Showing posts with label अनसुनी आवाज. Show all posts
Showing posts with label अनसुनी आवाज. Show all posts

Tuesday, May 15, 2012

मायावती और शाहखर्ची


मायावती की शाहखर्ची को लेकर समय-समय पर लोगों को मिर्गी के दौरे पड़ते रहते हैं। खर्च और लोग भी करते हं, लेकिन मामला दलित का हो तो उसे पचा पाना मुश्किल होता है। कॉरपोरेट जगत की एक भव्य पार्टी पर जितना खर्च किया जाता है वह रकम मायावती के घर की साज-सज्जा से संबंधित पूरे बजट के लिए पर्याप्त होगी। कारोबारी जगत को निकट से समझने वाले सोमशेखर सुंदरेशन ने बहुत बेहतरीन ढंग से इस मामले की पड़ताल की है- सत्येन्द्र)
सोमशेखर सुंदरेशन
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती के घर पर हुए खर्च की खबरें पिछले सप्ताह सभी राष्टï्रीय अखबारों के पहले पृष्ठï पर थीं। अचानक देश के मध्य वर्ग की अंतरात्मा जाग उठी और सभी लोग व्याकुल हो उठे, खास तौर पर कॉरपोरेट क्षेत्र के कर्मचारी। वे यह बात नहीं पचा पा रहे थे कि किसी दलित की विलासितापूर्ण जीवनशैली पर सार्वजनिक धन की इस तरह बरबादी की गई।
मायावती की खर्च करने की प्रवृत्ति ने पिछले साल भी जबरदस्त सुर्खियां बटोरी थीं। विकीलिक्स ने एक देशी राजनयिक से बातचीत पर आधारित यह रोचक खबर वेबसाइट पर डाली कि किस तरह केवल मायावती के बेशकीमती जूते लाने के लिए लखनऊ से एक खाली विमान मुंबई के लिए रवाना हुआ था। पूर्व मुख्यमंत्री ने इस रिपोर्ट का खंडन किया था। फिर भी, यदि निरपेक्ष नजरिया रखें और सुनी-सुनाई बातों पर गौर न करें तो मायावती एक विशिष्टï श्रेणी की हस्तियों में शुमार होंगी, न केवल राजनीतिक दुनिया में, बल्कि कॉरपोरेट जगत में भी। जिन लोगों को राज्य का शासन चलाने के लिए चुना जाता है, उन पर ऐसे लोगों की तुलना में ज्यादा ध्यान दिया जाता है जो सूचीबद्घ कंपनियों का प्रशासन संभालने के लिए चयनित होते हैं।
केवल लोक प्रशासन राज्य का मामला नहीं होता, बल्कि शेयर बाजारों में सूचीबद्घ कंपनियों का प्रशासन भी ऐसा ही मसला होता है, जिसमें सार्वजनिक धन लगा होता है। इस तरह कॉरपोरेट प्रशासन भी समान रूप से लोक शासन का हिस्सा हुआ। यदि करदाताओं के खर्चों पर विलासितापूर्ण जीवनशैली उचित नहीं है तो सार्वजनिक शेयरधारकों और जमाकर्ताओं के खर्च पर भी ऐसी जीवनशैली को सही नहीं ठहराया जा सकता। यहां मुद्दा केवल जीवनशैली का नहीं है। बल्कि यह उन लोगों से संबंधित मसला भी है जो शानदार जीवनशैली बनाए रखने के लिए बिलों की रकम बढ़ाते जाते हैं।
इस तरह के विषय पर चर्चा आगे बढ़ाएं तो कॉरपोरेट जगत में भी मायावती जैसे उदाहरण भरे पड़े हैं। कुछ उदाहरण तो ऐसे भी मिल जाएंगे, जिनके मुकाबले मायावती बेहतर नजर आएंगी। आपने सुना होगा कि एक सूचीबद्घ कंपनी के अध्यक्ष ऐसे हैं, जिनके लिए कारखाने के नजदीक उगने वाले एक विशेष फल लाने के वास्ते कॉरपोरेट हवाई जहाज उड़ान भरता है। ऐसी कई कहानियां प्रचलित हैं जो उन कॉरपोरेट जेट विमानों से संबंधित हैं जो स्थानीय बाजारों में उपलब्ध विशेष सूखे फलों के वास्ते दूसरे देशों के लिए उड़ान भरते हैं क्योंकि प्रवर्तक की पत्नी को वह बहुत पसंद है।
आपने ऐसी सूचीबद्घ कंपनियों के बारे में भी सुना होगा, जो दर्जी से समय पर सूट मंगवाने के लिए आईआईएम में शिक्षा प्राप्त महंगे रंगरूट रखते हैं। ऐसे मामलों की भी कमी नहीं हैं, जहां अध्यक्ष के लिए वीजा और पासपोर्ट का इंतजाम करने के लिए ट्रैवल एजेंटों, दूतावासों के कर्मचारियों और पासपोर्ट अधिकारियों पर समय और धन की बेशुमार बरबादी की जाती है। यह लागत भी अंतत: सार्वजनिक शेयरधारकों को ही उठानी पड़ता है। लेकिन, वरिष्ठï कॉरपोरेट नौकरशाहों (आईएएस अधिकारियों के समकक्ष) का कहना है कि केवल वही नहीं, बल्कि दूसरे लोग भी धन की बरबादी करते हैं क्योंकि खामियां तो पूरी व्यवस्था में हैं। यह कहना आसान है और संभवत: सुविधाजनक भी, लेकिन दोनों मामलों में बारीक अंतर है। कई लोग इस राय से सहमत होंगे कि निजी क्षेत्र के होने के नाते सूचीबद्घ कंपनियां वैध तरीके से अधिकारियों पर ज्यादा खर्च कर सकती हैं। फिर भी, सार्वजनिक धन का इस्तेमाल करने का मसला हमेशा प्रशासन से जुड़ा हुआ रहेगा, चाहे बात कॉरपोरेट प्रशासन की हो या फिर राज्य शासन की।
यह कहना समान रूप से उचित है कि उच्च और निम्न वर्गों के बीच संघर्ष चलता रहता है। लेकिन, इसके साथ-साथ यह भी उतना ही सही है कि भारत निश्चित रूप से इस मामले में काफी पिछड़ा हुआ है। अधिकारों को लागू करने के मामले में 183 देशों की फेहरिस्त में हम 182वें पायदान पर हैं। यह सूची विश्व बैंक और अंतरराष्टï्रीय वित्त निगम ने संयुक्त रूप से प्रकाशित की है। यदि क्षतिपूर्ति से संबंधि किसी मुकदमे की पहली सुनवाई में 20 वर्षों का लंबा समय लग जाता है तो ऐसे में हैरानी नहीं होनी चाहिए कि किसी सूचीबद्घ कंपनी द्वारा फिल्मी सितारों और राजनीतिक हस्तियों के निजी दौरों के लिए कॉरपोरेट जेट का इंतजाम करने में होने वाले खर्च पर सवाल उठाने में कोई सक्षम नहीं होगा।
बहरहाल मूल मसले पर आते हैं। दिलचस्प है कि कॉरपोरेट जगत की एक भव्य पार्टी पर जितना खर्च किया जाता है वह रकम मायावती के घर की साज-सज्जा से संबंधित पूरे बजट के लिए पर्याप्त होगी। वरिष्ठï कॉरपोरेट हस्तियों का जन्मदिन मनाने के लिए ऐसी ही भव्य दावतें दी जाती हैं। वरिष्ठï मीडिया पेशेवर इस तरह की दावतों को बड़ी बेपरवाही से कवर करते हैं, जबकि मायावती की ओर से दी जाने वाली पार्टियों की रिपोर्टिंग बारीकी से की जाती है। इसी तरह मीडिया में कंपनियों के मुख्य कार्याधिकारियों के वेतन-भत्तों और विनम्रता का बखान करते समय एक तरह का संतुलन रखा जाता है, लेकिन मायावती जैसी हस्तियों के मामले में इसकी कमी देखी जाती है।
यह मायावती की अनुचित शैली का बचाव करने की कोशिश नहीं है, बल्कि केवल यह याद दिलाने के लिए है कि पत्थर वही फेंक सकता है जिसने पाप न किए हों।
लेखक जेएसए, एडवोकेट्स ऐंड सॉलिसिटर्स के पार्टनर हैं और यह उनकी निजी राय है

Monday, May 14, 2012

कंपनियां यूं कराती हैं खबरों का प्रबंधन!

अभी तक सुनते थे कि आदिवासी ही बहुराष्ट्रीय कंपनियोंं की साजिश का शिकार हो रहे हैं, लेकिन किसान भी इनकी जद में हैं। जिस समय बीटी काटन पर बहस चल रही थी, देश के एक अग्रणी अंग्रेजी अखबार ने 2008 में किसानों के बीटी काटन से मालामाल होने की खबर छापी। पूरे पेज की उस खबर को 2011 में उस समय विज्ञापन के रूप में दिया गया, जब बीज विधेयक संसद में पेश नहीं हो सका। जाने माने पत्रकार पी साईनाथ ने इस खबर और विज्ञापन की खबर ली। झूठे आंकड़ों की कहानी लेकर आए और साजिशों का पर्दाफाश किया। पेश है खबर...
पी साईनाथ
करीब साढ़े तीन साल पहले जीन संवर्धित (जेनेटिकली मोडीफॉयड) बीजों के इस्तेमाल पर तगड़ी बहस छिड़ी हुई थी। यह मसला भारत के कोने-कोने में चर्चा में था। ठीक उसी समय एक समाचार ने इस तकनीक की सफलता के चमकदार असर पर खबर पेश की। टाइम्स ऑफ इंडिया ने 31 अक्टूबर 2008 के अंक में लिखा... "यहां पर आत्महत्या की कोई घटना नहीं हुई है। खेती बाड़ी से लोग अमीर हो रहे हैं। कपास के परंपरागत बीजों को छोड़कर बोलगार्ड या बीटी कॉटन अपनाने से पिछले 3-4 साल के दौरान यहां के गांवों (भांबराजा और अंटारागांव) में सामाजिक और आर्थिक क्रांति आई है।"
इसमें एक दिलचस्प पहलू और है। यही किस्सा इसी अखबार में अभी 9 महीने पहले शब्दशः एक बार फिर छपा। (28 अगस्त, 2011)। यह भी नहीं ध्यान रखा गया कि हो सकता है कि अब किसान कुछ अलग कहानी बयान कर रहे हों।
इस साल मार्च महीने में कृषि पर बनी संसद की स्थायी समिति ने इलाके का दौरा किया। भांबराजा गांव के गुस्साए किसानों की भीड़ में से आई आवाज ने समिति के सदस्यों को चौंका दिया। “हमारे गांव में आत्महत्या की 14 घटनाएं हुई हैं।” “इसमें ज्यादातर आत्महत्याएं बीटी के आने के बाद हुईं।” द हिंदू ने 2003 से 2009 के बीच आत्महत्या की 9 घटनाओं की पुष्टि की। यहां के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 5 औऱ घटनाएं गिनाईं। यह सभी घटनाएं 2002 के बाद की हैं, जब लोगों ने बीटी कॉटन को अपनाया था. उसके बाद टाइम्स आफ इंडिया ने किसानों के संपन्नता की कहानी लिखी थी। गांव वालों ने हतप्रभ सांसदों से कहा, “महोदय, ढेर सारी जमीनें खाली पड़ी हैं। तमाम लोगों का किसानी से भरोसा उठ गया है।” कुछ लोगों ने तो सोयाबीन की खेती अपना ली है, “कम से कम उसमें नुकसान की संभावना इतनी ज्यादा नहीं रहती”।
म्हाइको-मॉनसेंटो बायोटेक के बीटी कॉटन की खेती के “आदर्श गांव” से सैकड़ों किसान विस्थापित हो चुके हैं, जिसमें ज्यादा जमीन वाले किसान भी शामिल हैं। पिछले साल सितंबर महीने में हमारी पहली यात्रा के दौरान भांबराजा गांव के रामदास भोंड्रे ने भविष्यवाणी की थी, “अभी और ज्यादा लोग गांव छोड़ेंगे, क्योंकि किसानी मर रही है।”
मोनसेंटो के बीटी कॉटन का स्तुतिगान 2008 में उस समय पूरे पृष्ठ पर आया था. सरकार अगस्त 2011 में बॉयोटेक रेगुलेटरी अथॉरिटी आफ इंडिया (बीआऱएआई) विधेयक संसद में पेश करने में सफल नहीं हुई थी। विधेयक पेश न किए जा सकने की घटना महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि इससे कृषि बायोटेक उद्योग को भविष्य में मिलने वाला मुनाफा प्रभावित हुआ था। उसके बाद ही इसके लिए गोलबंदी शुरू हो गई। 28 अगस्त 2011 को पूरे पेज की कहानी “ Reaping Gold through Bt Cotton” टाइम्स आफ इंडिया में आई। उसके बाद कंपनी की ओर से अखबारों में विज्ञापन आने लगे। ऐसा ही लगातार 29, 30, 31 अगस्त और 1 व 3 सितंबर को हुआ। बहरहाल यह विधेयक संसद में पेश नहीं हो सका। न तो मॉनसून सत्र में न ही शीतकालीन सत्र में, जबकि दोनों सत्रों में इसे सूची में रखा गया था। अन्य मसलों पर संसद में हंगामा होता रहा। कुछ लोगों ने इसके बदले मुनाफा कमाया, बीटी कॉटन के माध्यम से नहीं तो अखबारी कागज के माध्यम से।
कृषि पर बनी संसद की स्थायी समिति पर इन विज्ञापनों का कोई असर नहीं हुआ। समिति ने पहले भी जीन संवर्धित फसलों को अनुमति दिए जाने के मसले को देखा था। किसानों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं की खबरों और विदर्भ के तनाव से परेशान समिति के सदस्यों ने इस इलाके का दौरा करने का मन बनाया। समिति में विभिन्न दलों के सदस्य शामिल थे।
भांबराजा गांव ने निश्चित रूप से इस समिति के अध्यक्ष और दिग्गज सांसद बासुदेव आचार्य का ध्यान खींचा था। आखिर ध्यान आकर्षित भी क्यों न करता, यह गांव तो म्हाइको मॉनसेंटो के करिश्मे से मालामाल हुआ गांव था! अन्य गांव मारेगांव-सोनेबर्डी था। लेकिन सांसदों को तब झटका लगा, जब इसमें से किसी गांव के लोग मालामाल नहीं नजर आए। करिश्मे का आभामंडल टूट चुका था। यहां के लोगों में फैली निराशा और तनाव सरकार की असफलता की कहानी बयां कर रहे थे।
यह मसला (और जैसा कि टाइम्स आफ इंडिया अपनी खबरों में दावा भी करता है) एक बार फिर जिंदा हुआ है, क्योंकि 2012 में बीटी कॉटन को 10 साल होने जा रहे हैं। पिछले साल 28 अगस्त को “Reaping Gold through Bt Cotton” नाम से आई कहानी को “ए कंज्यूमर कनेक्ट इनीशिएटिव” के रूप में पेश किया गया। अगर दूसरे शब्दों में कहें तो यह विज्ञापन था। पूरे पेज की इस खबर में पेशेवर पत्रकारों के नाम से खबरें और टाइम्स आफ इंडिया के फोटो थे। सबसे विरोधाभासी यह है कि जो खबर विज्ञापन में बदल चुकी थी, वह शब्दश टाइम्स आफ इंडिया के नागपुर संस्करण में 31 अक्टूबर 2008 को छप चुकी थी। आलोचकों ने इस दोहराव को हास्यास्पद बताया था। 28 अगस्त 2011 को छपी खबर इसी खबर के फिर से छप जाने के दोहराव जैसा लगा। लेकिन इसमें खास अंतर था। 2008 में छपी खबर को विज्ञापन के रूप में नहीं दिखाया गया था। दोनों संस्करणों में छपी खबर में एक समानता भी ध्यान देने योग्य है। उनमें लिखा गया था, “यवतमाल दौरे की व्यवस्था म्हाइको मोनसेंटो बायोटेक ने की थी।”
कंपनी ने 2008 में छपे फीचर को पूरे पेज के न्यूज रिपोर्ट के रूप में पेश किया, जिसे टाइम्स आफ इंडिया ने किया था. पिछले सप्ताह म्हाइको मोनसेंटो बायोटेक इंडिया के प्रवक्ता ने द हिंदू से बातचीत में कहा, “2008 का कवरेज मीडिया के दौरे का परिणाम था, जिसे संपादकीय विवेक के साथ लिखा गया था। हमने सिर्फ आने जाने की व्यवस्था की थी।” “2011 में जो रिपोर्ट छपी, वह 2008 की रिपोर्ट ही थी, जिसमें कोई संपादन नहीं किया गया और इसे मार्केटिंग फीचर के रूप में छापा गया।” 2008 में “पूरे पेज की न्यूज रिपोर्ट” नागपुर संस्करण में आई थी। 2011 का “मार्केटिंग फीचर”, िजसे आप स्पेशल रिपोर्ट के हिस्से में क्लिक करके देख सकते हैं, कई संस्कऱणों में दिखा। लेकिन यह नागपुर में नहीं छपा, जिसके चलते निश्चित रूप से विस्मय पैदा होता है।
इस तरह से एक पूरा पेज तीन साल के भीतर दो बार दिखा। पहली बार खबर के रूप में और दूसरी बार विज्ञापन के रूप में। पहली बार इसे समाचार पत्र के स्टाफ रिपोर्टर और फोटोग्राफर के माध्यम से पेश किया गया। दूसरी बार विज्ञापन विभाग ने इसे पेश किया। पहली बार इस खबर के लिए यात्रा की व्यवस्था म्हाइको मोनसेंटो ने की। दूसरी बार म्हाइको मोनसेंटो ने इसके लिए विज्ञापन की व्यवस्था की। पहली बार यह हादसे के रूप में सामने आया और दूसरी बार एक तमाशे के रूप में।
कंपनी के प्रवक्ता इस मामले में उच्च स्तर के पारदर्शिता का दावा करते हैं। हमने कहा कि यह प्रकाशन 31 अक्टूबर 2008 में छपी खबर का रीप्रिंट है है। लेकिन प्रवक्ता ने ई मेल से भेजे गए अपने जवाब में इस विज्ञापन के समय के बारे में द हिंदू के सवालों पर चुप्पी साध ली। कंपनी ने कहा, “2011 हमने बीटी बीज को लेकर जन जागरूकता अभियान चलाया था, जो सीमित अवधि के लिए था। इसका उद्देश्य था कि लोगों को कृषि के क्षेत्र में बायोटेक्नोलाजी के महत्त्व की जानकारी मिल सके।” द हिंदू ने यह सवाल पूछा था कि जब संसद में बीआरएआई विधेयक पेश होना था, उसी समय यह अभियान क्यों चलाया गया, लेकिन इसका कोई जवाब नहीं मिला।
लेकिन मामला इससे भी आगे का है। गांव के लोगों का कहना है कि बीटी के जादू पर लिखी गई टाइम्स आफ इंडिया की खबर में भांबराजा या अंतरगांव की जो फोटो लगी थी, वह उस गांव की थी ही नहीं। गांव के किसान बबनराव गवांडे कहते हैं, “ इस फोटो में लोगों को देखकर यह लगता है कि फोटो भांबराजा की नहीं है। ”
काल्पनिक करिश्मा
टाइम्स आफ इंडिया की खबर में एक चैंपियन शिक्षित किसान नंदू राउत को पात्र बनाया गया है, जो एलआईसी एजेंट भी है। इसकी कमाई बीटी के करिश्मे की वजह से बढ़ी बताई गई है। पिछले साल सितंबर महीने में नंदू राउत ने मुझसे कहा था, “मैंने इसके पहले साल करीब 2 लाख रुपये कमाए थे।” उसने कहा, “इसमें से करीब 1.6 लाख रुपये पॉलिसी की बिक्री से आए थे।” संक्षेप में कहें तो उसने एलआईसी पॉलिसी के माध्यम से खेती से हुई कमाई की तुलना में करीब 4 गुना ज्यादा कमाया। नंदू के पास साढ़े सात एकड़ जमीन है और उसके परिवार में 4 सदस्य हैं।
लेकिन टाइम्स आफ इंडिया की खबर में कहा गया है कीटनाशकों के खर्च बच जाने की वजह से उसे प्रति एकड़ 20,000 रुपये अतिरिक्त कमाई हुई। वह 4 एकड़ में खेती करता है, इस तरह से उसे 80,000 रुपये का अतिरिक्त मुनाफा हुआ।
इससे अलग भांबराजा गांव के किसान गुस्से से कहते हैं, “हमें एक किसान दिखा दो, जिसका प्रति एकड़ कुल मुनाफा भी 20,000 रुपये हो।” पूरे गांव में किए गए सर्वे, जिस पर राउत ने भी हस्ताक्षर किए हैं, उनकी कमाई की अलग कहानी कहता है। सर्वे की यह प्रति द हिंदू के पास भी है।
भांबराजा और मारेगांव के किसानों को बीटी के करिश्मे से हुए फायदे की कहानी को केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़े भी झुठलाते हैं। 19 दिसंबर 2011 को शरद पवार ने संसद में कहा, “विदर्भ में करीब 1.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर काटन लिंट का उत्पादन होता है।” इतने कम उत्पादन का आंकड़ा चौंकाने वाला है। इस आंकड़े का दोगुना भी कम होगा। किसान अपनी फसल को कच्चे कपास के रूप में बेचते हैं। 100 किलो कच्ची कपास में 35 किलो लिंट निकलती है और 65 किलो कपास बीज होता है। पवार के दिए गए आंकड़े कहते हैं कि 3.5 क्विंटल कच्चे कपास का उत्पादन प्रति हेक्टेयर होता है। पवार का कहना है कि किसानों को अधिकतम 4,200 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहे हैं। इस तरह से वह मानते हैं कि किसानों को करीब उतना ही मिल रहा है, जितना कि उनका उत्पादन लागत होता है, जिसकी वजह से ऐसी गंभीर समस्या पैदा हुई है। अगर पवार के आंक़डे सही हैं तो नंदू रावत की कमाई 5,900 रुपये प्रति एकड़ से ज्यादा नहीं हो सकती। अगर इसमें से 1.5 पैकेट बीज के करीब 1,400 रुपये व अन्य उत्पादन लागत निकाल दें तो उसके पास करीब कुछ भी नहीं बचता। जबकि टाइम्स आफ इंडिया के मुताबिक इसकी कमाई 20,000 रुपये प्रति एकड़ से ज्यादा है।
कमाई के इस असाधारण दावे के बारे में पूछे जाने पर म्हाइको मोनसेंटो के प्रवक्ता ने कहा, “हम एमएमबी इंडिया के सहकर्मियों के बयानों के साथ हैं, जैसा कि खबर में प्रकाशित किया गया है।”
दिलचस्प है कि पूरे पेज की इस खबर में एक पैराग्राफ का एक बयान है, जिसमें 20,000 रुपये प्रति एकड़ से ज्यादा कमाई या किसी अन्य आंकड़े का कोई जिक्र नहीं है। इसमें महज इतना कहा गया है कि बीटी की वजह से कपास की खेती करने वाले उत्पादकों की आमदनी बढ़ी है और बीटी का रकबा भी बढ़ा है। इसमें प्रति एकड़ पैदावार के बारे में नहीं बताया गया है। इसमें दो गांवों में किसी के भी आत्महत्या न करने के बारे में भी कुछ नहीं कहा गया है। इस तरह से कंपनी बड़ी सावधानी से टाइम्स आफ इंडिया के दावों से खुद को अलग करती है, लेकिन इसका इस्तेमाल बड़ी चालाकी से मार्केटिंग फीचर के रूप में करती है।
इन दावों के बारे में एमएमबी के प्रवक्ता का कहना है, “यह जानकारी पत्रकारों ने किसानों से सीधे बातचीत और किसानों के व्यक्तिगत अनुभवों से जुटाई है। पत्रकार गांव में गए थे, उन्होंने किसानों से बातचीत करके रिपोर्ट तैयार की औऱ उसमें किसानों के बयान भी दिए।”
खबर के बाद विज्ञापन बन चुके एक पेज के दावों के मुताबिक नंदू रावत की बोलगार्ड-2 की प्रति एक़ड़ उत्पादकता 20 क्विंटल होनी चाहिए, जो कृषि मंत्री शरद पवार के बताए 1.4 क्विंटल औसत की तुलना में 14 गुना ज्यादा है.
पवार का मानना है कि विदर्भ इलाके में बारिश के पानी पर निर्भरता की वजह से पैदावार कम होती है, क्योंकि कपास की दो से तीन बार सिंचाई की जरूरत होती है। हालांकि वह इस सवाल पर खामोश हो जाते हैं कि महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी व कांग्रेस की सरकार है, ऐसे में एक सूखे इलाके में बीटी काटन को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है। अगर हम टाइम्स आफ इंडिया की मानें तो नंदू नकदी की ढेर पर बैठा है, लेकिन कृषि मंत्री की बात पर यकीन करें तो वह मुश्किल से अपनी जान बचा रहा है।
म्हाइको मोनसेंटो बायोटेक के 2011 के ठीक इसी सप्ताह में दिल्ली के एक अखबार में छपे विज्ञापन पर विवाद हुआ था। एक विज्ञापन पर एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल आफ इंडिया (एएससीआई) के पास शिकायत पहुंची, जिसमें भारतीय किसानों को भारी मुनाफे का दावा किया गया था। एएससीआई ने पाया कि विज्ञापन में किए गए दावे पुष्ट नहीं हैं। एमएमबी के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी ने एएससीआई की ओर से उठाए गए मसलों को संज्ञान में लिया और उसके मुताबिक विज्ञापन में बदलाव किया गया।
हम स्थायी समिति के सांसदों के साथ जब मार्च में गांव के दौरे से लौट रहे थे तो एक बार फिर नंदू से मिले। उसने कहा, “आज की तारीख में फिलहाल मैं यही सलाह दूंगा कि यहां बीटी काटन का इस्तेमाल न करें, क्योंकि यह असिंचित इलाका है। अब हालात बहुत खराब हो गए हैं।” उसने सांसदों के साथ बैठक में एक भी सवाल नहीं उठाए और हा कि वह इतनी देर से आए हैं कि कुछ कर नहीं सकते।
टाइम्स आफ इंडिया की एक खबर में एक किसान मंगू चव्हाण अपने बयान में कहता है, “हम अब महाजनों के चंगुल से दूर हैं। अब किसी को उनकी जरूरत नहीं होती।” यह अंतरगांव के किसान का बयान है, जहां बीटी काटन के चलते लोगों की अमीरी दिखाई गई है। लेकिन भांबराजा के 365 किसान परिवारों और अंतरगांव के 150 परिवारों पर किए गए अध्ययन के आंकड़े कुछ और ही बयां करते हैं। यह अध्ययन विदर्भ जन आंदोलन समिति ने किए हैं। समिति के प्रमुख किशोर तिवारी कहते हैं, “बैंक खाते रखने वाले ज्यादातर किसान डिफाल्टर हो चुके हैं औऱ 60 प्रतिशत किसान साहूकारों के कर्ज तले दबे हैं।”
महाराष्ट्र सरकार ने पूरी कोशिश की कि सांसदों को “आदर्श गांव” भांबराजा और मारेगांव न जाने दिया जाए। बहरहाल, समिति के अध्यक्ष बासुदेव आचार्य और उनके सहयोगी वहां जाने को तत्पर थे। सांसदों के दौरे से प्रोत्साहित गांव वाले खुलकर बोले। महाराष्ट्र में 1995 से 2010 के बीच 50,000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक यह सबसे खराब स्थिति है। विदर्भ में लंबे समय से इस तरह की मौतें हो रही हैं। अब किसान भी नीतिगत मसलों पर आवाज उठाने लगे हैं, जिसकी वजह से गांवों में तनाव बढ़ा है।
किसी भी किसान ने यह नहीं कहा कि आत्महत्या की घटनाओं या संकट की वजह केवल बीटी काटन है। लेकिन गांववाले इसके करिश्मे के तमाम दावों की हवा निकालते हैं। उनकी कुछ प्रतिक्रियाएं तो सांसदों के लिए खबर की तरह आईं, न कि भुगतान की गई खबर या मार्केटिंग फीचर के रूप में।

Saturday, May 12, 2012

सिर जो झुका रहा है, वह भी है घोंघा बसन्त

(फेसबुक फ्रेंडों के पहले मेरे ब्लॉग फ्रेंड हुआ करते थे, अब भी हैं, लेकिन उधर सक्रियता कम होने की वजह से मामला सुस्त है। अंबेडकर के कार्टून को मुझे बहुत स्पष्ट समझाने में मेरी मदद की मेरे पुराने ब्लॉग फ्रेंड दिनेश राय द्विवेदी ने। अगर आपको भी समझने में कोई दिक्कत हो तो इस लेख से मदद जरूर लें। ऐसा लगता है कि शंकर असल में यही दिखाना चाह रहे थे, कार्टून की बाकी व्याख्याएं अतार्किक और बवाली हैं- जिसमें मेरे भी तमाम तर्क हैं)
दिनेशराय द्विवेदी
घोंघा एक विशेष प्रकार का जंतु है जो अपने जीवन का अधिकांश एक कड़े खोल में बिता देता है। इस के शरीर का अधिकांश हिस्सा सदैव ही खोल में बंद रहता है। जब इसे आहार आदि कार्यों के लिए विचरण करना होता है तो यह शरीर का निचला हिस्सा ही बाहर निकालता है जिस में इस के पाद (पैर) होते हैं और जिन की सहायता से यह चलता है। जैसे ही किसी आसन्न खतरे का आभास होता है यह अपने शरीर को पूरी तरह से खोल में छिपा लेता है। खतरे के पल्ले केवल कड़ा खोल पड़ता है। खतरे की संभावना मात्र से खोल में छिपने की इस की प्रवृत्ति पर अनेक लेखकों ने अपनी कलम चलाई है। इसे आधार बना कर सब से खूबसूरत कहानी महान रूसी कथाकार अंतोन चेखोव की ‘दी मेन इन दी केस’ है जिस के हिन्दी अनुवाद का शीर्षक ही ‘घोंघा’ है। इस कहानी को पढ़ कर मनुष्य की घोंघा प्रवृत्ति का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
खतरे से बचने के लिए कड़े खोल का निर्माण करने और खतरे की आशंका मात्र से खोल में छुप जाने की इस घोंघा प्रवृत्ति को व्यंग्य की धार बनाने का उपयोग साहित्य में अनेक लोगों ने किया है। लेकिन घोंघे की चाल की विशिष्ठता का उपयोग बिरले ही देखा गया है। विभिन्न प्रजाति के स्थलीय घोंघों की चाल नापे जाने पर प्राप्त परिणामों के अनुसार उन की न्यूनतम चाल 0.0028 मील प्रतिसैकंड और अधिकतम चाल 0.013 मील प्रति सैंकंड है। इस अधिकतम चाल से कोई भी घोंघा एक घंटे में 21 मीटर से अधिक दूरी नहीं चल सकता। पिछली सदी के महान भारतीय व्यंग्य चित्रकार केशव शंकर पिल्लई ने घोंघे की चाल का अपने व्यंग्य चित्र में जिस तरह से उपयोग किया उस का कोई सानी नहीं है। इस व्यंग्य चित्र में भारतीय राजनीति की दो महान हस्तियाँ सम्मिलित थीं। इस व्यंग्य चित्र को सामाजिक विज्ञान की पाठ्य पुस्तक में सम्मिलित किए जाने को कुछ लोगों ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और उसे पुस्तक से हटाने की मांग को ले कर संसद में हंगामा खड़ा किया। सरकार इस विवाद के सामने बेदम नजर आई। विभागीय मंत्री जी को खेद व्यक्त करते हुए उस व्यंग्य चित्र को पाठ्यपुस्तक से हटाने की घोषणा करनी पड़ी। भारतीय संसद नित नए प्रहसनों के लिए पहले ही कम ख्यात नहीं है। इस नए प्रहसन ने संसद की छवि में चार चांद और लगा दिए।
इस व्यंग्य चित्र में घोंघे को निर्मित होते हुए संविधान के रूप में दिखाया गया है। संविधान के इस घोंघे पर संविधान सभा के सभापति डा. भीमराव अम्बेडकर सवार हैं और चाबुक चला रहे हैं जिस से घोंघा दौड़ने लगे और शीघ्रता से अपनी मंजिल तय कर सके। घोंघे की इस चाल से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी प्रसन्न नहीं हैं और वे भी चाबुक ले कर घोंघे पर पिले पड़े हैं। सारे भारत की जनता इन दोनों महान नेताओं की इस चाबुकमार पर हँस रही है। इस व्यंग्य चित्र से प्रदर्शित हो रहा है कि दोनों महान नेताओं को संविधान का निर्माण संपन्न होने की इतनी व्यग्रता है कि वे यह भी विस्मृत कर गए कि यह जल��दबाजी में करने का नहीं अपितु तसल्ली से करने का काम है, इसीलिए संविधान को यहाँ घोंघे के रूप में दिखाया गया है। चाहे कितने ही चाबुक बरसाए जाएँ घोंघा तो अपनी चाल से ही चलेगा, उसे दौड़ाया नहीं जा सकता। अब घोंघे को चाबुक मार कर दौड़ाने का प्रयत्न तो एक मूर्खतापूर्ण कृत्य ही कहा जा सकता है। वास्तव में कोई ऐसा करे और उसे देखने वाला उस पर हँसे न तो क्या करे? इस व्यंग्य चित्र में दोनों महान नेताओं के इस कृत्य पर जनता का हँसना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया है।
इस व्यंग्य चित्र से न तो डाक्टर भीमराव अंबेडकर की प्रतिष्ठा को कोई आँच पहुँचती है और न ही नेहरू के सम्मान पर। हाँ उन की स्वाभाविक व्यग्रता जनता के सामने हँसी का कारण अवश्य बनती है। यह व्यंग्य चित्र दोनों नेताओं की व्यग्रता को जनता के प्रति उन की प्रतिबद्धता और कर्तव्यनिष्ठता के रूप में प्रदर्शित करता है। मुझे तो लगता है कि यदि किसी पाठ्य पुस्तक में व्यंग्य चित्रों के माध्यम से तत्कालीन राजनीति को समझाने की कोशिश की जाए तो इस व्यंग्य चित्र को अवश्य ही उस में शामिल होना चाहिए। पाठ्यपुस्तक निर्माताओं ने यही किया भी था।
संसद में जब यह प्रश्न उठा तो सरकार को उस का सामना करना चाहिए था और उस मुद्दे पर हंगामा नहीं बहस होनी चाहिए थी। सदन में उपस्थित विद्वान सांसदों को इस मामले की विवेचना को सदन के समक्ष रखना चाहिए था। यदि फिर भी संतुष्टि नहीं होती तो इस मामले को साहित्य और कला के मर्मज्ञों की एक समिति बना कर उस के हवाले करना चाहिए था और उस की समालोचना की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। डा. भीमराव अम्बेडकर को भगवान का दर्जा दे कर अपनी राजनीति भाँजने वाले लोगों का खुद डा. अम्बेडकर से क्या लेना देना? उन का मकसद तो संसद में हंगामे की तलवारें भांज कर वीर कहाना मात्र था। सरकारी पक्ष ने बाँकों के इस प्रहसन को एक गंभीर चुनौती के रूप में स्वीकार करने के स्थान पर उसे अपनी गलती के रूप में स्वीकार करते हुए सीधे सीधे आत्मसमर्पण कर दिया। जैसे जूता मंदिर में प्रवेश नहीं पा सकता, व्यंग्य चित्र का पाठ्य पुस्तक में क्या काम? मंदिर में जूते के प्रवेश नही पा सकने से उस का महत्व कम नहीं हो जाता। अपितु जो व्यक्ति जूते को बाहर छोड़ कर जाता है उसका ध्यान भगवान की प्रार्थना में कम और जूते में अधिक रहता है।
इस घर में पहले भी कम नहीं थे घोंघा बसन्त।
अब जिधर भी देखो नजर आते हैं घोंघा बसन्त।।
चाबुक जो थामे है, वह तो है घोंघा बसन्त।
सिर जो झुका रहा है, वह भी है घोंघा बसन्त।।
http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/dineshraidwivedi/entry/%E0%A4%B8-%E0%A4%B0-%E0%A4%9C-%E0%A4%9D-%E0%A4%95-%E0%A4%B0%E0%A4%B9-%E0%A4%B9-%E0%A4%B5%E0%A4%B9-%E0%A4%AD-%E0%A4%B9-%E0%A4%98-%E0%A4%98-%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A4%A8-%E0%A4%A4

तार्किक है किताब में कार्टून डाला जाना

(अंबेडकर पर छपे एक कार्टून पर 50-70 साल बाद बवाल हो गया। कार्टून किताब में डाला गया, इसलिए। हिमांशु पंड्या ने इस पर एक बहुत धारदार, शानदार और तार्किक लेख लिखा। अगर ऐसी किताबें आएं तो निश्चित रूप से छात्रों की तर्कशक्ति बढ़ेगी और वह शानदार तरीके से सीख सकेंगे।)
हिमांशु पंड्या
जिस किताब में छपे कार्टून पर विवाद हो रहा है, उसमें कुल बत्तीस कार्टून हैं। इसके अतिरिक्त दो एनिमेटेड बाल चरित्र भी हैं - उन्नी और मुन्नी। मैं सबसे पहले बड़े ही मशीनी ढंग से इनमें से कुछ कार्टूनों का कच्चा चिट्ठा आपके सामने प्रस्तुत करूँगा, फिर अंत में थोड़ी सी अपनी बात।
# नेहरु पर सबसे ज्यादा (पन्द्रह) कार्टून हैं। ये स्वाभाविक है क्योंकि किताब है : भारत का संविधान : सिद्धांत और व्यवहार। # एक राज्यपालों की नियुक्ति पर है। उसमें नेहरू जी किक मारकर एक नेता को राजभवन में पहुंचा रहे हैं। # एक भाषा विवाद पर है, उसमें राजर्षि टंडन आदि चार नेता एक अहिन्दी भाषी पर बैठे सवारी कर रहे हैं। # एक में संसद साहूकार की तरह बैठी है और नेहरू, प्रसाद, मौलाना आज़ाद, जगजीवन राम, मोरारजी देसाई आदि भिखारी की तरह लाइन लगाकर खड़े हैं। यह विभिन्न मंत्रालयों को धन आवंटित करने की एकमेव ताकत संसद के पास होने पर व्यंग्य है। # एक में वयस्क मताधिकार का हाथी है जिसे दुबले पतले नेहरू खींचने की असफल कोशिश कर रहे हैं। # एक में नोटों की बारिश हो रही है या तूफ़ान सा आ रहा है जिसमें नेहरू, मौलाना आजाद, मोरारजी आदि नेता, एक सरदार बलदेव सिंह, एक अन्य सरदार, एक शायद पन्त एक जगजीवन राम और एक और प्रमुख नेता जो मैं भूल रहा हूँ कौन - तैर रहे हैं। टैगलाइन है - इलेक्शन इन द एयर।
# एक में नेहरू हैरान परेशान म्यूजिक कंडक्टर बने दो ओर गर्दन एक साथ घुमा रहे हैं। एक ओर जन-गण-मन बजा रहे आंबेडकर, मौलाना, पन्त, शायद मेनन, और एक वही चरित्र जो पिछले कार्टून में भी मैं पहचान नहीं पाया, हैं। ये लोग ट्रम्पेट, वायलिन आदि बजा रहे हैं जबकि दूसरी ओर वंदे मातरम गा रहे दक्षिणपंथी समूह के लोग हैं। श्यामाप्रसाद मुखर्जी बजाने वालों की मंडली से खिसककर गाने वालों की मंडली में जा रहे हैं। # एक में चार राजनीतिज्ञ नेहरु, पटेल, प्रसाद और एक और नेता भीमकाय कॉंग्रेस का प्रतिनिधित्त्व करते हुए एक लिलिपुटनुमा विपक्ष को घेरकर खड़े हैं। यह चुनाव और प्रतिनिधित्त्व की दिक्कतें बताने वाले अध्याय में है। # ऊपरवाले कार्टून के ठीक उलट है ये कार्टून जिसमें नेहरु को कुछ भीमकाय पहलवाननुमा लोगों ने घेर रखा है, लग रहा है ये अखाड़ा है और नेहरु गिरे पड़े हैं। घेरे खड़े लोगों के नाम हैं - विशाल आंध्रा, महा गुजरात, संयुक्त कर्नाटक, बृहनमहाराष्ट्र। ये कार्टून नए राज्यों के निर्माण के लिए लगी होड़ के समय का है।
### कवर पर बना कार्टून सबसे तीखा है। आश्चर्य है इससे किसी की भावनाएं आहत क्यों नहीं हुईं। यह आर. के. लक्ष्मण का है। इसमें उनका कॉमन मैन सो रहा है, दीवार पर तस्वीरें टंगी हैं - नेहरु, शास्त्री, मोरारजी, इंदिरा, चरण सिंह, वी.पी.सिंह, चंद्रशेखर, राव, अटल बिहारी और देवैगोडा... और टीवी से आवाजें आ रही हैं - "unity, democracy, secularism, equality, industrial growth, economic progress, trade, foreign collaboration, export increase, ...we have passenger cars, computers, mobile phones, pagers etc... thus there has been spectacular progress... and now we are determined to remove poverty, provide drinking water, shelter, food, schools, hospitals...
कार्टून छोड़िये, इस किताब में उन्नी और मुन्नी जो सवाल पूछते हैं, वे किसी को भी परेशान करने के लिए काफी हैं। वे एकबारगी तो संविधान की संप्रभुता को चुनौती देते तक प्रतीत होते हैं। मसलन, उन्नी का ये सवाल - क्या यह संविधान उधार का था? हम ऐसा संविधान क्यों नहीं बना सके जिसमें कहीं से कुछ भी उधार न लिया गया हो? या ये सवाल (किसकी भावनाएं आहत करेगा आप सोचें) - मुझे समझ में नहीं आता कि खिलाड़ी, कलाकार और वैज्ञानिकों को मनोनीत करने का प्रावधान क्यों है? वे किसका प्रतिनिधित्त्व करते हैं? और क्या वे वास्तव में राज्यसभा की कार्यवाही में कुछ खास योगदान दे पाते हैं? या मुन्नी का ये सवाल देखें - सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही फैसले बदलने की इजाज़त क्यों दी गयी है? क्या ऐसा यह मानकर किया गया है कि अदालत से भी चूक हो सकती है? एक जगह सरकार की शक्ति और उस पर अंकुश के प्रावधान पढ़कर उन्नी पूछता है - ओह! तो पहले आप एक राक्षस बनाएँ फिर खुद को उससे बचाने की चिंता करने लगे। मैं तो यही कहूँगा कि फिर इस राक्षस जैसी सरकार को बनाया ही क्यों जाए?
किताब में अनेक असुविधाजनक तथ्य शामिल किये गए हैं। उदाहरणार्थ, किताब में बहुदलीय प्रणाली को समझाते हुए ये आंकड़े सहित उदाहरण दिया गया है कि चौरासी में कॉंग्रेस को अड़तालीस फीसदी मत मिलने के बावजूद अस्सी फीसदी सीटें मिलीं। इनमें से हर सवाल से टकराते हुए किताब उनका तार्किक कारण, ज़रूरत और संगती समझाती है। यानी किताब अपने खिलाफ उठ सकने वाली हर असहमति या आशंका को जगह देना लोकतंत्र का तकाजा मानती है। वह उनसे कतराती नहीं, उन्हें दरी के नीचे छिपाती नहीं, बल्कि बच्चों को उन पर विचार करने और उस आशंका का यथासंभव तार्किक समाधान करने की कोशिश करती है। उदाहरण के लिए जिस कार्टून पर विवाद है, वह संविधान निर्माण में लगने वाली देरी के सन्दर्भ में है। किताब में इस पर पूरे तीन पेज खर्च किये गए हैं, विस्तार से समझाया गया है कि संविधान सभा में सभी वर्गों और विचारधाराओं के लोगों को शामिल किया गया। उनके बीच हर मुद्दे पर गहराई से चर्चा हुई। संविधान सभा की विवेकपूर्ण बहसें हमारे लिए गर्व का विषय हैं, किताब ये बताती है। मानवाधिकार वाले अध्याय में सोमनाथ लाहिड़ी को (चित्र सहित) उद्धृत किया गया है कि अनेक मौलिक अधिकार एक सिपाही के दृष्टिकोण से बनाए गए हैं यानी अधिकार कम हैं, उन पर प्रतिबन्ध ज्यादा हैं। सरदार हुकुम सिंह को (चित्र सहित) उद्धृत करते हुए अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सवाल उठाया गया है। किताब इन सब बहसों को छूती है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात ये है कि जहाँ देर के कारण गिनाए गए हैं, वहाँ ये रेखांकित किया गया है कि संविधान में केवल एक ही प्रावधान था जो बिना वाद-विवाद सर्वसम्मति से पास हो गया - सार्वभौम मताधिकार। किताब में इस पर टिप्पणी है – “इस सभा की लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा का इससे बढ़िया व्यावहारिक रूप कुछ और नहीं हो सकता था।”
बच्चों को उपदेशों की खुराक नहीं चाहिए, उन्हें सहभागिता की चुनौती चाहिए। उपदेशों का खोखलापन हर बच्चा जानता है। यह और दो हज़ार पांच में बनी अन्य किताबें बच्चों को नियम/ सूत्र/ आंकड़े/ तथ्य रटाना नहीं चाहतीं। प्रसंगवश पाठ्यचर्या दो हज़ार पांच की पृष्ठभूमि में यशपाल कमेटी की रिपोर्ट थी। बच्चे आत्महत्या कर रहे थे, उनका बस्ता भारी होता जा रहा था, पढ़ाई उनके लिए सूचनाओं का भण्डार हो गयी थी, जिसे उन्हें रटना और उगल देना था। ऐसे में इस तरह के कार्टून और सवाल एक नयी बयार लेकर आये। ज्ञान एक अनवरत प्रक्रिया है, यदि ज्ञान कोई पोटली में भरी चीज़ है जिसे बच्चे को सिर्फ ‘पाना’ है तो पिछली पीढ़ी का ज्ञान अगली पीढ़ी की सीमा बन जाएगा। किताब बच्चे को अंतिम सत्य की तरह नहीं मिलनी चाहिये, उसे उससे पार जाने, नए क्षितिज छूने की आकांक्षा मिलनी चाहिए।
किताब अप्रश्नेय नहीं है और न ही कोई महापुरुष। कोई भी - गांधी, नेहरु, अम्बेडकर, मार्क्स... अगर कोई भी असुविधाजनक तथ्य छुपाएंगे तो कल जब वह जानेगा तो इस धोखे को महसूस कर ज़रूर प्रतिपक्षी विचार के साथ जाएगा। उसे सवालों का सामना करना और अपनी समझ/ विवेक से फैसला लेने दीजिए। यह किताब बच्चों को किताब के पार सोचने के लिए लगातार सवाल देती चलती है, उदाहरणार्थ यह सवाल - (क्या आप इससे पहले इस सवाल की कल्पना भी कर सकते थे?) क्या आप मानते हैं कि निम्न परिस्थितियाँ स्वतंत्रता के अधिकार पर प्रतिबंधों की मांग करती हैं? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दें – क* शहर में साम्प्रदायिक दंगों के बाद लोग शान्ति मार्च के लिए एकत्र हुए हैं। ख* दलितों को मंदिर प्रवेश की मनाही है। मंदिर में जबरदस्ती प्रवेश के लिए एक जुलूस का आयोजन किया जा रहा है। ग* सैंकड़ों आदिवासियों ने अपने परम्परागत अस्त्रों तीर-कमान और कुल्हाड़ी के साथ सड़क जाम कर रखा है। वे मांग कर रहे हैं कि एक उद्योग के लिए अधिग्रहीत खाली जमीं उन्हें लौटाई जाए। घ* किसी जाती की पंचायत की बैठक यह तय करने के लिए बुलाई गयी है कि जाती से बाहर विवाह करने के लिए एक नवदंपत्ति को क्या दंड दिया जाए।
अब आखिर में, जिन्हें लगता है कि बच्चे का बचपन बचाए रखना सबसे ज़रूरी है और वो कहीं दूषित न हो जाए, उन्हें छान्दोग्य उपनिषद का रैक्व आख्यान पढ़ना चाहिए। मेरी विनम्र राय में बच्चे को यथार्थ से दूर रखकर हम सामाजिक भेदों से बेपरवाह, मिथकीय राष्ट्रवाद से बज्बजाई, संवादहीनता के टापू पर बैठी आत्मकेंद्रित पीढ़ी ही तैयार करेंगे। तब, कहीं देर न हो जाए।

Friday, May 4, 2012

अबूझ है अबूझमाड़ की चुनौती


आदिति फडणीस
माओवादियों ने उड़ीसा के विधायक झीना हिकाका को अपनी गिरफ्त से छोड़ दिया है। हिकाका माओवादियों की मदद से ही विधायक चुने गए थे। उनके बदले में राज्य सरकार ने सिर्फ एक माओवादी महिला को छोड़ा है। छत्तीसगढ़ में भी माओवादियों ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी एलेक्स पॉल मेनन को अपनी गिरफ्त से आजाद कर दिया है। हालांकि उन्होंने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया, पर हर बात माओवादी अपहरणों को तिकड़म ही साबित करती है। बहरहाल माओवादी वह सब कुछ कर रहे हैं जिनसे वे अपने इलाके की हदबंदी तय कर सकते हों। जिसे वे अपना 'राज्य' कह सकते हों।
अबूझमाड़ माओवादियों का 'राज्य' है। इसका वास्तविक आकार एक अबूझ पहेली है। यह इलाका करीब 10,000 से 15,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है जो आकार में फिजी या साइप्रस के बराबर है-जो बस्तर के जंगलों वाले दूरदराज के क्षेत्र से लेकर आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद, खमम और पूर्वी गोदावरी जिलों और महाराष्ट्र के चंद्रपुर और गढ़चिरौली से लेकर मध्य प्रदेश के बालाघाट और ओडिशा के मलकानगिरि तक फैला हुआ है। इस इलाके के क्षेत्रों का कभी सर्वेक्षण नहीं हुआ, यहां तक कि 15वीं शताब्दी के मध्य में मुगल सम्राट अकबर द्वारा भी इसका सर्वेक्षण नहीं कराया गया जिन्होंने भारत का पहला राजस्व सर्वेक्षण कराया था। भारत के पहले महासर्वेक्षक एडवर्ड एवरेस्ट भी वर्ष 1872 से 1880 के बीच अबूझमाड़ की समस्त स्थलाकृति का आकलन करने में नाकाम रहे थे। खुफिया एजेंसियों के अनुसार अबूझमाड़ में माओवादियों के सभी बड़े प्रतिष्ठान मौजूद हैं जिनमें हथियार निर्माण इकाइयों से लेकर छापामार प्रशिक्षण केंद्र भी शामिल हैं। यह शीर्ष नेताओं के लिए भी सुरक्षित पनाहगाह है। राज्य के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, 'यह इलाका भारी उत्खनन वाला है और सुरक्षा एजेंसियों के लिए काम करना लगभग असंभव सा है।'
माओवादी भी अपने परिचालन इलाके का विस्तार कर रहे हैं। इस क्षेत्र की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था ने कच्चे माल की मांग में इजाफा कर दिया है। तापीय ऊर्जा और इस्पात में निवेश के लिए छत्तीसगढ़ पसंदीदा ठिकाना है। सेल, एस्सार, टाटा और जिंदल में राज्य में बड़ी कोयला और लौह अयस्क खदानों को हासिल करने की होड़ में लगी हुई हैं। छत्तीसगढ़ में अपनाई जा रही नई तिकड़में दूसरे खनन इलाकों में अपना वर्चस्व दिखाने की कोशिश लगती हैं। हीरा-पट्टी के रूप में पहचाने जाने वाले रायपुर जिले में एक शीर्ष माओवादी नेता की हालिया गिरफ्तारी से इस पर मुहर भी लग जाती है। उनके हित केवल जंगल तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि खनन और औद्योगिक इलाकों तक हैं। सरगुजा जिले के सिरीडीह और मानिपत इलाकों के बॉक्साइट समृद्घ क्षेत्र में जहां हिंडाल्को और वेदांत की भारत एल्युमीनियम जैसी कंपनियों के संयंत्र हैं, वहां भी उन्होंने अपनी मौजूदगी दिखाई है। छत्तीसगढ़ में उद्योगों के विरोध के अलावा विद्रोहियों ने राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी मार की है। इन हालात में कृषि करना असंभव है। और न ही राज्य अपने वन उत्पादों के लिहाज से लाभान्वित हो पा रहा है। क्षेत्र के लिए भारी बजट खर्च ही नहीं हो पाता। छत्तीसगढ़ सरकार के गृह विभाग का 450 करोड़ रुपये का 30 फीसदी हिस्सा माओवादियों के खिलाफ अभियान पर खर्च हो जाता है।
ये समूह कैसे संचालन करते हैं? पिछले एक दशक से माओवादी आंदोलन की तस्वीर काफी बदली है जहां गठजोड़ और एकीकरण में तेजी आई। छोटे समूहों ने खुद को बड़े समूहों के साथ संबद्घ कर लिया, कार्यकर्ताओं ने विरोधियों का दामन थाम लिया और गुटों की लड़ाई में कई वफादारों को जान गंवानी पड़ी, इसने माओवादियों को यह सोचने पर भी मजबूर कर दिया कि वे साथ मिलकर कैसे अपनी ताकत का बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं।
मगर व्यापक स्तर पर समूहों के बीच बेहतर समन्वय है जो पहले कभी इतना सहज नहीं था। तकरीबन 36 साल बाद ओडिशा-झारखंड सीमा के किसी जंगली इलाके में हुई सीपीआई (माओवादी) की नवीं कांग्रेस में विशेष आर्थिक क्षेत्रों (सेज), जंगल और आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण कर उस पर औद्योगीकरण का विरोध करने का फैसला किया गया। छत्तीसगढ़ में माओवादी पहले ही बस्तर में इस्पात संयंत्र लगाने के लिए टाटा और एस्सार को चेतावनी दे चुके हैं। सूत्रों के अनुसार कांग्रेस में कलिंग नगर, सिंगुर, नंदीग्राम और पोलावरम (आंध्र प्रदेश) में भी विरोध करने का फैसला किया गया। कुछ और खास परियोजनाओं पर उनकी टेढ़ी नजर है, इससे यह चुनौती और भयावह बन जाती है।
माओवादियों को कैसे मात दी जा सकती है-क्या उन्हें दी जानी चाहिए? यह समझना मुश्किल नहीं कि नक्सलवादी वहीं पनपेंगे जहां विकास और लोकतंत्र का नामोनिशां नहीं होगा। उनका तर्क है कि उनके संसाधनों से ही आर्थिक तेजी आई है और वे उसके लाभ से वंचित रह गए। अलगाववाद से निपटने में व्यापक अनुभव रखने वाले ब्रिगेडियर बसंत पंवार सैन्य तर्क के साथ कहते हैं, 'आप सैन्य तरीके से नक्सलवादियों को मात दे सकते हैं। आखिरकार वे क्या करते हैं-वे खनन के लिए राष्ट्रीय खनिज विकास निगम के गोदाम में रखे विस्फोटक लूटते हैं, पुलिस चौकियों से राइफल, एलएमजी और एके 47 लूटते हैं? लेकिन इन इलाकों में सैन्य दखल के लिए सरकार को इच्छाशक्ति दिखानी होगी। इन इलाकों में ऐसा करना ही होगा-क्योंकि यदि ऐसा नहीं किया जाता तो नक्सलवादी और उभरेंगे।' नक्सल प्रभाव में सरगुजा जिले में किए गए अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज के सर्वेक्षण में इसका जवाब रोजगार सृजन बताया गया है। जो लोग नक्सलवाद से इत्तफाक नहीं रखते उनको संगठित करने के विचार का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यही है कि वे नक्सली हमलों की भेंट चढ़ जाते हैं। आदिवासी जंगल को अपना घर मानते हैं, फिलहाल उन्हें नक्सली हमलों से बचाने के लिए विशेष शिविरों में रखा जा रहा है। एक बात तो तय है: चाहे कितनी भी पुलिसिया या सैन्य कार्रवाई क्यों न कर ली जाए नक्सलवादी आंदोलन के उभार को नहीं रोका जा सकता। पंवार कहते हैं, 'ऐसा नहीं कि सैन्य चुनौती बड़ी है। असल में हमारी जवाबी कार्रवाई कमजोर है।' साभारः http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=58347

Saturday, December 24, 2011

भ्रष्टाचार की जाति..

सत्येन्द्र प्रताप सिंह

भ्रष्टाचार किसे कहा जाए? ये सवाल हमेशा चुभने वाला होता है. ऐसे में यह और भी सोचनीय हो जाता है, जब दलितों/पिछडों को कही और तेजी से भ्रष्टाचार के मामलों में निशाने पर ले लिया जाता है. शेखर गुप्ता ने बहुत अहम और साहसिक लेख लिखा है, जिसमे उन्होंने क्रीमी लेयर के कथित सवर्णों की जन्मजात मानसिकता को टटोलने की कोशिश की है.

....
साथ ही एक मसला और खड़ा होता है. सांसद का चुनाव लड़ने के लिए एक से तीन करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं, ऐसे में खर्च कहाँ से आए? ज्यादातर एससी/एसटी/ओबीसी को चुनाव जीतने भर को पैसे नहीं होते, लेकिन समीकरण आरक्षण के चलते वो किसी तरह से जगह बना पाते हैं. तमाम राज्यों में वे राजनीति के शिखर पर भी पहुँचने में सफल हुए हैं.
इसी से जुड़ा एक मसला आरक्षण का है. बार बार इस पर सवाल उठते हैं. जो ख़बरें आती हैं, वो बेहद उटपटांग और पूर्वाग्रहों से ग्रसित और सर्वथा अविश्वसनीय. जैसे योग्य एस सी/एस टी प्रत्याशी नहीं मिल रहे. एससी/एसटी/ओबीसी के लोगों ने शून्य अंक पर संस्थान में प्रवेश ले लिए आदि-आदि.. जो हकीकत से परे होती है.
....
एक और समस्या है. मान लीजिए कि कोई मंत्री किसी कारोबारी/व्यक्ति को लाभ पहुंचा देता है. दोनों में लेन-देन का अघोषित समझौता हो जाता है. वही मंत्री कारोबारी का कोई मुकदमा कोर्ट में लड़ता है और उसे बतौर फीस सौ करोड़ रुपये दे दे और वह फीस पर कर भी दे दें. मतलब वैधानिक तरीके से अस्सी करोड़ रुपये कमा लें तो इसका परीक्षण कैसे हो!! वहीँ जब कोई संघर्षशील सांसद चाहे वह एससी/एसटी/ओबीसी हो या सामान्य श्रेणी का, उसे उसके लिए मंत्री बनना ही कठिन है. बन भी गया तो पैसे कमाने का तरीका न जानने के चलते उसका फंसना लाजिमी है!!

हाल ही में सोशल नेटवर्किंग में एक ट्वीट खूब लोकप्रिय हुई. उस पर भी गौर करना जरूरी है. पहले मूल प्रति देखें, फिर इस पर बात करते हैं.

I think we should have job reservations in all the fields. I completely support the PM and all the politicians for promoting this. Let's start the reservation with our cricket team. We should have 10 percent reservation for Muslims. 30 percent for OBC, SC /ST like that. Cricket rules should be modified accordingly. The boundary circle should be reduced for an SC/ST player. The four hit by an OBC player should be considered as a six and a six hit by a OBC player should be counted as 8 runs. An OBC player scoring 60 runs should be declared as a century. We should influence ICC and make rules so that the pace bowlers like Shoaib Akhtar should not bowl fast balls to our OBC player. Bowlers should bowl maximum speed of 80 kilometer per hour to an OBC player. Any delivery above this speed should be made illegal.

Also we should have reservation in Olympics. In the 100 meters race, an OBC player should be given a gold medal if he runs 80 meters.

There can be reservation in Government jobs also. Let's recruit SC/ST and OBC pilots for aircrafts which are carrying the ministers and politicians (that can really help the country.. )

Ensure that only SC/ST and OBC doctors do the operations for the ministers and other politicians. (Another way of saving the country..)

Let's be creative and think of ways and means to guide INDIA forward...

Let's show the world that INDIA is a GREAT country. Let's be proud of being an INDIAN..

अगर यह बयान अजीम प्रेमजी का है तो निहायत बचकाना है. क्या इस सवाल के बदले कारोबारियों ये पूछा जा सकता है कि अगर आपको एक लाख पचहत्तर करोड़ रुपये का स्पेक्ट्रम तीस हजार करोड़ रुपये में नीति बनाकर दे दिया जाता है और कारोबारी उसे बेचकर पैसा कमा लेते हैं और बड़े बन जाते हैं तो इसमें कौन सा बौद्धिक कसरत वे करते हैं. ये स्पेक्ट्रम का मामला नहीं है. हर क्षेत्र में ऐसा होता है और मुनाफे का कोई प्रतिशत नहीं तय होता. फिर ये मान लिया जाए कि अगर एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग के लोग प्रभावी होते हैं और वे किसी दूसरे को इसी तरह से सार्वजनिक संपत्ति सौंपकर बड़ा कारोबारी बना दें तो इसमें कारोबारी बन जाने वाले की क्या योग्यता होगी?? यह तो अघोषित आरक्षण है!!




बहरहाल शेखर गुप्ता का (मेरी ओर से प्रशंसित) लेख
National Interest: The caste of corruption

Shekhar Gupta

Is there a caste or communal link to corruption and crime? Or, are your chances of being involved (and getting caught) in corruption cases higher as you go down the caste ladder? Nobody in his right mind would say yes to either of these. But let’s examine some facts.

Why is there a preponderance of this underclass among those charged with corruption, or even targeted in media sting operations? Here is a roll call: A. Raja and Mayawati (Dalit), Madhu Koda and Shibu Soren (tribal), Lalu Prasad and Mulayam Singh Yadav (OBC), are all caught in corruption or disproportionate assets cases. Faggan Singh Kulaste, Ashok Argal and Mahavir Singh Bhagora, caught in the cash-for-votes sting, are all SC/ST; among the BSP MPs in the cash-for-queries sting, Narendra Kushwaha and Raja Ram Pal (who is now in the Congress) are OBC, and Lalchandra Kol a Dalit. Of course, there are also some illustrious upper-caste representatives in the net: Sukh Ram, Jayalalithaa, Suresh Kalmadi. But there are far fewer of them. Could it be that the upper crust tends to be “cleaner” as a rule, or could it be that the system is loaded against those in the lower half of the social pyramid? The Sachar Committee report on the condition of Muslims also tells us that the only place where our Muslims have numbers disproportionately high in comparison to their population is jails. So, face the question once again: do Muslims tend to be more criminal than Hindus, or is the system loaded against them?

For another example, look at the BJP. Two of its senior leaders were caught on camera accepting cash. One, Dilip Singh Judeo, caught taking Rs 9 lakh, was a mere MP, but of a high caste, and was happily rehabilitated in the party, fielded in the election, and is now back in Parliament. The other, Bangaru Laxman, caught taking just Rs 1 lakh, was ranked much higher in the party; he was, in fact, the president, but much lower on the caste pyramid, a Dalit. He has been banished and isolated and is fighting the charges in that Tehelka sting case by himself. I am sorry to use this expression, but the party treated him as an utter outcast even as it continued to defend Judeo. What is the difference between the two except caste?

You want to take this argument to the judiciary? It has been loosely insinuated by many prominent people, including by some notable members of Team Anna, that a large number of our former chief justices have been corrupt. But who is the only one targeted by name (however unsubstantiated the charges)? It is Justice K.G. Balakrishnan, currently chairman of the National Human Rights Commission and, more importantly, India’s first Dalit chief justice.
The upper caste, creamy layer of our society is the most prejudiced, and yet the most dominant minority in any democracy in the world. That is why even the person representing Mayawati on otherwise brilliant funny-man Cyrus Broacha’s show on CNN-IBN always has a blackened face (Dalits are supposed to be dark-skinned, no?).

An interesting new turn has meanwhile taken place in the discourse over the Lokpal bill. Whenever asked to comment on the UPA’s ploy of reservations, members of Team Anna simply say they are happy to leave that entirely to the government. Leave something entirely to the government? When was the last time you heard Team Anna say that?

They are doing so because the caste card, howsoever cynical, has thrown them entirely off-balance. They are now paying for having built such an unrepresentative upper-crust leadership, deluded perhaps by the belief that this battle was theirs to win on Twitter, Facebook and television channels where their interlocutors were trumpeters or fellow travellers. They forgot that the battle for power and ideas is fought in a democracy’s parliament and within its institutions. They started to believe their own mythology of being apolitical. They did not realise that politics, in a democracy as diverse as ours, needs two essential pre-requisites: ideology and inclusiveness. Abhorrence of corruption is a universal virtue but not an ideology.
It was probably because of that philosophical abhorrence of politics, and the give-and-take, the unending deal-making it involves, that Anna did not set up a truly diverse and representative “Team” to begin with. They had the wisdom and the sincerity, they thought, and Indians, cutting across barriers of caste and religion, would be smart enough to see it. Representative inclusiveness, they probably believed, was part of our cynical electoral politics though that did not stop them from having a Dalit and a Muslim girl help Anna break his fast, making it the first time that a child was described as “Dalit” on a public stage in a mass rally.

Leaders of Team Anna now rightly say that theirs indeed is a political movement. But even if they assert that it is above electoral politics, they have erred gravely in not learning from the political class and building a representative leadership. It could have come from both their abhorrence and ignorance of politics, from a lack of respect for the political class, and an inability to appreciate that you need politics to create a sense of fairness, balance and empowerment in such a diverse society. That is the difference between Anna on the one hand, and Gandhi and JP on the other. Both of the latter made inclusive politics the vehicle of their revolutions. Team Anna, instead, tried to circumvent politics, and now finds itself right in the thick of it.

courtesy: http://www.indianexpress.com/news/national-interest-the-caste-of-corruption/891508/1

Thursday, December 22, 2011

No Walmart Please


Rajindar Sachar

If the combined opposition had sat down for weeks so as to find an issue to embarrass the UPA Government and make it a laughing stock before the whole country, they could not have thought of a better issue than the free gift presented to it initially by the UPA Government by insisting that it had decided irrevocably to allow the entry of multi brand retail leader super stores like Walmart, USA and then within a few days, with a whimper withdrawing the proposal.

As it is even initially this decision defied logic in view of the Punjab and UP elections and further known strong views against it of BJP / left and many states who had all the time opposed the entry of Walmart which would affect the lives of millions in the country.

Retail business in India is estimated to be a 400 billion dollars but the share of the corporate sector is only 5%. There are 50 million retailers in India including hawkers and pavement sellers. This comes to one retailer serving 8 Indians. In China it is 1 for 100 Chinese. Food is 63% of the retail trade, according to the information given out even by FICCI.

The claim by the Government that Walmart intrusion will not result in the closure of small retailers is a deliberate mis-statement. IOWA State University study in USA has shown that in the first decade after Walmart arrived in IOWA the state lost 555 grocery stores, 298 hardware stores, 293 building supply stores, 161 variety stores, 158 women apparels stores and 153 shoe stores, 116 drug stores and 111 men and boys apparels stores. Why would it be different in India with lesser capacity for resilience by the small traders.

The fact is that during 15 years of Walmart entering the market, 31 super market chains sought bankruptcy in 15 years. Of the 1.6 million employees of Walmart only 1.2% makes a living above the poverty level. The Bureau of Labour Statistics, USA is on record with its conclusion that Walmart’s prices are not lower than anyone else when compared to a typical families’ weekly purchases.

In Thailand supermarkets led to 14% reduction in the share of ‘mom and pop’ stores within four years of FDI permission. In India, 33-60 percent of the traditional fruit and vegetable retailers reported 15-30 percent decline in footfalls, 10-30 percent decline in sales and 20-30 percent decline in incomes across cities of Bangalore, Ahmedabad and Chandigarh, the largest impact being in Bangalore, which is one of the most supermarket-penetrated cities in India.

The average size of the Walmart stores in the United States is about 10,800 sq. feet employing only 225 people. In that view is not the Government’s claim of increase in employment a canard.

Governments attempt to soften the blow by emphasizing that Walmart is being allowed only 51% in investment upto US$ 100 million. Prima facie the argument may seem attractive. But is Walmart management so stupid that when its present turn over of retails is 400 Billion Dollars it would settle for such small gain. No, obviously, Walmart is proceeding on a maxim of the camel being allowed to put its head inside a tent and the occupant finding thereafter that he is being driven out of it by the camel occupying the whole of the tent space. One may substitute Walmart to the camel in order to understand the danger to our millions of retailers.

The tongue in the cheek arguments by the Government that allowing Walmart to set up its business in India would lead to fall in prices and increase in employment is unproven. A 2004 Report of a Committee of US House of Representatives concluded that “Walmart’s success has meant downward pressures on wages and benefits, rampant violations of basic workers’ rights and threats to the standard of living in communities across the country.” By what logic does the Government say that in India the effect will be the opposite The only explanation could be that it is a deliberate mis-statement to help the multinationals.

Similar anti consumer effects have happened by the working of another Super Market enterprise namely Tesco of Britain.

A study carried out by Sunday Times shows that Tesco has almost total control of the food market of 108 of Britain’s coastal areas i.e. 7.4% of the country. The Super Markets like Walmart and Tesco have a compulsion to move from the territory from England and USA because their markets are saturated and they are looking for countries with larger population and low super market presence according to David Hogues, Professor of Agri Business at the Centre for Food Chain Research at Imperial Collage, London, because they have got nowhere else to go and their home markets are already full. Similarly a Professor of Michigan State University has pointed out that retail revolution causes serious risks for developing country farmers who traditionally supply to the local street market.

In Thailand, Tesco the foreign owned super market controls more than half the Thai market. Though Tesco when it moved into Thailand promised to employ local people but it is openly being accused of unfair trading practices and conflict with local businesses. As for the claim that these super market dealers will buy local products is belied because in a case filed against Tesco in July 2002 the Court found them charging slotting fees to carry manufacturers products, charging entry fee of suppliers. In Bangkok, Grocery Stores’ sales declined by more than half since Tesco opened a store only four years earlier.

In Malaysia seeing the damage done by the super market Tesco since January 2004 a freeze on the building of any new super markets was imposed in three major cities and this when Tesco had only gone to Malaysia in 2002.

It is worth noting that 92% of everything Walmart sells comes from Chinese owned companies. Indian market is already flooded with Chinese goods which are capturing the Indian market with cheap goods and traders are already crying foul because of the deplorable labour practices adopted by China. Can in all fairness, Indian Government still persist in keeping retail market open to foreign enterprises and thus endangering the earnings and occupation of millions of our countrymen and women.

Monday, October 3, 2011

कहीं और है भ्रष्टाचार का मुहाना..


(आज पी. साईनाथ का बहुत ही बेहतरीन लेख पढ़ने को मिला. ये सवाल हर एक सोचने वाले के दिमाग में हलचल मचाते रहे हैं, जिसे साईनाथ ने करीने से सजाया है. मेरे मन में एक और विचार आता है कि अगर किसी का वेतन चालीस हजार रुपये महीने हैं, और उसे रोज इस डर में जीना हो कि कब नौकरी चली जाए, साथ ही अगर उसे दो कमरे का फ़्लैट दे दिया जाए, जिसके लिए उसे बीस हजार रुपये महीने की ईएमआई अगले बीस साल तक चुकाना हो... तो उससे ईमानदारी की उम्मीद कैसे की जाए! क्या ये पूरी व्यवस्था ही बेईमानी और भ्रष्टाचार की ओर नहीं ले जाती? ग्रामीण पत्रकारिता और किसानो की दुर्दशा पर कलम चलाने वाले पी. साईनाथ का ये धारदार लेख - सत्येन्द्र)


पी. साईनाथ

मनमोहनॉमिक्स के करीब 20 साल पूरे हो रहे हैं, अतः उस कोरस को याद करना बहुत वाजिब होगा, जिसका राग मुखर वर्ग पहले तो खूब गर्व से और फिर खुद को दिलासा देने के लिए अलापता रहा हैः 'आप चाहे जो भी कहें, हमारे पास डॉ मनमोहन सिंह के रूप में सबसे ईमानदार आदमी हैं. उनके खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला जा सकता'. लेकिन ऐसा अब कम सुनने को मिलता है - ऐसे उद्गार अब ईमानदारी का झंडा बुलंद करनेवाले दूसरे चालबाजों की स्तुति में ज्यादा व्यक्त होते हैं. लेकिन बड़ी तादाद में लोग अब रोज यह कहते फिर रहे हैं : 'ईमानदार प्रधानमंत्री निर्विवाद रूप से हमारे इतिहास में अब तक के सबसे भ्रष्ट सरकार की मुखियागिरी कर रहे हैं.' और निश्चय ही इस कथन में कई सबक छुपे हुए हैं.

डॉ सिंह द्वारा संपादकों के साथ साप्ताहिक मुलाकात का फैसला हमें बताता है कि उन्होंने इन घोटालों से क्या सबक सीखा है. अब उन्हें यह लगने लगा है कि सरकार के लिए भ्रष्टाचार जन संपर्क से जुड़ा एक मामला है. हालांकि कुछ ऐसा ही मीडिया के साथ भी है, जो 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में राजनेताओं पर लगातार भौंकता रहा लेकिन इस घोटाले के आरोपी प्रमुख कॉरपोरेट्‌स को बरी कर दिया. डॉ सिंह अक्सर मीडिया को 'अभियोक्ता, अभियोजक और न्यायाधीश' तीनों ही रूपों में एक साथ देखते हैं. (हो सकता है वो इस मामले में सही हों). इसके बावजूद वो प्रमुख संपादकों के साथ बैठकी लगाना चाहते हैं. तो क्या यह जन संपर्क से जुड़ा मामला भर है? या वह यह मानते हैं कि भारत के संपादकों के पास ही ऐसा कोई नुस्खा है, जो सभी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार (मीडिया के भ्रष्टाचार को छोड़कर) समाप्त कर देगा? मुझे पहले की उम्मीद है.

उनकी सरकार के घोटालों का हिसाब-किताब रखना जनगणना करने की कवायद जैसा है. एक बड़ी और जटिल गणना की तरह. कुछ ऐसे घोटाले हुए जिन्हें दफन कर दिया गया और लेकिन कुछ अभी भी ठंडे नही हुए हैं. आने वाले दिनों में और घोटालों का खुलासा होने वाला है. कुछ का पता चल चुका है, बस भंडाफोड़ बाकी है. साथ ही कई ऐसे हैं जिनपर मीडिया जान-बूझकर चुप्पी बरत रहा है. बहुतेरे के बारे में तथ्य जुटाये जा रहे हैं. हमारा वर्तमान केंद्रीय कैबिनेट संभवतः अब तक का सबसे धनवान मंत्रिमंडल है, जिनके सदस्यों के पास 500 करोड़ रुपयों से अधिक की संपत्ति है. पहले के सभी पूर्ववर्ती मंत्रिमंडल सदस्यों की कुल संपत्ति को जोड़ दें तो भी यह ज्यादा ही होगा.

जाहिर है भ्रष्टाचार के कई कारण हैं और हर किसी के पास इससे जुड़ी अपनी-अपनी पसंदीदा कहानी है. लेकिन तीन ऐसे मूल कारण हैं जिन्हें नजरअंदाज करने से कोई भी विश्लेषण निरर्थक रहेगा. पहला कारण है : भारतीय समाज की संरचनात्मक असमानताएं, जिसमें संपत्ति और सत्ता का बड़े पैमाने पर संकेंद्रण, वर्ग और जाति, लिंग और इनसे जुड़े दूसरे भेदभाव शामिल हैं.

दूसरा पहलू आर्थिक नीतियों का पूरा ढांचा है जिसने इन असमानताओं की खाई पैदा की एवं उसे और ज्यादा गहरा किया है, साथ ही इन्हें एक किस्म की वैधता भी प्रदान की है. पिछले 20 वर्षों में ऐसा तेजी से घटित हुआ है. उदाहरण के तौर पर हम देख सकते हैं कि संविधान का मजाक उड़ाते हुए कॉरपोरेटों को नागरिकों से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया गया है.

और तीसरा पहलू है न्यूनतम जवाबदेही के साथ हरेक तरह का अपराध कर बचने और स्वेच्छाचारिता की संस्कृति का पैर जमाना. ऐसा होना रसूखवालों को अपराध कर बच निकलने का कोई-न-कोई रास्ता निकाल ही देता है. हद तो यह है कि एक राज्य का कोई जज सिर्फ इस कारण कार्यदिवसों पर सभी तरह की विरोध रैलियों पर रोक लगा देता है क्योंकि उसकी कार कोर्ट जाते वक्त एक रैली में फंस गयी थी. ऐसे निजाम में भांति-भांति के बाबा उस समय तक हरेक कर कानून को तोड़ सकते हैं जब तक कि वे सत्तारूढ़ शासन को चुनौती नहीं देते.

भ्रष्टाचार की गंगोत्री का मुहाना बंद किये बगैर, उससे निपटने की कोशिशें कुछ वैसी ही होंगी कि हम नल खुला छोड़ दें, उससे पानी भी बहता रहे और फर्श को सूखा रखने की कोशिशों में भी लगे रहें. ये स्रोत बहुत पुराने हैं. आज इन स्रोतों का दायरा, आकार और नुकसान नई-नई हदें तय कर रहे हैं.

बीते 20 वर्ष धन के अभूतपूर्व संकेंद्रण के साक्षी रहे हैं, इस धन को अक्सर गलत तरीके से आर्थिक नीति की आड़ में इकट्‌ठा किया गया है. राज्य की भूमिका कॉरपोरेट समृद्धि लाने वाले एक उपकरण मात्र की रह गयी है. वह निजी निवेश के लिए उचित माहौल उपलब्ध कराने भर के लिए रह गया है. प्रत्येक बजट कॉरपोरेट जगत के लिए (और आंशिक रूप से उसके द्वारा भी) तैयार किया जाता है. पिछले छह बजट में सिर्फ प्रत्यक्ष कॉरपोरेट आय कर, सीमा और उत्पाद शुल्क में छूट के रूप में कॉरपोरेट जगत को 21 लाख करोड़ रुपयों का उपहार दिया गया है. और इसी अवधि में खाद्य सब्सिडी और कृषि क्षेत्र को कटौती का सामना करना पड़ा है.
नव-उदारवादी आर्थिक ढांचे के अंतर्गत राज्य आम लोगों की कीमत पर कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए खाद-पानी मुहैया करता है. यही कारण है कि हम उस दौर में जी रहे हैं जहां सब कुछ का निजीकरण किया जा रहा है. कॉरपोरेट मुनाफे को और बढ़ाने के लिए जमीन, पानी, स्पेक्ट्रम जैसे सभी दुर्लभ राष्ट्रीय संसाधनों को निजी हाथों में सौंप देना अब राज्य का मिशन बन गया है. यह प्रक्रिया और कुछ नहीं निजी क्षेत्र को उन्हीं को तरजीह देने वाले शर्तों के आधार पर राष्ट्र के संसाधनों को सौंपना है जो कि हमारे समय में भ्रष्टाचार का मुख्य स्रोत है. घोटाले तो लक्षण मात्र हैं, रोग यह है कि भारतीय राज्य, नागरिकों की जगह कॉरपोरेट निगमों के हित साधता है.

चुनाव खर्च के बारे में चिंता करनेवालों को दूसरी चीजों पर भी ध्यान देना चाहिए. आज एक ऐसा वर्ग पैदा ले चुका है जिसके पास खर्च करने के लिए बहुत अधिक पैसा है, काली कमाई है. वो इतना पैसा उड़ाते हैं, जिसकी कल्पना तक 1947 में संभव नहीं थी. कई राज्यों में, आप करोड़पति हुए बिना चुनाव लड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकते.

इस साल मई में चार राज्यों, एक केंद्र शासित प्रदेश (और कडप्पा उपचुनाव) में निर्वाचित 825 विधायकों का उदाहरण लें. उनकी घोषित संपत्तियां देखें. हमें इन चुनावों से संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराने के लिए नेशनल इलेक्शन वाच (एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म -एडीआर) का शुक्रगुजार होना चाहिए. इन आंकड़ों का विश्लेषण करना एक मज़ेदार काम है.

एडीआर के आंकड़े बताते हैं कि इन 825 विधायकों की घोषित संपत्ति का कुल मूल्य 2,128 करोड़ रुपयों के आसपास है. इनमें से 231 दूसरी बार विधायक बने हैं. 2006 से 2011 के बीच इन्होंने अपनी संपत्ति में 169 प्रतिशत की औसत वृद्धि की है. इसका मतलब यह है कि विधायक बनने के पहले इन्होंने जितनी संपत्ति अर्जित की थी, उससे भी अधिक 'वैध' संपत्ति इन्होंने बतौर विधायक अपने पहले पांच साल के दौरान इकट्‌ठी कर ली.

अब 825 भूमिहीन श्रमिक परिवारों के बारे में सोचें. हम उनकी 'संपत्ति' की तुलना विधायकों की संपत्ति से नहीं कर सकते क्योंकि इन भूमिहीन श्रमिक परिवारों के पास कुछ नहीं है और वो लगातार कर्ज में डूब रहे हैं. इसका हिसाब लगाना बहुत ही दिलचस्प होगा कि मनरेगा जैसी योजना के सहारे कमाते हुए उन्हें 825 विधायकों के बराबर संपत्ति बनाने में कितना वक्त लगेगा?

मनरेगा में मिलने वाले 100 दिन के काम के जरिये वो राष्ट्रीय औसत पर 12 हजार 6 सौ रुपये के आस-पास कमा सकते हैं. इस तरह 825 भूमिहीन परिवारों को 2128 करोड़ रुपये अर्जित करने में 2,000 साल से अधिक लगेंगे. और साथ ही इसके लिए उन्हें भोजन जैसी तुच्छ आदतें छोड़नी पड़ेंगी. अगर श्रमिक परिवारों की संख्या 10 हजार कर दी जाये तो इस जैकपॉट को पाने में 170 साल के करीब का समय लगेगा. यहां तक कि दस लाख घरों को भी ऐसा करने में एक साल से अधिक का ही समय लग जाएगा. (याद रखें कि उन 231 विधायकों ने 60 महीने में अपनी संपत्ति दोगुनी से भी अधिक कर ली.)

इन गहरी असमानताओं के बीच ऐसी कोई संभावना ही नहीं दिखाई देती कि मजदूर परिवारों के पास भी कभी किसी भी तरह की संपत्ति होगी, 2,128 करोड़ रुपयों का तो जिक्र करना ही बेकार है. वे कर्ज के बोझ तले दबे रहेंगे. और वे इन कर्जों के एवज में जो सूद भेरेंगे वो शायद उन विधायकों की तिजोरी में भी जमा होगा जो साहूकार भी हैं. इसके बावजूद उन विधायकों की संपत्ति कॉरपोरेट जगत की उस विशाल संपत्ति की तुलना में मामूली है जो राज्य के सहयोग से जमा की गयी है. एक ओर मनरेगा की कमाई के सहारे दस लाख मजदूर परिवारों को 3.5 लाख करोड़ जमा करने में 275 साल के आसपास लगेंगे और दूसरी ओर पिछले छह साल से लगातार सरकार हर साल इतनी ही राशि कॉरपोरेट सेक्टर को बतौर छूट बांट रही है.

और फिर यहां बस अपराध करने की छूट है, दण्ड का कोई प्रावधान नहीं. डॉ सिंह अपने मंत्रिमंडल में उलटफेर कर सकते हैं, लेकिन क्या इससे बहुत कुछ बदल जाएगा? एक कृषि मंत्री हैं, जो क्रिकेट पर अधिक समय बिताते हैं और राष्ट्रीय जुनून को फूहड़ता के भद्दे, कारोबारी दलदल में बदलने में मददगार रहे हैं. कपड़ा मंत्री इस शासन की लड़खड़ाती दूसरी पारी में मैदान छोड़ने को मजबूर होने वाले सबसे हालिया 'बल्लेबाज' है. एक दूसरे भारी उद्योग मंत्री हैं जो साहूकारों को मदद करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा शर्मिंदा किये जाने के तुरंत बाद ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में पदोन्नत कर दिये गये. अगर उन्हें कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा भी दिया जाता है तो उनका विकल्प युवा होने के बावजूद हालात बदल नहीं पायेगा. ऐसे में क्या यह सिर्फ सुस्त प्रशासन या लचर नियमों से जुड़ा मामला भर है? नहीं, यह भ्रष्ट नीतियों से जुड़ा मामला है.

क्या आप आज के समय में भ्रष्टाचार से लड़ना चाहते हैं? तो आप संरचनात्मक असमानता को ढाहने के लिए कदम बढ़ायें, जो नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों से उपजा रोग और जवाबदेही के बिना स्वेच्छाचारिता की संस्कृति है. क्या हमें एक लोकपाल की जरूरत है? हां. क्या यह सरकार से भी शक्तिशाली हो सकती है? संवैधानिक ढांचे से ऊपर और जवाबदेही के बिना? अगर हम ऐसा ही लोकपाल चाहते हैं तो हम मुसीबत मोल ले रहे हैं. क्या यह असमानता, आर्थिक नीति और स्वेच्छाचारिता पर काबू पा सकता है? नहीं, लोकपाल का वर्तमान स्वरूप ऐसा करने में सक्षम नहीं. यह समग्र रूप से आम लोगों और उनके संस्थानों के लिए एक बड़ी लड़ाई है. जैसा कि एक पुरानी कहावत है, आपके अधिकार उस प्रक्रिया जितने ही सुरक्षित होते हैं, जिसके द्वारा आप अपने अधिकारों को सुरक्षित रखते हैं.

इस समय देश भर में विस्थापन, जबरन भूमि अधिग्रहण, संसाधनों की लूट के खिलाफ और वन व अन्य अधिकारों की बहाली के लिए लड़ाई तेज हो रही है. ये 'स्थानीय' संघर्ष हो सकते हैं, लेकिन वे बड़े पैमाने पर, यहां तक कि वैश्विक फलक पर भ्रष्टाचार को चुनौती देते हैं. वे असमानता और भेदभाव से लड़ रहे हैं. वे खुली छूट, लालच और मुनाफाखोरी का विरोध करते हैं. वे अपने शासकों को जवाबदेह बनाने की कोशिश करते हैं. इरोम शर्मिला जैसे कुछ लोग काले कानूनों की वापसी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. दूसरे कई केवल वन अधिकार कानून जैसे मौजूदा कानूनों को जमीन पर उतारने के लिए सड़क पर उतर चुके हैं. लेकिन इनमें से कोई भी खुद को राष्ट्र से ऊपर नहीं मानता. ये लोग यह घोषित नहीं करते कि वे कानून बनायेंगे जिसका दूसरों को पालन करना ही होगा. न ही इस पर जोर देते हैं कि वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं. फिर भी, वे अपने और हमारे अधिकारों के लिए लड़ते हैं और दमनकारी संरचनाओं को और अधिक जवाबदेह बनाने में मदद करते हैं.
इस मामले में अतीत को थोड़ा भुला दिया जा रहा है. मगर एक भ्रष्ट व कमजोर सरकार और बेशक कांग्रेस पार्टी को सब कुछ अच्छी तरह से पता है. बमुश्किल 36 साल पहले, एक व्यक्ति ने खुद को सभी संवैधानिक संस्थाओं से ऊपर रख लिया था- बिलकुल बेलगाम. यह याद करना वाकई दुखद है कि कितने संगठनों, मध्यमवर्गीय लोगों और यहां तक कि कुछ बुद्धिजीवियों ने उस व्यक्ति और उसके युग के पक्ष में बढ़-चढ़ कर जयकार लगाया था. उस व्यक्ति का नाम था संजय गांधी और उस युग को आपातकाल कहा जाता था.

बाकी सब इतिहास है.

दि हिंदू, 8 जुलाई, 2011 में प्रकाशित
अनुवाद: मनीष शांडिल्य

Wednesday, July 27, 2011

कहां गायब हुआ राग रामदेव

(रामदेव के समर्थन में लोगों ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर खूब धूम मचाई थी। जो कोई रामदेव पर सवाल उठाता था, उसे समर्थक वर्ग के क्रोध का शिकार होना पड़ता था। अब रामदेव की दुर्गति हो रही है और समर्थक नदारद हैं।)
उत्तराखंड पुलिस द्वारा बाबा रामदेव को घेरे में लेने की तैयारी के बीच उनके निकटतम सहयोगी आचार्य बालकृष्ण के हरिद्वार स्थित आवास पर आज पुलिस ने एक नोटिस चस्पा किया है जिसमें उनको कल देहरादून के सीबीआई कार्यालय में उपस्थित होने को कहा गया है।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक केवल खुराना ने आज बताया कि बालकृष्ण के गत सोमवार से लापता होने के बाद से आज तक उनकी कोई जानकारी नहीं मिली हैं। पुलिस उनके लापता होने के मामले की जांच कर रही है। उन्होंने कहा कि सीबाीआई की नोटिस को आज हरिद्वार के दिव्य योग मंदिर आश्रम स्थित आवास के बाहर चिपका दिया गया जिसमें उन्हें आवश्यक पूछताछ के लिए आगामी 28 जुलाई को सीबीआई के देहरादून स्थित कार्यालय में उपस्थित होने को कहा गया है। बालकृष्ण के खिलाफ गत रविवार को सीबीआई द्वारा मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद सोमवार से ही बालकृष्ण लापता हो गए हैं। बालकृष्ण द्वारा कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भारतीय पासपोर्ट हासिल करने के आरोप में सीबीआई ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। खुराना ने बताया कि कांवड मेले के बाद बालकृष्ण की तलाश में तेजी लाई जाएगी।
हरिद्वार के शहर पुलिस अधीक्षक किरन लाल शाह ने 'भाषाÓ को कल बताया था कि बालकृष्ण के गनर गजेन्द्र सिंह आसवाल ने गत सोमवार की रात कनखल थाने में उनके लापता होने की लिखित सूचना दी थी जिसके आधार पर मामला दर्ज कर लिया गया है और जांच की जा रही है। आसवाल की रिपोर्ट के अनुसार गत सोमवार की सुबह आचार्य बालकृष्ण को उनके दिव्य योग आश्रम के आवास पर पहुंचा ताकि वह उनको लेकर पतंजलि योगपीठ के कार्यालय को ले जा सके लेकिन बालकृष्ण ने उससे कार्यालय जाने को कह दिया था।
बालकृष्ण ने कहा था कि वह बाद में कार्यालय पहुंच जाएंगे, लेकिन शाम तक बालकृष्ण अपने कार्यालय नहीं पहुंचे। इसके बाद आसवाल ने उनकी पड़ताल की लेकिन वह नहीं मिले तब जाकर उसने कनखल थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी थी। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट दर्ज किए जाने के बाद से ही पुलिस ने बालकृष्ण का पता करने के लिए जांच शुरू कर दी है। हालांकि, अभी तक उनका कोई पता नहीं चला है। बालकृष्ण अपने पतंजलि योगपीठ में भी नहीं हैं। दूसरी ओर, कनखल थाना सूत्रों ने बताया कि रिपोर्ट दर्ज किए जाने के बाद बालकृष्ण के निजी सचिव से जब पूछताछ की गई तो बताया गया कि वह किसी कार्य से कहीं गए हुए हैं और जल्द ही लौट आएंगे।
दूसरी ओर केन्द्रीय जांच ब्यूरो द्वारा योग गुरू बाबा रामदेव और उनके सहयोगी बालकृष्ण के खिलाफ जांच की प्रक्रिया तेज करने के बाद अब उत्तराखंड पुलिस ने भी बाबा रामदेव को अपने घेरे में लेने की तैयारी शुरू कर दी है। हरिद्वार के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक केवल खुराना ने बताया कि कांवड मेले के बाद जिले में लोागों के गुमशुदगी के मामलों की जांच की जाएगी जिसमें बाबा रामदेव के गुरू शंकरदेव भी शामिल हैं। वह पिछले चार वर्षाें से लापता हैं। खुराना ने कहा कि जिले में लापता हुए लोगों के मामले की जांच का उन्होंने आदेश दिया है और कांवड़ मेले के बाद यह जांच शुरू की जाएगी। खुराना ने कहा कि जिन लापता हुए लोगों की जांच पहले की गई थी उनके मामले की विवेचना की जाएगी। यदि आवश्यकता पड़ी तो उन मामलों की जांच पुलिस की विशेष जांच टीम (एसआईएस) द्वारा कराई जाएगी। इसमें बाबा रामदेव के गुरू के लापता होने का मामला भी शामिल है। शंकरदेव 4 साल पहले अपने हरिद्वार आश्रम से लापता हो गए थे। आरोप लगे थे कि उनके गायब होने के पीछे रामदेव का हाथ था। (देहरादून, 27 जुलाई : भाषा :)

रामदेव की कंपनियों का भविष्य अधर में
शिशिर प्रशांत
देहरादून, 26 जुलाई


रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण पर सीबीआई द्वारा मामला दर्ज कराए जाने के बाद उनकी मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। प्रवर्तन निदेशालय उनके कारोबारी साम्राज्य और उनके ट्रस्ट की जांच में जुटा है।
बालकृष्ण, रामदेव की कुछ कंपनियों के प्रमुख हैं, जिसमें हरिद्वार स्थित 500 करोड़ रुपये का मेगा पतंजलि फूड ऐंड हर्बल पार्क भी शामिल है। पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के उपाध्यक्ष सीएल कमल सहित इसमें कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। उन्होंने इन कंपनियों के भविष्य की विस्तार योजनाओं को टाल दिया है।
सूत्रों ने बताया कि अनिश्चित भविष्य के चलते पतंजलि परिवहन लिमिटेड और पतंजलि हाइड्रोपोनिक्स लिमिटेड जैसी कुछ परियोजनाओं को टाल दिया गया है। कंपनी ने करीब 20-30 नए उत्पाद पेश करने की पहले ही योजना बनाई थी। इसके साथ ही पतंजलि फ्लैक्सीपैक प्राइवेट लिमिटेड और पतंजलि नेचुरल कोलोरोमा प्राइवेट लिमिटेड जैसी अन्य कंपनियों का भविष्य भी अधर में है। कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'रामदेव को लेकर चल रही उथल-पुथल के चलते ये कंपनियां अपेक्षित परिणाम देने में सफल नहीं रही हैं।Ó
सीबीआई ने रविवार को बालकृष्ण के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी का मुकदमा दर्ज कराया है। हरिद्वार के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी केवल खुराना ने कहा कि लापता होने के सभी मामलों की जांच करेगी, जिसमें रामदेव के गुरु शंकरदेव का मामला भी शामिल है। (Business Standard)

Thursday, June 23, 2011

कुछ इस तर्ज पर बढ़ेगी जमीन की लूट..

मैंने बहुत पहले संदेह जताया था कि अगर सत्तर या अस्सी प्रतिशत जमीन कब्ज़ा करने की जिम्मेदारी निजी हाथों को सौंप दी जाए तो लूट और बढ़ जाएगी. असल तो किसान को पता ही नहीं कि कीमत कितनी ली जाए, जिससे रोजी-रोटी आराम से चल जाए. पहले सरकारें अधिग्रहण करती थीं तो पुनर्वास और उस परियोजना में परिवार के एक आदमी को सरकारी नौकरी देती थीं, जिससे कम से कम एक परिवार के ३०-४० साल तक के जीने का सहारा मिल जाता था. अब किसानों के लिए कोई व्यवस्था नहीं है. निजी कम्पनियाँ नौकरी दे भी दें तो कितने दिन का भरोसा होगा? साथ ही अगर निजी क्षेत्र जमीन कब्ज़ा करेगा तो पहले तो वो औने पौने भाव जमीन खरीदेगा, फिर स्थानीय माफिया को जमीन कब्ज़ा करने का जिम्मा दे देगा, और वो उस क्षेत्रीय गुंडे को एक मुश्त रकम दे देगा, सुपारी के रूप में...


टाइम्स ऑफ इंडिया में आई इस खबर ने सरकार की मंशा साफ़ कर दी. मेरा संदेह भी पुख्ता हुआ..


BJP mantri’s son buys farmland for Videocon

Supriya Sharma TNN


Janjgir-Champa (Chhattisgarh): Over the past few months, a “lal batti gaadi” has been spotted frequently in the narrow lanes of Gaud village, carrying Sandeep Kanwar, whom villagers identify as “mantri ka beta” (minister’s son). Sandeep is the son of Nankiram Kanwar, Chhattisgarh’s home minister. He is also the chief of BJP’s Anusuchit Janjaati Morcha (Scheduled Tribes Front) in Korba.
But in his latest avatar, Sandeep has

been appointed public relations officer of Videocon group, which is setting up a 1200mw power plant in Gaud and the neighbouring villages of Bhada, Gadapalli, Akaltari and Kewa. Gaud is in Janjgir-
Champa, a small district in central Chhattisgarh, an extended landscape of irrigated plains, all set to become India’s power hub. Thirty-six thermal power plants are coming up here, the largest cluster of power projects anywhere in the country.
The farmland required for these projects is 960 acres, out of which approval for 198 acres was given by the state government last December. But the buying began
much before that and a nexus of corporate and political interests is profiting at the cost of the poor and powerless, with tribal farmers among the worst affected. Sandeep and Videocon are good examples of how the collusion works.
“Sandeep Kanwar comes, holds meetings and tells us we should sell our land to the company,” said Ram Charan, a farmer in Gaud. Since Sandeep travels as an official, often with the local patwari, few see him as representing a private company. Villagers say his constant visits have intimidated several families into selling their land. “Raj ukhar hai (he is in power),” says Mahatma, an old farmer. “His car is marked with phool chhaap (BJP’s lotus symbol).”
Faced with protests, the state industries department was forced to grant a stay to the approval given to Videocon to buy land. And Sandeep acknowledges he has erred.
It is not just that the minister’s son is playing the role of a dubious persuader. He has been buying land to help the company circumvent important safeguards for tribal farmers. With Sandeep as a “front”, the state rehabilitation policy is bypassed.
POWER PLAY
Sandeep Kanwar, son of Chhattisgarh’s home minister Nankiram Kanwar, a tribal, has been acquiring land for Videocon, which is setting up a 1200mw power plant in Gaud and nearby villages
Sandeep, as Videocon PRO, visits villages in a red-beacon car with BJP party symbol, along with the patwari, blurring politicalcorporate lines
On paper the power of attorney is with the Videocon project director for the power plant. Payment is also done by the company
Farmers allege Sandeep used political clout and threats to buy land at low prices
Minister’s son profits as farmers forced to sell cheap According to section 165
(6) of Chhattisgarh’s land revenue code,
tribal land cannot be sold to a non-tribal without the district collector’s permission. Enacted by Madhya Pradesh in 1959, the law seeks to protect vulnerable tribal communities from being dispossessed of their land by powerful groups.
However, over the decades, land agents have perfected a way to get around it: prop up a tribal buyer as a front. He buys small land holdings from several tribals. Once enough land is accumulated, he seeks the collector’s permission to sell it to the actual buyer, keeping a small chunk to satisfy the condition that, as a tribal, he was not left landless.
As the son of Chhattisgarh’s highest ranking tribal minister, Sandeep is the best “front” a company could find. TOI has testimonies of villagers that show Sandeep bought land in their area. Sandeep bought 4.07 acres from Sonuaram; 6.86 acres from Gulab; 0.35 acres from Sukalu; 0.96 from Radhabai – all tribal farmers of Bhada village. Radhabai initially resisted the pressure to sell, till she was promised, “ek parchi mein do naukri (two jobs for one sale deed)”. A widow with two sons, she was taken away at night and kept in a dharamshala for four days. “I was allowed to leave only after I had signed the papers,” she said. Radhabai feels cheated, but since Sandeep is “mantri ka beta”, she dare not complain.
While buying land as a “front” is common practice, in this case it seems even pretences have been done away with. TOI has a copy of a document where Sandeep has signed away the power of attorney to one Vishnu Mulay: “I have been appointed as the PRO of Janjgir project by Videocon Industries. Since I am busy with my duties, I am un
able to buy land. Hence, I appoint Vishnu Mulay, son of Achyut Mulay, as my attorney. He will buy land on my behalf in Gaud, Akaltari, Bhada, Kewa, Gadapalli, etc.”
Mulay is a top Videocon executive and the project director of the Janjgir Champa project. Although the legality of the document could not be confirmed – it’s signed but not registered – it makes for fascinating reading.
“The payment (for the land) will be made by Videocon,” the paper states. When contacted, Sandeep said that as the company PRO, he had simply facilitated the purchase of land. But when told about the documents in TOI’s possession, he accepted he had bought the tribal land directly. “Since the company can’t buy tribal land, I bought it to transfer to the company later,” he said.
The “facilitation” is at the cost of farmers, though. Sonuaram sold his entire land of 4.07 acres to Sandeep for Rs 11,21,000. This works out to less than Rs 3 lakh per acre, against the Rs 8 lakh stipulated as the minimum rate for single crop land under Chhattisgarh’s revised rehabilitation policy of 2010.
Not only was Sonauram cheated of fair price, he also lost all claim to rehabilitation, since he sold his land not to the company but to Sandeep. In effect, he cannot stake
claim to employment or any other benefit in lieu of land, although his land was taken over by the company: one-foot high concrete poles have been dug at the plot corners, painted with VC, for Videocon.
While poor tribal farmers lose out, Sandeep stands to make a neat profit when he resells the same land to the company. The company, in turn, reduces its liabilities and rehabilitation responsibilities.
Asked why he was cheating poor farmers of the right price and rehabilitation, Sandeep responded, “Galti ho gayi (I made a mistake)”.
But Sandeep is not the only “front” the company appears to have used. Records show largescale purchases of non-tribal land by Bodhiram Sahu, and tribal land by Bilam Singh. While Sahu is a minor employee of Videocon, Singh is a resident of Cherpani village in Kawardha district, 200km away. He features on the BPL list, but records show he owns land worth lakhs.
Vishnu Mulay, project director, chose to dissociate the company from Sandeep. “He has bought land in his individual capacity, it has nothing to do with the company,” Mulay said. Asked about the land bought by Bodhiram Sahu, a company employee, Mulay said, “We’re answerable only to the government which will see if we are following its regulations or not.”
Officials confirmed that the company’s public hearing scheduled for April was postponed. In a letter to the district collector on April 1, the industry department placed a stay on the approval given to the company to purchase land in Gaud, Bhada, Gadapalli and nearby villages. Official also confirmed that complaints led to postponement of the project’s public hearing. The industries department has already taken back the “in-principle approval” for land purchase.

Sunday, June 5, 2011

"आदिवासी नेताओं को जिंदा जलते देखती रही पुलिस"

न्यायिक जांच रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि आदिवासी आंदोलन के दौरान यहां से 60 किमी दूर बल्ली गांव में गुस्साई भीड़ ने दो आदिवासी नेताओं को जिंदा जला दिया था और इस पूरे प्रकरण के दौरान वहां मौजूद पुलिस मूकदर्शक बनी रही थी।
गोवा के मुख्य सचिव को गुरूवार की रात को सौंपी गई रिपोर्ट ने पुलिस विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट तैयार करने वाले न्यायाधीश मिहिर वर्धन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 25 मई को आदिवासियों की भीड़ से निबटने के लिए पुलिस काफी नहीं थी लेकिन स्थानीय भीड़ द्वारा दो नेताओं को आग में फेंकने की घटना के दौरान पुलिस अधिकारी मूकदर्शक बने रहे।
बल्ली में सरकारी नौकरियों में आरक्षण सहित कई मांगें कर रहे गांवकर और वेलिप आदिवासियों का प्रदर्शन हिंसक हो गया था और आंदोलनकारियों ने राष्ट्रीय राजमार्ग 17 को रोक दिया था। जवाब में स्थानीय भीड़ ने दो आदिवासी नेताओं मंगेश गांवकर और दिलीप वेलिप को कथित रूप से जिंदा जला दिया।
यूनाइटेड ट्राइबल एसोसिएशन एलाइंस :यूटीएए: ने आरोप लगाया था कि पुलिस की उपस्थिति में उसके दो नेताओं की हत्या की गई। गोवा पुलिस के प्रवक्ता आत्माराम देशपांडे ने हालांकि इस दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया था। न्यायिक जांच में हालांकि कहा गया कि दोनों नेताओं की पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में हत्या की गई। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यूटीएए कार्यकर्ताओं पर हमला एक सुनियोजित साजिश थी। यूटीएए ने यह भी दावा किया था कि पुलिस ने भीड़ पर डंडे चलाए जबकि ए लोग सरकार द्वारा मांगें पूरी होने का आश्वासन मिलने के बाद शांतिपूर्वक वापस जा रहे थे।
न्यायिक जांच में कहा गया कि पुलिस खुफिया विभाग पूरी तरह से नाकाम रहा जिससे अव्यवस्था फैली। वर्धन ने कहा कि चूंकि कोई खुफिया सूचना नहीं थी, पुलिस की उपस्थिति बहुत कम थी। रिपोर्ट में यूटीएए नेताओं की गलतियों पर भी प्रकाश डाला गया और आदिवासी कार्यकर्ताओं पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिसकर्मियों पर हमला करने का आरोप लगाया गया।
(भाषा, पणजी, पांच जून 2011)

Tuesday, May 31, 2011

जमीन लूटने की मुहिम


विश्व बैंक ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि भारत में भूमि की किरायेदारी शुरू होनी चाहिए। इसके अनुसार, भूमि बहुत ही महत्वपूर्ण संसाधन है, किंतु यह ऐसे लोगों (किसानों) के हाथों में केंद्रित है, जो इसका कुशलतापूर्वक उपयोग नहीं करते। विश्व बैंक का कहना है कि इन लोगों को इन संसाधनों से बेदखल कर देना चाहिए और भूमि उन लोगों को सौंप देनी चाहिए जो इसका कुशलता से उपयोग कर सकें और वास्तव में ये लोग कॉरपोरेट क्षेत्र के ही हो सकते हैं।


देविंदर शर्मा
1996 में विश्व बैंक के तत्कालीन उपाध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान सलाहकार समूह के अध्यक्ष डॉ. इस्माइल सेरेगेल्डिन ने एक बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि विश्व बैंक का आकलन है कि अगले बीस वर्षो में भारत में ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों में विस्थापन करने वालों की संख्या फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी की कुल आबादी के दोगुने से भी अधिक हो जाएगी। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की कुल आबादी करीब 20 करोड़ है। इस प्रकार विश्व बैंक का मानना था कि 2015 तक भारत में 40 करोड़ लोग गांवों से शहरों में चले जाएंगे।
मैंने समझा कि यह एक चेतावनी है, किंतु जब मैंने इसके बाद की विश्व बैंक की अन्य रपटों का अध्ययन किया तो मुझे उसके असल इरादों का भान हुआ। दरअसल, विश्व बैंक इस प्रक्रिया को रोकना नहीं, तेज करना चाहता था। 2008 में जारी विश्व विकास रिपोर्ट में विश्व बैंक ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि भारत में भूमि की किरायेदारी शुरू होनी चाहिए। इसके अनुसार, भूमि बहुत ही महत्वपूर्ण संसाधन है, किंतु यह ऐसे लोगों (किसानों) के हाथों में केंद्रित है, जो इसका कुशलतापूर्वक उपयोग नहीं करते। विश्व बैंक का कहना है कि इन लोगों को इन संसाधनों से बेदखल कर देना चाहिए और भूमि उन लोगों को सौंप देनी चाहिए जो इसका कुशलता से उपयोग कर सकें और वास्तव में ये लोग कॉरपोरेट क्षेत्र के ही हो सकते हैं।
किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने की यह प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है और अब अपने चरम पर पहुंच गई है। जिस तेज रफ्तार से सरकार भूमि अधिग्रहण के माध्यम से किसानों को जमीन से बेदखल कर रही है इससे विश्व के सामने खाद्य सुरक्षा का संकट गहराता जा रहा है। दुर्भाग्य से हमें यह समझाने की कोशिश की जाती है कि खाद्य उत्पादन के मोर्चे पर घबराने वाली कोई बात नहीं है, क्योंकि कॉरपोरेट जगत खाद्यान्न का कुशलतापूर्वक उत्पादन कर सकता है। मुख्यत: इसी मंशा से 1995 में विश्व व्यापार संगठन के अस्तित्व में आने के बाद से विकासशील देशों में धनी देशों की ओर से अनुदानित और सस्ती दरों पर खाद्यान्न के आयात की बाढ़ आ गई है।
इसी प्रकार मुक्त व्यापार समझौतों के नाम पर द्विपक्षीय समझौते और क्षेत्रीय व्यापार संधियों के माध्यम से विकासशील देशों में औद्योगिकीय उत्पादित खाद्यान्न और खाद्य उत्पादों के लिए बाजार विकसित किया जा रहा है।
इस प्रकार भूमि और जीविकोपार्जन केंद्रीय मुद्दों में तब्दील हो चुके हैं। ग्रामीण भारत से 40 करोड़ लोगों के संभावित विस्थापन से भारत अब तक विश्व में हुए सबसे बड़े पर्यावरणीय विस्थापन का साक्षी बन जाएगा। यह अवधारणा केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एक बड़ा क्षेत्र इसकी चपेट में आ जाएगा। मेरा अनुमान है कि आने वाले वर्षो में भारत और चीन के 80 करोड़ लोग गांवों से शहरों की ओर कूच कर जाएंगे। जिन करोड़ों लोगों को विस्थापन के लिए मजबूर किया जा रहा है उन्हें कृषि शरणार्थी कहा जा सकता है। क्या हम समझ सकते हैं कि विश्व किस दिशा में जा रहा है? क्या हम अनुमान लगा सकते हैं कि इस भयानक रफ्तार से विस्थापन के कारण कितने गंभीर सामाजिक-आर्थिक और साथ ही राजनीतिक संकट खड़े हो सकते हैं?
इसके बजाय हमें बताया जा रहा है कि बढ़ता शहरीकरण वैश्वीकरण और आर्थिक संवृद्धि का अपरिहार्य परिणाम है। हमें बार-बार बताया जा रहा है कि वैश्वीकरण ने राष्ट्रीय सीमाओं का अंत कर दिया है। यह सुनने में अच्छा लग सकता है, किंतु मुझे लगता है कि आने वाले कुछ बरसों में राष्ट्रों की सीमाएं धुंधली होने के बजाए और गहरी व लंबी हो जाएंगी। विकासशील देशों में जिस रफ्तार से और जिस हद तक भूमि हड़पने का सिलसिला चल रहा है वह चिंता का विषय है। उदाहरण के लिए एक भारतीय कंपनी ने अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में तीन हजार वर्ग किलोमीटर भूमि हासिल कर ली है। यह क्षेत्र बहुत से छोटे देशों के क्षेत्रफल से भी अधिक है। एक दिन इस भूमि के मालिक झंडा फहराकर यह घोषणा कर सकते हैं कि यह एक स्वतंत्र राष्ट्र है। आप इस संभावना को खारिज कर सकते हैं, किंतु हमें अधिक सावधानी से काम लेना होगा। देर-सबेर समाज कृषि, खाद्य सुरक्षा और भूमि संसाधन की सच्चाई से रूबरू होगा। जितना जल्द यह होगा, उतना ही बेहतर होगा।
समस्या यह है कि हम इस तरह के गंभीर मुद्दों पर किसी खास नजरिये और परिप्रेक्ष्य में ही विचार करते हैं, जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि ये मुद्दे बहुआयामी और बहुकोणीय होते हैं। जब तक हम ऐसा करने में सफल नहीं होंगे तब तक हम सही संदर्भ में विशिष्ट विचार प्रस्तुत करने में सफल नहीं होंगे। मैं जिन मंचों पर जाता हूं उनमें यह व्यापक सोच नदारद नजर आती है। शायद यही कारण है कि हम अंतरदृष्टि और सार्थकता के साथ असल मुद्दों से भटक जाते हैं। कृषि-व्यापार से यह प्रतीत होता है कि भारत और चीन जैसे देशों को अन्य देशों में अधिक खाद्य उत्पादन करना चाहिए।
घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारत और चीन द्वारा विदेशों में भूमि की खरीदारी को न्यायोचित ठहराया जा रहा है। अधिक खाद्यान्न उत्पादन की जरूरत के मद्देनजर भारी-भरकम कृषि भूमि की खरीदारी की वकालत की जा रही है। आज लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में शायद ही कोई देश हो जिसकी भूमि न हड़पी जा रही हो। भुखमरी और कुपोषण के शिकार इथियोपिया में आठ हजार से अधिक कंपनियां जमीन हथियाने के प्रयास में हैं। यह देश पहले ही 2000 कंपनियों को 27 लाख हेक्टेयर भूमि आवंटित कर चुका है, जिसमें भारत की कंपनियां भी शामिल हैं। ये कंपनियां इथियोपिया के लिए खाद्यान्न का उत्पादन नहीं करेंगी, बल्कि इसका निर्यात करेंगी। यहां से उत्पादित खाद्यान्न की पहली खेप सऊदी अरब भेजी भी जा चुकी है, जबकि इस देश की जनता दाने-दाने की मोहताज है।
यह मुझे इतिहास के काले अध्याय की याद दिलाता है। कुछ दशक पहले आयरलैंड के अकाल की 150वीं वर्षगांठ के आयोजन में मैंने भाग लिया। यह अकाल 19वीं सदी के मध्य में पड़ा था। सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए शहर के मेयर ने कहा था कि मैं हैरान हूं कि उस समय कितने बर्बर लोग थे। लोग भूख से मर रहे थे और फिर भी खाद्यान्न के बोरे के बोरे इंग्लैंड भेजे जा रहे थे। मुझे नहीं लगता कि समाज की इस बर्बर प्रकृति में कोई अंतर आया है। आने वाले समय में हम और भी बर्बर समाज में रहेंगे। इथियोपिया में जिस तरह भूमि हड़पी जा रही है, यह बर्बरता से कम नहीं है। देश में लोग भूख से मर रहे हैं और कंपनियों के पास खाद्यान्न के निर्यात की कानूनी अनुमति है। भविष्य में ऐसे और भी उदाहरण देखने को मिलेंगे।
(लेखक कृषि एवं खाद्य नीतियों के विश्लेषक हैं)

साभार: http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-06-01&pageno=8#id=111712860472008824_49_2011-06-01