Sunday, September 24, 2017

क्या बीएचयू और भारत के अन्य विश्वविद्यालय अब तेहरान युनिवर्सिटी बनने की ओर बढ़ रहे हैं?

सत्येन्द्र पीएस

ईरान में 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई। बड़े बड़े आंदोलन हुए। खोमैनी का शासन आ गया। ईरान इस्लामिक स्टेट बन गया। वहां सब कुछ बदल गया। ड्रेस कोड बना। विश्वविद्यालयों में इस्लामी पहनावा लागू हो गया। तरह-तरह के प्रतिबंध लग गए। अब हालात यह हैं कि जिस तेहरान युनिवर्सिटी को अमेरिका या ब्रिटेन के तमाम नामी गिरामी विश्वविद्यालयों के साथ मुकाबले के लिए जाना जाता था, उसका कोई नामलेवा नहीं है। क्या आपने सुना है कि आपका कोई परिचित कह रहा हो कि उसका सपना तेहरान युनिवर्सिटी में अपने बच्चे को पढ़ाने का है? ज्यादातर लोग तो जानते भी नहीं हैं कि ईरान या तेहरान में कोई युनिवर्सिटी भी है, या वहां के स्कूल कॉलेज को मदरसा वगैरा ही कहते हैं।



भारत में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद तमाम बदलाव हुए। सरकार ने विश्वविद्यालयों में अपनी मर्जी के कुलपति रखे। उन्हीं में से एक काशी हिंदू विश्वविद्यालय है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय को मैं हरि गौतम के जमाने से जानता हूं। उस समय कैंपस अशांत थे। तरह तरह के आंदोलन होते थे। गुंडे न केवल विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में दखल करते थे, बल्कि वहां के तमाम प्रोफेसर राजनीतिक रूप से ताकतवर जातीय गुंडा राजनेताओं के आदमी बन चुके थे और विद्यार्थियों को भड़काते थे। आए दिन विश्वविद्यालय में मारपीट, गुंडागर्दी, बमबाजी होती थी।
हरि गौतम के समय से सख्ती शुरू हुई। कैंपस शांत हो गया। उसके बाद वाई सी सिम्हाद्री, पंजाब सिंह, लालजी सिंह कुलपति बने। सभी अपने ज्ञान क्षेत्र में अव्वल थे। पहले भी वाइस चांसलर या तमाम बड़े पदों पर रहने के बाद बीएचयू पहुंचे थे।
केंद्र में 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद प्रोफेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी कुलपति बने। उस समय तक मैंने कभी इनका नाम नहीं सुना था। नाम न सुनना कोई बड़ी बात नहीं। देश में तमाम ऐसे विद्वान हैं, जिनका हम नाम नहीं सुने हुए होते हैं। लेकिन बाद में पता करने पर जानकारी मिल जाती है कि संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि क्या है। मुझे याद है कि सबसे पहली जानकारी प्रोफेसर त्रिपाठी के बारे में यही मिली थी कि वह पंडित मदन मोहन मालवीय के नाती के बहुत खास हैं। उसके बाद मैंने कई स्रोतों से पता करने की कोशिश की कि त्रिपाठी की एकेडमिक या प्रशासनिक उपलब्धि क्या रही, लेकिन कुछ भी जानकारी नहीं मिल सकी।
त्रिपाठी के कुलपति बनने के बाद उनके एक से बढ़कर एक कारनामे सामने आने लगे। बयान तो किसी विकृत मानसिकता के पुरबिया क्षुद्र व्यक्ति से नीचे।
विश्वविद्यालय के परिसर में लाइब्रेरी को 24 घंटे खोले जाने के लिए चल रहे आंदोलन के दौरान उनके बयानों को देखें। उन्होंने कहा, “लड़के बदमाश हैं, कॉपर वायर तोड़ ले जात्ते हैं, माउस चुरा ले जाते हैं, हार्डडिस्क निकालकर ले जाते हैं। पेन ड्राइव में अश्लील फ़िल्में देखते हैं। इन सबसे अलग उनके वहां रहने से एकदम दूसरी समस्या पैदा हो सकती है कि वे वहां क्या कर रहे हैं?”

शायद प्रोफेसर त्रिपाठी को अपने देश के ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी के बारे में ही जानकारी नहीं है, जहां विद्यार्थियों को 24 घंटे पढ़ने की सुविधा दी जाती है। वहां सेक्सुअल क्राइम के केसेज बहुत कम सामने आते हैं। आप कैंपस में घूमिए। तमाम झाड़ियां हैं। पहाड़ी विश्वविद्यालय बना है और आधे से ज्यादा छात्राएं हैं। लेकिन कहीं कुछ भी आपत्तिजनक या अश्लील या सेक्सुअल क्राइम नहीं मिलता, जबकि प्रोफेसर त्रिपाठी ने विश्वविद्यालय कैंपस में क्या ढूंढा, उनके इस बयान से अंदाज लगा सकते हैं। उन्होंने कहा, “एक बात मैंने यहां सघन तलाशी करायी। रात नौ बजे के बाद शहर के तमाम लड़के और लड़कियां यहां बैठे रहते हैं। अपनी कार से रात में निकला, लोगों ने कहा कि अरे आप वीसी हैं, हम ले चलते हैं। लेकिन मैं अध्यापक हूं। मैं निकला और मैंने देखा कि एक लड़का और लड़की ऐसी अवस्था में बैठे थे कि क्या बताऊं. मैंने गाड़ी रोकी। मैंने बैठा लिया गाड़ी में, कुछ और नहीं किया. मैंने केवल इतना कहा कि चलो तुम्हारे गार्जियन से बात करें. वे गिडगिडाने लगे, अरे नहीं सर, गलती हो गयी सर। फिर मैंने उन्हें छोड़ भी दिया।”

यह है काशी हिंदू विश्वविद्यालय का माहौल। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कंडोम गिनने का ठेका तो भारतीय जनता पार्टी के विधायक को दिया गया है, लेकिन बीएचयू में कंडोम बीनने खुद कुलपति निकल चुके हैं। उनका यह मकसद कतई नहीं रह गया है कि विश्वविद्यालय में ऐसा माहौल बना दिया जाए, जहां बच्चों के दिमाग में विश्व का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी बनने और लगातार पठन पाठन, शोध में रहे बल्कि वह विद्यार्थियों को किसी अलग ही नियम में बांधने को आतुर नजर आते हैं। जबकि हकीकत यह है कि विश्वविद्यालय में श्रेष्ठ विद्यार्थियों का एडमिशन होता है, जिनका पहले से एकेडमिक रिकॉर्ड बहुत शानदार रहा होता है। विश्वविद्यालय कड़ी परीक्षा लेने के बाद विद्यार्थियों को एडमिशन देता है। वाराणसी में कुल मिलाकर 4 विश्वविद्यालय हैं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, उदय प्रताप स्वायत्तशासी कॉलेज के अलावा पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर के डिग्री कॉलेज भी शहर में हैं। इसके अलावा बौद्ध विश्वविद्यालय़ भी सारनाथ में उपस्थित है। इन सबकी मौजूदगी के बीच विद्यार्थियों का सपना होता है कि वह अगर वाराणसी में पढ़ें तो बीएचयू में ही पढ़ें। बाहरी दुनिया के बच्चे भी बीएचयू में ही पढ़ने आते हैं। इस स्थिति में स्वाभाविक रूप से विश्वविद्यालय में क्रीम स्टूडेंट्स को ही जगह मिल पाती है।

हालांकि जेएनयू को भी श्रेष्ठ विश्वविद्यालय नहीं माना जा सकता। वैश्विक दुनिया में जेएनयू का कोई खास मुकाम नहीं है। लेकिन बमुश्किल 10,000 विद्यार्थियों के कैंपस का भारत के स्तर पर सफलता का अनुपात जबरदस्त है। वहां से आईएएस निकलते हैं, ब्यूरोक्रेट्स निकलते हैं, राष्ट्रीय स्तर के नेता निकलते हैं। वहीं अगर मौजूदा बीएचयू को देखें तो देश के प्रतिष्ठित संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अक्सर बीएचयू का नाम गायब रहता है, जो एक लाख विद्यार्थियों का कैंपस है। वैश्विक स्तर पर विश्वविद्यालय की स्थिति तो जाने ही दें।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय में जातीय लंपटई का इतिहास पुराना है। यह देश का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जहां 80 के दशक तक एडमिशन के लिए फार्म भरने वाले विद्यार्थियों से यह पूछा जाता था कि आप ब्राह्मण हैं या गैर ब्राह्मण। मोटे तौर पर इस समय भी विश्वविद्यालय में 70-80 प्रतिशत ब्राह्मण टीचिंग स्टाफ है। इतना ही नहीं, तमाम प्रोफेसर तो खानदानी हैं, जो वहां कई पीढ़ियों से पढ़ाए जाने के योग्य पाए जा रहे हैं। ऐसे में जातीय बजबजाहट यहां नई बात नहीं है।

इन सबके बावजूद हाल के वर्षों में ब्राह्मण या गैर ब्राह्मण पूछा जाना बंद हुआ। जातीय कुंठा भी कुछ घटी और अध्यापक नहीं तो विद्यार्थियों में जातीय विविधता आई। आरएसएस के स्वयंसेवक प्रोफेसर त्रिपाठी के कुलपति बनने के बाद विश्वविद्यालय एक बार फिर ब्राह्मणवादी कुंठा में फंसता नजर आ रहा है।

(बीएचयू बज, फेसबुक से ली गई तस्वीर। लड़कियों पर लाठी चार्ज के बाद)
विश्वविद्यालय में कुलपति अपने को गैर राजनीतिक होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन मामला इससे उलट है। अगर विश्वविद्यालय की छात्राएं छेड़खानी का विरोध कर रही हैं तो उन पर लाठियां चल रही हैं। विश्वविद्यालय के सुरक्षाकर्मियों की लंबी चौड़ी फौज है, जिनकी कैंपस में जबरदस्त गुंडागर्दी चलती है। वह मामला नहीं संभाल पाते हैं तो बाहर से पुलिस और पीएसी बुलाई जाती है। रात रात भर कैंपस में बवाल चलता है। लड़कियों को पीट पीटकर पुलिस हाथ पैर तोड़ देती है।

यह मामला काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति परिसर में टैंक रखवाना चाहते हैं, जिससे विद्यार्थियों में देशभक्ति आए। विश्वविद्यालय के कुलपति को टैंक में देशभक्ति दिखती है।

इसमें सबसे ज्यादा बुरा हाल छात्राओं का होने जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महराज बयान देते हैं कि लड़कियां मोटरसाइकिल पर बैठकर चलती हैं, इसलिए उनके साथ बलात्कार हो जाता है।

सवाल यह है कि हम किस दौर की ओर बढ़ रहे हैं। क्या हम इस्लामिक स्टेट की तरह भारत को हिंदू स्टेट बनाकर बर्बादी की ओर ले जाना चाहते हैं या रूस, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, यूरोपियन यूनियन की तरह समृद्ध और खुला समाज चाहते हैं? भारत में तो यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि कोई लड़की या महिला रात के सुनसान में अपने घर से निकलकर अकेले कहीं सड़क पर घूम सकती है, या किसी अपने परिचित की मदद के लिए पैदल निकल सकती है। महिला ही क्या, पुरुष भी यह सोचकर नहीं निकल सकते कि दो बजे रात को अगर वह सड़क पर जा रहे हों तो सुरक्षित घर लौटेंगे या नहीं। लेकिन किसी भी सभ्य, विकसित देश में यह आम बात है। फैसला हमें करना है कि हम देश को किस तरफ ले जाना चाहते हैं। विकसित, समृद्ध, सुरक्षित देश बनना चाहते हैं जहां ज्ञान विज्ञान और सुविधाओं के साथ सुरक्षा हो, या इस्लामिक स्टेट आफ ईरान की तरह हिंदू स्टेट आफ इंडिया बनना चाहते हैं।

फोटो क्रेडिट -1 और 2
http://www.dailymail.co.uk/travel/travel_news/article-4148684/Stunning-photos-reveal-life-Iran-revolution.html
फोटो क्रेडिट-3
http://www.payvand.com/news/17/sep/1083.html





दक्षिण भारत का टैक्स डिनायल सत्याग्रह कर रहा केंद्र सरकार की नाक में दम, आइए देखें क्या मामला है और क्यों हो रहा है आंदोलन



सत्येन्द्र पीएस

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किए जाने को कर की दिशा में ऐतिहासिक कदम करार दिया जा रहा है, वहीं 1 जुलाई 2017 से लागू कर व्यवस्था में तमाम विसंगतिया सामने आ रही हैं। दक्षिण भारत में इस कर के खिलाफ कर अवज्ञा सत्याग्रह (टैक्स डिनायल सत्याग्रह) चल रहा है।
कर अवज्ञा सत्याग्रह चला रहे ‘सत्याग्रह ग्राम सेवक संघ’ का कहना है कि आजादी के बाद पहली बार हस्तशिल्प को कर के दायरे में लाया गया है। यह गरीब तबके, कुटीर एवं लघु उद्योग चलाने वालों का एकमात्र सहारा है, जिसे अब तक सरकारें संरक्षण देती रही हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग इस क्षेत्र से रोजगार पाते हैं और स्थानीय कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन का मौका भी मिलता है।
सत्याग्रहियों का कहना है कि प्राकृतिक उत्पाद स्वाभाविक रूप से महंगे होते हैं। वे उदाहरण देते हुए बताते हैं कि खादी की साड़ी की कीमह सूरत की सिंथेटिक साड़ी से हमेशा महंगी होती है। अब कर लगने के बाद उसका दाम और बढ़ जाएगा।
एक तर्क यह भी सामने आता है कि अगर कोई उत्पाद बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता है तो क्यों न उसे बाजार से बाहर हो जाने दिया जाए ? हालांकि साथ में एक अभियान यह भी चल रहा है कि प्रकृति और प्राकृतिक उत्पादों की ओर चलना चाहिए, जो कहीं ज्यादा सुरक्षित और प्रकृति के अनुकूल हैं। प्राकृतिक उत्पादों की ओर जाने का अभियान न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में चल रहा है। वहीं भारत की सरकार ने हाथ से बने सामान पर कर लगा दिया।
उत्तर भारत में तो हस्त शिल्प का ज्यादा महत्त्व नहीं रहा और ज्यादातर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और हस्तशिल्प उत्पाद खत्म होते जा रहे हैं। वहीं तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक जैसे राज्यों में सरकारों ने हस्तशिल्प पर विशेष ध्यान दिया। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि दक्षिण में पिछले 100 साल के पिछड़े वर्ग के आंदोलन ने बहुत कुछ बदला है। दक्षिण में न सिर्फ सरकारी नौकरियों में दलितों-पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है बल्कि उन राज्यों ने हस्तशिल्प पर खासा जोर दिया, जिससे लघु व कुटीर उद्योगों को संरक्षण मिला, उनका विकास हुआ। इन उद्योगों में बड़े पैमाने पर दलितों व पिछड़े वर्ग की रोजी रोटी सुरक्षित है। आधुनिक और भारी भरकम तकनीकी फैक्टरियों के साथ दक्षिण में हस्तशिल्प को भी जगह मिली। कुटीर एवं लघु उद्योगों को भी जगह मिली।
भारत में भाषायी विविधता के साथ भौगोलिक दूरी के कारण सामान्यतया लोग नहीं जान पाते कि दक्षिण भारत में क्या चल रहा है। स्वाभाविक है कि इस कर अवज्ञा आंदोलन को भी उत्तर भारत में कोई पूछने वाला नहीं है।
इस आंदोलन को चला रहे लोगों की अपील है कि जीएसटी के विरोध में हम हैंडलूम उत्पाद बगैर कोई कर लिए या बगैर किसी कर भुगतान के खरीद सकते हैं। कर देने से इनकार करना सविनय अवज्ञा है। आंदोलनकारियों का कहना है कि इस अभियान का हिस्सा बन कर आप न सिर्फ गांव के गरीब लोगों की आजीविका बचा सकते हैं, बल्कि अपने वातावरण को प्रकृति के अनुकूल बनाने में सहयोग दे सकते हैं।
हस्त शिल्प पर कर लगाए जाने के विरोध में जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश कहते हैं, “क्या महात्मा गांधी के चरखे से काढ़ी गयी और कस्तूरबा की तकली से काती गयी सूत पर भी ये सरकार जीएसटी लगाती ? कुछ तो देश की जनता के हाथों और पसीने का लिहाज़ बचे ! हे राम !” दक्षिण के आंदोलनकारी और ग्रामीणों को उन राज्यों के बुद्धिजीवियों का भी समर्थन मिल रहा है। बाकायदा फेसबुक और ट्विटर पर #taxdenialsatyagraha हैशटैग से हस्तशिल्प पर लगने वाले कर के खिलाफ लिखा जा रहा है।
इसके अलावा भी तमाम कर लगाए गए हैं, जो असंगत लगते हैं। सरकार ने तमाम लग्जरी उत्पादों, जैसे सोने के आयात, कारों आदि पर कर कम रखा है। वहीं तमिलनाडु में सबसे ज्यादा प्रचलित वेट ग्राइंडर को लग्जरी आयटम में डाल दिया।
उत्तर भारत के ज्यादातर लोग वेट ग्राइंडर से परिचित नहीं होंगे। हालांकि दक्षिण का डोसा करीब हर भारतीय ने खा लिया है और वह लोगों की जीभ के स्वाद पर चढ़ चुका है। डोसे को बनाने के लिए जिस तरल खाद्य का इस्तेमाल किया जाता है, वह वेट ग्राइंडर से बनता है। कोयंबत्तूर का वेट ग्राइंडर उद्योग अपने ऊपर लगाए गए 28 प्रतिशत कर का विरोध कर रहा है। देश भर में यहीं से वेट ग्राइंडर की आपूर्ति होती है। मूल्यवर्धित कर (वैट) के तहत इस उद्योग पर 4 प्रतिशत कर था। कोयंबत्तूर वेट ग्राइंडर एंड एक्सेसरीज मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन (सीओडब्लूएमए) के अध्यक्ष एम राधाकृष्णन ने एक आर्थिक अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, 'उत्तर भारत से अच्छी पूछताछ आ रही है, लेकिन 28 प्रतिशत कर लगने के बाद कोई भी खरीदना नहीं चाहेगा।'
http://www.business-standard.com/article/economy-policy/gst-impact-wet-grinder-industry-fears-major-blow-with-28-rate-117060800756_1.html
माना जाता है कि वाशिंग मशीन ने पूरी दुनिया में महिलाओं की जिंदगी बदल दी है। वाशिंग मशीन के चलते न सिर्फ महिलाओं की काम करने की रचनात्मक क्षमता बढ़ी, बल्कि इससे उनके समय का दुरुपयोग खत्म हुआ। इसी तरह से दक्षिण भारत में वेट ग्राइंडर ने महिलाओं की जिंदगी बदल दी। डोसा बनाने के लिए चावल पीसने, घोंटने, उसे मथकर खमीर उठाने की प्रक्रिया में महिलाओं की अच्छी खासी दुर्गति होती थी, लेकिन इस मशीन ने घंटों का काम मिनटों में करना शुरू कर दिया। राज्य के हर अमीर गरीब परिवार में वेट ग्राइंडर मिलती है। इतना ही नहीं, ठेले से लेकर छोटे मोटे रेस्टोरेंटों में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है।
वेट ग्राइंडर की महत्ता इससे समझी जा सकती है कि मौजूदा अन्नाद्रमुक सरकार ने चुनाव के पहले लोगों से वादा किया था कि अगर पार्टी चुनाव जीतती है तो वह हर परिवार को मुफ्त में वेट ग्राइंडर देगी। तमिलनाडु सरकार अपने चुनावी वादे के मुताबिक पिछले 4 साल से इसकी आपूर्ति लोगों को मुफ्त में कर रही है। इस दौरान राज्य सरकार ने 3,600 करोड़ रुपये के 1.8 करोड़ वेट ग्राइंडर कोयंबटूर के विनिर्माताओं से खरीदे हैं।
सरकार के इस रवैये से क्षुब्ध उदय प्रकाश कहते हैं, “आज से 88 साल पहले अंग्रेज़ों ने नमक पर कर लगाया था। अब हस्त शिल्प, दस्तकारी, गांवों के लोगों के हाथों से बने सामग्री पर जीएसटी। आज अगर मध्यकाल के संत कबीर , रविदास, वचनकार, नाभादास, नानक या आज के भारत के महात्मा गांधी ही होते, तो टैक्स देना पड़ता। कैसी उलट बांसी है- तमाम बाबाओं के प्रोडक्ट्स पर टैक्स से छूट और संतों- गांव देहात, कस्बों और शहर के अंतरे-कोने में रहने वाले हस्तशिल्पियों के मेहनत के उत्पाद पर टैक्स। क्या एक और सत्याग्रह नहीं हो सकता? कर-अवज्ञा-सत्याग्रह ?”
अभियान चलाने वाले सत्याग्रही कहते हैं कि आखिर स्वराज क्या है? स्वराज न तो हिंदुत्व है, न इस्लामवाद। यह राष्ट्रवाद भी नहीं है। स्वराज का सीधा सा मतलब स्वशासन से है। उनका कहना है कि अब स्वराज और स्वशासन को नष्ट किया जा रहा है। इस तरह के कर के माध्यम से लोगों के खुद के रोजगार व धंधे छीने जा रहे हैं, जिससे विदेशी कंपनियां ही नहीं बल्कि भारत की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा मिले।

Wednesday, September 6, 2017

गौरी लंकेश का आख़िरी संपादकीय


(गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई। अभी तक हत्या किए जाने की वजह नहीं पता है। संभव है कि यह हत्या किसी ने व्यक्तिगत दुश्मनी में की हो। संभव है कि उनके लेखन की वजह से की गई हो। हत्या तो हर हाल में निंदनीय है, लेकिन अगर कुछ लिखने की वजह से हत्या हो जाती है तो यह बेहद खतरनाक है। सामान्यतया विचार बदलते रहते हैं। तमाम मामलों में देखा गया है कि उदार लोग कट्टर हो जाते हैं। दक्षिणपंथी लोग वाम की दिशा में चले जाते हैं। तमाम वामपंथियों ने कांग्रेस और भाजपा का दामन थाम लिया। ऐसे में अगर वैचारिक हत्या की संस्कृति फैलती है तो यह बेहद खतरनाक है। गौरी ने अपने टेबलायड अखबार में जो आखिरी संपादकीय लिखा है, वह झूठ फैलाए जाने के खिलाफ है। खासकर उस विचारधारा के खिलाफ, जिसका शासन इस समय भारत में चल रहा है। इसे रवीश कुमार के ब्लॉग कस्बा से साभार लिया गया है।)


फेक न्यूज़ के ज़माने में

इस हफ्ते के इश्यू में मेरे दोस्त डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह इंडिया में फेक न्यूज़ बनाने की फैक्ट्री के बारे में लिखा है। झूठ की ऐसी फैक्ट्रियां ज़्यादातर मोदी भक्त ही चलाते हैं। झूठ की फैक्ट्री से जो नुकसान हो रहा है मैं उसके बारे में अपने संपादकीय में बताने का प्रयास करूंगी। अभी परसों ही गणेश चतुर्थी थी। उस दिन सोशल मीडिया में एक झूठ फैलाया गया। फैलाने वाले संघ के लोग थे। ये झूठ क्या है? झूठ ये है कि कर्नाटक सरकार जहां बोलेगी वहीं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी है, उसके पहले दस लाख का डिपाज़िट करना होगा, मूर्ति की ऊंचाई कितनी होगी, इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी, दूसरे धर्म के लोग जहां रहते हैं उन रास्तों से विसर्जन के लिए नहीं ले जा सकते हैं। पटाखे वगैरह नहीं छोड़ सकते हैं। संघ के लोगों ने इस झूठ को खूब फैलाया। ये झूठ इतना ज़ोर से फैल गया कि अंत में कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर के दत्ता को प्रेस बुलानी पड़ी और सफाई देनी पड़ी कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है। ये सब झूठ है।

इस झूठ का सोर्स जब हमने पता करने की कोशिश की तो वो जाकर पहुंचा POSTCARD.IN नाम की वेबसाइट पर। यह वेबसाइट पक्के हिन्दुत्ववादियों की है। इसका काम हर दिन फ़ेक न्यूज़ बनाकर बनाकर सोशल मीडिया में फैलाना है। 11 अगस्त को POSTCARD.IN में एक हेडिंग लगाई गई। कर्नाटक में तालिबान सरकार। इस हेडिंग के सहारे राज्य भर में झूठ फैलाने की कोशिश हुई। संघ के लोग इसमें कामयाब भी हुए। जो लोग किसी न किसी वजह से सिद्धारमैया सरकार से नाराज़ रहते हैं उन लोगों ने इस फ़ेक न्यूज़ को अपना हथियार बना लिया। सबसे आश्चर्य और खेद की बात है कि लोगों ने भी बग़ैर सोचे समझे इसे सही मान लिया। अपने कान, नाक और भेजे का इस्तमाल नहीं किया।

पिछले सप्ताह जब कोर्ट ने राम रहीम नाम के एक ढोंगी बाबा को बलात्कार के मामले में सज़ा सुनाई तब उसके साथ बीजेपी के नेताओं की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में वायर होने लगी। इस ढोंगी बाबा के साथ मोदी के साथ साथ हरियाणा के बीजेपी विधायकों की फोटो और वीडियो वायरल होने लगा। इससे बीजेपी और संघ परिवार परेशान हो गए। इसे काउंटर करने के लिए गुरमीत बाबा के बाज़ू में केरल के सीपीएम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बैठे होने की तस्वीर वायरल करा दी गई। यह तस्वीर फोटोशाप थी। असली तस्वीर में कांग्रेस के नेता ओमन चांडी बैठे हैं लेकिन उनके धड़ पर विजयन का सर लगा दिया गया और संघ के लोगों ने इसे सोशल मीडिया में फैला दिया। शुक्र है संघ का यह तरीका कामयाब नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग तुरंत ही इसका ओरिजनल फोटो निकाल लाए और सोशल मीडिया में सच्चाई सामने रख दी।

एक्चुअली, पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ़ेक न्यूज़ प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था। अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है। पहले इस तरह के फ़ेक न्यूज़ ही चलती रहती थी लेकिन अब फ़ेक न्यूज़ के साथ साथ असली न्यूज़ भी आनी शुरू हो गए हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं।

उदाहरण के लिए 15 अगस्त के दिन जब लाल क़िले से प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दिया तो उसका एक विश्लेषण 17 अगस्त को ख़ूब वायरल हुआ। ध्रुव राठी ने उसका विश्लेषण किया था। ध्रुव राठी देखने में तो कालेज के लड़के जैसा है लेकिन वो पिछले कई महीनों से मोदी के झूठ की पोल सोशल मीडिया में खोल देता है। पहले ये वीडियो हम जैसे लोगों को ही दिख रहा था,आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा था लेकिन 17 अगस्ता के वीडियो एक दिन में एक लाख से ज़्यादा लोगों तक पहुंच गया। ( गौरी लंकेश अक्सर मोदी को बूसी बसिया लिखा करती थीं जिसका मतलब है जब भी मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे)। ध्रुव राठी ने बताया कि राज्य सभा में ‘बूसी बसिया’ की सरकार ने राज्य सभा में महीना भर पहले कहा कि 33 लाख नए करदाता आए हैं। उससे भी पहले वित्त मंत्री जेटली ने 91 लाख नए करदाताओं के जुड़ने की बात कही थी। अंत में आर्थिक सर्वे में कहा गया कि सिर्फ 5 लाख 40 हज़ार नए करदाता जुड़े हैं। तो इसमें कौन सा सच है, यही सवाल ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में उठाया है।

आज की मेनस्ट्रीम मीडिया केंद्र सरकार और बीजेपी के दिए आंकड़ों को जस का तस वेद वाक्य की तरह फैलाती रहती है। मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए सरकार का बोला हुआ वेद वाक्य हो गया है। उसमें भी जो टीवी न्यूज चैनल हैं, वो इस काम में दस कदम आगे हैं। उदाहरण के लिए, जब रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस दिन बहुत सारे अंग्रज़ी टीवी चैनलों ने ख़बर चलाई कि सिर्फ एक घंटे में ट्वीटर पर राष्ट्रपति कोविंद के फोलोअर की संख्या 30 लाख हो गई है। वो चिल्लाते रहे कि 30 लाख बढ़ गया, 30 लाख बढ़ गया। उनका मकसद यह बताना था कि कितने लोग कोविंद को सपोर्ट कर रहे हैं। बहुत से टीवी चैनल आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की टीम की तरह हो गए हैं। संघ का ही काम करते हैं। जबकि सच ये था कि उस दिन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सरकारी अकाउंट नए राष्ट्रपति के नाम हो गया। जब ये बदलाव हुआ तब राष्ट्रपति भवन के फोलोअर अब कोविंद के फोलोअर हो गए। इसमें एक बात और भी गौर करने वाली ये है कि प्रणब मुखर्जी को भी तीस लाख से भी ज्यादा लोग ट्वीटर पर फोलो करते थे।

आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के इस तरह के फैलाए गए फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई लाने के लिए बहुत से लोग सामने आ चुके हैं। ध्रुव राठी वीडियो के माध्यम से ये काम कर रहे हैं। प्रतीक सिन्हा altnews.in नाम की वेबसाइट से ये काम कर रहे हैं। होक्स स्लेयर, बूम और फैक्ट चेक नाम की वेबसाइट भी यही काम कर रही है। साथ ही साथ THEWIERE.IN, SCROLL.IN, NEWSLAUNDRY.COM, THEQUINT.COM जैसी वेबसाइट भी सक्रिय हैं। मैंने जिन लोगों ने नाम बताए हैं, उन सभी ने हाल ही में कई फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई को उजागर किया है। इनके काम से संघ के लोग काफी परेशान हो गए हैं। इसमें और भी महत्व की बात यह है कि ये लोग पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं। इनका एक ही मकसद है कि फासिस्ट लोगों के झूठ की फैक्ट्री को लोगों के सामने लाना।

कुछ हफ्ते पहले बंगलुरू में ज़ोरदार बारिश हुई। उस टाइम पर संघ के लोगों ने एक फोटो वायरल कराया। कैप्शन में लिखा था कि नासा ने मंगल ग्रह पर लोगों के चलने का फोटो जारी किया है। बंगलुरू नगरपालिका बीबीएमसी ने बयान दिया कि ये मंगल ग्रह का फोटो नहीं है। संघ का मकसद था, मंगल ग्रह का बताकर बंगलुरू का मज़ाक उड़ाना। जिससे लोग यह समझें कि बंगलुरू में सिद्धारमैया की सरकार ने कोई काम नही किया, यहां के रास्ते खराब हो गए हैं, इस तरह के प्रोपेगैंडा करके झूठी खबर फैलाना संघ का मकसद था। लेकिन ये उनको भारी पड़ गया था क्योंकि ये फोटो बंगलुरू का नहीं, महाराष्ट्र का था, जहां बीजेपी की सरकार है।

हाल ही में पश्चिम बंगाल में जब दंगे हुए तो आर एस एस के लोगों ने दो पोस्टर जारी किए। एक पोस्टर का कैप्शन था, बंगाल जल रहा है, उसमें प्रोपर्टी के जलने की तस्वीर थी। दूसरे फोटो में एक महीला की साड़ी खींची जा रही है और कैप्शन है बंगाल में हिन्दु महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है। बहुत जल्दी ही इस फोटो का सच सामने आ गया। पहली तस्वीर 2002 के गुजरात दंगों की थी जब मुख्यमंत्री मोदी ही सरकार में थे। दूसरी तस्वीर में भोजपुरी सिनेमा के एक सीन की थी। सिर्फ आर एस एस ही नहीं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भी ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में माहिर हैं। उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फोटो शेयर किया कि जिसमें कुछ लोग तिरंगे में आग लगा रहे थे। फोटो के कैप्शन पर लिखा था गणतंत्र के दिवस हैदराबाद में तिरंगे को आग लगाया जा रहा है। अभी गूगल इमेज सर्च एक नया अप्लिकेशन आया है, उसमें आप किसी भी तस्वीर को डालकर जान सकते हैं कि ये कहां और कब की है। प्रतीक सिन्हा ने यही काम किया और उस अप्लिकेशन के ज़रिये गडकरी के शेयर किए गए फोटो की सच्चाई उजागर कर दी। पता चला कि ये फोटो हैदराबाद का नहीं है। पाकिस्तान का है जहां एक प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन भारत के विरोध में तिरंगे को जला रहा है।

इसी तरह एक टीवी पैनल के डिस्कशन में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सरहद पर सैनिकों को तिरंगा लहराने में कितनी मुश्किलें आती हैं, फिर जे एन यू जैसे विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने में क्या समस्या है। यह सवाप पूछकर संबित ने एक तस्वीर दिखाई। बाद में पता चला कि यह एक मशहूर तस्वीर है मगर इसमें भारतीय नहीं, अमरीकी सैनिक हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों ने जब जापान के एक द्वीप पर क़ब्ज़ा किया तब उन्होंने अपना झंडा लहराया था। मगर फोटोशाप के ज़रिये संबित पात्रा लोगों को चकमा दे रहे थे। लेकिन ये उन्हें काफी भारी पड़ गया। ट्वीटर पर संबित पात्रा का लोगों ने काफी मज़ाक उड़ाया।

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक तस्वीर साझा की। लिखा कि भारत 50,000 किलोमीटर रास्तों पर सरकार ने तीस लाख एल ई डी बल्ब लगा दिए हैं। मगर जो तस्वीर उन्होंने लगाई वो फेक निकली। भारत की नहीं, 2009 में जापान की तस्वीर की थी। इसी गोयल ने पहले भी एक ट्वीट किया था कि कोयले की आपूर्ति में सरकार ने 25,900 करोड़ की बचत की है। उस ट्वीट की तस्वीर भी झूठी निकली।

छत्तीसगढ़ के पी डब्ल्यू डी मंत्री राजेश मूणत ने एक ब्रिज का फोटो शेयर किया। अपनी सरकार की कामयाबी बताई। उस ट्वीट को 2000 लाइक मिले। बाद में पता चला कि वो तस्वीर छत्तीसगढ़ की नहीं, वियतनाम की है।

ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में हमारे कर्नाटक के आर एस एस और बीजेपी लीडर भी कुछ कम नहीं हैं। कर्नाटक के सांसद प्रताप सिम्हा ने एक रिपोर्ट शेयर किया, कहा कि ये टाइम्स आफ इंडिय मे आया है। उसकी हेडलाइन ये थी कि हिन्दू लड़की को मुसलमान ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दुनिया भर को नैतिकता का ज्ञान देने वाले प्रताप सिम्हा ने सच्चाई जानने की ज़रा भी कोशिश नहीं की। किसी भी अखबार ने इस न्यूज को नहीं छापा था बल्कि फोटोशाप के ज़रिए किसी दूसरे न्यूज़ में हेडलाइन लगा दिया गया था और हिन्दू मुस्लिम रंग दिया गया। इसके लिए टाइम्स आफ इंडिया का नाम इस्तमाल किया गया। जब हंगामा हुआ कि ये तो फ़ेक न्यूज़ है तो सांसद ने डिलिट कर दिया मगर माफी नहीं मांगी। सांप्रादायिक झूठ फैलाने पर कोई पछतावा ज़ाहिर नहीं किया।

जैसा कि मेरे दोस्त वासु ने इस बार के कॉलम में लिखा है, मैंने भी एक बिना समझे एक फ़ेक न्यूज़ शेयर कर दिया। पिछले रविवार पटना की अपनी रैली की तस्वीर लालू यादव ने फोटोशाप करके साझा कर दी। थोड़ी देर में दोस्त शशिधर ने बताया कि ये फोटो फर्ज़ी है। नकली है। मैंने तुरंत हटाया और ग़लती भी मानी। यही नहीं फेक और असली तस्वीर दोनों को एक साथ ट्वीट किया। इस गलती के पीछे सांप्रदियाक रूप से भड़काने या प्रोपेगैंडा करने की मंशा नहीं थी। फासिस्टों के ख़िलाफ़ लोग जमा हो रहे थे, इसका संदेश देना ही मेरा मकसद था। फाइनली, जो भी फ़ेक न्यूज़ को एक्सपोज़ करते हैं, उनको सलाम । मेरी ख़्वाहिश है कि उनकी संख्या और भी ज़्यादा हो।