Thursday, July 16, 2009

हां... ओबामा कर सकते हैं!

किशोर सिंह

उन्हें यायावर कहा जा रहा था, जो किसी सर्द और अंधेरे कोने से भटकते हुए अमेरिकी राजनीति के मंच पर आ पहुंचे थे।
दो लगातार लड़ाइयों और आतंकी हमलों से टूट चुके, बेजार अमेरिका को उनकी शख्सियत तिलिस्मी लगी, एक पहेली, जिसे बूझने की कुव्वत उसके पास नहीं थी। इससे पहले डेमोक्रेटिक पार्टी मान चुकी थी कि राष्ट्रपति की कुर्सी अब हिलेरी क्लिंटन के लिए है।
हिलेरी ने तो बहुत पहले ही व्हाइट हाउस पर निगाह जमा भी ली थी। लेकिन अचानक हिफाजत और सेहत की बात फिजां में तैरने लगी और अमेरिका के डरे, सहमे वाशिंदों को लगा कि इन्हें हासिल करने के लिए अब बदलाव जरूरी है। बदलाव.. यानी बराक ओबामा।
रिचर्ड वोल्फ न्यूजवीक के वरिष्ठ संवाददाता हैं और एक वक्त फाइनैंशियल टाइम्स के साथ भी काम कर चुके हैं। उन्हें लगता है कि बराक ओबामा पर किताब लिखना इसलिए भी वाजिब है क्योंकि उनकी कहानी से अब तक लोग रूबरू नहीं हुए हैं। वोल्फ ने यह काम राष्ट्रपति पद की होड़ में शामिल होने के ओबामा के ऐलान के साथ ही शुरू कर दिया।
दिलचस्प है कि जिस तरह राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने से पहले सोनिया गांधी की मुखालफत का सामना करना पड़ा था, वैसा ही ओबामा के साथ भी हुआ। वोल्फ लिखते हैं, 'संसद तक पहुंचने की ओबामा की कोशिश 2000 में नाकाम हो चुकी थी, जिससे मिशेल को बेहद नफरत थी और उनकी छोटी बेटी के जन्म के समय उनकी शादी पर भी खतरा मंडरा रहा था।
उनके बीच बातचीत न के बराबर थी और रोमांस तो गायब ही हो गया था। मिशेल को ओबामा की खुदगर्जी और करियर के पीछे दौड़ने की फितरत से नफरत थी, जबकि ओबामा मानते थे कि उनकी पत्नी बेहद सर्द स्वभाव की और नाशुक्र किस्म की थीं।'
मिशेल की चिंता थी कि ओबामा का रोजमर्रा का कार्यक्रम कैसा होगा। वह घर पर कितना रुकेंगे? बेटियों और पत्नी के लिए उनके पास कितना वक्त होगा? क्या हफ्ते के आखिर में वह घर पर रुक पाएंगे? और उन्हें जवाब मिला - नहीं! इधर ओबामा ने तय कर लिया कि उन्हें चुनाव लड़ना है और उन्होंने वोल्फ को प्रचार अभियान पर लिखने की सलाह दी। वोल्फ की किताब 'द मेकिंग ऑफ बराक ओबामा' में 21 महीने का ब्योरा है, जिसमें वह 'उम्मीदवार ओबामा' के साथ चले और 'राष्ट्रपति ओबामा' के साथ व्हाइट हाउस पहुंचे। हरेक रणनीति में शामिल रहे, ओबामा के भाषणों, उनकी गलतियों, उनकी कमजोरियों, उनकी ताकत और अमेरिका को बदलने के उनके भरोसे को बेहद करीब से वोल्फ ने महसूस किया।
एकबारगी ओबामा ने वोल्फ से कहा, 'तुम्हें पता है, मेरे लिए भरोसे का क्या मतलब है? मैं केवल बदलाव के नाम पर बदलाव नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि बेघर बच्चों को अच्छे स्कूल मिलें। मैं सबके लिए सेहत चाहता हूं।'
जब ओबामा ने इओवा गुट का समर्थन हासिल किया, तो उनकी टीम में शामिल डेविड प्लॉफ ने कहा, 'यह राजनीति का होली ग्रेल है। (ईसाई धर्म में होली ग्रेल वह प्याला है, जिसका इस्तेमाल ईसा मसीह ने सूली पर चढ़ाए जाने से पहले अपने आखिरी भोजन में किया था।
इसे करिश्माई ताकत वाला माना जाता है और इसे पाने के लिए सदियों से कोशिशें चल रही हैं।)' लेकिन इस जबरदस्त जीत का खुमार एक ही झटके में उतर गया, जब न्यू हैंपशायर में ओबामा को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। लेकिन यहीं से ओबामा ने नारा दिया, 'हां, हम यह कर सकते हैं।'
21 महीने में अमेरिका की किस्मत बदल गई, 21 महीने में बराक ओबामा की भी किस्मत बदल गई। इस दरम्यान वोल्फ ओबामा की परछाईं बने रहे। उन्हें ओबामा को अमेरिका में सड़कों पर राजनीति की बिसात बिछाने वाले आयोजकों के सामने मुस्कराते देखा, मतदाताओं से हाथ मिलाते देखा, भाषण का अभ्यास करते देखा, अपने परिवार का इतिहास उसमें मिलाते देखा और अमेरिका के सामने पड़ी संभावनाओं की झांकी सबके सामने रखते हुए भी देखा।
ओबामा को थकान महसूस नहीं होती, वह बहुत बड़ा सोचते हैं, हार और जीत में भी सबक सीखते हैं, अपने परिवार को मीडिया की पैनी निगाहों से बचाना जाते हैं, शायद इसी वजह से अमेरिका ही नहीं दुनिया में बदलाव की बयार की ठंडक इस किताब में मौजूद है।


पुस्तक समीक्षा

द मेकिंग ऑफ बराक ओबामा
संपादन : रिचर्ड वोल्फ
प्रकाशक : वर्जिन बुक्स
कीमत : 13.99 पाउंड
पृष्ठ : 365

http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=21367

1 comment:

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

मैने यह रिव्यू पढ़ा है और खरीदने का मन है यह किताब।