Saturday, April 6, 2019

क्या था राज....

(पड़ोसी मुल्क को भले ही इसकी आदत हो लेकिन भारत में कभी भी सैन्य तख्तापलट की कल्पना भी नहीं की गई। हाल में एक अखबार में छपी सनसनीखेज रिपोर्ट ने सवाल उठा दिया है कि 16 जनवरी की रात को हुर्ई कवायद के पीछे क्या मकसद था। इसकी परतें खोलती अजय शुक्ला की रिपोर्ट)


चंद सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब हमें नहीं मिल पाता। कुछ ऐसी ही बात इस सवाल से जुड़ी हुई है जिनका जवाब अब हमें शायद कभी नहीं मिल पाएगा। क्या 16 जनवरी को सेना प्रमुख ने वास्तव में अपने मुखिया रक्षा मंत्री ए के एंटनी को चेतावनी देने के मकसद से नई दिल्ली के आसपास के इलाके में दो सैन्य टुकडिय़ों को जुटाने की कवायद की थी? यह वही दिन था जब जनरल वी के सिंह ने अभूतपूर्व कदम उठाते हुए उच्चतम न्यायालय में अपनी उम्र से जुड़े विवादास्पद मामले में सरकार को चुनौती दी थी।
बुधवार को इस खबर की आंच ने पूरे देश भर में हलचल मचा दी। 'इंडियन एक्सप्रेस' अखबार में यह खबर छपी कि 16 जनवरी की कुहासे और कड़ाके की ठंड वाली रात में जब खुफिया एजेंसियों को यह अंदाजा हुआ कि हिसार की 33 वीं बख्तरबंद डिविजन की एक सैन्य टुकड़ी और आगरा की 50 वीं (स्वतंत्र) पैराशूट ब्रिगेड की एक विशेष सैन्य बल टुकड़ी अप्रत्याशित तरीके से देश की राजधानी की ओर बढ़ रही है जिससे देश के राजनैतिक हलके में घबराहट बढ़ गई थी।

इस रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने इस घटनाक्रम को 'अप्रत्याशित' और 'गैर अधिसूचित' करार देते हुए आनन-फानन में रक्षा सचिव शशिकांत शर्मा को भी मलेशिया से वापस बुलाया था। शर्मा जब दिल्ली पहुंचे तब उन्होंने सेना के सैन्य संचालन महानिदेशक (डीजीएमओ) लेफ्टिनेंट जनरल ए के चौधरी को अपने दफ्तर में देर रात एक बैठक के लिए बुलाया और उनसे इस पर रुख स्पष्ट करने को कहा कि 'यह चल क्या रहा है?' जनरल को यह ताकीद दी गई कि वह सेना की टुकडिय़ों को तुरंत वापस भेजें।
हालांकि इस अंग्रेजी अखबार ने अपनी इस रिपोर्ट में 'तख्तापलट' जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था। लेकिन रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया था कि राजनैतिक-सैन्य रिश्ते में बने तनाव के माहौल के बीच सेना की इस हरकत से सरकार की नुमाइंदगी करने वाले प्रमुख लोगों ने 'गड़बड़ी की आशंका और घबराहट' महसूस की। इसके बाद सेना ने इस खबर का बड़े आक्रामक तरीके से खंडन किया।

सेना के बेहद ईमानदार और तेजतर्रार जनरलों में से एक लेफ्टिनेंट जनरल हरचरनजीत सिंह पनाग 2009 में सेवानिवृत होने तक एक सैन्य कमांडर थे, उन्होंने गुरुवार को ट्विटर पर लिखा कि जनरल सिंह ने सरकार को डराने के लिए यह योजना बनाई थी ताकि सरकार को यह अंदाजा हो जाए कि अगर वह उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी में है तो तख्तापलट भी संभव हो सकता है। पनाग ने सुझाया कि चूंकि सेना की दो टुकडिय़ों का यह कदम उनकी नियमित अभ्यास प्रक्रिया का ही हिस्सा था, ऐसे में किसी द्वेषपूर्ण और बुरे इरादे की बात को विश्वसनीय ढंग से खारिज किया जा सकता है। सेना की इन्हीं टुकडिय़ों को केवल अभ्यास के आदेश दिए गए थे जिस पर आपत्ति जताने का कोई सवाल भी नहीं खड़ा होता और केवल चुनिंदा लोग ही इस कार्यवाही के असली मकसद के बारे में जानते हैं।
इसी से जुड़े पांच ट्वीट में पनाग ने इस कदम को एक 'प्रदर्शन' करार दिया जो 'दुश्मन की फैसला लेने की प्रक्रिया में बदलाव' लाने के लिए की गई कार्रवाई है। एक 'कवर प्लान' के जरिये इस पूरे घटनाक्रम का खंडन करने की स्थिति पैदा की गई, जिसके बारे में पनाग विस्तार से बताते हैं, 'दुश्मन को झांसा देने के लिए बनाई गई योजना के लिए एक विश्वसनीय बहाना बनाया जा सके।' इस सैन्य प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाली सैन्य टुकडिय़ां इसके 'असली मकसद से वाकिफ नहीं थीं' लेकिन वरिष्ठ कमांडरों को इसका भान था। पनाग का कहना है कि नई दिल्ली की ओर सैन्य टुकडिय़ों का बढऩा एक 'सुनियोजित प्रदर्शन का हिस्सा था और इसके लिए उपयुक्त कवर योजना भी बना ली गई थी' जिसका मतलब यह है कि कोई दुश्मन किसी की रणनीति और योजना पर अमल न होने देने से पहले ही पलटवार कार्रवाई करना।

सरकार, सेना और मीडिया भी इस बात पर बड़े सावधान हैं और अगर पनाग की बात सही माने तो इसे करीब-करीब तख्तापलट जैसे अनुभव का नाम दिया जा सकता है। सार्वजनिक चर्चा में रिपोर्ट में लिखे गए 'सी' शब्द पर चर्चा हो रही है। इस रिपोर्ट को लिखने वाले इंडियन एक्सप्रेस के मुख्य संपादक शेखर गुप्ता ने एक टीवी पत्रकार के सवालों का जवाब देते हुए कहा, 'मैंने सी शब्द का इस्तेमाल जरूर किया है लेकिन इससे मेरा तात्पर्य क्यूरियस (उत्सुकता) था न कि कू (तख्तापलट)'।


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क्या वास्तव में यह सरकार और सेना के रिश्ते में आमूल परिवर्तन वाली ऐतिहासिक घटना है? क्या इतिहासकार 16 जनवरी को एक ऐसे दिन के रूप में देखेंगे जिस दिन जनरल सिंह ने सरकार की प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी और साथ-साथ (अगर पनाग सही हैं तो) दिल्ली की ओर कूच करके इसका हल निकालने की दृढ़ता दिखाई? फिलहाल ऐसा लगता है कि जनरल सिंह का सरकार के साथ चल रहा मतभेद सेना के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रहा है। अब रक्षा मंत्रालय के अधिकारी बड़ी तत्परता से नीतियों, खरीद प्रक्रिया और पदोन्नति को मंजूरी दे रहे हैं जिसे कुछ मामलों में कई सालों से बेवजह लटकाया गया था।

20 मार्च को रक्षा मंत्रालय ने मेजर जनरल के लिए एक पदोन्नति बोर्ड के नतीजे को मंजूरी दी थी जिसे पिछले 6 महीने से निर्ममता से टाला गया था। 2 अप्रैल को इसी मंत्रालय ने लंबे समय से संशोधन की राह ताक रही डिफेंस ऑफसेट पॉलिसी में सुधार किया था। उसी दिन एंटनी ने हथियारों की खरीद से जुड़ी समीक्षा की थी और उन्होंने इनके जल्द परीक्षण कराने का आग्रह भी किया। हालांकि सैन्य बलों पर असैन्य नियंत्रण के लिए वित्त एक महत्त्वपूर्ण पहलू रहा है लेकिन एंटनी ने रक्षा सेवाओं को ज्यादा वित्तीय शक्तियां देने का सुझाव दिया है ताकि ज्यादा से ज्यादा उपकरण खरीदें जाएं और इन सेवाओं के तंत्र को ज्यादा सशक्त बनाया जाए।

सेना की 15 वर्षीय दीर्घावधि एकीकृत दृष्टिकोण योजना, एक अहम दस्तावेज है जिसमें देसी तकनीक के आधार पर हथियारों के विकास और खरीद के लिए एक खाका तैयार किया गया है। सूत्रों का कहना है कि इसे जल्द ही मंजूरी मिल सकती है। एक ओर नरेश चंद्रा समिति रक्षा तैयारी और उच्च स्तर के रक्षा संगठनों की पुनर्संरचना से जुड़ी अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप दे रही है वहीं अंदरूनी सूत्रों ने इस बात पर दांव लगाना शुरू कर दिया है कि सरकार लंबे समय से विभिन्न समितियों और मंत्री समूहों द्वारा दिए जा रहे इस सुझाव को संभवत: स्वीकार सकती है कि तीन स्तर के सेना प्रमुखों से ऊपर एक 'चीफ ऑफ दि डिफेंस स्टॉफ' की नियुक्ति की जाए। यह प्रस्तावित पद पांच सितारा जनरल वाला होगा जिसके हाथ में थल, जल एवं वायु तीनो सेनाओं की कमान होगी।
फिलहाल सेना, सेनाध्यक्ष और सरकार के बीच चल रहे विवाद और रक्षा मंत्रालय से जुड़े इस तथाकथित संवेदनशील वाकये के बीच किसी ताल्लुक से साफ तौर पर इनकार कर रही है। हालांकि सेवारत जनरल जोरदार तरीके से इंडियन एक्सप्रेस के लेख से उभर रहे आरोपों को खारिज कर रहे हैं जिसके मुताबिक जनरल सिंह ने सरकार पर गैरकानूनी तरीके से दबाव बनाया।

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फिलहाल सेना मुख्यालय में सेवारत अधिकारी जोर देकर कहते हैं कि यह बिलकुल गलत बात है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में किसी भी वक्त सेना की हलचल से पहले रक्षा मंत्रालय द्वारा पूर्व जरूरी मंजूरी का कोई प्रावधान या नियम है। सैन्य संचालन के समन्वय से जुड़े एक ब्रिगेडियर का कहना है, 'सेना की टुकडिय़ां रोजाना दिल्ली की ओर, दिल्ली में और दिल्ली के इर्द-गिर्द होती हैं। इनमें फायरिंग या प्रशिक्षण के लिए जा रही टुकडिय़ों के काफिले के साथ-साथ एक केंद्र से दूसरे केंद्र की ओर स्थानांतरित हो रही टुकडिय़ों का काफिला भी होता है। हर कॉम्बैट टुकड़ी को हर दो या तीन साल में ऐसा करना ही होता है। इन टुकडिय़ों के काफिले को प्रशासनिक औपचारिकताएं पूरी करने के लिए दिल्ली में रुकना पड़ता है।'

सेवारत अधिकारी यह सवाल भी उठाते हैं कि आखिर दिल्ली की ओर आ रही दो टुकडिय़ों (बमुश्किल 500 जवान) को कैसे एक खतरे के तौर पर देखा जा सकता है, जब दो फ्रंटलाइन इन्फैंट्री ब्रिगेड और एक आर्टिलरी ब्रिगेड (10,000 से भी ज्यादा जवान) स्थायी रूप से राजधानी में तैनात रहते हैं। दिल्ली में इस स्थायी सैन्य जमाव में जनवरी में कुछ और हजार अतिरिक्त जवान तब और जुड़ जाते हैं जिन्हें सेना दिवस और गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होना होता है। एक अधिकारी सवाल करते हैं, 'चलिए एक क्षण को यह मान भी लिया जाए कि कुछ उन्मादी सेना प्रमुख तख्तापलट चाहते थे और वह दिल्ली में मौजूद सैनिकों के अलावा कुछ और सैनिक चाहते थे। ऐसे में वह हिसार (165 किलोमीटर दूर) और आगरा (204 किलोमीटर दूर) से सैनिकों को क्यों जमा करते जब महज 70 किलोमीटर की दूरी पर मेरठ में पूरी इन्फैंट्री डिविजन मौजूद है।'

यहां तक कि किसी कल्पित तख्तापलट पर हो रही चर्चा की संवेदनशीलता को देखते हुए पहचान गुप्त रखने की शर्त पर हाल में सेवानिवृत्त हुए एक लेफ्टिनेंट जनरल कहते हैं , 'किसी भी सफल सैन्य तख्तापलट के लिए सभी छह भौगोलिक सैन्य कमानों के अलावा वायु सेना प्रमुख के सक्रिय सहयोग की दरकार होगी। यहां तक कि अगर एक भी कमान के प्रमुख की इस पर सहमति नहीं होगी तो भी यह संभव नहीं होगा और ऐसा सोचना बिलकुल मूर्खतापूर्ण होगा कि भावी सेनाध्यक्ष और पूर्वी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल विक्रम सिंह खुद को किसी भी तख्तापलट के साथ जोड़ेंगे-ऐसे में कोई भी कोशिश तुरंत वफादारों और विद्रोहियों के बीच गृहयुद्घ में तब्दील हो जाएगी।'

हालांकि भारत में एक कामयाब सैन्य तख्तापलट की कल्पना करना शायद मुश्किल है, लेकिन मौजूदा फितूर किसी असल तख्तापलट की गुंजाइश का मसला नहीं है बल्कि जैसा कि पनाग कहते हैं, एक कमजोर सरकार की कलाई मरोड़कर उस पर हल्का सा सैन्य दबाव डालने की खयाली पुलाव हो सकता है। एक पूर्व सेनाध्यक्ष कहते हैं, 'हिसार और आगरा से इन दो टुकडिय़ों को बुलाने के पीछे के इरादों को निश्चित रूप से निर्धारित करना अगर असंभव नहीं तो कम से कम मुश्किल जरूर होगा। कागजी कार्यवाही ही यह बताएगी कि यह अभ्यास वैधानिक आदेश का हिस्सा था या नहीं। इस कदम के पीछे के इरादे ही मायने रखते हैं और इरादे इंसानी दिमाग में होते हैं।'
उनका कहना है कि यहां पर सरकार और सेना के बीच रिश्ते मायने रखते हैं। पूर्व सेनाध्यक्ष कहते हैं, 'पंजाब में अलगाववाद से लडऩे के लिए मुझे दिल्ली के रास्ते 3-4 पूरी डिविजन गुजारनी पड़ती थीं। उससे एक पल के लिए भी असैन्य प्रशासन के लिए साथ कोई तनाव नहीं हुआ। सेना और सरकार के बीच उस वक्त रिश्ते जैसे भी हों लेकिन हमारे बीच कोई संदेह नहीं था।'


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यही वजह है कि किसी देश के नागरिक-सैन्य संबंध निश्चित रूप से बेहतर स्थापित ढांचे, प्रक्रिया और प्रभाव चक्र पर आधारित होने चाहिए न कि मौजूदा मिजाज के हिसाब से जो हालात और घटनाओं से बदल सकते हैं। भारत में सरकार और सेना के बीच सीमा रेखा की कुछ समझ या सार्वजनिक चर्चा होती है जिसमें दोनों की जिम्मेदारी और संपर्क भी तय है। लेखक सैमुअल हंटिंगटन ने वर्ष 1957 में आई अपनी कालजयी कृति 'द सोल्जर ऐंड द स्टेट' में सेना के 'वस्तुनिष्ठ नियंत्रण' की अवधारणा पेश की। सभी सफलतम लोकतंत्रों में लागू असैन्य नियंत्रण का यह ढांचा सेना को अपने दायरे में पूरी स्वायत्तता मुहैया कराता है। अपने पेशेवर क्षेत्र में अपना प्रभुत्व रखने वाली सेना और इस तरह से 'वस्तुनिष्ठ नियंत्रण' स्वयंसिद्घ हो जाता है और वह राजनैतिक दायरे में खुद को शामिल नहीं करती। हालांकि असैन्य नियंत्रण सेना के रोजमर्रा के फैसलों को प्रभावित करने के बजाय व्यापक राजनैतिक मुद्दों के हिसाब से होता है। इसके उलट 'व्यक्तिपरक नियंत्रण' बाधित असैन्य नियंत्रण के जरिये सेना के प्रभाव को बेअसर करता है, विस्तृत असैन्य पकड़ सेना के आंतरिक मामलों में दखल देने लगती है। व्यक्तिपरक नियंत्रण 'सेना के असैन्यकरण' का संकेत देता है जबकि वस्तुनिष्ठ नियंत्रण 'सेना के सैन्यकरण' के लिए लक्षित होता है जो पेशेवर अंदाज और उसके दायरे में उसकी जिम्मेदारी को प्रोत्साहित करता है।
भारतीय सेना और रक्षा मंत्रालय या भारत सरकार के साथ इसके संबंधों के ढांचे पर नजर रखने वाले छात्र और विश्लेषक एकमत रूप से इस बात पर सहमत हैं कि पिछले कुछ वक्त के दौरान 'वस्तुनिष्ठ नियंत्रण' की सीमा का उल्लंघन हुआ है। दीर्घ अवधि की योजना से लेकर हथियार खरीद, प्रोन्नति और सेना के अधिकारियों की जन्म तिथि, सब पर असैन्य नौकरशाही हावी है। किसी भी सैन्य अधिकारी से उसकी सबसे बड़ी नाराजगी की वजह पूछिए लगभग निश्चित रूप से यही जवाब आएगा, 'बाबू' यानी नौकरशाह।

हालांकि भारत में सैन्य तख्तापलट बहुत मुश्किल है और संसदीय लोकतंत्र के ढांचे को लेकर शिकायतों और आक्रोश पर सेना एक दायरे में ही प्रतिक्रिया देती है। एक अन्य चर्चित पुस्तक 'सोल्जर्स इन पॉलिटिक्स, मिलिट्री कूज एंड गवर्नमेंट्स' के लेखक एरिक नॉर्डलिंगर तर्क देते हैं कि आमतौर पर सरकार की नाकामी सैन्य तख्तापलट की वजह बनती हैं। सैन्य दखल के वास्तविक कारण उन मामलों में होने वाला असैन्य दखल है जिन पर सेना अपना वैधानिक अधिकार मानती है, पर्याप्त बजटीय सहायता, आंतरिक मामलों में उसकी स्वायत्तता, प्रतिद्वंद्वी संगठन द्वारा उसकी जिम्मेदारी के अतिक्रमण रोकने का उसका अधिकार और खुद उसकी निरंतरता। क्या यह एक व्यापक बहस का समय है?

साभार- बिजनेस स्टैंडर्ड


Wednesday, March 27, 2019

एंटी सैटेलाइट मिसाइल का राजनीतिकरण



सत्येन्द्र पीएस


भारत अब आधिकारिक रूप से उन देशों के क्लब में शामिल हो गया है, जिनके पास अंतरिक्ष में किसी सैटेलाइल को मार गिराने की क्षमता है। भारत ने एंटी सैटेलाइट मिसाइल से एक लाइव सैटेलाइट को मार गिराया, जो अंतरिक्ष में 300 किलोमीटर दूर लो अर्थ ऑर्बिट में स्थित थी। यह क्षमता अब तक रूस, अमेरिका और चीन के पास थी। निश्चित रूप से भारत के हिसाब से यह बड़ी उपलब्धि है।

तकनीक में बहुत आगे बढ़ चुकी है दुनिया
पिछले 2 दशक में विश्व ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में सबसे ज्यादा प्रगति की है। इसकी वजह से हमारे हाथों में सैटेलाइट मोबाइल आए हैं और एक छोटा सा उपकरण लेकर हम दुनिया के किसी कोने में बैठे अपने किसी भी रिश्तेदार या परिचित से बात कर लेते हैं। वहीं हमारे एटीएम से लेकर पूरी बैंकिंग व्यवस्था को सैटेलाइट्स ने बदल दी है। यह एक दूसरे से इंटरलिंक हैं और हम एक चिप लगे डेबिट या क्रेडिट कार्ड के माध्यम से भारत या दुनिया के किसी कोने से अपना धन आसानी से किसी एटीएम से निकाल लेते हैं। इसमें कोई मानवीय हस्तक्षेप नहीं होता है। यह तकनीक इतनी प्रबल हो गई है, जो एक सामान्य मनुष्य के सिर्फ परिकल्पना में है। हम कहीं जा रहे होते हैं और गूगल मैप ऑन करते हैं, गूगल मैप में अपना गंतव्य स्थल सेट कर देते हैं। गूगल मैप को हमारे देश के चप्पे चप्पे की जानकारी है। अगर हम 10 मीटर भी आगे बढ़ जाते हैं तो गूगल मैप सिगनल देने लगता है कि आपने गलत राह पकड़ ली है और वह यू-टर्न लेने को कहता है, या किसी दूसरे रास्ते की मैपिंग दिखाने लगता है। कहने का आशय यह है कि तकनीक ने 21वीं सदी के मनुष्य को पूरी तरह से सैटेलाइट गाइडेड बना दिया है।

स्वाभाविक है कि तकनीक ने लोगों की जिंदगी आसान की है। हम इन तकनीकों पर पूरी तरह से विकसित देशों यानी अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और यहां तक कि चीन पर निर्भर हैं। हमारे एटीएम का संचालन चीनी तकनीक करती है। मोबाइल पर पिछले 3 साल में चीन की कंपनियों का कब्जा हो गया है और आपके हाथ में तो ओप्पो, विवो, मोटो, का फोन होता है, वह चीनी कंपनियां हैं। और अगर पूरा मोबाइल चीन का नहीं है तो कम से कम उसे खोलने पर बैट्री पर मेड इन चाइना लिखा पाया जाता है। ऐसी स्थिति में अगर भारत के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में कोई तकनीक हासिल कर ली है तो इससे बड़ी खुशी की कोई बात नहीं हो सकती है। इससे उम्मीदों का दरवाजा खुलता है कि भले ही हम चीन, रूस और अमेरिका द्वारा यह उपलब्धि हासिल करने के दशकों बाद स्वदेशी तकनीक से ऐसा करने में सफल हुए हैं, लेकिन यह संभावना है कि हम कुछ बेहतर कर सकते हैं।



देश के नाम संबोधन की घोषणा से भय का माहौल

एंटी सैटेलाइट मिसाइल की घोषणा करने के पहले जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माहौल बनाया, वह अद्भुत है। मोदी ने सुबह सबेरे ट्वीट किया कि मैं 11.45 से 12 बजे के बीच देश को काफी महत्त्वपूर्ण संदेश के साथ देश को संबोधित करूंगा। उसके बाद कई घंटे तक इस ट्वीट का मजाक बना रहा। लोगों को 8 नवंबर 2016 को की गई नोटबंदी की याद आ गई, जब अचानक प्रधानमंत्री टीवी पर नमूदार हुए और उन्होंने कहा कि अब 500 और 1,000 रुपये के नोट लीगल टेंडर नहीं होंगे। कुछ लोगों को लगा कि 2,000 रुपये का नोट बंद होने वाला है। कुछ लोगों ने सोचा कि पाकिस्तान पर कोई एयर स्ट्राइक होने वाला है। तरह तरह की आशंकाएं और मजाक सोशल मीडिया पर चले। इतना ही नहीं इस घबराहट के बीच 12.34 बजे दोपहर बीएसई पर सेंसेक्स 100 अंक नीचे चला गया, जो सुबह 200 अंकों की बढ़त पर कारोबार कर रहा था। अगर देखा जाए तो जनता को ही नहीं, बाजार को भी आशंका थी कि प्रधानमंत्री को कोई नया दौरा पड़ा है और वह राष्ट्र के नाम पर संबोधन में कोई नया पागलपन करने वाले हैं, जिससे देश की अर्थव्यवस्था तबाह होगी। हालांकि जब एंटी सैटेलाइट की घोषणा हुई तो बिजनेस कम्युनिटी ने राहत की सांस ली और मोदी के भाषण के दौरान बाजार 212 अंक चढ़ गया और रक्षा से जुड़े शेयरों में खास तेजी देखी गई।




प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद मिली राहत
प्रधानमंत्री की इस घोषणा से घंटों तक आशंकाओं में गोते लगाते भारत के जनमानस को राहत मिली। तमाम लोगों ने आसमान की तरफ देखा और ऊपर वाले को धन्यवाद दिया कि देश पर कोई नई मुसीबत नहीं आई। तमाम लोगों ने आसमान में देखकर गर्व महसूस किया कि अब हम बहुत ताकतवर हो गए हैं। चुनाव के बीच इस तरह से ताकतवर होने का प्रधानमंत्री ने संभवतः इसलिए एहसास दिलाया कि उसके कुछ वोट बढ़ सकेंगे। पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक से माहौल नहीं बन पा रहा था, जिसके बाद प्रधानमंत्री ने यह दिखाने की कवायद की, जैसे उन्होंने और उनकी पार्टी ने कोई विशेष उपलब्धि हासिल कर ली है और देश मजबूत हुआ है।
प्रधानमंत्री ने एंटी सैटेलाइट मिसाइल का राजनीतिक इस्तेमाल किया, डीआरडीओ के वैज्ञानिकों की उपलब्धि को अपनी उपलब्धि बताने की कवायद की है, यह राजनीति में नई गिरावट कही जा सकती है। लेकिन इसमें सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार ने स्वायत्त संस्थानों को नष्ट करने की कवायद की है। एंटी सैटेलाइट मिसाइल के परीक्षण के कुछ घंटे बाद रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के पूर्व महानिदेशक विजय कुमार सारस्वत नमूदार हुए। सारस्वत इस समय नीति आयोग के सदस्य के रूप में सरकार द्वारा उपकृत हैं। उन्होंने कहा कि 2012 में यूपीए सरकार से अग्नि 5 के परीक्षण के समय ही एंटी सैटेलाइट मिसाइल के परीक्षण की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन नहीं मिली। मंजूरी मिल जाती तो हम तभी ए-सैट की क्षमता हासिल कर चुके होते।


संस्थानों का खतरनाक राजनीतिकरण
इस बयान से लगता है कि सरकार न सिर्फ संस्थानों का राजनीतिकरण कर रही है बल्कि जनरल वीके सिंह जैसे सेना के अधिकारियों, राजकुमार सिंह जैसे आईएएस अधिकारियों, सत्यपाल सिंह जैसे आईपीएस अधिकारियों को सांसद और फिर मंत्री बनाकर उपकृत करने की कड़ी में अन्य तमाम अधिकारियों को नेता बन जाने की पेशकश कर रही है। अब तक संस्थानों को राजनीति से मुक्त रखा गया था, जो शांत माहौल में अपना काम करते थे, लेकिन भाजपा और मोदी सरकार ने संदेश दे दिया है कि अगर उनके पक्ष में अधिकारी बयान देते हैं और पहले की सरकारों की आलोचना करते हैं तो उन्हें पुरस्कार दिया जाएगा।
इस क्रम में विजय कुमार सारस्वत की नई एंट्री है। सारस्वत ने डीआरडीओ के प्रमुख रहते हुए 2012 में इंडिया टुडे पत्रिका को दिए गए भारी भरकम साक्षात्कार में कहा था कि भारत ने एंटी सैटेलाइट मिसाइल तैयार कर लिया है और अब वह अंतरिक्ष में लाइव किसी सैटेलाइट को मार गिराने में सक्षम है। प्रधानमंत्री ने जब राष्ट्र के नाम संबोधन कर इस एंटी सैटेलाइट मिसाइल का राजनीतिकरण कर दिया, उसके तुरंत बाद कांग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर कहा गया कि 1962 में पं. जवाहर लाल नेहरू द्वारा स्थापित किए गए भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम और इंदिरा गाँधी के द्वारा स्थापित किए गए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने हमेशा अपनी उपलब्धियों से भारत को गौरवान्वित किया है। केंद्र सरकार को लगा कि कांग्रेस इसका श्रेय लेने की कोशिश कर रही है। इस पर केंद्र सरकार की ओर से केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जोरदार पलटवार किया, वहां तक तो ठीक है। लेकिन सरकार ने सारस्वत को मैदान में उतार दिया।

टाइमिंग पर सवाल तो उठेंगे ही
ऐसे में सारस्वत से सवाल पूछा जाना लाजिम है कि अगर 2012 में उपलब्धि हासिल हो गई थी और मई 2014 में भाजपा की सरकार बन गई तो ताकतवर प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में ही परीक्षण की अनुमति क्यों नहीं दे दी? सारस्वत की सरकार से नजदीकी इससे समझी जा सकती है कि उन्हें मोदी ने नीति आयोग का सदस्य बनाकर उपकृत कर रखा है। ऐसे में उन्होंने यह सलाह तत्काल ही क्यों नहीं दी कि कांग्रेस इसके परीक्षण की अनुमति न देकर करीब डेढ़ साल की देरी कर चुकी है, अब यह परीक्षण तत्काल हो जाना चाहिए। यह सवाल उठना लाजिम है कि इतनी बेहतरीन टाइमिंग सारस्वत और उनकी टीम ने किस तरह से निर्धारित कराई कि एक पूरी तरह से तैयार एंटी सैटेलाइट मिसाइल का परीक्षण तब हो सका है, जब लोकसभा चुनाव के लिए मतदान शुरू होने में 14 दिन बचे हैं और 11 अप्रैल 2019 को लोकसभा चुनाव के पहले चरण के लिए मतदान होना है।


प्रधानमंत्री का ऐलान
प्रधानमंत्री ने 27 मार्च 2019 को ऐलान किया कि भारत ने अंतरिक्ष में एंटी सैटेलाइट मिसाइल से एक लाइव सैटेलाइट को मार गिराते हुए आज अपना नाम अंतरिक्ष महाशक्ति के तौर पर दर्ज कराया और ऐसी क्षमता हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया। प्रधानमंत्री ने कहा हर राष्ट्र की विकास यात्रा में कुछ ऐसे पल आते हैं जो उसके लिए अत्यधिक गौरव वाले होते हैं और आने वाली पीढय़िों पर उनका असर होता है। आज कुछ ऐसा ही समय है। मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा कहा, “मिशन शक्ति के तहत भारत ने स्वदेशी एंटी सैटेलाइट मिसाइल ए सैट से तीन मिनट में एक लाइव सैटेलाइट को सफलतापूर्वक मार गिराया। उन्होंने बाद में ट्वीट किया मिशन शक्ति की सफलता के लिए हर किसी को बधाई।”
मोदी ने कहा कि हमने जो नई क्षमता हासिल की है, यह किसी के विरूद्ध नहीं है बल्कि तेज गति से बढ़ रहे हिन्दुस्तान की रक्षात्मक पहल है। उन्होंने वैज्ञानिकों को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी और उनकी सराहना भी की। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि इससे किसी अंतरराष्ट्रीय कानून या संधि का उल्लंघन नहीं हुआ है। भारत हमेशा से अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ के विरूद्ध रहा है और इससे (उपग्रह मार गिराने से) देश की इस नीति में कोई परिवर्तन नहीं आया है। मोदी ने कहा कि मिशन शक्ति एक अत्यंत जटिल ऑपरेशन था जिसमें उच्च कोटि की तकनीकी क्षमता की आवश्यकता थी। वैज्ञानिकों द्वारा निर्धारित सभी लक्ष्य और उद्देश्य प्राप्त कर लिए गए हैं।
कांग्रेस ने भारत की उपग्रह रोधी मिसाइल क्षमता के सफल इस्तेमाल के लिए वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए केंद्र सरकार पर वैज्ञानिकों की इस उपलब्धि का भी श्रेय लेने की कोशिश करने का आरोप लगाया। ग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, “रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिकों को इस उपलब्धि के लिए बहुत-बहुत मुबारक और शुभकामनाएं। भारत ने एक और मील का पत्थर कायम किया है। यह क्षमता 2012 में डीआरडीओ ने हासिल कर ली थी। इसके बाद आज इसका व्यावहारिक परीक्षण किया गया।” उपग्रह रोधी मिसाइल की सफलता की घोषणा स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए जाने के कारण इस उपलब्धि से चुनावी
लाभ लेने के आरोपों के बारे में पूछने पर सुरजेवाला ने कहा, “जब सब कुछ खोने लगे, जब राजनीतिक धरातल खिसक जाए, जब कुछ भी हासिल न हो रहा हो, जब 15 लाख रुपए वाले जुमलों की पोल खुल जाए, जब किसान इंसाफ मांगे, और जब कांग्रेस की न्याय योजना से घबराहट शुरू हो जाए तो उस हड़बड़ी में कुछ भी करना पड़ता है।” उन्होंने कहा कि इससे पहले भी उपग्रह प्रक्षेपण से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अनगिनत उपलब्धियां हासिल की गई हैं और आगे भी यह सिलसिला जारी रहेगा। उन्होंने कहा, “हमारे वैज्ञानिकों की उपलब्धियों के लिए सभी सरकारों का डीआरडीओ को पूरा सहयोग और समर्थन रहा। लेकिन यह शायद पहला मौका है जबकि प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिकों की उपलब्धि को सार्वजनिक किया। यह वही व्यक्ति है जिसने हिंदुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड को नष्ट कर दिया।”


युद्ध के समय कारगर तकनीक
यह एक ऐसी तकनीक है, जो किसी देश के साथ युद्ध की स्थिति में कारगर है। अगर इस तकनीक को हासिल कर लिया जाए तो युद्ध के दौरान दुश्मन देश के सैटेलाइट को ध्वस्त कर उसकी पूरी संचार प्रणाली को तबाह किया जा सकता है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे युद्ध की स्थिति में आगे बढ़ने की होड़ मानता है। हालांकि विकसित देश अब इतने आगे बढ़ चुके हैं कि वे एक बग या वायरस डालकर किसी देश की पूरी बैंकिंग प्रणाली तक नष्ट कर सकते हैं या उसे अपने कब्जे में ले सकते हैं। वहीं गूगल को भारत के चप्पे चप्पे की लोकेशन पता है और कौन सा व्यक्ति किस गली में किस मकान में रहता है, इसका डेटा अमेरिका के पास मौजूद है। इसे आप अपने मोबाइल में अमेरिकी गूगल मैप खोलकर अपनी लोकेशन पर क्लिक करके जान सकते हैं कि तकनीक कहां तक पहुंच चुकी है। ऐसे में वैश्विक समुदाय मानवोपयोगी तकनीकी विकास के अलावा किसी ऐसी तकनीक का ऐलान नहीं करता, जिससे युद्धोन्माद या भय का वातावरण बने। विकसित देशों ने एंटी सैटेलाइट मिसाइल कई दशक पहले बना ली थी, तो स्वाभाविक रूप से वह इसके बहुत आगे का शोध कर चुके होंगे, उनका परीक्षण भी कर चुके होंगे, लेकिन इसका ऐलान नहीं किया जाता और किसी आपात स्थिति में उसका प्रयोग कर लिया जाता है, जैसे अमेरिका ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1945 में हिरोशिमा और नागाशाकी में परमाणु बम गिराकर अपनी ताकत दिखा दी थी, जिसका ढिंढोरा अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 11 से 13 मई 2018 को पोखरण परीक्षण करके पीटा था।


विदेश मंत्रालय का स्पष्टीकरण

ऐसी स्थिति में विदेश मंत्रालय को भी सामने आना पड़ा। विदेश मंत्रालय ने बताया कि यह डीआरडीओ का प्रौद्योगिकी मिशन था और इस मिशन में उपयोग किया गया उपग्रह निचली कक्षा में मौजूद भारत के उपग्रहों में से एक था। इसमें बताया गया, परीक्षण पूरी तरह से सफल रहा और योजना के तहत सभी मानदंडों को पूरा किया। यह पूरी तरह से स्वदेशी प्रौद्योगिकी पर आधारित था। इसमें स्पष्ट किया गया है कि भारत का परीक्षण किसी देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया है। यह परीक्षण क्यों किया गया, इस सवाल के जवाब में कहा गया कि यह परीक्षण इसलिए किया गया ताकि भारत के अपने अंतरिक्ष संबंधी परिसंपत्तियों की सुरक्षा की क्षमता की पुष्टि की जा सके। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि हम बाहरी अंतरिक्ष में अपने देश के हितों की रक्षा कर सकें। मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया कि भारत का इरादा बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ में शामिल होना नहीं है और उसने हमेशा इस बात का पालन किया है कि अंतरिक्ष का केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ही इस्तेमाल किया जाए।

इसमें कहा गया है कि भारत बाहरी अंतरिक्ष के शस्त्रीकरण के खिलाफ है और अंतरिक्ष आधारित परिसंपत्तियों की सुरक्षा के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का समर्थन करता है। क्या भारत बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ में प्रवेश कर रहा है, इस सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत मानता है कि बाहरी अंतरिक्ष मानवता की साझी धरोहर है और यह सभी राष्ट्रों की जिम्मेदारी है कि इसका संरक्षण किया जाए और अंतरराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी में हुई उन्नति के लाभ को प्रोत्साहित किया जाए। मंत्रालय ने कहा कि भारत बाहरी अंतरिक्ष से जुड़ी सभी अंतरराष्ट्रीय संधियों का पक्षकार है। भारत ने इस क्षेत्र में पारदर्शिता एवं विश्वास बहाली के अनेक उपायों को लागू किया है। भारत बाहरी अंतरिक्ष में पहले हथियारों का प्रयोग नहीं करने के संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव का समर्थन करता है। इसमें कहा गया है कि भारत भविष्य में बाहरी अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का मसौदा तैयार करने में भूमिका अदा करने की उम्मीद करता है।

Wednesday, March 14, 2018

गोरखपुर में संघ के गले की हड्डी बना सामाजिक न्याय


सत्येन्द्र पीएस

गोरखपुर का मठ धराशायी हो गया। इसकी मठाधीशी 1989 के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) संभाल रही थी। यह भारत की राजनीति की बड़ी परिघटना है, जो राजनीति की दिशा तय करने में अहम हो सकती है। ऐसे में इस जीत को लेकर कयास लगाया जाना स्वाभाविक है। गोरखपुर के इतिहास में यह भी पहली घटना है कि स्वतंत्रता के बाद से पहली बार वहां गैर ब्राह्मण, गैर ठाकुर सांसद प्रवीण कुमार निषाद बने हैं।

1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी। 1991 में पीवी नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने। 1996 में 13 दिन की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बाद हरदनहल्ली डोड्डागौड़ा देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने। 1998 में आम चुनाव के बाद अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। 2004 में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और 2009 में कांग्रेस के कामयाब होने पर फिर से सरदार को भारत का सरदार बनने का मौका मिला। 2014 में कांग्रेस के पिटने के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने।

लेकिन गोरखपुर में 1989 सिर्फ और सिर्फ भाजपा, हिंदू महासभा का कब्जा रहा। कोई असर नहीं पड़ा कि जनता दल सरकार बना रही है, कांग्रेस सरकार बना रही है या संयुक्त मोर्चे की सरकार है। पहले लगातार महंत अवैद्यनाथ चुनाव जीतते रहे और 1998 के बाद से योगी आदित्यनाथ चुनाव जीतने लगे। अवैद्यनाथ के निधन के बाद योगी आदित्यनाथ महंत बन गए और 2017 में भाजपा की यूपी में जीत के बाद आदित्यनाथ मुख्यमंत्री भी हो गए।

इसके पहले भी गोरखपुर आरएसएस और दक्षिणपंथियों के हिंदुत्व की प्रयोगशाला रहा है। गोरखनाथ मंदिर के महंत दिग्विजयनाथ हिंदू महासभा और घोड़ा मय सवार चुनाव चिह्न पर 1967 में सांसद बने थे और बाद में 1970-71 में महंत अवैद्यनाथ सांसद बने। उसके बाद कांग्रेस, भारतीय लोक दल के सांसद हुए। 1989 में मंदिर की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा फिर जागी। जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जनता दल बनाई तो गठजोड़ में गोरखपुर की सीट जनता दल के खाते में गई और महंत अवैद्यनाथ ने हिंदू महासभा से चुनाव लड़कर जीत दर्ज की। उसके बाद जितने भी लोकसभा चुनाव हुए, मंदिर के महंत भाजपा से चुनाव लड़ते रहे और जीतते रहे।

इसके अलावा गोरखपुर पर गीता प्रेस का भी असर है। वहां से धेरों धार्मिक पुस्तकें छपती हैं। रामचरित मानस के अलावा तमाम धार्मिक पुस्तकें हैं जो गीता प्रेस छापता है। अत्यंत सस्ती या कहें कि बिल्कुल मुफ्त होने के कारण उन किताबों की पहुंच स्थानीय लोगों तक आसानी से हो जाती है और उससे धार्मिक भावनाएं भी भरपूर पैदा होती हैं।

गीता प्रेस और गोरखनाथ मठ के मठाधीशों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा ने गोरखपुर को हिंदुत्व का अखाड़ा बना दिया और उसका परिणाम यह हुआ कि 1989 से लेकर 2018 के उपचुनाव तक लगातार गोरखपुर संसदीय सीट पर मठ पर कब्जा बना रहा।
फिर आखिर ऐसा क्या बदलाव हो गया, जिसकी वजह से भाजपा का यह मठ ऐसे समय में उजड़ गया, जब यहां के मठाधीश ही राज्य के मुख्यमंत्री हैं? तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। आदित्यनाथ का कैंडीडेट न होना, आदित्यनाथ को कमजोर करने के लिए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा कैंडीडेट को हरा दिया जाना, सपा-बसपा गठबंधन आदि आदि। तमाम तर्क हैं, तर्कों की अपनी अपनी व्याख्याएं हैं। यह भी एक तर्क है कि ईवीएम छेड़छाड़ न कर भाजपा सरकार ने उपचुनाव जीत जाने दिया, जिससे कि लोकसभा चुनाव में आसानी से धांधली की जा सके। यह सब तर्क हैं और तर्कों के पक्ष में तमाम तर्क-वितर्क हैं।

गोरखपुर ब्राह्मण बनाम ठाकुर का गढ़ रहा है। पहले भी कभी ठाकुर और कभी ब्राह्मण जीतते रहे हैं। कांग्रेस बारी बारी से ब्राह्मण और ठाकुर कैंडीडेट ट्राई करती रही थी। गोरखनाथ मंदिर ने जब ठाकुरवाद के साथ हिंदुत्व का काक्टेल किया तो उन्होंने अजेय बढ़त बना ली। कई बार मनोज तिवारी से लेकर हरिशंकर तिवारी तक को आजमाने की कोशिश की गई, लेकिन कभी भी सफलता नहीं मिली। इस बीच समाजवादी पार्टी ने पिछड़े वर्ग के निषाद प्रत्याशियों पर दांव खेले। बसपा ने पिछड़े वर्ग के सैथवार प्रत्याशी केदारनाथ सिंह पर दांव खेला, लेकिन कुल मिलाकर असफलता ही हाथ लगी। ठाकुरवाद और हिंदुत्व के कॉक्टेल की तोड़ कोई नहीं तोड़ सका।

इस बीच गोरखपुर विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में भी ठाकुर बनाम ब्राह्मण चलता रहा। छात्र संघ चुनाव में कोई प्रत्याशी पंडी जी का होता था और कोई बाऊ साहेब का। और अंग्रेजों के जमाने के जेलर की तरह आधे वोटर इधर और आधे उधर बंट जाते थे। करीब सभी पदों पर ब्राह्मण और ठाकुर प्रत्याशी जीत जाते। पहली बार इस समीकरण को उपाध्यक्ष पद के प्रत्याशी के रूप में मौजूदा बसपा नेता विश्वजीत सिंह ने तोड़ा था और वह विश्वविद्यालय उपाध्यक्ष बनने में सफल रहे थे। हालांकि उसके बाद कुछ वर्षों तक चुनाव नहीं हुआ और कभी हुआ भी तो छात्र फिर से आधे इधर और आधे उधर में बंटते रहे।

2014 की नरेंद्र मोदी सरकार गोरखपुर की छात्र राजनीति में टर्निंग प्वाइंट था, जब पिछड़े और दलित वर्ग के कुछ बच्चे समझने लगे कि यह खेल गड़बड़ है। इतना ही नहीं, आंकड़े भी आने लगे कि 1989 के बाद संसद और राज्य विधानसभाओं में पिछड़े वर्ग के सांसदों और विधायकों के चुनाव में लगातार बढ़ रही थी, लेकिन भाजपा के पूर्ण बहुमत आने के साथ ही उल्टी गंगा बहने लगी। 2014 में संसद में पिछड़े वर्ग के सांसदों की संख्या 1989 के बाद सबसे कम हो गई। गोरखपुर के कुछ छात्र इसे लेकर न सिर्फ चिंतित हुए बल्कि उन्होंने संगठित होने का काम भी शुरू कर दिया।

दर्शन शास्त्र के छात्र रहे हितेश सिंह ने यह पहल की। उन्होंने न सिर्फ गोरखपुर विश्वविद्यालयों के छात्रों की जातीय स्थिति और उनकी सोच को देखा, बल्कि उन्होंने बताना शुरू किया कि अगर कोशिश की जाए तो चुनाव जीता भी जा सकता है। शुरुआत हुई फूलन देवी की जयंती मनाने से। गोरखपुर के आसपास निषाद बड़ी संख्या में हैं और ओबीसी आरक्षण के बाद विश्वविद्यालय में भी ठीक ठाक संख्या में पहुंचते हैं। उसके बाद शाहू जी जयंती, अंबेडकर जयंती, फुले जयंती के माध्यम से दलितों पिछड़ों की एका बनाने की कवायद विश्वविद्यालय में हुई। मुस्लिम छात्रों को जोड़ने की भी कवायद हुई, जो 1991 में हुए दंगों के बाद से अलग कट चुके थे। गोरखपुर में स्थिति यह हुई थी कि 1991 के बाद से जो भी हिंदू मुस्लिम मिक्स कॉलोनियां थीं, वहां अगर मुस्लिम कम हैं तो उन्होंने घर और जमीन बेचकर मुस्लिम बहुल इलाके में अपना आशियाना बसा लिया और जिन इलाकों में हिंदू कम संख्या में थे, उन्होंने अपने मकान बेचकर हिंदू बहुल इलाके में घर खरीद लिए। ऐसे में हिंदू मुस्लिम पूरी तरह से अलग अलग टापू पर बस चुके हैं। इन अलग टापू पर बसे विद्यार्थियों को भी दलित पिछड़े छात्रों ने जोड़ना शुरू किया।

इसका परिणाम भी आया। सामाजिक न्याय के लिए लड़ रहे विद्यार्थियों ने विश्वविद्यालय चुनाव आते आते अपने प्रत्याशी उतार दिए। प्रत्याशी उतारे जाने तक किसी को कोई भान नहीं था कि गोरखपुर की राजनीति किस तरह बदल रही है। वजह यह थी कि न तो इसका कोई औपचारिक नाम था, न कोई गठजोड़, न कोई पार्टी कार्यालय, न किसी का वरदहस्त। बस इतना ही था कि विद्यार्थी उदा देवी पासी, फूलन देवी, सावित्री बाई फुले, ज्योतिबा फुले, भीम राव अंबेडकर, शाहू जी महराज की जयंती मनाते। उन्हें याद करते। उन पर चर्चा करते और सामाजिक न्याय के सपने देखते। लेकिन 2016 के चुनाव में सामाजिक न्याय अघोषित प्रत्याशी अरविंद कुमार उर्भ अमन यादव अध्यक्ष पद पर विजयी रहे। मंत्री पद पर पवन कुमार अपने एक हमनाम पवन कुमार पांडेय के चलते बहुत मामूली मत से हारे। मंत्री पद पर स्वतंत्र उम्मीदवार ऋचा चौधरी जीतने में कामयाब रहीं। वहीं पुस्तकालय मंत्री के पद पर आमिर खान जीत गए। उपाध्यक्ष पद के लिए सामाजिक न्याय वालों ने कोई प्रत्याशी नहीं उतारा था, जिसका फायदा सपा छात्र सभा के अमित यादव को मिला और वह एक स्वतंत्र प्रत्याशी अखिल देव त्रिपाठी से महज 20 मतों से हार गए। गोरखपुर की छात्र राजनीति के इतिहास में पहली बार अध्यक्ष और मंत्री पद पर पिछड़े वर्ग के विद्यार्थी जीतने में कामयाब हुए। पिछड़े वर्ग के सैंथवार जाति से ताल्लुक रखने वाले हितेश सिंह को साथ मिला अनुसूचित जाति में चमार जाति के युवा नेता धीरेंद्र प्रताप का। धीरेंद्र प्रताप बहुजन राजनीति करते हैं। अच्छे बॉडी बिल्डर हैं। अन्य विद्यार्थियों को शारीरिक शैष्ठव में निपुण बनाते हैं। साथ ही बुद्धलैंड की मांग कर रहे हैं। उन्होंने बुद्धलैंड राज्य निर्माण आंदोलन समिति बना रखी है।

चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रत्याशियों का बहुत बुरा हाल हुआ। भारतीय जनता पार्टी भले ही विधानसभा चुनाव जीत गई, लेकिन शहर से लेकर गांव तक लोगों को यह सताने लगा कि विश्वविद्यालय से निकले विद्यार्थी गोरखपुर की ब्राह्मण-क्षत्रिय राजनीति और मठ व हिंदुत्व के कॉक्टेल से अलग संकेत दे रहे हैं।

2017 में जब सामाजिक न्याय के ग्रुप ने गोरखपुर में आक्रामक तरीके से प्रचार शुरू किया तो चुनाव स्थगित करने के माहौल बनाए जाने लगे। विद्यार्थियों का आंदोलन अद्भुत एका पैदा कर रहा था। उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा खुद गोरखपुर आए। उन्होंने कुछ मानकों का हवाला देकर चुनाव कराने से ही इनकार कर दिया।

विद्यार्थियों को तो गोरखपुर में चुनाव नहीं लड़ने दिया गया, लेकिन भाजपा पर इसका खौफ भरपूर हुआ। छात्रों ने राजनीतिक स्तर पर संगठन और तेज किया। पहले सपा में रहे काली शंकर यादव ने अपने नाम के सामने काली शंकर ओबीसी लगा दिया। हितेश सिंह की कवायद के बाद गोरखपुर में लोकसभा चुनाव के ठीक पहले त्रिशक्ति सम्मेलन हुआ, जिसमें ओबीसी से जुड़ी तमाम जातियों ने हिस्सा लिया और कहा कि जो भी दल हमारी भागीदारी बढ़ाने की मांग करेगा, हम उसे समर्थन करेंगे।

इस बीच गोरखपुर से सपा ने निषाद पार्टी से गठजोड़ कर प्रवीण कुमार निषाद को सपा प्रत्याशी घोषित कर दिया। उसके दूसरे दिन काली शंकर ने प्रेस कान्फ्रेंस कर प्रवीण कुमार को समर्थन देने की घोषणा कर दी। इसके अलावा चौधरी अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल ने भी सपा के प्रत्याशी को समर्थन देने की घोषणा कर दी। भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले सैंथवार जाति के गंगा सिंह सैंथवार ने प्रवीण कुमार के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता करके समर्थन की घोषणा की, जो लोकदल के पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख हैं। इसके अलावा बसपा अध्यय मायावती की ओर से हरी झंडी मिलते ही बसपा के कार्यकर्ता भी समर्थन में आ गए। गोरखपुर में बसपा के नेता शिवांग सिंह बताते हैं कि बहन जी की घोषणा के बाद ही हम लोग सड़कों पर आ गए और सपा के प्रत्याशी का प्रचार करना शुरू कर दिया गया।

डॉ हितेश सिंह कहते हैं कि विद्यार्थियों का जागरूक होना बहुत मायने रखता है। महज 4 साल में दलित पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों में गांव गांव में यह अलख जगा दी कि मठ के महंत आदित्यनाथ के सांसद रहने से गोरखपुर रसातल में जा रहा है। हितेश कहते हैं, “अगर योगी आदित्यनाथ के करीब 15 साल के काल में उनके संसद में दिए भाषणों को सुनें तो उनकी प्राथमिकता पर आईएसआई, हिंदू मुस्लिम विवाद अहम रहता था। यहां तक कि वह अपने मसले को लेकर संसद में रोए भी। वहीं गोरखपुर में पिछले 30 साल से औसतन हर साल 700 बच्चे दिमागी बुखार से मर जाते हैं, गोरखपुर रेलवे मुख्यालय कई भागों में विभाजित हुआ, रोजगार छिन गया, फर्टिलाइजर बंद हो गया, मेडिकल कॉलेज को हर साल बंद करने की धमकी मिलती रही। यह सब मुद्दे आदित्यनाथ के लिए गौड़ रहे।”

गोरखपुर में भाजपा की हार ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा का छात्र राजनीति से भय नाहक नहीं है। चाहे जेएनयू हो, चाहे हैदराबाद हो, चाहे इलाहाबाद। भाजपा के एजेंडे पर लगातार छात्र राजनीति रहती है। दिलचस्प है कि भाजपा को वहां कोई दिक्कत नहीं हो रही है, जहां कांग्रेस के छात्र संगठन हैं। कम्युनिस्ट छात्र संगठन भाजपा को असहज करते हैं। और अगर कहीं सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले छात्र नेता उभरने लगते हैं तो वह भाजपा के लिए गले की हड्डी है।

और अब सामाजिक न्याय नाम की हड्डी भाजपा के गले में अटक चुकी है। दो उपचुनाव जीतने के बाद सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जिसकी आबादी सबसे ज्यादा है, उसे संघी लोग कीड़ा मकोड़ा समझते हैं। सपा बसपा के लोगों को सांप छछूंदर बोला। यादव ने आज घोषणा की कि सामाजिक न्याय विकास में बाधक नहीं है, विकास एजेंडा में रहेगा, लेकिन यह सामाजिक न्याय के साथ होगा।


Tuesday, January 16, 2018

आरक्षण विरोधियों ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के पहले अनुसूचित जाति का आरक्षण खत्म करने के लिए बनाया था वीपी सरकार पर दबाव

(यह लेख 1990 में वीपी सिंह सरकार द्वारा अन्य पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के बाद केदारनाथ सिंह के विभिन्न भाषणों का अंश है। केदारनाथ सिंह 1989 में पिपराइच विधानसभा क्षेत्र से जनता दल विधायक थे और वीपी सिंह के अहम साथियों में से एक रहे हैं। लेखक की कवायद है कि उसकी अविकल प्रस्तुति की जाए, जिससे मूल भावना में कोई बदलाव न हो। वीपी सिंह सरकार गिराए जाने को लेकर इस लेख से एक नया नजरिया सामने आता है कि किस तरह से विरोधियों ने मंडल आयोग की सिफारिश लागू होने के पहले ही आरक्षण के मसले पर वीपी सिंह सरकार को घेरना शुरू कर दिया था- सत्येन्द्र पीएस)


केदारनाथ सिंह

आरक्षण विरोधी मुहिम चलाने वाले जनता दल के पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह पर आरोप लगाते हैं कि अनुसूचित जाति, जनजाति का आरक्षण कायम रखते हुए मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर अन्य पिछड़े वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने से देश के अंदर जातीय तनाव पैदा हो गया है। इसमें कितनी सत्यता है, इसका विवेचन आवश्यक है। जनता दल व हमारे सरीखे लोग जहां सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण को एक आवश्यकता महसूस करते हैं वहीं आरक्षण विरोधी आंदोलन चलाने वाले तत्व इसे अनुचित करार देते हैं। आरक्षण उचित नहीं है, इस पर आरक्षण विरोधी अपना तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं परंतु जातीय दुर्भावना उभारने में किसका हाथ रहा है, पिछली घटनाओं के आधार पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि आरक्षण विरोधी आंदोलन चलाने वाले लोग कुलीन तंत्र के घोर पोषक हैं और एक जाति विशेष के अलावा किसी को भी सत्ता में भागीदारी नहीं देना चाहते हैं।
संविधान लागू होने के साथ ही अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। यह व्यवस्था स्वर्गीय पंडित जवाहरलाल नेहरू, उनकी पुत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी व उनके पौत्र श्री राजीव गांधी के समय भी लागू रही। क्या कारण है कि उनके समय में आरक्षण विरोधी मुहिम चलाने वाले कुलीन तंत्र के लोग खामोश बैठे रहे? अब जब गैर ब्राह्मण सत्ता परिवर्तन के बाद सत्ता में आया है तो यह तत्व आरक्षण विरोधी मुहिम चलाने का काम करते हैं।
पिछली घटनाओं पर अगर नजर डालें तो मामला साफ हो जाता है। सन 1977 में आपातकाल की ज्यादतियों से ऊबकर जब जनता ने जनता पार्टी को सत्ता सौंपी तो उस समय जगन्नाथ मिश्र के स्थान पर एक नाई के लड़के कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री बने। इसी तरह उत्तर प्रदेश में पंडित नारायण दत्त तिवारी को हटाकर पिछड़ी जाति के राम नरेश यादव मुख्यमंत्री बने। केंद्र में इंदिरा गांधी की जगह मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनी। उस समय 1977-78 में आरक्षण विरोधी आंदोलन चलाकर आरक्षण विरोधियों द्वारा जातीय दुर्भावना का प्रदर्शन किया गया। लोकसभा व विधानसभाओं में आरक्षण की अवधि को 10 साल के लिए बढ़ाया जाना था, जिसका विरोध शुरू हो गया, जबकि आरक्षण 1980 में बढ़ाया जाना था।
अगर आरक्षण विरोधियों ने उस समय विरोध शुरू किया था तो उन्हें विरोध जारी रखना चाहिए था। लेकिन 1980 में इंदिरा गांधी के सत्ता में आते ही आरक्षण विरोधी आंदोलन वापस ले लिया गया, जबकि उस समय आरक्षण की अवधि 10 साल के लिए बढ़ाई जानी थी।
आरक्षण विरोधी तत्व 10 साल तक खामोश रहे। जैसे ही सत्ता में गैर ब्राह्मण वर्ग का दबदबा हुआ और 1989 में बिहार में लालू प्रसाद, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और देश के प्रधानमंत्री वीपी सिंह बने, आरक्षण विरोधी आंदोलन फिर शुरू हो गया। आरक्षण विरोधी तत्व वीपी सिंह के सत्ता संभालने के बाद 5 दिन तक भी खामोश नहीं बैठ सके।
यह कौन सा मानदंड है? यह किसी के समझ में आने वाली चीज नहीं है। कोई चीज यदि किसी की नजर में गलत है तो उसकी नजर में जब तक कोई परिवर्तन नहीं होता, गलत ही रहेगी। आरक्षण व्यवस्था ब्राह्मणवादी शाशन व्यवस्था के अंतर्गत उचित करार दिया जाए और गैर ब्राह्मणवादी शासन में अनुचित करार दिया जाए, यह जातीय दुर्भावना नहीं तो और क्या है।
राजीव गांधी और उसके पहले के शासनकाल में जो आरक्षण व्यवस्था अनुसूचित जाति के लोगों के लिए थी, उसमें वीपी सिंह ने कोई बदलाव नहीं किया, सत्ता में आने पर उसमें कोई बढ़ोतरी नहीं की। इसके बावजूद वीपी सिंह को 5 दिन भी कुर्सी पर चैन न लेने देने का क्या कारण है? यदि कुर्सी पर बैठते ही तत्काल कोई परिवर्तन किया गया होता तो आरक्षण विरोधी मुहिम चलाने का कोई औचित्य होता। मंडल आयोग की सिफारिशें भी उस समय लागू नहीं की गई थीं। फिर भी आरक्षण विरोधी आंदोलन चला दिया गया।
कुलीनतंत्र के पोषकों ने जनता दल की सरकारों व वीपी सिंह के समक्ष ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी, जिसका समाधान ढूंढना कठिन हो गया। वास्तव में तथाकथित कुलीन तंत्र जो तिकड़म करके अपने को अनुसूचित जाति का ठेकेदार समझता था, उसने एक सुनियोजित षड़यंत्र के द्वारा एक खतरनाक जाल फेंकने का काम किया। देश के अंदर इस आंदोलन को चलाकर राष्ट्र की संपत्ति बर्बाद की गई। बस व ट्रेनें फूंकी गईं। देश के अंदर हिंसक वारदातें हुईं। इन घटनाओं में जाने अनजाने में पिछड़े वर्ग ने भी शिरकत की। कुल मिलाकर कुलीन तंत्र ने वीपी सिंह के सामने ऐसी स्थिति खड़ी कर दी कि वे घबराकर अनुसूचित जाति का आरक्षण खत्म कर दें और अनुसूचित जाति के लोग उनकी गोद में बैठ जाएं या वीपी सिंह सत्ता से हट जाएं। ऐसी स्थिति में वीपी सिंह और उनके केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दूरदर्शिता का परिचय देतेहुए अपने चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक 7 अगस्त 1990 को अन्य पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की घोषणा की।
इससे अलग थलग पड़े अनुसूचित जाति को सुरक्षा की गारंटी मिली और पिछड़े वर्ग के गरीब लोगों को सामाजिक न्याय मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। परिणाम यहहुआ कि इन कुलीन तंत्र के साथ में पिछड़े वर्ग के जो लोग आरक्षण विरोधी मुहिम में शामिल थे और भ्रमित थे, उनका नजरिया साफ हो गया और आरक्षण विरोधी आंदोलन फीका पड़ गया।
आरक्षण विरोधी आंदोलन की आड़ में ऐसे भी उदाहरण आए हैं कि नौनिहाल बच्चे बच्चियों को जिंदा जलाकर आत्मदाह का ढोंग रचाने का जघन्य अपराध किया गया। इससे निकृष्ट तत्व समाज को और कहां मिल सकते हैं?
कुलीन तंत्र के पोषकों ने वीपी सिंह और उनकी सरकार को लंगड़ी मारकर गिराने की कोशिश की, लेकिन वीपी सिंह ने इसके जबावमें ऐसा धोबियापाट मारा कि यह लोग चारों खाने चित्त हो गए। धोबियापाट से घायल कुलीन तंत्र केलोग बौखला गए और वीपी सिंह व जनता दल के नेताओं, कार्यकर्ताओं पर कातिलाना हमले शुरू हो गए। बम फेके गए। काफिले पर ईंट पत्थर बरसाए गए। अगर यह कुलीन तंत्र ठाकुर जाति को बर्दाश्त नहींकर सका तो और किसी दूसरी जाति को कहां ठिकाना मिलेगा?
कुलीन तंत्र अपनी तिकड़म से हजारों साल से राज करते रहे हैं। देश में नगण्य संख्या में रहते हुए भी सत्ता को नहीं छोड़ना चाहते और लोकतंत्र का हनन कर रहे हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकारों पर इन्हें आस्था नहीं है। इस मुद्दे पर हारने के बाद इस चालाक कुलीनतंत्र ने गुपचुप तरीके से अलग योजना बनाई।
जारी.....


Monday, December 25, 2017

सहकर्मियों के संरक्षक और यारों के यार थे शेखर


स्मृतिशेष

सत्येन्द्र पीएस


प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया के धुरंधर खिलाड़ी शशांक शेखर त्रिपाठी नहीं रहे। यह बार बार कहने, सुनने, फोटो देखने पर भी अहसास कर पाना मुश्किल होता है। करीब दस दिन पहले लखनऊ के पत्रकार साथी कुमार सौवीर ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा कि शेखर कौशांबी के यशोदा अस्पताल में भर्ती हैं। यूं तो यशोदा हॉस्पिटल का नाम सुनकर हल्की सिहरन होती है कि जब कोई गंभीर मामला होता है, तभी इस पांच सितारा मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल में जाता है, लेकिन शेखर का मकान कौशांबी में ही है। ऐसे में बात आई-गई हो गई। फिर 5 दिन बाद शेखर के एक साथी प्रभु राजदान ने शाम को घबराई हालत में फोन किया और कहा कि आपको पता है कि शेखर त्रिपाठी हॉस्पिटल में एडमिट हैं?

(निगमबोध घाट पर शशांक शेखर त्रिपाठी का शव ले जाते उनके मित्र व परिजन)

फिर मैं गंभीर हुआ। प्रभु ने बताया कि इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में वेंटिलेटर पर हैं। बोल पाने में सक्षम नहीं हैं। उस समय ऑफिस से अस्पताल तो न जा सका, लेकिन दूसरे रोज करीब साढ़े 10 बजे पहुंचा। रिसेप्शन पर पता चला कि आईसीयू में मिलने का वक्त सुबह साढ़े 9 से 10 बजे के बीच होता है। मैंने प्रभु को फिर फोन मिलाया और उन्होंने शेखर के बड़े बेटे शिवम का मोबाइल नंबर दिया। फोन पर बात हुई तो रिसेप्शन पर ही मुलाकात हो गई। शिवम ने बताया कि हॉस्पिटल में मिलने का वक्त निर्धारित है और उसके अलावा मिलने नहीं देते हैं। सिर्फ मुझे जाने देते हैं।
बातचीत में ही पता चला कि करीब 10 रोज पहले पेट में हल्का दर्द शुरू हुआ था। 3-4 रोज दर्द चला। उसके बाद शेखर बताने लगे कि कॉन्सटीपेशन हो गया है। टॉयलेट साफ नहीं हो रही है। करीब 2 रोज यह प्रक्रिया चली। फिर अचानक एक रोज बाथरूम में बेहोश हो गए और उन्हें यशोदा हॉस्पिटल लाया गया।

(अंतिम संस्कार की कवायद)

पेट की ढेर सारी जांच हुई। डॉक्टरों ने बताया कि इंटेस्टाइन यानी आंत में क्लॉटिंग है। उस समय शेखर का शुगर लेवल भी ज्यादा था। लेकिन डॉक्टरों ने ऑपरेशन करने का फैसला किया। ऑपरेशन थियेटर में जाते जाते शेखर मुस्कराते हुए गए। वरिष्ठ पत्रकार और चंडीगढ़ से प्रकाशित हिंदी ट्रिब्यून के संपादक डॉ उपेंद्र बताते हैं कि कहकर गए थे कि 10 मिनट का ऑपरेशन होता है, सब ठीक हो जाएगा। सबको आश्वस्त करके ऑपरेशन थिएटर में गए थे।
डॉक्टरों के मुताबिक क्लॉटिंग की वजह से गैंगरीन हो गया था। आंत पूरी काली पड़ गई थी। इन्फेक्शन वाला पूरा हिस्सा चिकित्सकों ने निकाल दिया। लेकिन उसके बाद शुगर का स्तर बढ़ने, पेशाब होने, सांस में तकलीफ के कारण उन्हें आईसीयू में रखा गया। चिकित्सकों का कहना है कि इन्फेक्शन होने की वजह से शुगर कंट्रोल नहीं हो रहा था और दवा का डोज बढ़ाकर किसी तरह शुगर कंट्रोल किया जा रहा था और इन्फेक्शन खत्म करने की कवायद की जा रही थी। इस तरह से यह कवायद एक सप्ताह चली और आखिरकार 24 दिसंबर 2017 को दोपहर करीब 2 बजे यशोदा अस्पताल के चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
एक रोज पहले देखने गया तो हॉस्पिटल की व्यवस्था ने मुझे आईसीयू में देखने जाने नहीं दिया। शेखर के परिजन हर संभव कवायद कर रहे थे कि वह उठ खड़े हों। उनकी पत्नी रिसेप्शन पर लगी साईं बाबा की मूर्ति के सामने कोई किताब लेकर पाठ कर रही थीं। दोनों बच्चे शनि देवता समेत कई देवताओं के यहां माथा नवा रहे थे। मेरे सामने ही दूध लाया गया, जिसे शेखर के हाथ से छुआकर किसी देवता को चढ़ाया गया।

(अंतिम संस्कार के बाद शेखर के पुराने साथी, सहकर्मी प्रभु राजदान, डॉ उपेंद्र व अन्य)

उनके बड़े बेटे से देर तक बात होती रही। अपने बारे में बताया कि किस तरह से चिकित्सक धमकाते हैं। यह भी कहा कि करीब 5 बार मुझसे और मेरे परिजनों से इलाज के दौरान लिखवाया गया कि आप मर ही जाएंगे और मैं मुस्कुराते हुए लिखता था और मन में यही सोचता था कि किसी भी हाल में मरेंगे तो नहीं ही। आते आते उनके बेटे से मैंने यही कहा कि कुछ नहीं होगा। बहुत आईसीयू देखा है। डॉक्टर सब पागल होते हैं। शेखर जी जल्द ही आईसीयू से बाहर होंगे। मेरी बात सुनकर शिवम मुस्कराया तो राहत महसूस हुई।
दूसरे रोज साढ़े नौ बजे अस्पताल पहुंच गया। शेखर जी का छोटा बेटा आईसीयू में उनके बगल में खड़ा था। एक तरफ मैं खड़ा हो गया। स्तब्ध सा खड़ा था। आईसीयू तो ठीक, लेकिन शेखर बोल-बतिया और पहचान नहीं रहे हैं, यह देखकर बड़ी निराशा हुई। लोगों ने बताया कि ऑपरेशन के बाद से ही यही हालात है। मैं इतना दुखी और निराश था कि वहां रुक नहीं पाया। दोपहर होते होते फेसबुक के माध्यम से ही पहली सूचना मिली कि शेखर का निधन हो गया।
ऐसे भी कोई जाता है भला... हममें से तमाम लोग हैं जिनके पेट में दर्द होता रहता है। अक्सर लोग पेट दर्द की एकाध गोली खा लेते हैं। लेकिन डॉक्टर को शायद की कोई दिखाता है। शेखर चेन स्मोकिंग करते थे। शुगर की प्रॉब्लम थी। लेकिन पेट में पहले से कोई प्रॉब्लम नहीं था। आखिर कैसे कोई यह अहसास कर ले कि बीमारी इस दिशा में ले जाएगी। सब कुछ अचानक हुआ।
शेखर से मेरा पहला सामना वाराणसी में 2004-05 के आसपास हुआ। वह उन दिनों हिंदुस्तान अखबार के स्थानीय संपादक थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के सुरक्षाकर्मी और प्रॉक्टोरियल बोर्ड पत्रकारों व फोटोग्राफरों से मारपीट में कुख्यात थे। उस समय में ईटीवी उत्तर प्रदेश के लिए खबरें भेजता था। बीएचयू में करीब रोजाना ही आना जाना होता था। ऐसे में सुरक्षाकर्मियों को भी झेलना पड़ता था। एक रोज हिंदुस्तान अखबार के एक फोटोग्राफर और कुछ रिपोर्टरों के साथ बीएचयू के सुरक्षाकर्मियों से हाथापाई हो गई। सभी पत्रकार व फोटोग्राफर आंदोलित थे। यह देखकर आश्चर्य हुआ कि हिंदुस्तान अखबार के स्थानीय संपादक शेखर त्रिपाठी पत्रकारों को लीड कर रहे हैं। न सिर्फ वह लीड कर रहे थे बल्कि नारेबाजी में भी शामिल हो रहे थे। बढ़ता हंगामा देखकर कुलपति ने शेखर को बातचीत के लिए आमंत्रित किया। लेकिन वह नहीं गए। बहुत देर तक पत्रकार कुलपति के आवास को घेरे रहे। आखिरकार बीच बचाव में यह सहमति बनी कि हर अखबार के प्रतिनिधि कुलपति से एक साथ मिलेंगे। उसके बाद कुलपति से वार्ता हुई। कुलपति ने घटना के लिए व्यक्तिगत रूप से खेद जताया और आश्वासन दिया कि आइंदा इस तरह की घटना न हो, इसका पूरा ध्यान रखा जाएगा। तब जाकर शेखर कुलपति आवास से हटे थे।

(मुखाग्नि देने के पूर्व की धार्मिक कवायद में शेखर त्रिपाठी के दोनों पुत्र, रिश्तेदार)

हिंदुस्तान टाइम्स के प्रभारी प्रभु राजदान से मेरी अच्छी मित्रता थी। मित्रता क्या, बनारस में हम लोग एक ही कमरे में रहते थे। उन्हीं के सामने शेखर त्रिपाठी भी बैठते थे और मेरा करीब करीब रोजाना ही हिंदुस्तान कार्यालय जाना होता था क्योंकि काम पूरा करने के बाद मैं और प्रभु एक साथ ही कमरे पर जाते थे। धीरे धीरे करके शेखर त्रिपाठी से भी बातचीत होने लगी और ठीक ठाक संबंध बन गए।
हालांकि उन संबंधों को घनिष्ट संबंध नहीं कहा जा सकता था, लेकिन शेखर ने जिस तरह हिंदुस्तान बनारस में टीम बनाई और अखबार की दिशा दशा बदली, वह खासा आकर्षक था। उन दिनों शेखर त्रिपाठी की टीम में रिपोर्टिंग कर चुके कुमार सौवीर कहते हैं कि शेखर ने हमें खबरें लिखना सिखाया। वह खुद बहुत कम लिखते, लेकिन खबर किसे कहते हैं, उसकी जबरदस्त समझ थी। उन दिनों काशी की संस्कृति पर चल रही एक सिरीज की याद दिलाते हुए सौवीर बताते हैं कि शेखर ने ऊपर 6 कॉलम में बनारस की खबर लगाई। समूह संपादक मृणाल पांडे की किसी विषय पर दी गई टिप्पणी को महज दो कॉलम स्थान दिया। सौवीर कहते हैं कि यह सोच पाना भी मुश्किल है कि कोई स्थानीय संपादक अपने समूह संपादक के लिखे को दरकिनार कर एक बहुत छोटे से रिपोर्टर की खबर से अखबार भर दे।
शेखर त्रिपाठी ने हिंदुस्तान अखबार में संपादक रहते खेती बाड़ी को खास महत्त्व दिया। इसको इसतरह से समझा जा सकता है कि उन दिनों हिंदुस्तान वाराणसी में मुख्य संवाददाता रहे डॉ. उपेंद्र से खेती-बाड़ी पर रोजाना एक खबर लिखवाई जाती थी। उस मौसम में जो भी फसल बोई जाने वाली रहती, या बोई जा चुकी रहती, उसके रखरखाव से लेकर रोगों, रोगों के रोकथाम के तरीकों पर डॉ उपेंद्र की खबर आती थी। इसके अलावा खेती को किस तरह से कमर्शियल बनाया जाए, किसानों की आमदनी किस तरह से बढ़े, यह शेखर की दिलचस्पी के मुख्य विषय रहते थे। बीएचयू के इंस्टीट्यूट आफ एग्रीकल्चरल साइंस के प्रोफेसरों के अलावा आस पास के जितने भी कृषि शोध संस्थान थे, उनके विशेषज्ञों की राय लेकर डॉ उपेंद्र खबरें लिखा करते थे।
इसके अलावा काशी की बुनकरी पर शेखर त्रिपाठी की जबरदस्त नजर रहती थी। प्रशासन की अकर्मण्यता के खिलाफ खबरें खूब लिखवाई जातीं। जिलाधिकारी से लेकर बुनकरी से जुड़े जितने भी अधिकारी रहते, उनकी जवाबदेही, सरकार द्वारा दिए जा रहे धन के उचित इस्तेमाल होने या न होने पर खबरें लिखी जाती थीं। कालीन का शहर कहे जाने वाले भदोही से शेखर ने खूब खबरें कराईं। खबरें इतनी तीखी होती थीं कि तमाम गुमनाम पत्र और फोन आने लगे और यहां तक कि दिल्ली मुख्यालय तक शिकायत पहुंच गई कि भदोही का रिपोर्टर पैसे लेता है और पैसे न देने पर खिलाफ में झूठी खबरें लिखता है।

(अपने साथियों, सहकर्मियों, परिजनों को छोड़ लकड़ियों के ढेर में छिपे शेखर)

उन दिनों को याद करते हुए भदोही में रिपोर्टर रहे सुरेश गांधी कहते हैं कि मेरी तो नौकरी ही जाने वाली थी। हाथ पांव फूल गए कि इन तमाम झूठे आरोपों का क्या जवाब दे सकता हूं। दिल्ली मुख्यालय से गांधी से मांगे गए स्पष्टीकरण का सुरेश गांधी की जगह शेखर त्रिपाठी ने खुद जवाब भेजा। सुरेश गांधी कहते हैं, “मेरा उनसे तो व्यक्तिगत जुड़ाव था, उन्होंने ही मुझे भदोही का न सिर्फ ब्यूरो चीफ बनाया बल्कि मेरी शिकायत किए जाने पर डीएम-एसपी की जमकर बखिया उधेड़ी थी। यहां तक हिन्दुस्तान की समूह संपादक रही मृणाल पांडेय द्वारा जारी मेरी शिकायती पत्र के जवाब में कहा था मैं सुरेश गांधी को व्यक्तिगत जानता हूं, उसके जैसा तो कोई पूर्वांचल मंर नहीं हैं, वह जवाबी लेटर आज भी मैं संभाल कर रखे हूं।“
अपने अधीनस्तों के साथ हर हाल में खड़े रहना शेखर की आदत में शामिल था। हिंदुस्तान वाराणसी के बाद उन्होंने दैनिक जागरण लखनऊ में स्थानीय संपादक का कार्यभार संभाला। दैनिक जागरण में भी पत्रकारों के लिए किसी से भी लड़ जाने के किस्से बहुत विख्यात हैं। जागरण लखनऊ में उनके साथ काम कर चुके नरेंद्र मिश्रा बताते हैं कि लखनऊ में एक बार आईबीएन के ब्यूरो चीफ रहे शलभ मणि त्रिपाठी से पुलिस के सर्किल अधिकारी से हाथापाईं हो गई। पत्रकारों ने प्रशासन के खिलाफ रात में ही प्रदर्शन शुरू कर दिया। रात में वरमूडा और टीशर्ट पहने शेखर त्रिपाठी खुद पहुंच गए पत्रकारों के विरोध प्रदर्शन में। उसके बाद तो जागरण की पूरी टीम ही पहुंच गई। यह जानकर कि जागरण के स्थानीय संपादक खुद प्रदर्शन में आए हैं, प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ पांव फूल गए। तत्कालीन एसएसपी ने शेखर से कहा कि आपको यहां नहीं आना चाहिए था, आप घर जाएं। अधिकारी के कहने का आशय जो भी रहा हो, लेकिन शेखर ने उन्हें बहुत तेज डांटा और कहा कि अगर हम अपने रिपोर्टर्स के लिए नहीं खड़े होंगे तो कौन खड़ा होगा, कौन सुनेगा उनकी। उस दिन कोयाद कतते हुए नरेंद्र मिश्र कहते हैं कि उसके बाद तो हम पत्रकारों का सीना चौड़ा हो गया और इतना तीखा विरोध प्रदर्शन हुआ कि प्रशासन को झुकना पड़ा सीओ का तत्काल ट्रांसफर किया गया, इलाके के एसओ को लाइन हाजिर किया गया। नरेंद्र मिश्र बताते हैं कि उन दिनों मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं और किसी के लिए यह कल्पना करना भी कठिन था कि पत्रकारों के विरोध प्रदर्शन से किसी अधिकारी का बाल बांका हो सकता है, लेकिन शेखर त्रिपाठी ने जो ताकत दी, उससे हम लोग कार्रवाई करा पाने में सफल हो पाए।

(अंतिम गंतव्य स्थल, जहां परिजन छोड़ आते हैं)

उसके बाद शेखर त्रिपाठी दिल्ली में दैनिक जागरण की डिजिटल टीम के प्रभारी हो गए। मैं पहले से ही दिल्ली में था। जागरण आना जाना अक्सर होता था। या यूं कहें कि शेखर त्रिपाठी और डॉ उपेंद्र से मिलने ही जागरण जाना होता था। जब भी मिलते तो वह आर्थिक खबरों के बारे में ही बात करते। शेयर बाजार, कंपनियों, देश की अर्थव्यवस्था आदि आदि। मैं भी जहां तक संभव हो पाता, उन्हें बताने की कोशिश करता था। फिर बाहर निकल जाते, सिगरेट और चाय पीने। जागरण दफ्तर के आगे एक पकौड़े की दुकान हुआ करती थी, जहां वह भूख लगी होने अक्सर पकौड़े खिलाया करते थे। सिगरेट और चाय तो होती ही थी। हालांकि हाल के दो-तीन साल से लगातार मेरा स्वास्थ्य खराब होने और डॉ उपेंद्र के चंडीगढ़ चले जाने पर जागरण आना जाना करीब छूट गया था, लेकिन फिर भी सूचनाएं मिलती रहती थीं।
हाल में शेखर त्रिपाठी जागरण की वेबसाइट पर एक खबर लिखे जाने को लेकर चर्चा में आए। ट्रिब्यून हिंदी के संपादक और शेखर के करीबी रहे डॉ उपेंद्र कहते हैं, “शेखर त्रिपाठी, दैनिक जागरण के इंटरनेट एडीटर थे, और दैनिक जागरण लखनऊ के संपादक, दैनिक हिंदुस्तान वाराणसी के संपादक, आज तक एडीटोरियल टीम के सदस्य रहे। फाइटर इतने जबरदस्त कि कभी हार नहीं मानी। कभी गलत बातों से समझौता नहीं किया। किंतु जागरण डॉट कॉम के संपादक रूप में दायित्व निभाते संस्थान हित में वह दोष अपने ऊपर ले लिया जिसके लिए वे जिम्मेदार ही नहीं थे। चुनाव सर्वेक्षण प्रकाशन के केस में एक रात की गिरफ्तारी और फिर हाईकोर्ट में पेंडिंग केस के कारण बीते छह महीने से संपादकीय कारोबार से दूर रहने की लाचारी ने उन्हें तोड़ दिया।”
यह शेखर की आदत ही थी कि वह कभी अपने अधीनस्थ को नहीं फंसने देते थे। स्थानीय अधिकारियों, नेताओं, माफिया, अपने संस्थान के वरिष्ठों से अपने जूनियर सहयोगियों के लिए भिड़ जाते थे। जागरण वेबसाइट में सर्वे आने का मामला भी निश्चित रूप से उनसे सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था। विभिन्न माध्यमों से खबरें आती हैं और वह लगती जाती हैं। लेकिन टीम का प्रभारी होने के नाते उन्होंने मरते दम तक जवाबदेही अपने ऊपर ली।

(और यूं सबको छोड़कर अग्नि में समाकर अनंत में विलीन हो गए शेखर)

पत्रकारिता जगत में इस शेखर जैसे जिंदादिल इंसान कम ही देखने को मिलते हैं। बेलौस, बेखौफ गाड़ी लेकर रातभर घूमना, पहाड़ों की सैर करना, बाइकिंग उनकी आदत में शुमार था। उनके ठहाकों, मुस्कुराते चेहरे के तो जूनियर से लेकर सीनियर तक सभी सहकर्मी कायल थे। वरिष्ठ पत्रकार अकु श्रीवास्तकव लिखते हैं, “जिंदगी ऐसी है पहेली… कभी तो रुलाए.. कभी तो हंसाए.. शेखर ने रोना तो सीखा ही नहीं था। मस्ती उनकी जिंदगी का हिस्सा रही। जिम्मेदारी उन्होंने हंस हंस कर ली और जो दूसरों की मदद कर सकते थे, की। 35 साल से ज्यादा जानता रहा, गायब भी रहे... पर सुध लेते रहे। उनके प्रशंसकों की लंबी फेहरिस्त है। लार्जर देन लाइफ जीने वाले 6 फुटे दोस्त को प्रणाम।”
अपने सहकर्मियों की दाल रोटी की चिंता से लेकर पत्रकारीय दायित्व तक पर नजर रखने वाले और जहां तक बन पड़े, लीक से हटकर मदद करने वाले पत्रकार बिड़ले ही मिलते हैं।
आप बहुत याद आएंगे शेखर।

Sunday, December 17, 2017

गुरु गोरक्षनाथ के नाम पर मेरिट की हत्या, नियमों को ताक पर रखकर प्रो. सुग्रीवनाथ तिवारी ने की अपनी बेटी को पुरस्कार देने की सिफारिश

सत्येन्द्र पीएस


उत्तर प्रदेश के गोरखपुर विश्वविद्यालय में मेरिट की हत्या का अद्भुत कारनामा सामने आया है। अपनी बेटी को पुरस्कार दिलाने के लिए विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने सभी नियमों को ताक पर रख दिया। मेधावी छात्र मुंह ताकते रह गए। प्रोफेसर के इस कांड का खुलकर विरोध हो रहा है, वहीं इस मसले का खुलासा करने वाले विश्वविद्यालय के एक और प्रोफेसर को धमकियां मिलने लगी हैं।
राज्य में योगी आदित्यनाथ के सत्ता संभालने के बाद एक खास तबके के हौसले बुलंद हैं। यह मेडल नाथ संप्रदाय के प्रसिद्ध योगी के नाम पर “महायोगी गुरु गोरखनाथ गोल्ड मेडल” शुरू किया गया। मेडल शुरू किया जाना निश्चित रूप से सरकार का एक बेहतरीन फैसला था, जिसके माध्यम से विशिष्ट शोध के लिए दिया जाना था।

गोरखपुर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में 103 छात्र छात्राओं को डिग्रियां दी जानी हैं। इसके बावजूद विशिष्ट मेडल के लिए सिर्फ दो नाम भेजे गए। इसमें एक नाम भौतिक विज्ञान की शोध छात्रा गार्गी तिवारी का था और दूसरा बॉटनी के शोध छात्र का। बॉटनी के शोध छात्र को इस सूची से यह कहकर बाहर कर दिया गया क्योंकि उसे 2016 में डिग्री अवार्ड की जा चुकी है, इसलिए उसे 2017 का विशिष्ट मेल नहीं दिया जा सकता है। आखिर में इस पुरस्कार की एकमात्र दावेदार गार्गी बचीं, जिन्हें इस पुरस्कार के योग्य मान लिया गया।

अब खेल देखिए। शोधार्थी का नाम विभागीय समिति भेजती है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया। अमर उजाला की एक खबर के मुताबिक जिन शोध पत्रों का इंपैक्ट फैक्टर 3.6 और 3.4 है, उन्हें आवेदन फॉर्म जमा करने की सूचना नहीं दी गई। वहीं जिस स्कॉलर को विशिष्ट मेडल दिए जाने की घोषणा की गई है, उसके शोधपत्र का इंपैक्ट फैक्टर 0.3 है। गार्गी की एक बड़ी योग्यता उनके पिता डॉ सुग्रीव नाथ तिवारी हैं, जो भौतिकी के विभागाध्यक्ष हैं।

इस मामले को विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के महामंत्री डॉ. उमेश यादव ने उठाया। उन्होंने कुलपति प्रो. वीके सिंह को पत्र लिखकर कहा कि मेडल सुग्रीव नाथ तिवारी की बेटी गार्गी तिवारी को दिया जा रहा है, जबकि उनसे बेहतर संजय यादव, रवि प्रकाश और दीपेंद्र शर्मा का शोध कार्य है।

भौतिक विभाग के शोध छात्र संजय यादव ने भी पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए डीन आफ साइंस फैकल्टी प्रो. एसके सेनगुप्ता को पत्र लिखकर मेडल के लिए आवेदन जमा करने की अनुमति मांगी है।

जातीय आधार पर द्रोणाचार्यों की अपने शिष्यों का अंगूठा काट लेने की शिकायतें पूरे देश से समय समय पर आती रहती हैं। लेकिन घटती नौकरियों के बीच नव उत्पन्न इन द्रोणाचार्यों ने जाति के भीतर भी अपना गिरोह बना लिया है। विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ सूत्रों का कहना है कि सुग्रीवनाथ तिवारी की बेटी गार्गी निहायत औसत विद्यार्थी है और इसके पहले भी बीएससी और एमएससी की परीक्षाओं में भी उसे धांधली करके ज्यादा नंबर देकर टॉप कराया गया। विश्वविद्यालय में गार्गी के सहपाठियों ने उसे ऐज युजुअल मानकर स्वीकार कर लिया और उनका विरोध क्लासरूम और अपने सहपाठियों के बीच घुटकर रह गया।

गोरखनाथ मेडल देने के नाम की घोषणा होने पर भी विद्यार्थियों के बीच सिर्फ सुगबुगाहट ही थी कि किस आधार पर, कैसे और किस आवेदन पर गार्गी का चय़न कर लिया गया। तमाम छात्र छात्राओं को पुरस्कार के लिए गार्गी के नाम की घोषणा होने के बाद पता चला कि द्रोणाचार्यों ने मिलकर खेल कर दिया है। विद्यार्थी घुट रहे थे। प्रोफेसर सुग्रीव और उनकी फौज विजेता थी। उसी बीच डॉ उमेश यादव ने इस मामले की शिकायत कुलपति से कर दी।

अब महज 2 दिन बाद यह पुरस्कार दिया जाना है। 19 दिसंबर को दीक्षांत समारोह होना है। इस बेइमानी का शिकार सिर्फ दलित पिछड़े नहीं हुए, बल्कि 103 छात्र छात्राएं हुए हैं। सभी अवाक हैं कि आखिर चयन का आधार क्या है।

इस बीच यह मामला उठाने वाले डॉ उमेश यादव को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। विश्वविद्यालय के सूत्रों के मुताबिक सुग्रीवनाथ तिवारी से जुड़े लोग यादव को धमकियां दे रहे हैं। उन्हें नौकरी न कर पाने देने की भी धमकी मिल रही है, जो पहले इस धमकी से शुरू हुई थी कि आपका भी कोई कैंडीडेड होगा तो हमीं लोगों को साथ देना है, सोच लीजिएगा।

गोरखपुर विश्वविद्यालय में एकलव्य का अंगूठा कटवाने की पुरानी परंपरा ये बेईमान कायम रखे हुए हैं, बस स्वरूप बदल गया है। विश्वविद्यालय में शुरू में इन बेईमानों के खिलाफ प्रखर आवाज डॉ अनिरुद्ध प्रसाद ने उठाया था। 'आरक्षण पर धरातली विचार क्यो नही' नामक पुस्तक में उन्होने कथित मेरिट धारियो की जमकर हवा निकाली है और अपने पुराने संस्मरण भी बताए हैं।

बहरहाल अभी इस पुरस्कार से वंचित किए जाने वालों में जिनका नाम सामने आ रहा है, उनमें संजय यादव पहले स्थान पर हैं। यादव के शोधपत्र की प्रशंसा न सिर्फ उनके सहपाठी करते रहे हैं, बल्कि उनके गुरुजन भी उनके लिखे को बेहतरीन मानते रहे हैं। दूसरे स्थान पर रवि प्रकाश का नाम है। रवि प्रकाश तिवारी सेंट एंड्यूज पीजी कॉलेज में में शोधार्थी रहे हैं। वह जाने माने भौतिकविद प्रो. एसए खान के विद्यार्थी हैं, जिनके कुशल नेतृत्व में तिवारी शोध पत्र लिखकर चर्चा में आए थे। तीसरे स्थान पर दीपेंद्र शर्मा का नाम है। दीपेंद्र लोहार समुदाय से हैं। इनका शोध भी लगातार चर्चा में रहा है और सहपाठियों से लेकर इनके गुरुजनों तक को आश्चर्य हो रहा है कि आखिर किस आधार पर दीपेंद्र को छांटा गया है।

कुल मिलाकर देखें तो यह मेरिट को मार डालने का अद्भुत कारनामा है। ब्राह्मणवाद और मनुवाद की गिरोहबंदी किसी को छोड़ने को तैयार नहीं है। यह सब कुछ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की नाक के नीचे, उनकी 3 दशक से कर्मभूमि गोरखपुर में हो रहा है।

Monday, December 11, 2017

सामाजिक न्याय के पहरुआ केदारनाथ सिंह



यादों के झरोखे से
13 दिसंबर को पुण्य तिथि पर विशेष

सत्येन्द्र पीएस

बात 18 दिसम्बर 1990 की है। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू किए जाने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी) की सरकार गिर गई थी। गोरखपुर के तमकुही कोठी मैदान में मांडा के राजा और 1989 के चुनाव के पहले देश के तकदीर विश्वनाथ प्रताप सिंह की सभा होने वाली थी। मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद वीपी सरकार गिर गई। उसके बाद सामाजिक न्याय के मसीहा का पहला और मेगा शो गोरखपुर में हुआ।

पिपराइच के विधायक केदारनाथ सिंह को सभा का संयोजक बनाया गया, महराजगंज के सांसद हर्षवर्धन सिंह कार्यक्रम करा रहे थे। कुल मिलाकर कार्यक्रम में तत्कालीन विधायक केदारनाथ सिंह, हर्षवर्धन और मार्कंडेय चंद की अहम भूमिका थी।
प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी, जो जनता दल (स) में चले गए थे। इसका गठन चंद्रशेखर ने जनता दल को तोड़कर किया था। चंद्रशेखर करीब 40 सांसदों के साथ कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री थे।

(फोटो कैप्शन-फोटो1- मंच पर भाषण देते डॉ संजय सिंह। दाएं से पहले मुलायम सिंह यादव, दूसरे विश्वनाथ प्रताप सिंह और तीसरे केदारनाथ सिंह।)

गोरखपुर में सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गई। इसी बीच 17 दिसंबर को एक अज्ञात सा संगठन सवर्ण लिबरेशन फ्रंट उभरा। उसने चेतावनी दी कि किसी भी हालत में वीपी की सभा नहीं होने दी जाएगी। अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) का आरक्षण लागू होने का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पिछले दरवाजे से विरोध कर रही थी। यही हाल कांग्रेस का था। आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन खुलेआम आरक्षण के विरोध में मैदान में कूद पड़े थे।

सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने सिर्फ धमकी ही नहीं दी, बल्कि सभा के एक दिन पहले केदारनाथ सिंह के आवास परिसर में बम विस्फोट भी कराया। इस मामले में न तो किसी का नाम सामने आया, न गिरफ्तारी हुई। हालांकि पुलिस व्यवस्था और सख्त कर दी गई। केदारनाथ सिंह ने मीडिया में बयान जारी कर ऐलान किया कि सभा हर हाल में और हर कीमत पर होगी। इस तरह की कायराना हरकत करने से अब पिछड़ा वर्ग दबने वाला नहीं है। कुल मिलाकर आरक्षण विरोधियों व आरक्षण समर्थकों के बीच सीधी जंग शुरू हो चुकी थी। निशाने पर थे सैंथवार समाज से आने वाले पिछड़े वर्ग के एकमात्र ताकतवर नेता केदारनाथ सिंह।

सभा के रोज सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने जनता कर्फ्यू लगा दिया। हंगामे को देखते हुए प्रसाशन ने भी स्कूल कॉलेजों को बंद कराना ही उचित समझा। सुबह सबेरे से आरक्षण विरोधियों व आरक्षण समर्थकों के बीच जंग छिड़ चुकी थी। सवर्ण लिबरेशन फ्रंट ने जगह जगह बम विस्फोट कराए। यहां तक कि जनसभा के स्थल तमकुही कोठी मैदान में भी सभा में आए लोगों को निशाना बनाकर बम फेके गए। प्रशासन के हाथ पांव फूले हुए थे। जनता दल के स्थानीय नेताओं और आरक्षण समर्थकों की एक दिन पहले से ही शिकायत आने लगी थी कि डीजल और पेट्रोल की आपूर्ति रोक दी गई है, जिससे कि ट्रैक्टर ट्रालियों में भरकर लोग तमकुही मैदान में न पहुंच सकें। इसके बावजूद किसी न किसी माध्यम से शहर और आसपास के इलाकों से पचास हजार से ऊपर लोग जनसभा में पहुंच चुके थे।

उस समय केदारनाथ सिंह के समर्थन में पहुंचने वाले संजय कुमार सिंह बताते हैं कि उनके पिता जी खुद ट्रैक्टर ट्राली में लोगों को भरकर तमकुही मैदान आए थे। डीजल की कमी की बात स्वीकार करते हुए बताते हैं कि उनके ट्रैक्टर में इत्तेफाक से तेल भरा हुआ था, साथ ही दो रोज पहले ही कंटेनर में भी डीजल भरकर लाया गया था क्योंकि गेहूं की सिंचाई का मौसम चल रहा था। संजय बताते हैं कि उनके पिताजी ने पूरा डीजल कई रिश्तेदारों, परिचितों के ट्रैक्टर में डलवाया। यहां तक कि अपने ट्रैक्टर में से भी डीजल निकालकर जीप और ट्रैक्टरों में डालने के लिए दिया, जिससे कि लोग सभा स्थल तक पहुंच सकें और वहां से वापस लौट सकें। लेकिन हंगामा बढ़ते देख प्रशासन ने 12 बजे के बाद गोरखपुर के चारों तरफ शहर में प्रवेश करने वाली सड़कों की नाकेबंदी कर दी और जनता दल के झंडे डंडे से लैस आम लोगों की गाड़ियों, ट्रैक्टरों को बाहरी इलाके में रोका गया और उन्हें वापस भेजा जाने लगा।

तमकुही कोठी मैदान के बगल में ही केदारनाथ सिंह का सरकारी बंगला था, जिसमें दर्जनों गाड़ियों की पार्किंग थी। संघी ब्रिगेड के जितने छोटे मोटे समूह थे, सभी आरक्षण के विरोध में सक्रिय थे। जिधर से जनता दल नेताओं के वाहन निकलते, पथराव शुरू हो जाते।
केदारनाथ सिंह के पुत्र अजय सिंह ने खुद मोर्चा संभाल रखा था। सभा के संयोजक के रूप में सभी पार्टी कार्यकर्ताओं को उनका निर्देश था कि मांडा नरेश को एक पत्थर नहीं लगना चाहिए, उसके लिए जो भी करना पड़े, वह करें। अपनी जान पर खेलकर उन्हें बचाया जाए। इसी बीच अजय सिंह को सूचना मिली कि कुछ संघी गुंडे बंगले में घुसने की कोशिश कर रहे हैं और हाते में खड़े वाहनों पर पत्थर फेंकने की कवायद में हैं।

अजय ने अपने ड्राइवर से तत्काल आवास की ओर गाड़ी मोड़ लेने को कहा। जैसे ही वाहन रुका, उन्हें निशाना बनाकर बम फेका गया। किसी तरह से वह बचे, लेकिन एक छर्रा उनके पैर में लग गया था।


(फोटो कैप्शन- फोटो 2- एक जनसभा के दौरान एंकरिंग करते हरवंश सिंह भल्ला (बाएं), केदारनाथ सिंह (बाएं से दूसरे) विश्वनाथ प्रताप सिंह, मुलायम सिंह यादव और मुफ्ती मोहम्मद सईद (बैठे हुए क्रमशः बाएं से दाएंं)


पुरानी याद दिलाने पर अजय सिंह ने हंसते हुए बताया कि उनका ड्राइवर डर के मारे बेहोश हो गया था। लगा चिल्लाने, साहब हम मर गए, बाल बच्चेदार आदमी हैं, मेरे परिवार का क्या होगा। हालांकि बाद में पता चला कि उसे बम का एक छर्रा भी नहीं लगा था।
अजय सिंह पर बम फेके जाने तक जीप में बैठे युवा धड़ाधड़ उतर चुके थे। यह तो नहीं पता चला कि बम किसने फेंका था, लेकिन सामने पड़ा विश्व हिंदू परिषद का महानगर मंत्री आनंद कुमार गुप्ता। उसे युवाओं ने पीटना शुरू किया और पथराव कर रहे उसके अन्य सहयोगियों को भी दौड़ाया, जो एकाध हॉकी और थप्पड़ खाने के बाद भागने में सफल हो गए। गुप्ता की जमकर पिटाई हो गई।

उस समय के अखबारों का रुख देखें। स्थानीय अखबार स्वतंत्र चेतना ने “विश्व हिंदू परिषद के मंत्री की असमाजिक तत्वों द्वारा पिटाई” शीर्षक से खबर चलाई। इसमें लिखा गया...
“विहिप महानगर मंत्री आनंद कुमार गुप्त आज अपराह्न लगभग ढाई बजे अपने व्यक्तिगत कार्य से पार्क रोड की सड़क से होते हुए जा रहे थे। जनता दल विधायक केदारनाथ सिंह के घर के सामने उनके लड़के और भतीजे जो कि 8-10 लोगों के साथ सड़क के किनारे खड़े थे, उन्होंने आनंद कुमार गुप्त को देखते ही कहा कि यह विश्व हिंदू परिषद का महामंत्री है, बचकर जाने न पाए। और इतना कहते ही सब लोगों ने स्कूटर धर लिया और आनंद कुमार को ईंटों से मारने लगे। जिससे उनका सर फट गया तथा अन्य जगहों पर भी गंभीर चोटें आईं। भारतीय जनता पार्टी सिविल लाइंस के वार्ड मंत्री श्री रविंद्र कुमार मौर्य ने इस घृणित कृत्य की घोर निंदा करते हुएए कहा कि तुरंद ही अपराधियों को गिरफ्तार किया जाए अन्यथा हम आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।”


स्वतंत्र चेतना अखबार ने सर पर पट्टी बांधे गुप्ता की फोटो भी छापी। अखबार ने कथित रूप से पिटाई करने वाले लोगों का नाम दिया, मौर्य के हवाले से अपराधी लिखा। लेकिन अखबार ने विधायक के पुत्र से बात करने की जहमत भी नहीं उठाई कि आखिर वहां पर क्या हुआ। केवल स्वतंत्र चेतना ही नहीं, करीब सभी अखबारों का रुख सवर्ण लिबरेशन फ्रंट को हीरो बताने वाला था। वीपी की सभा की रिपोर्टिंग भी उसी लहजे में की गई। जनसभा को फ्लॉप शो बताया गया।

वीपी सिंह ने उस रैली में कहा, “भूख एक ऐसी आग है कि जब वह पेट तक सीमित रहती है तो अन्न और जल से शांत हो जाती है और जब वह दिमाग तक पहुंचती है तो क्रांति को जन्म देती है। इस पर गौर करना होगा। गरीबों के मन की बात दब नहीं सकती और अंततः उसके दृढ़ संकल्प की जीत होगी।” सिंह ने कहा, “गरीबों की कोई बिरादरी नहीं होती। दंगों में मारे जाने वाले लोग हिंदू और मुसलमान नहीं, हिंदुस्तान के गरीब लोग हैं। गरीबों के साथ हमेशा अत्याचार होते रहे हैं। इस शोषण अत्याचार को बंद करके समाज के पिछड़े तबके के लोगों को ऊपर उठाना होगा।”

इस सभा के दौरान चौधरी अजीत सिंह का सर फट गया, शरद यादव को भी चोटें आईं। अजीत सिंह ने कहा कि सामाजिक न्याय की ओर कदम बढ़ाने पर इस तरह की बाधाएं आती रहेंगी और हम इसके लिए पूरी तरह से तैयार हैं। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भी सामाजिक न्याय के प्रति निष्ठा जताते हुए घोषणा की कि बिहार सरकार हर हाल में ओबीसी आरक्षण लागू करेगी। लालू प्रसाद और पूर्व गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के भाषण के दौरान सभा स्थल पर बम फेके गए, जिसमें दर्जनों लोग घायल हो गए।
इस बीच सभा स्थल पर मंच पर चढ़ने की कवायद कर रहे लिबरेशन फ्रंट के गुंडों को पीटने के लिए विधायकों तक को सामने आना पड़ा। यह आश्यर्यजनक, लेकिन सत्य है कि मीडिया में खबरें भरी पड़ी हैं कि पुलिस ने आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन, पथराव, बमबाजी कर रहे छात्रों की पिटाई की, लेकिन यह भी खबर है कि पूर्व प्रधानमंत्री, दर्जनों पूर्व कैबिनेट मंत्री, बिहार तत्कालीन मुख्यमंत्री के मंच पर गुंडे चढ़ गए और वह बम और पत्थर मारते रहे। पुलिस उन्हें रोकने में नाकाम रही।

जब मंच पर गुंडे चढ़ गए तो विधायक केदारनाथ सिंह ने मोर्चा संभाला और गुंडों को पीटना शुरू कर दिया। उसके बाद मार्कंडेय चंद ने भी मंच पर चढ़े गुंडों की पिटाई करनी शुरू की और मंच से उन्हें खदेड़ दिया गया। फिर क्या था! जनसभा में आए लोगों ने भी मोर्चा संभाल लिया। जिन लाठियों में झंडे बांधकर लाए गए थे वे लाठियां, बांस निकल गए और पिछड़े वर्ग के लोगों ने मोर्चा संभालकर गुंडों को रोका। पत्थरबाजों को दौड़ा दौड़ाकर मारा। शरद यादव ने जनसभा में ही कहा कि आज की घटनाओं के पीछे भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा विश्व हिंदू परिषद का हाथ है।

उस दौर में पहले नंबर पर रहे आज अखबार की रिपोर्टिंग का भी रुख जानना जरूरी है, जिसे कांग्रेसी अखबार माना जाता रहा है। अखबार ने “वीपी सिंह के राजनीतिक उत्थान के बाद पतन का भी साक्षी बना गोरखपुर” शीर्षक से खबर लिखी, जो कुछ इस तरह थी..

“पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के राजनीतिक उत्थान का जहां गोरखपुर साक्षी रहा, वहीं उसने आज उनका पतन भी देख लिया। वोट की राजनीति के चलते सैकड़ों निर्दोष छात्र छात्राओं को अग्निस्नान तथा आत्महत्या के लिए मानसिक रूप से बाध्य करने के जिम्मेदार वीपी सिंह ने जब 15 माह पहले गोरक्षनाथ की धरती पर कदम रखा था तो यहां की जनता ने उन्हें सिर आंखों पर बैठाया था। लेकिन मंडल के चक्कर में देश में जातिवाद की खाईं पैदा करने वाले वीपी और उनके सहयोगियों ने यहां के लोगों का गुस्सा भी आज देखा और अनुभव किया।
लोकतांत्रिक वामपंथी मोर्चा के बैनर पर आज स्थानीय तमकुही मैदान में बने सभास्थल पर बैठे वीपी सिंह, अजित सिंह, शरद यादव, मुफ्ती मोहम्मद सईद और शरद यादव के अंगरक्षक समेत कई लोग घायल हो गए।
आज नगर के पूर्वी भाग में बम, कट्टा, आंसू गैस, लाठी, ईंट, पत्थर आदि दोपहर से सायंकाल तक चलते रहे। जगह जगह छात्रों ने सड़कों पर अवरोध खड़े किए। गड़बड़ी उस समय शुरू हुई जब आरक्षण विरोधियों द्वारा सभा में व्यवधान डालने की कोशिश की गई और महराजगंज के सांसद हर्षवर्धन ने मंद से लठैतों को पूर्व मंत्रियों की सुरक्षा के लिए चलने को ललकारा।
सभास्थल पर कार से आ रहे पूर्व केंद्रीय मंत्रियों पर पथराव किया गया और बम फेंके गए। परिणामस्वरूप शरद यादव और मुफ्ती मोहम्मद सईद घायल हो गए। जिस समय अजित सिंह मंच पर चढ़ रहे थे, तभी एक पत्थर से उनके सिर में चोटें आईं। शरद यादव का अंगरक्षक टॉमस गंभीर रूप से घायल हो गया। अपराह्न लगभग ढाई बजे जिस समय अजित सिंह घायल होने के बाद मंच पर बैठे, मंच के पास तेज विस्फोट हुआ। सौभाग्य से कोई घायल नहीं हुआ।
इससे पूर्व आज अपराह्न 12.20 बजे तमकुही मैदान के पश्चिमी सड़क पर जमी भीड़ पर जब पुलिस ने लाठी चार्ज किया, उसी समय पहला बम विस्फोट हुआ। यह स्थान मंच से लगभग 200 गज दूर था। इसके बाद सभास्थल के पूर्वी छोर से आरक्षण विरोधियों की बड़ी भीड़ ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया, जिससे मंच पर भी कुछ पत्थर आए और वहां बैठे जद नेता रणजीत सिंहराज घायल हुए। मंच पर भगदड़ मच गई और देखते देखते पूरा मंच खाली हो गया। इसी पथराव में बिहार से आए एक वयोवृद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विष्णु प्रसाद यादव भी घायल हो गए।
सवर्ण आर्मी लिबरेशन फ्रंट ने आज जनता कर्फ्यू का एलान किया था। कल राज भी कई बम विस्फोट हुए थे।
वीपी सिंह तथा बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को हवाई अड्डे से भारी पुलिस सुरक्षा व्यवस्था में सभास्थल तक लाया गया। लालू यादव के भाषण के समय भी बम विस्फोट और सभा में पथराव की अनेक घटनाएं हुईं।
आज अपराह्न 12 बजे से आंदोलनकारी सक्रिय हो गए। पथराव, बमबाजी कर सभा को कई बार भंग करने का प्रयास किया। आंदोलनकारियों ने आज नगर में अनेक वाहनों को आग लगा दी तथा जिलाधिकारी आवास पर जमकर पथराव किया जिससे जिलाधिकारी की कार का शीशा टूट गया।
वीपी सिंह के भाषण के समय पूर्ण शांति रही, लेकिन इससे पूर्व शरद यादव के भाषण के समय से ही पुलिस ने लोगों को सभा स्थल पर जाने से रोक दिया था। भय और आतंक के माहौल के कारण लोग धीरे धीरे सभा स्थल से खिसकने लगे। शरद यादव के भाषण के समय सभास्थल पर जमकर ढेलेबाजी हुई।
बाहर से लाए गए जद कार्यकर्ता डंडों में झंडा लगाकर मुकाबले के लिए पूरी तरह से तैयार होकर आए थे। वीपी के भाषण के समय सभास्थल पर श्रोताओं की संख्या बहुत कम रही। पुलिस द्वारा लाठीचार्ज तथा आंदोलनकारियों के पथराव में दर्जनों घायल हो गए। घायलों में कुछ पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।
श्री सिंह को सभास्थल तक नहीं पहुंचने देने की धमकी दे चुके छात्रों को हटाने के लिए विश्वविद्यालय छात्रावासों में घुसकर पुलिस ने छात्रों की पिटाई की। उत्तेजित छात्रों ने पुलिस पर जमकर पथराव किया। बाद में सब इंसपेक्टर की मोटरसाइकिल पर बम फेका, जिससे उसमें आग लग गई। हॉस्टल रोड को पूरी तरह घेर लिया। वीपी इसी मार्ग से सभास्थल तक गए।”


यह उस दौर की सबसे संतुलित रिपोर्ट थी, जिसे पढ़कर अहसास किया जा सकता है कि अखबार, उसमें लिखने वालों व लोकतंत्र के अन्य कथित झंडाबरदारों का उस दौर में क्या रुख था।


यह पिछड़े वर्ग की सामाजिक जागरूकता न होने का परिणाम था कि आरएसएस व उसके अनुषांगिक संगठनों ने ओबीसी तबके से जुड़े तबकों को ही आरक्षण के विरोध में खड़ा कर दिया था। एक तरह से देखा जाए तो आज जहां मराठा, कापू, पाटीदार, जाट, गूर्जर बड़े पैमाने पर आंदोलन चला रहे हैं और हजारों की संख्या में लोगों की पिटाई हो रही है, सैकड़ों की जान चली गई, गुप्ता और मौर्य मुफ्त में बगैर आंदोलन के आरक्षण पा गए। आज भी पिछड़े वर्ग के ज्यादातर लोग आरक्षण के पीछे अपनी जिंदगी दांव पर लगाने वालों की न तो कद्र करते हैं और न ही उन्हें सम्मान देते हैं। इन लोगों की पीढ़ियां आरक्षण की मलाई चाभ रही है और पिछड़े वर्ग की जिंदगी संवारने वाले मसीहाओं को विस्मृत कर चुकी है।

गोरखपुर में हुई वीपी की इस जनसभा के बाद केदारनाथ सिंह निशाने पर आ गए। स्वाभाविक है कि आरक्षण विरोधियों के निशाने पर वह थे ही, आरक्षण समर्थकों ने भी उनकी भरपूर उपेक्षा की। ओबीसी तबके की ओर से ओबीसी आरक्षण का विरोध लगातार जारी था। ओबीसी तबके की ज्यादातर जातियों का यह मानना था कि आरक्षण होने से उनका जातीय डिमोशन हो गया है और वह अनुसूचित जाति/जनजाति बना दिए गए हैं।


(फोटो कैप्शन-फोटो 3- कांग्रेस (जे) के जनता दल में विलय के मौके पर केदारनाथ सिंह, हरवंश सिंह भल्ला, विश्वनाथ प्रताप सिंह और मुलायम सिंह यादव (बाएं से दाएं)

जनता दल के नेता शरद यादव ने 25.08.1992 से 6.11.92 तक मंडल रथ यात्रा निकाली। इसका मकसद न सिर्फ यह बताना था कि सरकार ओबीसी रिजर्वेशन को लेकर साजिश न करे, साथ ही पिछड़ा वर्ग भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो। शरद यादव ने घोषणा की, “हम वर्तमान केंद्र की सरकार को खबरदार करना चाहते हैं कि हमें उनकी नीयत का पता है। हमें यह भी पता है कि अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास मंडल कमीशन द्वारा उत्पन्न पिछड़े व दलितों के जागरण को कब्र में भेजने की यह चतुर द्विज चाल है।”

शरद ने जनता को यह बताने की कोशिश की कि किस तरह से पिछड़े वर्ग के खिलाफ साजिश कर उन्हें सरकारी नौकरियों में नहीं जाने दिया। आरक्षण की नींव को समझाया। स्वतंत्रता के 40 साल बाद भी उच्च सेवाओं में देश में पिछड़े वर्ग की 60 प्रतिशत आबादी की नौकरियों में 5 प्रतिशत से भी कम हिस्सेदारी और नीति निर्धारक सरकारी पदों पर प्रतिनिधित्व न होने का मसला उठाया।
केदारनाथ सिंह ने भी पूर्वांचल में पिछड़ों की आबादी को जागरूक करने का बीड़ा उठा लिया। सबसे तीखा विरोध उन्हें खुद अपनी जाति के लोगों से उठाना पड़ा। गरीबी और बहुत कठिन जीवन जी रहे लोगों को संपन्न तबका बरगला रहा था कि आरक्षण पाने से वह जातीय पद सोपान में अनुसूचित जाति/ जनजाति के समकक्ष खड़े हो जाएंगे। सिंह ने पिछड़े वर्ग, खासकर अपनी जाति के लोगों को यह समझाने में शेष जिंदगी खर्च कर दी कि आरक्षण पाने से कोई जाति नीची नहीं होती। समाज में कुर्मी समुदाय की भी बहुत प्रतिष्ठा है, साजिशन उन्हें सरकार के उच्च पदों पर प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है।

इसके साइड इफेक्ट भी हुए। जनता पार्टी में वित्त मंत्री मधुकर दिघे से भारी मतों से कांग्रेस (जे) से चुनाव जीतकर 1980 में विधानसभा से औपचारिक राजनीति की शुरुआत करने के बाद केदारनाथ सिंह का राजनीति में ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा था। उन्होंने उसके बाद लगातार राजनीति में नए आयाम स्थापित किए। कांग्रेस की आंधी में वह महराजगंज से लोकसभा चुनाव लडे। उस दौर में जहां लोग कांग्रेस के ऐरे गैरे प्रत्याशियों से एक लाख से ऊपर के मतों के अंतर से हार रहे थे, केदारनाथ सिंह महराजगंज से महज डेढ़ हजार वोट से चुनाव हारे थे। वीपी ने जब कांग्रेस से निकलकर अलग दल बनाया तो पूर्वांचल में उन्होंने केदारनाथ सिंह को अपने पाले में लाने की हर संभव कवायद की। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 1980 में जगजीवन राम की कांग्रेस (जे) के 18 विधायक जीतकर आए थे, और सदन में उन विधायकों के नेता थे केदारनाथ सिंह। आखिरकार वीपी की भारी भरकम कवायदों के बीच कांग्रेस जे का जनता दल में विलय हो गया। विलय के मौके पर आयोजित जनसभा में वीपी के अलावा मुफ्ती मोहम्मद सईद, संजय सिंह, मुलायम सिंह यादव सहित जनता दल के तमाम दिग्गज नेता तमकुही कोठी मैदान में जमा थे। केदारनाथ सिंह 1989 में पिपराइच विधानसभा से फिर से चुनकर विधायक बन गए। वीपी के खास रहे केदारनाथ सिंह उस समय मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में शामिल नहीं हुए। उन्हें संगठन का काम सौंपा गया। यहां तक कि विधायी कार्रवाई में भी केदारनाथ सिंह अहम माने जाते थे। 1989 में वर्तमान समाजवादी नेता आजम खां ने विधानसभा में राज्यपाल का अभिभाषण फाड़ डाला तो उनके खिलाफ कार्रवाई की तलवार लटकने लगी। उसमें भी केदारनाथ सिंह ने पूरे मामले की बाकायदा ड्राफ्टिंग की और विधायी नियमों व विधायकों के अधिकार को स्पष्ट कराने में अहम भूमिका निभाई। आखिरकार आजम खां के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने पाई।

हालांकि 1990 के आरक्षण आंदोलन के बाद केदारनाथ सिंह को कभी पूर्वांचल में उभरने नहीं दिया गया। उन्हें उन पिछड़ों ने ही लगातार उपेक्षित किया, जिनके हक के लिए उन्होंने लाठियों, गोलियों व बम का मुकाबला किया।

केदारनाथ सिंह पिपराइच से भी लड़े, जहां अमूमन 80 प्रतिशत दलित और पिछड़े वर्ग के लोग हैं। उसके बाद वह गोरखपुर से सांसद का चुनाव भी लड़े। लेकिन पिछड़े तबके ने कभी उनका साथ नहीं दिया और लगातार चुनाव हारते रहे। यह अलग बाद है कि समाजवादी पार्टी के पुरोधा मुलायम सिंह यादव ने उन्हें अपने साथ बनाए रखा और भरपूर सम्मान भी दिया। इतना ही नहीं, किन्ही वजहों से एक बाद केदारनाथ सिंह सपा से नाराज हो गए। उस समय उन्हें तत्कालीन बसपा पुरोधा कांशीराम ने अपने पास बुलाया और बसपा से उन्हें न सिर्फ टिकट दिया, बल्कि पार्टी कैडर को पूरी तरह से सक्रिय होकर साथ देने का निर्देश भी दिया। लेकिन उसके बाद वह न कभी सांसद चुनाव जीते, न विधायक का।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वाले सबसे बड़े योद्धा के रूप में केदारनाथ सिंह का नाम प्रमुख है। हाशिए पर खड़ा समाज हमेशा उनकी चिंता का विषय रहा। उनके समर्थक आज भी सम्मान से उन्हें “बाबू जी” कहते हैं।

केदारनाथ सिंह का जन्म उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के राजपुर गांव के एक संपन्न परिवार में हुआ। उनके पिता श्रवण कुमार सिंह इलाके के जमींदार थे। भारत के स्वतंत्र होने के पहले राजपुर, महुअवा, कुन्नूर (बोदरवार) तक करीब 50 वर्ग किलोमीटर के इलाके की जमींदारी उनके प्रशासन क्षेत्र में आती थी। उनकी माता रामरती सिंह भी एक संपन्न जमींदार परिवार की थीं। अत्यंत सुविधासंपन्न परिवार में 7 सितंबर 1938 को जन्मे केदारनाथ सिंह की शिक्षा दीक्षा में कोई कमी नहीं रही और उन्हें बेहतरीन कॉलेजों में पढ़ने का मौका मिला। लेकिन पिपराइच के दलित पिछड़े बहुत इलाके की गरीबी ने उनके दिलो दिमाग पर गहरा असर डाला। शुरुआत में जहां उनके पिता ने परोक्ष रूप से स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की, स्वतंत्रता के बाद पिपराइच क्षेत्र से कांग्रेस के नेता अक्षयबर सिंह को लगातार 3 बार चुनाव जिताने में अहम भूमिका निभाई, वहीं केदारनाथ सिंह ने कांग्रेस से अलग वंचित तबके की आवाज बनना उचित समझा। शारदा सिंह से विवाह के बाद वह पारिवारिक जीवन में उतरे। इस उनके 4 पुत्र हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। बड़े पुत्र अजय कुमार सिंह उर्फ राकेश सिंह सैंथवार समाजवादी पार्टी से जुड़े हैं और हाल तक राम आसरे विश्वकर्मा के नेतृत्व में पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य रहे। दूसरे नंबर के पुत्र अजित कुमार सिंह लखनऊ में बसे हैं और एक सफल कारोबारी हैं। डॉ आशीष कुमार सिंह दांत के चिकित्सक हैं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहते हैं। वहीं सबसे छोटे पुत्र अमित कुमार सिंह बेंगलूरु में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं।

केदारनाथ सिंह अंतिम समय तक वंचित तबके की लड़ाई लड़ते रहे। देश में सांप्रदायिक हिंसा की प्रयोगशाला रहे गोरखपुर में उन्होंने लगातार समरसता के लिए आवाज बुलंद की। केदारनाथ सिंह का सपना था कि 100 में 85 प्रतिशत वंचित आबादी को उसका हक मिले और वह इसके लिए लगातार संघर्ष करते रहे। भले ही चुनावी राजनीति ने उन्हें खारिज कर दिया, लेकिन वह अंत तक सच्चे समाजवादी नेता बने रहे। उनका सपना बना रहा कि लोग जाति की मानसिकता से उबरकर वर्ग हित में सोचें और पिछड़ा वर्ग जातियों में विभाजित न होकर वर्ग के रूप में उभरे। यह सपना देखते और इस सपने पर काम करते हुए उन्होंने भले ही अपना चमकता राजनीतिक जीवन कुर्बान कर दिया और सभी सुख, सुविधाएं उनसे दूर होती गईं लेकिन जीवन के आखिरी पल तक बाबू जी आम लोगों के दिलों में बसे रहे। गरीबों, वंचितों के बाबू जी का 13 दिसंबर 2012 को निधन हो गया। पिछड़ा वर्ग भले ही जातियों के खांचे में हिचकोले खा रहा है, लेकिन पिछड़े वर्ग का बुद्धिजीवी तबका अभी भी केदारनाथ सिंह के उस सपने पर काम करने में लगा हुआ है कि लोग जातियों का खांचा छोड़कर वर्गीय हित की ओर बढ़ें और समतामूलक समाज स्थापित कर राष्ट्रनिर्माण में अहम भूमिका निभाएं।

Sunday, September 24, 2017

क्या बीएचयू और भारत के अन्य विश्वविद्यालय अब तेहरान युनिवर्सिटी बनने की ओर बढ़ रहे हैं?

सत्येन्द्र पीएस

ईरान में 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई। बड़े बड़े आंदोलन हुए। खोमैनी का शासन आ गया। ईरान इस्लामिक स्टेट बन गया। वहां सब कुछ बदल गया। ड्रेस कोड बना। विश्वविद्यालयों में इस्लामी पहनावा लागू हो गया। तरह-तरह के प्रतिबंध लग गए। अब हालात यह हैं कि जिस तेहरान युनिवर्सिटी को अमेरिका या ब्रिटेन के तमाम नामी गिरामी विश्वविद्यालयों के साथ मुकाबले के लिए जाना जाता था, उसका कोई नामलेवा नहीं है। क्या आपने सुना है कि आपका कोई परिचित कह रहा हो कि उसका सपना तेहरान युनिवर्सिटी में अपने बच्चे को पढ़ाने का है? ज्यादातर लोग तो जानते भी नहीं हैं कि ईरान या तेहरान में कोई युनिवर्सिटी भी है, या वहां के स्कूल कॉलेज को मदरसा वगैरा ही कहते हैं।



भारत में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद तमाम बदलाव हुए। सरकार ने विश्वविद्यालयों में अपनी मर्जी के कुलपति रखे। उन्हीं में से एक काशी हिंदू विश्वविद्यालय है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय को मैं हरि गौतम के जमाने से जानता हूं। उस समय कैंपस अशांत थे। तरह तरह के आंदोलन होते थे। गुंडे न केवल विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में दखल करते थे, बल्कि वहां के तमाम प्रोफेसर राजनीतिक रूप से ताकतवर जातीय गुंडा राजनेताओं के आदमी बन चुके थे और विद्यार्थियों को भड़काते थे। आए दिन विश्वविद्यालय में मारपीट, गुंडागर्दी, बमबाजी होती थी।
हरि गौतम के समय से सख्ती शुरू हुई। कैंपस शांत हो गया। उसके बाद वाई सी सिम्हाद्री, पंजाब सिंह, लालजी सिंह कुलपति बने। सभी अपने ज्ञान क्षेत्र में अव्वल थे। पहले भी वाइस चांसलर या तमाम बड़े पदों पर रहने के बाद बीएचयू पहुंचे थे।
केंद्र में 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद प्रोफेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी कुलपति बने। उस समय तक मैंने कभी इनका नाम नहीं सुना था। नाम न सुनना कोई बड़ी बात नहीं। देश में तमाम ऐसे विद्वान हैं, जिनका हम नाम नहीं सुने हुए होते हैं। लेकिन बाद में पता करने पर जानकारी मिल जाती है कि संबंधित व्यक्ति की पृष्ठभूमि क्या है। मुझे याद है कि सबसे पहली जानकारी प्रोफेसर त्रिपाठी के बारे में यही मिली थी कि वह पंडित मदन मोहन मालवीय के नाती के बहुत खास हैं। उसके बाद मैंने कई स्रोतों से पता करने की कोशिश की कि त्रिपाठी की एकेडमिक या प्रशासनिक उपलब्धि क्या रही, लेकिन कुछ भी जानकारी नहीं मिल सकी।
त्रिपाठी के कुलपति बनने के बाद उनके एक से बढ़कर एक कारनामे सामने आने लगे। बयान तो किसी विकृत मानसिकता के पुरबिया क्षुद्र व्यक्ति से नीचे।
विश्वविद्यालय के परिसर में लाइब्रेरी को 24 घंटे खोले जाने के लिए चल रहे आंदोलन के दौरान उनके बयानों को देखें। उन्होंने कहा, “लड़के बदमाश हैं, कॉपर वायर तोड़ ले जात्ते हैं, माउस चुरा ले जाते हैं, हार्डडिस्क निकालकर ले जाते हैं। पेन ड्राइव में अश्लील फ़िल्में देखते हैं। इन सबसे अलग उनके वहां रहने से एकदम दूसरी समस्या पैदा हो सकती है कि वे वहां क्या कर रहे हैं?”

शायद प्रोफेसर त्रिपाठी को अपने देश के ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी के बारे में ही जानकारी नहीं है, जहां विद्यार्थियों को 24 घंटे पढ़ने की सुविधा दी जाती है। वहां सेक्सुअल क्राइम के केसेज बहुत कम सामने आते हैं। आप कैंपस में घूमिए। तमाम झाड़ियां हैं। पहाड़ी विश्वविद्यालय बना है और आधे से ज्यादा छात्राएं हैं। लेकिन कहीं कुछ भी आपत्तिजनक या अश्लील या सेक्सुअल क्राइम नहीं मिलता, जबकि प्रोफेसर त्रिपाठी ने विश्वविद्यालय कैंपस में क्या ढूंढा, उनके इस बयान से अंदाज लगा सकते हैं। उन्होंने कहा, “एक बात मैंने यहां सघन तलाशी करायी। रात नौ बजे के बाद शहर के तमाम लड़के और लड़कियां यहां बैठे रहते हैं। अपनी कार से रात में निकला, लोगों ने कहा कि अरे आप वीसी हैं, हम ले चलते हैं। लेकिन मैं अध्यापक हूं। मैं निकला और मैंने देखा कि एक लड़का और लड़की ऐसी अवस्था में बैठे थे कि क्या बताऊं. मैंने गाड़ी रोकी। मैंने बैठा लिया गाड़ी में, कुछ और नहीं किया. मैंने केवल इतना कहा कि चलो तुम्हारे गार्जियन से बात करें. वे गिडगिडाने लगे, अरे नहीं सर, गलती हो गयी सर। फिर मैंने उन्हें छोड़ भी दिया।”

यह है काशी हिंदू विश्वविद्यालय का माहौल। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कंडोम गिनने का ठेका तो भारतीय जनता पार्टी के विधायक को दिया गया है, लेकिन बीएचयू में कंडोम बीनने खुद कुलपति निकल चुके हैं। उनका यह मकसद कतई नहीं रह गया है कि विश्वविद्यालय में ऐसा माहौल बना दिया जाए, जहां बच्चों के दिमाग में विश्व का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी बनने और लगातार पठन पाठन, शोध में रहे बल्कि वह विद्यार्थियों को किसी अलग ही नियम में बांधने को आतुर नजर आते हैं। जबकि हकीकत यह है कि विश्वविद्यालय में श्रेष्ठ विद्यार्थियों का एडमिशन होता है, जिनका पहले से एकेडमिक रिकॉर्ड बहुत शानदार रहा होता है। विश्वविद्यालय कड़ी परीक्षा लेने के बाद विद्यार्थियों को एडमिशन देता है। वाराणसी में कुल मिलाकर 4 विश्वविद्यालय हैं। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, उदय प्रताप स्वायत्तशासी कॉलेज के अलावा पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर के डिग्री कॉलेज भी शहर में हैं। इसके अलावा बौद्ध विश्वविद्यालय़ भी सारनाथ में उपस्थित है। इन सबकी मौजूदगी के बीच विद्यार्थियों का सपना होता है कि वह अगर वाराणसी में पढ़ें तो बीएचयू में ही पढ़ें। बाहरी दुनिया के बच्चे भी बीएचयू में ही पढ़ने आते हैं। इस स्थिति में स्वाभाविक रूप से विश्वविद्यालय में क्रीम स्टूडेंट्स को ही जगह मिल पाती है।

हालांकि जेएनयू को भी श्रेष्ठ विश्वविद्यालय नहीं माना जा सकता। वैश्विक दुनिया में जेएनयू का कोई खास मुकाम नहीं है। लेकिन बमुश्किल 10,000 विद्यार्थियों के कैंपस का भारत के स्तर पर सफलता का अनुपात जबरदस्त है। वहां से आईएएस निकलते हैं, ब्यूरोक्रेट्स निकलते हैं, राष्ट्रीय स्तर के नेता निकलते हैं। वहीं अगर मौजूदा बीएचयू को देखें तो देश के प्रतिष्ठित संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अक्सर बीएचयू का नाम गायब रहता है, जो एक लाख विद्यार्थियों का कैंपस है। वैश्विक स्तर पर विश्वविद्यालय की स्थिति तो जाने ही दें।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय में जातीय लंपटई का इतिहास पुराना है। यह देश का एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है जहां 80 के दशक तक एडमिशन के लिए फार्म भरने वाले विद्यार्थियों से यह पूछा जाता था कि आप ब्राह्मण हैं या गैर ब्राह्मण। मोटे तौर पर इस समय भी विश्वविद्यालय में 70-80 प्रतिशत ब्राह्मण टीचिंग स्टाफ है। इतना ही नहीं, तमाम प्रोफेसर तो खानदानी हैं, जो वहां कई पीढ़ियों से पढ़ाए जाने के योग्य पाए जा रहे हैं। ऐसे में जातीय बजबजाहट यहां नई बात नहीं है।

इन सबके बावजूद हाल के वर्षों में ब्राह्मण या गैर ब्राह्मण पूछा जाना बंद हुआ। जातीय कुंठा भी कुछ घटी और अध्यापक नहीं तो विद्यार्थियों में जातीय विविधता आई। आरएसएस के स्वयंसेवक प्रोफेसर त्रिपाठी के कुलपति बनने के बाद विश्वविद्यालय एक बार फिर ब्राह्मणवादी कुंठा में फंसता नजर आ रहा है।

(बीएचयू बज, फेसबुक से ली गई तस्वीर। लड़कियों पर लाठी चार्ज के बाद)
विश्वविद्यालय में कुलपति अपने को गैर राजनीतिक होने का दावा कर रहे हैं। लेकिन मामला इससे उलट है। अगर विश्वविद्यालय की छात्राएं छेड़खानी का विरोध कर रही हैं तो उन पर लाठियां चल रही हैं। विश्वविद्यालय के सुरक्षाकर्मियों की लंबी चौड़ी फौज है, जिनकी कैंपस में जबरदस्त गुंडागर्दी चलती है। वह मामला नहीं संभाल पाते हैं तो बाहर से पुलिस और पीएसी बुलाई जाती है। रात रात भर कैंपस में बवाल चलता है। लड़कियों को पीट पीटकर पुलिस हाथ पैर तोड़ देती है।

यह मामला काशी हिंदू विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति परिसर में टैंक रखवाना चाहते हैं, जिससे विद्यार्थियों में देशभक्ति आए। विश्वविद्यालय के कुलपति को टैंक में देशभक्ति दिखती है।

इसमें सबसे ज्यादा बुरा हाल छात्राओं का होने जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महराज बयान देते हैं कि लड़कियां मोटरसाइकिल पर बैठकर चलती हैं, इसलिए उनके साथ बलात्कार हो जाता है।

सवाल यह है कि हम किस दौर की ओर बढ़ रहे हैं। क्या हम इस्लामिक स्टेट की तरह भारत को हिंदू स्टेट बनाकर बर्बादी की ओर ले जाना चाहते हैं या रूस, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान, यूरोपियन यूनियन की तरह समृद्ध और खुला समाज चाहते हैं? भारत में तो यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि कोई लड़की या महिला रात के सुनसान में अपने घर से निकलकर अकेले कहीं सड़क पर घूम सकती है, या किसी अपने परिचित की मदद के लिए पैदल निकल सकती है। महिला ही क्या, पुरुष भी यह सोचकर नहीं निकल सकते कि दो बजे रात को अगर वह सड़क पर जा रहे हों तो सुरक्षित घर लौटेंगे या नहीं। लेकिन किसी भी सभ्य, विकसित देश में यह आम बात है। फैसला हमें करना है कि हम देश को किस तरफ ले जाना चाहते हैं। विकसित, समृद्ध, सुरक्षित देश बनना चाहते हैं जहां ज्ञान विज्ञान और सुविधाओं के साथ सुरक्षा हो, या इस्लामिक स्टेट आफ ईरान की तरह हिंदू स्टेट आफ इंडिया बनना चाहते हैं।

फोटो क्रेडिट -1 और 2
http://www.dailymail.co.uk/travel/travel_news/article-4148684/Stunning-photos-reveal-life-Iran-revolution.html
फोटो क्रेडिट-3
http://www.payvand.com/news/17/sep/1083.html