Sunday, April 5, 2009

हिंदू-मुसलमानों पर उठते सवालों का जवाब

सुनील जैन

क्या देश की अदालतों में मुस्लिमों से भेदभाव किया जाता है, जैसा कि अक्सर इल्जाम लगता है कि स्थानीय पुलिस हिंदुओं के मुकाबले उन्हें ज्यादा गिरफ्तार करती है?

क्या न्यायिक प्रणाली सिर्फ आंख बंद कर फैसला देती है और आतंकवाद के आरोपियों को बिना एक निष्पक्ष मुकदमे के उन्हें सजा दे देती है? क्या विभिन्न अदालतों और न्यायाधीशों के फैसलों का पहले अनुमान लगाया जा सकता है जैसा जॉन ग्रिशैम ने 'दी रनवे जूरी' में किया था?

क्या कमजोरगठबंधन सरकार की मौजूदगी अदालतों के किसी तरह के फैसले पर असर डालती है? जब कभी आप भारत की न्यायिक प्रणाली के बारे में सोचते हैं तो इस तरह के कई और सवाल भी खुद-ब-खुद दिमाग में आ जाते हैं।
कोलंबिया से राजनीतिक विज्ञान में पीएचडी शैलाश्री शंकर जो ऑस्टिन की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस में असिस्टेंट प्रोफेसर थीं और अब नई दिल्ली में पॉलिसी रिसर्च सेंटर में काम कर रही हैं, ने इन और ऐसे कई सवालों के सटीक जवाब देने की कोशिश की है।

अदालतों के अलग-अलग फैसलों के रूप में चरणों में दिलचस्प लेखन के अलावा शंकर ने अपने तर्कों को अलग आयाम देने के लिए दिलचस्प अर्थमितीय उदाहरणों का सहारा लिया है।

नतीजतन, लगभग इस किताब के अहम हिस्से के लगभग 200 पृष्ठ आसानी से एक बार में ही पढ़े जाते हैं। यह किताब मनुपात्र में दिए गए फैसलों पर आधारित है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय और अलग-अलग उच्च न्यायालयों के फैसले बड़ी तादाद में शामिल हैं।

जैसा कि आप उम्मीद करेंगे अदालतों ने लीक से हटकर फैसले दिए हैं। ये फैसले आपातकाल के दिनों से लेकर अत्यधिक सक्रियता के हैं। लेखक ने इसे बताने के लिए काफी अच्छे उदाहरणों का सहारा लिया है: जैसे प्रधान न्यायाधीश बेग 1978 में सेवानिवृत्त होने को ही थे, सार्वजनिक जीवन से जुड़ी 52 हस्तियों और वकीलों ने बॉम्बे मेमोरेंडम में सरकार से अपील की कि वह न तो न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ और न ही न्यायमूर्ति भगवती को नियुक्त करें।

उनका तर्क था कि उन्होंने काले कानूनमीसा को लागू करने के सरकार के अधिकार को बरकरार रखा था। दो वर्ष बाद, न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने मुकदमे के दौरान खुद में इस्तीफा न दे पाने की हिम्मत को लेकर माफी मांगी। दूसरे शब्दों में कहें तो न्यायाधीश इंसान भी हैं, और जनता के बीच अपनी वैधानिकता भी चाहते हैं।

सौभाग्य से लेखिका ने यह किताब लिखने के लिए जो तथ्य जुटाए हैं, उनसे पता चलता है कि न्यायमूर्ति अपनार् कत्तव्य भूल कर अपनी वैधानिकता पाने की कोशिश नहीं करते। सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने वर्ष 2005 में 1,700 मामलों की सुनवाई की।

यह संख्या अपने आप में काफी चकरा देने वाली है। इनमें से कुछ उदाहरणों को यहां पेश किया गया है: वर्ष 1985 से 1995 के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महज 35 प्रतिशत टाडा के मामले सुनवाई के लिए आए। अदालत में पेश इनमें से 57 प्रतिशत मामले ही राज्य के पक्ष में गए।

वर्ष 1950 से 1970 के दौरान निवारक निरोधक के मामलों में से सिर्फ 53 प्रतिशत ही ऐसे थे जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे। इनमें से 74 प्रतिशत मामलों का फैसला राज्य के हक में हुआ। टाडा के मामले में एक न्यायाधीश द्वारा आरोपी के पक्ष में आदेश दिए जाने की संभावना निवारक निरोधक मामले की तुलना में 48 प्रतिशत अधिक थी। इससे आपातकाल के बाद न्यायपालिका के नजरिये में परिवर्तन का संकेत मिलता है।

टाडा के मामलों में अगर कोई मुस्लिम याचिकाकर्ता है तो ऐसे मामले में राज्य के पक्ष में फैसला दिए जाने की संभावना 38 प्रतिशत कम थी (इससे प्रदर्शित होता है कि पुलिस दूसरे समुदायों की तुलना में अक्सर मुस्लिमों को ज्यादा पकड़ती है, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि अगर मुस्लिमों के खिलाफ हिंदू पक्षपात है तो निश्चित ही न्यायाधीशों में यह बिल्कुल नहीं झलकता।)

ऐसे मामलों में जिनमें आरोपी मुस्लिम था, हिंदू न्यायाधीशों के फैसले राज्य के पक्ष में 34 प्रतिशत कम रहने की संभावना थी। (सर्वोच्च न्यायालय में 87 प्रतिशत हिंदू न्यायाधीश।) गठजोड़ अल्पमत सरकारों के दौरान न्यायधीशों के राज्य के खिलाफ फैसला दिए जाने की संभावना 27 प्रतिशत अधिक थी। संसद पर हमले के बाद फैसले राज्य के पक्ष में अधिक लगे।
आधे से तीन-चौथाई मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के 40 प्रतिशत न्यायाधीश राज्य के पक्ष में रहते हैं, जबकि आधे से भी कम मामलों में वे 24 प्रतिशत राज्य के पक्ष में नहीं रहते हैं। सोचिए कि इन आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद मुकदमा लड़ने वालों को कैसे फायदा होगा।

लेकिन इस तर्क में कुछ खामियां भी हैं- मिसाल के तौर पर हर मामले को एक ही नजर से देखा जाता है, जबकि उनमें से कुछ निश्चित तौर पर ज्यादा अहम होते हैं। बीएमडब्ल्यू मामले में हमने देखा, कि मामला मजबूत होने के बावजूद भी कई बार सरकार आरोपी को सजा नहीं दिला पाती। यह फेहरिस्त काफी लंबी है।

इस किताब का उद्देश्य न्यायिक प्रणाली की सराहना करना या उसकी निंदा करना नहीं है। बल्कि इसके पीछे अदालती रवैये में पैटर्न को सामने लाना है। और उनके लिए सफाई की तलाश करना है। इस स्तर पर यह सराहनीय कार्य है। और यह पढ़ने के लिहाज से उत्कृष्ट है।


पुस्तक समीक्षा

स्केलिंग जस्टिस इंडियाज सुप्रीम कोर्ट, एंटी-टेरर लॉज ऐंड सोशल राइट्स

लेखिका: शैलाश्री शंकर

प्रकाशक: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

कीमत: 395 रुपये

पृष्ठ: 271

http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=14588

1 comment:

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

पता नहीं। मुझे तो लगता है इस देश में बहुत अल्पसंख्यक तुष्टिकरण है।