Friday, November 20, 2009

तोड़फोड़ और हंगामा करके सारी व्यवस्था न ठप करें तो क्या करें किसान?

किसान अपना अनाज बहुत सस्ते में बेचता है। गेहूं अगर १००० रुपये क्विंटल के हिसाब बेच देता है तो उसे आटा २००० रुपये क्विंटल मिलता है। अगर उसने अरहर २० रुपये किलो बेचा तो उसे दाल ९० रुपये किलो मिल रही है। आखिर कौन खा रहा है मुनाफा? जिंसों की कमी दिखाकर मुनाफाखोरी चरम पर है और सरकार इस मसले पर विकलांग बनी हुई है। जिंसों के उत्पादों के खरीदारों को भी नुकसान और किसान अगल तबाह है।
तर्क दिया जा रहा है कि किसानों ने बहुत उत्पात मचाया। दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान। आखिर बेचारा किसान अपनी बाद किस ढंग से रखे। क्या अगर वह अपने घरों में शांत बैठकर सब दुख झेलता रहता है तो यह कथित सभ्य समाज और मीडिया उसकी बात को उठाता है? दिल्ली के अखबार किसानों के उत्पात के विरोध से पटे पड़े हैं। आखिर में इसके पहले इन मुनाफाखोरों और नेताओं के समर्थक कहां सोए रहते हैं?
पिछले पांच महीनों महीनों के दौरान कृषि के गौण उत्पादों की कीमतों में भारी उछाल आयी है, लेकिन उसका कोई लाभ कृषि के प्राथमिक उत्पादकों को नहीं मिला है।
किसानों को इसी बात की आशंका सता रही है कि आने वाले समय में भी उनके प्राथमिक उत्पाद न्यूनतम समर्थन मूल्य या उसके आसपास की कीमत पर खरीद लिए जाएंगे और उससे जुड़े उत्पाद चार या पांच गुने दाम पर बिकेंगे। एक आम उपभोक्ता के नाते उन्हें भी उसी बढ़ी कीमत पर गौण उत्पादों की खरीदारी करनी पड़ती है।
किसानों के मुताबिक पिछले सीजन में उन्होंने मंडी में दलहन (अरहर) की बिक्री 2000 रुपये प्रति क्विंटल तो मसूर की बिक्री 1700 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की थी। नए दलहनों के लिए सरकार ने कीमतों में प्रति क्विंटल 30-60 रुपये की बढ़ोतरी की है।
इस साल भी वे अधिकतम 1800-2200 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से दलहन की बिक्री करेंगे। जबकि नए सीजन में भी दालों के भाव में कोई खास गिरावट की संभावना नहीं है। किसान बताते हैं कि किसी दलहन को दाल बनाने एवं उस पर पॉलिश वगैरह करने में प्रति किलोग्राम अधिकतम 6 रुपये की लागत आती है।
मांग के मुकाबले आपूर्ति में कमी आते ही बाजार में भाव चढ़ने लगते हैं, लेकिन उस अनुपात में उन्हें उसका लाभ नहीं मिलता है। किसान कहते हैं कि उनके लिए मांग एवं पूर्ति का कोई सिध्दांत काम नहीं करता। गन्ने के भुगतान मूल्य के मामले में भी किसानों की यही शिकायत है।
दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे किसान पूछते हैं, 'क्या केवल चीनी बनाने की लागत बढ़ती है? चीनी की कमी होते ही 140-145 रुपये प्रति क्विंटल की दर से खरीदे गए गन्ने से बनी चीनी की कीमत 3600-3700 रुपये प्रति क्विंटल हो गयी तो क्या इसका लाभ गन्ना किसानों को नहीं मिलना चाहिए?'
गेहूं किसान रुआंसे मन से कहते हैं, 'पिछले साल उन्होंने अधिकतम 1000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गेहूं की बिक्री की, लेकिन धान के उत्पादन में कमी को देखते हुए बाजार में गेहूं की कीमत 1400 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी है। उन्हें इसका कोई लाभ नहीं मिला। उल्टा उन्हें अब 20 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से खाने के लिए आटा खरीदना पड़ रहा है।'


प्राथमिक उत्पादक को नहीं मुनाफा
कृषि जिंस कीमत जुड़े उत्पाद कीमत
दलहन अरहर 2000 अरहर दाल 9000
दलहन मसूर 1700 मसूर दाल 6000
सरसों 1600 सरसों तेल 6000
धान 950 चावल 2200
बासमती धान 1300 चावल 6500
गेहूं 1000 आटा 1900
चीनी 1800 चीनी 3700


सभी कीमत रुपये प्रति क्विंटल में

4 comments:

Suresh Chiplunkar said...

बिलकुल सही लिखा है आपने। दिल्ली के धन्ना सेठों के आराम में जरा सा खलल पड़ा तो तुरन्त चिल्लाने लगे… वरना कभी किसानों के बारे में सोचते तक नहीं…। ऐसा निकम्मा और भ्रष्ट कृषि मंत्री आज तक भारत ने नहीं देखा… पिछले साल जब शकर ज्यादा हुई थी तब 17 रुपये के भाव पर निर्यात कर दी, और तुरन्त 6 माह बाद शकर कमी बताकर 24 रुपये के भाव पर आयात भी कर ली…। मधु कोड़ा भी कहीं नहीं लगता पवार के सामने…

Suman said...

kissan sabs kamjor hai asangathit hai isliye sabse jyada shoshan usi ka ho raha hai har ckhane vaali cheej ko vo paida karta hai aur svayam aatmhatya k liye majboor hai parjivi logo k liye hi vyavastha hai kisaan k liy kaun si vyavastha aaj tak hui hai jara use bhi likhne ka kast klarein har chunaav mein rajnitik dal kisaano ki hi baat karte hain kisaano k fayde k liye hi kanoon banaye jaate hain kintu unbke fayde k liye banaye jaane vaale kanoono se ve aatmhatya k liye majboor ho rahe hain. tata birla, dalmiya ambaniyo k liye koi rajnitik dal unke fayde k liye kanoon banane ki baat nahi karta hai unki parsampattiyan saal mein hajaron guna badhti hain .
suman
loksangharsha

शरद कोकास said...

यह सही विश्लेषण है ।

विजय पाण्डेय said...

उल्टा सब लाठी लेकर किसानों पर पिल पड़े हैं... उनमें से कई किसान पुत्र ही हैं... वैसे भी इनकी नजर में किसान कीड़े मकोड़े से ज्यादा नहीं है... किसान आत्महत्या करता है तो करता रहे... इनकी बला से... हां जब किसान पूरी तरह से बाजार बन जाएगा तब देखेंगे