Friday, May 16, 2008

विदेशी आईफोन के देसी जादू के लिए रहिए तैयार


सत्यव्रत मिश्र


एप्पल के आईफोन की चर्चा आज कल अपने मुल्क में भी खूब चल रही है। उम्मीद है कि इसके दीवाने इस बार उसे अपने हाथों में थामे ही दीवाली मनाएंगे।
वैसे ऐसा पहली बार नहीं है, जब इस फोन को लेकर इतना हंगामा हो रहा हो। अमेरिका में पिछले साल जब इसके आने की बात चली थी, तब तो इसका लोग-बाग पागल हो गए थे। उन्होंने कई-कई रातें इसे खरीदने के लिए दुकानों के बाहर बिताई थीं।
मशहूर अमेरिकी मैगजीन 'टाइम' ने इसे इनोवेशन ऑफ द ईयर के खिताब से नवाजा था। लेकिन इसमें ऐसा क्या है, जिसकी वजह है से लोगों पर इसका जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है? आखिर है तो यह एक फोन ही। अगर आप भी ऐसा सोच रहे हैं, तो हुजूर आप गलत हैं। अपने दीवानों के लिए यह केवल एक फोन से कहीं बढ़कर है।



कैसे हुई शुरुआत?
आईपॉड की जबर्दस्त कामयाबी के बाद एप्पल द्वारा इसी तरह के फोन को लॉन्च किए जाने की चर्चा तो काफी पहले से चल रही थी, लेकिन काफी दिनों तक कंपनी के बड़े अधिकारियों ने इस मुद्दे पर अपनी जुबान बंद रखी थी।
इसके बारे में पहली बार संकेत 2003 में तब मिले थे, जब एक समारोह में कंपनी के सीईओ स्टीव जॉब्स ने एप्पल का नया पीडीए लॉन्च करने से मना कर दिया। उनका कहना था कि, 'एप्पल पीडीए या टैब्लेट कंप्यूटरों के मार्केट में अपना पैर पसारने को ज्यादा उत्सुक नहीं है। हमें लगता है आने वाले कल में मोबाइल फोन ही कहीं से कोई भी जानकारी जुटाने के लिए अहम मशीनरी के रूप में सामने आएंगे।
वैसे, इस वक्त तो हम आईपॉड और आईटयूंस को ही मजबूत बनाने के लिए काम कर रहे हैं।' फिर सिंतबर, 2005 में मोटोरोला अपना रॉकर ई1 वन मोबाइल फोन लेकर सामने आई, जो आईटयूंस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करने वाला पहला फोन था।
वैसे जॉब्स उस फोन से खुश नहीं थे क्योंकि मोटोरोला ने रॉकर को उस तरह से डिजाइन नहीं किया था, जिस तरह जॉब्स चाहते थे। इसलिए तो सिंतबर 2006 में एप्पल ने रॉकर के लिए सॉफ्टवेयर सपोर्ट देना बंद कर दिया। फिर आया 9 जनवरी, 2007 का वह दिन जब जॉब्स ने मैकवर्ल्ड कनवेंशन में आईफोन को उतारने का ऐलान किया।



जबर्दस्त रिस्पॉन्स
जैसे ही जॉब्स ने इस फोन की घोषणा की थी, लोगों की तो जैसे मन चाही मुराद पूरी हो गई। अमेरिका में तो जैसे तरफ यही चर्चा थी कि आईफोन ऐसा होगा, आईफोन वैसा होगा। इसकी पहली झलक लोगों को देखने को मिली पिछले साल के ऑस्कर पुरस्कार समारोह की लाइव कवरेज के दौरान।
तीन जून, 2007 को एप्पल ने इसे 29 जून को लॉन्च करने की घोषणा की। फिर तो वहां के अखबारों में इसी चर्चा खूब जोर-शोर से होने लगी। जैसे-जैसे यह तारीख करीब आती गई, लोगों के बीच इसका क्रेज भी परवान चढ़ता गया। तब 4जीबी वाले फोन की कीमत 499 डॉलर (करीब 20 हजार रुपये) तय की गई थी, जबकि 8 जीबी वाले फोन की कीमत रखी गई थी 599 डॉलर (करीब 24 हजार रुपये)।
इसे लेने के लिए तो लोगों ने दो-दो रातें तक दुकानों के बाहर सड़क पर बिताईं थीं। एप्पल ने तो कंपनी में एक साल तक काम कर चुके लोगों को यह फोन मुफ्त में दिया था। अमेरिकी अखबारों की मानें तो केवल तीन दिनों में ही ढाई से सात लाख आईफोन बिक चुके थे।



कमाल की हैं खूबियां
इस फोन में तो अनोखे फीचर्स का जैसे अंबार लगा हुआ है। सबसे प्यारा तो इसका डिजाइन है। इस फोन को देखते ही इसे अपनी हाथों में उठा लेने का दिल करता है। इस क्यूट से फोन में आपको मिलेगा 3.5 इंच का एलसीडी कलर डिस्प्ले, वो भी टचस्क्रीन के साथ। यानी अब आपको फोन के बटनों के साथ कुश्ती नहीं लड़नी पड़ेगी।
बस एक छूअन भर से आप अपने फोन को कंट्रोल कर पाएंगे। इस स्क्रीन में एक और कमाल की चीज है, लैंडस्केप ऑरिएंटेशन। इसके जरिये आपका फोन जिस भी कोण में रखा हो, वहां से स्क्रीन सीधा ही नजर आएगा। इस फोन से आप मजे ले पाएंगे दुनिया को दीवाना कर देने वाले आईपॉड का भी। यह फोन अपने आप ही आपके फेवरेट म्यूजिक को अलग-अलग कैटेगरी जैसे सॉन्ग्स, ऑर्टिस्ट, एल्बम और जॉनर्स में बांटकर आपके लिए अच्छी-खासी मीडिया लाइब्रेरी तैयार कर सकता है।
अगर आपको एक गाने से दूसरे पर जाना है, तो आपको ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी। बस हल्के से स्क्रीन के एक खास हिस्से को टच करिए और आप दूसरे गाने को सुन रहे होगें। इसके साथ एक और मजे की बात यह है कि यह फोन गैपलेस प्लेबैक तकनीक का इस्तेमाल करता है। इसका मतलब यह कि अगर एक गाना खत्म हो गया तो दूसरा तुरंत ही बजने लगेगा। यानी एक से दूसरे गाने के लिए आपको जरा सा भी इंतजार नहीं करना पडेग़ा।
इसका इस्तेमाल कर चुके लोगों की मानें तो इसकी आवाज कमाल की है। इसके अलावा, आप चाहें तो इसके दो मेगापिक्सल कैमरा की मदद से खूबसूरत तस्वीरें भी खिंच सकते हैं। फिर अपने दोस्तों को वह तस्वीर भेजने के लिए आप ब्लूटूथ या वाई-फाई का इस्तेमाल कर सकते हैं।
आप चाहें तो इस फोन में आईटयूंस स्टोर से अपने मनपसंद गाने भी खरीद सकते हैं। इस फोन के जरिये आप यूटयूब के मजेदार विडियोज का भी खूब मजा उठा सकते हैं। इसका सफारी वेब ब्राउजर भी कमाल का है। इसमें अगर आपको वेबसाइट का टेस्ट छोटे नजर आएंगे, तो आपको जरूरत होगी सिर्फ स्क्रीन पर दो बार हल्के से छूने की। वहां खुद ब खुद जूम हो जाएगा।



बड़ी खामियां
खूबियां तो इस फोन में कई हैं, लेकिन इसमें कुछ ऐसी खामियां भी हैं जिसे अनदेखा करना नामुमकिन है। इन्हीं खामियां की वजह से तो आलोचक आईफोन की कड़ी आलोचना करते हैं। इसकी सबसे बडी खामी तो यह है कि जिस कंपनी से आप यह फोन खरीदेंगे, उसके सिम के अलावा किसी और कंपनी का सिम इसमें काम ही नहीं करेगा।
इसका सिम लॉक खुलवाने के लिए आपको मोटी रकम चुकानी पड़ सकती है। इसकी बड़ी खामियों में से एक तो इसका काफी वजनी होना है। इसका वजह करीब 135 ग्राम है, जो आज मोबाइल फोनों को देखते हुए काफी ज्यादा है। साथ ही, इसमें कैमरे के साथ फ्लैश भी नहीं है। यानी तस्वीरें लेने के लिए आपको काफी रोशनी की जरूरत पडेग़ी। आईफोन के कैमरे में रोशनी की कमी की वजह से तस्वीरें काफी खराब आती हैं। इसकी बड़ी खामियों में एक यह भी है कि इसके जरिये आप विडियो नहीं रिकॉड कर पाएंगे। कहने को तो इसकी बैटरी आठ घंटों का टॉक टाइम देती है, लेकिन इसका इस्तेमाल कर रहे लोगों की मानें तो यह ज्यादा देर तक नहीं चलती। एक और बड़ी खामी इसके एसएमएस मेन्यु के साथ है।
आप इस फोन में एसएमएसों को अपने अजीजों को फॉरवर्ड नहीं कर पाएंगे। इसमें आप आईपॉड का मजा तो उठा सकते हैं, लेकिन इसके जरिये आप एफएम का लुत्फ नहीं उठा पाएंगे। इसमें रेडियो है ही नहीं। इसमें आप केवल बोलकर किसी का नंबर डाइल करने की सुविधा यानी वॉयस डाइलिंग सेवा का भी इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।
इसकी स्क्रीन है तो काफी जबर्दस्त पर इस पर स्क्रैच भी काफी जल्दी लगाता है। साथ ही, इसमें ब्लूटूथ तो है, लेकिन इसके जरिये गानों के स्टीरियोफोनिक साउंड का लुत्फ नहीं उठा पाएंगे। यह फोन तो 3जी टेक्नोलॉजी से भी लैस नहीं है। इसकी बड़ी खामी इसका काफी महंगा होना भी है।



भारत पर भी चला जादू
अब तो अपने देश पर भी आईफोन का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है। अब तक तो आईफोन अपने देश में ब्लैकमार्केट में ही मिला करते थे। लेकिन इस महीने की शुरुआत में वोडाफोन ने यह कहकर सनसनी मचा दी कि वह इसे भारत में लॉन्च करने के बारे में सोच रही है।
कुछ ही दिनों में यह बात भी साफ हो गई वोडाफोन इसे साल के अंत में दीवाली तक भारतीय बाजार में लॉन्च करने वाली है। कंपनी के सूत्रों के मुताबिक वह इसकी कीमत 24 से 27 हजार रुपये के बीच रख सकती है। वैसे, वह इकलौती कंपनी नहीं है, जो आईफोन को लॉन्च करने की कोशिश कर रही है। एयरटेल ने भी घोषणा की है कि वह भी आईफोन उतारने वाली है।



क्या है एप्पल के इस फोन में


खूबी
3.5 इंच की एलसीडी टच स्क्रीन, जबर्दस्त आवाज, आईपॉड, मन मोह लेने वाला डिजाइन, लैंडस्केप ऑरियंटेशन, गैपलेस प्लेबैक, दो मेगापिक्सल कैमरा, यूटयूब, सफारी वेब ब्राउजर, ब्लूटूथ और वाई-फाई, वेबपेज पर जूम
खामी
नहीं चलेगा किसी और कंपनी का सिम, नहीं है एफएम रेडियो, कम चलती है बैटरी, विडियो रिकॉर्डिंग नहीं, एसएमएस फॉरवर्ड की कमी, काफी भारी, नहीं है फ्लैश, नहीं है 3जी तकनीक, काफी महंगा, जल्दी लगते हैं स्क्रैच, नहीं है वॉयस


साभारः http://www.bshindi.com/

Wednesday, May 14, 2008

किसानों के दर्द का इलहाम है किसे..



श्रीलता मेनन


महंगाई के आंकड़े अखबारों और टेलिविजन चैनलों की सुर्खियां बनते जा रहे हैं। बढ़ती महंगाई से किसान परिवारों के चेहरों पर रौनक होनी चाहिए, क्योंकि बढ़ती मंहगाई से उन्हें भी अपनी फसल के लिए ऊंची कीमत मिलेगी।
उन्हें इस बात की खुशी होनी चाहिए कि जो अनाज वे उगा रहे हैं, उनके लिए उन्हें बढ़ी हुई दर पर पैसे दिए जाएंगे। पर हकीकत क्या ऐसी ही है, जैसा हम सोच रहे हैं। इस बात की सच्चाई का पता लगाने के लिए बिजनेस स्टैंडर्ड के संवाददाता देश के विभिन्न हिस्सों में गांवों में गए और किसानों से बात की।
जिंस उत्पादों की कीमतों में भले ही तेजी देखने को मिल रही हो, लेकिन इन्हें अपने खेतों में उगाने वाले किसानों को इसका सीधा फायदा नहीं मिल पा रहा है। बाजार में इनकी कीमतें भले ही कितनी भी भाग रही हों, पर किसानों को इन फसलों के एवज में अधिक पैसा नहीं दिया जा रहा है। उदाहरण के लिए दाल जैसे जिंस उत्पादों का आयात रोक दिए जाने के बावजूद इसकी पैदावार के लिए उन्हें बढ़ी दर पर भुगतान नहीं किया जा रहा है।
अगर वर्तमान परिस्थिति को देखें तो कहना गलत नहीं होगा कि महंगाई को रोकने के लिए जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, उनसे किसानों को फायदा मिलने के बजाय उनका नुकसान ही हुआ है। इससे एक सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या सरकार को केवल उपभोक्ताओं की फिक्र है। क्या सरकार को किसानों की चिंता नहीं सता रही। पर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि महंगाई हो या नहीं हो, किसानों के लिए हालात बहुत बदलने की संभावनाएं नहीं दिखती हैं।
किसानों से धान जिस दर पर खरीदा जाता है, वह लगभग उतनी ही होती है जिस दर पर गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों के लिए चावल मिलता है, यानी 6.50 रुपये। तो ऐसे में वह धान की खेती क्यों करे?
दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा चलाने वाले बिहार के बेगूसराय जिले के किसान रूप सिंह कहते हैं: मैं एक एकड़ जमीन पर जो गेहूं उगाता हूं, उसके लिए मुझे प्रति किलो 12 रुपये मिलते हैं। वहीं मुझे 14 रुपये में यहां एक किलो आटा मिल जाता है तो मैं खेती क्यों करूं? यही वजह है कि पैदावार खेती के मौसम में भी रूप सिंह और उनके गांव के कुछ और किसान दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा चलाना ही बेहतर समझते हैं।
सरकार ने अधिकतर अनाजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय कर रखा है। पर दालों और तिलहन की सरकारी खरीद के लिए कोई इंतजाम नहीं है। साथ ही धान की सरकारी खरीद केवल पंजाब और हरियाणा में की जाती है। इसके अलावा यह बात भी खास ध्यान देने योग्य है कि गेहूं (प्रति क्विंटल 1,000 रुपये) को छोड़कर अधिकांश अनाज के लिए एमएसपी इतना कम है कि, इससे बेहतर है कि इन अनाजों के लिए सरकारी खरीद हो ही नहीं।
अब एक सवाल जो जेहन में उठता है वह यह है कि आखिर एमएसपी को इतना कम क्यों रखा गया है। धान जैसी कुछ फसलों के लिए तो पिछले दस सालों में एमएसपी में कुछ ही रुपयों से अधिक की बढ़ोतरी नहीं की गई है। जब सरकार किसानों पर ऋण माफी की घोषणा करती है तो देश में इसे लेकर हो हल्ला मचाया जाता है, पर क्या हमने कभी यह सोचा है कि कृषि को मुनाफे का सौदा बनाने की कोशिश क्यों नहीं की जाती है। किसानों को आखिर इन हालात तक पहुंचने ही क्यों दिया जाता है।
कृषि मंत्रालय के अंतर्गत कृषि लागत एवं कीमत आयोग ने उस समय एक क्रांतिकारी कदम उठाया था जब उसने अपनी नई रिपोर्ट में यह सुझाव पेश किया था कि विभिन्न जिंस उत्पादों के लिए एमएसपी में 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी की जानी चाहिए। हालांकि इसकी एक वजह यह भी थी कि आयोग के अध्यक्ष टी हेक सेवानिवृत्त होने वाले थे और वह पद छोड़ने के पहले कोई साहसिक कदम उठाना चाहते थे।
सरकार ने भले ही आयोग के सुझाव को मानते हुए गेहूं के एमएसपी को प्रति क्विंटल 650 रुपये से बढ़ाकर 1000 रुपये करने का निर्णय कर लिया, पर शेष सुझावों के लिए कैबिनेट की मंजूरी मिलनी बाकी है। इन सुझावों में धान के एमएसपी को 650 रुपये से बढ़ाकर 1,000 रुपये और दालों के एमएसपी को 1,500 रुपये से बढ़ाकर 2,400 रुपये करना शामिल है।
चाहे जो भी हो पर आत्महत्या कर रहे किसानों और जिंस उत्पादों के बढ़ते मूल्य के बावजूद पिछली सरकारों को यह समझ में नहीं आया कि उन्हें एमएसपी को बढ़ाना चाहिए। कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन कहते हैं, 'किसान हमारे सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। अगर उन्हें चुकाई जाने वाली कीमतें सुधर जाती हैं तो बाकी सब कुछ खुद-ब-खुद ठीक हो जाएगा।'
देश में कृषि के बिगड़ते हालात को देखते हुए ही आने वाली पीढ़ी भी इसे रोजगार के अवसर के तौर पर नहीं देख रही है। हरियाणा के झार जिले में ऐसे बच्चे जो कंप्यूटर का पहला अध्याय पढ़ रहे हैं, कहते हैं कि उन्हें अपने अभिभावक के खेतों पर खेती करने का मन नहीं है। 14 साल के एक किशोर को यह कहने में कोई झिझक नहीं होती कि खेती से कोई कमाई नहीं हो सकती। वह कहता है कि यह आय का जरिया नहीं हो सकता है।
उसने कहा कि खेती में इतना खर्च हो जाता है कि वापस मिलने वाली रकम से कोई मुनाफा नहीं हो पाता। पर फिर यही बच्चे यह भी कहते हैं कि गेहूं पर एमएसपी को बढ़ाकर 1,500 रुपये कर दिया जाता है तो उन्हें खेती से कोई गुरेज नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो किसानों को दान (कर्जमाफी) नहीं चाहिए, बस हालात को सुधार कर ऐसा बना दिया जाए कि उन्हें खेती से मुनाफा होने लगे।


साभारः बिजनेस स्टैंडर्ड

Sunday, May 11, 2008

कब करें म्युचुअल फंडों से निकासी


मनीश कुमार मिश्र
अधिकांश निवेशक म्युचुअल फंडों की वास्तविक धारणा से अनभिज्ञ हैं। उनकी मानें तो म्युचुअल फंड में निवेश करने का मतलब है, शेयरों में निवेश करना।
ऐसे निवेशकों को वैसी योजनाएं ज्यादा भाती हैं जिनके एनएवी (शुध्द परिसंपत्ति मूल्य)कम होते हैं या जब किसी योजना पर अधिक लाभांश की घोषणा की जाती है या फिर कोई नया फंड ऑफर आता है। ऐसे निवेशक प्राय: इन बातों से प्रेरित होकर ही अपनी यूनिट भी बेच डालते हैं।
नया फंड ऑफ र आया नहीं कि अपने पुराने निवेश को भुनाकर वे उसमें निवेश करने चले जाते हैं। वे 10 रुपये के मूल्य वाले नए फंड को सस्ता समझते हैं। ऐसा नहीं है कि सारे निवेशक ऐसा अपनी मर्जी से ही करते हों, वितरक भी अपने फायदे के लिए निवेशकों को गुमराह करते रहते हैं।
वैसे तो म्युचुअल फंड या इक्विटी में दीर्घावधि के लिए निवेश करने को ज्यादा लाभकारी माना जाता है। लेकिन कभी-कभार परिस्थितियां कुछ ऐसी हो जाती हैं कि यूनिटों को बेचना जरुरी हो जाता है। आज हम उन परिस्थितियों पर विचार करेंगे जिसके तहत म्युचुअल फंड की यूनिटों को बेचना आवश्यक हो जाता है।


नकदी की विशेष जरुरत होने पर
म्युचुअल फंड बेचने की एक महत्वपूर्ण वजह पैसे की सख्त जरुरत भी हो सकती है। हम सभी भविष्य के किसी विशेष लक्ष्य को पूरा करने के लिए ही निवेश करते हैं। मान लीजिए कि आपको बच्चे की पढ़ाई का शुल्क तुरंत देना है या परिवार के किसी सदस्य की शल्य क्रिया करवानी है या आप महंगी कार खरीदना चाहते हैं तो इसके लिए आपको अपने निवेश के एक हिस्से को भुनाने की जरुरत होगी।
यहां यह देखा जाना महत्वपूर्ण है कि आपको अपने निवेश पोर्टफोलियो के किस फंड को भुनाना चाहिए। वैसे फंड को बेचा जा सकता है जिसका प्रदर्शन बढ़िया न हो या जिस पर आयकर का पर्याप्त लाभ न मिल पा रहा हो। अगर ऐसी कोई बात न हो तो आप बाहर से भी उधार लेकर अपनी जरुरतों को पूरी कर सकते हैं।


फंड की निवेश शैली में परिवर्तन
किसी फंड विशेष की निवेश शैली को ध्यान में रखकर ही हम निवेश करते हैं। मान लीजिए कि आपके पोर्टफोलियो में पहले से ही मिड कैप फंड है और पोर्ट फोलियो के विशाखण के लिए आप लार्ज कैप फंड में निवेश करते हैं।
कुछ समय बाद आपको यह जानकारी होती है कि जिस लार्ज कैप फंड योजना में आपने निवेश किया था वह मिड कैप फंड में भी निवेश कर रहा है। ऐसे में आपको अपना वर्तमान लार्ज कैप फंड बेच कर किसी विशुध्द लार्ज कैप फंड में निवेश करना चाहिए। जब कभी कोई फंड अपने निवेश की मूल नीति से हट कर निवेश करने लगे तो आपको वह फंड बेच कर अन्यत्र निवेश करना चाहिए।


किसी फंड का खराब प्रदर्शन
अभी बाजार में 200 से भी अधिक इक्विटी फंड हैं। सभी फंडों ने पिछले एक साल में प्राय: अच्छा प्रतिफल दिया है। 9 मई को समाप्प्त हुए एक वर्ष में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले फंड, रिलायंस डाइवर्सिफायड पावर सेक्टर रिटेल ने 69.80 प्रतिशत का प्रतिफल दिया है (स्रोत: वैल्यूरिसर्चऑनलाइन)।
बाजार में आये उतार-चढ़ाव के दौरन सभी फंडों का प्रदर्शन बेहतर हो यह आवश्यक नहीं है। किसी फंड का प्रदर्शन जानने के लिए 1-5 सालों के उसके प्रतिफल का समान समूह वाले अन्य फंडों एवं बेंचमार्क सूचकांक के प्रतिफल से उसकी तुलना की जानी चाहिए। अल्पावधि के खराब प्रदर्शन की कोई भी वजह हो सकती है। कुछ फंड दीर्घावधि के उद्देश्य से किए गए हो सकते हैं और संभव है कि कुछ खास सेक्टर का प्रदर्शन बढ़िया न चल रहा हो। लेकिन अगर किसी फंड का प्रदर्शन लगातार औसत से नीचे चल रहा हो तो बेहतर है कि आप अपने यूनिटों को भुना लें और किसी अच्छे फंड में उसका निवेश करें।


पोर्टफोलियो के पुनर्संतुलन के लिए
हम सबके पोर्टफोलियो में परिसंपत्तियों का आवंटन जोखिम उठाने की क्षमता और निर्धारित लक्ष्य के अनुसार निवेश के विभिन्न विकल्पों में होता है। इसमें प्राय: ऋण, इक्विटी, रियल एस्टेट, सोना आदि शामिल होते हैं। आपके वित्तीय व्यवस्था में बदलाव के साथ ही आपक ो अपने पोर्टफोलियो को पुनर्संतुलित करने की जरुरत पड़ सकती है।
मान लीजिए आप पहले बैचलर थे और ज्यादा जोखिम उठा सकते थे इसलिए आपने इक्विटी वाले म्युचुअल फंड में निवेश किया। अब आपकी शादी हो चुकी है और जिम्मेदारियां बढ़ चुकी है। जोखिम उठाने की क्षमता भी कम हो गई है। ऐसे में आपको इक्विटी के जोखिम से मुक्त होने के लिए अपने इक्विटी फंड के निवेश को घटाना चाहिए।

साभारः www.bshindi.com

पढ़े फारसी, बेचे तेल!


श्यामल मजूमदार

स्मिता राजन (बदला हुआ नाम) ने मुंबई के किसी साधारण बिजनेस स्कूल से एमबीए की डिग्री हासिल की है।
जब उन्हें भारत के एक नामीगिरामी बैंक के मार्केटिंग डिपार्टमेंट से नौकरी का ऑफर आया, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। शुरूआत करने के लिहाज से वेतन भी ठीकठाक था और साथ ही बेहतर करियर की संभावना भी नजर आ रही थी।
एक साल बाद स्मिता के पापा को पांच लाख के लोन का जुगाड़ करना पड़ा। यह राशि स्मिता के बैंक को अदा करना थी। दरअसअल बैंक के साथ स्मिता के करार के मुताबिक, अगर दो साल से पहले वह नौकरी छोड़ती है तो उसे पांच लाख रुपये बैंक को देने होंगे। हालांकि स्मिता के पापा का कहना है कि अपनी बेटी की प्रताड़ना को देखने के बजाय वह इससे भी ज्यादा लोन का भार सहना करना पसंद करते।
आइए अब स्मिता की आपबाती के बारे में जानते हैं। 24 साल की इस लड़की को दफ्तर में सुबह 9 बजे से रात 10 बजे तक गुजारना पड़ता था। यही नहीं खाता खुलवाने के लिए उन्हें लोगों को प्रेरित करने के लिए हर घर का दरवाजा खटखटाना पड़ता था। टार्गेट नहीं पूरा होने के मद्देनजर 3 महीने उनके वेतन में शामिल वैरिएबल की राशि में से 8500 रुपये काट लिए गए।
स्मिता के पिता के मुताबिक, इस काम के लिए एमबीए को बहाल करने की कोई जरूरत नहीं है। उनकी बेटी पूरी तरह टूट चुकी है और बैंक ने स्मिता का आत्मविश्वास खत्म कर दिया है। आलम यह है कि बैंक ने टेलर मशीनों की देखरेख के लिए भी एमबीए डिग्री प्राप्त लोगों की भर्ती कर रखी है।
इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि स्मिता इस मामले में अकेली नहीं है। भारत में रोजगार के अंबार का ढिंढोरा पीटे जाने के बीच कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं। इसी तरह देवाशीष भौमिक (बदला हुआ नाम) ने कोलकाता के किसी प्राइवेट संस्थान से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है। वह किसी विंडमिल कंपनी में नौकरी करने नवी मुंबई पहुंचे। इस कंपनी का मुख्यालय यूरोप में है। इस कंपनी में भौमिक का जॉब प्रोफाइल सिक्युरिटी गार्ड से थोड़ा ही बेहतर था।
हालांकि वह खुशकिस्मत रहे और उन्हें चार महीने के भीतर दूसरी नौकरी मिल गई। उन्होंने बताया कि पिछली कंपनी के उनके बॉस ने उन्हें कंपनी के गोदामों में सिक्युरिटी सिस्टम पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने को कहा था। दरअसल कंपनी को आशंका थी कि उसके गोदामों में छिटपुट चोरी का सिलसिला काफी तेज है। इसके तहत इस इंजीनियरिंग ग्रैजुएट को गोदाम सिस्टम की गड़बड़ियों का पता लगाने के लिए सिक्युरिटी ऑफिस में बैठने का निर्देश दिया गया।
इस काम के दौरान भौमिक ने पाया कि लंच के दौरान जब सिक्युरिटी गार्ड खाना लाने के लिए कैंटीन जाता है, तो गोदाम की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता। भौमिक की इस राय से प्रभावित हो होकर उनके बॉस ने उन्हें यह पता लगाने का निर्देश दिया कि ऐसा चाय या डिनर के दौरान हो रहा है या फिर सिक्युरिटी गार्ड्स हमेशा गेट को छोड़कर टॉयलेट जाते रहते हैं।
भौमिक ने अपने इस्तीफा पत्र में लिखा कि मैंने लोगों की चाय और टॉयलेट की आदतों पर गौर करने के लिए इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल नहीं की है। अब हम एक फर्स्ट क्लास से पास बी. कॉम. ग्रैजुएट की बात करते हैं। यह जनाब बीपीओ में बतौर सर्विस ऑफिसर काम करते हैं। उनका ऑफिस शाम 4 बजे से शुरू होता है और रात को 2 बजे डयूटी खत्म होती है।
अत्याधिक काम के बोझ और अनियमित रूटीन की वजह से अक्सर उन्हें स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि कंपनी ने उन्हें अमेरिकी एक्सेंट में अंग्रेजी बोलना सीखने के लिए जीभ के नीचे मार्बल रखकर अंग्रेजी बोलने का अभ्यास करने को कहा है। कंपनी में नौकरी छोड़कर जाने वालों की तादाद (30 से 40 फीसदी) काफी ज्यादा है।
इसके बावजूद कंपनी को इसकी कोई चिंता नहीं है, क्योंकि अंग्रेजी बोलने वाले ग्रैजुएट्स की भरमार होने के कारण उसे कभी भी कर्मचारियों की किल्लत का सामना नहीं करना पड़ता। 12 हजार रुपये प्रति महीना पर काम करने के लिए ऐसे ग्रैजुएट्स की कतार लगी होती है। फर्स्ट क्लास से पास करने वाले ग्रैजुएट्स और अपेक्षाकृत कम नामीगिरामी संस्थानों से इंजीनियरिंग या एमबीए की डिग्री लेने वालों से बात करने पर एक आम बात उभर कर सामने आती है।
वह यह कि कंपनियां इंसेंटिव का लालच देकर लोगों को ऐसा बिजनेस लक्ष्य देती हैं, जिन्हें हासिल करना मुमकिन नहीं होता। साथ ही जॉब प्रोफाइल भी ठीक नहीं होता। ऐसे वक्त में जब सभी लोग भारत में रोजगार के बढ़ते अवसरों की दुहाई दे रहे हैं, ये उदाहरण बताते हैं कि भारतीय कंपनियों की भर्ती का तरीका काफी बेतरतीब है और इस प्रक्रिया में योग्यता और जॉब प्रोफाइल का सामंजस्य बिल्कुल भी नजर नहीं आता।
इसके मद्देनजर लार्सन एंड टूब्रो के चेयरमैन ए. एम नायक ने आईटी कंपनियों पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि यह सेक्टर इंजीनियरों को हाईजैक कर रहा है, जबकि उन्हें सिर्फ बी. कॉम. ग्रैजुएट्स की जरूरत है। जरूरत से ज्यादा योग्यता वाले लोगों की नियुक्ति के बारे में कंपनियों की दलील है कि जिस देश में हर दूसरा शख्स फर्स्ट क्लास ग्रैजुएट, इंजीनियर या एमबीए है, वहां इस तरह की घटनाओं को रोकना संभव नहीं है।
इसके अलावा दूसरे दर्जे के इन संस्थानों में पढ़ाई की क्वॉलिटी भी स्तरीय नहीं होती है और इस वजह से कंपनियों को इन लोगों को नए सिरे से प्रशिक्षित करना पड़ता है। एक कंपनी के एचआर मैनेजर के मुताबिक, ट्रेनिंग के बाद भी ऐसे लोग अपनी डिग्री से खुद को जोड़ने में सक्षम नहीं हो पाते और इस वजह से कंपनियों को इन लोगों को कोर्स से अलग जॉब प्रोफाइल मुहैया कराने के सिवा कोई चारा नहीं रहता।
उनकी इस बात में दम हो सकता है। अध्ययन बताते हैं कि भारत में चार में सिर्फ एक ग्रैजुएट के पास उचित रोजगार प्राप्त करने की योग्यता होती है। मतलब यह है कि जब तक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं होता है, बाकी तीन लोगों को बैंकों में खाते खुलवाने के लिए लोगों को राजी करने, लोगों की चाय और टॉयलेट संबंधी आदतों की निगरानी करने और आधी रात में अपनी अमेरिकन एक्सेंट सुधारने जैसे कामों से खुद को संतुष्ट रखना पड़ेगा।


sआभार_ www.bshindi.com

Friday, May 9, 2008

30 साल का हुआ साइबर नटवरलाल


सत्यव्रत मिश्र


अभी हाल में साइबर स्पेस के एक बड़े नाम का 30वां जन्मदिन था। एक ऐसा नाम जिस सुन कई लोगों के पसीने छूट जाते हैं, तो कई लोगों का गुस्से सातवें आसमान को पार कर जाता है।
एक ऐसा कुख्यात नाम जो कई लोगों की जीवन भर की गाढ़ी कमाई लेकर चंपत हो चुका है। हुजूर, साइबर स्पेस के इस मिस्टर नटवरलाल को लोग-बाग को जानते हैं स्पैम के नाम से। जी हां, आपके और हमारे जीवन को मुहाल कर देने वाला स्पैम तीन मई को 30 साल का हो गया।
अपने 30 साल की इस जिंदगी में उसने जितना लोगों को हैरान और परेशान किया है, उतना तो किसी कंप्यूटर वाइरस ने भी आज तक नहीं किया है। जाहिर सी बात है इस बर्थडे के मौके पर आप केक खाने की इच्छा तो नहीं कर सकते।


क्या बला है यह?
स्पैम एक ही तरह के हजारों ईमेल मैसेजों को कहते हैं, जो हजारों लोगों को भेजे जाते हैं। इसके लिए उन लोगों से इस बात की सहमति भी नहीं ली जाती है कि वे लोग इन ईमेलों को रिसीव करना चाहते भी हैं या नहीं। स्पैम का दूसरा नाम है बल्क ईमेल या जंक ईमेल।
कानूनी जुबान में इसे कहते हैं अनसौलिसिटेड बल्क ईमेल्स (यूबीई)। इस हिसाब से किसी ईमेल को स्पैम करार देने के लिए यह जरूरी है कि वह भारी तादाद में भेजे गए हों और उन्हें प्राप्त करने के लिए लोगों ने सहमति नहीं दी हो।


कैसे हुई थी शुरुआत?
पहला स्पैम भेजा गया था तीन मई 1978 को। वह स्पैम भेजा गैरी थीयुरक ने अपरानेट के जरिये। अपरानेट को ही बाद में इंटरनेट के नाम से लोगों ने जाना। हालांकि, उस समय अमेरिका में इस सिस्टम का इस्तेमाल बस शुरू भर हुआ था। तब अपरानेट का इस्तेमाल केवल अमेरिकी सरकार की एजेंसियां, कंपनियां और बड़ी यूनिवर्सिटीज ही किया करती थीं।
इसी अपरानेट पर गैरी भाई साहब ने अपनी कंपनी डिजीटल इलेक्ट्रोनिक्स कॉरपोरेशन द्वारा विकसित किए गए एक नए सिस्टम का विज्ञापन डाल दिया। यह विज्ञापन उन्होंने 10 या 20 नहीं, बल्कि पूरे 350 लोगों को भेजा था। वैसे, तब भी जिन लोगों को यह मैसेज मिला था, उनमें से काफी ज्यादा लोगों ने इस मैसेज का कड़ा विरोध किया था। यानी तब से लेकर अब तक इसके प्रति लोगों का नजरिया ज्यादा नहीं बदला है।


स्पैम के प्रकार
स्पैम कई तरह के होते हैं। लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए स्पैमर तरह-तरह के तरीकों का सहारा लेते रहते हैं। इससे बचने का सबसे असरदार तरीका उनके बारे में जानकारी ही है। अलग-अलग तरह के स्पैमों की लिस्ट यह रही।


419 स्पैम : इसे नाइजीरियाई ईमेल स्कैम के नाम से भी जाना जाता है। यह लोगों से पैसे ठगने का सबसे कुख्यात तरीका है, इसी वजह से तो स्पैमर इसका इस्तेमाल भी धड़ल्ले से करते हैं। अक्सर इस तरह के स्पैम को भेजने वाला खुद नाइजीरिया, जॉर्जिया, उज्बेकिस्तान या ऐसे ही किसी अफ्रीकी, पूर्वी यूरोपीय या सोवियत संघ से अलग हुए किसी मुल्क का ऐसा उच्चाधिकारी बताता है।
स्पैमर अपने शिकार को यह कहकर फांसने की पूरी कोशिश करता है कि आपने एक लॉटरी में लाखों डॉलर की रकम जीती है और प्रोसेसिंग फी के नाम पर आपको एक 'छोटी-सी' रकम चुकानी पड़ेगी। अगर आपने उस ऑफर में रुचि दिखलाई तो वह आपको असली से दिखने वाले नकली कागजात भी भेज देगा। फिर जैसे ही अपने रकम चुकाई, वह इंसान आपके पैसों के साथ गायब हो जाएगा। इससे बचने का इकलौता तरीका यही है कि इस तरह के ईमेलों का जवाब ही नहीं दें।


फिशिंग : इसमें स्पैमर आपको एक ईमेल भेजता है, जिसमें आपको नीचे दिए हाइपरलिंक पर जाकर अपने बैंक अकाउंट नंबर, इंटरनेट पासवर्ड और अकाउंट से संबंधित दूसरी बातों को 'अपडेट', 'वेरीफाई' या 'कन्फर्म' करने के लिए कहा जाता है। जैसे ही आप ऐसा करते हैं, रातोंरात ही आपका बैंक अकाउंट की अच्छी-खासी तरीके से 'सफाई' हो जाती है। इकोई भी बैंक ईमेल के जरिये आपके अकाउंट इन्फॉर्मेशन को अपडेट करने के लिए नहीं कहता। इसलिए इस तरह के ईमेल्स का कतई भी जवाब नहीं दें।


वर्क एट होम स्पैम : इस तरह के स्पैम के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं बेरोजगार नौजवान और शादीशुदा महिलाएं। इसमें स्पैमर लोगों से वादा करता है कम मेहनत और ज्यादा कर्माई का। उनसे यह भी कहा जाता है कि इसके लिए उन्हंा किसी दफ्तर आने की जरूरत नहीं, बल्कि यह काम तो वह घर बैठे बिठाए भी कर सकते हैं। हालांकि, इसमें यह नहीं बताया जाता कि काम खत्म होने के बाद तो स्पैमर यह कहाकर पैसे देने से भी इनकार कर देता है कि काम की क्वालिटी अच्छी नहीं थी।


वाइगरा स्पैम : आजकल तो इस तरह के स्पैम की खूब बारिस हो रही है। कई लोगों के इनबॉक्स तो सस्ते वाइगरा के ऑफर से भरे रहते हैं।


कैसे भेजे जाते हैं ये?
इसके लिए सबसे पहले जरूरत होती है ईमेल एड्रेसेज की। इन ईमेल एड्रेसेज को जुटाने की प्रक्रिया को ईमेल एड्रेस हार्वेस्टिंग के नाम से जाना जाता है। इसके लिए स्पैमर सबसे पहले संभावित ईमेल एड्रेसेज की एक पूरी सूची बना लेते हैं। अक्सर इसके लिए लोगों की सहमति नहीं ली जाती है।
ज्यादा से ज्यादा लोगों तक स्पैम को पहुंचने के लिए आज की तारीख में लाखों और कभी-कभी तो करोड़ों ईमेल एड्रेसेज की लिस्ट बनाई जाती है। फिर स्पैमर इन ईमेल्स को भेजने के लिए ईमेल अकाउंट खोलते हैं और फिर उसके जरिये स्पैम भेजते हैं। अब तो अपनी पहचान छुपाने के लिए स्पैमर प्रॉक्सी सर्वरों का भी सहारा लेने लगे हैं।


जीना किया दूभर
स्पैम्स की वजह से तो इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों का जीना दूभर हो गया है। हर दिन दुनिया भर में 100 अरब स्पैम भेजे जाते हैं। लेकिन डरावनी बात तो यह है कि स्पैम्स के फैलने की रफ्तार तेजी से फैल रही है। आंकड़ों की मानें तो इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों के इनबॉक्स में हर दिन आने वाले ईमेल्स में 80 से 90 फीसदी तो स्पैम होते हैं। इसकी वजह से अकेले अमेरिका को हर साल 21.58 अरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ता है।
पूरी दुनिया को पिछले साल इसकी वजह से 198 अरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा था। आपको बता दें कि सबसे ज्यादा स्पैम भेजे जाते हैं अमेरिका से। अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई की मानें तो साइबर स्पेस में होने वाले कुल गड़बड़ झाले में से 75 फीसदी की वजह यही स्पैम होते हैं।
वैसे, हमारा देश भी इससे खासा परेशान हैं। सरकार के मुताबिक भारत से जाने वाले ईमेल्स में से 76 फीसदी स्पैम होते हैं। इसलिए तो सरकार आईपीसी की धारा 40 को आईटी एक्ट में शामिल करने पर बात कर रही है।

साभारः बिज़नेस स्टैंडर्ड

Thursday, May 8, 2008

नए जमाने के मुताबिक होगा नया मूल्य सूचकांक


सत्येन्द्र प्रताप सिंह और कुमार नरोत्तम


थोक मूल्य सूचकांक से हर सप्ताह महंगाई में होने वाली बढ़ोतरी या कमी के आंकड़े मिलते हैं। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ये आंकड़े जारी करता है।
हालांकि मूल्यों के नमूने और इस सूचकांक में शामिल जिंसों से सामान्य अनुमान लगाया जाता है, लेकिन इससे सही आंकड़े नहीं मिल पाते। वर्तमान थोक मूल्य सूचकांक को लेकर ढेरों सवाल उठ रहे हैं। पहला मुद्दा यह है कि आधार वर्ष पुराना पड़ चुका है। दूसरा, इसमें शामिल किए गए जिंसों की संख्या कम है, साथ ही विनिर्मित क्षेत्र के उत्पादों में क ई परिवर्तन हुए हैं। वर्तमान बास्केट में शामिल कई जिंसों का महत्व घट गया है। इसके अलावा मूल्यों के ताजा आंकड़े सही समय पर नहीं पहुंचते, जिससे मुद्रास्फीति की सही सूची ही नहीं बन पाती।
थोक मूल्य सूचकांक को अद्यतन करने के लिए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अभिजीत सेन की अध्यक्षता में कार्य समूह का गठन किया गया है। इसका प्रमुख काम वर्तमान थोक मूल्य सूचकांक, जिसका आधार वर्ष 1993-94=100 है, को पुनरीक्षित करना है।
वाणिज्य मंत्रालय के ऑफिस आफ इकनॉमिक एडवाइजर की इच्छा है कि यह कार्य समूह थोक मूल्य सूचकांक की पुनरीक्षित श्रृंखला पेश करे, जिससे मुद्रास्फीति के सही आंकड़े जानने के लिए बेहतर संकेतक मिल सके। साथ ही इस बारे में भी जानकारी हासिल हो सके कि अंतरराष्ट्रीय बाजार का भारतीय जिंसों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। इस कार्य समूह में चार उप समूह शामिल किए गए हैं।
विश्लेषणात्मक मुद्देविनिर्मित वस्तुओं के मामलेकृषि जिंस संगठित और असंगठित क्षेत्र
प्रो. अभिजीत सेन की अध्यक्षता वाले कार्य समूह से जुड़े सूत्रों का कहना है कि थोक मूल्य सूचकांक की तकनीकी रिपोर्ट बनकर तैयार हो गई है। इसे अंतिम रूप दिया जा रहा है। लेकिन संकट आंकड़ों को लेकर संकट अब भी बरकरार है। सेन रिपोर्ट में मुद्रास्फीति की साप्ताहिक के बदले मासिक रिपोर्ट जारी किए जाने की भी बात कही जा रही है। साथ ही स्पष्ट और समय के मुताबिक आंकड़े प्राप्त करना भी अहम मुद्दा बना हुआ है। बहरहाल इस साल के अंत तक रिपोर्ट आने की संभावना है।
एक्सिस बैंक के प्रमुख अर्थशास्त्री और वाइस प्रेसीडेंट सौगात भट्टाचार्य का कहना है कि पुराने थोक मूल्य सूचकांक में ढेरों खामिया है, जिसे दुरुस्त किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा, ''कंपनियों के लिए परिवर्तित कीमतों के आंकड़े देना अनिवार्य नहीं किया गया है, जिससे समय पर आंकड़े नहीं मिल पाते। साथ ही कंज्यूमर डयूरेबल्स के तमाम आयटम को शामिल किए जाने की जरूरत है।
पेट्रोल की खपत भी आधार वर्ष की तुलना में बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है, जिसका वेटेज बढ़ाया जाना चाहिए। साथ ही विभिन्न सामग्रियों की संख्या वर्तमान में 435 है, जिसे बढ़ाकर 1000 तक किए जाने की जरूरत है, जिससे महंगाई की सही स्थिति का अनुमान लगाया जा सके। ''

साथ ही औद्योगिक मूल्य सूचकांक, थोक मूल्य सूचकांक और जीडीपी के लिए एक ही आधार वर्ष बनाए जाने की बात चल रही है। इसे सांख्यिकी के जानकार बेहतर मान रहे हैं। हालांकि अभी इसकी राह बहुत कठिन लगती है।
भारत के मुख्य सांख्यिकीयविद् प्रणव सेन ने बताया कि वैसे तो राष्ट्रीय आय को निर्धारित करने के लिए 1999-2000 को भी अभी स्थिरता प्राप्त करना बाकी है। इसलिए 2004-05 को आधार वर्ष बनाने में अभी काफी समय लगेगा। एचडीएफसी के मुख्य अर्थशास्त्री अभीक बरुआ ने कहा कि कॉमन आधार वर्ष से आंकड़ों का विश्लेषण आसान हो जाएगा।


साभारः बिजनेस स्टैंडर्ड