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Friday, May 16, 2008

विदेशी आईफोन के देसी जादू के लिए रहिए तैयार


सत्यव्रत मिश्र


एप्पल के आईफोन की चर्चा आज कल अपने मुल्क में भी खूब चल रही है। उम्मीद है कि इसके दीवाने इस बार उसे अपने हाथों में थामे ही दीवाली मनाएंगे।
वैसे ऐसा पहली बार नहीं है, जब इस फोन को लेकर इतना हंगामा हो रहा हो। अमेरिका में पिछले साल जब इसके आने की बात चली थी, तब तो इसका लोग-बाग पागल हो गए थे। उन्होंने कई-कई रातें इसे खरीदने के लिए दुकानों के बाहर बिताई थीं।
मशहूर अमेरिकी मैगजीन 'टाइम' ने इसे इनोवेशन ऑफ द ईयर के खिताब से नवाजा था। लेकिन इसमें ऐसा क्या है, जिसकी वजह है से लोगों पर इसका जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है? आखिर है तो यह एक फोन ही। अगर आप भी ऐसा सोच रहे हैं, तो हुजूर आप गलत हैं। अपने दीवानों के लिए यह केवल एक फोन से कहीं बढ़कर है।



कैसे हुई शुरुआत?
आईपॉड की जबर्दस्त कामयाबी के बाद एप्पल द्वारा इसी तरह के फोन को लॉन्च किए जाने की चर्चा तो काफी पहले से चल रही थी, लेकिन काफी दिनों तक कंपनी के बड़े अधिकारियों ने इस मुद्दे पर अपनी जुबान बंद रखी थी।
इसके बारे में पहली बार संकेत 2003 में तब मिले थे, जब एक समारोह में कंपनी के सीईओ स्टीव जॉब्स ने एप्पल का नया पीडीए लॉन्च करने से मना कर दिया। उनका कहना था कि, 'एप्पल पीडीए या टैब्लेट कंप्यूटरों के मार्केट में अपना पैर पसारने को ज्यादा उत्सुक नहीं है। हमें लगता है आने वाले कल में मोबाइल फोन ही कहीं से कोई भी जानकारी जुटाने के लिए अहम मशीनरी के रूप में सामने आएंगे।
वैसे, इस वक्त तो हम आईपॉड और आईटयूंस को ही मजबूत बनाने के लिए काम कर रहे हैं।' फिर सिंतबर, 2005 में मोटोरोला अपना रॉकर ई1 वन मोबाइल फोन लेकर सामने आई, जो आईटयूंस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करने वाला पहला फोन था।
वैसे जॉब्स उस फोन से खुश नहीं थे क्योंकि मोटोरोला ने रॉकर को उस तरह से डिजाइन नहीं किया था, जिस तरह जॉब्स चाहते थे। इसलिए तो सिंतबर 2006 में एप्पल ने रॉकर के लिए सॉफ्टवेयर सपोर्ट देना बंद कर दिया। फिर आया 9 जनवरी, 2007 का वह दिन जब जॉब्स ने मैकवर्ल्ड कनवेंशन में आईफोन को उतारने का ऐलान किया।



जबर्दस्त रिस्पॉन्स
जैसे ही जॉब्स ने इस फोन की घोषणा की थी, लोगों की तो जैसे मन चाही मुराद पूरी हो गई। अमेरिका में तो जैसे तरफ यही चर्चा थी कि आईफोन ऐसा होगा, आईफोन वैसा होगा। इसकी पहली झलक लोगों को देखने को मिली पिछले साल के ऑस्कर पुरस्कार समारोह की लाइव कवरेज के दौरान।
तीन जून, 2007 को एप्पल ने इसे 29 जून को लॉन्च करने की घोषणा की। फिर तो वहां के अखबारों में इसी चर्चा खूब जोर-शोर से होने लगी। जैसे-जैसे यह तारीख करीब आती गई, लोगों के बीच इसका क्रेज भी परवान चढ़ता गया। तब 4जीबी वाले फोन की कीमत 499 डॉलर (करीब 20 हजार रुपये) तय की गई थी, जबकि 8 जीबी वाले फोन की कीमत रखी गई थी 599 डॉलर (करीब 24 हजार रुपये)।
इसे लेने के लिए तो लोगों ने दो-दो रातें तक दुकानों के बाहर सड़क पर बिताईं थीं। एप्पल ने तो कंपनी में एक साल तक काम कर चुके लोगों को यह फोन मुफ्त में दिया था। अमेरिकी अखबारों की मानें तो केवल तीन दिनों में ही ढाई से सात लाख आईफोन बिक चुके थे।



कमाल की हैं खूबियां
इस फोन में तो अनोखे फीचर्स का जैसे अंबार लगा हुआ है। सबसे प्यारा तो इसका डिजाइन है। इस फोन को देखते ही इसे अपनी हाथों में उठा लेने का दिल करता है। इस क्यूट से फोन में आपको मिलेगा 3.5 इंच का एलसीडी कलर डिस्प्ले, वो भी टचस्क्रीन के साथ। यानी अब आपको फोन के बटनों के साथ कुश्ती नहीं लड़नी पड़ेगी।
बस एक छूअन भर से आप अपने फोन को कंट्रोल कर पाएंगे। इस स्क्रीन में एक और कमाल की चीज है, लैंडस्केप ऑरिएंटेशन। इसके जरिये आपका फोन जिस भी कोण में रखा हो, वहां से स्क्रीन सीधा ही नजर आएगा। इस फोन से आप मजे ले पाएंगे दुनिया को दीवाना कर देने वाले आईपॉड का भी। यह फोन अपने आप ही आपके फेवरेट म्यूजिक को अलग-अलग कैटेगरी जैसे सॉन्ग्स, ऑर्टिस्ट, एल्बम और जॉनर्स में बांटकर आपके लिए अच्छी-खासी मीडिया लाइब्रेरी तैयार कर सकता है।
अगर आपको एक गाने से दूसरे पर जाना है, तो आपको ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी। बस हल्के से स्क्रीन के एक खास हिस्से को टच करिए और आप दूसरे गाने को सुन रहे होगें। इसके साथ एक और मजे की बात यह है कि यह फोन गैपलेस प्लेबैक तकनीक का इस्तेमाल करता है। इसका मतलब यह कि अगर एक गाना खत्म हो गया तो दूसरा तुरंत ही बजने लगेगा। यानी एक से दूसरे गाने के लिए आपको जरा सा भी इंतजार नहीं करना पडेग़ा।
इसका इस्तेमाल कर चुके लोगों की मानें तो इसकी आवाज कमाल की है। इसके अलावा, आप चाहें तो इसके दो मेगापिक्सल कैमरा की मदद से खूबसूरत तस्वीरें भी खिंच सकते हैं। फिर अपने दोस्तों को वह तस्वीर भेजने के लिए आप ब्लूटूथ या वाई-फाई का इस्तेमाल कर सकते हैं।
आप चाहें तो इस फोन में आईटयूंस स्टोर से अपने मनपसंद गाने भी खरीद सकते हैं। इस फोन के जरिये आप यूटयूब के मजेदार विडियोज का भी खूब मजा उठा सकते हैं। इसका सफारी वेब ब्राउजर भी कमाल का है। इसमें अगर आपको वेबसाइट का टेस्ट छोटे नजर आएंगे, तो आपको जरूरत होगी सिर्फ स्क्रीन पर दो बार हल्के से छूने की। वहां खुद ब खुद जूम हो जाएगा।



बड़ी खामियां
खूबियां तो इस फोन में कई हैं, लेकिन इसमें कुछ ऐसी खामियां भी हैं जिसे अनदेखा करना नामुमकिन है। इन्हीं खामियां की वजह से तो आलोचक आईफोन की कड़ी आलोचना करते हैं। इसकी सबसे बडी खामी तो यह है कि जिस कंपनी से आप यह फोन खरीदेंगे, उसके सिम के अलावा किसी और कंपनी का सिम इसमें काम ही नहीं करेगा।
इसका सिम लॉक खुलवाने के लिए आपको मोटी रकम चुकानी पड़ सकती है। इसकी बड़ी खामियों में से एक तो इसका काफी वजनी होना है। इसका वजह करीब 135 ग्राम है, जो आज मोबाइल फोनों को देखते हुए काफी ज्यादा है। साथ ही, इसमें कैमरे के साथ फ्लैश भी नहीं है। यानी तस्वीरें लेने के लिए आपको काफी रोशनी की जरूरत पडेग़ी। आईफोन के कैमरे में रोशनी की कमी की वजह से तस्वीरें काफी खराब आती हैं। इसकी बड़ी खामियों में एक यह भी है कि इसके जरिये आप विडियो नहीं रिकॉड कर पाएंगे। कहने को तो इसकी बैटरी आठ घंटों का टॉक टाइम देती है, लेकिन इसका इस्तेमाल कर रहे लोगों की मानें तो यह ज्यादा देर तक नहीं चलती। एक और बड़ी खामी इसके एसएमएस मेन्यु के साथ है।
आप इस फोन में एसएमएसों को अपने अजीजों को फॉरवर्ड नहीं कर पाएंगे। इसमें आप आईपॉड का मजा तो उठा सकते हैं, लेकिन इसके जरिये आप एफएम का लुत्फ नहीं उठा पाएंगे। इसमें रेडियो है ही नहीं। इसमें आप केवल बोलकर किसी का नंबर डाइल करने की सुविधा यानी वॉयस डाइलिंग सेवा का भी इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।
इसकी स्क्रीन है तो काफी जबर्दस्त पर इस पर स्क्रैच भी काफी जल्दी लगाता है। साथ ही, इसमें ब्लूटूथ तो है, लेकिन इसके जरिये गानों के स्टीरियोफोनिक साउंड का लुत्फ नहीं उठा पाएंगे। यह फोन तो 3जी टेक्नोलॉजी से भी लैस नहीं है। इसकी बड़ी खामी इसका काफी महंगा होना भी है।



भारत पर भी चला जादू
अब तो अपने देश पर भी आईफोन का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है। अब तक तो आईफोन अपने देश में ब्लैकमार्केट में ही मिला करते थे। लेकिन इस महीने की शुरुआत में वोडाफोन ने यह कहकर सनसनी मचा दी कि वह इसे भारत में लॉन्च करने के बारे में सोच रही है।
कुछ ही दिनों में यह बात भी साफ हो गई वोडाफोन इसे साल के अंत में दीवाली तक भारतीय बाजार में लॉन्च करने वाली है। कंपनी के सूत्रों के मुताबिक वह इसकी कीमत 24 से 27 हजार रुपये के बीच रख सकती है। वैसे, वह इकलौती कंपनी नहीं है, जो आईफोन को लॉन्च करने की कोशिश कर रही है। एयरटेल ने भी घोषणा की है कि वह भी आईफोन उतारने वाली है।



क्या है एप्पल के इस फोन में


खूबी
3.5 इंच की एलसीडी टच स्क्रीन, जबर्दस्त आवाज, आईपॉड, मन मोह लेने वाला डिजाइन, लैंडस्केप ऑरियंटेशन, गैपलेस प्लेबैक, दो मेगापिक्सल कैमरा, यूटयूब, सफारी वेब ब्राउजर, ब्लूटूथ और वाई-फाई, वेबपेज पर जूम
खामी
नहीं चलेगा किसी और कंपनी का सिम, नहीं है एफएम रेडियो, कम चलती है बैटरी, विडियो रिकॉर्डिंग नहीं, एसएमएस फॉरवर्ड की कमी, काफी भारी, नहीं है फ्लैश, नहीं है 3जी तकनीक, काफी महंगा, जल्दी लगते हैं स्क्रैच, नहीं है वॉयस


साभारः http://www.bshindi.com/

Friday, May 9, 2008

30 साल का हुआ साइबर नटवरलाल


सत्यव्रत मिश्र


अभी हाल में साइबर स्पेस के एक बड़े नाम का 30वां जन्मदिन था। एक ऐसा नाम जिस सुन कई लोगों के पसीने छूट जाते हैं, तो कई लोगों का गुस्से सातवें आसमान को पार कर जाता है।
एक ऐसा कुख्यात नाम जो कई लोगों की जीवन भर की गाढ़ी कमाई लेकर चंपत हो चुका है। हुजूर, साइबर स्पेस के इस मिस्टर नटवरलाल को लोग-बाग को जानते हैं स्पैम के नाम से। जी हां, आपके और हमारे जीवन को मुहाल कर देने वाला स्पैम तीन मई को 30 साल का हो गया।
अपने 30 साल की इस जिंदगी में उसने जितना लोगों को हैरान और परेशान किया है, उतना तो किसी कंप्यूटर वाइरस ने भी आज तक नहीं किया है। जाहिर सी बात है इस बर्थडे के मौके पर आप केक खाने की इच्छा तो नहीं कर सकते।


क्या बला है यह?
स्पैम एक ही तरह के हजारों ईमेल मैसेजों को कहते हैं, जो हजारों लोगों को भेजे जाते हैं। इसके लिए उन लोगों से इस बात की सहमति भी नहीं ली जाती है कि वे लोग इन ईमेलों को रिसीव करना चाहते भी हैं या नहीं। स्पैम का दूसरा नाम है बल्क ईमेल या जंक ईमेल।
कानूनी जुबान में इसे कहते हैं अनसौलिसिटेड बल्क ईमेल्स (यूबीई)। इस हिसाब से किसी ईमेल को स्पैम करार देने के लिए यह जरूरी है कि वह भारी तादाद में भेजे गए हों और उन्हें प्राप्त करने के लिए लोगों ने सहमति नहीं दी हो।


कैसे हुई थी शुरुआत?
पहला स्पैम भेजा गया था तीन मई 1978 को। वह स्पैम भेजा गैरी थीयुरक ने अपरानेट के जरिये। अपरानेट को ही बाद में इंटरनेट के नाम से लोगों ने जाना। हालांकि, उस समय अमेरिका में इस सिस्टम का इस्तेमाल बस शुरू भर हुआ था। तब अपरानेट का इस्तेमाल केवल अमेरिकी सरकार की एजेंसियां, कंपनियां और बड़ी यूनिवर्सिटीज ही किया करती थीं।
इसी अपरानेट पर गैरी भाई साहब ने अपनी कंपनी डिजीटल इलेक्ट्रोनिक्स कॉरपोरेशन द्वारा विकसित किए गए एक नए सिस्टम का विज्ञापन डाल दिया। यह विज्ञापन उन्होंने 10 या 20 नहीं, बल्कि पूरे 350 लोगों को भेजा था। वैसे, तब भी जिन लोगों को यह मैसेज मिला था, उनमें से काफी ज्यादा लोगों ने इस मैसेज का कड़ा विरोध किया था। यानी तब से लेकर अब तक इसके प्रति लोगों का नजरिया ज्यादा नहीं बदला है।


स्पैम के प्रकार
स्पैम कई तरह के होते हैं। लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए स्पैमर तरह-तरह के तरीकों का सहारा लेते रहते हैं। इससे बचने का सबसे असरदार तरीका उनके बारे में जानकारी ही है। अलग-अलग तरह के स्पैमों की लिस्ट यह रही।


419 स्पैम : इसे नाइजीरियाई ईमेल स्कैम के नाम से भी जाना जाता है। यह लोगों से पैसे ठगने का सबसे कुख्यात तरीका है, इसी वजह से तो स्पैमर इसका इस्तेमाल भी धड़ल्ले से करते हैं। अक्सर इस तरह के स्पैम को भेजने वाला खुद नाइजीरिया, जॉर्जिया, उज्बेकिस्तान या ऐसे ही किसी अफ्रीकी, पूर्वी यूरोपीय या सोवियत संघ से अलग हुए किसी मुल्क का ऐसा उच्चाधिकारी बताता है।
स्पैमर अपने शिकार को यह कहकर फांसने की पूरी कोशिश करता है कि आपने एक लॉटरी में लाखों डॉलर की रकम जीती है और प्रोसेसिंग फी के नाम पर आपको एक 'छोटी-सी' रकम चुकानी पड़ेगी। अगर आपने उस ऑफर में रुचि दिखलाई तो वह आपको असली से दिखने वाले नकली कागजात भी भेज देगा। फिर जैसे ही अपने रकम चुकाई, वह इंसान आपके पैसों के साथ गायब हो जाएगा। इससे बचने का इकलौता तरीका यही है कि इस तरह के ईमेलों का जवाब ही नहीं दें।


फिशिंग : इसमें स्पैमर आपको एक ईमेल भेजता है, जिसमें आपको नीचे दिए हाइपरलिंक पर जाकर अपने बैंक अकाउंट नंबर, इंटरनेट पासवर्ड और अकाउंट से संबंधित दूसरी बातों को 'अपडेट', 'वेरीफाई' या 'कन्फर्म' करने के लिए कहा जाता है। जैसे ही आप ऐसा करते हैं, रातोंरात ही आपका बैंक अकाउंट की अच्छी-खासी तरीके से 'सफाई' हो जाती है। इकोई भी बैंक ईमेल के जरिये आपके अकाउंट इन्फॉर्मेशन को अपडेट करने के लिए नहीं कहता। इसलिए इस तरह के ईमेल्स का कतई भी जवाब नहीं दें।


वर्क एट होम स्पैम : इस तरह के स्पैम के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं बेरोजगार नौजवान और शादीशुदा महिलाएं। इसमें स्पैमर लोगों से वादा करता है कम मेहनत और ज्यादा कर्माई का। उनसे यह भी कहा जाता है कि इसके लिए उन्हंा किसी दफ्तर आने की जरूरत नहीं, बल्कि यह काम तो वह घर बैठे बिठाए भी कर सकते हैं। हालांकि, इसमें यह नहीं बताया जाता कि काम खत्म होने के बाद तो स्पैमर यह कहाकर पैसे देने से भी इनकार कर देता है कि काम की क्वालिटी अच्छी नहीं थी।


वाइगरा स्पैम : आजकल तो इस तरह के स्पैम की खूब बारिस हो रही है। कई लोगों के इनबॉक्स तो सस्ते वाइगरा के ऑफर से भरे रहते हैं।


कैसे भेजे जाते हैं ये?
इसके लिए सबसे पहले जरूरत होती है ईमेल एड्रेसेज की। इन ईमेल एड्रेसेज को जुटाने की प्रक्रिया को ईमेल एड्रेस हार्वेस्टिंग के नाम से जाना जाता है। इसके लिए स्पैमर सबसे पहले संभावित ईमेल एड्रेसेज की एक पूरी सूची बना लेते हैं। अक्सर इसके लिए लोगों की सहमति नहीं ली जाती है।
ज्यादा से ज्यादा लोगों तक स्पैम को पहुंचने के लिए आज की तारीख में लाखों और कभी-कभी तो करोड़ों ईमेल एड्रेसेज की लिस्ट बनाई जाती है। फिर स्पैमर इन ईमेल्स को भेजने के लिए ईमेल अकाउंट खोलते हैं और फिर उसके जरिये स्पैम भेजते हैं। अब तो अपनी पहचान छुपाने के लिए स्पैमर प्रॉक्सी सर्वरों का भी सहारा लेने लगे हैं।


जीना किया दूभर
स्पैम्स की वजह से तो इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों का जीना दूभर हो गया है। हर दिन दुनिया भर में 100 अरब स्पैम भेजे जाते हैं। लेकिन डरावनी बात तो यह है कि स्पैम्स के फैलने की रफ्तार तेजी से फैल रही है। आंकड़ों की मानें तो इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों के इनबॉक्स में हर दिन आने वाले ईमेल्स में 80 से 90 फीसदी तो स्पैम होते हैं। इसकी वजह से अकेले अमेरिका को हर साल 21.58 अरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ता है।
पूरी दुनिया को पिछले साल इसकी वजह से 198 अरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा था। आपको बता दें कि सबसे ज्यादा स्पैम भेजे जाते हैं अमेरिका से। अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई की मानें तो साइबर स्पेस में होने वाले कुल गड़बड़ झाले में से 75 फीसदी की वजह यही स्पैम होते हैं।
वैसे, हमारा देश भी इससे खासा परेशान हैं। सरकार के मुताबिक भारत से जाने वाले ईमेल्स में से 76 फीसदी स्पैम होते हैं। इसलिए तो सरकार आईपीसी की धारा 40 को आईटी एक्ट में शामिल करने पर बात कर रही है।

साभारः बिज़नेस स्टैंडर्ड

Saturday, May 3, 2008

अब नेट को मिला वाईमैक्स का साथ



सत्यव्रत मिश्र


जब ब्रॉडबैंड आया था, तो उसे डायल अप कनेक्शन की मुश्किलों से मुक्तिदाता कहा गया था। कुछ हद तक यह बात सच भी थी।
ब्रॉडबैंड ने देश में कछुए की रफ्तार से चल रहे इंटरनेट को खरगोश की स्पीड दिला दी। अब इंटरनेट पर गाने सुनना और वीडियो देखना दूर की कौड़ी नहीं रह गई थी। लेकिन ऐसी बात नहीं थी कि ब्रॉडबैंड में कोई खामी नहीं थी। अक्सर ब्रॉडब्रैंड की तार टूट जाती है। दूरदराज के इलाके में तो यह पहुंच भी नहीं पाता।
साथ ही, यह काफी महंगा पड़ता था। इसलिए लोग-बाग अब इससे भी परेशान हो गए हैं। इन सभी प्रोबल्म्स से परेशान लोगों के लिए राहत का सबब बनकर आया है वाई-मैक्स। अपनी खूबियों की वजह से ही तो वाईमैक्स आज की तारीख में लोगों का फेवरिट बन चुका है।



क्या बला है यह?
वाई मैक्स यानी वर्ल्ड इंटरऑपरोबिलिटी फॉर माइक्रोवेब एक्सेस है नए जमाने की तकनीक। इसके जरिये आप बिना किसी तामझाम के फास्ट स्पीड इंटरनेट का लुत्फ उठा पाएंगे। वाई मैक्स नाम रखने का फैसला किया गया था 2001 में वाई मैक्स फोरम की बैठक में। इस संस्था का कहना है कि,'वाई मैक्स एक ऐसी उच्च गुणवत्ता वाली तकनीक है, जिसके जरिये वायरलेस ब्रॉडबैंड जमीन के आखिरी हिस्से तक पहुंच सकता है।'
विशेषज्ञों का कहना है कि इसके लिए आपको तारों के जंजाल की जरूरत नहीं पड़ती। वैसे, काम करने के अंदाज से यह तकनीक वाई-फाई से काफी जुदा तकनीक है। वाई मैक्स कई किलोमीटर के दायरे में फैले एक बड़े क्षेत्रफल में काम करती है। इसके लिए जरूरत पड़ती है लाइसेंस्ड स्पेक्ट्रम की।
दूसरी तरफ, वाईफाई केवल छोटी दूरी में ही यानी केवल कुछ मीटर के दायरे में काम करती है। इसके लिए किसी प्रकार के लाइसेंस की जरूरत नहीं पड़ती।
साथ ही, वाईमैक्स का इस्तेमाल इंटरनेट को एक्सेस करने के लिए जाता है, जबकि वाईफाई का इस्तेमाल अपने नेटवर्क को एक्सेस करने के लिए होता है।



कैसे काम करता है यह?
आसान शब्दों में कहें तो यह बडे ऌलाके में फैले वाई-फाई नेटवर्क की तरह ही है। लेकिन वाईमैक्स की स्पीड काफी तेज होती है और साथ ही इसकी कवरेज भी ज्यादा बड़े इलाके तक फैली होती है। इस सिस्टम के लिए जरूरत होती है वाईमैक्स टॉवर और वाईमैक्स रिसीवर की। वाईमैक्स टॉवर दिखने में बिल्कुल मोबाइल फोन टॉवर की तरह लगता है। लेकिन वह टॉवर तीन हजार वर्ग मील के इलाके को कवर कर सकता है।
दूसरी तरफ, वाईमैक्स रिसीवर एक सेटटॉप बॉक्स की तरह होता है। अब ये रिसीवर छोटी से कार्ड की शक्ल में भी आ गए हैं, जिसे लैपटॉप के साथ जोड़कर काम किया जाता है। इसके लिए आपको देनी पड़ती है फीस। वैसे, यह फीस ब्रॉडबैंड के इंस्टॉलेशन कॉस्ट से काफी कम होता है।
सबसे पहले वाईमैक्स टॉवर को तारों के सहारे इंटरनेट के साथ जोड़ा जाता है। फिर ये टॉवर सिग्नल ट्रांसमिट करते हैं। जिन्हें पकड़ते हैं आपके घर में लगा हुआ वाईमैक्स रिसीवर। आप कंप्यूटर को उस रिसीवर से जोड़कर मजे में इंटरनेट एक्सेस कर सकते हैं।



क्या हैं इसके फायदे?
साइबर स्पेस के धुरंधरों की मानें तो वाई-मैक्स इंटरनेट की दुनिया में वह चमत्कार कर सकती है, जो सेलफोन ने टेलीफोन की दुनिया में कर दिखाया था। इसका सबसे बड़ा फायदा जो इंटरनेट के धंधे से जुड़े लोग बाग बताते हैं वह यह है कि आप वाईमैक्स के जरिये कहीं से भी अपने लैपटॉप या पॉमटॉप से बड़ी आसानी के साथ इंटरनेट पर काम कर सकते हैं।
इसके लिए आपको तारों के जंजाल की जरूरत नहीं पड़ती। यानी अब आप गांवों और दूर-दराज के इलाकों से भी बड़ी आसानी से एक्सेस कर सकते हैं अपनी ईमेल। यानी ब्रॉडबैंड से अलग यह हर जगह मौजूद रह सकता है। साथ ही, ब्रॉडबैंड से काफी हद तक सस्ता भी है। इसमें डेटा ट्रांसफर की स्पीड भी काफी तेज होती है।इसी वजह से तो विदेशों में कई मोबाइल फोन कंपनियां इसका इस्तेमाल सेल फोन ऑपरेशंस में भी करना चाहती हैं।
मोबाइल फोन कंपनियों की इस तकनीक के प्रति पनपी मोहब्बत एक वजह यह भी है कि वाई मैक्स उपभोक्ताओं और कंपनियों, दोनों के लिए काफी सस्ती पड़ती है। साथ ही, व्यापारिक प्रतिष्ठानों में इसका इस्तेमाल केबल और डीएसएल के साथ-साथ एक इमरजेंसी लाइन की तरह किया जा सकता है।
इंडोनेशिया में सुनामी के दौरान इसने तो लोगों की जान भी बचाने में लोगों की काफी मदद की थी। इसी के जरिये मुसीबत में फंसे कई लोगों ने राहतकर्मियों से संपर्क साधा था। अमेरिका में आए कैटरिना तूफान के दौरान भी इसने कई लोगों की जिंदगियां बचाई थी।



इसमें भी हैं खामियां
वाईमैक्स के साथ एक आम गलतफहमी यह जुड़ी हुई है कि ये 50 किमी के दायरे में 70 मेगाबिट के स्पीड से काम कर सकता है। लेकिन हकीकत तो यही है कि यह दोनों में से कोई एक ही काम कर सकता है। या तो आप इसके 50 किमी के दायरे में इंटरनेट एक्सेस कर सकते हैं या फिर 70 मेगाबिट प्रति सेकंड की रफ्तार से नेट एक्सेस कर सकते हैं।
आप जितना ज्यादा इसके दायरे को बढ़ाते हैं, उतनी ही इसकी स्पीड कम हो जाती है। वैसे, मोबाइल वाईमैक्स के साथ सबसे बड़ी खामी यही है कि सिग्नल कम या ज्यादा होने के साथ-साथ इसमें इंटरनेट की स्पीड भी स्लो या फास्ट होती रहती है। सिग्नल कम जोर होने की सबसे बड़ी वजह कंक्रीट के जंगल। अक्सर जैसे मोबाइल फोन के साथ होता है कि घनी आबादी वाली जगहों पर सिग्नल कमजोर हो जाता है।
उसी तरह वाई मैक्स में भी घनी आबादी वाली जगहों पर सिग्नल कमजोर हो जाता है। दुनिया में वाईमैक्स सेवा मुहैया करवाने वाली कंपनियां अक्सर दावा तो करती है 10मेगाबिट्स प्रति सेकंड के स्पीड की, लेकिन हकीकत में वह दो से तीन मेगाबिट्स से ज्यादा की स्पीड लोगों को मुहैया ही नहीं करवा पाते। भारत जैसे देश में एक और बड़ी दिक्कत है स्पेक्ट्रम की।
देश में अभी हाल ही स्पेक्ट्रम बंटवारो को लेकर काफी हंगामा मचा था। अभी तक उस विवाद का हल नहीं हो पाया है, ऐसी हालत में वाईमैक्स के लिए स्पेक्ट्रम मिलने की उम्मीद काफी कम है।



दुनिया दीवानी
पूरे विश्व में इस वक्त वाईमैक्स की धूम मची हुई है। पूरे अमेरिका में इस लागू करने की तैयारी जोर शोर से चल रही है। वैसे, अभी तक वाईमैक्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल दो एशियाई देश ही कर रहे हैं। वो देश हैं, जापान और दक्षिण कोरिया। जापान में यह सेवा मुहैया करवा रही है केडीडीआई और दक्षिण कोरिया में कोरिया टेलीकॉम। वैसे, ये दोनों नेटवर्क भी पूरे देश में नहीं, बस कुछेक खास-खास इलाकों में ही मौजूद हैं। जापान में केडीडीआई उसे अगले साल से पूरे देश में लागू करेगी।



भारत में भी मची है धूम
अपने वतन में तो वाईमैक्स की खासी धूम मची हुई है। कई कंपनियां या तो वाईमैक्स सेवाएं लॉन्च कर चुकी हैं या फिर करने की जुगत में है। पिछले साल इसे चेन्नई में लॉन्च किया था सिफी ने। अब तो टाटा टेलीसर्विसेज ने अगले साल से इसे देश के 115 शहरों में लॉन्च करने की योजना बनाई है। यह अब तक किसी देश में वाईमैक्स का सबसे बड़ा नेटवर्क होगा।
हाल ही, अनिल अंबानी की रिलांयस कम्यु्निकेशन ने ब्रिटेन की एक वाईमैक्स कंपनी में 90 फीसदी हिस्सेदारी खरीदकर इस क्षेत्र में उतरने की मंशा के बारे में खुले तौर पर इजहार कर दिया है। वैसे, रिलायंस कम्युनिकेशन इस वक्त पुणे और बेंगलुरु में वाईमैक्स की सेवा दे रही है। वहीं, बीएसएनएल ने भी कुछ दिनों पहले इस इलाके में कूदने का इरादा जताया था। सूत्रों की मानें तो एमटीएनएल और भारती ने इस बारे में देखो और इंतजार करो की नीति अपना रखी है।


साभारः बिज़नेस स्टैंडर्ड

Thursday, May 1, 2008

फिशिंग से बचके रहना रे बाबा



सत्यव्रत मिश्र


स्विट्जरलैंड में रहने वाले डॉ। वेणुगोपाल अजंता को कुछ दिनों पहले एक ईमेल आया था। इसमें उनसे उस ईमेल दिए लिंक पर जाकर एचडीएफसी बैंक के अपने इंटरनेट आईडी और पासवर्ड को वेरीफाई करने के लिए कहा गया।
डॉ. अजंता ने जब उस लिंक पर क्लिक किया, तो उनकी बैंक की वेबसाइट से मिलती-जुलती एक साइट खुल गई। उन्हें सब कुछ ठीक-ठाक लगा, इसलिए उन्होंने बिना किसी शक के अपनी आईडी और पासवर्ड डाल दिया और भूल गए। लेकिन उनके होश उस वक्त फाख्ता हो गए, जब उनके अकाउंट से रातोंरात 14 लाख रुपये गायब हो गए।
भाई साहब यह कोई कहानी नहीं, बल्कि सच्ची घटना है। इस मामले में मुंबई पुलिस ने एक आदमी को गिरफ्तार किया है और तीन लोगों की तलाश में है। वैसे, डॉ। अजंता जैसे हजारों लोग साइबर स्पेस में हर रोज इस तरह की धोखाधड़ी के शिकार होते हैं। इस हाईटेक धोखाधडी क़ो कंप्यूटर की भाषा में 'फिशिंग' के नाम से जाना जाता है। इसकी वजह से तो पूरे साइबर स्पेस में कोहराम मचा हुआ है। खासतौर पर बैंकों और ई-शॉपिंग वेबसाइटों की तो इसने नींदें उड़ा रखी है।



क्या बला है 'फिशिंग'?
विशेषज्ञों का कहना है कि 'फिशिंग' में सबसे पहले कंप्यूटर हैकर अपने 'शिकार' के पास एक ईमेल भेजते हैं, जो दिखने में हूबहू बैंक के नोटिस की तरह लगता है। इस ईमेल में आपसे आपकी बैंक अकाउंट के बारे में अहम जानकारियां, जैसे बैंक अकाउंट नंबर, क्रेडिट कार्ड नंबर, इंटरनेट आईडी और पासवर्ड की मांग की जाती है।
कुछ ईमेलों में तो आपको एक लिंक भी रहता है, जिसका ऐड्रैस आपके बैंक के वेबसाइट की ऐड्रैस से मिलता-जुलता होगा। अगर जैसे ही लिंक पर क्लिक करेंगे तो आपके बैंक की वेबसाइट से मिलती-जुलती एक वेबसाइट आपके सामने होगी। इसमें आपको जो भी जानकारी डालेंगे, वो असल में आपका खाता खाली करने की जुगत में लगे इंटरनेट चोरों के पास पहुंच जाएगी। फिर वे जब चाहे और जितना चाहे आपके अकाउंट को खाली कर देंगे।
वैसे, यही इकलौता तरीका नहीं है, जिसके जरिये वह लोगों को बेवकूफ बनाते हैं। कई बार तो वह ईमेल में एक फोन नंबर देकर लोगों को अपना पिन नंबर वेरीफाई करते हैं। जब लोग-बाग उस नंबर पर फोन करते हैं, तो उनसे पिन नंबर डालने के लिए कहा जाता है। एक बार आपने अपना पिन नंबर डाल दिया तो फिर वे आपके अकाउंट को खाली करने के लिए करने में उसका बखूबी इस्तेमाल करते हैं।



कैसे हुई थी शुरुआत
इलेक्ट्रोनिक धोखेधड़ी या 'फिशिंग' की शुरुआत तो 1987 में हो गई थी। वैसे, पहली बार इलेक्ट्रोनिक धोखेधड़ी के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया था अमेरिका में हैकरों की एक मैगजीन में। 1990 के दशक के शुरुआती सालों में इसका इस्तेमाल होता था एओएल पर ईमेल अकाउंट बनाने के लिए।
उस समय ईमेल अकाउंट बनाने के लिए लोगों को पैसे चुकाने पड़ते थे। जब हैकरों ने यह देखा कि इस तरीके से लोगों को बेवकूफ बनाना काफी आसान होता है, तो उन्होंने इसका इस्तेमाल बैंकों से सीधे पैसे निकालने में भी शुरू कर दिया। अमेरिका में तो हर साल 'फिशिंग' की वजह से लोगों को करीब दो अरब डॉलर (8000 करोड़ रुपये) का चूना लगता है।
सिर्फ 2007 में अमेरिकी व्यस्कों के कम से कम 3।2 अरब डॉलर (12,480 करोड़ रुपये) हैकरों ने चुरा लिये। ब्रिटेन में भी इसका कहर खूब बरपा है। वहां 2005 में 'फीशिंग' ने 2.32 करोड़ पॉउन्ड (185.6 करोड़ रुपये) गायब कर लिये। अपने देश में भी इसका कहर खूब बरपा है।



हम भी हैं परेशान
हाल ही में, एंटी वायरस बनाने वाली इंटरनेट सिक्योरिटी फर्म, सिमेंटक ने एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसके मुताबिक भारत के लोग भी तेजी से 'फीशिंग' के शिकार बन रहे हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक 'फीशिंग' के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं देश की वित्तीय राजधानी मुंबई के लोग-बाग। इस साल जितने भी 'फीशिंग वेबसाइट' सामने आए हैं, उसमें से 38 फीसदी मायानगरी से ही ताल्लुक रखते हैं।
दूसरे नंबर पर है दिल्ली, जहां कुल मिलाकर 29 फीसदी 'फीशिंग वेबसाइट' पकड़े गए हैं। वैसे, इस मामले में भोपाल, सूरत, पुणे और नोएडा भी इस मामले में ज्यादा पीछे नहीं हैं। इन शहरों से चलने वाले कई 'फीशिंग वेबसाइट' भी पकड़े गए हैं। इसी कंपनी की एक दूसरी रिपोर्ट की मानें तो सबसे ज्यादा 'फीशिंग' वेबसाइट वाले देशों की सूची में भारत का स्थान 14वां है।
सीआईआई के खुर्शीद डार का कहना है कि, 'पिछले साल तो अपने देश में कुल मिलाकर 392 फिशिंग के मामले सामने आए। इसमें से 24 फीसदी मामले में तो वित्तीय संस्थानों पर सीधा हमला किया गया था। हम इस बारे में एक मई से एक कार्यक्रम शुरू करने वाले हैं, जिसके तहत लोगों को फिशिंग के खतरों के बारे में बताया जाएगा।'



बैंक हैं चुस्त
भारत में इस बैंकों ने भी इस मामले में अपनी कमर कस ली है। आईसीआईसीआई बैंक का कहना है कि, 'हमने अपने उपभोक्ताओं को इस जंजाल से बचाने के लिए अपनी वेबसाइट पर सारी जानकारी डाल दी है। हमारा कोई अधिकारी कभी भी अपने उपभोक्ताओं को फोन करके उनसे उनके पर्सनल डिटेल नहीं मांगता। अगर हमारे उपभोक्ता ऐसे किसी ऐसी वेबसाइट के बारे में बताता है, तो हम तुरंत ही उन्हें ब्लॉक करवा देते हैं।
हमारा आईटी डिपार्टमेंट इस मामले में काफी चुस्त है।' वैसे, बैंक ने यह बताने से साफ इनकार कर दिया कि अब तक उनके कितने कस्टमर इसके शिकार हुए हैं। दूसरी तरफ, पंजाब नैशनल बैंक के जनरल मैनेजर (आईटी) आर. आई. एस. सिद्दू ने बताया कि, 'हमने अपनी वेबसाइट पर एक डू'ज एंड डोंट्स का कॉलम डाल रखा है। इसके जरिये हम अपने ग्राहकों को इस मामले में अप टू डेट रखते हैं।
साथ ही, हम उन्हें समय समय पर टिप्स भी देते रहते हैं, ताकि वे 'फिशिंग' के शिकार न बन पाएं।' वैसे, विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर बैंक तो इस मामले को काफी चुस्त रहते हैं। असल दिक्कत तो ग्राहकों की तरफ से होती है। उनके मुताबिक अब भी कई ग्राहक न्यूमतम सुरक्षा मानकों को भी नहीं अपनाते।



कैसे हो बचाव
इस बारे में विशेषज्ञों का केवल इतना ही कहना है कि सावधान रहें। सिद्दू ने बताया कि, 'इससे केवल सावधान रहकर और अपनी आंखें खोलकर ही लड़ा जा सकता है। हैकर हम लोगों से हमेशा एक कदम आगे की सोचते हैं, इसलिए लोगों को काफी सावधान रहने की जरूरत है।
सबसे बड़ी बात यह है कि देश का कोई भी वित्तीय संस्थान कभी भी लोगों से उनके पासवर्ड या पिन की मांग नहीं करता। इसलिए कभी भी ऐसे ईमेल का जवाब नहीं दें और उसके बारे में अपने बैंक को बताएं। कभी भी अपनी आईडी, पासवर्ड या पिन को कहीं लिखकर न रखें। कोशिश करें, उन्हें याद रखने की।'



साभारः बिज़नेस स्टैंडर्ड