Tuesday, December 14, 2010

दिग्विजय-चिदंबरम की कुड़ुमई की वजह

दिल्ली में सामूहिक बलात्कार, रोड रेज, चोरी, छिनैती आदि करने वाले प्रवासी (यानी दूसरे राज्यों से आए लोग) हैं। मुंबई में हेमंत करकरे ने अपनी हत्या के पहले कहा था कि उन्हें हिंदूवादियों से खतरा था।

कांग्रेस के दो बड़े नेताओं ने ताबड़तोड़ यह बयान दिया। क्या ये दोनो पागल हो गए हैं? ऐसा नहीं है। ये दोनों बहुत सयाने और दस जनपथ के चहेते हैं। दरअसल एक लाख पचहत्तर हजार करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है और वह सत्ता पक्ष व विपक्ष के न चाहते हुए भी एक देशव्यापी मुद्दा बन गया है। इसके जवाब में कुछ तो चाहिए। हेमंत करकरे के बारे में दिए गए बयान की हवा शहीद की पत्नी ने ही निकाल दी और वह मसला नहीं बन पाया। ऐसे में चिदंबरम का बयान आना स्वाभाविक था। कांग्रेस तो मान ही चुकी है कि उसे उत्तर प्रदेश और बिहार में हाल फिलहाल में कुछ नहीं मिलना है। यह मसला उठाने पर महज यूपी बिहार में ही असर पड़ना है। ऐसे में कांग्रेस के रणनीतिकारों को यह बयान दिए जाने में कोई जोखिम नहीं महसूस हुआ, वर्ना यह बयान आने के बाद चिदंबरम को देश का गृहमंत्री बने रहने का हक नहीं होता।
मेरे कुछ मित्रों ने इसके पहले की पोस्ट में संसद के साथ बलात्कार शब्द पर आपत्ति उठाई थी और उन्होंने पोस्ट पर प्रतिक्रिया नहीं दी थी। इसलिए इसके लिए मैने थोड़ा सॉफ्ट बनारसी शब्द कुड़ुमई शब्द इस्तेमाल किया।
प्रवासी मजदूरों का मसला ऐसा है, जिस पर कांग्रेस व भाजपा दोनों की एक ही राय है। जो बात शीला दीक्षित, तेजिंदर खन्ना और अब चिदंबरम कह रहे हैं या कहते रहे हैं, कुछ वैसा ही भाजपा के विजय मलहोत्रा, विजय गोयल भी गाहे-बगाहे कहते रहते हैं। अभी कल ही विजय मलहोत्रा ने चिदंबरम का विरोध करते हुए कह ही दिया कि एनसीआर के लोग दिल्ली आते हैं और अपराध करके चले जाते हैं। ऐसे में दोनों पार्टियों की राय एक ही है।
मजदूरों के वास्तविक संकट और झुग्गी बस्तियों को खत्म करना एक ऐसा मसला है, जिसे पूंजीवादी व्यवस्था में कोई हल नहीं करना चाहता। अगर झुग्गी नहीं बसानी होती तो औद्योगिक क्षेत्रों में जब जमीन दी जाती है, उसी समय उस इकाई में काम करने वाले औद्योगिक मजदूरों के लिए भी रहने के लिए जमीन देकर भवन बनवा दिए जाते। अगर यह अनिवार्य हो जाए तो किसी भी जगह से आने वाला मजदूर झुग्गी बस्तियों में रहने को मजबूर नहीं होगा। लेकिन इसमें समस्या यह है कि तब मुफ्त के और सस्ते मजदूर नहीं मिलेंगे, क्योंकि उस इकाई विशेष में काम करने वालों की सही गणना हो जाएगी और उन्हें फैक्टरियों को उचित मजदूरी देनी पड़ेगी।
समस्या यही है कि कांग्रेस चोर इसलिए है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी डकैत है। ये दोनों जानते भी हैं कि अभी देश में इनका कोई विकल्प नहीं है, जैसा कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों ने ढूंढ लिया है। कांग्रेस जनता की समझ को जानती है कि वह चोरों के बजाय डकैत को चुनना नहीं चाहेगी, इसलिए उसकी सत्ता को फिलहाल कोई खतरा नहीं है। लेकिन कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका और उद्योग जगत ने जिस तरह से उत्पात मचा रखा है, उससे एक संभावना हमेशा जिंदा रहती है कि जनता इनके खिलाफ एकजुट हो जाए और कुछ कर बैठे।

4 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

विचारात्‍मक विश्‍लेषण।

---------
दिल्‍ली के दिलवाले ब्‍लॉगर।

प्रवीण पाण्डेय said...

राजनीति का पालन नहीं, फुटबॉल बना कर खेल हो रहा है।

संदीप पाण्डेय said...

हम हुए तुम हुए कि मीर हुए
उनकी जुल्फों के सब असीर हुए

satyendra said...

wah sandeep ji, is umra me bhee unki julfon ke aseer congress me bache hai.