सबकी अपनी अपनी सोच है, विचारों के इन्हीं प्रवाह में जीवन चलता रहता है ... अविरल धारा की तरह...
Showing posts with label समाज. Show all posts
Showing posts with label समाज. Show all posts
Saturday, May 12, 2012
सिर जो झुका रहा है, वह भी है घोंघा बसन्त
(फेसबुक फ्रेंडों के पहले मेरे ब्लॉग फ्रेंड हुआ करते थे, अब भी हैं, लेकिन उधर सक्रियता कम होने की वजह से मामला सुस्त है। अंबेडकर के कार्टून को मुझे बहुत स्पष्ट समझाने में मेरी मदद की मेरे पुराने ब्लॉग फ्रेंड दिनेश राय द्विवेदी ने। अगर आपको भी समझने में कोई दिक्कत हो तो इस लेख से मदद जरूर लें। ऐसा लगता है कि शंकर असल में यही दिखाना चाह रहे थे, कार्टून की बाकी व्याख्याएं अतार्किक और बवाली हैं- जिसमें मेरे भी तमाम तर्क हैं)
दिनेशराय द्विवेदी
घोंघा एक विशेष प्रकार का जंतु है जो अपने जीवन का अधिकांश एक कड़े खोल में बिता देता है। इस के शरीर का अधिकांश हिस्सा सदैव ही खोल में बंद रहता है। जब इसे आहार आदि कार्यों के लिए विचरण करना होता है तो यह शरीर का निचला हिस्सा ही बाहर निकालता है जिस में इस के पाद (पैर) होते हैं और जिन की सहायता से यह चलता है। जैसे ही किसी आसन्न खतरे का आभास होता है यह अपने शरीर को पूरी तरह से खोल में छिपा लेता है। खतरे के पल्ले केवल कड़ा खोल पड़ता है। खतरे की संभावना मात्र से खोल में छिपने की इस की प्रवृत्ति पर अनेक लेखकों ने अपनी कलम चलाई है। इसे आधार बना कर सब से खूबसूरत कहानी महान रूसी कथाकार अंतोन चेखोव की ‘दी मेन इन दी केस’ है जिस के हिन्दी अनुवाद का शीर्षक ही ‘घोंघा’ है। इस कहानी को पढ़ कर मनुष्य की घोंघा प्रवृत्ति का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
खतरे से बचने के लिए कड़े खोल का निर्माण करने और खतरे की आशंका मात्र से खोल में छुप जाने की इस घोंघा प्रवृत्ति को व्यंग्य की धार बनाने का उपयोग साहित्य में अनेक लोगों ने किया है। लेकिन घोंघे की चाल की विशिष्ठता का उपयोग बिरले ही देखा गया है। विभिन्न प्रजाति के स्थलीय घोंघों की चाल नापे जाने पर प्राप्त परिणामों के अनुसार उन की न्यूनतम चाल 0.0028 मील प्रतिसैकंड और अधिकतम चाल 0.013 मील प्रति सैंकंड है। इस अधिकतम चाल से कोई भी घोंघा एक घंटे में 21 मीटर से अधिक दूरी नहीं चल सकता। पिछली सदी के महान भारतीय व्यंग्य चित्रकार केशव शंकर पिल्लई ने घोंघे की चाल का अपने व्यंग्य चित्र में जिस तरह से उपयोग किया उस का कोई सानी नहीं है। इस व्यंग्य चित्र में भारतीय राजनीति की दो महान हस्तियाँ सम्मिलित थीं। इस व्यंग्य चित्र को सामाजिक विज्ञान की पाठ्य पुस्तक में सम्मिलित किए जाने को कुछ लोगों ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और उसे पुस्तक से हटाने की मांग को ले कर संसद में हंगामा खड़ा किया। सरकार इस विवाद के सामने बेदम नजर आई। विभागीय मंत्री जी को खेद व्यक्त करते हुए उस व्यंग्य चित्र को पाठ्यपुस्तक से हटाने की घोषणा करनी पड़ी। भारतीय संसद नित नए प्रहसनों के लिए पहले ही कम ख्यात नहीं है। इस नए प्रहसन ने संसद की छवि में चार चांद और लगा दिए।
इस व्यंग्य चित्र में घोंघे को निर्मित होते हुए संविधान के रूप में दिखाया गया है। संविधान के इस घोंघे पर संविधान सभा के सभापति डा. भीमराव अम्बेडकर सवार हैं और चाबुक चला रहे हैं जिस से घोंघा दौड़ने लगे और शीघ्रता से अपनी मंजिल तय कर सके। घोंघे की इस चाल से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी प्रसन्न नहीं हैं और वे भी चाबुक ले कर घोंघे पर पिले पड़े हैं। सारे भारत की जनता इन दोनों महान नेताओं की इस चाबुकमार पर हँस रही है। इस व्यंग्य चित्र से प्रदर्शित हो रहा है कि दोनों महान नेताओं को संविधान का निर्माण संपन्न होने की इतनी व्यग्रता है कि वे यह भी विस्मृत कर गए कि यह जल��दबाजी में करने का नहीं अपितु तसल्ली से करने का काम है, इसीलिए संविधान को यहाँ घोंघे के रूप में दिखाया गया है। चाहे कितने ही चाबुक बरसाए जाएँ घोंघा तो अपनी चाल से ही चलेगा, उसे दौड़ाया नहीं जा सकता। अब घोंघे को चाबुक मार कर दौड़ाने का प्रयत्न तो एक मूर्खतापूर्ण कृत्य ही कहा जा सकता है। वास्तव में कोई ऐसा करे और उसे देखने वाला उस पर हँसे न तो क्या करे? इस व्यंग्य चित्र में दोनों महान नेताओं के इस कृत्य पर जनता का हँसना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में सामने आया है।
इस व्यंग्य चित्र से न तो डाक्टर भीमराव अंबेडकर की प्रतिष्ठा को कोई आँच पहुँचती है और न ही नेहरू के सम्मान पर। हाँ उन की स्वाभाविक व्यग्रता जनता के सामने हँसी का कारण अवश्य बनती है। यह व्यंग्य चित्र दोनों नेताओं की व्यग्रता को जनता के प्रति उन की प्रतिबद्धता और कर्तव्यनिष्ठता के रूप में प्रदर्शित करता है। मुझे तो लगता है कि यदि किसी पाठ्य पुस्तक में व्यंग्य चित्रों के माध्यम से तत्कालीन राजनीति को समझाने की कोशिश की जाए तो इस व्यंग्य चित्र को अवश्य ही उस में शामिल होना चाहिए। पाठ्यपुस्तक निर्माताओं ने यही किया भी था।
संसद में जब यह प्रश्न उठा तो सरकार को उस का सामना करना चाहिए था और उस मुद्दे पर हंगामा नहीं बहस होनी चाहिए थी। सदन में उपस्थित विद्वान सांसदों को इस मामले की विवेचना को सदन के समक्ष रखना चाहिए था। यदि फिर भी संतुष्टि नहीं होती तो इस मामले को साहित्य और कला के मर्मज्ञों की एक समिति बना कर उस के हवाले करना चाहिए था और उस की समालोचना की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। डा. भीमराव अम्बेडकर को भगवान का दर्जा दे कर अपनी राजनीति भाँजने वाले लोगों का खुद डा. अम्बेडकर से क्या लेना देना? उन का मकसद तो संसद में हंगामे की तलवारें भांज कर वीर कहाना मात्र था। सरकारी पक्ष ने बाँकों के इस प्रहसन को एक गंभीर चुनौती के रूप में स्वीकार करने के स्थान पर उसे अपनी गलती के रूप में स्वीकार करते हुए सीधे सीधे आत्मसमर्पण कर दिया। जैसे जूता मंदिर में प्रवेश नहीं पा सकता, व्यंग्य चित्र का पाठ्य पुस्तक में क्या काम? मंदिर में जूते के प्रवेश नही पा सकने से उस का महत्व कम नहीं हो जाता। अपितु जो व्यक्ति जूते को बाहर छोड़ कर जाता है उसका ध्यान भगवान की प्रार्थना में कम और जूते में अधिक रहता है।
इस घर में पहले भी कम नहीं थे घोंघा बसन्त।
अब जिधर भी देखो नजर आते हैं घोंघा बसन्त।।
चाबुक जो थामे है, वह तो है घोंघा बसन्त।
सिर जो झुका रहा है, वह भी है घोंघा बसन्त।।
http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/dineshraidwivedi/entry/%E0%A4%B8-%E0%A4%B0-%E0%A4%9C-%E0%A4%9D-%E0%A4%95-%E0%A4%B0%E0%A4%B9-%E0%A4%B9-%E0%A4%B5%E0%A4%B9-%E0%A4%AD-%E0%A4%B9-%E0%A4%98-%E0%A4%98-%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A4%A8-%E0%A4%A4
तार्किक है किताब में कार्टून डाला जाना
(अंबेडकर पर छपे एक कार्टून पर 50-70 साल बाद बवाल हो गया। कार्टून किताब में डाला गया, इसलिए। हिमांशु पंड्या ने इस पर एक बहुत धारदार, शानदार और तार्किक लेख लिखा। अगर ऐसी किताबें आएं तो निश्चित रूप से छात्रों की तर्कशक्ति बढ़ेगी और वह शानदार तरीके से सीख सकेंगे।)जिस किताब में छपे कार्टून पर विवाद हो रहा है, उसमें कुल बत्तीस कार्टून हैं। इसके अतिरिक्त दो एनिमेटेड बाल चरित्र भी हैं - उन्नी और मुन्नी। मैं सबसे पहले बड़े ही मशीनी ढंग से इनमें से कुछ कार्टूनों का कच्चा चिट्ठा आपके सामने प्रस्तुत करूँगा, फिर अंत में थोड़ी सी अपनी बात।
# नेहरु पर सबसे ज्यादा (पन्द्रह) कार्टून हैं। ये स्वाभाविक है क्योंकि किताब है : भारत का संविधान : सिद्धांत और व्यवहार। # एक राज्यपालों की नियुक्ति पर है। उसमें नेहरू जी किक मारकर एक नेता को राजभवन में पहुंचा रहे हैं। # एक भाषा विवाद पर है, उसमें राजर्षि टंडन आदि चार नेता एक अहिन्दी भाषी पर बैठे सवारी कर रहे हैं। # एक में संसद साहूकार की तरह बैठी है और नेहरू, प्रसाद, मौलाना आज़ाद, जगजीवन राम, मोरारजी देसाई आदि भिखारी की तरह लाइन लगाकर खड़े हैं। यह विभिन्न मंत्रालयों को धन आवंटित करने की एकमेव ताकत संसद के पास होने पर व्यंग्य है। # एक में वयस्क मताधिकार का हाथी है जिसे दुबले पतले नेहरू खींचने की असफल कोशिश कर रहे हैं। # एक में नोटों की बारिश हो रही है या तूफ़ान सा आ रहा है जिसमें नेहरू, मौलाना आजाद, मोरारजी आदि नेता, एक सरदार बलदेव सिंह, एक अन्य सरदार, एक शायद पन्त एक जगजीवन राम और एक और प्रमुख नेता जो मैं भूल रहा हूँ कौन - तैर रहे हैं। टैगलाइन है - इलेक्शन इन द एयर।
# एक में नेहरू हैरान परेशान म्यूजिक कंडक्टर बने दो ओर गर्दन एक साथ घुमा रहे हैं। एक ओर जन-गण-मन बजा रहे आंबेडकर, मौलाना, पन्त, शायद मेनन, और एक वही चरित्र जो पिछले कार्टून में भी मैं पहचान नहीं पाया, हैं। ये लोग ट्रम्पेट, वायलिन आदि बजा रहे हैं जबकि दूसरी ओर वंदे मातरम गा रहे दक्षिणपंथी समूह के लोग हैं। श्यामाप्रसाद मुखर्जी बजाने वालों की मंडली से खिसककर गाने वालों की मंडली में जा रहे हैं। # एक में चार राजनीतिज्ञ नेहरु, पटेल, प्रसाद और एक और नेता भीमकाय कॉंग्रेस का प्रतिनिधित्त्व करते हुए एक लिलिपुटनुमा विपक्ष को घेरकर खड़े हैं। यह चुनाव और प्रतिनिधित्त्व की दिक्कतें बताने वाले अध्याय में है। # ऊपरवाले कार्टून के ठीक उलट है ये कार्टून जिसमें नेहरु को कुछ भीमकाय पहलवाननुमा लोगों ने घेर रखा है, लग रहा है ये अखाड़ा है और नेहरु गिरे पड़े हैं। घेरे खड़े लोगों के नाम हैं - विशाल आंध्रा, महा गुजरात, संयुक्त कर्नाटक, बृहनमहाराष्ट्र। ये कार्टून नए राज्यों के निर्माण के लिए लगी होड़ के समय का है।
### कवर पर बना कार्टून सबसे तीखा है। आश्चर्य है इससे किसी की भावनाएं आहत क्यों नहीं हुईं। यह आर. के. लक्ष्मण का है। इसमें उनका कॉमन मैन सो रहा है, दीवार पर तस्वीरें टंगी हैं - नेहरु, शास्त्री, मोरारजी, इंदिरा, चरण सिंह, वी.पी.सिंह, चंद्रशेखर, राव, अटल बिहारी और देवैगोडा... और टीवी से आवाजें आ रही हैं - "unity, democracy, secularism, equality, industrial growth, economic progress, trade, foreign collaboration, export increase, ...we have passenger cars, computers, mobile phones, pagers etc... thus there has been spectacular progress... and now we are determined to remove poverty, provide drinking water, shelter, food, schools, hospitals...
कार्टून छोड़िये, इस किताब में उन्नी और मुन्नी जो सवाल पूछते हैं, वे किसी को भी परेशान करने के लिए काफी हैं। वे एकबारगी तो संविधान की संप्रभुता को चुनौती देते तक प्रतीत होते हैं। मसलन, उन्नी का ये सवाल - क्या यह संविधान उधार का था? हम ऐसा संविधान क्यों नहीं बना सके जिसमें कहीं से कुछ भी उधार न लिया गया हो? या ये सवाल (किसकी भावनाएं आहत करेगा आप सोचें) - मुझे समझ में नहीं आता कि खिलाड़ी, कलाकार और वैज्ञानिकों को मनोनीत करने का प्रावधान क्यों है? वे किसका प्रतिनिधित्त्व करते हैं? और क्या वे वास्तव में राज्यसभा की कार्यवाही में कुछ खास योगदान दे पाते हैं? या मुन्नी का ये सवाल देखें - सर्वोच्च न्यायालय को अपने ही फैसले बदलने की इजाज़त क्यों दी गयी है? क्या ऐसा यह मानकर किया गया है कि अदालत से भी चूक हो सकती है? एक जगह सरकार की शक्ति और उस पर अंकुश के प्रावधान पढ़कर उन्नी पूछता है - ओह! तो पहले आप एक राक्षस बनाएँ फिर खुद को उससे बचाने की चिंता करने लगे। मैं तो यही कहूँगा कि फिर इस राक्षस जैसी सरकार को बनाया ही क्यों जाए?
किताब में अनेक असुविधाजनक तथ्य शामिल किये गए हैं। उदाहरणार्थ, किताब में बहुदलीय प्रणाली को समझाते हुए ये आंकड़े सहित उदाहरण दिया गया है कि चौरासी में कॉंग्रेस को अड़तालीस फीसदी मत मिलने के बावजूद अस्सी फीसदी सीटें मिलीं। इनमें से हर सवाल से टकराते हुए किताब उनका तार्किक कारण, ज़रूरत और संगती समझाती है। यानी किताब अपने खिलाफ उठ सकने वाली हर असहमति या आशंका को जगह देना लोकतंत्र का तकाजा मानती है। वह उनसे कतराती नहीं, उन्हें दरी के नीचे छिपाती नहीं, बल्कि बच्चों को उन पर विचार करने और उस आशंका का यथासंभव तार्किक समाधान करने की कोशिश करती है। उदाहरण के लिए जिस कार्टून पर विवाद है, वह संविधान निर्माण में लगने वाली देरी के सन्दर्भ में है। किताब में इस पर पूरे तीन पेज खर्च किये गए हैं, विस्तार से समझाया गया है कि संविधान सभा में सभी वर्गों और विचारधाराओं के लोगों को शामिल किया गया। उनके बीच हर मुद्दे पर गहराई से चर्चा हुई। संविधान सभा की विवेकपूर्ण बहसें हमारे लिए गर्व का विषय हैं, किताब ये बताती है। मानवाधिकार वाले अध्याय में सोमनाथ लाहिड़ी को (चित्र सहित) उद्धृत किया गया है कि अनेक मौलिक अधिकार एक सिपाही के दृष्टिकोण से बनाए गए हैं यानी अधिकार कम हैं, उन पर प्रतिबन्ध ज्यादा हैं। सरदार हुकुम सिंह को (चित्र सहित) उद्धृत करते हुए अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सवाल उठाया गया है। किताब इन सब बहसों को छूती है।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात ये है कि जहाँ देर के कारण गिनाए गए हैं, वहाँ ये रेखांकित किया गया है कि संविधान में केवल एक ही प्रावधान था जो बिना वाद-विवाद सर्वसम्मति से पास हो गया - सार्वभौम मताधिकार। किताब में इस पर टिप्पणी है – “इस सभा की लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा का इससे बढ़िया व्यावहारिक रूप कुछ और नहीं हो सकता था।”
बच्चों को उपदेशों की खुराक नहीं चाहिए, उन्हें सहभागिता की चुनौती चाहिए। उपदेशों का खोखलापन हर बच्चा जानता है। यह और दो हज़ार पांच में बनी अन्य किताबें बच्चों को नियम/ सूत्र/ आंकड़े/ तथ्य रटाना नहीं चाहतीं। प्रसंगवश पाठ्यचर्या दो हज़ार पांच की पृष्ठभूमि में यशपाल कमेटी की रिपोर्ट थी। बच्चे आत्महत्या कर रहे थे, उनका बस्ता भारी होता जा रहा था, पढ़ाई उनके लिए सूचनाओं का भण्डार हो गयी थी, जिसे उन्हें रटना और उगल देना था। ऐसे में इस तरह के कार्टून और सवाल एक नयी बयार लेकर आये। ज्ञान एक अनवरत प्रक्रिया है, यदि ज्ञान कोई पोटली में भरी चीज़ है जिसे बच्चे को सिर्फ ‘पाना’ है तो पिछली पीढ़ी का ज्ञान अगली पीढ़ी की सीमा बन जाएगा। किताब बच्चे को अंतिम सत्य की तरह नहीं मिलनी चाहिये, उसे उससे पार जाने, नए क्षितिज छूने की आकांक्षा मिलनी चाहिए।
किताब अप्रश्नेय नहीं है और न ही कोई महापुरुष। कोई भी - गांधी, नेहरु, अम्बेडकर, मार्क्स... अगर कोई भी असुविधाजनक तथ्य छुपाएंगे तो कल जब वह जानेगा तो इस धोखे को महसूस कर ज़रूर प्रतिपक्षी विचार के साथ जाएगा। उसे सवालों का सामना करना और अपनी समझ/ विवेक से फैसला लेने दीजिए। यह किताब बच्चों को किताब के पार सोचने के लिए लगातार सवाल देती चलती है, उदाहरणार्थ यह सवाल - (क्या आप इससे पहले इस सवाल की कल्पना भी कर सकते थे?) क्या आप मानते हैं कि निम्न परिस्थितियाँ स्वतंत्रता के अधिकार पर प्रतिबंधों की मांग करती हैं? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दें – क* शहर में साम्प्रदायिक दंगों के बाद लोग शान्ति मार्च के लिए एकत्र हुए हैं। ख* दलितों को मंदिर प्रवेश की मनाही है। मंदिर में जबरदस्ती प्रवेश के लिए एक जुलूस का आयोजन किया जा रहा है। ग* सैंकड़ों आदिवासियों ने अपने परम्परागत अस्त्रों तीर-कमान और कुल्हाड़ी के साथ सड़क जाम कर रखा है। वे मांग कर रहे हैं कि एक उद्योग के लिए अधिग्रहीत खाली जमीं उन्हें लौटाई जाए। घ* किसी जाती की पंचायत की बैठक यह तय करने के लिए बुलाई गयी है कि जाती से बाहर विवाह करने के लिए एक नवदंपत्ति को क्या दंड दिया जाए।
अब आखिर में, जिन्हें लगता है कि बच्चे का बचपन बचाए रखना सबसे ज़रूरी है और वो कहीं दूषित न हो जाए, उन्हें छान्दोग्य उपनिषद का रैक्व आख्यान पढ़ना चाहिए। मेरी विनम्र राय में बच्चे को यथार्थ से दूर रखकर हम सामाजिक भेदों से बेपरवाह, मिथकीय राष्ट्रवाद से बज्बजाई, संवादहीनता के टापू पर बैठी आत्मकेंद्रित पीढ़ी ही तैयार करेंगे। तब, कहीं देर न हो जाए।
हिमांशु पंड्या
Thursday, June 24, 2010
एक ही गांव के लोग भाई-बहन होते है...
दिल्ली के वजीरपुर गांव के लोग कह रहे हैं कि एक ही गांव के लोग भाई बहन होते हैं। वे क्या गलत कह रहे हैं? सिर्फ इतना ही नहीं, चाचा-भतीजा, भाई-भाभी, बाबा-दादी, ताऊ, ताई तमाम रिश्ते होते हैं। मैने अपने गांव में देखा है। मुझसे कम उम्र के कितने लोग मेरे चाचा हैं। मैं अपने उम्र के दोगुने उम्र के लोगों का चाचा भी हूं। तमाम लोग, जो मेरे हमउम्र हैं, रिश्ते में मेरे बाबा हैं। मेरी तमाम बुआ हैं। गांव की किसी लड़की का पति अगर गांव में आता है तो वह पूरे गांव का दामाद हो जाता है। उसके बच्चे आते हैं तो सारा गांव उसका मामा-मामी, नाना-नानी हो जाते हैं। हां, ऐसा कोई उदाहरण शायद मैने अपने गांव में नहीं देखा है कि एक ही गांव के लोग पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका हों।
गांव में रिश्तों की एक तासीर होती है। वे शायद शहरी रिश्तों को नहीं समझ पाते कि बगल वाले फ्लैट में रहने वाला व्यक्ति, रिश्ते में उसका क्या लगता है? शायद इसका कारण है कि शहरों में अभी लोग १०-२० या ४०-५० साल से बसे हैं। वे अलग-अलग इलाके से आते हैं। उन्हें बगल वाले के दुख-दर्द से कोई मतलब नहीं होता। अगर बगल के फ्लैट में कोई अकेला है, बीमार है और मरने की कगार पर है तो उसका पड़ोसी ऑफिस जाना ज्यादा जरूरी समझता है। गांव का आदमी अगर आधी रात को बीमार पड़ता है तो गांव में संसाधन, इलाज की सुविधा आदि न होने के बावजूद पूरा गांव एकत्र हो जाता है औऱ उसे अगर १०० किलोमीटर दूर इलाज के लिए ले जाना पड़ता है तो गांव के १० लोग साथ हो लेते हैं। लोगों के पास पैसा नहीं होता है लेकिन गांव में तत्काल १०-२० हजार रुपये इकट्ठा हो जाता है। दिल्ली में ज्यादातर लोग लखपति हैं, लेकिन यहां १०-२० प्रतिशत आबादी भूखे पेट सो जाती है। गांव में सभी लोग आधा पेट भोजन करते हैं, और भूख से तभी मरते हैं जब पूरा गांव भूख से मरने की कगार पर पहुंचने को होता है।
यह होती है रिश्तों की तासीर। यह होता है गांव और शहर के रिश्तों में फर्क, जो मैने महसूस किया है।
गांव में रिश्तों की एक तासीर होती है। वे शायद शहरी रिश्तों को नहीं समझ पाते कि बगल वाले फ्लैट में रहने वाला व्यक्ति, रिश्ते में उसका क्या लगता है? शायद इसका कारण है कि शहरों में अभी लोग १०-२० या ४०-५० साल से बसे हैं। वे अलग-अलग इलाके से आते हैं। उन्हें बगल वाले के दुख-दर्द से कोई मतलब नहीं होता। अगर बगल के फ्लैट में कोई अकेला है, बीमार है और मरने की कगार पर है तो उसका पड़ोसी ऑफिस जाना ज्यादा जरूरी समझता है। गांव का आदमी अगर आधी रात को बीमार पड़ता है तो गांव में संसाधन, इलाज की सुविधा आदि न होने के बावजूद पूरा गांव एकत्र हो जाता है औऱ उसे अगर १०० किलोमीटर दूर इलाज के लिए ले जाना पड़ता है तो गांव के १० लोग साथ हो लेते हैं। लोगों के पास पैसा नहीं होता है लेकिन गांव में तत्काल १०-२० हजार रुपये इकट्ठा हो जाता है। दिल्ली में ज्यादातर लोग लखपति हैं, लेकिन यहां १०-२० प्रतिशत आबादी भूखे पेट सो जाती है। गांव में सभी लोग आधा पेट भोजन करते हैं, और भूख से तभी मरते हैं जब पूरा गांव भूख से मरने की कगार पर पहुंचने को होता है।
यह होती है रिश्तों की तासीर। यह होता है गांव और शहर के रिश्तों में फर्क, जो मैने महसूस किया है।
Monday, May 10, 2010
ऑनर किलिंग की निकलती हवा
आप नज़ीर देख सकते हैं। भारत में मीडिया एक हवा चलाती है और यह किस तरह से आंधी में बदलती है। एक प्रिंस कुएं में गिरता है, फिर तमाम प्रिंस गिरते जाते हैं। चलिए उसमें तो कोई दो राय नहीं, बच्चा पाइप में फंसा होता है। लेकिन इस ऑनर किलिंग जैसी घटना का क्या करें, जिसमें परिवार तबाह हो रहे हैं और जांच का नतीजा भी उल्टा-पुल्टा आ रहा है।
पहला उदाहरण लेते हैं सबसे सनसनीखेज मामले का। मुजफ्फरपुर से खबर आती है कि ऑनर किलिंग में प्रेमी-प्रेमिका को मार दिया गया। लड़की के भाई ने कैमरे पर स्वीकार कर लिया कि उसने अपनी बहन और उसके प्रेमी को मार डाला। लाश भी बरामद हो गई। लड़की का बाप इतने सदमें में था कि उसने जहर खा लिया। बाद में प्रेमी जोड़ा प्रकट हो गया- यानी लाश को धत्ता बताते हुए फिर जी उठा। फिर पुलिस ने गिरफ्तार बच्चे को धमकाया कि लाश किसकी थी तो उसने शायद कह दिया कि अपने दोस्त को मार डाला। बहरहाल- लड़की का पूरा परिवार तबाह हो गया। मीडिया और पुलिस ने इस तबाही में अहम भूमिका निभाई। सचमुच परिस्थितजन्य साक्ष्य यही कह रहे थे कि लड़की के भाई ने प्रेमी-प्रेमिका को काट डाला था?- ८ मई
दूसरी घटना- मेरठ में एक लड़की छत से गिर गई। लड़की के पिता का यह कसूर था कि वह पुलिस वाला है। इससे उसका रसूख भी जुड़ गया कि उसके डर से कोई सामने नहीं आ रहा है। जुड़ गई प्यार की कहानी। कहा गया कि लड़की प्यार करती थी, जिसके चलते इंस्पेक्टर बाप ने उसे छत से धकेल दिया। कहानी कुछ ऐसी चली कि पूरा परिवार तबाह है। लड़की होश में आने के बाद कह रही है कि उसके पिता ने उसे छत से नहीं धकेला था। हां- इतना जरूर हुआ कि लड़की और उसके परिवार के साथ बदनामी लंबे समय के लिए जुड़ गई।- ९ मई 2०१०
तीसरी घटना- कौशांबी के खलीलाबाद गांव में एक बाप ने अपनी बेटी को काट डाला। इस मामले में भी लड़की के पिता ने स्वीकार कर लिया कि उसने ही अपनी बेटी को मार डाला है। उसने मारने का तरीका भी बताया। उस मामले के आगे बढ़ने की उम्मीद कम ही है, क्योंकि टीवी चैनलों से बातचीत करने वाले पिता को देखने से लग रहा था कि वह गरीब है। उसकी शक्ल देखकर तो निश्चित रूप से लगता है कि उसे सजा मिल जाएगी। ९ मई, २०१०
चौथी घटना- मामला है निरुपमा पाठक का। इसमें ऑनर किलिंग के साथ परंपरावादी हिंदू परिवार, हिंदू धर्म, सेक्स, गर्भ और लिव इन रिलेशन जैसे आधुनिक और पुरातनपंथी मसाले लगे हैं, जिससे मीडिया और तमाम अधिकारवादी झंडावरदारों के पास ढेरों मसाले हैं। शुरू में जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई उससे और परिस्थितजन्य साक्ष्यों से लगा कि लड़की के परिवार वालों ने ऑनर किलिंग कर डाली। लड़की की मां गिरफ्तार हो गई। बाद में पता चलता है कि पोस्टमार्टम में झोल है। एम्स के डॉक्टरों ने कह दिया कि जांच परिणामों से इसे आत्महत्या होने से इनकार नहीं किया जा सकता। -३० अप्रैल, २०१०
अब पुलिस आत्महत्या मानकर भी घटना की छानबीन में आगे बढ़ रही है। लड़की के प्रेमी से भी पूछताछ हुई। दिल्ली के आंदोलनकारियों ने मान लिया कि अब अन्याय हो रहा है। जब तक लड़की के परिवारवाले फंस रहे थे, तब तक तो दिल्ली में न्याय की दिशा ठीक मानी जा रही थी, लेकिन जैसे ही शक की सुई प्रेमी की ओर घूमी, सीबीआई की मांग उठ गई। ढेर सारे सवाल उठे कि सब कुछ मैनेज कर जांच को गलत दिशा में ले जाया जा रहा है। पुलिस भी शायद ठोस नतीजे पर न पहुंच पाए कि आखिर हुआ क्या? बहरहाल, उम्मीद यही लगती है कि अंत में मामले को आत्महत्या मान लिया जाए। हां- यह अलग है कि लड़की के घर पर मरने की वजह और परिस्थितजन्य साक्ष्यों से माता-पिता और कुछ अन्य कथित साक्ष्यों से प्रेमी दोषी लगता है। लड़की ने अगर आत्महत्या की है तो दोनों इसके लिए जिम्मेदार हैं।
पंद्रह दिन के भीतर हुई इन घटनाओं ने पंद्रह हजार सवाल उठा दिए हैं। पहले, दूसरे और तीसरे मामले में लड़की के परिवार वाले तबाह हुए हैं। पहली घटना को देखते हुए पुलिस की भूमिका स्पष्ट होती है कि वे मामले को किस तरह निपटाते हैं और अपने सिर से बवाल हटा देते हैं। आखिरी घटना में अब तक तो लड़की के परिवार वाले तबाह हुए हैं और अब लड़के की दुर्दशा हो रही है जो सुनने में आ रहा है कि अपने परिवार का एकमात्र कमाऊ पूत है। अगर इस तरह के मामलों में तथ्यों का पता नहीं लगाया जाता है और बेवजह लोगों का परिवार तबाह होता है तो निश्चित रूप से मीडिया ट्रायल करने वालों और जांच करने वालों की जबाबदेही बनती है।
पहला उदाहरण लेते हैं सबसे सनसनीखेज मामले का। मुजफ्फरपुर से खबर आती है कि ऑनर किलिंग में प्रेमी-प्रेमिका को मार दिया गया। लड़की के भाई ने कैमरे पर स्वीकार कर लिया कि उसने अपनी बहन और उसके प्रेमी को मार डाला। लाश भी बरामद हो गई। लड़की का बाप इतने सदमें में था कि उसने जहर खा लिया। बाद में प्रेमी जोड़ा प्रकट हो गया- यानी लाश को धत्ता बताते हुए फिर जी उठा। फिर पुलिस ने गिरफ्तार बच्चे को धमकाया कि लाश किसकी थी तो उसने शायद कह दिया कि अपने दोस्त को मार डाला। बहरहाल- लड़की का पूरा परिवार तबाह हो गया। मीडिया और पुलिस ने इस तबाही में अहम भूमिका निभाई। सचमुच परिस्थितजन्य साक्ष्य यही कह रहे थे कि लड़की के भाई ने प्रेमी-प्रेमिका को काट डाला था?- ८ मई
दूसरी घटना- मेरठ में एक लड़की छत से गिर गई। लड़की के पिता का यह कसूर था कि वह पुलिस वाला है। इससे उसका रसूख भी जुड़ गया कि उसके डर से कोई सामने नहीं आ रहा है। जुड़ गई प्यार की कहानी। कहा गया कि लड़की प्यार करती थी, जिसके चलते इंस्पेक्टर बाप ने उसे छत से धकेल दिया। कहानी कुछ ऐसी चली कि पूरा परिवार तबाह है। लड़की होश में आने के बाद कह रही है कि उसके पिता ने उसे छत से नहीं धकेला था। हां- इतना जरूर हुआ कि लड़की और उसके परिवार के साथ बदनामी लंबे समय के लिए जुड़ गई।- ९ मई 2०१०
तीसरी घटना- कौशांबी के खलीलाबाद गांव में एक बाप ने अपनी बेटी को काट डाला। इस मामले में भी लड़की के पिता ने स्वीकार कर लिया कि उसने ही अपनी बेटी को मार डाला है। उसने मारने का तरीका भी बताया। उस मामले के आगे बढ़ने की उम्मीद कम ही है, क्योंकि टीवी चैनलों से बातचीत करने वाले पिता को देखने से लग रहा था कि वह गरीब है। उसकी शक्ल देखकर तो निश्चित रूप से लगता है कि उसे सजा मिल जाएगी। ९ मई, २०१०
चौथी घटना- मामला है निरुपमा पाठक का। इसमें ऑनर किलिंग के साथ परंपरावादी हिंदू परिवार, हिंदू धर्म, सेक्स, गर्भ और लिव इन रिलेशन जैसे आधुनिक और पुरातनपंथी मसाले लगे हैं, जिससे मीडिया और तमाम अधिकारवादी झंडावरदारों के पास ढेरों मसाले हैं। शुरू में जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई उससे और परिस्थितजन्य साक्ष्यों से लगा कि लड़की के परिवार वालों ने ऑनर किलिंग कर डाली। लड़की की मां गिरफ्तार हो गई। बाद में पता चलता है कि पोस्टमार्टम में झोल है। एम्स के डॉक्टरों ने कह दिया कि जांच परिणामों से इसे आत्महत्या होने से इनकार नहीं किया जा सकता। -३० अप्रैल, २०१०
अब पुलिस आत्महत्या मानकर भी घटना की छानबीन में आगे बढ़ रही है। लड़की के प्रेमी से भी पूछताछ हुई। दिल्ली के आंदोलनकारियों ने मान लिया कि अब अन्याय हो रहा है। जब तक लड़की के परिवारवाले फंस रहे थे, तब तक तो दिल्ली में न्याय की दिशा ठीक मानी जा रही थी, लेकिन जैसे ही शक की सुई प्रेमी की ओर घूमी, सीबीआई की मांग उठ गई। ढेर सारे सवाल उठे कि सब कुछ मैनेज कर जांच को गलत दिशा में ले जाया जा रहा है। पुलिस भी शायद ठोस नतीजे पर न पहुंच पाए कि आखिर हुआ क्या? बहरहाल, उम्मीद यही लगती है कि अंत में मामले को आत्महत्या मान लिया जाए। हां- यह अलग है कि लड़की के घर पर मरने की वजह और परिस्थितजन्य साक्ष्यों से माता-पिता और कुछ अन्य कथित साक्ष्यों से प्रेमी दोषी लगता है। लड़की ने अगर आत्महत्या की है तो दोनों इसके लिए जिम्मेदार हैं।
पंद्रह दिन के भीतर हुई इन घटनाओं ने पंद्रह हजार सवाल उठा दिए हैं। पहले, दूसरे और तीसरे मामले में लड़की के परिवार वाले तबाह हुए हैं। पहली घटना को देखते हुए पुलिस की भूमिका स्पष्ट होती है कि वे मामले को किस तरह निपटाते हैं और अपने सिर से बवाल हटा देते हैं। आखिरी घटना में अब तक तो लड़की के परिवार वाले तबाह हुए हैं और अब लड़के की दुर्दशा हो रही है जो सुनने में आ रहा है कि अपने परिवार का एकमात्र कमाऊ पूत है। अगर इस तरह के मामलों में तथ्यों का पता नहीं लगाया जाता है और बेवजह लोगों का परिवार तबाह होता है तो निश्चित रूप से मीडिया ट्रायल करने वालों और जांच करने वालों की जबाबदेही बनती है।
Subscribe to:
Posts (Atom)
