Friday, August 7, 2009

.... कोसी की अजब कहानी


पूर्वी नहर तटबंध टूटने से बिगड़ी सिंचाई व्यवस्था
खेतों में भरी है बालू
पानी की जबरदस्त किल्लत
मॉनसून में देरी से बिगड़ गई बुआई



सत्येंद्र प्रताप सिंह / चैनपुर/सुपौल
बिहार में सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, अररिया, कटिहार और पूर्णिया जिलों के खेत इस साल सूखे पड़े हैं। बाढ़ ने पिछले साल इन इलाकों को डुबाया ही था, नहर की व्यवस्था ध्वस्त होने से खेतों में पानी नहीं पहुंच रहा है। मानसूनी बारिश न होना भी कोढ़ में खाज बन गया है।
कोसी नदी से सिंचाई के लिए निकाली गई पूर्र्वी नहर से इन सभी जिलों में सिंचाई होती थी। लेकिन कुसहा में तटबंध टूटने के बाद सिंचाई की व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई जिससे इलाके के किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है।
खेतों में बालू भरा पड़ा है और सिंचाई के लिए पानी की किल्लत हो गई है। जिन खेतों में बुआई होनी थी, बारिश की कमी की वजह से वे भी बांझ की तरह हैं, जिनमें बीज ही नहीं पड़ सकते। चैनपुर गांव के कलानंद यादव के पास 3 एकड़ जमीन है। लेकिन उनकी खेती-किसानी बिलकुल चौपट हो चुकी है।
खेत में बालू जमा है और गांव की कुछ जमीन पर सब्जी उगाकर उसे स्थानीय बाजार में बेचने जाते हैं। यादव कहते हैं, 'कोसी ने हमारे खेतों को विधवा बना दिया है। उस से निकली नहर के पानी से ही खेतों का श्रृंगार होता था। खेतों में बालू के बावजूद अगर पानी होता तो कुछ न कुछ उपजा ही लेते।'
हालांकि ग्रामीणों ने बताया कि सरकार ने 130 रुपये कट्ठा से हिसाब से मुआवजा दिया है। कोसी से निकली पूर्वी नहर की सिंचाई क्षमता करीब 8.5 लाख हेक्टेयर थी लेकिन नहरों में अवसाद जमा हो जाने से क्षमता घटकर 3 से 4 लाख हेक्टेयर तक रह गई।
नाम न छापने की शर्त पर सिंचाई विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं,'पूर्वी नहर के राजपुर ब्रांच की मरम्मत की गई है लेकिन काम की रफ्तार धीमी है। इस रफ्तार से काम में काफी वक्त लग जाएगा।'
http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=22072

3 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

यह बिजनेस स्टेण्डर्ड के प्रिण्ट संस्करण में पढ़ रहा हूं। मैं कई बार इस अखबार के अंग्रेजी-हिन्दी सबस्क्रिप्शन में अदल बदल करता रहा हूं। पर अन्तत इस प्रकार की रिपोर्टिंग मुझे हिन्दी में जारी रहने को प्रेरित करती है।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अंग्रेजी वाले कोसीपीड़ितों का यह दर्द भला कैसे समझेंगे? यह दर्द तो वही समझेंगे, जिहोने ख़ुद कभी खेत-मेड़ पर काम किय हो.

रंजीत said...

great work. Thanks to you and Buisness standard. But it's time for media houses and journalists to look after. otherwise a mass movement is bound with kosi.whenever it will gain it's "critical mass " a chain reactions will be started.then no body can stop this.
Yes. Mr. isht dev is right. those who never gon in farming sheath would not experience the trauma of koshi. no one can experience the pain of ploughman's palm without steering the handle of HAL. old saying is - jako paawam ...
thanks
ranjit