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Friday, January 8, 2010

मोबाइल है तो स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक आपको कभी भी धमकी दे सकता है!

मुझे भरोसा है कि अगर एकता ने स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक से कर्ज लिया होगा तो वह आत्महत्या कर चुकी होगी। गुरुवार की सुबह मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ, जिसे मैं जिंदगी में शायद ही कभी भूल पाऊं। दोपहर 11।30 बजे मैं ऑफिस जाने के लिए तैयार ही हो रहा था कि मेरे मोबाइल पर +911244826071 और +911242350104 से कॉल आने लगी। वह किसी एकता के बारे में पूछ रहा था। 10 मिनट के भीतर जब चौथी कॉल आई तो वह मुझे गालियां देने लगा। मैने भी थोड़ी-बहुत गालियां दी, जो मुझे आती थीं और कहा कि आइंदा अगर कॉल किया तो मैं एफआईआर करा दूंगा। फोन काट दिया।
फोन काटते ही फिर फोन आ गया तो मेरी पत्नी ने फोन ले लिया। वह बात कर रही थी तो स्पीकर ऑन था और फोन करने वाला लगातार गालियां दिए जा रहा था, ऐसी गालियां- जिसे लिखना भी संभव नहीं है। बहरहाल मैने फिर फोन काटा।12 बजे तक मैने कम से कम 5 बार फोन काटा। तब तक ऑफिस जाने के लिए मेरे मित्र भी आ चुके थे। मैं उन्हें इस घटना के बारे में बता ही रहा था कि फिर कॉल आ गई। इस बार मेरे मित्र ने फोन उठाया और उन्होंने समझाने की कोशिश की कि यह उस व्यक्ति का नंबर नहीं है, जिसे तुम तलाश रहे हो। उधर से जवाब आया कि तब उसे पैदा कर। बहरहाल उन्होंने भी थोड़ा-बहुत अपनी भाषा में समझाने की कोशिश की। हम लोग ऑफिस के लिए निकले और मैं लगातार फोन काटता रहा या उसे रिसीव करके छोड़ता रहा।

बहरहाल ऑफिस पहुंचने पर इस घटना के बारे में चर्चा कर ही रहा था कि फिर फोन आने लगा। इस बार मैने फोन उठाया और कहा कि यह एकता का नंबर नहीं है। फोन करने वाले ने कहा कि अभी थोड़ी देर पहले इसी फोन पर एकता से बात हुई है, तू उससे बात करा। बहरहाल- मैने फिर फोन काट दिया। फोन काटते ही फिर फोन आ गया। इस बार मेरे एक सहकर्मी मनीश ने फोन उठाया। उन्होंने फोन करने वाले को समझाने की कोशिश की कि भाई यह नंबर सत्येन्द्र जी का है। उसने कहा कि तुम फोन का कागज लेकर बैंक आ जाओ। उन्होंने फोन काट दिया और एफआईआर करने की सलाह दी। इस बीच मुझे कॉल करने वाले ने कहा कि मैं प्रवीण बोल रहा हूं, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक बैंक गुडग़ांव से। वह बार-बार पैसे वापस करने की बात कर रहा था।

इस बीच 4 काल और आई और मैं फोन काटते अपने सहयोगी को लेकर आईपीओ एक्सटेंशन थाने की ओर बढऩे लगा। थाने पर पहुंचने पर पहले तो वहां मौजूद पुलिसकर्मी ने मुझे समझाया कि आप पांडव नगर इलाके के थाने में एफआईआर दर्ज कराइये। हालांकि थाने पर यह बताने पर कि मैं बिजनेस स्टैंडर्ड में रिपोर्टर हूं और आईटीओ पर मेरा ऑफिस है, जो आपके थाना क्षेत्र में आता है, तो उसने मुझे सब इंस्पेक्टर (शायद) मीना यादव के पास भेज दिया। उन्होंने मुझे कॉल रिकॉर्ड करने की सलाह दी और एक लिखित आवेदन अपने पास जमा करा लिया, जिसमें मैने अपने दो घंटे के मानसिक उत्पीडऩ के बारे में लिख दिया। इंसपेक्टर ने मुझे कार्रवाई करने का आश्वासन देकर विदा कर दिया।

मैं अभी कार्यालय पहुंचा भी नहीं था कि इंसपेक्टर मीना यादव का फोन आ गया। उन्होंने कहा कि मेरी बात आपके द्वारा दिए गए नंबर पर हुई है और कॉल रिसीव करने वाले ने बताया है कि वह स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक से बोल रहा है। उसने इंसपेक्टर को बताया था कि यह नंबर उसे मिला है, जिसमें उसे एकता का नाम बताया गया है। बहरहाल इंसपेक्टर ने कहा कि अब इस नंबर से आपको कॉल नहीं आनी चाहिए और अगर आती है तो आप मुझे इनफार्म करिएगा। बैंक वाले ने इंसपेक्टर से यह भी कहा कि कॉल रिकार्डेड है और किसी तरह की गाली-गलौझ नहीं की गई है। शायद उसने बाद में की गई 2-3 कॉल की रिकॉर्डिंग की होगी।बहरहाल, उसके बाद ब्लॉग पर लिखने तक मेरे पास कॉल नहीं आई है।

मैं यही सोच रहा हूं कि आर्थिक अखबार में काम करने के नाते हम लोग लगातार रिजर्व बैंक के गाइडलाइंस के बारे में लिखते हैं, चिदंबरम का भाषण सुनते है और उसे छापते हैं कि वसूली के नाम पर किसी को तंग नहीं किया जाएगा। साथ ही पुलिस का आश्वासन होता है कि स्पेशल सेल बनी है और इस तरह की किसी भी सूचना पर तत्काल कार्रवाई होगी। आखिर ये सब आश्वासन, खबरें किसके लिए हैं।

हालांकि मैने अपनी अब तक की जिंदगी में किसी बैंक से कोई कर्ज नहीं लिया है। भगवान न करें कि कभी लेना भी पड़े, लेकिन अगर जिस व्यक्ति ने कर्ज लिया है तो ये निजी बैंक कितनी गुंडागर्दी करते हैं यह मुझे समझ में आ गया। दो-तीन घंटे का मानसिक उत्पीडऩ मेरे ऊपर इतना भारी पड़ा कि उसका बयान किया जाना भी मुश्किल है।

Wednesday, July 15, 2009

बाबू मोशाय, बिहार से बजट में ऐसा भेदभाव!

सत्येन्द्र प्रताप सिंह
लोकसभा चुनाव के पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने पाले में शामिल करने की कोशिश करने वाली कांग्रेस ने सरकार बनने के बाद बिहार को निराश कर दिया है।
दरअसल चुनाव परिणाम आने के पहले कांग्रेस को खुद के गठजोड़ के दम पर सरकार बनने की उम्मीद नहीं थी और उस समय प्रधानमंत्री ने भी बिहार को सैध्दांतिक रूप से विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने को समर्थन दिया। लेकिन प्रणब मुखर्जी ने अपने बजट से बिहारी बाबू के खासा नाराज कर दिया।
नीतीश कुमार ने कहा कि हमें उम्मीद थी कि राज्य के पिछड़ेपन और स्थानीय लोगों के पलायन को ध्यान में रखते हुए सरकार निश्चित रूप से बजट में अलग से सहायता का प्रावधान करेगी, लेकिन बजट में तो मनमोहन सरकार खुद के वादों से भी मुकर गई। कुमार ने कहा कि सरकार ने बिहार के विकास की जरूरतों को नहीं समझा।
अगर बजट में राज्यों को विशेष सहायता दिए जाने की सूची को देखें तो तमिलनाडु को श्रीलंका से आए विस्थापितों को बसाने के लिए 500 करोड़ रुपये, पश्चिम बंगाल में आइला तूफान से हुए नुकसान की भरपाई के लिए 1000 करोड़ रुपये, दिल्ली में कामनवेल्थ खेलों के लिए 16,300 करोड़ रुपये दिए गए, वहीं बिहार में कोसी नदी से आई बाढ़ को पिछली संप्रग सरकार के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद राष्ट्रीय आपदा घोषित किया था और उस समय सहायता दिए जाने की बात कही गई।
उस सरकार में प्रमुख भागीदार रहे लालू प्रसाद केंद्र पर दबाव बनाने में सफल रहे थे, लेकिन वर्तमान संप्रग सरकार में बिहार की हिस्सेदारी खत्म हो गई और सरकार ने कोसी की बाढ़ से पीड़ित बिहार के लोगों के लिए कोई आर्थिक सहायता देने की जरूरत नहीं समझी।
राज्य सरकार ने बिहार की गरीबी और स्थानीय लोगों के दूसरे राज्यों में बढ़ते विस्थापन के आंकड़े देते हुए केंद्र सरकार से विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग की थी। राज्य की उम्मीदें तब और प्रबल हो गई, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्य के पिछड़ेपन को स्वीकारा, लेकिन बजट में विशेष श्रेणी या विशेष पैकेज जैसी कोई बात सामने नहीं आई।
यहां तक कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के लिए हैंडलूम क्लस्टर की घोषणा की गई, लेकिन भागलपुर के हैंडलूम क्षेत्र की पूरी तरह से उपेक्षा कर दी गई। राज्य के वित्तमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि राजस्व के मसले में भी केंद्र सरकार ने निराश किया है।
उन्होंने कहा कि अंतरिम बजट में बिहार के हिस्से 18,154 करोड़ रुपये आया था, लेकिन प्रणब मुखर्जी के 2009-10 के अंतिम बजट में इसे कम कर 18,909 करोड़ रुपये कर दिया गया। पिछले साल की तुलना में राज्य को दिए जाने वाले राजस्व में केवल 2.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
मोदी ने कहा कि इसके लिए मंदी का हवाला दिया जा रहा है, लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में राज्य सरकार ने आंतरिक कर राजस्व में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। उम्मीद थी कि राज्य को केंद्र की मदद मिल जाएगी, लेकिन बजट ने भी राज्य को निराश कर दिया।


ख्वाहिशें... जो नहीं हुई पूरी

विशेष राज्य का दर्जा

पिछड़ेपन और पलायन को देखते हुए विशेष पैकेज

कोसी नदी में आई बाढ़ के बाद पीड़ितों की मदद के लिए रकम

विशेष सड़क योजना के लिए सहायता

केंद्र सरकार के राजस्व में हिस्सेदारी बढ़ाना

भागलपुर को हैंडलूम क्लस्टर के रूप में आर्थिक मदद

किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कैंपस खोलने के लिए
मदद


http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=21235

Sunday, January 4, 2009

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र देगा बिहार के विकास को गति

सत्येन्द्र प्रताप सिंह


बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से हर साल जूझने वाले बिहार ने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के लिए कमर कस ली है।
इसके तहत सभी बुनियादी सुविधाओं वाले मेगा फूड पार्क बनाने की योजना है, जो इस साल कार्यरूप लेगा। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर टेक्सटाइल और हैंडलूम के क्षेत्र में भी तेजी से काम चल रहा है। इस कारोबार से जुड़े कारोबारियों और सरकारी अधिकारियों का मानना है कि ये क्षेत्र वर्ष 2009 को खुशगवार बना देंगे।

खाद्य प्रसंस्करण से जुडे ज़ानकारों का मानना है कि 2015 तक खाद्य प्रसंस्करण कारोबार 83,000 करोड़ रुपये तक का हो जाएगा। इसे देखते हुए बिहार सरकार ने 2 मेगा फूड पार्क बनाने की योजना बनाई है। एक मुजफ्फरपुर वैशाली क्षेत्र तथा एक भागलपुर खगड़िया क्षेत्र में होगा। मेगा फूड पार्क, छोटे-छोटे प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्रों से जोड़े जाएंगे। इसके लिए कोल्ड चेन तैयार की जाएगी। प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्रों को फील्ड कलेक्शन केंद्रों से जोड़ा जाएगा। केंद्रीय प्रसंस्करण हब के रूप में विकसित किए जाने वाले मेगा फूड पार्कों में सभी बुनियादी सुविधाएं जैसे गोदाम और प्रसंस्करण आदि की सुविधा उपलब्ध होगी। इसके अलावा चावल, मक्का और मखाना क्लस्टर के विकास के साथ ही 100 कृषि आधारित ग्रामीण व्यापार केंद्र विकसित करने की योजना है। इसके अलावा राज्य सरकार ने पिछले एक साल में निजी निवेश के 71,000 करोड़ रुपये के 145 निजी प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इसमें 2 चीनी मिलें, 11 पॉवर प्लांट, 8 फूड प्रॉसेसिंग, 6 तकनीकी संस्थान शामिल हैं। इंटीग्रेटेड हैंडलूम डेवलपमेंट योजना के तहत राज्य के 9 हथकरघा क्लस्टर विक सित करने की परियोजना को मंजूरी दे दी गई है। साथ ही इन औद्योगिक क्षेत्रों में 50 प्रतिशत के अनुदान पर डीजल जेनरेटिंग सेट की स्थापना की योजना बनाई गई है। बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष कैलाश झुनझुनवाला का कहना है कि नया साल राज्य के लिए ढेरों उम्मीदें लेकर आ रहा है। इंटीग्रल रेल कोच फैक्टरी बनने वाली है। इससे सेवा क्षेत्र में संभावनाएं बढ़ेंगी। साथ ही सरकार की फूड पार्क, क्लस्टर डेवलपमेंट की कोशिशें भी कार्यरूप लेना शुरू कर देंगी, जिसका सीधा असर उत्पादन और रोजगार पर पड़ेगा और छोटे-छोटे कारोबार चल पड़ेंगे।बिहार के उद्योग मंत्री दिनेश यादव ने बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहा कि राज्य में छोटे-मझोले कारोबारियों के लिए अपार संभावनाएं हैं। खासकर हमारी कोशिश यह है कि ऐसे कारोबार विकसित किए जाएं, जिसमें यहां का कच्चा माल इस्तेमाल हो सके। सरकार की पिछले तीन साल की कोशिशें इस साल रंग दिखाएंगी और वर्ष 2009 में खाद्य प्रसंस्करण, हथकरघा, बिजली उत्पादन के क्षेत्र में जोरदार प्रगति होगी। राज्य सरकार ने छोटे कारोबारियों को राहत देते हुए रस्सियों और सुतलियों, ऑटो पार्ट्स, ड्राई फ्रूट्स, प्लाईवुड, ब्लैकबोर्ड सहित उनके निर्माण में लगने वाले कच्चे माल पर वैट की दर 12।5 प्रतिशत से घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया है। आने वाले साल में छोटे और मझोले उद्योग के कारोबारी अपने कार्य को विस्तार देने में की दिशा में भी काम करेंगे।

साभार: http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=12248

Friday, January 2, 2009

मिलेगा कर्ज का घी, और सुनहरे मौके भी

सत्येन्द्र प्रताप सिंह


गुजरे साल में पाई-पाई को तरसते रहे छोटे और मझोले उद्योगपतियों की झोली में 2009 काफी माल डाल सकता है, अब चाहे वह कर्ज ही हो।
वह यूं कि एक तरफ तो रिजर्व बैंक ने रोजगार में इस क्षेत्र के महत्व को देखते हुए खजाना खोल दिया है। तो दूसरी तरफ बैंकों ने भी सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों की अहमियत को समझते हुए सस्ता और सुलभ कर्ज मुहैया कराने की ठान ली है।

मिसाल के तौर पर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, जो अब तक अपने कुल कर्ज का 16 प्रतिशत एसएमई को देता है, उसने अब इसे बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने का फैसला किया है। बैंक के महाप्रबंधक एस।एस. घुग्रे ने कहा, 'हमने अपने कुल दिए गए कर्ज 85,506 करोड़ रुपये में से 13,884 करोड़ रुपये एमएसएमई को दिया है, जो कुल कर्ज के 16 प्रतिशत से ज्यादा है।' यही नहीं, नए साल में इनके खुश होने की और भी कई वजहें हैं। वह इसलिए कि यूरोप और अमेरिका में भले ही इनका निर्यात प्रभावित हो रहा हो, लेकिन कैरेबियाई देशों और अन्य विकासशील देशों में संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं। यानी, जरूरत है अब सिर्फ समय की नब्ज समझकर कारोबार करने की।उद्योग से जुड़े लोगों का भी मानना है कि वर्ष 2009 में उद्योग जगत में स्थिरता आएगी और सरकार की सकारात्मक कोशिशें रंग लाएंगी।

इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष और एमआर इंजीनियरिंग वर्क्स, सहारनपुर के प्रमुख प्रवीण सडाना कहते हैं कि 8 दिसंबर को प्रधानमंत्री के साथ हुई बैठक से ढेरों उम्मीदें हैं।सरकार ने 13 में से 10 मांगें मान ली हैं, जिसमें कर्ज की ब्याज दरें कम करना भी शामिल है। कारोबारियों को खुला मौका है कि वे कैरेबियाई देशों में अपने उत्पादों का निर्यात कर सकते हैं।त्रिनिदाद और टोबैगो के राजदूत ने भी कहा कि हमारी खुली अर्थव्यवस्था है और देश पर मंदी का कोई प्रभाव नहीं है, कारोबारियों को खुला मौका है कि वे न केवल हमारे देश में अपने उत्पादों की आपूर्ति, विनिर्माण कर सकते हैं, बल्कि वहां आधार बनाकर अन्य देशों को भी उत्पादों की आपूर्ति कर सकते हैं। दिल्ली के प्रमुख ऑटो पाट्र्स उत्पादक और वेलकम ऑटोमोबाइल के प्रमुख नरेंद्र मदान ने कहा, 'ऑटो सेक्टर में पूरे साल मंदी का दौर रहा। उम्मीद है कि अब बड़े उत्पादकों का भी स्टॉक खत्म होने को है और इस साल उनकी तरफ से मांग बढ़ेगी।'सडाना बताते हैं कि जिला स्तर पर बैंकों का रवैया छोटे उद्योगपतियों के प्रति बहुत ही निराशाजनक होता है, जिसके चलते हमने प्रधानमंत्री से मांग की है कि जिला स्तर पर बैंकों द्वारा रिजर्व बैंक के निर्देशों के मुताबिक कर्ज दिए जाने की जांच की जाए। इस पर प्रधानमंत्री ने समिति गठित करने की घोषणा की है।

साभार: http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=12220

Thursday, July 3, 2008

महंगाई की मार, किराये में बढ़ोतरी : बिखर रहे सपने


सत्येन्द्र प्रताप सिंह


अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आज 142 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई हैं। बढ़ती कीमतों की मार उड्डयन क्षेत्र पर पड़ रही हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस उद्योग की रीढ़ टूट रही है।

भारतीय कंपनियां तो बेहाल हैं ही, एयर फ्रांस, कैथे पैसिफिक , सिंगापुर एयरलाइंस, क्वांटाज, एमिरेट्स और यहां तक कि ब्रिटिश एयरवेज भी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच रही हैं। ऐसे में सस्ती उड़ानें ख्वाब बनती जा रही हैं।

हवाई ईंधन का प्रभाव

अगर भारत की बात करें तो पिछले छह महीने में हवाई ईंधन (एटीएफ) की कीमतें दोगुनी हो गई हैं। साथ ही भारत में विभिन्न करों के चलते अन्य देशों की तुलना में एटीएफ की कीमतें 60 प्रतिशत ज्यादा हैं। उदाहरण के लिए अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में एटीएफ 100 रुपये है तो घरेलू सेवा प्रदाताओं को इसके 165 रुपये और भारत में ईंधन लेने वाले अंतरराष्ट्रीय सेवा प्रदाताओं को 135 रुपये देने पड़ते हैं। भारतीय विमानन उद्योग में एटीएफ की कुल खपत 20 लाख किलोलीटर है। भारत में अप्रैल तक एक टिकट पर ईंधन सरचार्ज 1650 रुपये था, जो अब 2250 रुपये से 2950 रुपये हो गया है।

घरेलू सेवा प्रदाताओं का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय दरों पर ही घरेलू बाजार में एटीएफ मिलने लगे तो इससे उन्हें सालाना 5000 से 5500 करोड़ रुपये का फायदा होगा, जो चालू वित्त वर्ष में हुए 8,000-10000 रुपये के कुल घाटे का करीब आधा है। हालत यह है कि सभी विमानन कंपनियां घाटे में चली गई हैं। जेट एयरवेज को 2007-08 की चौथी तिमाही में 221 करोड़ रुपये का घाटा हुआ, जबकि पिछले साल इसी तिमाही में कं पनी को 88 करोड़ का फायदा हुआ था।

स्पाइस जेट को 2008 में समाप्त वित्त वर्ष में 133.5 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। कंपनी का प्रतिदिन का घाटा 50 से 75 लाख रुपये हो गया है। कंपनी के परिचालन खर्च में 87 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। स्पाइस जेट के कुल खर्च में एटीएफ का योगदान 45 प्रतिशत है।

कंपनियों के बचाव के तरीके

स्पाइस जेट ने जयपुर की उड़ानें रद्द कर दी हैं और अपनी उड़ानों की संख्या 117 से घटाकर 97 कर दी हैं। इसी तरह से किंगफिशर एयरलाइंस ने 17 और डेक्कन एयरलाइंस ने 20 उड़ानें खत्म की हैं। एयर इंडिया ने मुंबई-चेन्नई-मुंबई मार्ग पर उड़ानें कम की हैं और वह अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में भी कटौती की योजना बना रही है।

गो एयर के प्रबंध निदेशक जो वाडिया ने कहा है कि हम कंपनी का आकार घटा रहे हैं। उड़ानों की संख्या में कटौती की गई है, कुछ मार्गों पर परिचालन बंद कर दिया गया है। इसके साथ ही जेट एयरवेज, किंगफिशर एयरलाइंस और एयर इंडिया ने ट्रैवल एजेंटों को दिए जाने वाले कमीशन में 5 प्रतिशत की कमी करने की घोषणा की है।

मार गई महंगाई

ऐसा नहीं है कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ही विमानन कंपनियों को मार रही है। बढ़ती महंगाई के चलते हवाई यात्रा करने वाले लोगों की संख्या में भी कमी आई है। एयरपोर्ट अथारिटी आफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक गोवा, पटना, तिरुवनंतपुरम, श्रीनगर- यहां तक कि जम्मू, उदयपुर और जोधपुर जैसे पर्यटन स्थलों पर जाने वाले यात्रियों की संख्या में कमी आई है। पिछले 4 साल से हवाई यात्रा करने वालों की संख्या में 30-40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही थी, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो यह बढ़ोतरी एक अंक तक सिमट गई है।

बेंगलुरु और हैदराबाद में ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बने और 35 नान मेट्रो शहरों में एयरपोर्ट के विस्तार और नवीकरण की योजना बन रही थी, अब वह भी धराशायी होती नजर आ रही है। कंपनियों ने विस्तार योजनाएं रोक दी हैं। महंगाई इस कदर बढ़ी है कि दाल-चावल का जुगाड़ करने में ही आम लोगों के पसीने छूट रहे हैं। बढ़ता किराया हवाई उड़ान का आनंद लेने का सपना सजोने वालों को हकीकत से दूर ले जा रहा है। बिजनेस क्लास में यात्रा करने वाले इकनॉमी क्लास में यात्रा करने लगे हैं। गालिब के शब्दों में कहें तो-
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन,
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।

courtsy: bshindi.com

Thursday, June 19, 2008

झमाझम मानसूनी बारिश से ही खिलते हैं किसानों के मुरझाए चेहरे



सत्येन्द्र प्रताप सिंह / June 18, 2008
झांसी के एक गांव में रहने वाले मेहरबान सिंह की खुशी का ठिकाना नहीं है। उन्हें उम्मीद जागी है कि एक बार फिर फसल लहलहाएगी।
बुंदेलखंड इलाके में 5 साल बाद पिछले सोमवार को पूरे दिन झमाझम बारिश हुई। उन्हें उम्मीद है कि बारिश का सिलसिला कुछ दिन तक जारी रहेगा, और पटरी से उतर चुकी बुंदेलखंड की खेती उन्हें खुशहाल कर देगी।यह खुशी केवल एक आदमी की नहीं है। जब भी पानी नहीं बरसता, न केवल विभिन्न इलाकों में बल्कि वहां रहने वाले किसानों की जिंदगी में सूखा पड़ जाता है।
दुनिया में मानसून के अलावा कोई ऐसी जलवायु नहीं है, जिससे हर साल बहुतायत में लोग प्रभावित होते हैं। भारत उन 20 एशियाई देशों में से एक है, जहां कृषि और उस पर आधारित अर्थव्यवस्था मानसून पर निर्भर है। इसके अलावा चीन, जापान, इंडोनेशिया, उत्तरी और दक्षिणी कोरिया तथा भारत के पड़ोसी देश आते हैं। बहरहाल जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों ने तो औद्योगिक विकास कर लिया है, लेकिन बाकी देशों की अब भी मानसून पर निर्भरता बनी हुई है। इन देशों में धान का उत्पादन मानसून पर ही निर्भर करता है। हालत यह है कि धान का उत्पादन भिन्न-भिन्न इलाकों में होता है, इसलिए इसका क्षेत्रवार निर्धारण करना भी कठिन है कि किन इलाकों में कितने पानी की जरूरत होती है। भारत ने
स्वतंत्रता के बाद से ही मानसून पर निर्भरता कम करने के लिए कोशिशें शुरू कीं। इसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी लिया, जिससे कम समय और लंबे समय के लिए मानसून की भविष्यवाणी की जा सके। लेकिन आज भी यह नहीं कहा जाता है कि मानसून पर निर्भरता कम हुई है। भारत में मानसून का सीधा असर कृषि पर तो पड़ता ही है, सकल घरेलू उत्पाद पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का हिस्सा करीब 20 प्रतिशत है, जो उद्योगों को कच्चा माल भी उपलब्ध कराता है। देश की 60 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, जो उद्योगों के उत्पादों के लिए बहुत बड़ा उपभोक्ता है। इस तरह से विनिर्मित वस्तुओं का बाजार भी ग्रामीण बाजार से जुड़ा हुआ है। अगर खेती की हालत अच्छी नहीं रहती है, तो स्वाभाविक है कि ग्रामीण इलाकों में मांग कम हो जाती है और परोक्ष रूप से इसका प्रभाव उद्योगों पर पड़ता है।
किसानों ने इस समय देश भर में विकसित हो रहे विशेष आर्थिक क्षेत्रों का जोरदार विरोध करना शुरू कर दिया है। महज चार दिन पहले गोवा में रिलायंस के प्रस्तावित सेज के विरोध में किसानों ने गोवा-मुंबई हाईवे जाम कर दिया। किसानों का कहना है कि सरकार उनकी बात नहीं सुनती। सिंचित क्षेत्र में सेज बनाया जा रहा है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। किसानों का आरोप है कि उन्हें केवल राजनेताओं से आश्वासन मिलता है, जबकि अंतिम रूप से सरकार उद्योगपतियों की ही बात सुनती है। ऐसा ही कुछ पश्चिम बंगाल के सिंगूर इलाके में हुआ। देश में अभी भी सिंचित कृषि भूमि एक तिहाई ही है। ऐसे में सिंचित भूमि पर सेज का विकास कहां से जायज है?11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-11) के लिए कृषि प्रसार पर बने कार्य समूह का मानना है कि 60 प्रतिशत किसान कृषि के लिए विकसित नई तकनीकों से वाकिफ नहीं हैं। समिति का कहना है कि कृषि के विस्तार के लिए सूचना का प्रसार किसानों तक करना बेहद जरूरी है। उसका कहना है कि कृषि उत्पाद को 2010 तक 247.8 टन और 2020 तक 296.6 टन तक बढ़ाए जाने की जरूरत है जो 2004-05 के आंकड़ों के मुताबिक 206.39 टन है। साथ ही यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर 10 प्रतिशत बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि कृषि क्षेत्र की विकास दर वर्तमान के 1.7 प्रतिशत की तुलना में बढ़ाकर 4.1 प्रतिशत करनी होगी।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पंजाब सिंह की अध्यक्षता में बनी योजना आयोग की समिति की 8 जून 2006 की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह असंभव सा लगता है, लेकिन सही है कि दुर्भाग्य से देश में कोई नेशनल एग्रीकल्चल एक्स्टेंशन सिस्टम नहीं बना। रिपोर्ट में इस बात की सिफारिश की गई है कि देश में दूसरे देशों की कृषि योजनाओं की नकल के बजाय अपनी जरूरतों के मुताबिक योजना बनाए जाने की जरूरत है, जिससे क्षेत्रवार कृषि के विकास और उनकी जरूरतों को पूरा किया जा सके। रिपोर्ट में इस तरफ भी ध्यान दिलाया गया है कि जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, उसी के मुताबिक अनाज की जरूरतें भी बढ़ेंगी। घरेलू मांगों को पूरा करने के लिए 1949-50 से 1089-90 के बीच रहे अनाजों के उत्पाद की वृध्दि दर को बढाकर 3.5 से 4 प्रतिशत करना होगा।
बहरहाल जमीनी हकीकत यह है कि किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। एक गैर सरकारी संगठन विदर्भ जन आंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी ने कहा कि पिछले एक हफ्ते में कर्ज से दबे विदर्भ के छह किसानों ने आत्महत्या कर ली। कृषि के विकास और मानसून पर निर्भरता कम होने के दावों के बीच किसानों पर मानसून की हल्की सी मार भी उन्हें कर्ज के जाल में फंसा देती है। प्रकृति के सामने सभी शोध और आंकड़े कागजी ही साबित होते हैं। किसी शायर ने सच ही कहा है और यह भारत के किसानों पर सटीक बैठता है:
हस्ती अपनी हबाब (बुलबुला) की-सी है,
ये नुमाइश सराब (रेगिस्तान) की- सी है।

courtsy: bshindi.com

Thursday, June 12, 2008

आखिर पेट्रोलियम पदार्थो की बढ़ी कीमतों पर हंगामा है क्यों बरपा




सत्येन्द्र प्रताप सिंह
तेल की ऊंची कीमतों की उपभोक्ता पर दोहरी मार पड़ती है। इनका अन्य जिंसों की कीमतों पर भी असर पड़ता है। हाल ही में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ने से राजनीतिक दलों में हलचल मच गई।
मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ही नहीं बल्कि कांग्रेस के सहयोगी दल भी इन कीमतों को बढ़ाए जाने से काफी खफा हैं। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ने से जिंसों के दाम बढ़ने तय हैं। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों का राजनीतिक अर्थशास्त्र पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। महंगाई का असर हाल के कर्नाटक चुनावों पर भी पड़ा और दक्षिण भारत में पहली बार अपने दम पर कमल खिल गया। केंद्र सरकार को आगामी लोकसभा और विधान सभा चुनावों की चिंता सता रही है, वहीं विपक्ष इस मसले पर कोई भी मौका गंवाना नहीं चाहता है।

रुला चुकी है महंगाई
अगर हम इतिहास में जाएं तो स्वतंत्रता के बाद से ही इसका साफ प्रभाव नजर आने लगा था। हार्वर्ड और मैरीलैंड विश्वविद्यालय के विद्वानों द्वारा हाल में किए गए एक शोध के मुताबिक भारत में सर्वाधिक महंगाई दर 1943 में रही, जो 53।8 प्रतिशत थी। ध्यान रहे कि अंग्रेजों के शासनकाल में उस साल बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा था। 10 जनवरी 1942 से थोक मूल्य सूचकांक के आंकड़े दिए जा रहे हैं। उन दिनों 23 जिंसों को इसमें शामिल किया गया था और इनके दामों का केवल एक नमूना लिया जाता था। वर्तमान में सूचकांक में जिंसों की संख्या बढ़कर 435 हो गई है और दामों के 1918 नमूने लिए जाते हैं जो विभिन्न जगहों से आते हैं। वैसे अगर देखें तो कीमतों में वृध्दि स्वाभाविक नजर आती है और इसका राजनीति, राजनीतिक दलों या प्रधानमंत्री से कोई लेना देना नहीं होता है। भारत के स्वतंत्र होने के बाद से हर दस या पांच साल बाद कीमतों में जोरदार उछाल आता है। उस समय चाहे कांग्रेस सत्ता में रहे, भाजपा रही हो या कम समय के लिए कोई भी सरकार रही हो, इस पर किसी का नियंत्रण नहीं होता। 1956-57 जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में महंगाई दर 13.6 प्रतिशत रही। लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में 1964-65 में यह 11.5 प्रतिशत थी। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 1974-75 में यह दर सबसे ऊपर 24.9 प्रतिशत पर पहुंच गई। जनता पार्टी सत्ता में आई तो महंगाई ने चौधरी चरण सिंह को भी त्रस्त किया और यह 17.3 प्रतिशत रही। चंद्रशेखर का कार्यकाल तो बहुत कम, महज 7 माह रहा, लेकिन महंगाई दर 10.2 प्रतिशत बनी रही। नरसिंह राव के कार्यकाल 1991-96 के बीच महंगाई दल 8.0 से 13.8 प्रतिशत के बीच बनी रही।

बड़ा चुनावी मुद्दा
भाजपा ने इस समय बढ़ती महंगाई को लेकर मुहिम छेड़ दी है। पेट्रोल की कीमतें बढ़ने के बाद वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार की मौत का फरमान है। यह कदम केंद्र में अवसरवादी गठबंधन और संप्रग सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन का नतीजा है। याद रहे कि यह वही भाजपा है जिसके शासनकाल में महंगाई दर 7.2 प्रतिशत थी और इसका इस कदर राजनीतिकरण हुआ कि केवल प्याज की कीमतों ने दिल्ली में भाजपा को खून के आंसू रुला दिया था। इस बार कांग्रेस की बारी है।

विभिन्न क्षेत्रों पर असर
पेट्रोलिम पदार्थों की कीमतों के बढ़ने पर आम उपभोग की वस्तुओं और खाद्य पदार्थों पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ेगा। ट्रकों के मालभाड़े में बढ़ोतरी से आवक पर असर होगा। इसके साथ ही मंदी की मार झेल रहे आटोमोबाइल सेक्टर पर भी इसका असर नजर आने लगा है। हालांकि चार पहिया वाहनों की बिक्री पिछले माह की तुलना में घटी है। इसके साथ साथ कंपनियों को चार पहिया वाहनों की कीमतों को घटाने पर भी मजबूर होना पड़ा है। किसानों पर इसकी जोरदार मार पड़ेगी। देश के ज्यादातर हिस्सों में किसान फसलों की सिंचाई के लिए डीजल का इस्तेमाल करते हैं। इससे उनकी खेती का खर्च बढ़ जाएगा। साथ ही मंडियों के निकट के किसानों को भी तैयार फसलों को मंडियों में पहुंचाने के लिए अधिक खर्च वहन करना पड़ेगा। अधिक पैदावार की हालत में भी वे कच्चे माल के खराब होने के डर से औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर होंगे।

प्रधानमंत्री की सफाई
ऐसा पहली बार हुआ है कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए प्रधानमंत्री को सफाई देनी पड़ी। चार जून को प्रधानमंत्री टेलीविजन स्क्रीन पर नजर आए और उन्होंने अपनी मजबूरियां गिनाईं। उन्होंने स्वीकार किया कि सरकार द्वारा डीजल, पेट्रोल और एलपीजी के दाम बढ़ाना अलोकप्रिय कदम है, लेकिन ईंधन की निर्बाध आपूर्ति के लिए यह जरूरी था। साथ ही अमेरिका के साथ परमाणु करार का विरोध कर रहे लोगों पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ परमाणु करार अटका हुआ है। ऐसे में परमाणु ऊर्जा का विकल्प अपनाने के लिए उन्होंने समर्थन मांगा। इसके दूसरे दिन ही प्रधानमंत्री ने विदेशी दौरों और सरकारी खर्चों में कटौती करने के लिए विभागों को पत्र लिखा।

विरोध का दौर
भाजपा ने पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी को संप्रग सरकार का आर्थिक आतंकवाद क हा है। साथ ही इसके खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन भी किया गया। कांग्रेस के सहयोगी वाम शासित प्रदेशों पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में मूल्य वृध्दि के खिलाफ प्रदर्शन हुए। हर जगह विरोध का मोर्चा बड़े कम्युनिस्ट नेताओं ने संभाल रखा था। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने केंद्र सरकार से समर्थन वापसी की चेतावनी तक दे डाली।महंगाई उफान पर है। 24 मई को समाप्त सप्ताह में अनाज, कागजों और खाद्य तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई दर पिछले साढ़े तीन साल के उच्चतम स्तर 8.24 प्रतिशत पर पहुंच गई है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि यह अभी 9 प्रतिशत के आंकड़े को पार करेगी।

भले ही महंगाई हर सरकार के कार्यकाल में बढ़ती है, राजनीति का तकाजा है कि सत्तापक्ष बढ़ोतरी के कारणों को गिनाता है और विपक्ष उसका राजनीतिक फायदा उठाने को सोचता है। इसके बीच में खड़ी रहती है मूकदर्शक जनता। किसी शायर ने ठीक ही कहा है:

फुगां कि मुझ गरीब को, ये हुक्म है हयात का। समझ हर एक राज को, मगर फरेब खाए जा।

साभारः बिजनेस स्टैंडर्ड

Thursday, May 1, 2008

प्रमुख जिंसों के आधार पर बनता है थोक मूल्य सूचकांक




सत्येन्द्र प्रताप सिंह और कुमार नरोत्तम


थोक मूल्य सूचकांक सरकार की नीतियों को प्रभावित करता है। पिछले कुछ महीनों से यह सूचकांक बता रहा था कि महंगाई दर बढ़ रही है।
सरकार पर दबाव बढ़ा, आयात और निर्यात नीतियां बदलीं। इसके साथ ही रिजर्व बैंक ने भी कड़े कदम उठाए। कैश रिजर्व रेश्यो बढ़ा दिया गया। यानी कि आपसे अब बैंक अधिक ब्याज लेंगे। बाजार में धन का प्रवाह कम होगा, लोगों की खरीद शक्ति कम होगी और परोक्ष रूप से महंगाई पर लगाम लगेगी।
इस समय प्रोफेसर एसआर हाशिम की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया थोक मूल्य सूचकांक लागू है, जिसका आधार वर्ष 1993-94 है। इस सूचकांक में कुल 435 वस्तुएं शामिल किए गए हैं, जिनके लिए कीमतों के नमूने देश के 1918 स्थानों से लिए जाते हैं।



उत्पादक मूल्य
उत्पादक मूल्य के तहत सभी प्रकार के करों और आवागमन के शुल्कों को शामिल किया जाता है। उत्पादक मूल्य के अंतर्गत उस राशि को शामिल किया जाता है जो किसी सामान या सेवा की किसी एक इकाई के लिए क्रेता, उत्पादक को भुगतान करता है।
इसमें विक्रेता के द्वारा भुगतान की जाने वाली वैट और अन्य करों को हटा दिया जाता है। इसमें उत्पादकों के द्वारा दी जाने वाली कोई भी आवागमन शुल्क को भी घटा दिया जाता है। हालांकि उत्पादक मूल्य के तहत खुदरा या थोक मूल्य को शामिल किया जाता है।



आधार वर्ष का विकल्प
आधार वर्ष के चयन का जाना माना तीन तरीका उपलब्ध है। पहला, एक सामान्य वर्ष यानी वह वर्ष जिसमें उत्पादन के स्तरों पर व्यापार और मूल्यों के संदर्भ में किसी तरह की कोई अनियमितता नही हुई हो। दूसरा, वह वर्ष जिसमें उत्पादन, मूल्य और अन्य गतिविधियों से जरूरी आंकड़े उपलब्ध हों।
तीसरा, राष्ट्रीय और राज्य स्तरों पर आंकड़े एकत्र करने का कोई ताजातरीन वर्ष। राष्ट्रीय सांख्यिकीय आयोग ने इस बात की अनुशंसा की है कि इस आधार वर्ष की समीझा पांच वर्ष में एक बार होनी चाहिए, दस वर्ष की अवधि के बाद इस समीझा का कोई महत्व नही है।



सामग्रियों, किस्मों, ग्रेड्स तथा बाजार का चयन
किसी आधार वर्ष के अंतर्गत ऐसी हर सामग्री जिसका लेनदेन काफी महत्वपूर्ण है, को इस सूचकांक की श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए। इस संबंध में एक बात महत्वपूर्ण है कि ये सामग्रियां अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित कर रही हो। मुक्त अर्थव्यवस्था में किसी किस्म या सामग्री की महत्ता इस बात को लेकर है कि कथित आधार वर्ष में उसका व्यापार मूल्य कितना अधिक रहा।
थोक स्तरों पर सामानों और सेवाओं का लेनदेन भी शामिल किया जाता है। थोक मूल्य सूचकांक के अंतर्गत मुख्यत: सामानों को ही शामिल किया जाता है और इसमें सेवाओं को उतनी महत्ता के साथ शामिल नही किया जाता है। अगर व्यापार कीमत के आंकड़े के लिए कोई एक स्रोत उपलब्ध नही हो तो इसमें शामिल किए गए कृषि और गैर-कृषि जिंसों की चयन प्रक्रिया में भिन्नता आ जाती है।



कृषि जिंसों का चयन
वैसे कृषि जिंसों के चयन के अंतर्गत नए प्रकार की सामग्रियों की संभावना बहुत कम दीखती है लेकिन फिर भी इस श्रेणी में अगर कोई सामग्री थोक मूल्य बाजार में तेजी से उभर कर सामने आती है तो इसे शामिल किया जा सकता है। अगर किसी सामग्री के महत्व में गिरावट आती है तो इसे अगली समीक्षा के अंतर्गत शामिल नही किया जा सकता है। वैसे इस श्रेणी में किसी सामग्री के शामिल या नही शामिल किए जाने का मुद्दा विभिन्न विभागों की स्वीकृति पर निर्भर करता है।
वर्तमान की थोक मूल्य सूचकांक श्रेणी की बात करें तो उनमें सामग्रियों की विशिष्टता और बाजार का निर्धारण राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड, मसाला बोर्ड, चाय बोर्ड, कॉफी बोर्ड, रबर बोर्ड , सिल्क बोर्ड, तंबाकू निदेशालय, भारतीय सूती निगम आदि करता है।



खदान सामग्री
किसी भी खदान सामग्री को शामिल किया जाए या नही इस संबंध में भारतीय खदान ब्यूरो के सुझावों को महत्व दिया जाता है। कोयला, कोक और आग्नेय चट्टानों की विशिष्टता के लिए कोयला विभाग से संपर्क स्थापित किया जाता है। इसी तरह अगर पेट्रोलियम और बिजली की सामग्री का चयन करना हो तो इसके लिए क्रमश: पेट्रोलियम और केंद्रीय बिजली प्राधिकरण से सुझाव लिए जाते हैं।



निर्मित उत्पाद
निर्मित उत्पादों के तहत सामग्रियों का चयन अन्य चयन की अपेक्षा सबसे ज्यादा मुश्किल भरा होता है। इस चयन प्रक्रिया में समय भी काफी लगता है। इसे हम अलग अलग श्रेणी में बांटकर समझ सकते हैं-



(क) संगठित निर्मित उत्पाद
फैक्ट्री समेत उद्योग जगत के वार्षिक सर्वे से उत्पादों के मूल्य के जो आंकड़े मिलते हैं उसी के आधार पर निर्मित उत्पादों के सूचकांक बनाए जाते हैं। इसके अंतर्गत सामग्रियों के चयन का एक मानक यह है कि निर्धारित आधार वर्ष में उस सामग्री की कट ऑफ कीमत क्या रही।
इस श्रेणी में सबसे ज्यादा मुश्किल टेक्सटाइल सामग्री को शामिल करते वक्त होती है। वैसे टेक्सटाइल सामग्री का चयन टेक्सटाइल आयुक्त के सुझाव पर निर्भर करता है। इस श्रेणी में कभी कभी ऐसे भी सामानों को शामिल नही किया जाता है जिसने कट ऑफ मूल्य की सीमा पार कर ली है।



(ख) असंगठित निर्मित उत्पाद
इस श्रेणी में हैंडलूम, रेशम उत्पाद, नारियल की जटाएं, खादी और ग्रामीण उद्योगों के उत्पाद शामिल किए जाते हैं। आधुनिक श्रेणी में छोटे उद्योगों के उत्पाद सहित पावर लूम को भी इसमें शामिल किया जाता है।


साभारः बिजनेस स्टैंडर्ड-हिंदी

Thursday, April 24, 2008

किस करवट बैठेगी महंगाई, देखता है मूल्य सूचकांक

सत्येन्द्र प्रताप सिंह और कुमार नरोत्तम


मूल्य सूचकांक वस्तुओं और सेवाओं की एक नियत श्रेणी और किसी खास समयांतराल में औसत मूल्य गतिशीलता का मापक या संकेतक होता है।
इस खास श्रेणी में आनेवाली उपभोक्ता, थोक या उत्पादक मूल्य आदि में हो रहे परिवर्तन के आधार पर इनके मूल्य सूचकांक का निर्धारण किया जाता है। मूल्य सूचकांक में आर्थिक, क्षेत्रीय या क्षेत्र विशिष्ट गतिविधियों के कारण परिवर्तन होता है।
आज भारत में उपभोक्ता और थोक स्तरों पर मूल्यों की गतिशीलता मापने के लिए अलग-अलग सूचकांक है। राष्ट्रीय स्तर पर मूल्य सूचकांकों की मुख्यत: चार श्रेणियां मौजूद है। ये हैं- औद्योगिक कर्मियों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई-आईडब्ल्यू), कृषि या ग्रामीण मजदूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई-एएल या आरएल), शहरी अकुशल कर्मियों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई- यूएनएमई)। ये सारे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक हैं।
इसके अतिरिक्त जो चौथा मुख्य मूल्य सूचकांक है, वह है- थोक मूल्य सूचकांक।मूल्य सूचकांक द्वारा मुद्रास्फीति या महंगाई दर के आकलन का सीधा असर सरकार की नीतियों पर पड़ता है। उदाहरण के लिए अगर महंगाई दर बढ़ती है तो सरकार नियंत्रित जिंसों को- जैसे गेहूं, चावल आदि बाजार में उतार देती है, जिससे मांग और आपूर्ति संतुलित हो सके।
इसके अलावा भारतीय रिजर्व बैंक महंगाई बढ़ने पर ब्याज दरें बढ़ाता है, नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में बढ़ोतरी करता है, जिससे बाजार में धन के प्रवाह को कम किया जा सके। कुल मिलाकर परिस्थितियों के मुताबिक मांग और आपूर्ति के संतुलन को बरकरार रखने के लिए कदम उठाए जाते हैं।
थोक मूल्य सूचकांक
थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) संख्या अर्थव्यवस्था में थोक मूल्यों की गतिविधियों का मापक है। कुछ ऐसे भी राज्य हैं जिनके उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) और थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) अलग-अलग होते हैं।
राज्यों के द्वारा जब थोक मूल्य सूचकांक का निर्धारण किया जाता है तो उसमें राज्य स्तर पर हो रहे लेनदेन को शामिल किया जाता है। वर्तमान में जो डब्ल्यूपीआई हैं, वे हैं-असम (आधार वर्ष 1993-94), बिहार (1991-92), हरियाणा (1980-81), कर्नाटक (1981-82), पंजाब (1979-82), उत्तरप्रदेश (1970-71) और पश्चिम बंगाल (1980-81)।
इसमें ज्यादातर राज्यों के सूचकांकों में कृषि जिंस लेनदेन और हस्तांतरण को ही शामिल किया जाता है, जिनका कारोबार स्थानीय स्तर पर होता है।
थोक मूल्य सूचकांक की गणना का परिचय
एक बार अगर थोक मूल्य की संकल्पना को परिभाषित कर दिया जाए और आधार वर्ष का निर्धारण हो जाए तो उसके बाद सामग्रियों का निर्धारण, सामग्रियों के भार का आवंटन, श्रेणी या उप-श्रेणी स्तर आदि के जरिए इसे पूरा किया जाता है। इसके साथ ही आधार मूल्य एकत्र करना, वर्तमान मूल्य, सामग्री की विशिष्टता का निर्धारण, मूल्य आंकडा स्रोत और आंकडा संग्रह की प्रक्रिया का निष्पादन किया जाता है। इन चरणों के बारे में हम निम्नलिखित तरीके से विस्तार से चर्चा करेंगे-
थोक मूल्य सूचकांक की संकल्पना
थोक मूल्य सूचकांक को हर विभाग अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल करता है। कृषि और गैर-कृषि जिंस कारोबार के लिए कोई एक तरह की परिभाषा नही है और इसलिए जमे हुए बाजार से भी हम इसके आंकड़े लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो सकते हैं।
कृषि जिंस
व्यावहारिक तौर पर देखें तो मुख्य तौर पर तीन तरह के थोक बाजार होते हैं- प्राथमिक, द्वितीयक और कृ षि क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाले टर्मिनल। इन सारे थोक बाजारों में मूल्य की गतिशीलता और मूल्य के स्तरों में परिवर्तनीयता होती है। टर्मिनल बाजार में मूल्य की गतिशीलता से ही खुदरा दामों का निर्धारण किया जाता है। इन सारे विकल्पों में कृषि जिंसों के थोक लेनदेन के आधार पर ही थोक मूल्य का निर्धारण किया जाता है लेकिन प्राथमिक बाजार को आधार बनाया जाता है।
कृषि मंत्रालय थोक मूल्य को इस तरह परिभाषित करता है- थोक मूल्य वह दर है जिसमें खरीदारी के लेनदेन, जिसका इस्तेमाल आगे की खरीद के लिए किया जाता है, प्रभावित हो । बहुत सारी थोक मूल्य सूचकांक संग्रह करने वाली एजेंसियां कृषि मंत्रालय की इस परिभाषा को आधार मानती है।
वैसे आकस्मिक दरों, करों और शुल्कों के संदर्भ में ये मानदंड बदलते रहते हैं। आंध्रप्रदेश में भारीय शुल्क, बैग की कीमत और बिक्री कर के आधार पर आकस्मिक शुल्क तय किए जाते हैं। गुजरात में थोक मूल्य के अंतर्गत ही पैकिंग शुल्क और करों को शामिल कर लिया जाता है। पंजाब और तमिलनाडु में आकस्मिक लागतों को थोक मूल्य सूचकांक के तौर पर शामिल किया जाता है। हरियाणा में कृषि जिंस कारोबार के अंतर्गत आढ़त, भार और लॉरी चार्ज आदि को सम्मिलित किया जाता है।
गैर-कृषि जिंस
गैर-कृषि जिंस के तहत निर्माण वस्तुएं आती हैं लेकिन इसके साथ एक दिक्कत यह है कि गैर-कृषि जिंस का कोई स्थापित स्रोत बाजार में उपलब्ध नही होता है। ऐसा भी देखा जाता है कि कभी-कभी थोक विक्रेता को इन गैर कृ षि जिंसों के बीच मार्जिन के लिए काफी अरसे तक इंतजार करना पड़ता है।

साभारः बिज़नेस स्टैंडर्ड