सबकी अपनी अपनी सोच है, विचारों के इन्हीं प्रवाह में जीवन चलता रहता है ... अविरल धारा की तरह...
Wednesday, January 20, 2010
अब पवार ने दिया दूध की कालाबाजारी करने वालों को अवसर
हालांकि जब शरद पवार से कीमतें घटने के ज्योतिष ज्ञान के बारे में पूछा जाता है तो वे अपने ज्योतिष ज्ञान से साफ मुकर जाते हैं।
खाद्य एवं कृषि मंत्री शरद पवार ने आज कहा कि उत्तरी भारत में दूध की कमी के कारण दुग्ध उत्पादक इसकी कीमत बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने यह भी आगाह किया कि जब तक कीमतों को बढ़ाने का निर्णय नहीं किया जाता राज्यों के लिए दूध को खरीदने में मुश्किल पेश आएगी। पवार ने कहा, 'हम विशेषकर उत्तरी भारत में दूध की अपर्याप्त उपलब्धता की स्थिति को झेल रहे हैं। अक्टूबर में हमने कीमतों में वृद्धि करने का निर्णय किया था। इसकी कीमतों को बढ़ाने की मांग की जा रही है।Ó उन्होंने कहा, 'जब तक कोई निर्णय नहीं हो जाता मुझे नहीं मालूम कि विभिन्न राज्य लोगों की मांग को पूरा करने के लिए दूध खरीदने में सक्षम होंगे या नहीं। यह दर्शाता है कि किस तरह से इस क्षेत्र की अनदेखी हुई है।Ó
अब देखना है कि दूध के लिए मारामारी कब से शुरू होती है और कालाबाजारी करने वाले इससे कितने सौ करोड़ रुपये कमाते हैं। चीनी की कीमतें बढ़वाने में तो पवार साहब का हित समझ में आता है। लेकिन लगता है कि अब उन्होंने दूध के कारोबार में भी कदम रख दिया है?
Tuesday, January 12, 2010
पवार की धोखेबाजी से चीनी मिलों को मोटी कमाई
शायद यह सभी को याद हो कि जब उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों ने परोक्ष रूप से धमकी दे दी थी कि किसानों का गन्ना वे 200 रुपये क्विंटल के हिसाब से नहीं लेंगे, तब उत्तर प्रदेश सरकार ने कच्ची चीनी के प्रवेश पर रोक लगाई थी। मिलों को भरोसा था कि वे पेराई नहीं भी करते तो आयातित कच्ची चीनी साफ करके मोटा मुनाफा कमा लेंगे। किसानों का गन्ना सूखे- उनकी बला से। केंद्र में तो पवार साहब हैं ही बयान देने के लिए कि कच्ची चीनी महंगी पड़ रही है, इसलिए चीनी की कीमतें 100 रुपये किलो तक जा सकती हैं।
आखिर केंद्र सरकार किसे बेवकूफ बना रही है? चीनी माफिया मंत्रियों ने जनता को धोखा देने की ठान ली है। अभी तो मान लीजिए कि कच्ची चीनी आ रही है, वह महंगी पड़ रही है इसलिए दाम बढ़ रहे हैं। याद कीजिए कि 2009 मार्च से लेकर अक्टूबर तक वही चीनी मिलों द्वारा 30 रुपये किलो तक बेची गई, जो चीनी मार्च के पहले 16 रुपये किलो बिक रही थी। आखिर चीनी तैयार करने की लागत कितनी बढ़ गई है कि मिलें थोक भाव में 41 रुपये किलो चीनी बेचने लगीं? आखिर मिलों को कितना मुनाफा खाना है? कितने प्रतिशत लाभ कमाना है, चीनी की कमी दिखाकर? इसके लिए कौैन जवाबदेह है? केंद्र सरकार या राज्यों की सरकारें? जवाब या तो केंद्र सरकार दे सकती है... या लोकतंत्र में सबसे ताकतवर माना जाने वाला मतदाता- यानी आम जनता।
Friday, January 8, 2010
मोबाइल है तो स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक आपको कभी भी धमकी दे सकता है!
फोन काटते ही फिर फोन आ गया तो मेरी पत्नी ने फोन ले लिया। वह बात कर रही थी तो स्पीकर ऑन था और फोन करने वाला लगातार गालियां दिए जा रहा था, ऐसी गालियां- जिसे लिखना भी संभव नहीं है। बहरहाल मैने फिर फोन काटा।12 बजे तक मैने कम से कम 5 बार फोन काटा। तब तक ऑफिस जाने के लिए मेरे मित्र भी आ चुके थे। मैं उन्हें इस घटना के बारे में बता ही रहा था कि फिर कॉल आ गई। इस बार मेरे मित्र ने फोन उठाया और उन्होंने समझाने की कोशिश की कि यह उस व्यक्ति का नंबर नहीं है, जिसे तुम तलाश रहे हो। उधर से जवाब आया कि तब उसे पैदा कर। बहरहाल उन्होंने भी थोड़ा-बहुत अपनी भाषा में समझाने की कोशिश की। हम लोग ऑफिस के लिए निकले और मैं लगातार फोन काटता रहा या उसे रिसीव करके छोड़ता रहा।
बहरहाल ऑफिस पहुंचने पर इस घटना के बारे में चर्चा कर ही रहा था कि फिर फोन आने लगा। इस बार मैने फोन उठाया और कहा कि यह एकता का नंबर नहीं है। फोन करने वाले ने कहा कि अभी थोड़ी देर पहले इसी फोन पर एकता से बात हुई है, तू उससे बात करा। बहरहाल- मैने फिर फोन काट दिया। फोन काटते ही फिर फोन आ गया। इस बार मेरे एक सहकर्मी मनीश ने फोन उठाया। उन्होंने फोन करने वाले को समझाने की कोशिश की कि भाई यह नंबर सत्येन्द्र जी का है। उसने कहा कि तुम फोन का कागज लेकर बैंक आ जाओ। उन्होंने फोन काट दिया और एफआईआर करने की सलाह दी। इस बीच मुझे कॉल करने वाले ने कहा कि मैं प्रवीण बोल रहा हूं, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक बैंक गुडग़ांव से। वह बार-बार पैसे वापस करने की बात कर रहा था।
इस बीच 4 काल और आई और मैं फोन काटते अपने सहयोगी को लेकर आईपीओ एक्सटेंशन थाने की ओर बढऩे लगा। थाने पर पहुंचने पर पहले तो वहां मौजूद पुलिसकर्मी ने मुझे समझाया कि आप पांडव नगर इलाके के थाने में एफआईआर दर्ज कराइये। हालांकि थाने पर यह बताने पर कि मैं बिजनेस स्टैंडर्ड में रिपोर्टर हूं और आईटीओ पर मेरा ऑफिस है, जो आपके थाना क्षेत्र में आता है, तो उसने मुझे सब इंस्पेक्टर (शायद) मीना यादव के पास भेज दिया। उन्होंने मुझे कॉल रिकॉर्ड करने की सलाह दी और एक लिखित आवेदन अपने पास जमा करा लिया, जिसमें मैने अपने दो घंटे के मानसिक उत्पीडऩ के बारे में लिख दिया। इंसपेक्टर ने मुझे कार्रवाई करने का आश्वासन देकर विदा कर दिया।
मैं अभी कार्यालय पहुंचा भी नहीं था कि इंसपेक्टर मीना यादव का फोन आ गया। उन्होंने कहा कि मेरी बात आपके द्वारा दिए गए नंबर पर हुई है और कॉल रिसीव करने वाले ने बताया है कि वह स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक से बोल रहा है। उसने इंसपेक्टर को बताया था कि यह नंबर उसे मिला है, जिसमें उसे एकता का नाम बताया गया है। बहरहाल इंसपेक्टर ने कहा कि अब इस नंबर से आपको कॉल नहीं आनी चाहिए और अगर आती है तो आप मुझे इनफार्म करिएगा। बैंक वाले ने इंसपेक्टर से यह भी कहा कि कॉल रिकार्डेड है और किसी तरह की गाली-गलौझ नहीं की गई है। शायद उसने बाद में की गई 2-3 कॉल की रिकॉर्डिंग की होगी।बहरहाल, उसके बाद ब्लॉग पर लिखने तक मेरे पास कॉल नहीं आई है।
मैं यही सोच रहा हूं कि आर्थिक अखबार में काम करने के नाते हम लोग लगातार रिजर्व बैंक के गाइडलाइंस के बारे में लिखते हैं, चिदंबरम का भाषण सुनते है और उसे छापते हैं कि वसूली के नाम पर किसी को तंग नहीं किया जाएगा। साथ ही पुलिस का आश्वासन होता है कि स्पेशल सेल बनी है और इस तरह की किसी भी सूचना पर तत्काल कार्रवाई होगी। आखिर ये सब आश्वासन, खबरें किसके लिए हैं।
हालांकि मैने अपनी अब तक की जिंदगी में किसी बैंक से कोई कर्ज नहीं लिया है। भगवान न करें कि कभी लेना भी पड़े, लेकिन अगर जिस व्यक्ति ने कर्ज लिया है तो ये निजी बैंक कितनी गुंडागर्दी करते हैं यह मुझे समझ में आ गया। दो-तीन घंटे का मानसिक उत्पीडऩ मेरे ऊपर इतना भारी पड़ा कि उसका बयान किया जाना भी मुश्किल है।
Sunday, November 22, 2009
किसान, बेरोजगार सभी- लिब्रहान मसले पर हुए हिंदू और मुसलमान
इंडियन एक्सप्रेस में लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित हो गई। इसमें अटल, आडवाणी, जोशी और कल्याण सिंह को दोषी ठहराया गया। जो रिपोर्ट संसद में पेश की जानी थी, अखबार में पेश हो गई। सही कहें तो यह मसला इस समय कोई मसला ही नहीं था।
असल मसला तो यह था कि चीनी लाबी के खिलाफ तैयार हो रहे जनमत को भ्रमित करना था। प्रदर्शनकारी किसानों का उत्पात, दारू पीते लोगों की फोटो, दारू की खाली बोतलें दिखाए जाने पर भी मुद्दे से भटकाव नहीं हुआ था। आम जनता लूट के खिलाफ एकजुट हो रही थी और वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी। ऐसे में कांग्रेस ने लिब्रहान आयोग का पासा फेंक दिया। पुराने सत्ताधारी हैं। बाजी कैसे खाली जाती। संसद ठप। अब हर गली- चौराहे पर सिर्फ एक ही चर्चा। बाबरी किसने ढहाई? कुछ कहेंगे भाजपा दोषी, कुछ कहेंगे कांग्रेस दोषी। हालांकि इस मसले से किसी के पेट में रोटी नहीं जानी है। किसी किसान का पेट नहीं भरना है। किसी बेरोजगार को रोजगार भी इस मसले से नहीं मिलने वाला है। लेकिन यह सही है कि यह पीड़ित तबका लिब्रहान आयोग और बाबरी पर चर्चा करके अपना पेट भर लेगा। किसानों का गेहूं १० रुपये किलो खरीदकर उन्हीं को २० रुपये किलो आटा देने और २० रुपये किलो अरहर खरीदकर १०० रुपये किलो अरहर का दाल देने वाले लोग फिर बचकर निकल जाएंगे। देश की जनता अब या तो हिंदू हो जाएगी, या मुसलमान। गरीब, किसान, शोषित, पीड़ित, दलित औऱ बेरोजगार कोई नहीं रहेगा।
हां इससे कांग्रेस को फायदा जरूर हो जाएगा। उन्हें पता है कि ये मुद्दा मर चुका है, जिससे भाजपा लाभ नहीं उठा सकती। इसकी प्रतिक्रिया में कांग्रेस को जरूर थोड़ा फायदा हो जाएगा। मसले की प्रतिक्रिया से कम, असल मुद्दों से भटकाव और आक्रोश की दिशा बदलने का फायदा कांग्रेस को जरूर मिलेगा। भाजपा एक बार फिर गलत मसला उठाकर जनता की नजर में कमजोर साबित हो जाएगी।
Friday, November 20, 2009
तोड़फोड़ और हंगामा करके सारी व्यवस्था न ठप करें तो क्या करें किसान?
तर्क दिया जा रहा है कि किसानों ने बहुत उत्पात मचाया। दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान। आखिर बेचारा किसान अपनी बाद किस ढंग से रखे। क्या अगर वह अपने घरों में शांत बैठकर सब दुख झेलता रहता है तो यह कथित सभ्य समाज और मीडिया उसकी बात को उठाता है? दिल्ली के अखबार किसानों के उत्पात के विरोध से पटे पड़े हैं। आखिर में इसके पहले इन मुनाफाखोरों और नेताओं के समर्थक कहां सोए रहते हैं?
पिछले पांच महीनों महीनों के दौरान कृषि के गौण उत्पादों की कीमतों में भारी उछाल आयी है, लेकिन उसका कोई लाभ कृषि के प्राथमिक उत्पादकों को नहीं मिला है।
किसानों को इसी बात की आशंका सता रही है कि आने वाले समय में भी उनके प्राथमिक उत्पाद न्यूनतम समर्थन मूल्य या उसके आसपास की कीमत पर खरीद लिए जाएंगे और उससे जुड़े उत्पाद चार या पांच गुने दाम पर बिकेंगे। एक आम उपभोक्ता के नाते उन्हें भी उसी बढ़ी कीमत पर गौण उत्पादों की खरीदारी करनी पड़ती है।
किसानों के मुताबिक पिछले सीजन में उन्होंने मंडी में दलहन (अरहर) की बिक्री 2000 रुपये प्रति क्विंटल तो मसूर की बिक्री 1700 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की थी। नए दलहनों के लिए सरकार ने कीमतों में प्रति क्विंटल 30-60 रुपये की बढ़ोतरी की है।
इस साल भी वे अधिकतम 1800-2200 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से दलहन की बिक्री करेंगे। जबकि नए सीजन में भी दालों के भाव में कोई खास गिरावट की संभावना नहीं है। किसान बताते हैं कि किसी दलहन को दाल बनाने एवं उस पर पॉलिश वगैरह करने में प्रति किलोग्राम अधिकतम 6 रुपये की लागत आती है।
मांग के मुकाबले आपूर्ति में कमी आते ही बाजार में भाव चढ़ने लगते हैं, लेकिन उस अनुपात में उन्हें उसका लाभ नहीं मिलता है। किसान कहते हैं कि उनके लिए मांग एवं पूर्ति का कोई सिध्दांत काम नहीं करता। गन्ने के भुगतान मूल्य के मामले में भी किसानों की यही शिकायत है।
दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे किसान पूछते हैं, 'क्या केवल चीनी बनाने की लागत बढ़ती है? चीनी की कमी होते ही 140-145 रुपये प्रति क्विंटल की दर से खरीदे गए गन्ने से बनी चीनी की कीमत 3600-3700 रुपये प्रति क्विंटल हो गयी तो क्या इसका लाभ गन्ना किसानों को नहीं मिलना चाहिए?'
गेहूं किसान रुआंसे मन से कहते हैं, 'पिछले साल उन्होंने अधिकतम 1000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गेहूं की बिक्री की, लेकिन धान के उत्पादन में कमी को देखते हुए बाजार में गेहूं की कीमत 1400 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी है। उन्हें इसका कोई लाभ नहीं मिला। उल्टा उन्हें अब 20 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से खाने के लिए आटा खरीदना पड़ रहा है।'
प्राथमिक उत्पादक को नहीं मुनाफा
कृषि जिंस कीमत जुड़े उत्पाद कीमत
दलहन अरहर 2000 अरहर दाल 9000
दलहन मसूर 1700 मसूर दाल 6000
सरसों 1600 सरसों तेल 6000
धान 950 चावल 2200
बासमती धान 1300 चावल 6500
गेहूं 1000 आटा 1900
चीनी 1800 चीनी 3700
सभी कीमत रुपये प्रति क्विंटल में
Thursday, November 19, 2009
आखिर क्यों न मिले गन्ने का उचित दाम...क्या कंपनियां और सरकार जवाबदेह नहीं?
जन्तर मंतर पर ४ दिन से प्रदर्शन चल रहा है। किसानों के चेहरे पर बेबसी साफ झलकती है। राजनीति करने वाले राजनीति कर रहे हैं, करना भी चाहिए। कंपनियों ने चीनी की कमी दिखाकर करोड़ो कमाए और अब चीनी के दाम ३६ रुपये किलो के करीब तय जो चुके हैं। शीरे का दाम कंपनियां बढ़ाकर २६ रुपये लीटर करने की तैयारी कर रही हैं, ऐसे में किसानों को क्यों बेबस बनाए रखना चाहती है सरकार।
किसानों के पास इसका तर्क भी है कि क्यों उन्हें ज्यादा दाम मिलना चाहिए। बागपत शुगर फैक्ट्री (सहकारी) के अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के तमाम सहकारी मिलों के अध्यक्षों के संगठन के चेयरमैन प्रताप सिंह गुर्जर किसानों की इस मांग को सही ठहराते हुए कहते हैं, 'थोक बाजार में चीनी की मौजूदा कीमत 3,600 रुपये प्रति क्विंटल है। पेराई से निकले बगास 280 रुपये प्रति क्विंटल, शीरा 1,600 रुपये प्रति क्विंटल और प्रेस मड 126 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिकते हैं। एक क्विंटल गन्ने से करीब 10 किलोग्राम चीनी का उत्पादन होता है। यानी अन्य सह उत्पादों को छोड़ भी दिया जाए तो एक क्विंटल गन्ने से केवल 360 रुपये की चीनी बनती है। ऐसे में 165-170 रुपये प्रति क्विंटल गन्ने की कीमत को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता।'
आखिर सरकार को ये क्यों समझ में नहीं आता? क्या चुनाव के पहले चीनी कंपनियों से इतना ब्लैक मनी वसूल लिया गया था कि १५ रुपये किलो लागत वाली चीनी ६ महीने तक ३० रुपये किलो बेचवाने के बाद भी कंपनियों का सरकार पर चढ़ा एहसान नहीं उतर रहा है?
Friday, November 6, 2009
मोंटेक सिंह ही बताएं कि क्या किसानों को मिल रहा है कृषि जिंसों की कीमतों में बढ़ोतरी का मुनाफा
बिचौलिए मुनाफा खा रहे हैं, हो सकता है कि प्रसंस्करण इकाइयों को फायदा हो, साथ ही बड़े आयातकों को भी आयात कराकर मुनाफा कराया जा रहा हो, लेकिन किसानों को तो कहीं से फायदा नहीं हो रहा है। उन्हें तो फायदा तब होता, जब अनाज खेतों से उपजने के बाद भी रेट महंगे रहते, न्यूनतम समर्थन मूल्य मूल्य उनके उत्पादन लागत से ५० प्रतिशत ज्यादा होता और सारा खाद्यान्न सरकार खरीद लेती और उसके बाद उसे बाजार में उतारती।
आइए देखते हैं कि क्या है आंटे दाल का भाव। चावल और गेहूं के अलावा कमोबेश सभी कृषि जिंसों के भाव पिछले महीने भर में 20 फीसदी से ज्यादा उछल गए हैं। देश में होने वाले कुल कृषि उत्पादन में 20 फीसदी हिस्सेदारी खरीफ के अनाज, दालों और तिलहनों की होती है। रबी की फसलें भी इसमें 20 फीसदी योगदान करती हैं। बाकी 60 फीसदी बागवानी, मांस और मछली उद्योग से मिलता है।
हालांकि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इस साल के आखिर तक सरकारी कवायद की वजह से खाने पीने की वस्तुओं के दाम कम हो जाने की उम्मीद जताई है, लेकिन यह बहुत दूर की कौड़ी लग रही है।
17 अक्टूबर को थोक मूल्य सूचकांक पिछले साल 17 अकटूबर के मुकाबले 1.51 फीसदी बढ़ा, लेकिन खाद्य मूल्य सूचकांक में 12.85 फीसदी की उछाल देखी गई। कृषि उत्पादों के वायदा कारोबार की देश की सबसे बड़ी संस्था नैशनल कमोडिटी ऐंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (एनसीडीईएक्स) मुख्य अर्थशास्त्री और ज्ञान प्रबंधन प्रमुख मदन सबनवीस अहलूवालिया की बात से सहमत नहीं हैं।
उन्होंने कहा, 'देश के हरेक क्षेत्र में अलग-अलग वस्तुओं की खपत कम-ज्यादा रहती है और इस मामले में उपभोक्ताओं का जायका बदल नहीं सकता। चने की दाल सस्ती और आसानी से उपलब्ध है, केवल यही सोचकर अरहर की जगह कोई चने की दाल खाना शुरू नहीं करेगा। इसी तरह कुछ खास राज्यों में चावल कभी गेहूं की जगह नहीं ले सकता। इसलिए सरकार लाख चाहे, कीमतों में तेजी रुक नहीं सकती।'
इस साल मॉनसून की लुकाछिपी की वजह से खरीफ की फसल में 18 फीसदी कमी का अंदेशा जताया जा रहा है। इसी तरह रबी की फसल में गेहूं भी पिछले साल से कम होने की बात कही जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में कुल खाद्यान्न उत्पादन में रबी का योगदान बढ़ा है और पिछले वित्त वर्ष में यह हिस्सेदारी 50 फीसदी रही थी।
हालांकि प्रमुख अनाज गेहूं और चावल के दाम कम बढ़े हैं क्योंकि कारोबारियों को डर है कि सरकार दाम काबू करने के लिए पिछले रबी और इस बार के खरीफ सत्र में बनाए गए बफर स्टॉक का इस्तेमाल कर लेगी। लेकिन दालों, चीनी और मसालों के ऐसे भंडार मौजूद नहीं हैं और फसल भी कमजोर हुई है, जिसकी वजह से इनके दाम बेलगाम हो रहे हैं।
सबनवीस कहते हैं कि घरेलू उत्पादन पर बहुत कुछ निर्भर करता है। चीनी को ही लीजिए। विदेशों में भी कीमत ज्यादा है, इसलिए सरकार कच्ची चीनी का आयात नहीं कर सकती। हल्दी का न तो बफर स्टॉक है और न ही उसके आयात की कोई गुंजाइश है, इसलिए घरेलू उपज पर ही ये निर्भर हैं।
आखिर कैसे भरें पेट
उत्पाद 4 अक्टूबर 4 नवंबर
चावल 33 34
गेहूं 18 20
आटा 20 24
सूजी 20 24
मैदा 20 26
चीनी 32 38
तुअर 90 110
हल्दी 120 160
अंडे* 30 38
सभी भाव रुपये प्रति किलोग्राम
* अंडे के भाव रुपये प्रति दर्ज़न
Wednesday, November 4, 2009
सरकार की गन्ना किसानों से बेइमानी और मिलों से गन्ने की कीमत ज्यादा देने के घड़ियाली आंसू
इसी बीच केंद्र सरकार उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) ले आई। इसके मुताबिक मिलों को सिर्फ १२९ रुपये प्रति क्विंटल ही किसानों को गन्ना मूल्य देना होगा। अगर किसी राज्य सरकार ने गन्ने के ज्यादा दाम किसानों को दिलाने की कोशिश की, तो उसकी भरपाई उस संबंधित राज्य को करनी होगी। कहने का मतलब यह है कि एफआरपी अगर १३० रुपये क्विंटल तय हो गया और किसी राज्य सरकार ने अपने राज्य के लिए गन्ने का राज्य समर्थित मूल्य १६० रुपये प्रति क्विंटल तय कर दिया तो उस राज्य सरकार को ही किसानों को ३० रुपये क्विंटल किसानों को देना होगा। मिलें सिर्फ १३० रुपये क्विंटल भुगतान करके निकल जाएंगी।
कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों से वे उम्मीद करते हैं कि वे एफआरपी से ज्यादा गन्ने का दाम देंगी। समझ से परे है कि वे किस आधार पर उम्मीद कर रहे हैं कि अधिक दाम देंगी मिलें। अगर गन्ने का अधिक दाम देना उचित है, तो वही दाम केंद्र सरकार ने क्यों नहीं फिक्स कर दिया, उचित औऱ लाभकारी मूल्य के रूप में।
साफ है कि कांग्रेस सरकार बेइमानी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना चाहती है, न कि किसानों को मुनाफा कराना चाहती है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया कहते हैं कि खाद्यान्न के दाम बढ़ने से किसानों को फायदा होगा। शायद वे जमीनी हकीकत से रूबरू नहीं होना चाहते। चीनी मिलों ने वही चीनी ३० रुपये प्रति किलो बेची, जो वे फरवरी तक १५ रुपये किलो बेचा करते थे। और यह ८ महीने से चल रहा है। इस बीच नई चीनी बाजार में नहीं आई है। आयातित चीनी भी अभी बाजार में कम ही आई है (आंकड़े सामने आए तो इस पर एक बार फिर लिखेंगे कि चीनी मिलों ने इस लूट से पिछले आठ महीने में कितने हजार करोड़ रुपये कमाए हैं)। अब मोंटेक सिंह ही बताएं कि इससे गन्ना किसानों को कितना फायदा मिला है और उपभोक्ताओं को कितना फायदा मिला है?
Sunday, November 1, 2009
आखिर लोग इतने पाशविक क्यों हो जाते हैं कि भावनाओं में बहकर निर्दोष लोगों की जान लेते है?
स्वतंत्रता के बाद भीषण दंगे हुए। विभाजन का दंगा। उसके बाद सबसे वीभत्स रहा १९८४ में सिखों पर हमला। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सामूहिक नरसंहार शुरू हुए और यह तीन दिन तक चला। देश भर में हजारों की संख्या में लोगों को जिंदा जलाया गया। अभी मैं दैनिक जागरण के पूर्व पत्रकार और चिदंबरम पर जूता फेंकने वाले जरनैल सिंह की पुस्तक पढ़ रहा था। रात को पढ़ना शुरू किया। हालात के वर्णन कुछ इस तरह थे कि रात भर नींद नहीं आई। इसमें सबसे दुखद यह रहा कि आज भी पीड़ितों का उत्पीड़न जारी है। मानसिक, शारीरिक, आर्थिक हर तरह का। न्याय मिलना तो दूर की बात है।
दिल्ली में ८४ के दंगों में भी देखा गया था कि जिन इलाकों के अधिकारी चुस्त दुरुस्त थे, उन इलाकों में दंगे का प्रभाव कम रहा। जहां नेताओं ने दंगाइयों को नेतृत्व दिया, वहीं संकट गहरा रहा। लेकिन इन दंगाई नेताओं को किसी तरह की सजा नहीं मिली।
यही स्थिति गुजरात में हुई, जब नरेंद्र मोदी सरकार कुछ नहीं कर पाई और पूरा राज्य जलता रहा।आखिर इस तरह के दंगों में प्रशासन भी भावनात्मक रूप से पागल हुए लोगों के साथ पागल क्यों हो जाता है? बार बार जेहन में यही सवाल कौंधता है।
कश्मीर के बारे में तो अब शायद कोई याद भी नहीं करता, जहां स्वतंत्रता मांगने के नाम पर आए दिन हत्याएं होती हैं। लंबे समय से वहां चल रहे आतंकी अपराध के बाद कश्मीरी पंडितों का वही हाल है, जो ८४ में दंगे से पीडित सिखों का है। अपने ही देश में निर्वासित जीवन जीने को विवश हैं कश्मीरी पंडित।राजनीति से जु़ड़े लोग इनकी लाशों पर राजनीति करते हैं। समझ में नहीं आता कि आखिर कब तक चलेंगे इस तरह के दंगे और प्रशासन इनका कब तक साथ देता रहेगा।
जब कभी भी प्रशासन चुस्त होता है, इस तरह की घटनाएं तत्काल रुक जाती हैं। कई ऐसे मामले उत्तर प्रदेश में हुए हैं। प्रशासन ने जब कर्फ्यू लगाया, लोग अपने घरों में दुबक गए। एकाध बाहर निकले दंगा करने तो उन्हें सेना ने गोली मार दी। और अगर इस तरह के ऐक्शन ज्यादा नहीं एक बड़े शहर में इक्के दुक्के होते हैं और पूरा शहर खामोश हो जाता है। लेकिन अगर आम आदमी की भावनाओं के साथ प्रशासन और नेता दंगाई हो जाते हैं, तभी लाशों की ढेर जमा होती है।
Wednesday, October 28, 2009
ये कैसे माओवादी हैं जो राजधानी एक्सप्रेस में रोटी और कंबल लूटते हैं
-वे ट्रेन को जलाना चाहते थे
-बाद में कुछ बच्चे और महिलाएं डर के मारे रोने लगे तो उन्होंने ट्रेन जलाने का विचार त्याग दिया
-उन्होंने पूरी ट्रेन में नारे लिखे और लिखा कि छत्रधर महतो संथालियों के मित्र हैं
-ट्रेन छोड़ने से पहले वे अपने साथ पेंट्री कार से खाना और कंबल लूट के ले गए
यह सब पढ़कर थोड़ा अफसोस हुआ। ब्लागों पर पढ़ते आ रहे थे कि ये बहुत धनी, अमीर लोग हैं। लेवी वसूलते हैं। करोडो़ की संपत्ति रखते हैं। ऐय्याशियां करते हैं। लेकिन खबरें कुछ ऐसी आईं कि दिल में दर्द हुआ। ये तो रोटी लूटते हैं। ओढ़ने के लिए कंबल लूटते हैं। यात्रियों और उनके सामान को सुरक्षित छोड़ देते हैं और अपनी बात कहकर जंगल में चले जाते हैं।
स्वतंत्रता के समय संथालों ने भी अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई थी। मैनै अयोध्या सिंह की अंग्रेजों के समय हुए आदिवासी विद्रोह पर लिखी गई किताब में यह सब पढ़ा। उनके पास गोला बारूद नहीं था। जान देकर अपने तीर धनुष से लड़े थे। स्वतंत्र भारत में भी वे वैसे ही हैं। रोटी लूटते हैं, तीर धनुष, फरसा लेकर क्रांति लाने और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश मात्र करते हैं। उनकी जिंदगी में आज भी सब कुछ वैसा ही है, जैसा १०० साल पहले था। उनकी जमीन अंग्रेजों और जमींदारों ने मिलकर छीनी। वहां से खनिजों का दोहन हुआ। आदिवासियों को जंगल में जाने के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया।
मजे की बात है कि अखबार भी उनकी दयनीय हालत के बारे में लिखते-लिखते थक गए। पढ़ने वाले भी थक गए। अखबारों ने लिखना बंद कर दिया.. और सरकार ने उनके बारे में सोचना। अब जब उन्होंने राजधानी एक्सप्रेस को कब्जे में लिया, तब जाकर खबर बने। लेकिन उनकी समस्या पर कुछ नहीं लिखा गया। क्या उन्हें स्वतंत्र भारत में रोटी और कंबल लूटते और पुलिस की गोलियां खाते ही जिंदगी काटनी है??
बुधवार की सुबह से ही खबरें आ रही हैं कि दिल्ली की केंद्र सरकार उच्च स्तरीय बैठक कर रही है। चिदंबरम साब पहले ही सेना और अर्धसैनिक बलों के माध्यम से लड़ाई लड़ने की तैयारी कर चुके हैं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि किस तरह से सरकार गरीबों पर गोलियां चलाकर गरीबी खत्म कर पाती है। और किस हद तक। सवाल यह भी है कि जिन आदिवासी इलाकों में आजतक सड़कें, रेल, पेयजल, स्वास्थ्य सुविधाएं, पुलिस व्यवस्था बहाल नहीं की जा सकी, वहां अब सरकार सेना को कैसे पहुंचाती है और इन इलाकों के लोगों के ऊपर गोलियां चलवाकर किस तरह से हिंसक आंदोलन को खत्म करती है।
Tuesday, October 20, 2009
काऊ बेल्ट वालों को आईआईटी में नहीं घुसने देना चाहते कपिल सिब्बल
अब उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड आदि राज्यों में अध्यापकों के नंबर देने का ट्रेंड देखिए। आज ही मेरे एक मित्र से मेरी बातचीत हो रही थी। उसके पिता अध्यापक हैं। उन्होंने बताया कि उसके भाई ने झारखंड बोर्ड से परीक्षा दी थी। सभी पेपरों की कापियां संबंधित विषयों के अध्यापकों ने लिखीं, लेकिन उसे ७९ प्रतिशत अंक मिले। (बात मैं नकल की नहीं कर रहा हूं, क्योंकि यह तो हर राज्य और हर बोर्ड में होता है, चाहे वह दिल्ली हो या हरियाणा। जहां भी निजी संस्थानों का बोलबाला है, १० कापियां अध्यापक लिखते हैं, जिससे स्कूल का नाम मेरिट सूची में चमक सके।) दरअसल इससे इन राज्यों में अध्यापकों के अंक देने की प्रवृत्ति का पता चलता है। वे पूर्णांक नहीं देते, इस आस में कि और बेहतर देने के लिए भी छात्र मिलेंगे। वहीं सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के छात्रों को खुले हाथ से नंबर बांटा जाता है। इसका उदाहरण भी मेरे पास है। मेरा एक सहपाठी हाई स्कूल में यूपी बोर्ड से फेल होने के बाद निजी स्कूल में सीबीएसई बोर्ड में एडमिशन लेने में सफल हो पाया, क्योंकि फेल होने में उसका इतना कम अंक था कि स्कूल ने दूसरी जगह एडमिशन कराने के लिए दबाव डाला। वहां से छात्र ७० प्रतिशत अंक लेकर पास होने में सफल हुआ।
कोचिंग रोकने का बेमानी तर्क
सिब्बल साहब का तर्क है कि इससे कोचिंग संस्थानों पर लगाम लगेगी। अरे जनाब, कोचिंग भी तो आईसीएसई और सीबीएसई वाले ही पढ़ पाते हैं? ग्रामीण इलाकों के छात्र तो पैसे और सुविधा के मामले में बेचारे साबित होते हैं। रहा सवाल आईआईटी कोचिंग का तो कोई भी छात्र केवल आईआईटी के लिए कोचिंग नहीं पढ़ता। उसके अलावा तमाम राज्य सरकारों के इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, जिसमें प्रवेश पाने की छात्रों की इच्छा होती है। अब अगर कोचिंग बंद ही करना है, तो क्या मानव संसाधन विभाग के अधिकार खत्म हो गए? वह ताकत के मामले में हिजडा़ हो गया है कि सीधे कोचिंग संस्थानों को बंद नहीं करा सकता?
Tuesday, October 13, 2009
आदमी की पूंछ और पूंछ हिलाने की आदत
हालांकि आदमी पूंछ का साथ छोड़ने को तैयार नहीं है। स्वाभाविक है कि पूंछ गायब होने में अगर सदियों लगे हैं तो उसकी पूंछ हिलाने की आदत इतनी जल्दी कैसे छूट जाएगी।
एक बार मेरे एक सहकर्मी ने सवाल किया कि इतनी तत्परता से काम करने के बावजूद मेरे काम पर सवाल क्यों उठाया जाता है? बार-बार ड्यूटी क्यों बदली जाती है? काम में बाधा डालने के लिए तरह-तरह के हथकंडे क्यों अपनाए जाते हैं?
हालांकि कोई भी पुराना आदमी (मेरा मतलब है लंबे समय से नौकरी कर रहे व्यक्ति से ) लक्षण सुनकर बीमारी पहले ही जान लेगा। उसे मैने समझाने की कोशिश की। देखिये- जो काम करता है उसी के काम पर सवाल उठता है। अगर काम न करिए तो कोई सवाल ही नहीं उठेगा। कभी कभी काम करिए तो सभी कहेंगे भी कि आपने काम किया। उसने फिर सवाल कर दिया कि काम नहीं करेंगे तो नौकरी कैसे बचेगी। उत्तर साफ था- पूंछ हिलानी शुरू करो बॉस, दूसरा और कौन सा रास्ता है।
लोग हमेशा ढोंग करते हैं कि हमें चमचागीरी पसंद नहीं है। खासकर उच्च पदों पर बैठे लोग। लेकिन आंकड़े और तथ्य स्पष्ट कर देते हैं कि भइये चमचागीरी तो सभी को पसंद है। अब अगर आपका कोई बॉस कोई खबर लिखता है और पूछता है कि कैसी है--- अगर आप उसकी आलोचना करने की कोशिश करते हैं और अपनी बुद्धिमत्ता दिखाते हैं तो गए काम से। तत्काल कह दीजिए कि बहुत बेहतरीन सर... इससे बेहतर तो कुछ हो ही नहीं सकता। अगर वह फिर सवाल उठाता है कि यह लाइनें या पैराग्राफ कुछ कमजोर लग रहे हैं... तपाक से बोलिए, हां सर यही तो मुझे भी खटक रहा था। और पूंछ हिलाने में दक्ष तो आप तब माने जाएंगे, जब बॉस किसी खबर का शीर्षक लगाए (यह कोई और काम भी हो सकता है) और आपकी तरफ मुंह करके हल्का सा मुस्कराए.. आप अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया देना न भूलें कि वाह सर... इससे बढ़िया शीर्षक तो कोई दे ही नहीं सकता, यहां तक तो किसी की सोच पहुंचती ही नहीं।
बहरहाल, मेरे उस मित्र ने सही फार्मूला अपनाया और पूंछ हिलाने की शुरुआत कर दी। अब पता नहीं वह संतुष्ट हुआ या नहीं लेकिन मुझसे बातचीत बंद है, बॉस से ही ज्यादा बात होती है इन दिनों उसकी।
Wednesday, October 7, 2009
क्या सरकारों में नक्सलवाद रोकने के लिए नैतिक बल है?
झारखंड के पुलिस निरीक्षक फ्रांसिस इंदुवर की माओवादिओं द्वारा हत्या कर दी गई। कोबड गांधी समेत तीन बड़े माओवादी नेता गिरफ्तार हुए। खबरें आईं कि माओवादिओं ने अपने तीन बड़े नेताओं को इंसपेक्टर के बदले छुड़ाने की मांग रखी थी। इसके पहले बिहार के खगडिया जिले में सामूहिक नरसंहार
तमाम तर्क दिए जाते हैं इस नक्सलवाद के लिए। लोगों को कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। लोकतांत्रिक देश है, राजतंत्र नहीं- जो विक्षुब्ध हैं वे चुनाव का सहारा लें बदलाव के लिए। विदेश से नक्सलवादियों को मदद मिल रही है। नक्सलवादी नेता पैसे वसूली के लिए गरीबों को बरगला रहे हैं आदि आदि....
सवाल यह है कि स्वतंत्रता के ५० साल बाद भी आदिवासी समस्या का समाधान क्यों नहीं निकला। उस पर भी तुर्रा ये कि उदारीकरण के बाद रोजगार का केंद्रीकरण दिल्ली, मुंबई, गुजरात के कुछ शहरों, बेंगलुरु आदि बड़े शहरों में केंद्रित कर दिया गया। युवक रोजगार के लिए भटक रहे हैं। आदिवासी इलाकों में महिलाओं का यौन शोषण, भूमिहीन विचरण और आर्थिक संसाधनों और कमाई के अभाव में भटकाव जारी है।
भूख से बिलबिला रहे आदिवासियों, कुछ अनुसूचित जातियों की जिंदगी में आखिर रखा क्या है खोने के लिए, जो हथियार उठा लेने से डरें। आदिवासी इलाकों में दूसरे इलाकों के तथाकथित सभ्य लोग मोटी कमाई कर रहे हैं, उन्हें कानून का पालन करने वाला कहा जाता है। जो एक रोटी के लिए मर रहा है, उसे कानून हाथ में लेने वाला। पुलिस गरीबों पर कहर ढाती है, नक्सलवादी कहकर उन्हें मारती है। पैसे वालों के लिए बने कानून के मुताबिक काम करती है। बंधुआ मजदूरी करीब खत्म हो गई है, लेकिन गरीब इलाकों से जो लोग बाल बच्चे सहित महज कुछ रुपयों के लिए महानगरों में मजदूरी करते हैं, बच्चे सड़कों पर खड़े होकर भीख मांगते हैं, उनके लिए क्या इंतजाम है? दिल्ली में ऐसा दृष्य आम है। मां बाप देवी देवताओं की खूबसूरत मूर्तियां बनाते हैं और सड़कों के किनारे पॉलिथीन डालकर रहते है और बच्चे भीख मांगते हैं।
शायद यही गरीब हैं, जो कुछ इलाकों में संगठित हो गए हैं और किन्हीं साधनों से उन्हें हथियार मिल गए हैं। वे अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।
ये लोग राजनीति में भी कुछ नहीं कर सकते। जिन लोगों ने भूख के चलते मौत से लड़ने की बजाय हथियार उठाकर लड़ना शुरू किया है, उनकी संख्या भी कम है और उनके पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि वे चुनाव में जीत हासिल कर सकें। चुनाव भी वही जीतते हैं, जो खानदानी हैं। स्वतंत्रता के पहले भी अमीर थे, अंग्रेजों की दलाली के माध्यम से। उनमें से कुछ ने स्वतंत्रता की लड़ाई भी लड़ ली। गरीब, पिछड़े वहीं के वहीं रह गए और उनके शोषण का दौर जारी रहा।
स्वाभाविक रूप से वर्तमान में न तो कांग्रेस के पास नक्सलवाद को रोकने का कोई विकल्प, विजन या नैतिक साहस है और न ही जाति और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली भाजपा के पास। सत्ताधारी लोग इन १० प्रतिशत गरीब आदिवासी और पिछड़े लोगों को गुलाम ही बनाए रखना चाहते हैं। हां अब ऐसा लगने लगा है कि उदारीकरण और पूंजीवाद के बाद इन १० प्रतिशत की संख्या और बढ़ जाएगी और अगर हथियार उठाने वाले लोगों की संख्या यूं ही बढ़ती गई तो सेना या पुलिस द्वारा इन्हें रोक पाना संभव नहीं होगा।
Thursday, October 1, 2009
जब कोई सोच और तैयारी ही नहीं तो भारत कैसे रखे दुनिया के सामने अपनी बात
वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव स्तर का एक ही अधिकारी वहां मौजूद था, जो इनपुट व
सुझाव देने के लिए एक कमरे से दूसरे कमरे का चक्कर लगा रहा था। पिट्सबर्ग
कॉन्फ्रेंस सेंटर में तब एक साथ कई बैठकें हो रही थी और यह अधिकारी अकेले ही हर जगह
इनपुट व सुझाव मुहैया करा रहा था।
भारत सरकार पिट्सबर्ग सम्मेलन से कई सबक ले सकती है। जी-20 समूह के नेताओं की बैठक पिछले हफ्ते समाप्त हुई और भारत को इस बात का अहसास हो गया कि वैश्विक परिदृश्य में उसे और बडी भूमिका निभानी होगी।
जिस तरह से जी-20 द्वारा नीतिगत प्रारूप तैयार किया जाना है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि वैश्विक आर्थिक मुद्दों की बाबत अब जी-20 प्रमुख निकाय बन चुका है। एक और सबक है जिसे भारत ने पिट्सबर्ग बैठक से अवश्य सीखा होगा।
वह यह कि जब वैश्विक संस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की बात आती है तब किस तरह से सूचना के प्रसार की बाबत भारत सरकार के पास लोगों और विचार दोनों की कमी देखी गई। लोगों की कमी तब और स्पष्ट हो गई जब जी-20 में पहुंचे चीनी प्रतिनिधिमंडल या फिर दक्षिण कोरिया के प्रतिनिधिमंडल से इसकी तुलना की गई।
वित्त मंत्रालय के संयुक्त सचिव स्तर का एक ही अधिकारी वहां मौजूद था, जो इनपुट व सुझाव देने के लिए एक कमरे से दूसरे कमरे का चक्कर लगा रहा था। पिट्सबर्ग कॉन्फ्रेंस सेंटर में तब एक साथ कई बैठकें हो रही थी और यह अधिकारी अकेले ही हर जगह इनपुट व सुझाव मुहैया करा रहा था। इसकी तुलना हम चीनियों से करते हैं कि उन्होंने क्या किया।
उन्होंने कई वरिष्ठ अधिकारियों को अलग-अलग बैठक का कार्यभार सौंपा था। एक ने जी-20 की बैठक के साथ-साथ सदस्य देशों की सरकारों के विशेष दूतों के साथ बैठक की जबकि दूसरे को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) व विश्व बैंक के साथ बैठक की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। ये दोनों संगठन भी पिट्सबर्ग में उस समय शुरुआती बैठक आयोजित किए हुए थे।
चीन ने स्पष्ट तौर पर अहसास कर लिया था कि वैश्विक बैठक में संपर्क के दौरान वे निश्चित रूप से अधिकारियों की मजबूत टीम को काम पर लगाएंगे। ऐसे में उन्होंने विशेषज्ञ अधिकारियों की टीम तैयार की और उन्हें अलग-अलग जिम्मेदारी सौंपी गई, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि चीनी राजनेताओं को जी-20 फोरम में पर्याप्त इनपुट मिल जाए।
भारत में वित्त मंत्रालय की इंटरनैशनल कोऑपरेटिव डिवीजन मुख्य रूप से विश्व बैंक व आईएमएफ की गतिविधियों में शामिल रही थी। विश्व बैंक व आईएमएफ के साथ काम कर रही वही टीम अब जी-20 के साथ भारत की तरफ से संपर्क अभियान में जुटी रही। साफ तौर पर वित्त मंत्रालय में अलग-अलग टीम बनाए जाने की दरकार है जो विश्व बैंक, आईएमएफ व जी-20 के साथ भारत के संबंधों का नियंत्रण व प्रबंधन कर सके।
वास्तव में, अब वित्त मंत्रालय व विदेश मंत्रालय के बीच विस्तृत स्तर पर सहयोग व समन्वय की दरकार है। 1990 में शुरू हुए आर्थिक सुधार के शुरुआती दिनों में विदेश मंत्रालय का नामकरण आर्थिक मंत्रालय करने का प्रस्ताव था। यह कोशिश वैसे देश में आर्थिक कूटनीति के महत्त्व की बाबत थी जिसका विकास तेजी से हो रहा था और इस तरह से विश्व की अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका निभा सके।
यह विचार उस समय शायद परिपक्व नहीं था। लेकिन जी-20 का सदस्य होने के नाते अब समय आ गया है कि भारत सरकार या तो वित्त मंत्रालय के इंटरनैशनल कोऑपरेशन डिवीजन का विस्तार करे या विदेश मंत्रालय में मौजूद अधिकारियों का इस्तेमाल करते हुए आर्थिक सहयोग के लिए अलग से डिवीजन बनाए।
विचारों की किल्लत उस समय स्पष्ट हो गई जिस तरह से पिट्सबर्ग में भारत सरकार ने जी-20 के अन्य नेताओं के साथ बातचीत में सूचनाओं का प्रसार किया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिट्सबर्ग गए थे और उनके साथ मीडिया प्रतिनिधियों का दल भी गया था। उनके हिसाब से जी-20 के नेताओं के साथ उनकी बैठक सकारात्मक रही।
बैठक की समाप्ति पर प्रधानमंत्री के संवाददाता सम्मेलन के अलावा भारत सरकार ने इस बाबत एक भी संवाददाता सम्मेलन आयोजित नहीं किया कि पिट्सबर्ग में बहस के लिए आए आर्थिक मुद्दों से भारत ने किस तरह अपना रुख स्पष्ट किया।
हां, भारतीय सुरक्षा सलाहकार ने संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया था। दूसरा सम्मेलनक्या प्रधानमंत्री की टीम ने उनका और पिट्सबर्ग में मौजूद मीडिया प्रतिनिधिमंडल का पूरा इस्तेमाल किया? सच्चाई यह है कि उनमें से कोई भी प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए नहीं आए। सभी महत्त्वपूर्ण सदस्य देशों ने अपने मीडिया प्रतिनिधिमंडल को बताया कि उनके नेताओं ने जी-20 की बहस में किस तरह से महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन भारत की तरफ से लोगों की कमी और विचारों का अभाव नजर आया, जिसे कि प्रसारित किया जा सके।
प्रधानमंत्री केविशेष दूत ने जलवायु परिवर्तन पर आयोजित किया था। लेकिन क्या जी-20
सुरक्षा या जलवायु परिवर्तन केसंबंध में था? या फिर यह वैश्विक आर्थिक मुद्दों की
बाबत था? प्रधानमंत्री की टीम में योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया,
वित्त सचिव अशोक चावला जैसे लोग थे।
http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=24738
Sunday, September 27, 2009
सुखी दांपत्य जीवन की बचत योजना
मनीष कुमार मिश्र
प्रत्येक व्यक्ति इस बात से सहमत होगा कि विवाह के बाद चाहे स्त्री हो या पुरुष दोनों के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन आते हैं। यह परिवर्तन आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक होते हैं।
विवाह के बाद स्त्री-पुरुष परस्पर एक दूसरे के सुखों और खुशियों की जिमेदारी उठाते हैं और उनकी पूरी कोशिश होती है कि इसमें कोई कमी न रह जाए। हम केवल इसके आर्थिक पक्ष की बात करेंगे। सफल विवाह का एक महत्वपूर्ण तत्व, मिल-जुलकर धन का प्रबंधन करना है।
यह मायने नहीं रखता कि आप उम्र के किस पड़ाव में हैं। कोई भी महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णय अगर आपस में बातचीत करने के बाद लें तो जीवन सुखमय रहेगा और एक दूसरे के प्रति प्यार और आदर का भाव भी जीवंत बना रहेगा।
विवाह से पहले यदि आप अपने माता-पिता के साथ रहते थे तो आपको केवल फोन के बिल और अपने खर्चों की व्यवस्था करनी पड़ती रही होगी। अब आपके ऊपर ही परिवार की पूरी जिम्मेदारी है।
छुट्टियां मनाने जाना चाहते हैं? उससे पहले आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि क्या आपके बैंक के जमा खाते में इसके लिए पर्याप्त पैसे हैं। विवाह के बाद वित्तीय जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं और ऐसी परिस्थिति में पैसे बचाना उतना आसान नहीं होता है। न ही यह स्वयमेव शुरु होने वाली चीज है। इसके लिए आपको दृढ़ निश्चय करने की जरूरत है। अगर आप शुरु से ही बचत-प्रेमी हैं तो शादी के बाद भी नियमित बचत के अनुशासन को मत छोड़ें। इसकी एक युक्ति है। आप खुद को थोड़ा अधिक व्यवस्थित करते हुए वास्तविक वित्तीय योजना बनाने की शुरूआत करें।
जहां पहले आपकी बचत का लक्ष्य केवल बचत और निवेश करना था, वहीं अब परिवार के भविष्य को देखते हुए वित्तीय योजना बनाने का समय है। इसलिए पति-पत्नी दोनों को मिलकर निवेश की योजना बनानी चाहिए। योजना ऐसी हो जिससे दोनों को ही फायदा भी हो और राहत भी मिले।
कैसी हो वित्तीय योजना
सर्वप्रथम आपको यह देखने की जरूरत है कि आपका पर्याप्त बीमा है या नहीं, खासतौर पर तब जब आपकी पत्नी (या पति) आप पर आर्थिक रूप से निर्भर है। पति या पत्नी के नौकरीपेशा होने के बावजूद यह न भूलें की आपकी कमाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा घरेलू खर्चों और ऋण की अदाएगी के लिए है।
आपको यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि आपने पर्याप्त बीमा लिया हुआ है, ताकि आपके साथ किसी प्रकार का हादसा (मृत्यु) हो जाने की दशा में आपके पति या पत्नी को आर्थिक कष्ट न झेलना पड़े और घर के मासिक खर्च के अलावा अन्य आर्थिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में भी उसे कोई बाधा न आए। इसके लिए आप समय-समय पर अपने बीमा की जरूरतों का पुनर्आंकलन भी करते रहें।
उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि आपका जीवन बीमा 10 लाख रुपये का है और आपकी पत्नी भी नौकरी करती हैं। जब आप पिता बनते हैं तो कुछ वर्षों के लिए उन्हें ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ेगी। अब घर के कमाऊ सदस्य केवल आप हैं।
मां और बच्चा दोनों की जिम्मेदारी आपके ऊपर है। ऐसे में आपको अपनी बीमा जरूरतों का फिर से आकलन करने की जरूरत है। अपने बचत करने के लक्ष्यों की एक सूची बनाएं और प्रत्येक लक्ष्य के लिए एक समय-सीमा का निर्धारण करें। इससे आपको अपने निवेश को सार्थक तरीके से आवंटित करने में मदद मिलेगी। यह मत भूलिए कि इन सबमें आपके परिवार की भलाई छिपी है।
लक्ष्य का निर्धारण जरूरी
मान लीजिए कि खास समय सीमा में आपने अपने लिए तीन लक्ष्य निर्धारित किए हैं-
आप कुछ महीनों के अंदर अपना घर खरीदना चाहते हैं जिसके लिए डाउन पेमेंट की व्यवस्था करनी है। यह आपकी तात्कालिक जरूरत है जिसकी पूर्ति आप अपने बचत खाते में जमा की गई राशि से या नकदी-कोष से कर सकते हैं।
आपकी इच्छा है कि आप जीवन-साथी के संग छुट्टियां मनाने जाएं - इसके लिए की जाने वाली बचत को अल्पावधि के ऋण फंड में डाल देना चाहिए। अगर आप दो-तीन वर्षों में छुट्टियां मनाने जाना चाहते हैं तो बैंक की सावधि जमा या इनकम फंड में पैसे डाल सकते हैं।
रिटायरमेंट फंड - रिटायरमेंट के लिए धन-कोष इकट्ठा करने के लिए सबसे बढ़िया विकल्प है इक्विटी में निवेश, अगर आप 20 या 30 के दशक में हैं।
आपके पोर्टफोलियो में ऋण और इक्विटी संतुलित रूप में होने चाहिए। अगर आपका लक्ष्य 7 वर्ष या उससे अधिक समय सीमा का है तो इक्विटी में निवेश करना ज्यादा तर्कसंगत है। लेकिन पोर्टफोलियो को संतुलित रखने के लिए ऋण का एक छोटा हिस्सा भी होना आवश्यक है।
अगर आप विशुद्ध ऋण फंड में निवेश नहीं करना चाहते हैं तो 10-15 प्रतिशत निवेश की जाने वाली राशि का आवंटन बैलेंस्ड फंड में कर सकते है। आपको ऋण इक्विटी संतुलन पर तब ज्यादा गौर फरमाने की जरूरत है जब आपने पब्लिक प्रोविडेंट फंड, कर्मचारी भविष्य निधि, राष्ट्रीय बचत प्रमाण-पत्र या किसान विकास पत्र में निवेश पहले से किया हुआ है।
विवाह के बाद जिम्मेदारियां तो बढ़ती ही हैं साथ ही भविष्य के बारे में भी सोचना होता है। बचत अचानक नहीं शुरू हो सकती, इसके लिए दृढ़प्रतिज्ञ होना जरूरी है।
Wednesday, September 23, 2009
समाजवाद से आएगी समानता
यह किताब उस दौर के विभिन्न पहलुओं की मार्क्सवादी सोच को दिखाती है, जब भारतीय जनता पार्टी का शासन था।
गुजरात से लाल कृष्ण आडवाणी की शुरू हुई रथयात्रा और उसके बाद हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद भाजपा के उभार और केंद्रीय सत्ता में पहुंच जाने के बाद संसद से लेकर सड़क तक जो बदलाव हुए, उसका क्रमवार विवरण और जनमानस द्वारा भाजपा को नकारे जाने तक के मार्क्सवादी नजरिए को पुस्तक में पेश किया गया है।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पोलित ब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी ने इस दौरान विभिन्न लेखों से अपनी पार्टी की विचारधारा और पूंजीवादी मुहिम के खिलाफ विभिन्न लेखों में अपने विचार लिखे, उन्हीं लेखों को 22 अध्याय में प्रकाशित कर पुस्तक का रूप दिया गया है।
पुस्तक की शुरुआत भारतीय गणतंत्र : चुनौतियां और समाधान नामक अध्याय से शुरू होता है, जो इस पुस्तक का नाम भी है। लेखक के विचार से भारतीय गणतंत्र की 53वीं सालगिरह के अवसर पर राष्ट्रपति के अभिभाषण में शहरी सुविधाओं को ग्रामीण भारत तक पहुंचाने के विजन 2020 को पेश करना एक ऊंचे मंसूबे की घोषणा मात्र है।
तीव्र विकास के हसीन सपने दिखाए जा रहे हैं और जनता की शिक्षा स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारियों से शासन हाथ खींच रहा है। लेखक ने जनता से इन नीतियों के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया है।
इसके बाद के 13 अध्यायों में केंद्र में उस दौरान सत्तासीन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के चाल-चरित्र के बारे में चर्चा की गई है कि किस तरह से सरकार ने गुजरात में हुए दंगों के बाद नरेंद्र मोदी सरकार का साथ दिया और देश को दो धार्मिक ध्रुवों में बांट देने की कोशिश की।
गोलवरकर की पुस्तक 'मिलिटेंट हिंदुइज्म इन इंडिया- ए स्टडी आफ द आरएसएस' का जिक्र करते हुए लेखक ने यह समझाने की कोशिश की है कि किस तरह से केंद्र की राजग सरकार फासीवादी तरीके से सरकार चलाने और जनता के बुनियादी अधिकारों को छीनने की कोशिश कर रही थी।
पुस्तक में विनिवेश के माध्यम से सरकारी उपक्रमों का निजीकरण किए जाने का पुरजोर विरोध किया गया है। तत्कालीन रक्षामंत्री और राजग संयोजक जॉर्ज फर्नांडिस तथा आरएसएस और स्वदेशी जागरण मंच के विनिवेश के विरोध को लेखक ने नौटंकी करार देते हुए कहा है कि सत्ता में बैठे लोग फासीवादी तरकश का ही तीर छोड़ रहे हैं, जिससे विनिवेश से उपजे जनता के विरोध को कम किया जा सके।
पुस्तक के कुछ अध्यायों में स्पष्ट रूप से मार्क्सवादी विचारधारा को सरल शब्दों में समझाने की भी कोशिश की गई है कि किस तरह से पूंजीवादी व्यवस्था शोषण में जुटी है और उसका एक मात्र समाधान मजदूरों की एकता और पूंजीवाद का विरोध है। पुस्तक के आखिरी 6 अध्यायों में कम्युनिज्म के वैश्विक विरोध और पूंजीवाद को स्थापित करने की चर्चा की गई है।
साथ ही भारत में विभिन्न अखबारों द्वारा पूंजीवाद के समर्थन में लिखे गए लेखों की चर्चा है। अपनी पार्टी की विचारधारा के अनुरूप लेखक ने अमेरिकी प्रभुत्ववादी साजिशों का जिक्र किया है, जिसमें आतंकवाद के नाम पर सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों में आंतरिक हस्तक्षेप किया गया।
साथ ही पूंजीवाद के बेहतर होने और कम्युनिज्म के खत्म होने के प्रचार को झूठा साबित करने की कोशिशों के विरुध्द दलील दी गई है। 'क्रांतिकारी संभावना को उन्मुक्त करो' शीर्षक से प्रकाशित अध्याय में लेखक ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखा है, 'पूंजीवादी वैश्वीकरण के दौर में असमानता और बढ़ गई है।
अमेरिकी प्रभुत्ववादी साजिशों की काट के बारे में लिखते हुए येचुरी ने यह बताने की कोशिश की है कि आतंकवाद पूरी तरह से पूंजीवाद से जुड़ा हुआ मामला है। उनका कहना है कि समाजवादी आंदोलन के खिलाफ अमेरिका ने तमाम देशों में गुट खड़े किए जो सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका के लिए ही सिरदर्द बने।
'द्विध्रुवीय शीतयुध्द के बाद अंतरराष्ट्रीय स्थिति के विकास में स्वाभाविक प्रक्रिया यह होती कि यह स्थिति बहुधु्रवीयता की ओर बढ़ती। अमेरिका ने इस स्वाभाविक प्रक्रिया को पलट दिया ताकि अपने प्रभुत्व के तहत एकध्रुवीय व्यवस्था कायम की जा सके।'
लेखक का मानना है कि ऐसी स्थिति में अमेरिका सिर्फ विश्व दारोगा की ही तरह काम नहीं करना चाहता है, बल्कि साथ साथ वह न्यायाधीश की भी भूमिका निभाना चाहता है। इसका एकमात्र समाधान समाजवाद बताया गया है, जिससे समाज में गरीबी और असमानता दूर होगी और कोई भी हथियार उठाने को विवश नहीं होगा।
विकासशील देशों में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या बढ़कर 1.1 अरब हो गई है.... दुनिया के 50 बड़े अरबपतियों की दौलत मिलकर सहारा और अफ्रीकी देशों के सकल घरेलू उत्पाद के बराबर हो गई है, जहां 68 करोड़ 80 लाख जनता जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रही है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक हर साल भूख से 3 करोड़ 60 लाख से ज्यादा लोग मर जाते हैं।'
पुस्तक में ऐतिहासिक तथ्यों का भी जिक्र किया गया है कि द्वितीय विश्वयुध्द के दौरान किस तरह से फासीवाद के खिलाफ एकजुट होने में पूंजीवादी देशों ने हीला-हवाली की। मानव अधिकारों को बचाने के लिए सोवियत संघ ने कुर्बानियां दी।
बहरहाल, इस पुस्तक में पूंजीवादी व्यवस्था में बेरोजगारों की बढ़ती फौज, अस्थायी नौकरियां, आउटसोर्सिंग के माध्यम से पूंजीवाद को बढ़ावा देने का जिक्र तो है, लेकिन इसका स्पष्ट जवाब नहीं मिलता कि समाधान क्या है। 'भारतीय गणतंत्र : चुनौतियां और समाधान' पुस्तक का शीर्षक तो है, लेकिन इसमें चुनौतियों पर ही ज्यादा बल है, समाधान की राहें स्पष्ट नहीं हैं- खासकर भारत के परिप्रेक्ष्य में।
पुस्तक समीक्षा
भारतीय गणतंत्र चुनौतियां और समाधान
लेखन: सीताराम येचुरी
प्रकाशक: सामयिक प्रकाशन
कीमत: 200 रुपये
पृष्ठ: 159
Monday, September 14, 2009
ब्लॉग वार्ता : कोसी खा गई मुरलीगंज

200 साल पुराना है मधेपुरा का मुरलीगंज बाजार। बाढ़ के कारण बड़ी संख्या में व्यापारी इलाके को छोड़ कर चले गए हैं। मुरलीगंज के काशीपुर रोड से करोड़ों रुपये का माल कोलकाता जाता था। कोसी की तबाही की कहानी फिर से इस ब्लॉग पर पसर रही है। क्लिक कीजिए http:// satyendrapratap. blogspot. com
सत्येंद्र प्रताप लिखते हैं कि ट्रक, ट्रैक्टर और बैलगाड़ियों से जाम रहने वाला काशीपुर रोड बाढ़ के एक साल बाद भी अपनी रौनक नहीं पा सकी है। वार्ड नंबर सात के किराना व्यापारी शिव कुमार भगत अपनी बर्बादी की कहानी कहना चाहते हैं।
लेकिन अब कौन सुनता है। कोसी से विस्थापित लाखों लोगों की कहानियां उनके निजी क्षणों में दफन कर दी गई हैं। सरकार के कुछेक प्रयासों की कामयाबी के बाद भी ऐसी कहानियों के लिए जगह नहीं बन पाई। नीतीश कुमार ने अपने राहत के प्रयासों से लोगों का विश्वास भले ही जीत लिया हो, लेकिन एक साल बाद भी लोगों के जहन में कोसी का पानी हिलोर मारता होगा। शायद त्रासदी की उन्हीं लहरों को पकड़ कर कथाओं में बदलने की कोशिश कर रहे हैं सत्येंद्र प्रताप।
ब्लॉग बेहतर जगह है ऐसी कहानियों को दर्ज करने के लिए। मधेपुरा से बीरपुर पहुंचते हैं तो पता चलता है कि जिन किसानों ने बैंक से कैश क्रेडिट अकाउंट लोन लिया था, उनका इस आधार पर बीमा ही नहीं हुआ। बीरपुर बाजार के 100 व्यापारी इस संकट से परेशान हैं। नियम है कि जब बैंक से लोन लेंगे तो बदले में बीमा मिलेगा। जब जयसवाल इंटरप्राइजेज के संतोष जायसवाल ने पिछले चार साल से बैंक उनकी दुकान का बीमा करा रहा था लेकिन जिस साल बाढ़ आई बीमा नहीं कराया। उस साल का नुकसान हो गया। गनीमत है कि बैंक ने इस साल का बीमा करा दिया है।
जाहिर है राज्य सरकार को अपनी नीतिगत कामयाबी के बाद व्यक्तिगत समस्याओं की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। मुझे भी बीरपुर से फोन आते हैं कि डाक बाबू अकाउंट खोलने के पैसे मांगता है। एक डाकबाबू की इतनी हिम्मत और लोग कैसे सह लेते हैं, समझ में नहीं आता। सरकारी कर्मचारियों के साथ अपने दैनिक झंझटों को भी हर दिन मुद्दा बनाना चाहिए। ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों की कीमत मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति ही चुकाता है। लिहाजा उसे ऐसे अधिकारियों को तुरंत चलता कर देने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए।
बिहार की जनता ने यह तो बताया ही है कि भ्रष्ट रहते हुए लंबे राजनीतिक भविष्य की कामना न करें। पहली बार हो रहा है कि बिहार की नीतियों की नकल केंद्र सरकार कर रही है। अब इन नीतियों को लागू करने में भी लोगों और अफसरों को पहल करनी चाहिए। सत्येंद्र प्रताप के अलावा भी कई ब्लॉगर कोसी की कहानी लिख रहे हैं। बता रहे हैं कि राहत कार्य लूट-पाट से मुक्त नहीं है। अगर ऐसा होता तो फिर इन इलाकों में सत्तारूढ़ दल को बढ़त कैसे मिलती। जाहिर है कुछ अफसर और कर्मचारी इस तरह की हरकत कर रहे हैं।
कोसी से उजड़ें लोगों का वृतांत आगे बढ़ रहा है। बीरपुर बाजार के वीरेंद्र कुमार मिश्रा की कहानी। घड़ी की पूरी दुकान नष्ट हो गई है। टाइटन कंपनी से तीन लाख का लोन लेकर काम चला रहे हैं। अभी तक उनकी दो कारें मिट्टी में धंसी हैं। दुकान का बीमा नहीं हो सका तो पैसा मिला ही नहीं। पढ़ कर बीमा के मामले में घपला लगता है।
उनकी भी कहानी है जिन्हें सरकारी राहत से फायदा हुआ है। बलुआ बाजार के दिल्ली चौक से 15 किमी दूर एक गांव में पवन पासवान को चार हजार नगद और एक क्िवंटल अनाज मिला है। गांव में कई लोगों को मिला है। जोगी पासवान कहते हैं कि सब कुछ उजड़ जाने के बाद भी लोग गांव छोड़ कर नहीं गए। कहते हैं कि इससे पहले सरकारी मदद नहीं मिलती थी इसलिए लोग बाढ़ के बाद दूसरे शहरों में चले जाते थे। जोगी पासवान को शिकायत है तो स्थानीय जनप्रतिनिधि से। जिसने जोगी पासवान को पशु मुआवजा नहीं मिलने दिया।
सहरसा के शिवशंकर झा की कहानी डराती है। कहते हैं कि पिछली पंद्रह साल से बाढ़ की आशंका से रात की नींद टूट जाती है। इस डर के कारण शिवशंकर झा रोज तटबंध की तरफ घूमने निकलते हैं। वो खुद चेक करना चाहते हैं कि आज कोई दरार तो नहीं आई। शिवशंकर झा का डर बताता है कि सरकारों को और जागना होगा। बाढ़ का कोई हल निकालना होगा। सबकुछ केंद्र पर मढ़े जाने वाले आरोपों के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता। बांध समाधान नहीं है। कोसी ने साबित किया है। इलाके को फिर से बसाना होगा।
साभार- http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/57-62-70205.html
Tuesday, September 1, 2009
जिन्ना और बंटवारे के गुनहगार
यह किताब लेखक के उस सफर का नतीजा है, जो उन्होंने भारत के बंटवारे को समझने के लिए अतीत के गलियारों में की थी। उन्होंने देखा कि जिन्ना किस तरह 'हिंदू-मुस्लिम एकता के हरकारे से 'पाकिस्तान के कायदे-आजम बन गए। लेखक को लगा कि महज सपाटबयानी के साथ तथ्यों को कागज पर उतारना ठीक नहीं, इसलिए उनके जज्बात से लबरेज है यह किताब।
समीक्षाकार भारतीय विदेश सेवा के पूर्व सदस्य हैं और फिलहाल नई दिल्ली के जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय के एकेडमी ऑफ थर्ड वल्र्ड स्टडीज में अतिथि प्रोफेसर हैं।)
पुस्तक : जिन्ना इंडिया-पार्टिशन-इंडिपेंडेंस
लेखक : जसवंत सिंह
प्रकाशक : रूपा ऐंड कंपनी
पृष्ठï : 669
मूल्य : 695 रुपये
Friday, August 28, 2009
डूब गया कारोबार, नहीं कोई पुरसाहाल
बिहार में मधेपुरा जिले का मुरलीगंज बाजार कोसी क्षेत्र का ऐसा बाजार है जहां कोलकाता, दिल्ली सहित अन्य शहरों से सीधे कारोबार होता है। बाढ़ के बाद यहां सन्नाटे जैसा है।
कारोबारियों के चेहरे पर बाढ़ का दर्द साफ पढ़ा जा सकता है। वहीं जूट मंडी के 85 फीसदी कारोबारी, इलाका छोड़कर चले गए हैं। बचे कारोबारियों को भी पूछने वाला यहां कोई नहीं है।
मुरलीगंज बाजार में 22 अगस्त 2008 की रात को पानी घुसा। तबाही का मंजर ऐसा था कि मुख्यमंत्री ने अखबारों के माध्यम से अपील की कि सभी लोग इलाका खाली कर दें और संपत्ति का मोह छोड़कर इलाका खाली कर अपनी जान बचाएं। इस कवायद के तहत यहां का बाजार पूरी तरह से खाली करा लिया गया था।
मुरलीगंज बाजार में कुल 1,734 कारोबारी हैं। वहीं करीब 100 कारोबारियों की पूंजी एक करोड़ रुपये से ज्यादा की है। आकलन के मुताबिक इस बाजार में बाढ़ से कुल 19,96,79,587 रुपये का नुकसान हुआ है। यहां रोजाना औसतन 50 करोड़ रुपये का कारोबार होता था।
मुरलीगंज के काशीपुर रोड की ही मिसाल लें तो यहां से रोजाना 2 से 3 करोड़ रुपये का जूट कोलकाता भेजा था। बाद में किसानों की जूट की खेती चौपट हो गई और बाजार भी उजड़ गया। ट्रक, ट्रैक्टर और बैलगाड़ियों से जाम रहने वाली काशीपुर रोड की रोनक ही सूनी पड़ गई।
मुरलीगंज वार्ड नंबर-7 के किराना कारोबारी शिव कुमार भगत ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया,'इस बाजार से गेहूं, मूंग, मक्का, गुलाब बाग मंडी भेजा जाता है, जहां से माल दिल्ली, कोलकाता, कटक और बांग्लादेश सीमा तक भेजा जाता है। कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रियरंजन दासमुंशी के इलाके-कलियागंज में माल यहीं से जाता है।'
भगत ने कहा कि उन्हें तो दोहरी मार झेलनी पड़ी। पहले नेपाल के माओवादियों के डर से नेपाल से कारोबार छोड़कर भागना पड़ा, रिश्तेदारों की कोशिश से मुरलीगंज में कारोबार शुरू किया, उसे भी बाढ़ खा गई।
मुरलीगंज बाजार 200 साल पुराना है। स्थानीय कारोबारियों का कहना है बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बाजार पिछड़ता गया और बदहाल कानून व्यवस्था ने भी इसे प्रभावित किया। 3 साल से स्थिति में सुधार हो रहा था, लेकिन बाढ़ ने सब पर पानी फेर डाला।
कितना नुकसान हुआ मुरलीगंज में-
कारोबारियों की संख्या 1,734
क्षति राशि 19,96,79,587 रुपये
कर्ज़
कैश क्रेडिट अकाउंट 42,03,6,000 रुपये
प्रधानमंत्री रोज़गार योजना 1,16,84,400 रुपये
अन्य स्रोतों से 2,99,60,283 रुपये
मासिक आय 78,28,833 रुपये
बीमा राशि 5,34,49,000 रुपये
दावा राशि 4,46,19,449 रुपए
http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=22108
Thursday, August 27, 2009
डूबते को नहीं बैंक का सहारा
"बाढ़ में 2,75,000 रुपये का माल डूब गया। 9 बीघा खेत बालू से भरा पड़ा है। बाढ़ में 4 गायें भी डूबकर मर गई। उम्मीद थी कि बीमा राशि से दुकान चल जाएगी, लेकिन बैंक से जानकारी मिली की वर्ष 2008-09 के दौरान बीमा ही नहीं कराया गया है।''
बिहार के सुपौल जिले के बीरपुर बाजार के कारोबारी इस समय अजब संकट में हैं। यहां करीब 100 कारोबारी हैं जो अपनी दुकाने चलाते हैं और इन्होंने भारतीय स्टेट बैंक से कैश क्रेडिट अकाउंट लोन ले रखा है। बैंक हर साल इस कर्ज के आधार पर बीमा करता था, लेकिन वर्ष 2008 में बैंक ने इन बीमा कारोबारियों का बीमा ही नहीं कराया।
बीरपुर बाजार में जायसवाल इंटरप्राइजेज नाम से दुकान चलाने वाले संतोष जायसवाल ने बताया कि 'सीसी अकाउंट से 1 लाख रुपये का कर्ज लिया था। पिछले 4 साल से बैंक हमारी दुकान का बीमा करता था लेकिन वर्ष 2008-09 के दौरान इसने बीमा नहीं कराया। हालांकि बैंक ने इस साल फिर करा दिया है।
बाढ़ में 2,75,000 रुपये का माल डूब गया। 9 बीघा खेत बालू से भरा पड़ा है। बाढ़ में 4 गायें भी डूबकर मर गई। उम्मीद थी कि बीमा राशि से दुकान चल जाएगी, लेकिन बैंक से जानकारी मिली की वर्ष 2008-09 के दौरान बीमा ही नहीं कराया गया है।'
यही स्थिति बाजार के हर कारोबारी की है। 25 कारोबारियों ने अपने कैश क्रेडिट अकाउंट नंबरों के साथ बैंक को आवेदन भी किया लेकिन बैंक से एक ही जवाब मिलता है कि बड़े अधिकारियों को इसके बारे में सूचित कर दिया गया है।
जय स्पेयर केंद्र के संजय कुमार घोष ने कहा कि उन्होंने बैंक से 4 लाख रुपये का कर्ज लिया था। बीमा न होने की क्षतिपूर्ति नहीं मिली और अब उधारी पर काम चल रहा है। बाजार में टाइम सेंटर के नाम से घड़ी की दुकान चलाने वाले वीरेंद्र कुमार मिश्र की तो पूरी दुकान ही नष्ट हो गई है।
टाइटन कंपनी से 3 लाख रुपये का क्रेडिट पर माल लेकर दुकान चला रहे हैं। पुरानी दुकान के किनारे ही उनकी 2 कारें अभी तक मिट्टी में धंसी है, लेकिन दुकान का बीमा ही नहीं हुआ था तो पैसा कैसे मिले।
वीरेंद्र कुमार मिश्र ने कहा कि उनकी दुकान का बीमा फरवरी 09 में करा दिया है, लेकिन बीमा उस दुकान का है जो नष्ट हो चुकी है। मिश्र को डर है कि अगर नई दुकान में कोई हादसा हो जाए तो बीमा कंपनी पैसा नहीं देगी। यही हाल यहां के 25 बीमित कारोबारियों का है।
स्थानीय कारोबारियों ने बताया कि 20 कारोबारी तो ऐसे हैं जिनका सब कुछ खत्म हो गया है और वे अब भी इधर-उधर रिश्तेदारों के यहां दिन काटने को मजबूर हैं। इस सिलसिले में पूछे जाने पर भारतीय स्टेट बैंक के बीरपुर शाखा के प्रबंधक मनोज कुमार मिश्र ने कहा, 'बीमा न होने के बारे में कंट्रोलर को सूचित कर दिया गया है और इस मामले की जांच चल रही है।'
हालांकि उन्होंने इस बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया कि इसका कोई समाधान निकल पाएगा या नहीं।
http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=22206