Thursday, April 24, 2008

किस करवट बैठेगी महंगाई, देखता है मूल्य सूचकांक

सत्येन्द्र प्रताप सिंह और कुमार नरोत्तम


मूल्य सूचकांक वस्तुओं और सेवाओं की एक नियत श्रेणी और किसी खास समयांतराल में औसत मूल्य गतिशीलता का मापक या संकेतक होता है।
इस खास श्रेणी में आनेवाली उपभोक्ता, थोक या उत्पादक मूल्य आदि में हो रहे परिवर्तन के आधार पर इनके मूल्य सूचकांक का निर्धारण किया जाता है। मूल्य सूचकांक में आर्थिक, क्षेत्रीय या क्षेत्र विशिष्ट गतिविधियों के कारण परिवर्तन होता है।
आज भारत में उपभोक्ता और थोक स्तरों पर मूल्यों की गतिशीलता मापने के लिए अलग-अलग सूचकांक है। राष्ट्रीय स्तर पर मूल्य सूचकांकों की मुख्यत: चार श्रेणियां मौजूद है। ये हैं- औद्योगिक कर्मियों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई-आईडब्ल्यू), कृषि या ग्रामीण मजदूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई-एएल या आरएल), शहरी अकुशल कर्मियों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई- यूएनएमई)। ये सारे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक हैं।
इसके अतिरिक्त जो चौथा मुख्य मूल्य सूचकांक है, वह है- थोक मूल्य सूचकांक।मूल्य सूचकांक द्वारा मुद्रास्फीति या महंगाई दर के आकलन का सीधा असर सरकार की नीतियों पर पड़ता है। उदाहरण के लिए अगर महंगाई दर बढ़ती है तो सरकार नियंत्रित जिंसों को- जैसे गेहूं, चावल आदि बाजार में उतार देती है, जिससे मांग और आपूर्ति संतुलित हो सके।
इसके अलावा भारतीय रिजर्व बैंक महंगाई बढ़ने पर ब्याज दरें बढ़ाता है, नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में बढ़ोतरी करता है, जिससे बाजार में धन के प्रवाह को कम किया जा सके। कुल मिलाकर परिस्थितियों के मुताबिक मांग और आपूर्ति के संतुलन को बरकरार रखने के लिए कदम उठाए जाते हैं।
थोक मूल्य सूचकांक
थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) संख्या अर्थव्यवस्था में थोक मूल्यों की गतिविधियों का मापक है। कुछ ऐसे भी राज्य हैं जिनके उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) और थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) अलग-अलग होते हैं।
राज्यों के द्वारा जब थोक मूल्य सूचकांक का निर्धारण किया जाता है तो उसमें राज्य स्तर पर हो रहे लेनदेन को शामिल किया जाता है। वर्तमान में जो डब्ल्यूपीआई हैं, वे हैं-असम (आधार वर्ष 1993-94), बिहार (1991-92), हरियाणा (1980-81), कर्नाटक (1981-82), पंजाब (1979-82), उत्तरप्रदेश (1970-71) और पश्चिम बंगाल (1980-81)।
इसमें ज्यादातर राज्यों के सूचकांकों में कृषि जिंस लेनदेन और हस्तांतरण को ही शामिल किया जाता है, जिनका कारोबार स्थानीय स्तर पर होता है।
थोक मूल्य सूचकांक की गणना का परिचय
एक बार अगर थोक मूल्य की संकल्पना को परिभाषित कर दिया जाए और आधार वर्ष का निर्धारण हो जाए तो उसके बाद सामग्रियों का निर्धारण, सामग्रियों के भार का आवंटन, श्रेणी या उप-श्रेणी स्तर आदि के जरिए इसे पूरा किया जाता है। इसके साथ ही आधार मूल्य एकत्र करना, वर्तमान मूल्य, सामग्री की विशिष्टता का निर्धारण, मूल्य आंकडा स्रोत और आंकडा संग्रह की प्रक्रिया का निष्पादन किया जाता है। इन चरणों के बारे में हम निम्नलिखित तरीके से विस्तार से चर्चा करेंगे-
थोक मूल्य सूचकांक की संकल्पना
थोक मूल्य सूचकांक को हर विभाग अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल करता है। कृषि और गैर-कृषि जिंस कारोबार के लिए कोई एक तरह की परिभाषा नही है और इसलिए जमे हुए बाजार से भी हम इसके आंकड़े लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हो सकते हैं।
कृषि जिंस
व्यावहारिक तौर पर देखें तो मुख्य तौर पर तीन तरह के थोक बाजार होते हैं- प्राथमिक, द्वितीयक और कृ षि क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाले टर्मिनल। इन सारे थोक बाजारों में मूल्य की गतिशीलता और मूल्य के स्तरों में परिवर्तनीयता होती है। टर्मिनल बाजार में मूल्य की गतिशीलता से ही खुदरा दामों का निर्धारण किया जाता है। इन सारे विकल्पों में कृषि जिंसों के थोक लेनदेन के आधार पर ही थोक मूल्य का निर्धारण किया जाता है लेकिन प्राथमिक बाजार को आधार बनाया जाता है।
कृषि मंत्रालय थोक मूल्य को इस तरह परिभाषित करता है- थोक मूल्य वह दर है जिसमें खरीदारी के लेनदेन, जिसका इस्तेमाल आगे की खरीद के लिए किया जाता है, प्रभावित हो । बहुत सारी थोक मूल्य सूचकांक संग्रह करने वाली एजेंसियां कृषि मंत्रालय की इस परिभाषा को आधार मानती है।
वैसे आकस्मिक दरों, करों और शुल्कों के संदर्भ में ये मानदंड बदलते रहते हैं। आंध्रप्रदेश में भारीय शुल्क, बैग की कीमत और बिक्री कर के आधार पर आकस्मिक शुल्क तय किए जाते हैं। गुजरात में थोक मूल्य के अंतर्गत ही पैकिंग शुल्क और करों को शामिल कर लिया जाता है। पंजाब और तमिलनाडु में आकस्मिक लागतों को थोक मूल्य सूचकांक के तौर पर शामिल किया जाता है। हरियाणा में कृषि जिंस कारोबार के अंतर्गत आढ़त, भार और लॉरी चार्ज आदि को सम्मिलित किया जाता है।
गैर-कृषि जिंस
गैर-कृषि जिंस के तहत निर्माण वस्तुएं आती हैं लेकिन इसके साथ एक दिक्कत यह है कि गैर-कृषि जिंस का कोई स्थापित स्रोत बाजार में उपलब्ध नही होता है। ऐसा भी देखा जाता है कि कभी-कभी थोक विक्रेता को इन गैर कृ षि जिंसों के बीच मार्जिन के लिए काफी अरसे तक इंतजार करना पड़ता है।

साभारः बिज़नेस स्टैंडर्ड

Wednesday, April 23, 2008

छोटा कितना दर्जा, बड़ा कितना दुख


मधुकर उपाध्याय

...औरतों के खिलाफ जुल्म का मसला कितना बड़ा है, मैं यह महसूस करके भौचक्की रह जाती हूं। हर उस औरत के मुकाबले, जो जुल्म के खिलाफ लड़ती है और बच निकलती है, कितनी औरतें रेत में दफन हो जाती हैं, बिना किसी कद्र और कीमत के, यहां तक कि कब्र के बिना भी। तकलीफ की इस दुनिया में मेरा दुख कितना छोटा है।...

पाकिस्तान की मुख्तारन माई का ये दुख दरअसल उतना छोटा नहीं है। बहुत बड़ा है। इसकी कई मिसालें इस्लामी देशों में फैली हुई मिलती हैं। एशिया से अफ्रीका तक। ऐसा शायद पहली बार हुआ है, जब इस्लामी देशों की औरतों की बात किताबों की शक्ल में लिख कर कही गई है। इनमें से कई किताबें औरतों की लिखी हुई हैं।
मुख्तारन माई की किताब ...इन द नेम ऑफ ऑनर... तकरीबन दो साल पहले आई थी। उसी के साथ सोमालिया की एक लड़की अयान हिरसी अली की किताब आई ...इनफिडेल... और उसके बाद खालिद हुसैनी की किताब ... थाउजेन्ड स्प्लैंडिड सन्स...। इस बीच दो किताबें और आईं। जॉर्डन की एक महिला नोरमा खोरी ने ...फोरबिडन लव... और इरान की अज़र नफ़ीसी ने ...रीडिंग लोलिता इन तेहरान... लिखी। एक और किताब नार्वे की आस्ने सेयरेस्ताद की थी, ...द बुकसेलर ऑफ काबुल...।
इन किताबों को एक धागा जोड़ता है- इस्लामी देशों में औरतों की स्थिति। इस पर पहले भी काफी कुछ लिखा गया है, लेकिन इन किताबों को एक साथ पढ़ना तस्वीर को बेहतर ढंग से सामने रखता है। शायद इसलिए भी कि इन्हें महिलाओं की स्थिति बयान करने के

मूल इरादे से नहीं लिखा गया। उनके सामने देश, समाज और दुनिया के समीकरण थे, जिसे उन लेखकों ने अपने ढंग से सामने रखा। महिलाएं पात्रों की तरह आईं और अंत तक आते-आते उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो गई। यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है कि इनमें से खालिद हुसैनी को छोड़कर बाकी सब लेखिकाएं हैं। महिलाओं की जटिल दुनिया तक उनकी पहुंच संभवतः इसीलिए आसान रही होगी।
अयान हिरसी अली का उपन्यास ... इनफिडेल... आत्मकथात्मक है। सोमालिया में उसके जन्म से लेकर अमेरिका जाने तक। किताब कई जगह इतनी तीखी है कि पढ़ते हुए झुंझलाहट होती है, गुस्सा आता है और सवाल उठता है कि जो जैसा है, वैसा क्यों है?

अयान का बचपन, जाहिर है, सोमालिया में गुजरा। पिता बहुत संपन्न नहीं थे लेकिन हालात बहुत खराब भी नहीं थी। इतना जरूर था कि अयान को इस्लामी जीवन जीने की तालीम मिली थी। सिर पर दुपट्टा, बदन पूरा ढ़का हुआ और सवाल करने पर एक अघोषित पाबंदी। अब्बा ने कनाडा के एक लड़के के साथ उसका निकाह तय कर दिया पर अयान को पूरी ज़िंदगी की गुलामी पसंद नहीं थी। किसी तरह वह सोमालिया से निकलकर हालैंड पहुंच गई। जान पर खतरा होने की गलतबयानी करके उसने शरणार्थी का दर्जा हासिल किया और उसके बाद उसने जिंदगी के नए अर्थ ढूंढ़े। सोमालिया की दूसरी महिलाओं की मदद के लिए डच भाषा सीखी और हॉलैंड की नागरिकता हासिल की। दुभाषिये की तरह सरकारी नौकरी की। एक राजनीतिक दल के नेता की शोध सचिव बनी। चुनाव लड़ी और संसद सदस्य बन गई। महिलाओं की स्थिति पर हिरसी के बयानों ने उसके इतने दुश्मन बना दिए कि उसे कड़ी सुरक्षा में रहने के अलावा कई बार दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ी। अंततः शरणार्थी का दर्जा हासिल करने के समय बोला गया झूठ सामने आया और हिरसी की नागरिकता छीन ली गई। संसद सदस्यता भी चली गई, लेकिन तब तक उसे अमेरिका में काम मिल गया था। अयान के लिए सांसद बनने से ज्यादा महत्वपूर्ण इस्लाम में महिलाओं के अधिकार और उनकी स्थिति का मुद्दा था और नए काम में उसे यही करने का मौका मिल रहा था। ...इनफिडेल... में हिरसी अली ने अपनी बात बहुत बेबाकी औऱ ईमानदारी से रखी है। नतीजतन वह विवादों के घेरे में आ गई। कठिन स्थितियों, विपन्नता और रूढ़ मानसिकता से जूझने और कामयाब होने की इस अद्भुत आत्मकथा के कई हिस्से निश्चित रूप से विवादास्पद हैं, लेकिन शायद साफगोई की अपेक्षा करने वालों को वे उस तरह नहीं अखरेंगे।

आस्ने सेयरेस्ताद की ...द बुकसेलर ऑफ काबुल... भी आत्मकथात्मक है। पत्रकार की तरह काम करने वाली आस्ने रिपोर्टिंग के लिए काबुल पहुंची तो एक दुकान देखकर हैरान रह गईं। रूसी, तालिबानी, मुजाहिदीन और अमेरिकी हमलों से तबाह अफगानिस्तान की राजधानी में किताब की एक बड़ी दुकान। आस्ने को समझ में नहीं आया कि ऐसी ध्वस्त अर्थव्यवस्था, तनाव और लगातार बम धमाकों के बीच आखिर कौन किताब खरीदता और पढ़ता होगा।

उसने यह सवाल दुकान के मालिक मोहम्मद शाह रईस से पूछा। जवाब संतोषजनक नहीं लगा। फिर उसने रईस के सामने एक प्रस्ताव रखा कि वह चार महीने उसके परिवार के साथ रहना चाहती है। उसके घर में। रईस राजी हो गया। नॉर्वे लौटकर उसने अपनी किताब पूरी की। किताब में रईस का नाम बदलकर सुल्तान खान कर दिया लेकिन घटनाक्रम नहीं बदला।
पूरी किताब में सुल्तान खान एक पढ़े-लिखे अंग्रेजी बोलने वाले संपन्न अफगानी की तरह आता है, लेकिन घर की चहारदीवारी के भीतर उसका रूप बदला हुआ होता है। अपने परिवार, पत्नी और बेटियों के साथ वह अक्सर क्रूर होता है और कई बार आक्रामक भी। बहन घर में गुलाम की तरह रहती है। औरतों को टूटे फर्नीचर की तरह इधर-उधर फेंक दिया जाता है। किसी संमृद्ध अफगानी के घर के अंदर का ऐसा विवरण इससे पहले उपलब्ध नहीं था।

मैं काबुल के इंटरकांटिनेंटल होटल में रईस से मिला। उनकी एक दुकान होटल में भी है। जिक्र ...द बुकसेलर ऑफ काबुल... का आया तो रईस बिफर पड़े। कहा, ... आस्ने ने बहुत नाइंसाफी की है। सुल्तान खान मैं ही हूं। आस्ने की वजह से मैं पूरी दुनिया में बदनाम हो गया। उसने न सिर्फ मुझे, बल्कि मेरे मुल्क को भी बदनाम किया है। मैं उस पर मुकदमा करूंगा।... रईस से काफी देर बातचीत होती रही। उसी दौरान पता चला कि उन्होंने एक बार खुद किताब लिखकर उस किताब का जवाब देने के बारे में सोचा था। नॉर्वे के कई नाकामयाब चक्कर लगाने के बाद अब शायद उन्होंने अपनी किताब पूरी कर ली है।
अपने पहले उपन्यास ...काइट रनर... से चर्चा में आए खालिद हुसैनी की नई किताब ...थाउजेंड स्प्लेंडिड संस... की पृष्ठभूमि भी अफगानिस्तान ही है। पूरा बचपन काबुल और हेरात के आसपास बिताने वाले खालिद इस समय अमेरिका में रहते हैं। उनकी किताब एक तरह से अफगानिस्तान की पिछले तीस साल की कहानी है। सोवियत आक्रमण से लेकर तालिबान और उसके बाद तक। दो पीढ़ियों की यह कहानी लगभग जादुई सम्मोहन के साथ पाठक को बांधे रखती है, जिसमें तबाही, बर्बादी और दुखद घटनाक्रमों के बीच ज़िंदगी और खुशियां तलाश करते चरित्र हैं। यानी कि तकरीबन हर पन्ने पर इतिहास और ज़िंदगी साथ-साथ चलते हैं। किताब चार हिस्सों में बंटी हुई है। पहला हिस्सा एक महिला चरित्र मरियम, दूसरा और चौथा हिस्सा एक अन्य महिला चरित्र लैला पर है और तीसरा मरियम और लैला की साझा कहानी है।
पश्चिमी अफगानिस्तान में हेरात के एक गांव में मरियम अपनी मां के साथ रहती है। पिता ने दूसरी शादी कर ली है। अमीर है और हेरात में रहता है। वह मरियम से मिलने तक से इनकार कर देता है। बाद में मरियम की शादी काबुल के एक मोची रशीद से होती है। मरियम शादी करके काबुल आती है। उसी के घर की गली में लैला रहती है, एक ताजिक लड़की। उसका एक दोस्त है तारिक। उसके संबंध बहुत करीबी हैं, शारीरिक तक। कुछ दिन के बाद तारिक का परिवार काबुल से चला जाता है। लैला के मां-बाप काबुल छोड़ने को होते हैं कि एक बम धमाके में मारे जाते हैं। घायल लैला को रशीद बचाता है। अपने घर में रखता है और बाद में उससे शादी कर लेता है। इसलिए कि मरियम उसके बच्चे की मां नहीं बन सकती। मरियम के साथ उसका व्यवहार दिन-ब-दिन खराब और क्रूर होता जाता है। लैला मां बनती है, लेकिन वह जानती है कि पिता रशीद नहीं, तारिक है। एक दिन तारिक अचानक लौट आता है। बाद में रशीद को सच्चाई पता चलती है और वह लैला के साथ भी उसी तरह क्रूर हो जाता है। एक रोज जब वह लैला को जान से मारने पर आमादा होता है, मरियम बेलचे से रशीद की हत्या कर देती है। बाद में वह खुद को तालिबान को सौंप देती है और उसे फांसी हो जाती है। तारिक लैला को लेकर हेरात जाता है, जहां मरियम को दफनाया गया था। दोनों वहीं अपनी बेटी का नामकरण करते हैं- मरियम।
वह चाहे लैला और तारिक हों या सुल्तान खान की अनाम बीवी और बहन, या फिर अयान हिरसी अली- उनका दुख और समाज में उनका दर्जा नहीं बदलता। भौगोलिक परिवर्तनों से उसमें कोई फर्क नहीं आता। सोमालिया के रेगिस्तान से लेकर अफगान पहाड़ियों तक।

क्या समाज में वाकई नई सोच की जगह नहीं बची है? या फिर यथास्थितिवादी और कठमुल्ला इस कदर हावी हैं कि नई रोशनी वहां तक पहुंच नहीं पा रही।

Tuesday, April 22, 2008

क्रेजी क्रिकेट

क्रेजी क्रिकेट। जी हां। हर तरफ पागलपन का माहौल। मैदान पर। टीवी पर और गली-मुहल्लों में। आईपीएल का रोमांच सबके सर चढ़कर बोल रहा है। दनादन छक्के। झटपट गिरते विकेट। और हर रोमांचक लम्हों पर देशी गानों पर थिरकती विदेशी बालाएं। मौजा ही मौजा करती हुईं। लगता है हर तरफ मौज ही मौज है। उपर से क्रिकेट में बालीवुड का तड़का। और क्या चाहिए। क्रेजी होने के लिए। सभी कुछ तो मौजूद है यहां। लेकिन सब कुछ होने के बावजूद लगता है लगता कुछ नहीं है। वो है देशभक्ति का अहसास। अंतरराष्ट्रीय मैच के दौरान जब भारतीय धुरंधर दूसरे देश के बालरों की बखिया उधेड़ते हैं, तो वो अहसास ही कुछ अलग होता है। या जब ईंशात शर्मा जैसे बालर पोंटिग की गिल्लियां बिखेरते हैं, जो मन बाग-बाग हो उठता है। मन करता है इन फिरंगियों को मजा चखा दें। लेकिन आईपीएल में न जाने क्यों फर्क ही नहीं पड़ता। कोई भी जीते। कोई भी हारे। हमें क्या। हमें मजा चाहिए और वो हमें मिल रहा है। आईपीएल के मैच के दौरान कई बार ऐसे मौके आए, जब लगा कि शायद यह जज्बा लोगों से गायब हो गया है। मंगलवार को डेक्कन चार्जर्स के खिलाफ जब वीरू ने अर्धशतक ठोका। तो हैदराबाद के मैदान में मौजूद दर्शकों ने उनका अभिवादन नहीं किया। इस पर वीरू ने हाथ उठाकर कहा क्या हुआ दोस्तों मैं तुम्हारा वीरू। लेकिन मैदान में सन्नाटा छाया रहा। इसी वीरू ने जब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ ३१९ रन की पारी खेली थी। तो देश क्या विदेश में भी भारतीय झूम उठे थे। और मैदान पर मौजूद दर्शकों की तो बात ही छोड़ दीजिए। सब के सब क्रेजी हुए पड़े थे। ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि आईपीएल हमारे क्रेजी दर्शकों में दीवार खड़ी कर रहा है। लोग देश को छोड़, प्रांतीय टीमों से जुड़ गए हैं। आईपीएल की टीमों के एडवरटिजमेंट से तो यही जाहिर होता है। जैसे एक डेंटिस्ट के यहां एक मरीज अपने दांत दिखाने आता है। इसी दौरान डाक्टर मरीज से पूछता है कि आप कौन सी टीम को सपोर्ट करते हैं। इस पर मरीज कहता है दिल्ली डेयरडेविल्स। डाक्टर नर्स की ओर देखता है। और कहता है इनके एक दांत नहीं। पांच दांत उखाड़ दो। इस पर मरीज घबरा जाता है, और डाक्टर रेपिस्ट जैसी हंसी के साथ कहता है। मैं मुंबई इंडियन। क्या पता कुछ दिनों बाद इस तरह की घटनाएं मैदान पर दिखाई दें। लोग अपनी टीम को लेकर इतने संवेदनशील हो उठे कि अपनी टीम के खिलाफ एक शब्द न सुन सकें। क्या पता डेक्कन चार्जर्स के प्रशंसक और नाइट राइडर्स के फैंस के बीच झगड़ा हो जाए और बात खून-खराबे तक पहुंच जाए। जैसा आमतौर पर पश्चिमी देशों में फुटबाल मैच के दौरान दिखाई देता है। मैनचेस्टर युनाइटेड के प्रशंसक या तो आर्सनल के फैंस को पीट देते हैं। या फिर आर्सनल के मैनचेस्टर युनाइटेड को।
मैं तो विदेश नहीं गया हूं, लेकिन मेरा दोस्त इंग्लैंड गया था। वहां जब वो कैब में बैठकर लिवरपूल जा रहा था। तो रास्ते में उसने कैब ड्राइवर से पूछा आप कौन सी टीम को सपोर्ट करते हैं। इस पर कैब ड्राइवर ने कहा लिवरपूल। इसके बाद ड्राइवर ने पूछा आप। मेरा दोस्त बोला। मैनचेस्टर युनाइटेड। इस पर कैब ड्राइवर पीछे मुड़ा और कहा सो यू आर माई राइवल। अगर तुमने अब कोई भी हरकत की तो मैं तुम्हारा वो हश्र करूंगा कि तुम जिंदगी भर याद रखोगे। इसके बाद मेरा दोस्त चुपचाप बैठ गया और कुछ नहीं बोला। क्या पता कुछ दिनों बाद यहां के लोगों में भी प्रांतीय टीमों के लेकर इसी तरह की दीवार खड़ी हो जाए। है भगवान पहले से जाति-धर्म की इतनी दीवारें हैं। अब और नहीं। दर्शकों के बीच अगर यह दीवार खड़ी हो गई तो क्या पता सचिन तेंदुलकर के छक्के पर मुंबई वाला ही ताली बजाए और दिल्ली वाला खामोश बैठा रहे। या मुंबई वाले के ज्यादा उछलने पर उसे दूसरे टीम के समर्थक पीट भी दें। अगर ऐसा हुआ तो वो दिन शायद इस खेल और उसकी आत्मा के लिए सबसे शर्मनाक दिन होगा।


भूपेंद्र सिंह

Saturday, February 23, 2008

अप्पू मुझसे रूठ गया


भूपेंद्र सिंह


मेरे बचपन का साथी पीछे छूट गया,
मेरा अप्पू मुझसे रूठ गया।
कभी उन झूलों पर बसती थी जिंदगी,
खिलखिलाता था बचपन,
लेकिन आज फैली है खामोशी,
छाया है नीरसपन,
मेरा अप्पू अपनी मौत नहीं है मरा,
बड़ों की ख्वाहिशों ने उसे मारा है,
लेकिन क्या करें
अब तो बस अप्पू की यादों का सहारा है।

अप्पू घर महज एक एम्युजमेंट पाकॆ नहीं था। बल्कि एक सपना था, उन बच्चों का जो इसके साथ बड़े हुए। इसके साथ जिए। इसके झूले पर झूलकर जिंदगी को जिया। ये उन बच्चों का भी सपना था, जो यहां झूलना चाहते थे। अपना बचपन जीता चाहते थे। लेकिन जैसा हमेशा से होता आया है। बड़ों के अरमानों के आगे बच्चों की ख्वाहिशों की बलि दी जाती रही है। वहीं यहां भी हुआ। कुछ वकीलों और जजों की लाइब्रेरी और बैठने की जगह के लिए बच्चों के बचपन का आशियाना उजाड़ दिया गया। निदा फाजली ने ठीक ही कहा है।

बच्चों के छोटे हाथों में चांद सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे।

वकील और जज भी चार किताबें पढ़कर ये भूल गए हैं, कि वो भी कभी बच्चे थे। बचपन में जब उनसे कोई उनका खिलौना छीनता होगा, तो वो भी रोते होंगे। अगर आज वो बच्चे होते, तब उन्हें पता चलता कि बचपन की क्या अहमियत होती है। खिलौनों के छीन लिए जाने पर कैसा लगता है। आज सब बड़े हो गए हैं, उन्हें खेलने के लिए खिलौनों और झूले नहीं चाहिए। उन्हें चाहिए ऐशो आराम। ये उनकी आज की जरूरतें थी। अगर आज उनसे उनका ये ऐशो आराम छीन लिया जाए, तो सभी किस तरह भड़केंगे। हम सभी जानते हैं।
मैं बचपन से दिल्ली में रहा हूं। अप्पू घर के झूलों में झूला हूं। इसलिए जानता हूं कि पुराने साथी का बिछड़ना कैसा लगता है। कोई आपके सामने ही आपके बचपन के आशियाने को उजाड़ दे, तो कैसा लगता है। मैं जानता हूं। सबकुछ देख रहा हूं, फिर भी कुछ नहीं करता। क्या करूं कानूनी दावपेंचों में उलझना नहीं चाहता। इसलिए खामोश हूं, क्योंकि चार किताबें पढ़कर मैं भी बड़ों जैसा हो गया हूं। आगे पीछे का सोचने लगा हूं। बड़ों जैसा हो गया हूं।

Friday, February 1, 2008

२५ प्रतिशत शेयर सार्वजनिक किए जाने का प्रस्ताव आम निवेशकों के हित में


सत्येन्द्र प्रताप सिंह
वित्त मंत्रालय एक प्रस्ताव लाया है। बाजार में शेयर लाने से पहले कंपनियों पर कम से कम एक चौथाई शेयर सार्वजनिक करने की शर्त तय की जाए। मंत्रालय का मानना है कि संस्थागत निवेशकों, कर्मचारियों औऱ प्रवासी भारतीयों को शेयर बेचकर सार्वजनिक शेयर की खानापूर्ति नहीं होनी चाहिए।
यह सही है कि कंपनियां बाजार में उतरने के पहले कृत्रिम बढ़त बनाने की कोशिश करती हैं, जिससे आम निवेशकों की भीड़ को खींचा जा सके। इस कोशिश में तमाम बड़ी कंपनियां सेक्टरवाइज शेयर भी उतार देती हैं, यानी एक ही कंपनी के दो शेयर। होता यह है कि कंपनी अपने एक सेक्टर से पूंजी निकालती है और दूसरे में डाल देती है। खुद, कर्मचारियों के माध्यम से या संस्थागत निवेशकों के जरिए। बाद में ओवर सब्सक्रिप्शन देखकर जनता दौड़ती है उस कंपनी का शेयर खरीदने। इस तरह से कंपनी के आईपीओ का जलवा कायम हो जाता है। बाद में वह कंपनी धीरे-धीरे अपना पैसा खींचती है। शेयर गिरता है और आम निवेशक की तबाही शुरू हो जाती है।
अगर वित्त मंत्रालय का यह प्रस्ताव अमल में आता है तो स्वाभाविक है कि कंपनियों का गड़बड़झाला सामने आ जाएगा और वे आम निवेशकों के सामने नंगे हो जाएंगे। इससे सीधा फायदा बाजार में सीधे निवेश करने वाले निवेशकों को होगा और बाजार की घट-बढ़ चाल भी समझ में आएगी। जब कंपनी का कोई सीधा लाभ होगा या उसकी प्रगति होगी तभी शेयर के दाम बढ़ेंगे और सटोरियों, आम लोगों से पैसा लेकर निवेश करने वाले संस्थागत निवेशकों द्वारा उत्पन्न कृत्रिम बढ़त बनाने का दौर भी कम होगा।

Thursday, January 31, 2008

दलालों को ही सट्टा लगाने दें, आप जब भी निवेश करें, आंख कान खुला रखें।

सत्येन्द्र प्रताप सिंह
बाजार के बड़े-बड़े खिलाड़ी भी वायदा बाजार की चाल समझने में गच्चा खा जाते हैं। शेयर बाजार में पैसा लगाना, उससे मुनाफा कमाने इच्छा आज हर उस भारतीय को है जो कुछ पैसे अपनी तनखाह से बचा लेता है। बाजार गिर रहा है, बाजार चढ़ रहा है। वह देखता है, सोचता है- लेकिन क्या तमाशा है उसे समझ में नहीं आता।
आईपीओ की बात करें तो रिलायंस जैसे ही बाजार में आया उसका शेयर बारह गुना ओवर सब्सक्राइब हुआ। वास्तविक धरातल पर कंपनियों के पास कुछ हो या न हो अगर बाजार में एक बार शाख बन गई या किसी तरीके से बनाने में कामयाब रहे तो रातोंरात अरबपति और खरबपति बनते देर नहीं लगती।
शेयर का दाम भी बंबई शेयर बाजार में बेतहाशा बढ़ता है। किस तरह बढ़ता है? पता नहीं। इसका कोई ठोस आधार नहीं है। इसीलिए तो इसे वायदा कारोबार कहते हैं। आम लोगों को लगता है कि कंपनी को लाभ हो रहा है इसलिए शेयर बढ़ रहा है, लेकिन हकीकत इससे अलग है। किसी कंपनी का शेयर जनवरी में ४० रुपये का है तो फरवरी में वह ६० रुपये का हो जाता है। हालांकि कंपनी जब अपना तिमाही मुनाफा पेश करती है तो महज १०-१५ प्रतिशत लाभ दिखाती है। स्वाभाविक है शेयर भहराएगा ही। कुछ कंपनियां तमाम प्रोजेक्ट दिखाकर कृत्रिम बढ़त को सालोंसाल बनाए रखती हैं। सपने दिखाती रहती हैं और जनता से पैसा खींचती रहती हैं। अब कंपनी की दूरगामी परियोजनाओं की सफलता पर निर्भर करता है कि वे बाजार में टिकी रहती हैं या सारा पैसा लेकर रफूचक्कर हो जाती हैं। यह भी संभव है कि कृतिमता कुछ इस तरह बनाई जाए कि एक कंपनी की ३०० परियोजनाएं हों और जिसमें सबसे ज्यादा निवेश हो जाए उसे बर्बाद बता दिया जाए। बाकी के शेयरों में खुद निवेश कर कृत्रिम बढ़त बनाए रखा जाए।
इन सभी तथ्यों से आम निवेशक को हमेशा सावधान रहने की जरूरत है।
भारतीय शेयर बाजार में वर्ष 1930 में बॉम्‍बे रिक्‍लेमेशन नामक कंपनी सूचीबद्ध थी जिसका भाव उस समय छह हजार रुपये प्रति शेयर बोला जा रहा था, जबकि लोगों का वेतन उस समय दस रुपए महीना होता था। कंपनी का दावा था कि वह समुद्र में से जमीन निकालेगी और मुंबई को विशाल से विशाल शहर में बदल देगी लेकिन हुआ क्‍या। कंपनी दिवालिया हो गई और लोगों को लगी बड़ी चोट। अब यह लगता है कि अनेक रियालिटी या कंसट्रक्‍शंस के नाम पर कुछ कंपनियां फिर से इतिहास दोहरा सकती हैं। आप खुद सोचिए कि ऐसा क्‍या हुआ कि रातों रात ये कंपनियां जो अपने आप को करोड़ों रुपए की स्‍वामी बता रही हैं, आम निवेशक को अपना मुनाफा बांटने आ गईं।
इसमें किसी भी तरह का फ्राड संभव है और ऐसा न हो कि बरबादी के बाद रोने पर आंसू भी न आए। हमेशा ठोस परियोजनाओं और ठोस कारोबार की ओर नजर रखें और लाभ के चक्कर में किसी एक कंपनी में बहुत ज्यादा निवेश न करें। इसी में भलाई है।

Monday, January 21, 2008

माया की हनक



सत्येन्द्र प्रताप
उत्तर प्रदेश की राजनीति पर बसपा की हाथी छाने के बाद कांग्रेस, सपा, भाजपा सहित प्रदेश में जनाधार रखने वाली सभी पार्टियों पर असर पड़ा है। बुंदेलखंड के मुद्दे पर राहुल ने माया को ललकारा वहीं मुलायम भी सारे दाव चल रहे हैं। हालत यहां तक पहुंच गई है कि प्रदेश में सपा-कांग्रेस में समझौते के आसार बनने लगे हैं।
उत्तर प्रदेश में समीकरण बदला है। पहले जहां अंबेडकर और जगजीवन राम जैसे बड़े नामों के साथ वहां का आम दलित जुड़ा था, वह मायावती की झोली में पहुंच गया। एक मजबूत जनाधार के बाद मायावती ने कांग्रेस के समीकरण को दोहराने की कोशिश की। कांग्रेस का फार्मूला ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम गठजोड़ बना और सफल भी रहा। बदला है तो सिर्फ इतना कि पहले सत्ता कुलीन और उच्च वर्ग के हाथ में हुआ करती थी और अब दलित नेता मायावती के हाथ आ गई है।
स्वाभाविक है कि सत्ता से जु़ड़े रहने का लोभ रखने वालों ने मायावती का साथ दिया और मंडल कमंडल के साथ कांग्रेस भी धूल फांकने लगी। हाल के गुजरात चुनावों में माया का कोई जादू नहीं चला, लेकिन यूपी में पूर्ण बहुमत के मानसिक बढ़त ने इतना प्रभाव जरूर डाला कि तमाम सीटों पर कांग्रेस हार गई। यही किस्सा हिमाचल में भी दोहराया गया।
यूपी में हार का स्वाद चख चुके मुलायम को भी कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। कांग्रेस, मध्य प्रदेश और राजस्थान को लेकर चिंतित है कि कहीं मायावती ने आगामी चुनावों में इन राज्यों में ४ प्रतिशत वोटों की सेंधमारी की तो हालत पतली होना तय है। इसी के साथ कम्युनिष्टों की धमकी से भी कांग्रेस के माथे पर बल पड़ रहा है।
ऐसे हालत में ऊंट किस करवट बैठने जा रहा है, सबकी नज़र इसी पर है।

Thursday, December 27, 2007

भुट्टो की हत्या के बाद की तस्वीर(रावलपिंडी)


AQ372 - Rawalpindi, - PAKISTAN : A supporter of former premier Benazir Bhutto cries as he sits among dead bodies after the bomb blast, in Rawalpindi 27 December 2007. Benazir Bhutto died in a suicide blast in after an election rally. AFP PHOTO/AAMIR QURESHI
पाकिस्तान के रावलपिंडी में बेनजीर की रैली के दौरान आत्मघाती विस्फोट हुआ। यह दृष्य विस्फोट के बाद का है, जिसमें एक समर्थक बिखरी पड़ी लाशों के सामने रो रहा है। ( सौजन्य-फोटो-एएफपी)

फ्लैश॥फ्लैश... बेनजीर भुट्टो की हत्या।

पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री व पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो की हत्या। रैली में हुआ हमला।

फ्लैश॥फ्लैश... बेनजीर भुट्टो की हत्या।

पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री व पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की अध्यक्ष बेनजीर भुट्टो की हत्या। रैली में हुआ हमला।

Friday, December 21, 2007

अजब जीवट हैं... फिर बस गए

सत्येन्द्र प्रताप

दिल्ली की सरकार ने तो उन्हें उजाड़ दिया था। और कोई जगह नहीं मिली। चार दिन भी नहीं बीते हैं, मूर्तियां फिर से बनने लगीं। खुले आसमान के नीचे। पहले पालीथीन की छाजन थी। अब नहीं है। एक युवक बैठा हुआ सरस्वती की मूर्ति बना रहा था। उसे छोटे बच्चे घेरे हुए थे।
उसी कुनबे से एक ११-१२ साल की बच्ची निकली। साथ में उससे कम उम्र के बच्चे थे। एक छोटा सा हारमोनियम लिए हुए। बड़ी बच्ची के हाथ में खपड़ा था। उसे आकार देने में जुट गई। शायद संगीत उपकरण बनाना चाहती है, जिसे बजाकर बच्चे बसों में भीख मांगते हैं।
उसी समय डीटीसी की एक बस आई। उसमें हारमोनियम के साथ बच्ची चढ़ी। साथ में तीन-चार साल का बच्चा था। कुछ देर तक गीत के धुन निकालती रही। हारमोनियम के साथ उसके गले से भी मोटी सी आवाज निकली। दिल के अरमां आंसुओं में बह गए। वही स्टाइल, जिसमें भीख मांगी जाती है। हारमोनियम अच्छा बज रहा था। छोटे बच्चे ने भीख मांगना शुरु किया। शुरु से अंत तक पूरे बस में पैसा न मिला। एक आदमी ने उसे गुड़ का छोटा टुकड़ा दिया। चेहरे पर मुस्कान लिए वह लौटा। उसने हारमोनियम बजा रही लड़की को खुश होकर दिखाया, लेकिन उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नही हुई। वह फिर से बजाने और गाने लगी। शायद उसे कुनबे के अन्य सदस्यों की भूख का भी एहसास था। बच्चा गुड़ का टुकड़ा लेकर बैठ गया औऱ खाने लगा। गीत के धुन खत्म हुए। और लड़की ने भीख मांगना शुरु किया। लोगों के पैर छूने और विभिन्न तरह के दयनीय चेहरे बनाने पर भी उसे एक पाई न मिली। शायद बस में यात्रा कर रहे लोगों को इस दृश्य की आदत सी पड़ गई है। आशय बदल चुके हैं। बच्चे की मुस्कराहट और अपनी हार के साथ वह बस से उतर गई। उसके दिल के अरमां, सचमुच आंसुओं में बह चुके थे।

Tuesday, December 18, 2007

मुंह से निवाला छीनती सरकार

सत्येन्द्र प्रताप
आदमी सभ्य हो रहा है। अच्छी बात है। आप ही जवाब दें। क्या हर कथित सभ्य को जिंदा रहने का हक है? मुंह में आवाज बची है क्या? इसी सभ्य आदमी से सवाल है। सरकार तो जवाब देने से रही।
पिछले तीन महीने से देख रहा था। नोयडा मोड़ बस स्टाप को। समसपुर जागीरगांव लिखा है उस स्टैंड पर। अक्षरधाम के दिव्य-भव्य मंदिर के पास। स्टैंड के ठीक पीछे मजदूरों के कुछ परिवार। रोज उन्हें प्लास्टर आफ पेरिस से भगवान या कुछ और बनाते देखता था। सबसे ज्यादा भगवान बनते थे, उसके बाद कुछ सुंदरियां वगैरह। खजुराहो शैली की।
दिल्ली सरकार ने उन्हें उजाड़ दिया। उन्होंने सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा कर रखा था। क्या था कब्जा समझ में नहीं आता। पंद्रह बीस छोटे छोटे बच्चे, नंग-धड़ंग घूमते हुए। पांच छह महिलाएं और उतने ही पुरुष और कुछ बुजुर्ग वहां रहते थे। पालीथीन की छाजन डाले हुए।
आज कुछ बदला-बदला था दृष्य था। वे दुखी नहीं थे। खुश तो वे कभी रहते ही नहीं थे। केवल सामान को सहेज रहे थे। पता नहीं कहां से कुछ महिलाएं खाना भी खा रहीं थी। हो सकता है उन्होंने भीख मांगी हो। पेट तो मानता नहीं कि अवैध कब्जा हटाया गया है तो उस दिन कम से कम भूख न लगे। ठंड भी नहीं मानी होगी, लेकिन रात भर खुले आसमान के नीचे सोने के बाद भी कोई मरा नहीं। एक बच्चा भी नहीं मरा।
दिन कुछ मेहरबान है। धूप निकल आई है। सब कुछ बिखरा पड़ा है। कुछ ध्वस्त भगवान भी इधर-उधर पड़े हैं। एक छोटा सा बच्चा कुछ ढूंढ रहा है। कूड़े के ढेर में। मलबे में।
अजीब सा लगा यह दृष्य।
मुझे तो समझ में नहीं आता कि अब ये क्या करें। कहां जाएं। ये भी नहीं पता है कि कहां से ये लोग आए थे। रहते थे और मैं आफिस जाने के लिए बस का इंतजार करता रोज उन्हें देखता था।
अब क्या करेंगे ये लोग...
१- ऐसी ही शक्ल नजर आती है रोज, जब रेड लाइट पर कारों का काफिला खड़ा होता है। कोई महिला गोद में छोटा बच्चा और हाथ में कटोरा लिए इस कार से उस कार के बगल भागती नजर आती है। कुछ दानियों के शीशे खुलते हैं तो कुछ कारें हरी बत्ती होते ही सन्न से निकल जाती हैं।
२- ये लोग मर जाएं। सामूहिक रूप से आत्महत्या कर लें। लेकिन जीवट देश है यह। यहां ऐसी घटनाएं नहीं होतीं।
३- गलियों और बसों में चोरियां करें, पाकेट मारें या लोगों को लूटकर अपने पेट की आग बुझा लें।
४- हथियार उठा लें... नक्सली बन जाएं... आतंकवादी बन जाएं... किसी की हत्या करने का ठेका लेकर अपना पेट भरें या अपने अधिकार और निवाला छीनने के वालों को मार डालें।

प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्तियां बनाने वाले इन कलाकारों का भी मन होगा कि अपने मेहनत से दो रोटी कमाएं। ऐसी इच्छा नहीं होती तो इन्हें पहले भी मेहनत नहीं करना चाहिए था। बहुत दिनों से अवैध निर्माण हटाने की बात चल रही थी। रेल लाइनों के किनारे छह मंजिला इमारतें बनी हैं। सब अवैध हैं। छोटे बिल्डरों ने बनाई। उन्हें गिराने की बात चल रही थी। बिल्डिंगे आखिर बनने ही क्यों दी गईं? सवाल तो यही था। हालांकि इनमें रहने वाले मजदूर थोड़े चालाक हो गए हैं और वे वोटर बन गए हैं। सरकार मजबूर हो गई। उन अवैध बिल्डिंगों को बख्श दिया गया। लेकिन निशाने पर आए वे गरीब, जो मेहनतकश हैं। अपने हुनर और मेहनत से रोटी कमाना चाहते हैं। संगठित नहीं हैं। संगठित होने का समय ही नहीं है। दिन रात महिलाएं पुरुष और बच्चे मूर्तियां बनाने और बेचने में ही गुजार देते हैं। पेट है कि भरता ही नहीं।

Saturday, December 15, 2007

अब मजदूरों पर गोली चलना भी खबर नहीं होती


सत्येन्द्र प्रताप

नोएडा में गोली चली। फैक्ट्री के गार्ड ने चलाई। उत्तेजित मजदूरों ने घुसकर तोड़फोड़ की। पुलिस आई, विरोध करने वालों की तोड़ाई की और सुरक्षा कड़ी कर दी गई। न कोई बहस न चर्चा। नामी गिरामी अखबारों ने एक कालम की खबर दी और कर्तव्यों की इतिश्री।

अखबार और चैनलों में खबर तभी होती है, जब मजदूरों पर गोली चले और दहाई में मौतें हों। ओबी वैन की रेंज में अगर कोई बच्चा गड्ढे में गिर जाए तो खबर। तात्कालिक समस्या है। खबर चलेगी- उसका असर होगा। गड्ढा पाट दिया जाएगा।

मजदूर जब अपना हक मांगता है तो लाला उसे लात मार देता है। अगर वो संगठित होता है तो लाला की सुरक्षा में लगी पुलिस की पिटाई पड़ती है। न्यूज बैल्यू भी तो नहीं है। अगर ये समस्या उठाई जाए तो उसका कोई हल तो निकलना नहीं है। बेरोजगारी तो दूर नहीं होनी है। क्या फायदा। मरने दो। मर जाएंगे, गरीबों की संख्या घट जाएगी। उतने ही गरीब बचेंगे जो लाला की चाकरी करके आराम से रोजी-रोटी चला लें। ज्यादा टिपिर-टिपिर करेंगे तो पीटने के लिए खाकी वर्दी है ही। अगर खाकी वालों का भी जमीर जाग गया तो निजी सुरक्षाबल रखने की कूबत तो है ही। उनसे पिटवा देंगे। तो कोई मतलब नहीं है ज्यादा टें-टें करने का।

Wednesday, December 12, 2007

58 वर्षीय वृद्धा ने जुड़वां बच्चों को जन्म दिया

विग्यान भी क्या कमाल करता है। कभी विश्वास न होने वाली घटना हो जाती है। ऐसा ही हुआ हरियाणा में । जिंद जिले के बुरैन गांव की ५८ साल की चमेली देवी पहली ऐसी महिला बन गई हैं, जिन्होंने वृद्धावस्था में जुड़वां बच्चों को जन्म दिया है। कृतिम गर्भाधान के जरिए ७५ साल के कपूर सिंह की पत्नी ने एक लड़का और एक लड़की को जन्म दिया।
बच्चे की चाह में कपूर ने चमेली से दूसरा ब्याह रचाया था। उनके ब्याह को ४४ साल हो गए हैं। आपरेशन करने वाले डा. अनुराग विश्नोई का कहना है कि यह पेंचीदा मामला था। हमने उच्च रक्तचाप के चलते काफी एहतियात बरता। चमेली देवी ने आईवीएफ-- इनवीट्रो फर्टिलाइजेशन के जरिए गर्भधारण किया था। चिकित्सकों के मुताबिक बच्चा जच्चा दोनो स्वस्थ हैं।
आप भी शुभकामनाएं दें।

यह मनुष्य था, इतने पर भी नहीं मरा था



सत्येन्द्र प्रताप
कवि त्रिलोचन. पिछले पंद्रह साल से कोई जानता भी न था कि कहां हैं. अचानक खबर मिली कि नहीं रहे. सोमवार, १० दिसंबर २००७. निगमबोध घाट पर मिले. मेरे जैसे आम आदमी से.
देश की आजादी के दौर को देखा था उन्होंने. लोगों को जीते हुए। एकमात्र कवि. जिसको देखा, कलम चलाने की इच्छा हुई तो उसी के मन, उसी की आत्मा में घुस गए। मानो त्रिलोचन आपबीती सुना रहे हैं. पिछले साल उनकी एक रचना भी प्रकाशित हुई. लेकिन गुमनामी के अंधेरे में ही रहे त्रिलोचन। अपने आखिरी दशक में.
उनकी तीन कविताएं...

भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
जिसको समझे था है तो है यह फौलादी.
ठेस-सी लगी मुझे, क्योंकि यह मन था आदी
नहीं, झेल जाता श्रद्धा की चोट अचंचल,
नहीं संभाल सका अपने को। जाकर पूछा,
'भिक्षा से क्या मिलता है.' 'जीवन.' क्या इसको
अच्छा आप समझते हैं. दुनिया में जिसको
अच्छा नहीं समझते हैं करते हैं, छूछा
पेट काम तो नहीं करेगा. 'मुझे आपसे
ऐसी आशा न थी.' आप ही कहें, क्या करूं,
खाली पेट भरूं, कुछ काम करूं कि चुप मरूं,
क्या अच्छा है. जीवन जीवन है प्रताप से,
स्वाभिमान ज्योतिष्क लोचनों में उतरा था,
यह मनुष्य था, इतने पर भी नहीं मरा था.

त्रिलोचन ने किसी से कहा नहीं। सब कुछ कहते ही गए. आम लोगों को भी बताते गए और भीख मांगकर जीने वालों को नसीहत देने वालों के सामने यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया.

दूसरी कविता
वही त्रिलोचन है, वह-जिस के तन पर गंदे
कपड़े हैं। कपड़े भी कैसे- फटे लटे हैं
यह भी फैशन है, फैशन से कटे कटे हैं.
कौन कह सकेगा इसका जीवन चंदे
पर अवलंबित है. चलना तो देखो इसका-
उठा हुआ सिर, चौड़ी छाती, लम्बी बाहें,
सधे कदमस तेजी, वे टेढ़ी मेढ़ी राहें
मानो डर से सिकुड़ रही हैं, किस का किस का
ध्यान इस समय खींच रहा है. कौन बताए,
क्या हलचल है इस के रुंघे रुंधाए जी में
कभी नहीं देखा है इसको चलते धीमे.
धुन का पक्का है, जो चेते वही चिताए.
जीवन इसका जो कुछ है पथ पर बिखरा है,
तप तप कर ही भट्ठी में सोना निखरा है.
कवि त्रिलोचन कहीं निराश नहीं है. हर दशक के उन लोगों को ही उन्होंने अपनी लेखनी से सम्मान दिया जो विकास और प्रगति की पहली सीढ़ी भी नहीं चढ़ पाया. संघर्ष करता रहा.
तीसरी कविता
बिस्तरा है न चारपाई है,
जिन्दगी खूब हमने पाई है.
कल अंधेरे में जिसने सर काटा,
नाम मत लो हमारा भाई है.
ठोकरें दर-ब-दर की थीं, हम थे,
कम नहीं हमने मुंह की खाई है.
कब तलक तीर वे नहीं छूते,
अब इसी बात पर लड़ाई है.
आदमी जी रहा है मरने को
सबसे ऊपर यही सचाई है.
कच्चे ही हो अभी अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहां वह संभल के आई है.

Sunday, December 9, 2007

दिल की नीलामी



यह दिल नीलाम होगा...
कीमत चालीस हजार डॉलर।
कीमती है ना।
वैसे तो बाजार में कितने दिल नीलाम होते हैं।
हर रोज.. हर घंटे...
पैसे की बलि वेदी पर चढ़ते हैं।
नीलामी के लिए यह दिल भी है
लेकिन अच्छे काम के लिए...
असली नहीं
चित्रकार की कल्पना है केवल।
समाज की सच्चाइयां दिखाती
नीलाम होगा।
टूटेगा नहीं।
पैसे मिलेंगे...
वह राहत पहुंचाएंगे..
उन दिलों को..
जो टूट चुके हैं एड्स की चपेट में आकर।
इसकी नीलामी होगी।
सोथवे आक्शन सेंटर पर
ब्रिटेन में नहीं, न्यूयार्क में।
आम दिन नहीं...
खास दिन।
दिल को धड़काने वाले दिन।
चौदह फरवरी के दिन।

चुनावी रंग में कहां कुछ याद रहा हमें



ओम कबीर

गुजरात के चुनावी रंग पूरे देश में छिटक गए हैं। हर तरफ चरचा है। कुरसी की। ऊंट किस करवट बैठेगा। सब इसी में मशगूल हैं। इस बीच कुछ महत्वपूणॆ मुद्दों पर पेंट पुत गया है। चुनावी पेंट। नंदीग्राम और तसलीमा आउट आफ फोकस हो चुके हैं। बाजार का यही अथॆशास्त्र। हम बाजार युग में जी रहे हैं। इससे यह भी पता चलता है। लेकिन मैं इस मुद्दे को उठा रहा हूं। न्याय करने की दृष्टि से। तसलीमा बड़ा मुद्दा था। नंदीग्राम से भी। तेजी से उभरा। जनआंदोलन की शक्ल अख्तियार कर लिया। राजनीति उबलने लगी। लोग सिर के ऊपर आसमान उठाने लगे। शांत हुआ तो कहीं खो गया। इतना चुपके से। पता भी न चला। तसलीमा कहां हैं यह मीडिया के लिए भी आउट आफ कांटेक्स्ट की बात है। तसलीमा से झगड़ा लोगों का उनकी किताब की चंद पंक्तियों को लेकर था। तथाकथित ईश निंदा का। किताब की चंद पंक्तियों ने नंदीग्राम की अमानवीयता को मात दे दी। आंदोलन के स्तर पर। हजारों बेघर लोगों का मुद्दा चंद पंक्तियों से छोटा दिखने लगा। हत्या, लूट, बलात्कार से भी बड़ी थीं ये पंक्तियां। नंदीग्राम भी मुद्दा बना लेकिन जनआंदोलन नहीं। तसलीमा की तरह। सियासी मुद्दा भी बना। लेकिन लाभदायक नहीं रहा। नेताओं का भी मोहभंग हो गया। बहुत जल्द। जैसे तसलीमा चढ़ीं और उतरीं। क्या हम नंदीग्राम को तसलीमा की तरह ही बड़ा मुद्दा नहीं बना सकते थे। तसलीमा सियासी मुद्दा थी। नंदीग्राम राजनीतिक जंग। जंग में हर चीज जायज होती है। पर हर चीज जायज भी नहीं होती। नंदीग्राम को प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं।

Thursday, December 6, 2007

गंगा तू चली कहां


मानॊ तॊ मैं हूं मां गंगा न मानॊ तॊ बहता पानी ा यह सब आस्था पर है ा न जाने कितनी शदियॊं से जीवित और मत पाणियॊं का उद्धार कर रही हैा वॊ जब स्वग से पथ्वी पर अवतरित हुई तॊ उनके साथ ३३ कॊटी देवता भी देवपयाग आये ा लॊगॊं के पाप धॊते -धॊते मैली हॊ गयीा उसमें जसे डाला गया उसे मां ने बिना कुछ कहे अपने में समाहित कर लियाा काश मां अपने में भष्टाचार कॊ भी समा लेती तॊ आज समाज कितना अच्छा हॊता ा पुतर भले ही कुपतर बन जाए पर मां कभी कुमाता नहीं बनती ा वॊ अपने बच्चॊं की बस खुश देखना चाहती हैा हर गम सहती है लेकिन कुछ कहती नहींा वॊ तॊ उसके लायक बचचे ही उसे उसके नालायक बच्चॊं से उसकी र‌शा करते हैंा
गंगा मां ने भी कभी किसी से कुछ नहीं कहाा मां गंगा की सफाई पर करॊड़ॊं रुपये खरच हॊ गये हैं पर नतीजा शिफर ा अदालत कॊ कहना पड़ा बस करॊ अब गंगा के नाम पर कितना तर करॊगे अपने आप कॊ ा मां गंगा जब परवतॊं में अपने घर ऋषिकेश कॊ छॊड़कर मैदानी इलाकॊं में आती है तॊ उसके पहाडवासी बच्चे भी उसे पहचान नहीं पाते ा उनका कहना है कि हमारी मां तॊ अत्याधिक सुंदर है जॊ अपने बच्चॊं की प्यास बुझाती है उसका जल निमरल है ा लेकिन इसका जल तॊ गंदगी से पटा पड़ा हैा इसके किनारे रहने वाले तॊ पानी कॊ उबाल कर पीते हैा

जी करता है जग जीत लूं


सत्येन्द्र
अगर स्वतंत्रता असीमित हो तो नंगई बढ़ जाती है। स्वतंत्रता के साथ संयम भी उतना ही जरूरी है। एक तरफ ईरान में रात को बुर्का चेक करने के लिए महिला पुलिस निकलती है, तो पश्चिमी देशों में खुलेपन की कोई सीमा नहीं बचती। रुस में चुनाव हुए। प्रो क्रेमलिन ग्रुप नासी ने भी खुशी का इजहार किया। खुशी का आलम यह था कि मास्को के रेड स्क्वायर में रैली के दौरान बिकिनी पहनकर दौड़ लगाने लगी। हाल के पार्लियामेंट्री चुनावों में रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन की यूनाइटेड रूस पार्टी ने जीत हासिल की है। यूनाइटेड रूस ६४.१ प्रतिशत मत हासिल किए हैं।

Wednesday, December 5, 2007

गड्ढा

विवेक ध्यानी

भले ही आज इस मासूम पर कॊई ध्यान नहीं दे रहा हॊा बच्चे तॊ अपनी ही दुनिया में मस्त रहते हैं वॊ इस जहान के भ़ष्टाचार से दूर हैं ा लेकिन समाज में भ़ष्टाचार अपनी जड़े गहरी जमा चुका हैा चारॊ तरफ भ़ष्टाचार हावी है ा भ़‍ष्ट चारी ये भी हर जगह भ़ष्टाचार करता है ा बड़े तॊ संभल कर चले जाते हैं गिरता तॊ बच्चा है ा जॊ भविष्य है ा लेकिन भविष्य की किसे चिंता है सब वतॆमान में जी रहे हैं ा अपने कॊ प्रजातंत्र का चॊथा सतंभ कहने वाला मीडिया भी तभी जागता है जब कॊई प़िंस गढ्ढे में गिरता है तॊ उन्हें २४ घंटे के लिए ख़बर मिल जाती हैा सारा देश उस समय गढ्ढॊं कॊ कॊसता है ा फिर चाहे आम आदमी हॊ या फिर सीएम हर कॊई दुआ सलामती मांगता है ा अंगेजी की कहावत है पिवेंशन इज बैटर देन क्यॊर अथात वक्त रहते ऎसे गढ्ढॊं कॊ ढक दिया जाए तॊ कल का भविष्य कभी ऎसे गढ्ढॊं में नहीं गिरेगाा