Tuesday, November 13, 2007

निकम्मों के लिए खतरे की घंटी


देश के निकम्मों, सावधान हो जाओ। अब न तो चार्वाक दर्शन चलेगा और न ही मलूकदास की कविता, जिसमें सबके दाता राम होते हैं। भारतीय न्यायालय का डंडा चल पड़ा है। बचना मुश्किल।

गरीबी और नकारापन के कारण अपनी पहली पत्नी और उसके बच्चों को भरण-पोषण न देने पर मेरठ की एक अदालत ने एक व्यक्ति को जेल में मेहनत, मजदूरी की सजा सुनाई है। अभियोजन के अनुसार मेरठ जिले के कस्बा किठौर निवासी सलीम की शादी जिले के मुंडाली थाना अन्तर्गत ग्राम सफियाबाद लोटी की रहने वाली दिलजहान से 28 जून 1991 में हुई थी।
दूसरी शादी कर लेने और अपने परिवार का खर्च न उठाने पर परिवार न्यायालय के न्यायाधीश ने पत्नी का 450 रुपया और उसके तीन अव्यस्क बच्चों का भरण-पोषण 350 रुपए प्रत्येक के हिसाब से 1500 रुपए प्रतिमाह देने का आदेश गत 31 जनवरी 2001 को पारित किया था। अदालत के आदेश के बावजूद भरण-पोषण का एक भी पैसा न देने और अदालत में उपस्थित न होने के कारण सजायाफ्ता सलीम के विरुद्ध कई वारंट और रिकवरी वारंट भी जारी किए गए, लेकिन सलीम कोई चल-अचल संपत्ति न होने और रोजी के तौर पर कोई काम न करने की बात करता रहा। गत एक सितंबर 2007 को इसी न्यायालय ने कारावास का दंड देकर उसे मेरठ जेल भिजवा दिया। जहां वह इन दिनों अपनी सजा काट रहा है। परिवार न्यायाधीश आर.एस. यादव की अदालत में दिलजहान की खराब आर्थिक स्थिति को देखते हुए मेरठ जिला जेल के जेलर को आज आदेश दिए कि 40 वर्षीय सलीम को जेल में ही मेहनत, मजदूरी करवाकर कमाए गए तमाम पैसे को अदालत में जमा करवाया जाए जिससे गुजारा भत्ते के तौर पर उसकी पत्नी और बच्चों को दिया जा सके। अदालत ने अपने फैसले में यह भी आदेश दिए है कि भरण पोषण भत्ते की पूरी रकम अदा हो जाने तक उसे जेल में ही रखा जाए। अदालत ने यह भी स्वीकार किया है कि सलीम मन, बुद्धि और शरीर से स्वस्थ व्यक्ति है और सिर्फ नकारापन के कारण मेहनत, मजदूरी करके गुजारा भत्ता नहीं दे रहा है।
इस मामले में वादी दिलजहान के अधिवक्ता वी.के. गुप्ता ने बताया कि अदालत ने उच्चतम न्यायालय की ठक्कर एवं एस. नटराजन बैंच द्वारा वर्ष 1989 में 128 सीआरपीसी के तहत कुलदीप कौर बनाम सुन्दर सिंह मामले की रलिंग को आधार मानकर यह फैसला सुनाया है। अदालत के इस निर्णय से यह सवाल भी उठ गया है कि बकाया 1 लाख 18 हजार 500 रुपये और प्रति माह 1500 रुपए के गुजारे भत्ते की रकम क्या वह पूरी उम्र जेल में चक्की पीसकर चुका पाएगा? क्योंकि जिला जेल में मजदूरी के औसतन दस रुपए प्रतिदिन दिए जाने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि अदालत के आदेशों पर यदि पालन हुआ तो सलीम पूरी जिन्दगी जेल में बिताकर भी गुजारा भत्ते की पूरी रकम अदा नहीं कर पाएगा।
(साभार-जोश१८)

1 comment:

Pratik said...

यह तो सरासर ज़ुल्म है। आइए, हम सभी निकम्मे इसकी पुरज़ोर मज़म्मत करें। "दुनिया के निकम्मों, एक हो जाओ!"