Sunday, September 24, 2017

क्या बीएचयू और भारत के अन्य विश्वविद्यालय अब तेहरान युनिवर्सिटी बनने की ओर बढ़ रहे हैं?

सत्येन्द्र पीएस

ईरान में 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई। बड़े बड़े आंदोलन हुए। खोमैनी का शासन आ गया। ईरान इस्लामिक स्टेट बन गया। वहां सब कुछ बदल गया। ड्रेस कोड बना। विश्वविद्यालयों में इस्लामी पहनावा लागू हो गया। तरह-तरह के प्रतिबंध लग गए। अब हालात यह हैं कि जिस तेहरान युनिवर्सिटी को अमेरिका या ब्रिटेन के तमाम नामी गिरामी विश्वविद्यालयों के साथ मुकाबले के लिए जाना जाता था, उसका कोई नामलेवा नहीं है। क्या आपने सुना है कि आपका कोई परिचित कह रहा हो कि उसका सपना तेहरान युनिवर्सिटी में अपने बच्चे को पढ़ाने का है? ज्यादातर लोग तो जानते भी नहीं हैं कि ईरान या तेहरान में कोई युनिवर्सिटी भी है, या वहां के स्कूल कॉलेज को मदरसा वगैरा ही कहते हैं।



भारत में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद तमाम बदलाव हुए। सरकार ने विश्वविद्यालयों में अपनी मर्जी के कुलपति रखे। उन्हीं में से एक काशी हिंदू विश्वविद्यालय है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय को मैं हरि गौतम के जमाने से जानता हूं। उस समय कैंपस अशांत थे। तरह तरह के आंदोलन होते थे। गुंडे न केवल विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में दखल करते थे, बल्कि वहां के तमाम प्रोफेसर राजनीतिक रूप से ताकतवर जातीय गुंडा राजनेताओं के आदमी बन चुके थे और विद्यार्थियों को भड़काते थे। आए दिन विश्वविद्यालय में मारपीट, गुंडागर्दी, बमबाजी होती थी।
हरि गौतम के समय से सख्ती शुरू हुई। कैंपस शांत हो गया। उसके बाद वाई सी सिम्हाद्री, पंजाब सिंह, लालजी सिंह कुलपति बने। सभी अपने ज्ञान क्षेत्र में अव्वल थे। पहले भी वाइस चांसलर या तमाम बड़े पदों पर रहने के बाद बीएचयू पहुंचे थे।
केंद्र में 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद प्रोफेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी कुलपति बने। उस समय तक मैंने कभी इनका नाम नहीं सुना था। नाम न सुनना कोई बड़ी बात नहीं। देश में तमाम ऐसे विद्वान हैं, जिनका हम नाम नहीं सुने हुए होते हैं। लेकिन बाद में पता करने पर जानकारी मिल जाती है कि संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि क्या है। मुझे याद है कि सबसे पहली जानकारी प्रोफेसर त्रिपाठी के बारे में यही मिली थी कि वह पंडित मदन मोहन मालवीय के नाती के बहुत खास हैं। उसके बाद मैंने कई स्रोतों से पता करने की कोशिश की कि त्रिपाठी की एकेडमिक या प्रशासनिक उपलब्धि क्या रही, लेकिन कुछ भी जानकारी नहीं मिल सकी।
त्रिपाठी के कुलपति बनने के बाद उनके एक से बढ़कर एक कारनामे सामने आने लगे। बयान तो किसी विकृत मानसिकता के पुरबिया क्षुद्र व्यक्ति से नीचे।
विश्वविद्यालय के परिसर में लाइब्रेरी को 24 घंटे खोले जाने के लिए चल रहे आंदोलन के दौरान उनके बयानों को देखें। उन्होंने कहा, “लड़के बदमाश हैं, कॉपर वायर तोड़ ले जात्ते हैं, माउस चुरा ले जाते हैं, हार्डडिस्क निकालकर ले जाते हैं। पेन ड्राइव में अश्लील फ़िल्में देखते हैं। इन सबसे अलग उनके वहां रहने से एकदम दूसरी समस्या पैदा हो सकती है कि वे वहां क्या कर रहे हैं?”

शायद प्रोफेसर त्रिपाठी को अपने देश के ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी के बारे में ही जानकारी नहीं है, जहां विद्यार्थियों को 24 घंटे पढ़ने की सुविधा दी जाती है। वहां सेक्सुअल क्राइम के केसेज बहुत कम सामने आते हैं। आप कैंपस में घूमिए। तमाम झाड़ियां हैं। पहाड़ी विश्वविद्यालय बना है और आधे से ज्यादा छात्राएं हैं। लेकिन कहीं कुछ भी आपत्तिजनक या अश्लील या सेक्सुअल क्राइम नहीं मिलता, जबकि प्रोफेसर त्रिपाठी ने विश्वविद्यालय कैंपस में क्या ढूंढा, उनके इस बयान से अंदाज लगा सकते हैं। उन्होंने कहा, “एक बात मैंने यहां सघन तलाशी करायी। रात नौ बजे के बाद शहर के तमाम लड़के और लड़कियां यहां बैठे रहते हैं। अपनी कार से रात में निकला, लोगों ने कहा कि अरे आप वीसी हैं, हम ले चलते हैं। लेकिन मैं अध्यापक हूं। मैं निकला और मैंने देखा कि एक लड़का और लड़की ऐसी अवस्था में बैठे थे कि क्या बताऊं. मैंने गाड़ी रोकी। मैंने बैठा लिया गाड़ी में, कुछ और नहीं किया. मैंने केवल इतना कहा कि चलो तुम्हारे गार्जियन से बात करें. वे गिडगिडाने लगे, अरे नहीं सर, गलती हो गयी सर। फिर मैंने उन्हें छोड़ भी दिया।”

यह है काशी हिंदू विश्वविद्यालय का माहौल। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कंडोम गिनने का ठेका तो भारतीय जनता पार्टी के विधायक को दिया गया है, लेकिन बीएचयू में कंडोम बीनने खुद कुलपति निकल चुके हैं। उनका यह मकसद कतई नहीं रह गया है कि विश्वविद्यालय में ऐसा माहौल बना दिया जाए, जहां बच्चों के दिमाग में विश्व का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी बनने और लगातार पठन पाठन, शोध में रहे बल्कि वह विद्यार्थियों को किसी अलग ही नियम में बांधने को आतुर नजर आते हैं। जबकि हकीकत यह है कि विश्वविद्यालय में श्रेष्ठ विद्यार्थियों का एडमिशन होता है, जिनका पहले से एकेडमिक रिकॉर्ड बहुत शानदार रहा होता है। विश्वविद्यालय कड़ी परीक्षा लेने के बाद विद्यार्थियों को एडमिशन देता है। वाराणसी में कुल मिलाकर 4 विश्वविद्यालय हैं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, उदय प्रताप स्वायत्तशासी कॉलेज के अलावा पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर के डिग्री कॉलेज भी शहर में हैं। इसके अलावा बौद्ध विश्वविद्यालय़ भी सारनाथ में उपस्थित है। इन सबकी मौजूदगी के बीच विद्यार्थियों का सपना होता है कि वह अगर वाराणसी में पढ़ें तो बीएचयू में ही पढ़ें। बाहरी दुनिया के बच्चे भी बीएचयू में ही पढ़ने आते हैं। इस स्थिति में स्वाभाविक रूप से विश्वविद्यालय में क्रीम स्टूडेंट्स को ही जगह मिल पाती है।

हालांकि जेएनयू को भी श्रेष्ठ विश्वविद्यालय नहीं माना जा सकता। वैश्विक दुनिया में जेएनयू का कोई खास मुकाम नहीं है। लेकिन बमुश्किल 10,000 विद्यार्थियों के कैंपस का भारत के स्तर पर सफलता का अनुपात जबरदस्त है। वहां से आईएएस निकलते हैं, ब्यूरोक्रेट्स निकलते हैं, राष्ट्रीय स्तर के नेता निकलते हैं। वहीं अगर मौजूदा बीएचयू को देखें तो देश के प्रतिष्ठित संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अक्सर बीएचयू का नाम गायब रहता है, जो एक लाख विद्यार्थियों का कैंपस है। वैश्विक स्तर पर विश्वविद्यालय की स्थिति तो जाने ही दें।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय में जातीय लंपटई का इतिहास पुराना है। यह देश का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जहां 80 के दशक तक एडमिशन के लिए फार्म भरने वाले विद्यार्थियों से यह पूछा जाता था कि आप ब्राह्मण हैं या गैर ब्राह्मण। मोटे तौर पर इस समय भी विश्वविद्यालय में 70-80 प्रतिशत ब्राह्मण टीचिंग स्टाफ है। इतना ही नहीं, तमाम प्रोफेसर तो खानदानी हैं, जो वहां कई पीढ़ियों से पढ़ाए जाने के योग्य पाए जा रहे हैं। ऐसे में जातीय बजबजाहट यहां नई बात नहीं है।

इन सबके बावजूद हाल के वर्षों में ब्राह्मण या गैर ब्राह्मण पूछा जाना बंद हुआ। जातीय कुंठा भी कुछ घटी और अध्यापक नहीं तो विद्यार्थियों में जातीय विविधता आई। आरएसएस के स्वयंसेवक प्रोफेसर त्रिपाठी के कुलपति बनने के बाद विश्वविद्यालय एक बार फिर ब्राह्मणवादी कुंठा में फंसता नजर आ रहा है।

(बीएचयू बज, फेसबुक से ली गई तस्वीर। लड़कियों पर लाठी चार्ज के बाद)
विश्वविद्यालय में कुलपति अपने को गैर राजनीतिक होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन मामला इससे उलट है। अगर विश्वविद्यालय की छात्राएं छेड़खानी का विरोध कर रही हैं तो उन पर लाठियां चल रही हैं। विश्वविद्यालय के सुरक्षाकर्मियों की लंबी चौड़ी फौज है, जिनकी कैंपस में जबरदस्त गुंडागर्दी चलती है। वह मामला नहीं संभाल पाते हैं तो बाहर से पुलिस और पीएसी बुलाई जाती है। रात रात भर कैंपस में बवाल चलता है। लड़कियों को पीट पीटकर पुलिस हाथ पैर तोड़ देती है।

यह मामला काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति परिसर में टैंक रखवाना चाहते हैं, जिससे विद्यार्थियों में देशभक्ति आए। विश्वविद्यालय के कुलपति को टैंक में देशभक्ति दिखती है।

इसमें सबसे ज्यादा बुरा हाल छात्राओं का होने जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महराज बयान देते हैं कि लड़कियां मोटरसाइकिल पर बैठकर चलती हैं, इसलिए उनके साथ बलात्कार हो जाता है।

सवाल यह है कि हम किस दौर की ओर बढ़ रहे हैं। क्या हम इस्लामिक स्टेट की तरह भारत को हिंदू स्टेट बनाकर बर्बादी की ओर ले जाना चाहते हैं या रूस, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, यूरोपियन यूनियन की तरह समृद्ध और खुला समाज चाहते हैं? भारत में तो यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि कोई लड़की या महिला रात के सुनसान में अपने घर से निकलकर अकेले कहीं सड़क पर घूम सकती है, या किसी अपने परिचित की मदद के लिए पैदल निकल सकती है। महिला ही क्या, पुरुष भी यह सोचकर नहीं निकल सकते कि दो बजे रात को अगर वह सड़क पर जा रहे हों तो सुरक्षित घर लौटेंगे या नहीं। लेकिन किसी भी सभ्य, विकसित देश में यह आम बात है। फैसला हमें करना है कि हम देश को किस तरफ ले जाना चाहते हैं। विकसित, समृद्ध, सुरक्षित देश बनना चाहते हैं जहां ज्ञान विज्ञान और सुविधाओं के साथ सुरक्षा हो, या इस्लामिक स्टेट आफ ईरान की तरह हिंदू स्टेट आफ इंडिया बनना चाहते हैं।

फोटो क्रेडिट -1 और 2
http://www.dailymail.co.uk/travel/travel_news/article-4148684/Stunning-photos-reveal-life-Iran-revolution.html
फोटो क्रेडिट-3
http://www.payvand.com/news/17/sep/1083.html





दक्षिण भारत का टैक्स डिनायल सत्याग्रह कर रहा केंद्र सरकार की नाक में दम, आइए देखें क्या मामला है और क्यों हो रहा है आंदोलन



सत्येन्द्र पीएस

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू किए जाने को कर की दिशा में ऐतिहासिक कदम करार दिया जा रहा है, वहीं 1 जुलाई 2017 से लागू कर व्यवस्था में तमाम विसंगतिया सामने आ रही हैं। दक्षिण भारत में इस कर के खिलाफ कर अवज्ञा सत्याग्रह (टैक्स डिनायल सत्याग्रह) चल रहा है।
कर अवज्ञा सत्याग्रह चला रहे ‘सत्याग्रह ग्राम सेवक संघ’ का कहना है कि आजादी के बाद पहली बार हस्तशिल्प को कर के दायरे में लाया गया है। यह गरीब तबके, कुटीर एवं लघु उद्योग चलाने वालों का एकमात्र सहारा है, जिसे अब तक सरकारें संरक्षण देती रही हैं, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग इस क्षेत्र से रोजगार पाते हैं और स्थानीय कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन का मौका भी मिलता है।
सत्याग्रहियों का कहना है कि प्राकृतिक उत्पाद स्वाभाविक रूप से महंगे होते हैं। वे उदाहरण देते हुए बताते हैं कि खादी की साड़ी की कीमह सूरत की सिंथेटिक साड़ी से हमेशा महंगी होती है। अब कर लगने के बाद उसका दाम और बढ़ जाएगा।
एक तर्क यह भी सामने आता है कि अगर कोई उत्पाद बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता है तो क्यों न उसे बाजार से बाहर हो जाने दिया जाए ? हालांकि साथ में एक अभियान यह भी चल रहा है कि प्रकृति और प्राकृतिक उत्पादों की ओर चलना चाहिए, जो कहीं ज्यादा सुरक्षित और प्रकृति के अनुकूल हैं। प्राकृतिक उत्पादों की ओर जाने का अभियान न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में चल रहा है। वहीं भारत की सरकार ने हाथ से बने सामान पर कर लगा दिया।
उत्तर भारत में तो हस्त शिल्प का ज्यादा महत्त्व नहीं रहा और ज्यादातर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और हस्तशिल्प उत्पाद खत्म होते जा रहे हैं। वहीं तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक जैसे राज्यों में सरकारों ने हस्तशिल्प पर विशेष ध्यान दिया। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि दक्षिण में पिछले 100 साल के पिछड़े वर्ग के आंदोलन ने बहुत कुछ बदला है। दक्षिण में न सिर्फ सरकारी नौकरियों में दलितों-पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है बल्कि उन राज्यों ने हस्तशिल्प पर खासा जोर दिया, जिससे लघु व कुटीर उद्योगों को संरक्षण मिला, उनका विकास हुआ। इन उद्योगों में बड़े पैमाने पर दलितों व पिछड़े वर्ग की रोजी रोटी सुरक्षित है। आधुनिक और भारी भरकम तकनीकी फैक्टरियों के साथ दक्षिण में हस्तशिल्प को भी जगह मिली। कुटीर एवं लघु उद्योगों को भी जगह मिली।
भारत में भाषायी विविधता के साथ भौगोलिक दूरी के कारण सामान्यतया लोग नहीं जान पाते कि दक्षिण भारत में क्या चल रहा है। स्वाभाविक है कि इस कर अवज्ञा आंदोलन को भी उत्तर भारत में कोई पूछने वाला नहीं है।
इस आंदोलन को चला रहे लोगों की अपील है कि जीएसटी के विरोध में हम हैंडलूम उत्पाद बगैर कोई कर लिए या बगैर किसी कर भुगतान के खरीद सकते हैं। कर देने से इनकार करना सविनय अवज्ञा है। आंदोलनकारियों का कहना है कि इस अभियान का हिस्सा बन कर आप न सिर्फ गांव के गरीब लोगों की आजीविका बचा सकते हैं, बल्कि अपने वातावरण को प्रकृति के अनुकूल बनाने में सहयोग दे सकते हैं।
हस्त शिल्प पर कर लगाए जाने के विरोध में जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश कहते हैं, “क्या महात्मा गांधी के चरखे से काढ़ी गयी और कस्तूरबा की तकली से काती गयी सूत पर भी ये सरकार जीएसटी लगाती ? कुछ तो देश की जनता के हाथों और पसीने का लिहाज़ बचे ! हे राम !” दक्षिण के आंदोलनकारी और ग्रामीणों को उन राज्यों के बुद्धिजीवियों का भी समर्थन मिल रहा है। बाकायदा फेसबुक और ट्विटर पर #taxdenialsatyagraha हैशटैग से हस्तशिल्प पर लगने वाले कर के खिलाफ लिखा जा रहा है।
इसके अलावा भी तमाम कर लगाए गए हैं, जो असंगत लगते हैं। सरकार ने तमाम लग्जरी उत्पादों, जैसे सोने के आयात, कारों आदि पर कर कम रखा है। वहीं तमिलनाडु में सबसे ज्यादा प्रचलित वेट ग्राइंडर को लग्जरी आयटम में डाल दिया।
उत्तर भारत के ज्यादातर लोग वेट ग्राइंडर से परिचित नहीं होंगे। हालांकि दक्षिण का डोसा करीब हर भारतीय ने खा लिया है और वह लोगों की जीभ के स्वाद पर चढ़ चुका है। डोसे को बनाने के लिए जिस तरल खाद्य का इस्तेमाल किया जाता है, वह वेट ग्राइंडर से बनता है। कोयंबत्तूर का वेट ग्राइंडर उद्योग अपने ऊपर लगाए गए 28 प्रतिशत कर का विरोध कर रहा है। देश भर में यहीं से वेट ग्राइंडर की आपूर्ति होती है। मूल्यवर्धित कर (वैट) के तहत इस उद्योग पर 4 प्रतिशत कर था। कोयंबत्तूर वेट ग्राइंडर एंड एक्सेसरीज मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन (सीओडब्लूएमए) के अध्यक्ष एम राधाकृष्णन ने एक आर्थिक अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, 'उत्तर भारत से अच्छी पूछताछ आ रही है, लेकिन 28 प्रतिशत कर लगने के बाद कोई भी खरीदना नहीं चाहेगा।'
http://www.business-standard.com/article/economy-policy/gst-impact-wet-grinder-industry-fears-major-blow-with-28-rate-117060800756_1.html
माना जाता है कि वाशिंग मशीन ने पूरी दुनिया में महिलाओं की जिंदगी बदल दी है। वाशिंग मशीन के चलते न सिर्फ महिलाओं की काम करने की रचनात्मक क्षमता बढ़ी, बल्कि इससे उनके समय का दुरुपयोग खत्म हुआ। इसी तरह से दक्षिण भारत में वेट ग्राइंडर ने महिलाओं की जिंदगी बदल दी। डोसा बनाने के लिए चावल पीसने, घोंटने, उसे मथकर खमीर उठाने की प्रक्रिया में महिलाओं की अच्छी खासी दुर्गति होती थी, लेकिन इस मशीन ने घंटों का काम मिनटों में करना शुरू कर दिया। राज्य के हर अमीर गरीब परिवार में वेट ग्राइंडर मिलती है। इतना ही नहीं, ठेले से लेकर छोटे मोटे रेस्टोरेंटों में भी इसका खूब इस्तेमाल होता है।
वेट ग्राइंडर की महत्ता इससे समझी जा सकती है कि मौजूदा अन्नाद्रमुक सरकार ने चुनाव के पहले लोगों से वादा किया था कि अगर पार्टी चुनाव जीतती है तो वह हर परिवार को मुफ्त में वेट ग्राइंडर देगी। तमिलनाडु सरकार अपने चुनावी वादे के मुताबिक पिछले 4 साल से इसकी आपूर्ति लोगों को मुफ्त में कर रही है। इस दौरान राज्य सरकार ने 3,600 करोड़ रुपये के 1.8 करोड़ वेट ग्राइंडर कोयंबटूर के विनिर्माताओं से खरीदे हैं।
सरकार के इस रवैये से क्षुब्ध उदय प्रकाश कहते हैं, “आज से 88 साल पहले अंग्रेज़ों ने नमक पर कर लगाया था। अब हस्त शिल्प, दस्तकारी, गांवों के लोगों के हाथों से बने सामग्री पर जीएसटी। आज अगर मध्यकाल के संत कबीर , रविदास, वचनकार, नाभादास, नानक या आज के भारत के महात्मा गांधी ही होते, तो टैक्स देना पड़ता। कैसी उलट बांसी है- तमाम बाबाओं के प्रोडक्ट्स पर टैक्स से छूट और संतों- गांव देहात, कस्बों और शहर के अंतरे-कोने में रहने वाले हस्तशिल्पियों के मेहनत के उत्पाद पर टैक्स। क्या एक और सत्याग्रह नहीं हो सकता? कर-अवज्ञा-सत्याग्रह ?”
अभियान चलाने वाले सत्याग्रही कहते हैं कि आखिर स्वराज क्या है? स्वराज न तो हिंदुत्व है, न इस्लामवाद। यह राष्ट्रवाद भी नहीं है। स्वराज का सीधा सा मतलब स्वशासन से है। उनका कहना है कि अब स्वराज और स्वशासन को नष्ट किया जा रहा है। इस तरह के कर के माध्यम से लोगों के खुद के रोजगार व धंधे छीने जा रहे हैं, जिससे विदेशी कंपनियां ही नहीं बल्कि भारत की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फायदा मिले।

Wednesday, September 6, 2017

गौरी लंकेश का आख़िरी संपादकीय


(गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई। अभी तक हत्या किए जाने की वजह नहीं पता है। संभव है कि यह हत्या किसी ने व्यक्तिगत दुश्मनी में की हो। संभव है कि उनके लेखन की वजह से की गई हो। हत्या तो हर हाल में निंदनीय है, लेकिन अगर कुछ लिखने की वजह से हत्या हो जाती है तो यह बेहद खतरनाक है। सामान्यतया विचार बदलते रहते हैं। तमाम मामलों में देखा गया है कि उदार लोग कट्टर हो जाते हैं। दक्षिणपंथी लोग वाम की दिशा में चले जाते हैं। तमाम वामपंथियों ने कांग्रेस और भाजपा का दामन थाम लिया। ऐसे में अगर वैचारिक हत्या की संस्कृति फैलती है तो यह बेहद खतरनाक है। गौरी ने अपने टेबलायड अखबार में जो आखिरी संपादकीय लिखा है, वह झूठ फैलाए जाने के खिलाफ है। खासकर उस विचारधारा के खिलाफ, जिसका शासन इस समय भारत में चल रहा है। इसे रवीश कुमार के ब्लॉग कस्बा से साभार लिया गया है।)


फेक न्यूज़ के ज़माने में

इस हफ्ते के इश्यू में मेरे दोस्त डॉ वासु ने गोएबल्स की तरह इंडिया में फेक न्यूज़ बनाने की फैक्ट्री के बारे में लिखा है। झूठ की ऐसी फैक्ट्रियां ज़्यादातर मोदी भक्त ही चलाते हैं। झूठ की फैक्ट्री से जो नुकसान हो रहा है मैं उसके बारे में अपने संपादकीय में बताने का प्रयास करूंगी। अभी परसों ही गणेश चतुर्थी थी। उस दिन सोशल मीडिया में एक झूठ फैलाया गया। फैलाने वाले संघ के लोग थे। ये झूठ क्या है? झूठ ये है कि कर्नाटक सरकार जहां बोलेगी वहीं गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करनी है, उसके पहले दस लाख का डिपाज़िट करना होगा, मूर्ति की ऊंचाई कितनी होगी, इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी होगी, दूसरे धर्म के लोग जहां रहते हैं उन रास्तों से विसर्जन के लिए नहीं ले जा सकते हैं। पटाखे वगैरह नहीं छोड़ सकते हैं। संघ के लोगों ने इस झूठ को खूब फैलाया। ये झूठ इतना ज़ोर से फैल गया कि अंत में कर्नाटक के पुलिस प्रमुख आर के दत्ता को प्रेस बुलानी पड़ी और सफाई देनी पड़ी कि सरकार ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है। ये सब झूठ है।

इस झूठ का सोर्स जब हमने पता करने की कोशिश की तो वो जाकर पहुंचा POSTCARD.IN नाम की वेबसाइट पर। यह वेबसाइट पक्के हिन्दुत्ववादियों की है। इसका काम हर दिन फ़ेक न्यूज़ बनाकर बनाकर सोशल मीडिया में फैलाना है। 11 अगस्त को POSTCARD.IN में एक हेडिंग लगाई गई। कर्नाटक में तालिबान सरकार। इस हेडिंग के सहारे राज्य भर में झूठ फैलाने की कोशिश हुई। संघ के लोग इसमें कामयाब भी हुए। जो लोग किसी न किसी वजह से सिद्धारमैया सरकार से नाराज़ रहते हैं उन लोगों ने इस फ़ेक न्यूज़ को अपना हथियार बना लिया। सबसे आश्चर्य और खेद की बात है कि लोगों ने भी बग़ैर सोचे समझे इसे सही मान लिया। अपने कान, नाक और भेजे का इस्तमाल नहीं किया।

पिछले सप्ताह जब कोर्ट ने राम रहीम नाम के एक ढोंगी बाबा को बलात्कार के मामले में सज़ा सुनाई तब उसके साथ बीजेपी के नेताओं की कई तस्वीरें सोशल मीडिया में वायर होने लगी। इस ढोंगी बाबा के साथ मोदी के साथ साथ हरियाणा के बीजेपी विधायकों की फोटो और वीडियो वायरल होने लगा। इससे बीजेपी और संघ परिवार परेशान हो गए। इसे काउंटर करने के लिए गुरमीत बाबा के बाज़ू में केरल के सीपीएम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के बैठे होने की तस्वीर वायरल करा दी गई। यह तस्वीर फोटोशाप थी। असली तस्वीर में कांग्रेस के नेता ओमन चांडी बैठे हैं लेकिन उनके धड़ पर विजयन का सर लगा दिया गया और संघ के लोगों ने इसे सोशल मीडिया में फैला दिया। शुक्र है संघ का यह तरीका कामयाब नहीं हुआ क्योंकि कुछ लोग तुरंत ही इसका ओरिजनल फोटो निकाल लाए और सोशल मीडिया में सच्चाई सामने रख दी।

एक्चुअली, पिछले साल तक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के फ़ेक न्यूज़ प्रोपेगैंडा को रोकने या सामने लाने वाला कोई नहीं था। अब बहुत से लोग इस तरह के काम में जुट गए हैं, जो कि अच्छी बात है। पहले इस तरह के फ़ेक न्यूज़ ही चलती रहती थी लेकिन अब फ़ेक न्यूज़ के साथ साथ असली न्यूज़ भी आनी शुरू हो गए हैं और लोग पढ़ भी रहे हैं।

उदाहरण के लिए 15 अगस्त के दिन जब लाल क़िले से प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण दिया तो उसका एक विश्लेषण 17 अगस्त को ख़ूब वायरल हुआ। ध्रुव राठी ने उसका विश्लेषण किया था। ध्रुव राठी देखने में तो कालेज के लड़के जैसा है लेकिन वो पिछले कई महीनों से मोदी के झूठ की पोल सोशल मीडिया में खोल देता है। पहले ये वीडियो हम जैसे लोगों को ही दिख रहा था,आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा था लेकिन 17 अगस्ता के वीडियो एक दिन में एक लाख से ज़्यादा लोगों तक पहुंच गया। ( गौरी लंकेश अक्सर मोदी को बूसी बसिया लिखा करती थीं जिसका मतलब है जब भी मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे)। ध्रुव राठी ने बताया कि राज्य सभा में ‘बूसी बसिया’ की सरकार ने राज्य सभा में महीना भर पहले कहा कि 33 लाख नए करदाता आए हैं। उससे भी पहले वित्त मंत्री जेटली ने 91 लाख नए करदाताओं के जुड़ने की बात कही थी। अंत में आर्थिक सर्वे में कहा गया कि सिर्फ 5 लाख 40 हज़ार नए करदाता जुड़े हैं। तो इसमें कौन सा सच है, यही सवाल ध्रुव राठी ने अपने वीडियो में उठाया है।

आज की मेनस्ट्रीम मीडिया केंद्र सरकार और बीजेपी के दिए आंकड़ों को जस का तस वेद वाक्य की तरह फैलाती रहती है। मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए सरकार का बोला हुआ वेद वाक्य हो गया है। उसमें भी जो टीवी न्यूज चैनल हैं, वो इस काम में दस कदम आगे हैं। उदाहरण के लिए, जब रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस दिन बहुत सारे अंग्रज़ी टीवी चैनलों ने ख़बर चलाई कि सिर्फ एक घंटे में ट्वीटर पर राष्ट्रपति कोविंद के फोलोअर की संख्या 30 लाख हो गई है। वो चिल्लाते रहे कि 30 लाख बढ़ गया, 30 लाख बढ़ गया। उनका मकसद यह बताना था कि कितने लोग कोविंद को सपोर्ट कर रहे हैं। बहुत से टीवी चैनल आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की टीम की तरह हो गए हैं। संघ का ही काम करते हैं। जबकि सच ये था कि उस दिन पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का सरकारी अकाउंट नए राष्ट्रपति के नाम हो गया। जब ये बदलाव हुआ तब राष्ट्रपति भवन के फोलोअर अब कोविंद के फोलोअर हो गए। इसमें एक बात और भी गौर करने वाली ये है कि प्रणब मुखर्जी को भी तीस लाख से भी ज्यादा लोग ट्वीटर पर फोलो करते थे।

आज राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के इस तरह के फैलाए गए फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई लाने के लिए बहुत से लोग सामने आ चुके हैं। ध्रुव राठी वीडियो के माध्यम से ये काम कर रहे हैं। प्रतीक सिन्हा altnews.in नाम की वेबसाइट से ये काम कर रहे हैं। होक्स स्लेयर, बूम और फैक्ट चेक नाम की वेबसाइट भी यही काम कर रही है। साथ ही साथ THEWIERE.IN, SCROLL.IN, NEWSLAUNDRY.COM, THEQUINT.COM जैसी वेबसाइट भी सक्रिय हैं। मैंने जिन लोगों ने नाम बताए हैं, उन सभी ने हाल ही में कई फ़ेक न्यूज़ की सच्चाई को उजागर किया है। इनके काम से संघ के लोग काफी परेशान हो गए हैं। इसमें और भी महत्व की बात यह है कि ये लोग पैसे के लिए काम नहीं कर रहे हैं। इनका एक ही मकसद है कि फासिस्ट लोगों के झूठ की फैक्ट्री को लोगों के सामने लाना।

कुछ हफ्ते पहले बंगलुरू में ज़ोरदार बारिश हुई। उस टाइम पर संघ के लोगों ने एक फोटो वायरल कराया। कैप्शन में लिखा था कि नासा ने मंगल ग्रह पर लोगों के चलने का फोटो जारी किया है। बंगलुरू नगरपालिका बीबीएमसी ने बयान दिया कि ये मंगल ग्रह का फोटो नहीं है। संघ का मकसद था, मंगल ग्रह का बताकर बंगलुरू का मज़ाक उड़ाना। जिससे लोग यह समझें कि बंगलुरू में सिद्धारमैया की सरकार ने कोई काम नही किया, यहां के रास्ते खराब हो गए हैं, इस तरह के प्रोपेगैंडा करके झूठी खबर फैलाना संघ का मकसद था। लेकिन ये उनको भारी पड़ गया था क्योंकि ये फोटो बंगलुरू का नहीं, महाराष्ट्र का था, जहां बीजेपी की सरकार है।

हाल ही में पश्चिम बंगाल में जब दंगे हुए तो आर एस एस के लोगों ने दो पोस्टर जारी किए। एक पोस्टर का कैप्शन था, बंगाल जल रहा है, उसमें प्रोपर्टी के जलने की तस्वीर थी। दूसरे फोटो में एक महीला की साड़ी खींची जा रही है और कैप्शन है बंगाल में हिन्दु महिलाओं के साथ अत्याचार हो रहा है। बहुत जल्दी ही इस फोटो का सच सामने आ गया। पहली तस्वीर 2002 के गुजरात दंगों की थी जब मुख्यमंत्री मोदी ही सरकार में थे। दूसरी तस्वीर में भोजपुरी सिनेमा के एक सीन की थी। सिर्फ आर एस एस ही नहीं बीजेपी के केंद्रीय मंत्री भी ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में माहिर हैं। उदाहरण के लिए, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने फोटो शेयर किया कि जिसमें कुछ लोग तिरंगे में आग लगा रहे थे। फोटो के कैप्शन पर लिखा था गणतंत्र के दिवस हैदराबाद में तिरंगे को आग लगाया जा रहा है। अभी गूगल इमेज सर्च एक नया अप्लिकेशन आया है, उसमें आप किसी भी तस्वीर को डालकर जान सकते हैं कि ये कहां और कब की है। प्रतीक सिन्हा ने यही काम किया और उस अप्लिकेशन के ज़रिये गडकरी के शेयर किए गए फोटो की सच्चाई उजागर कर दी। पता चला कि ये फोटो हैदराबाद का नहीं है। पाकिस्तान का है जहां एक प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन भारत के विरोध में तिरंगे को जला रहा है।

इसी तरह एक टीवी पैनल के डिस्कशन में बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सरहद पर सैनिकों को तिरंगा लहराने में कितनी मुश्किलें आती हैं, फिर जे एन यू जैसे विश्वविद्यालयों में तिरंगा लहराने में क्या समस्या है। यह सवाप पूछकर संबित ने एक तस्वीर दिखाई। बाद में पता चला कि यह एक मशहूर तस्वीर है मगर इसमें भारतीय नहीं, अमरीकी सैनिक हैं। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमरीकी सैनिकों ने जब जापान के एक द्वीप पर क़ब्ज़ा किया तब उन्होंने अपना झंडा लहराया था। मगर फोटोशाप के ज़रिये संबित पात्रा लोगों को चकमा दे रहे थे। लेकिन ये उन्हें काफी भारी पड़ गया। ट्वीटर पर संबित पात्रा का लोगों ने काफी मज़ाक उड़ाया।

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में एक तस्वीर साझा की। लिखा कि भारत 50,000 किलोमीटर रास्तों पर सरकार ने तीस लाख एल ई डी बल्ब लगा दिए हैं। मगर जो तस्वीर उन्होंने लगाई वो फेक निकली। भारत की नहीं, 2009 में जापान की तस्वीर की थी। इसी गोयल ने पहले भी एक ट्वीट किया था कि कोयले की आपूर्ति में सरकार ने 25,900 करोड़ की बचत की है। उस ट्वीट की तस्वीर भी झूठी निकली।

छत्तीसगढ़ के पी डब्ल्यू डी मंत्री राजेश मूणत ने एक ब्रिज का फोटो शेयर किया। अपनी सरकार की कामयाबी बताई। उस ट्वीट को 2000 लाइक मिले। बाद में पता चला कि वो तस्वीर छत्तीसगढ़ की नहीं, वियतनाम की है।

ऐसे फ़ेक न्यूज़ फैलाने में हमारे कर्नाटक के आर एस एस और बीजेपी लीडर भी कुछ कम नहीं हैं। कर्नाटक के सांसद प्रताप सिम्हा ने एक रिपोर्ट शेयर किया, कहा कि ये टाइम्स आफ इंडिय मे आया है। उसकी हेडलाइन ये थी कि हिन्दू लड़की को मुसलमान ने चाकू मारकर हत्या कर दी। दुनिया भर को नैतिकता का ज्ञान देने वाले प्रताप सिम्हा ने सच्चाई जानने की ज़रा भी कोशिश नहीं की। किसी भी अखबार ने इस न्यूज को नहीं छापा था बल्कि फोटोशाप के ज़रिए किसी दूसरे न्यूज़ में हेडलाइन लगा दिया गया था और हिन्दू मुस्लिम रंग दिया गया। इसके लिए टाइम्स आफ इंडिया का नाम इस्तमाल किया गया। जब हंगामा हुआ कि ये तो फ़ेक न्यूज़ है तो सांसद ने डिलिट कर दिया मगर माफी नहीं मांगी। सांप्रादायिक झूठ फैलाने पर कोई पछतावा ज़ाहिर नहीं किया।

जैसा कि मेरे दोस्त वासु ने इस बार के कॉलम में लिखा है, मैंने भी एक बिना समझे एक फ़ेक न्यूज़ शेयर कर दिया। पिछले रविवार पटना की अपनी रैली की तस्वीर लालू यादव ने फोटोशाप करके साझा कर दी। थोड़ी देर में दोस्त शशिधर ने बताया कि ये फोटो फर्ज़ी है। नकली है। मैंने तुरंत हटाया और ग़लती भी मानी। यही नहीं फेक और असली तस्वीर दोनों को एक साथ ट्वीट किया। इस गलती के पीछे सांप्रदियाक रूप से भड़काने या प्रोपेगैंडा करने की मंशा नहीं थी। फासिस्टों के ख़िलाफ़ लोग जमा हो रहे थे, इसका संदेश देना ही मेरा मकसद था। फाइनली, जो भी फ़ेक न्यूज़ को एक्सपोज़ करते हैं, उनको सलाम । मेरी ख़्वाहिश है कि उनकी संख्या और भी ज़्यादा हो।

Wednesday, April 26, 2017

धूल फांक रही हैं मंडल आयोग की 40 में से 38 सिफारिशें


सत्येन्द्र पीएस

"गरीब का आंसू कुछ समय तक तो आंसू रहता है, लेकिन वही आंसू फिर तेजाब बन जाता है जो इतिहास के पन्नों को चीर करके धरती पर अपना व्यक्तित्व बनाता है। यॆ समझ लीजिए कि गरीब की आंख में जब तक आंसू हैं, आंसू हैं लेकिन जब आंसू सूख जाते हैं तो उसकी आंखें अंगार हो जाती हैं और इतिहास ने ये बताया है कि जब गरीबों की आंखें अंगार होती हैं तो सोने के भी महल पिघल करके पनालों में बहते हैं।"
विश्वनाथ प्रताप सिंह, मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के बाद 15 अगस्त 1990 को लाल किले की प्राचीर से
मंडल आयोग की सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की सिर्फ एक सिफारिश लागू होने पर देश में ऐसा तूफान उठा, मानो अगर 52 प्रतिशत आबादी को कुछ जगह सरकारी नौकरियों में दे दी गई तो देश पर कोई आफत आ जाएगी। जगह जगह धरने प्रदर्शन हुए। कांग्रेस ने पिछले दरवाजे से आरक्षण विरोधियों का समर्थन किया। भाजपा ने कांग्रेस की रणनीति अपनाने के साथ उस समय की विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार को गिरा दिया।
बहरहाल अब ओबीसी आरक्षण लागू होने के 25 साल बाद उसकी समीक्षा की मांग उठने लगी है। मंडल आयोग ने भी अपनी सिफारिश में कहा था कि सिफारिशें लागू होने के 20 साल बाद इसकी समीक्षा होनी चाहिए। हालांकि यह नहीं कहा था कि सिर्फ एक सिफारिश लागू करने के बाद ही समीक्षा हो जानी चाहिए कि उसका लाभ हुआ या नहीं।


अब जब आरक्षण विरोधी समीक्षा की मांग कर रहे हैं तो आरक्षण का आंशिक लाभ पाने वाला तबका भी आरक्षण की समीक्षा की मांग कर रहा है। अब वह तबका 100 प्रतिशत लेने और शेष 15 प्रतिशत आबादी को आरक्षण देने की मांग कर रहा है। शायद इंतजार करते करते गरीब के आंसू सूख चुके हैं।
"देश के 85 ओबीसी, एससी, एसटी अब 50 % पर नहीं मानने वाले, अब ये हर क्षेत्र में 100 % लेंगे। उसके बाद मानवता के आधार पर तुम्हे 15 % की भीख देंगे।"
हिंदुत्व और मनुवाद की प्रयोगशाला बने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से आरक्षण को लेकर उठी डॉ हितेश सिंह की यह आवाज संदेश देती है।
इस समय आरएसएस के विचारकों की ओर से रह रहकर आरक्षण की समीक्षा की बात होती है। अब नए तरह की समीक्षा सामने आई है कि आखिर संविधान में प्रावधान होने के बावजूद बेईमानी क्यों हो रही है। जिन लोगों का जातीय आधार पर सदियों से शोषण किया गया उनके लिए थोड़ा सा स्पेस देने में दिक्कत क्यों आ रही है ?

यह सवाल उठना ऐसे दौर में लाज़िम है जब विभिन्न रिपोर्ट आ रही हैं कि देश के विश्व विद्यालयों, सरकारी संस्थानों, सरकारी विभागों में आरक्षण होने के बावजूद न तो 22.5 % sc, st का कोटा भरा है और न ही 27 % ओबीसी का कोटा भरा है। केंद्रीय सेवाओं में ओबीसी का प्रतिनिधित्व वर्ष 2016 में 14 फीसदी तक सिमट कर रह गया है। हालांकि वर्ष 2016 के ये आंकड़े 33 मंत्रालयों/विभागों के हैं, बाकी विभागों ने इस संदर्भ में रिपोर्ट डीओपीटी को नहीं दी है।


1931 की जनगणना के आधार पर मंडल आयोग ने 1980 में पेश अपनी रिपोर्ट में अनुमाम लगाया था कि देश में ओबीसी आरक्षण में आने वाली गैर द्विज जातियों की आबादी 52 प्रतिशत है। 1993 में मंडल आयोग की सिर्फ एक सिफारिश लागू की गई। 2008 में अर्जुन सिंह जब मानव संसाधन मंत्री थे तब एक और सिफारिश लागू हुई। शेष करीब 38 सिफारिशें धूल फांक रही हैं। उनको पूछने वाला कोई नहीं है।

इतनी कम सुविधा में भी सदियों से सुविधा भोग रहे सुविधा भोगियों का कलेजा फटने लगा। सिर्फ 2 सिफारिशें लागू की गई। परिणाम यह हुआ कि ओबीसी तबके को बहुत सीमित लाभ हुआ। कुछ बच्चे पढ़ पाए। आरक्षण मिल रहा है और हमे भी जगह मिल सकती है इस उत्साह में तमाम बच्चे नौकरियां हासिल करने में सफल रहे, लेकिन सीमित दायरे में।


मंडल आयोग ने नौकरियों में आरक्षण की सिफारिश में यह भी लिखा था, “हमारा यह तर्क नहीं है कि ओबीसी अभ्यर्थियों को कुछ हजार नौकरियां देकर हम देश की कुल आबादी के 52 प्रतिशत पिछड़े वर्ग को अगड़ा बनाने में सक्षम होंगे। लेकिन हम यह निश्चित रूप से मानते हैं कि यह सामाजिक पिछड़ेपन के खिलाफ लड़ाई का जरूरी हिस्सा है, जो पिछड़े लोगों के दिमाग में लड़ा जाएगा। भारत में सरकारी नौकरी को हमेशा से प्रतिष्ठा और ताकत का पैमाना माना जाता रहा है। सरकारी सेवाओं में ओबीसी का प्रतिनिधित्व बढ़ाकर हम उन्हें देश के प्रशासन में हिस्सेदारी की तत्काल अनुभूति देंगे। जब एक पिछड़े वर्ग का अभ्यर्थी कलेक्टर या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक होता है तो उसके पद से भौतिक लाभ उसके परिवार के सदस्यों तक सीमित होता है। लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक असर बहुत व्यापक होता है। पूरे पिछड़ा वर्ग समाज को लगता है कि उसका सामाजिक स्तर ऊपर उठा है। भले ही पूरे समुदाय को ठोस या वास्तविक लाभ नहीं मिलता है, लेकिन उसे यह अनुभव होता है कि उसका “अपना आदमी” अब “सत्ता के गलियारे” में पहुंच गया है। यह उसके हौसले व मानसिक शक्ति को बढ़ाने का काम करता है।”

अब ज्योतिबा फुले, शाहू जी महराज, भीमराव अंबेडकर, काशीराम से आगे बढ़कर मामला नई पीढ़ी के हाथों में आ गया है। नई पीढ़ी स्वाभाविक रूप से ज्यादा तार्किक और ज्यादा आक्रामक तरीके से अपने हित और अहित की बात सोच रही है। लेकिन इसमें भी पेंच है। पिछड़े वर्ग को यह कहकर बरगलाया जा रहा है कि उसमें जो अमीर हैं, वही सारा लाभ ले जा रहे हैं। जबकि आंकड़े कहते हैं कि 27 प्रतिशत कोटा भी नहीं भरा जा सका है। खुले तौर पर बेइमानी हो रही है और देश की 52 प्रतिशत आबादी को अभी भी सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है।

निजी क्षेत्र में स्थिति और भयावह है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुखदेव थोराट के एक अध्ययन के मुताबिक निजी क्षेत्र में उन आवेदकों के चयनित होने की संभावना बहुत कम होती है, जिनकी जातीय टाइटल से यह पता चलता है कि वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या पिछड़े वर्ग से आते हैं।


भेदभाव को इस तरह भी समझा जा सकता है कि ओबीसी, एसटी, एसटी के लोग बड़े पैमाने पर अपनी जाति छिपाते हैं। उच्च जाति यानी क्षत्रिय या ब्राह्मण होने के दावे करते हैं। उन दावों के समर्थन में हजारों तर्क इतिहास और भूगोल से खोदकर लाते हैं। लेकिन उच्च जाति होने का दावा और तर्क उनके जातीय समूह तक ही सिमटा होता है। समाज का कोई अन्य तबका, अन्य जाति उनके दावे को नहीं मानता और उस दावे का मजाक ही उड़ाता है।
उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश की दो सशक्त पिछड़ी जातियां अहिर और कुर्मी खुद को क्षत्रिय होने का दावा करती हैं। लेकिन क्षत्रिय या ब्राह्मणों द्वारा उनके क्षत्रिय माने जाने की बात तो दूर, इनको कोई बढ़ई, लोहार, बरई, तेली तमोली, चमार, ढाढ़ी भी क्षत्रिय नहीं मानता। यह व्यावहारिक बात है। लेकिन इसके बावजूद यह तबका अपनी जाति ऊंची बताने, अपनी जाति व टाइटिल छिपाने की कवायद में रहता है कि सत्तासीन अपर कास्ट शायद इन्हें धोखे में ही सही, कुछ लाभ पहुंचा दे।
मुस्लिम समुदाय के प्रति भेदभाव की खबरें तो अक्सर आती रहती हैं। ऐसे में निजी क्षेत्र में आरक्षण भी एक महत्त्वपूर्ण मसला बन गया है, जिससे बहुसंख्यक आबादी को मुख्य धारा में शामिल किया जा सके।
कुल मिलाकर मौजूदा सत्तासीन दल भाजपा और उसके संरक्षक आरएसएस की पृष्ठभूमि देखें तो पिछड़े वर्ग के आरक्षण का विरोध का इनका लंबा इतिहास रहा है। अनुसूचित जाति के आरक्षण को तो इन्होंने बर्दाश्त कर लिया, लेकिन पिछड़ा वर्ग इन्हें कतई बर्दाश्त नहीं है।
सरकार की नीतियां भी इस ओर इशारा करती हैं। किसानों की तरह तरह की मांगों पर सरकार बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही है। सरकारी नौकरियां खत्म की जा रही हैं। जो सरकारी पद खाली हैं, उनकी वैकेंसी नहीं आ रही है। निजी क्षेत्र में संभावनाएं कम हो गई हैं।
ऐसे में देश के पिछड़े वर्ग के लोग भी संगठित हो रहे हैं। पिछड़े वर्ग में आज भी किसान, छोटे मोटे कारोबार करने वाले, लघु व कुटीर उद्योग चलाने वाले लोग हैं। आज इस तबके की बर्बादी किसी से छिपी हुई नहीं है। इस तबके की ओर से असंगठित रूप से ही सही, विरोध हो रहा है। लोग विरोध में सड़कों पर उतर रहे हैं। इसकी पूरी संभावना है कि आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज हो सकता है।


https://youtu.be/x94cu5gKiew


https://youtu.be/x94cu5gKiew


Saturday, March 18, 2017

टेक सेवी मोदी और उनकी ढाई कदम की चाल से पस्त विपक्ष


सत्येन्द्र पीएस
मैंने सबसे पहले नरेंद्र मोदी से सेल्फी शब्द सुना था। उसके बाद गूगल में खोजने पर पता चला कि मोबाइल में फ्रंट कैमरे आ गए हैं, उससे खुद की फोटो लेने को सेल्फी कहते हैं। हालांकि सेल्फी शब्द की हिंदी मैं उस समय नहीं खोज पाया था।
यह उस समय की बात है, जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। मोदी पर तमाम आर्टिकल और टीवी शो मैंने देखा। कई में यह बताया गया था कि मोदी शुरू से बहुत ज्यादा टेक सेवी हैं। वह लैपटॉप का इस्तेमाल करते हैं। अत्याधुनिक मोबाइल फोन रखते हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट पर मौजूद रहते हैं।

हालांकि सबसे पहले ट्विटर के बारे में कांग्रेस के नेता शशि थरूर के माध्यम से मुझे जानकारी मिली थी। लेकिन कुछ महीनों बाद यह जानकारी आने लगी मोदी के ट्विटर पर फॉलोवर बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। उस समय ट्वीट नया नया ही था। ब्लॉग, फेसबुक होते हुए हम ट्विटर की ओर बढ़े थे। भारतीय नेताओं में टेक्नोलॉजी, सोशल साइट्स के मामले में मोदी सबसे तेज हैं।

लोकसभा चुनाव जब शुरू हुआ तो मोदी ने फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से प्रचार शुरू किया। कांग्रेस शासन काल में उन्होंने मीडिया के खिलाफ माहौल बनाने के साथ मीडिया को अपने पक्ष में बखूबी किया। बड़ी संख्या में अपने फॉलोवर तैयार किए। उस समय तक कांग्रेस या किसी अन्य भारतीय दल को यह एहसास नहीं था कि चुनाव ट्विटर और फेसबुक के माध्यम से लड़ा जा सकता है। राजनेता इसे हल्के में ले रहे थे और मोदी अपनी टेक टीम के साथ इसका बखूबी इस्तेमाल कर रहे थे। किसे ट्रोल कराना है, किस मीडिया पर्सन को निशाना बनाना है, यह पूरी टीम भावना के साथ तय होता था। जिस पर हमला करना है, उसे लहूलुहान और पस्त करने तक उसका पीछा किया जाता था। टीम कोई भी मसला छोड़ती और फेसबुक और ट्विटर पर फॉलोवर बने समर्थक इसे बहुत तेजी से लपक लेते। साथ ही तरह तरह की गालियों की बौछार शुरू होती और अगर कोई अन्य दल या विचारधारा का समर्थक होता तो वह भाग खड़ा होता।

राजनीतिक दलों में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर मोदी समर्थकों का सबसे तेजी से आम आदमी पार्टी व उसके समर्थकों ने किया। तेजी से फेसबुक पर सदस्य बनाए। मिस्ड कॉल से पार्टी का कार्यकर्ता बनाकर लोगों के मोबाइल डेटा बेस तैयार किए। हालांकि पहले से आधार न होने की वजह से पार्टी सिर्फ दिल्ली तक सिमटी रह गई।

केंद्र में जब भाजपा सत्ता में आई और मोदी प्रधानमंत्री बने तो थोड़ा बहुत कांग्रेस की भी तंद्रा टूटी और वह भी सोशल साइट्स की ओर चली। यू ट्यूब पर विज्ञापन देना भी कांग्रेस ने शुरू किया। लेकिन रफ्तार बहुत सुस्त रही। लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, अखिलेश यादव सहित तमाम दलों ने सोशल साइट्स का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। सोशल साइट्स इतनी प्रसिद्ध हो गईं कि राजनीतिक दल और सरकार भी ट्विटर और फेसबुक से खबरें देने लगे। आज हम इस दौर में जी रहे हैं कि तमाम खबरें और खबरों के लिए कोट्स ट्विटर से मिलते हैं। पार्टियों की ओर से जारी होने वाली प्रेस विज्ञप्ति और नेताओं के बयान की जगह ट्विटर पर किए गए उनके ट्वीट ही खबरों में बदल चुके हैं। हर अखबार, टीवी चैनल के बीट रिपोर्टर की नजर ट्विटर पर होती है।

उत्तर प्रदेश का चुनाव आते आते करीब सभी दल सोशल साइट्स पर सक्रिय हो गए। समाजवादी पार्टी ने जहां सोशल साइट्स के लिए पूरी टीम लगा दी, वहीं बसपा के समर्थकों ने भी मोर्चा संभाल लिया। वहीं मोदी ने फिर नई रणनीति अपनाई। फेसबुक और ट्विटर तो पार्टी समर्थकों पर छोड़ दिया गया, जिन्हें समाज में “भक्त” के नाम से जाना जाता है।

भक्त ऐसे तत्व होते हैं, जो बेरोजगार या रोजगार पाए युवा, बुजुर्ग, सेवानिवृत्त व्यक्ति कोई भी हो सकते हैं। इनका न तो पार्टी से कोई लेना देना होता है, न नीतियों से। प्रशासन से इन लोगों का काम कम ही पड़ता है। मोदी से भी इन्हें कोई खास काम नहीं है। भक्तों की चिंता सिर्फ कथित 'राष्ट्र' होता है। वह राष्ट्र की माला जपते हैं और उनका एक सूत्री कार्यक्रम होता है कि मोदी की प्रशंसा करें।

उत्तर प्रदेश के चुनाव में फेसबुक और ट्विटर को इसी तरह के भक्तों पर छोड़ दिया गया, जो सपा और बसपा की टीमों से लगातार मोर्चा संभाले रहे।

राजनीतिक विश्लेषक अश्विनी कुमार श्रीवास्तव लिखते हैं कि भाजपा के ध्रुवीकरण की शातिर चाल में बसपा फंस गईं। उनका मानना है कि ध्रुवीकरण की रणनीति भाजपा ने पहले ही बना ली थी और इसके तहत मुस्लिमों को एक भी टिकट नहीं दिया। साथ ही गैर यादव पिछड़ा वर्ग, जो बसपा का बड़े पैमाने पर आधार वोट रहा है, उसे लुभाने की कवायद की। इस घाटे की भरपाई के लिए मायावती को मुस्लिम वोट खींचने की कवायद करने के लिए बाध्य किया। मायावती इस ट्रैप में फंस गईं और ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने का काम किया। इससे भाजपा को खुद को हिंदूवादी साबित करने व अति पिछड़े तबके को हिंदू बनाने का मौका मिला और वह पूरी तरह से अपनी इस रणनीति में कामयाब रही।

मोदी और उनकी तकनीकी पेशेवर टीम ने यूपी चुनाव में ह्वाट्स ऐप पर जोर दिया। लोगों के परिवारों, कार्यालय आदि के ग्रुप बनाने व व्यक्तिगत मैसेज, वीडियो भेजने के लिए व्हाट्स ऐप ने खासी जगह बना ली है। यह सब सेवाएं फेसबुक पर भी उपलब्ध हैं। लेकिन ग्रुप बनाने, इंस्टैंट मैसेजिंग, वीडियो शेयरिंग के मामले में यह ऐप बहुत ही कारगर और उपभोक्ताओं के अनुकूल है।

मोदी की टीम ने ह्वाट्स ऐप के मुताबिक मैसेज और वीडियो पर जोर दिया। चुनाव के पहले भुगतान वाले ढेरों नेट पैक उपलब्ध थे, लेकिन चुनाव के तीन महीने पहले हाई स्पीड 4जी जियो कनेक्शन मुफ्त मिल गया। यह कनेक्शन मिलते ही ईरान, ईराक, सीरिया और पता नहीं किन किन देशों के वीडियो, तमाम धार्मिक सांप्रदायिक वीडियो स्मार्ट फोन पर आने लगे। जियो का 4 जी धकाधक उसे डाउनलोड और अपलोड करने में मदद करने लगा।

मैसेज सभी वही थे, जो आरएसएस अपने जन्म के समय से ही प्रसारित करता रहा है। इसमें नेहरू के मुस्लिम परिवार के होने से लेकर चौतरफा हिंदुओं पर हमले होने के मामले, अगले दो दशक में हिंदुओं के खत्म होने और मुसलमानों के बहुसंख्यक होने, विपक्षी नेताओं पर अश्लील चुटकुले, टिप्पणियां और वीडियो भेजने का काम बहुत बहुत तेजी से हुए।

इस खेल को विपक्ष उस तेजी से नहीं समझ पाया, जितनी तेजी से उसे समझना चाहिए था। मिस्ड कॉल वाली सदस्यताओं ने पार्टी को बहुत बड़ी संख्या में मोबाइल डेटा बेस दिया और इन मोबाइलों पर भारी मात्रा में ध्रुवीकरण करने वाले मैसेज, वीडियो, चुटकुले, टिप्पणियां बड़े पैमाने पर लोगों को पहुंचाई गईं।

इस तरह से तकनीक के मामले में मोदी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि हमारी उभरती युवा पीढ़ी और टेक्नोक्रेट्स की तुलना में वह 62 साल की उम्र में भी बुड्ढे नहीं हुए हैं।

और भाजपा ने उत्तर प्रदेश को 403 में से 325 सीटें जीतकर भारी बहुमत के साथ अपनी झोली में डाल लिया। विपक्ष के लिए बचा जाने माने शायर मोहम्मद इब्राहिम जौक का यह शेर..
कम होंगे इस बिसात पे हम जैसे बद-क़िमार
जो चाल हम चले सो निहायत बुरी चले

(इस पर एक अलग लेख बनता है कि जब 2009 की हार के बाद जीवीएल नरसिम्हाराव इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के खिलाफ लेख लिखने, लाल कृष्ण आडवाणी इसके विरोध प्रदर्शन में व्यस्त थे तो मोदी किस कदर खामोश रहे। उन्हें तो जैसे कोई फॉर्मूला मिल गया था। 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद गुजरात में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से जब निकाय चुनाव हुए तो भाजपा ने 70 प्रतिशत के करीब वोट हासिल कर एकतरफा निकाय चुनाव जीता था।)

Saturday, March 11, 2017

बसपा क्यों हारी?

“हम लोग बसपा को वोट देते रहे हैं। कई दशक से। ब्राह्मणवाद के खिलाफ हमारे परिवार ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। मायावती अब सतीश मिश्रा की गोदी में खेलती हैं। जिन ब्राह्मणवादियों से हम लड़ते थे, वो हमें गालियां देते हैं कि देखिए आपकी नेता क्या कर रही हैं। दलित हमें गाली देते हैं कि ये ब्राह्मणवाद की पालकी ढोते हैं। हमारे ऊपर चौतरफा मार पड़ रही है। अब बसपा को वोट देने का क्या मतलब बनता है?”
यह पिछड़े वर्ग के बहुजन समाज पार्टी (बसपा) समर्थक का बयान है। इसमें कुछ गालियां जोड़ लें, जिन्हें हिंदी भाषा की बाध्यता के चलते यहां नहीं लिखा गया है।
“छोटी जातियों के लोग बहुत खुश हैं। उनको लगता है कि ब्राह्मण, ठाकुर और बड़े लोग नोटबंदी से पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं। उन्हें अपना फल, सब्जियां, दूध फेकना पड़ा। रिक्शेवालों की कमाई घट गई। फिर भी उन्हें आंतरिक खुशी है कि मोदी जी ने ऐसी चाल चली कि ब्राह्मण ठाकुर बर्बाद हो गए। नोटबंदी पूरी तरह भाजपा के पक्ष मे जा रही है।”
यह भारतीय जनता पार्टी के उत्तर प्रदेश के एक बड़े नेता का बयान है। यह पूछे जाने पर कि उत्तर प्रदेश में नोटबंदी का क्या असर है, खासकर ग्रामीण इलाकों में, तो उन्होंने यह जवाब दिया था।

करीब 2 महीने पहले के यह बयान सुनकर यह संकेत मिल रहे थे कि उत्तर प्रदेश में क्या हो सकता है। उत्तर प्रदेश घूम रहे तमाम लोग भी यह सूचना दे रहे थे कि बसपा बुरी तरह हार रही है। यह सूचनाएं व बयान देने वालों की निजता की रक्षा के लिए जरूरी है कि उनके नाम न लिखे जाएं। हां, उल्लेख करना इसलिए जरूरी है कि जमीनी हकीकत का पता चल सके और लोग रूबरू हो सकें कि आखिर हार की क्या वजह है। बसपा ने ऐसा क्या कर दिया, जिसकी वजह से उसके खिलाफ आंधी चली। अगर उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा के समर्थन में आंधी चली है तो यह भी मानना होगा कि बसपा के खिलाफ भी उतना ही तगड़ा तूफान था। और बसपा उड़ गई।
उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर मेरी राय बड़ी स्पष्ट थी। तमाम साथी, समीक्षक यह मानकर चल रहे थे कि त्रिशंकु विधानसभा होगी। मैंने यह बार बार दोहराया कि त्रिशंकु की कोई स्थिति उत्तर प्रदेश में नहीं है। या तो बसपा 300 पार कर जाएगी, या भाजपा। इन दोनों दलों में से इस चुनाव में एक का बर्बाद होना निश्चित है। ऐसा अनुमान लगाने की बड़ी वजह उपरोक्त दो बयान थे, जिसमें नोटबंदी का सार्थक असर और बसपा समर्थक पिछड़े वर्ग के मतदाताओं का बसपा के प्रति वैचारिक घृणा थी। बसपा के लोगों का कहना था कि उनके कुछ पिछड़े वोट भाजपा की ओर जा रहे हैं, लेकिन ब्राह्मण प्रत्याशियों को मिलने वाले वोट और मुस्लिम वोट मिलकर इसे कवर कर लेंगे। ऐसे में मेरी स्पष्ट राय थी कि अगर ब्राह्मण और मुस्लिम वोट एकतरफा बसपा को मिला (हालांकि पुराने अनुभव चींख चींखकर कह रहे थे कि ऐसा नहीं होने जा रहा है) तो वह सबका सूपड़ा साफ करेगी। अगर बसपा के प्रति ओबीसी की नफरत प्रभावी हुई तो वह मत भाजपा की ओर जाएंगे और बसपा पूरी तरह उड़ जाएगी। और वही हुआ।
2007 में विधानसभा चुनाव में जीत के बाद से ही बसपा का समीकरण बदलना शुरू हो गया। पार्टी में निश्चित रूप से तमाम ब्राह्मण व ठाकुर नेता पहले से ही जुड़े हुए थे। लेकिन 2007 में सत्ता में आने के बाद से सतीश मिश्रा पार्टी में अहम हो गए। मायावती जब भी कोई प्रेस कान्फ्रेंस या आयोजन करतीं, सतीश मिश्र वहां खड़े नजर आते। इतना ही नहीं, उसके बाद हुए चुनावों में सतीश मिश्रा के रिश्तेदारों, परिवार वालों को जमकर लाभ पहुंचाया गया, उन्हें टिकट बांटे गए। बसपा का बहुजन, सर्वजन में बदल गया।
सर्वजन में बदलना एक तकनीकी खामी है। सभी के लिए काम करना देवत्व की अवधारणा है। राजनीतिक दलों का एक पक्ष होता है कि उनका झुकाव किधर है। यहां तक भी ठीक था। बसपा की गलती तब शुरू हुई, जब पार्टी ने अति पिछड़े वर्ग की उपेक्षा शुरू कर दी, जो काशीराम के समय से ही पार्टी के कोर वोटर थे। शुरुआत में जब सोनेलाल पटेल से लेकर ओमप्रकाश राजभर जैसे नेता निकाले गए तो उनके समर्थकों ने यह मान लिया कि व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा के चलते इन नेताओं को निकाल दिया गया है। बाद में पिछड़ों की यह उपेक्षा संगठनात्मक स्तर पर भी नजर आने लगी। टिकट बटवारे में यह साफ दिखने लगी।
बसपा ने 2012 में सर्वजन समाज के जातीय समीकरण के मुताबिक टिकट बांटना शुरू किया। करारी शिकस्त के बाद भी पार्टी नहीं संभली और 2014 के लोक सभा चुनाव में भी उसी समीकरण पर भरोसा किया। 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी पूरी तरह से और खुलेआम कांग्रेस के ब्राह्मण दलित मुस्लिम समीकरण पर उतर आई। टिकट बंटवारे में यही दिखाया गया कि कितने मुस्लिमों और कितने ब्राह्मणों को टिकट दिए गए।
बसपा या मायावती के लिए ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित समीकरण बिल्कुल मुफीद नहीं लगता। कांग्रेस के लिए तो यह ठीक है। वहां नेतृत्व ब्राह्मण का होता है, जहां मुस्लिम और दलित खुशी खुशी नेतृत्व स्वीकार करते रहे हैं। जहां बसपा नहीं है, वहां देश भर में कांग्रेस का आज भी यही समीकरण सफलता पूर्वक चल रहा है। लेकिन बसपा के साथ दिक्कत यह है कि ब्राह्मण या मुस्लिम कभी दलित नेतृत्व नहीं स्वीकार कर सकता, क्योंकि वह शासक जाति रही है। बसपा के रणनीतिकारों ने न सिर्फ 2017 के विधान सभा चुनाव में यह चूक की है, बल्कि 2012 के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में भी यही किया था। बसपा बुरी तरह फेल रही।
काशीराम का समीकरण बड़ा साफ था कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। उन्होंने पिछड़े वर्ग को लठैत बनाया। दलित तबका उस समय लाठी उठाने को तैयार नहीं था। ऐसे में दलितों का वोट और पिछड़ों की लाठी का समीकरण बना। काशीराम तक पिछड़ा वर्ग दलितों के रक्षक की भूमिका में था। लेकिन जैसे ही मायावती के हाथ सत्ता आई, सतीश मिश्र की भूमिका बढ़ी। पिछड़े वर्ग की लठैती वाली भूमिका खत्म हो गई। पिछड़े नेता एक एक कर निकाले जाते रहे। दलित समाज का नव बौद्धिक वर्ग पिछड़ों को ब्राह्मणवाद की पालकी ढोने वाला बताता रहा। पिछड़ों की बसपा के प्रति नफरत बढ़ती गई। उसकी चरम परिणति 2017 के विधानसभा चुनाव में दिखी।
समाजवादी पार्टी का तो भविष्य करीब करीब पहले से ही साफ था। सोशल मीडिया से लेकर जमीनी स्तर तक उसके सिर्फ यादव समर्थक बचे। यादवों में भी जिन लोगों ने इलाहाबाद में त्रिस्तरीय आरक्षण की लड़ाई लड़ी या जेएनयू में अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे युवा सपा से उम्मीद छोड़ चुके थे। पारिवारिक कलह पहले से ही कोढ़ में खाज बन चुकी थी। ऐसे में उसका बेड़ा गर्क होना तय था।
मायावती का कहना है कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ हुई। यह सही भी हो सकता है, गलत भी हो सकता है। तकनीक के इस युग में ईवीएम सेट करना शायद संभव हो कि आप बसपा को वोट करें और वह भाजपा को चला जाए। लेकिन यह कहकर कछुए की तरह अपनी खोल में गर्दन छिपा लेने से जान बचने की संभावना कम है।
पूर्वांचल के जाने माने छात्र नेता पवन सिंह कहते हैं कि बसपा को अति पिछड़े वर्ग का वोट नहीं मिला है। मुस्लिमों का भी वोट नहीं मिला है। यह पूछे जाने पर कि क्या आपके पास बूथ स्तर पर आंकड़ा है कि ऐसा हुआ है ? या मीडिया में चल रही खबरों के आधार पर ऐसा कह रहे हैं, उन्होंने कई गांवों के आंकड़े गिना डाले। उन्होंने दावा किया कि जिस विधानसभा में वह मतदाता हैं, उनके तमाम गांवों के आंकड़ों से यही लगता है कि अति पिछड़े वर्ग का एकतरफा वोट भारतीय जनता पार्टी को मिला है, जबकि मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी को मिला है। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति कमोबेश पूर्वी उत्तर प्रदेश के हर जिले में रही है। साथ ही वह बताते हैं कि ब्राह्मण बनिया और कायस्थ का एकमुश्त वोट भारतीय जनता पार्टी को मिला है। उन्होंने कहा कि भाजपा से जीतने वाले उम्मीदवार ऐसे हैं, जिन्हें विधानसभा में कितनी पंचायतें, कितने थाने हैं, यह भी नहीं पता होगा, जनता से उनका कोई लेना देना नहीं है, लेकिन मोदी के नाम पर वोट पड़ा है। सभी भाईचारा खत्म हो गया। किसी के लिए काम कराना, किसी के सुख दुख में शामिल होना कोई फैक्टर नहीं रहा, सिर्फ और सिर्फ मोदी के लिए लोगों ने अपना प्रेम दिखाया।
उनका कहना है कि कथित सवर्ण जातियों को तो उनकी मनचाही जातीय पार्टी मिल ही गई थी। हालांकि पवन सिंह ठाकुरों के बारे में कुछ भी नहीं कहते कि वह किधर गए।
बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के लिए संघर्षरत एचएल दुसाध कहते हैं कि इन दलों को अपने मुद्दे पर लौटना होगा, दूसरा कोई रास्ता नहीं है कि यह दल अपने को बचा सकें। परिवार और जाति से ऊपर उठकर वंचित तबके की राजनीति करनी होगी। उनकी रोजी रोजगार के लिए लड़ना होगा, तभी यह दल फिर से जगह बना सकते हैं।
बहरहाल बसपा को अब शून्य से नहीं दोहरे शून्य से शुरुआत करनी है। एक लोकसभा का शून्य, और अब उसमें विधानसभा का भी शून्य जुड़ गया। सपा का भी कमोबेश यही हाल है। सपा और बसपा को कम से कम यह समझना होगा कि सामाजिक न्याय की राजनीति, हिस्सेदारी की राजनीति ही बचा सकती है। जातीय समीकरण बनाना न सपा के लिए संभव है और न बसपा के लिए। भाजपा और आरएसएस स्वाभाविक ब्राह्मणवादी राजनीतिक संगठन है। वह 5,000 साल से जाति के खिलाड़ी रहे हैं। उन्होंने पूरे समाज को 10,000 से ज्यादा जातियों में बांट रखा है। जाति पर चुनाव खेलने पर वही जीतेंगे।

बल्ली सिंह चीमा की कुछ पंक्तियां बहुत सामयिक हैं
तय करो किस ओर हो तुम, तय करो किस ओर हो
आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो।
खुद को पसीने में भिगोना ही नहीं है जिंदगी
रेंगकर मर-मर के जीना ही नहीं है जिंदगी
कुछ करो कि जिंदगी की डोर न कमजोर हो
तय करो किस ओर हो तुम, तय करो किस ओर हो
खोलो आंखें फंस न जाना तुम सुनहरे जाल में,
भेड़िये भी घूमते हैं आदमी की खाल में,
जिंदगी का गीत हो या मौत का कोई शोर हो।
तय करो किस ओर हो तुम, तय करो किस ओर हो।
सूट और लंगोटियों के बीच युद्ध होगा जरूर
झोपड़ों और कोठियों के बीच युद्ध होगा जरूर
इससे पहले युद्ध शुरू हो, तय करो किस ओऱ हो
तय करो किस ओर हो तुम, तय करो किस ओर हो
आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो।




Saturday, September 17, 2016

गोरक्षा के नाम पर शर्मसार होती मानवता


सत्येन्द्र पीएस


गोरक्षा के नाम पर गुजरात के ऊना में दलितों को बंधक बनाए जाने, बांधकर उनकी पिटाई किए जाने की घटना ने पूरी दुनिया में भारत को शर्मसार किया है। गाय की रक्षा के नाम पर मनुष्यों को मार दिए जाने की घटना दुनिया के किसी भी सभ्य समाज के लिए वीभत्स है।
हालांकि भारत में दलितों का उत्पीड़न नया नहीं है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सत्ता में प्रभावी होने पर गोरक्षा कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ लेता है। इसके पहले जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी थी, तब भी हरियाणा में कथित गोरक्षकों ने गाय का चमड़ा उतारने ले जा रहे दलितों की हत्या कर दी थी।
अब दोबारा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने और आरएसएस के प्रभावी होने के बाद से गोरक्षक सड़कों पर हैं। देश के तमाम इलाकों से गुंडागर्दी, हत्या, मारपीट की खबरें आनी शुरू हो गईं। उत्तर प्रदेश के दिल्ली से सटे नोएडा इलाके में अखलाक को निशाना बनाया गया। मंदिर की माइक से ऐलान हुआ कि अखलाक के फ्रिज में गाय का मांस रखा है। भीड़ जुटी। उसने फैसला कर दिया। अखलाक को पीट पीटकर मार डाला गया।
उसके बाद पंजाब का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें ट्रक पर गाय लादकर ले जा रहे कुछ सिखों को कुछ लोग बड़ी बेरहमी से लाठी डंडों से पीट रहे थे। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर गाय की रक्षा के नाम पर गाय ले जा रहे लोगों के उत्पीड़न की खबरें आती रहती हैं। गुजरात के उना में मरे जानवर का चमड़ा उतारने ले जा रहे दलितों की पिटाई का वीडियो वायरल होने के कुछ दिनों पहले भी राज्य में कुछ दलितों की पिटाई हो चुकी थी, लेकिन जब ऊना मामले ने तूल पकड़ा तब जाकर उस मामले में आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
साफ है कि कानून की धमक कहीं नहीं दिख रही है। कथित गोरक्षक गुंडों को लगता है कि उनकी सरकार बन गई है और वह हर हाल में सुरक्षित हैं। उन्हें किसी को भी मारने पीटने का पूरा अधिकार मिल गया है।
हालांकि इस बीच प्रधानमंत्री ने एक कार्यक्रम के दौरान अजीबोगरीब बयान दिया। उन्होंने कहा, “मुझे गोली मार दो, लेकिन मेरे दलित भाइयों को मत मारो।” आखिर इसका क्या मतलब निकाला जाए? क्या प्रधानमंत्री के हाथ में कोई ताकत नहीं रह गई है? क्या प्रधानमंत्री कहना चाह रहे हैं कि गोरक्षा के नाम पर पिटाई उचित है और कोई दलित चमड़ा उतारता है उसे पीटने के बजाय प्रधानमंत्री को पीटा जाए? क्या प्रधानमंत्री कानून की रक्षा में सक्षम नहीं हैं? क्या प्रधानमंत्री सीधे अपील नहीं कर सकते कि यह अपराध न किया जाए? क्या प्रधानमंत्री को सचमुच नहीं पता है कि यह कौन कर रहा है? ऐसे तमाम सवाल हैं, जो प्रधानमंत्री के बयान के बाद उठते हैं।
भारत में सदियों से जातीय भेदभाव है। एक जाति विशेष के लोग ही मरे हुए जानवरों को निपटाते हैं। किसान या किसी के घर कोई जानवर मरता है तो उस जाति विशेष के लोगों को पशु के मरने के पहले ही सूचना दे दी जाती है। वह पशुओं को सिवान में ले जाते हैं, उनकी खाल उतारते हैं। खाल बेचने से उन्हें कुछ धन मिल जाता है। हां, गरीबी के दौर में मरे हुए जानवरों का मांस भी वह तबका खाता था, लेकिन अब शायद मांस खाने की स्थिति नहीं है। ओम प्रकाश बाल्मीकि और प्रोफेसर तुलसीराम ने अपने प्रसिद्ध उपन्यासों में खाल उतारने और मरे हुए जानवरों का मांस हासिल करने के लिए गिद्धों और दलित महिलाओं के बीच संघर्ष के बारे में बताया है।
यह कितना दुखद है कि जो काम दलित करते आए हैं, और कोई तबका वह काम करने को तैयार नहीं है, उसके लिए भी उन्हें पीटा जाता है। शायद पीटा जाना हिंदुत्व या हिंदू संस्कृति का एक अभिन्न अंग है, जिसके तहत एक दुश्मन खोजना जरूरी होता है, जिससे हिंदुत्व को बचाना होता है।
इस हिंदुत्व की रक्षा के लिए वह काल्पनिक दुश्मन मुस्लिम हो सकता है, इसाई हो सकता है, दलित हो सकता है, या नास्तिक हो सकता है। कोई भी। कभी भी। कुछ भी। एक दुश्मन होना जरूरी है, जिससे जंग छेड़नी है। जंग इसलिए कि हिंदुत्व बच सके। यह पता नहीं कैसा हिंदुत्व है, जो गाय या मरी हुई गाय की खाल में रहता है, जिसे बचाने की कवायद की जाती है।
हिंदुत्व की रक्षा के अजब गजब रूप और अजब गजब दुश्मन रहे हैं। हिंदू देवी देवता हथियारों से लैस हैं। हर देवी देवता के हाथ में असलहे हैं। मुस्लिम नहीं थे, तब यह देवता धर्म की रक्षा के लिए लड़ते थे। आखिर किससे लड़ते थे? उल्लेख तो मिलता है कि वैदिक यज्ञों में गायों की बलि दी जाती थी। इस बलि प्रथा और खून खराबे की वजह से ही जैन और बौद्ध धर्म का उद्भव हुआ था, जो यज्ञों की हिंसा के पूरी तरह खिलाफ थे। आखिर में वे कौन लोग थे, जो वैदिक हिंसा के विरोधी थे और वैदिक यज्ञों को तहस नहस करने के लिए तत्पर रहते थे। इन्ही राक्षसों से यज्ञों की रक्षा के लिए वैदिक देवता हमेशा हथियार लिए फिरते थे।
अब नए दौर में गोरक्षा का प्रभार कुछ संगठनों ने संभाल लिया है। गोरक्षक दल, गोसेवा दल जैसे कितने संगठन आ गए हैं, जो अभी गोआतंकी बने घूम रहे हैं।
अहम बात यह है कि ऊना की घटना का जोरदार विरोध हुआ। गुजरात ही नहीं, महाराष्ट्र में भी तमाम रैलियां निकलीं। संसद में विपक्षी दलों ने इस मसले को उठाया। वहीं गुजरात में अहमदाबाद से ऊना तक की पदयात्रा और उसके बाद ऊना में सभा का आयोजन हुआ। युवा वकील जिग्नेश शाह इस आंदोलन के अगुआ बनकर उभरे। हालांकि पहले वह आम आदमी पार्टी से जुड़े थे, लेकिन विवादों के बाद उन्होने आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि सिर्फ दलित आंदोलन उनका मकसद है और गुजरात के आंदोलन में आम आदमी पार्टी की कोई भूमिका नहीं रही है।
इस आंदोलन के बाद गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल को पद छोड़ना पड़ा। भले ही सरकार ने तमाम अन्य वजहें गिनाईं, आनंदीबेन की उम्र का हवाला दिया गया। लेकिन माना जा रहा है कि पाटीदार आरक्षण आंदोलन के बाद दलित आंदोलन ने मुख्यमंत्री के इस्तीफे में अहम भूमिका निभाई।
इन आंदोलनों व विरोध प्रदर्शनों का असर जो भी नजर आ रहा हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी का मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सेहत पर इससे कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। आगरा में 21 अगस्त 2016 को आयोजित एक कार्यक्रम में गोरक्षकों पर उठ रहे सवाल को लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि गोरक्षा का काम कानून के दायरे में चल रहा है, अगर किसी को शंका होती है तो भला बुरा कह सकता है। उन्होंने कहा कि गोरक्षा के काम ही उनके लिए उत्तर है, जो पहले विरोधी थे वह भी गोरक्षा के काम को देखकर समर्थन में आ गए। भागवत ने कहा कि गोरक्षा की गतिविधियां चल रही हैं और आगे भी चलती रहेंगी, गोरक्षक अच्छा काम कर रहे हैं। आशय साफ है। आरएसएस समाज के ध्रुवीकरण के पक्ष में खड़ा है। गोरक्षा की आड़ में वह सियासी रोटियां सेंकने को तैयार है। उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने को हैं और गुजरात मामला अभी शांत नहीं हुआ है। वहीं आरएसएस ने उत्तर प्रदेश के आगरा शहर से साफ संकेत दे लिया कि गोरक्षा के नाम पर जो चल रहा है, वह चलते रहना चाहिए।
प्रधानमंत्री के दलित प्रेम से भी यही छलकता हुआ दिख रहा है। उन्हें अखलाक की घटना स्वीकार्य है, दलितों के ऊपर सीधा हमला स्वीकार नहीं है। परोक्ष रूप से वह इस मामले को हिंदू और मुस्लिम ध्रुवीकरण तक ही सीमित रखना चाहते हैं। दलितों व पिछड़ों के बारे में प्रधानमंत्री की सोच का पता उनके 23 अगस्त 2016 के दिल्ली के एनडीएमसी हॉल में सभी 29 राज्यों और 7 केंद्रशासित प्रदेशों से आए पार्टी के नेताओं के सम्मेलन में दिए गए बयान से चलता है। मोदी ने कहा कि राष्ट्रवादी तो हमारे साथ हैं, हमें दलित और पिछड़ों को साथ लाना है। शायद उनका आशय यह था कि अपर कास्ट राष्ट्रवादी होता है और दलित पिछड़े अराष्ट्रवादी, राष्ट्रदोही या कुछ और हैं। वे राष्ट्रवादी नहीं हैं और उन्हें राष्ट्र से शायद कोई प्रेम नहीं है।
कुल मिलाकर सरकार का रोना धोना और दलित उत्पीड़न की घटनाओं का विरोध जताना एक दिखावटी कवायद ज्यादा बन गई है। शायद भाजपा आरएसएस और उनके अनुषंगी संगठनों को यह संदेश साफ जाता है कि उन्हें किसे पीटना है और किसके खिलाफ गुंडागर्दी करनी है। गुजरात में ऐसा हुआ भी। प्रधानमंत्री के लाख रोने गाने के बावजूद जब ऊना में दलित रैली खत्म हो रही थी तो दलितों पर हमले हो गए। दरबार यानी काठी दरबार गुजरात के क्षत्रिय हैं जिनकी सौराष्ट्र में कभी 250 से ज्याीदा रियासतें हुआ करती थीं। इस समुदाय ने ऊना की रैली से लौटते दलितों पर लाठी, तलवार और बंदूक से हमला किया।
गुजरात में दलित चेतना नई बात नहीं है। बड़ौदा के महाराज सयाजी राव गायकवाड़ ने 1882-83 में सभी के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान कर दिया था और बड़ौदा, नवसारी, पाटन व अमरेली में चार अंत्यएज स्कू ल व हॉस्टाल खुलवाए थे। 1939 में उनकी मृत्यु हुई। उसके बाद 1931 में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के अहमदाबाद आगमन के बाद से यहां आंबेडकरवादी विचारधारा का जो काम चालू हुआ, वह अभी जमीनी स्तसर पर चालू है। गुजरात में दलितों के घर में बाबा साहेब की तस्वींरों लगी हुई नजर आती हैं। कांग्रेस का मजदूर महाजन संघ, आर्य समाज, आंबेडकर का बनाया शेड्यूल कास्टी फेडरेशन, कांग्रेस का हरिजन सेवक संघ, बौद्ध महासंघ आदि तमाम संगठनों के मिले जुले काम ने दलितों की चेतना जगाने का काम किया है।
हालांकि गुजरात में बाबाओं का प्रकोप भी कम नहीं है। सौराष्ट्रस में भी काठियावाड़ के जो दलित हैं, उनमें अस्सीा प्रतिशत जैसलमेर के रामदेवरा धाम के भक्तड हैं। रामदेव स्वािमी जाति से क्षत्रिय थे, लेकिन दलितों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। गुजरात में रामदेव स्वा मी के दो मंदिर हैं। जामनगर से भावनगर तक के दलित वहां हर साल मंडप नामक त्योकहार में जाते हैं और अलग अलग जाति के लोगों के साथ मिलकर पूजा अर्चना करते हैं। इनके अलावा सवैयानाथ से लेकर जालाराम तक तमाम संत हुए, जिनकी भक्ति दलित करते हैं। इसमें संत की जाति नहीं देखी जाती। संतों की आराधना के मामले में दलितों के साथ भेदभाव गुजरात में मिट चुका है।
गुजरात के दलितों के बीच सामाजिक सुधार की जो प्रमुख धारा करीब सौ साल से मौजूद रही है, वह आज कहीं कहीं राष्ट्रावादी राजनीति के रूप में नजर आती है। सौराष्ट्र के दलितों के धर्मगुरु शम्भूतनाथ बापू हैं। वे राज्यिसभा में भाजपा सांसद हैं। पाकिस्तालन के सिंध में भी उनके करीब दो लाख अनुयायी रहते हैं। जाति से वे खुद दलित हैं और दलितों की जमकर हिमायत करते हैं, लेकिन अपनी पार्टी लाइन के खिलाफ कभी नहीं जाते। 21 जुलाई 2016 को राज्यलसभा में शम्भू नाथ बापू ने ऊना मामले पर जोरदार भाषण दिया, लेकिन उनका सामाजिक न्याूय बीजेपी की सत्ता की पुष्टि करने में लगा रहा। कुल मिलाकर दलित या शोषण का मसला अपने राजनीतिक स्वार्थ या विचारधारा के खांचे में बंधा हुआ नजर आता है।
इसके पहले भी गुजरात में दलित आंदोलन हुए हैं। 1980 के आसपास आरक्षण विरोधी आंदोलन हुआ था, जिसमें दलितों को निशाना बनाया गया। उस समय भी दलितों पर कहानियां लिखी गईं, उसे प्रचारित प्रसारित किया गया। दलितों ने प्रतिज्ञा की कि वे मरे जानवरों को नहीं उठाएंगे। हालांकि इसका कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। तीन साल पहले जूनागढ़ में 80,000 दलितों ने एक साथ बौद्ध धर्म में दीक्षा लेकर तूफान खड़ा कर दिया था। इस पर भी कोई खास हलचल नहीं हुई।
फिलहाल इस आंदोलन से भाजपा के विरोधी खासे खुश हैं। खासकर गुजरात को लेकर कांग्रेस उत्साह में है। आम आदमी पार्टी भी इस मामले को भुनाने में लगी है। दलित वहीं के वहीं खड़े हैं। गुजरात में दलित चेतना अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा ही है। इसके बावजूद कांग्रेस व भाजपा दोनों ने ही दलितों को अलग थलग रखा है। माना जाता है कि दलित ज्यादातर कांग्रेस को अपना वोट देते हैं, लेकिन कांग्रेस के लिए भी गुजरात के दलित वोटर से ज्यादा कुछ नहीं हैं। अनुमान के मुताबिक राज्य में महज 6 प्रतिशत दलित हैं। ऐसे में न तो वह लोकतंत्र में वोट की राजनीति के सशक्त प्रहरी बन पा रहे हैं, न ही अपने संवैधानिक हक का इस्तेमाल कर पा रहे हैं। इन 6 प्रतिशत मतों की अन्य किसी वर्ग मसलन पिछड़े या मुस्लिम या किसी अन्य के साथ लाबीयिंग भी नहीं है, जिससे मतदान के वक्त ये सशक्त मतदाता बनकर कुछ कर दिखाने या राजनीतिक बदलाव लाने में सक्षम हों।
ऊना में दलितों पर हुए हमले और उसके असर को देखने के लिए अभी बहुत कुछ देखना बाकी है। अगर गुजरात के अलावा इसे पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र के संदर्भ में देखें, जहां दलितों की निर्णायक आबादी है, तो इसके राजनीतिक निहितार्थ और असर देखना अभी बाकी है।

Friday, September 16, 2016

झूठे जग की झूठी प्रीत, कैसी हार और किसकी जीत




(सामाजिक न्याय के पुरोधा एक बार फिर खींचतान में फंस गए हैं। इनसे आस लगाए बैठा समाज निराश है। इन पुरोधाओं से उम्मीद थी कि यह हिंदुत्व, गाय, गोबर और गोमूत्र की राजनीति से निकालकर राह दिखाएंगे, लेकिन यह अपने ही विवादों में फंसे और पतनोन्मुख नजर आ रहे हैं।)

सत्येन्द्र पीएस

उत्तर प्रदेश में सत्तासीन समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के परिवार में घमासान मची है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दो कैबिनेट मंत्रियों गायत्री प्रसाद प्रजापति और राजकिशोर सिंह को बर्ख़ास्त कर दिया। गायत्री जहां मुलायम सिंह के करीबी माने जाते हैं, वहीं राजकिशोर शिवपाल सिंह यादव के खासमखास हैं। इसके पहले भी इस परिवार में कई बार टकराव की स्थिति आई है।
मऊ के विधायक मुख्तार अंसारी को शिवपाल ने सपा में शामिल होने की घोषणा की, वहीं अखिलेश ने इसके खिलाफ बयान दे दिया। आखिरकार मुलायम सिंह के हस्तक्षेप के बाद किसी तरह से बवाल टला। उसके कुछ दिन ही बीते थे कि शिवपाल ने इस्तीफे की पेशकश कर दी। मंत्रियों की बर्खास्तगी पर पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह की प्रतिक्रिया थी कि यह जानकारी उन्हें समाचार माध्यमों से मिली।
मंत्रियों की बर्खास्तगी के विवाद को 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि अखिलेश ने मुख्य सचिव दीपक सिंघल को हटा दिया। सिंघल ने दो महीने पहले ही मुख्य सचिव का पदभार ग्रहण किया था। उनकी जगह प्रमुख सचिव (वित्त) राहुल भटनागर को नया मुख्य सचिव नियुक्त किया गया। सिंघल को शिवपाल का करीबी माना जाता है, जो मुख्य सचिव बनने के पहले सिंचाई विभाग में प्रमुख सचिव थे। सिंचाई विभाग के मंत्री शिवपाल यादव हैं और माना जाता है कि उन्हीं के दबाव में सिंघल को मुख्य सचिव बनाया गया था। सपा के कुछ नेताओं का मानना है कि सिंघल सपा के राज्यसभा सदस्य अमर सिंह द्वारा दिल्ली में दिए गए रात्रिभोज में शामिल हुए थे, जिससे अखिलेश नाखुश थे।

उधर बिहार में अलग बवाल मचा है। राष्ट्रीय जनता दल के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन जेल से रिहा हो गए। छूटते ही उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार तो परिस्थितिवश मुख्यमंत्री बने हैं, नेता तो लालू प्रसाद हैं। वहीं नीतीश पर लगातार हमलावर रहे राजद उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने भी शहाबुद्दीन का समर्थन कर दिया। हमले के बीच नीतीश ने कहा कि उन्हें कौन क्या कहता, उसकी वह परवाह नहीं करते। वहीं जदयू के वरिष्ठ नेता बिजेंद्र प्रसाद यादव व ललन सिंह ने मीडिया से बातचीत कर राजद प्रमुख लालू प्रसाद से अपील की कि गैर जिम्मेदाराना बयान देने वाले नेताओं पर लगाम लगाएं।

शुक्र है कि लालू प्रसाद का बयान आ गया कि गठबंधन के सर्वमान्य नेता नीतीश कुमार हैं। इसमें कहीं से किसी को संदेह की जरूरत नहीं है। रघुवंश बाबू की लगातार बयानबाजी पर भी उन्होंने अपना पक्ष साफ करते हुए कहा गया है कि पार्टी नेताओं को मीडिया में ऐसी बयानबाजी से बचने को कहा गया है, लेकिन बड़े नेता कुछ न कुछ बोल रहे हैं। हालांकि शहाबुद्दीन के बयान में लालू को कोई खामी नजर नहीं आई और उन्होंने कहा कि अपने दल के प्रमुख की प्रशंसा करना कहीं से गलत नहीं है!
उत्तर प्रदेश और बिहार के यह दो नेता लालू प्रसाद और मुलायम सिंह सामाजिक न्याय के पहरुआ माने जाते हैं। पिछड़े वर्ग के लोग जब भी खुद को पीड़ित या दबा महसूस करते हैं, मुंह उठाकर इन दो नेताओं की ओर देखते हैं। 2014 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी / आरएसएस की शानदार जीत के बाद जब पिछड़ा तबका हाशिए पर महसूस करने लगा तो उसने इन नेताओं की ओर देखा। बिहार में विधान सभा चुनाव होने वाले थे। लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने सक्रिय कोशिश करना शुरू किया कि समाजवादियों को एक झंडे के नीचे लाया जाए। तमाम बैठकें हुईं। पुराने जनता दली नेताओं ने मिलकर मुलायम सिंह यादव को महागठबंधन का नेता भी घोषित कर दिया। सामाजिक न्याय के पुरोधाओं से उम्मीद की जाने लगी कि राष्ट्रीय स्तर पर कोई कामन मिनिमम प्रोग्राम बनेगा और अब पिछड़े वर्ग का राजनीतिक अस्तित्व बचाया जा सकेगा।

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले ही महागठबंधन की हवा निकल गई। सपा में शिवपाल लॉबी जहां संयुक्त एकता के पक्ष में थी, वहीं रामगोपाल-अखिलेश लॉबी इसके खिलाफ थी। रामगोपाल यादव ने सार्वजनिक बयान भी दिया कि दलों का विलय व्यावहारिक नहीं है। आखिरकार सपा अलग हो गई। इसके बावजूद शिवपाल यादव ने व्यक्तिगत स्तर पर जाकर राजद और जदयू गठबंधन का प्रचार किया। फिर भी एका की हवा निकल चुकी थी। मुलायम कुनबे में शिवपाल यादव जमीनी नेता रहे हैं। जब नेता जी दिल्ली और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करते थे तो उन्हें पहले विधानसभा और फिर लोकसभा में पहुंचाने के लिए स्थानीय लेवल पर लठैती करने का काम शिवपाल यादव संभालते थे।

अगर मुलायम के किसी जीवनीकार ने ईमानदारी दिखाई होगी तो इस पहलू पर जरूर प्रकाश डाला होगा कि मुलायम सिंह यादव को राष्ट्रीय स्तर पर नेताजी बनाने में शिवपाल नींव के पत्थर थे। बावजूद इसके, जब सपा 2012 में विधानसभा चुनाव जीती तो अचानक अखिलेश यादव ने शिवपाल को पीछे छोड़ दिया। बिहार में लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव कैबिनेट मंत्री हैं, वहीं तेजस्वी यादव उप मुख्यमंत्री। मतलब नीतीश कुमार के बाद दूसरे स्थान पर। लालू प्रसाद के दल में भी निश्चित रूप से रघुबंश बाबू और अब्दुल बारी सिद्दीकी को भी उम्मीदें रही होंगी, भले ही ये नेता लालू प्रसाद के परिवार के नहीं रहे हैं। बहरहाल लालू प्रसाद के दोनों पुत्र ठीक उसी तरह राजद के सबसे बड़े नेता बन गए, जैसे मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश यादव बने थे।

पिछड़ा वर्ग विकल्पहीन है। शरद यादव का जनाधार नहीं है, जिनके परिवार के बारे में कोई जानता नहीं। परिवारवाद से कोसों दूर नीतीश कुमार का रुख साफ नहीं रहता। लगातार 17 साल भाजपा के साथ रहे और लोकसभा चुनाव के पहले धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अलग हो गए। नीतीश कुमार ने न तो कभी पिछड़े वर्ग के पक्ष में खुलकर बयान दिया और न ही वर्गीय हित को लेकर कोई आंदोलन या लड़ाई छेड़ी। वहीं मुलायम और लालू ने शुरुआती दिनों में पिछड़े वर्ग के लिए समाज में खुलकर लोहा लिया। बाद में यह दोनों यादव नेता हुए। इनकी सीमाएं सिमटते सिमटते अब अपने परिवार के नेता तक पहुंच गई। निश्चित रूप से इस आइडेंडिटी पॉलिटिक्स ने उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस को और उसके बाद भाजपा को शीर्षासन करा दिया। यह दोनों दल जीत के लिए तरस गए।

स्वाभाविक है कि नेताओं को जनता का जबरदस्त प्यार मिला। नेताओं ने प्यार वापस भी किया। कुछ हद तक पिछड़े वर्ग का उत्थान भी हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में पिछड़े चेहरे दिखाई देने लगे। अब पिछड़े वर्ग के युवा पढ़ रहे हैं। चीजों को अपने नजरिए से समझ रहे हैं। एका भी बनी है। तमाम विश्वविद्यालयों में पिछड़े वर्ग के छात्रनेता निकल रहे हैं। हालांकि इन कुनबों की राजनीति और आपसी खींचतान में एक निराशा नजर आती है। स्वाभाविक रूप से लालू प्रसाद से उम्मीद थी कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद वह दिल्ली में बैठेंगे और केंद्र की राजनीति करेंगे। उसी तरह से मुलायम सिंह यादव से भी उम्मीद थी कि वह राष्ट्रीय स्तर पर एकता बनाकर केंद्रीय राजनीति में सशक्त हस्तक्षेप करेंगे।

इन ताजा विवादों से वंचित तबके, या कहें कि इन नेताओं से आस लगाए बैठे लोगों की उम्मीदें तार तार हो रही हैं। एक राजनीतिक हताशा सामने आ रही है कि अब आगे क्या ? क्या कोई नेता ऐसा आएगा, जो संकीर्णताओं से ऊपर उठकर पिछड़े वर्ग का नेता बने। पूरे समाज का नेता तो बनना दूर, पारिवारिक विवादों में उलझी क्षेत्रवादी राजनीति एक बार फिर अपने समर्थकों को निराशा की गर्त में ढकेल रही है।

इस काली आधी रात को बेगम अख्तर का गाया गीत ही बेहतर नजर आ रहा है....
झूठे जग की झूठी प्रीत।
दुनिया का दिन रैन का सपना
मोह नगर में चैन का सपना,
रूप अनूप है नैन का सपना
कैसी हार और किसकी जीत