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Thursday, October 1, 2009

जब कोई सोच और तैयारी ही नहीं तो भारत कैसे रखे दुनिया के सामने अपनी बात

ए. के. भट्टाचार्य

वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव स्तर का एक ही अधिकारी वहां मौजूद था, जो इनपुट व
सुझाव देने के लिए एक कमरे से दूसरे कमरे का चक्कर लगा रहा था। पिट्सबर्ग
कॉन्फ्रेंस सेंटर में तब एक साथ कई बैठकें हो रही थी और यह अधिकारी अकेले ही हर जगह
इनपुट व सुझाव मुहैया करा रहा था।


भारत सरकार पिट्सबर्ग सम्मेलन से कई सबक ले सकती है। जी-20 समूह के नेताओं की बैठक पिछले हफ्ते समाप्त हुई और भारत को इस बात का अहसास हो गया कि वैश्विक परिदृश्य में उसे और बडी भूमिका निभानी होगी।
जिस तरह से जी-20 द्वारा नीतिगत प्रारूप तैयार किया जाना है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वैश्विक आर्थिक मुद्दों की बाबत अब जी-20 प्रमुख निकाय बन चुका है। एक और सबक है जिसे भारत ने पिट्सबर्ग बैठक से अवश्य सीखा होगा।
वह यह कि जब वैश्विक संस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की बात आती है तब किस तरह से सूचना के प्रसार की बाबत भारत सरकार के पास लोगों और विचार दोनों की कमी देखी गई। लोगों की कमी तब और स्पष्ट हो गई जब जी-20 में पहुंचे चीनी प्रतिनिधिमंडल या फिर दक्षिण कोरिया के प्रतिनिधिमंडल से इसकी तुलना की गई।
वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव स्तर का एक ही अधिकारी वहां मौजूद था, जो इनपुट व सुझाव देने के लिए एक कमरे से दूसरे कमरे का चक्कर लगा रहा था। पिट्सबर्ग कॉन्फ्रेंस सेंटर में तब एक साथ कई बैठकें हो रही थी और यह अधिकारी अकेले ही हर जगह इनपुट व सुझाव मुहैया करा रहा था। इसकी तुलना हम चीनियों से करते हैं कि उन्होंने क्या किया।
उन्होंने कई वरिष्ठ अधिकारियों को अलग-अलग बैठक का कार्यभार सौंपा था। एक ने जी-20 की बैठक के साथ-साथ सदस्य देशों की सरकारों के विशेष दूतों के साथ बैठक की जबकि दूसरे को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) व विश्व बैंक के साथ बैठक की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। ये दोनों संगठन भी पिट्सबर्ग में उस समय शुरुआती बैठक आयोजित किए हुए थे।
चीन ने स्पष्ट तौर पर अहसास कर लिया था कि वैश्विक बैठक में संपर्क के दौरान वे निश्चित रूप से अधिकारियों की मजबूत टीम को काम पर लगाएंगे। ऐसे में उन्होंने विशेषज्ञ अधिकारियों की टीम तैयार की और उन्हें अलग-अलग जिम्मेदारी सौंपी गई, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि चीनी राजनेताओं को जी-20 फोरम में पर्याप्त इनपुट मिल जाए।
भारत में वित्त मंत्रालय की इंटरनैशनल कोऑपरेटिव डिवीजन मुख्य रूप से विश्व बैंक व आईएमएफ की गतिविधियों में शामिल रही थी। विश्व बैंक व आईएमएफ के साथ काम कर रही वही टीम अब जी-20 के साथ भारत की तरफ से संपर्क अभियान में जुटी रही। साफ तौर पर वित्त मंत्रालय में अलग-अलग टीम बनाए जाने की दरकार है जो विश्व बैंक, आईएमएफ व जी-20 के साथ भारत के संबंधों का नियंत्रण व प्रबंधन कर सके।
वास्तव में, अब वित्त मंत्रालय व विदेश मंत्रालय के बीच विस्तृत स्तर पर सहयोग व समन्वय की दरकार है। 1990 में शुरू हुए आर्थिक सुधार के शुरुआती दिनों में विदेश मंत्रालय का नामकरण आर्थिक मंत्रालय करने का प्रस्ताव था। यह कोशिश वैसे देश में आर्थिक कूटनीति के महत्त्व की बाबत थी जिसका विकास तेजी से हो रहा था और इस तरह से विश्व की अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभा सके।
यह विचार उस समय शायद परिपक्व नहीं था। लेकिन जी-20 का सदस्य होने के नाते अब समय आ गया है कि भारत सरकार या तो वित्त मंत्रालय के इंटरनैशनल कोऑपरेशन डिवीजन का विस्तार करे या विदेश मंत्रालय में मौजूद अधिकारियों का इस्तेमाल करते हुए आर्थिक सहयोग के लिए अलग से डिवीजन बनाए।
विचारों की किल्लत उस समय स्पष्ट हो गई जिस तरह से पिट्सबर्ग में भारत सरकार ने जी-20 के अन्य नेताओं के साथ बातचीत में सूचनाओं का प्रसार किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिट्सबर्ग गए थे और उनके साथ मीडिया प्रतिनिधियों का दल भी गया था। उनके हिसाब से जी-20 के नेताओं के साथ उनकी बैठक सकारात्मक रही।
बैठक की समाप्ति पर प्रधानमंत्री के संवाददाता सम्मेलन के अलावा भारत सरकार ने इस बाबत एक भी संवाददाता सम्मेलन आयोजित नहीं किया कि पिट्सबर्ग में बहस के लिए आए आर्थिक मुद्दों से भारत ने किस तरह अपना रुख स्पष्ट किया।
हां, भारतीय सुरक्षा सलाहकार ने संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया था। दूसरा सम्मेलन
प्रधानमंत्री केविशेष दूत ने जलवायु परिवर्तन पर आयोजित किया था। लेकिन क्या जी-20
सुरक्षा या जलवायु परिवर्तन केसंबंध में था? या फिर यह वैश्विक आर्थिक मुद्दों की
बाबत था? प्रधानमंत्री की टीम में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया,
वित्त सचिव अशोक चावला जैसे लोग थे।

क्या प्रधानमंत्री की टीम ने उनका और पिट्सबर्ग में मौजूद मीडिया प्रतिनिधिमंडल का पूरा इस्तेमाल किया? सच्चाई यह है कि उनमें से कोई भी प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए नहीं आए। सभी महत्त्वपूर्ण सदस्य देशों ने अपने मीडिया प्रतिनिधिमंडल को बताया कि उनके नेताओं ने जी-20 की बहस में किस तरह से महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन भारत की तरफ से लोगों की कमी और विचारों का अभाव नजर आया, जिसे कि प्रसारित किया जा सके।
http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=24738

Sunday, October 12, 2008

गंदी राजनीति के चलते खतरनाक बनता असम

आदिति फडणीस



असम में बोडो और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के बीच संघर्ष में गत सप्ताह दर्जनों लोग मारे गए।

2006 में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले भी असम में इसी तरह की मुठभेड़ हुई थी, लेकिन दो जनजाति समूहों के बीच। कबीलों, जनजातियों, जातीय और धार्मिक समुदायों में बंटा असम, अन्य राज्यों से ज्यादा हिंसा का शिकार होता है।

कहावत है कि आप अपने दोस्तों को चुन सकते हैं, लेकिन अपने संबंधियों को नहीं। असम का कुछ यही हाल है। बांग्लादेश से सटी एक सीमा की वजह से असम और बांग्लादेश के बीच पारिवारिक संबंध है। सीमा पर किसी तरह की रोक-टोक नहीं है।

अत: बोडो जाति के असामाजिक तत्व - जैसे कथित आतंकवादी परेश बरुआ- बांग्लादेश के दामाद की तरह सीमा पार कर आते जाते रहते हैं। बांग्लादेश भी उनको खुशी से दूध पिलाता है- क्या पता कब जरूरत पड़ जाए! 1960 से 1980 के दशक में असम में लगातार कांग्रेस का ही शासन रहा करता था।

राज्य के दिग्गज कांग्रेसी नेता, देवकांत बरुआ खुलेआम कहा करते थे कि जब तक अली (बांग्लादेशी मुसलमान), कुली (चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिक) और बंगाली (पश्चिम बंगाल से आए हुए हिंदू) कांग्रेस के साथ थे, कांग्रेस के हारने का कोई सवाल ही नहीं था। जब इन तीनों समुदायों- अली, कुली और बंगाली- के अनुपात की लगाम कांग्रेस के हाथ से निकल गई तो सामाजिक और आर्थिक विकृतियों का उभरकर आना स्वाभाविक था।

ऐसा कुछ होता चला गया 1980 के दशक से। बाहर से आए लोगों के खिलाफ आवाज उठाई अहोम गण परिषद ने। इसके बाद उत्तर प्रत्युत्तर में हिंसा असम की राजनीति का एक हिस्सा सा बन गई। कभी हिंदू मुस्लिम दंगे होते थे तो कभी बोडो-कुकी झगड़े। बांग्लादेश से भागे हिंदू भी असम आने लगे। असम के हिंदू इन्हें हिकारत की निगाह से देखते थे। तनाव स्वाभाविक था।

1980 और 84 के चुनाव किन परिस्थितियों में हुए, यह सर्वविदित है। भारत सरकार और आल असम स्टूडेंट्स यूनियन व अगप के बीच करार के बाद स्थिति संभल गई। अगप की सरकार भी बनी, लेकिन युवा आदर्शों को सत्ता के लालच ने निगल लिया। सरकार की लूटपाट से तंग आकर असम ने फिर कांग्रेस को चुना।

2001 में तरुण गोगोई मुख्यमंत्री बने और 2006 में कांग्रेस पुन: जीतकर आई। सरकार तो औपचारिक रूप से बन गई लेकिन राजनीतिक चुनौतियां बरकरार रहीं। लेफ्टीनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) एस. के. सिन्हा ने, जो असम के राज्यपाल थे, राज्य सरकार को कई बार चेताया कि यदि बाहरी लोगों को असम में आने से रोका नहीं गया तो असम का जनसांख्यिकीय चरित्र ही बदल जाएगा।

यही बात कही लेफ्टीनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) अजय सिंह ने, जो अब राज्यपाल हैं। तरुण गोगोई और राज्यपाल में तो सार्वजनिक झड़प हो गई। गोगोई ने राज्यपाल के इस कथन का खंडन किया कि रोज 6,000 लोग बांग्लादेश से भारत आते हैं और इन्हें रोकने का राज्य सरकार कोई प्रयास नहीं कर रही है।

2005 में तिनसुकिया जंगलों में फौज आतंकवादियों को ढूंढ रही थी। अचानक राज्य सरकार से आदेश मिला कि खोज को रोक दिया जाए। सेना ने 14 को मार गिराया था। सेनाध्यक्ष पशोपेश में पड़ गए। जब जंगल खाली करने का मौका था तो पीछे हटना क्या बुध्दिमानी थी? लेकिन सरकार अड़ी रही और सेना को ऑपरेशन अधूरा छोड़ना पड़ा। सच तो यह है कि चुनाव सामने था और सरकार नहीं चाहती थी कि किसी भी समुदाय के वोट वह खो दे।

तरुण गोगोई ने अपने कार्यकाल में ऐसा बहुत कुछ किया है, जिससे असम के निवासियों का विश्वास जीता जा सके। पुलिस के इंसपेक्टर जनरल की पदवी को ही रद्द कर दिया गया। जिस तरह मुफ्ती मोहम्मद सईद कश्मीर का चुनाव इस वायदे पर जीत गए कि स्पेशल टास्क फोर्स को वह राज्य से बाहर कर देंगे।

क्या सेना और पुलिस का मनोबल तब तोड़ना चाहिए, जब वे ऑपरेशन में सफलता हासिल कर रहे हों? बहरहाल दंगाइयों को लगा कि जब सैंया भए कोतवाल तब डर काहे का। लेफ्टी. जनरल सिन्हा की चेतावनी अब दिल्ली में सब को याद आ रही है।

राष्ट्रपति के. आर. नारायणन को एक पत्र में जनरल सिन्हा ने लिखा था कि बांग्लादेशी नागरिकों का असम में घर बनाना अब इतना प्रचलित हो गया है कि वह समय दूर नहीं, जब असम के बड़े हिस्सों से मांग होगी कि भारत सरकार को उन जिलों को बांग्लादेश के साथ विलय की अनुमति दे देनी चाहिए ।

भारत सरकार ने आईएमडीटी एक्ट के तहत गैर कानूनी बांग्लादेशी नागरिकों को स्वदेश भेजने के लिए एक तंत्र बनाया था। इसे संप्रग सरकार ने खारिज कर दिया है। असम अब कितने खतरनाक और संवेदनशील कगार पर खड़ा है, यह बहुत कम लोग समझते हैं।

भूटान, बांग्लादेश और बर्मा जैसे तीन देशों से सटी सीमा वाला असम भारत के लिए एक भयंकर जंजाल बन सकता है, यदि यहां की राजनीति पर नजर न रखी गई। जाति और कबीलों की राजनीति वैसे भी बहुत पेचीदा होती है। उसे धर्म का पुट मिल जाए तो पूरे भारत के लिए खतरा हो सकता है। प्रधानमंत्री जिस राज्य से चुने गए हैं, उसमें इस तरह की घटना वाकई शर्मनाक है।
courtesy: www.bshindi.com