Tuesday, December 4, 2007

अब क्या है जिसकी परदादारी


ओम कबीर
हर चेहरे से परदा गिर जाता है। कुछ का देर, तो कुछ का सबेर। लोग तो कह रहे थे कि तसलीमा मामले को उछालकर नंदीग्राम मामले पर परदा डाला जा रहा है। अब क्या बचा है, जिसकी परदादारी है। लोगों से अब क्या छुपा है। जो है सबके सामने है। अब ढोंग रचने से भी क्या फायदा। हर रंग उभर कर साफ नजर आ रहा है। कल तक जो गुजरात दंगे जैसे मुद्दे पर हिंदूवादियों की खिंचाई कर रहे थे, वही अब मुंह छिपाने के लिए परदे की ओट ढूंढ रहे हैं। गुजरात तो सबके सामने था। खुला खेल। नंदीग्राम में तो सब कुछ छिपकर हुआ। परदे के पीछे से हमला। उन्हें लगता था कि यह परदा हमेशा उनके चेहरे रहेगा। वो परदा भी गिर गया। अपने को बुद्धिजीवी कहने वाले शरमशार हैं। तसलीमा को शरण देने की कीमत मांगी गई है। वो भी सभ्य समाज को शरमशार कर देने वाली। अपनी लेखनी को कुंद करने की कीमत। सभ्य कहलाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी पहले अपने को वामपंथी कहलाना गवॆ समझते थे। अब शरमशार हैं। समझ में नहीं आता तसलीमा झुकी हैं या राजनीति का सिर नीचा हुआ है। वामपंथियों का सिर तो पहले ही झुका हुआ था। सांप्रदायिकता के खिलाफ नारा बुलंद करने वाले उसके तलवे तले दबे जा रहे हैं। वामपंथी अपने को आम आदमी से ऊपर समझते थे। अब शरम को भी पीछे छोड़ चुके हैं। इस मामले में उन्हें परदे की भी जरूरत नहीं। नंगापन भा रहा है। वो तो पहले भी अपनी बुराई नहीं सुनते थे, अब गालियों से उन्हें डर लगने लगा है। वामपंथी कहलाने से अब वे शरमाने भी लगे हैं। अभी बहुत से परदे गिरने बाकी हैं। तब तक, जब तक कि एक भी शरीर बचा है।

1 comment:

satyendra... said...

वाह-वाह क्या बात है, कम शब्दों में जोरदार धुलाई।