Thursday, April 23, 2009

हैं तो चुनावी मुद्दे, लेकिन पार्टियां उन्हें उठाती ही नहीं


अब दिल्ली को ही देखिए। शीला दीक्षित चुनाव जीत गईं। वाह, क्या बात है- तीसरी बार जीतीं। भाजपा ने मुद्दा भी क्या उठाया?? गजब की मरी पार्टी की तरह। कांग्रेस एक प्याज से सत्ता में आई थी, भाजपा ने सोचा कि सब्जियों को मुद्दा बनाकर वापस सत्ता पर काबिज हो जाएं। साथ ही बुझे मन से आतंकवाद का मसला भी उठाया, इस डर के साथ कि कहीं उनकी सरकार में हुआ संसद पर हमला जनता को न याद आ जाए। हुआ भी वही। जनता को याद रहा कि भाजपा के शासन में आतंकवाद भी था, सब्जी भी महंगी थी- बढ़िया है कि फिर से कांग्रेस को चुन लिया जाए।
अब ऐसा भी नहीं कि कांग्रेस ने कम नाश किया हो। आज स्थिति यह है कि आप अपने बच्चे को किसी मझोले दर्जे के निजी प्राथमिक स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं तो ४०,००० (चालीस हजार) डोनेशन, ७,००० तिमाही के हिसाब से २८,००० (अट्ठाइस हजार सालाना) फीस रख लीजिए। इसके अलावा ८०० रुपये महीने के हिसाब से १०००० रुपया सालाना बस भाड़ा। कुल मिलाकर न्यूनतम ९०,००० रुपये चाहिए, तब जाकर आपका बच्चा एलकेजी से यूकेजी में पहुंच पाएगा। इस तरह से करीब ७,५०० रुपये महीना आपको अपने एक बच्चे के लिए कमाना होगा। लेकिन यह चुनावी मसला नहीं...
इसी तरह से दिल्ली में भूमाफिया और बिल्डर सक्रिय हैं। रही सही कसर प्रॉपर्टी डीलर पूरा कर देते हैं। अगर आप किसी लाल डोरा (स्लम) इलाके में कमरा किराये पर लेना चाहते हैं तो २ कमरे का ६,००० रुपया महीना किराया देना होगा। दलाल को हर साल ६,००० रुपये दलाली देनी होगी। किसी भी प्लैट की कीमत दिल्ली के बाहरी इलाकों में भी २ कमरे का २० लाख रुपये से कम नहीं है। लूट मची है। लेकिन यह भी चुनावी मसला नहीं...
दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्री खुद स्कूल चलाते (शिक्षा माफिया??) हैं, उन्हें शायद किसी से भी ज्यादा पता है। भाजपा शायद इसलिए इसे मुद्दा बनाना नहीं चाहती होगी कि उसे भी किसी शिक्षा माफिया को शिक्षा मंत्री और शहरी विकास मंत्रालय किसी भूमाफिया या बिल्डर को देना हो....

2 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

चुनाव की यह पद्यति सार्थक मुद्दों के पनपने में बाधक है। जब ३०-४० हजार उम्मेदवार और कुकुरमुत्तों की तरह दल हों तो मुद्दे शोर में मर जाते हैं।
राष्ट्रपतीय प्रणाली में सार्थक मुद्दों के लिये बेहतर स्पेस होगा।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

सब्ज़ियों का मसला कहां उठाया था साहब? वो तो बस ये बताने में लगे रहे कि हमारी ओर से सीएम इन वेटिंग कौन है. सब्ज़ियों का मसला उठा देते तो अगली बार उनको सस्ती न करनी पड़तीं!