Wednesday, August 5, 2009

संसद के इतिहास में पहली बार बनियों पर हंगामा

भारत के स्वतंत्र होने का बाद पहली बार ऐसी स्थिति आई है, जब संसद कारोबारियों के मसले पर बंधक बन गई। संप्रग सरकार के इसके पहले कार्यकाल में भी स्पस्ट नजर आ रहा था कि पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा परोक्ष रूप से मुकेश अंबानी की मदद कर रहे हैं। लेकिन हुआ कुछ ऐसा कि सरकार ने उन्हें दोबारा उसी पद पर विभूषित कर दिया है। वैसे भी मुरली देवड़ा की राजनीति में पैठ उद्योगपतियों की दलाली से ही शुरू हुई। बाद में १९९१ में आर्थिक उदारीकरण के बाद जब उनका धंधा मंदा पड़ गया तो उन्होंने राजनीति की राह पकड़ी और मुंबई की शव यात्राओं में शामिल होकर, तरह तरह के भोज कराकर उन्होंने राजनीतिक क्षेत्र बनाया और संसद में पहुंचने में कामयाब हो गए। सांसद बनने के बाद तो किसी की औकात नहीं कि उन्हें कोई जनप्रतिनिधि नहीं माने।अब मुलायम सिंह सहित उनके तमाम साथियों ने जब देश की नीति को बंधक बनाकर मुकेश अंबानी को लाभ पहुंचाने और अनिल अंबानी की बिजली परियोजना रोकने की बात उठाई तो बवाल मच गया।हालांकि मुरली देवड़ा या उनके जैसे नेताओं के खिलाफ कुछ करने में सरकार सक्षम नहीं लगती। ग्लोबलाइजेशन के नाम पर अब सरकार ने अपने हाथ कुछ इस कदर बांध लिए हैं कि बैंकों को राहत पैकेज देने के लिए ७२ हजार करोड़ रुपये दिए जाते हैं और सरकार उसे किसानों की कर्जमाफी का नाम देती है।मुलायम सिंह जैसे लोग जब संसद में सवाल उठाते हैं कि किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिलना चाहिए तो पक्ष-विपक्ष में उनका साथ देने वाला कोई नहीं होता। अब राजनीति पूरी तरह से नोटों पर चलती नजर आती है।
आखिर संसद में बोलते हुए मुलायम सिंह ने क्या बुरा कहा था कि केंद्र सरकार की कृषि पर गठित समिति ने गेहूं का प्रति क्विंटल उत्पादन मूल्य ९०० रुपये बताए थे, साथ ही कहा था कि कच्चा माल होने की वजह से इस पर किसानों को ५० प्रतिशत मुनाफा मिलना चाहिए जैसा कि अन्य कारोबार में होता है। मुलायम ने पूछा कि किसानों को सरकार गेहूं की यह कीमत कब देगी? लेकिन सवाल दब गया। यहां तो समलैंगिकता महत्वपूर्ण सवाल है, राखी सावंत का विवाह देश के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। ८० करोड़ किसानों को पूछने वाला कौन है????

4 comments:

चन्दन कुमार said...

abhi aur itihas banane wale hain , bas dekhte jaiye

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

देश की अगली हरित क्रांति करनी हो तो रा.सावन्त को कृषि मन्त्री बना दें। हरित क्रान्ति न भी हो तो किसान का मन मनसायन हो कर हरियरा जायेगा। :)

परमजीत बाली said...

सरकारी तंत्र सिर्फ पूँजी पतियों के लिए ही काम कर सकता है.....जो उन्हें भी फायदा पहुँचाते हैं.....किसान भला क्या फायदा पहुँचाएगा उन्हें....। अब मुलायम जी की जरूरत नही तो कौन सुनेगा उनकी....

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

कष्टकर बात यह है कि अगर अमर सिंह की सेहत पर बात करनी हो या अपने किसी आदमी को कोई ख़ास लाभ दिलाना हो तब तो मुलायम सिंह सवाल पूछ-पूछ के संसद के नाक में दम कर देंगे. लेकिन किसानों का सवाल वह भी बस एक बार करके खानापूरी कर देते है और इसके बाद मामला खल्लास.