Sunday, January 11, 2009

आभूषणों से बेहतर गोल्ड ईटीएफ




"- गोल्ड ईटीएफ में निवेश कर होती है सोने की अभौतिक खरीदारी, भौतिक सोने में निवेश से जुड़ा जोखिम नहीं"

मनीश कुमार मिश्र


शेयर बाजार की स्थिति फिलहाल भ्रमित करने वाली है। बाजार की दिशा के सेदर्भ में अनुमान लगाना मुश्किल है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समय इक्विटी फंडों में निवेश के लिए पूरी तरह उपयुक्त है।

लेकिन, पोर्टफोलियो के विशाखण और संतुलन के लिए सोने को सम्मिलित करने की सलाह भी देते हैं। सोने की कीमत साल की दूसरी छमाही में पहली छमाही की तुलना में अधिक होती है क्योंकि यह मौसम शादी-विवाह का होता है। इसे देखते हुए क्या धातु में निवेश करना का यह उपयुक्त समय है? पार्क फाइनैंशियल एडवाइजर के अखिलेश तिलोतिया कहते हैं,'पोर्टफोलियो बनाते समय सोने को निश्चित तौर पर शामिल करना चाहिए।

अगर, 50-60 फीसदी इक्विटी फंडों में निवेश करते हैं तो 10 से 15 प्रतिशत निवेश सोने में भी किया जाना चाहिए। वैसे भी सोना निवेश का सबसे सुरक्षित विकल्प है।' तो क्या निवेश या फिर पोर्टफोलियो के विविधीकरण के लिए आपको नजदीक के आभूषण विक्रेता के पास जाकर सोने के आभूषण खरीदने चाहिए, जिस पर आपकी महीनों से नजर थी? या पड़ोस के बैंक से सोने के सिक्के की खरीदारी करना आपके लिए ज्यादा लाभदायक साबित होगा?अगर सोने में ही निवेश करना है तो इसे भौतिक रुप से खरीदने की क्या जरुरत है। गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) सोने में निवेश करने का सबसे बेहतर माध्यम हो सकता है। ईटीएफ वस्तुत: म्यूचुअल फंड हैं जिसके यूनिटों का कारोबार स्टॉक एक्सचेंजों में ठीक उसी प्रकार किया जा सकता है जैसे किसी कंपनी के शेयरों का।

गोल्ड ईटीएफ में निवेश कर आप सोना अभौतिक रुप में खरीदते हैं, इसमें भौतिक सोने में निवेश से जुड़ा जोखिम नहीं है। गोल्ड ईटीएफ चूंकि डीमैट रुप में होता है इसलिए जो निवेशक इसमें निवेश करना चाहते हैं उनका डीमैट खाता होना आवश्यक है।कोई भी व्यक्ति गोल्ड ईटीएफ के यूनिटों की खरीदारी स्टॉक एक्सचेंजों से कर सकता है जहां वर्तमान में पांच गोल्ड ईटीएफ फंड सूचीबध्द हैं। इन पांच फंडों में बेंचमार्क गोल्ड ईटीएफ और यूटीआई म्यूचुअल फंड का गोल्डईटीएफ, रिलायंस गोल्ड ईटीएफ, क्वांटम गोल्ड ईटीएफ और कोटक गोल्ड ईटीएफ शामिल हैं।

यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि शेयरों की तरह ही गोल्ड ईटीएफ के यूनिटों की खरीदारी करने में आपको ब्रोकरेज शुल्क का भुगतान करना होता है। जब कोई निवेशक गोल्ड ईटीएफ का एक यूनिट खरीदता है तो प्रभावी तौर पर वह एक ग्राम सोना खरीद रहा होता है। दूसरी बात यह कि गोल्ड ईटीएफ में किए गए निवेश का मूल्य सोने के वास्तविक बाजार मूल्य से लगभग मेल खा रहा होता है। 2 जनवरी 2009 को जहां सोने का बाजार मूल्य प्रति ग्राम 1,357.5 रुपये था वहीं बेंचमार्क म्युचुअल फंड के गोल्ड ईटीएफ के एक यूनिट का मूल्य 1,364.64 रुपये था।

इस प्रकार आप जब भी चाहें गोल्ड ईटीएफ का एक यूनिट बेच कर बाजार से एक ग्राम सोना खरीद सकते हैं। जब कभी आप भौतिक तौर पर सोने में 15 लाख से अधिक की राशि का निवेश करते हैं तो आपको वेल्थ टैक्स देना पड़ता है। गोल्ड ईटीएफ के मामले में एक निवेशक सोने को अभौतिक रुप में या यूनिटों के रुप में रखता है इसलिए इस पर कोई वेल्थ टैक्स अदा करने की जरुरत नहीं होती है।वैसे लोगों को क्या करना चाहिए जो सोने की खरीदारी अपने पुत्र या पुत्री की शादी के लिए करना चाहते हैं? अधिकांश भारतीय परिवार शादी के कई वर्ष पहले से ही आभूषण खरीद-खरीद कर जमा करने लगते हैं। आभूषण के डिजाइन विवाह के समय तक पुराने हो जाते हैं।

आभूषण निर्माता और विक्रेता ऐसे में सलाह देते हैं कि डिजाइन की चिंता नहीं की जानी चाहिए क्योंकि उन्हीं गहनों को बाद में नए डिजाइनों में ढाला जा सकता है।डिजाइन को परिवर्तित कराने में भी पैसे लगते हैं। इसके अलावा अगर आप अपने आभूषणों को बैंक के लॉकर में सुरक्षित रखना चाहते हैं तो उसके लिए भी आपको अतिरिक्त पैसे देने होते हैं। हो सकता है कि आप आभूषणों का बीमा करवाना चााहें जिसके प्रीमियम में आपको अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं।

कुल मिला कर देखा जाए तो यह गोल्ड ईटीएफ में निवेश करने की अपेक्षा महंगा सौदा है। शादी-विवाह के लिए पहले से आभूषण खरीद कर रखने से बेहतर है कि आप गोल्ड ईटीएफ में निवेश करें। जब कभी आभूषण खरीदने की जरुरत हो तो इसके यूनिटों को बेच कर प्राप्त पैसों से नवीनतम डिजाइन वाले गहने खरीदे जा सकते हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि आपका विश्वस्त आभूषण विक्रेता भी आपको एक बार अशुध्द सोने के गहने पकड़ा सकता है लेकिन गोल्ड ईटीएफ चूंकि अभौतिक रुप में होता है इसलिए इसमें अशुध्दि संबंधी कोई जोखिम ही नहीं होता है।

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Friday, January 9, 2009

सवालों के घेरे में स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका


"अगर आप रामलिंग राजू से मिलें तो आपके दिमाग में
दो बातें जरूर कौंधेंगी। पहला, भारतीय सीईओ में आपको इतना मृदुभाषी व्यक्ति शायद ही मिले, कभी कभी तो वे इतने धीमे से बोलते हैं कि आपके लिए उसे समझना मुश्किल हो जाएगा।
"

अगर आप रामलिंग राजू से मिलें तो आपके दिमाग में दो बातें जरूर कौंधेंगी। पहला, भारतीय सीईओ में आपको इतना मृदुभाषी व्यक्ति शायद ही मिले, कभी कभी तो वे इतने धीमे से बोलते हैं कि आपके लिए उसे समझना मुश्किल हो जाएगा।
और दूसरे, वह तभी खुलकर बोलते हैं जब आप उनसे कार्पोरेट गवनर्स के बारे में बात करें। अगर आप बातचीत को दूसरी ओर मोड़ते हैं, जो सत्यम से जुड़ा हो तो उनके जवाब रटे-रटाए होते

राजू के साथ हुई एक ऐसी ही बैठक याद आ रही है। उस समय राजू ने विस्तार से बातचीत करते हुए बताया था कि सत्यम का मानना है कि बेहतरीन कार्पोरेट गवनर्स कारोबार के बेहतर परिणाम देता है और इससे कंपनी का प्रदर्शन बेहतरीन होता है और हिस्सेदारों को बहुत लाभ मिलता है। उन्होंने बोर होने तक मुझे यह सब कुछ सुनाया था। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि बेहतरीन कार्पोरेट गवनर्स के लिए सत्यम को दो गोल्डन पीकॉक पुरस्कार मिले, इस तरह के पुरस्कार मिलने से कंपनी को भविष्य में लगातार अपने कार्पोरेट गवनर्स में सुधार करने के लिए प्रोत्साहन मिलता

गुरुवार को दिए गए उनके चौंका देने वाले वक्तव्य से पता चलता है कि राजू कार्पोरेट गवनर्स के नियमों का पालन करने की बजाय इस कोशिश में लगे हुए थे कि किस तरह से सत्यम के बही खातों में गड़बड़ी की जाए। कंपनी के वित्तीय ब्यौरों में हेराफेरी और धोखाधड़ी इतनी ज्यादा हुई है कि यह किसी के भी दिमाग को उलझन में डाल सकती है। और अगर कोई राजू से पहले मिल चुका है और उनसे कुछ देर तक भी बातचीत की है तो वह उनके झूठ बोलने के स्तर के बारे में सोचकर हैरत में होगा, जैसा मेरे साथ हुआ।किसी पत्रकार को गुमराह करना कोई बड़ी बात नहीं है, अगर आप तुलना करें कि राजू ने किस तरह से 50,000 से अधिक कर्मचारियों का मात्र एक सप्ताह पहले तक नेतृत्व किया। मायटास की दो फर्म को खरीदने की योजना के निवेशकों द्वारा कड़े विरोध और उसके बाद उस योजना के खत्म हो जाने पर राजू ने अपने कर्मचारियों को लिखे गए एक पत्र में कहा था,''आप कंपनी के साथ बने रहिए,कंपनी ने हमेशा कार्पोरेट गवनर्स के उच्चतम मानकों का पालन किया है। आपसे अनुरोध किया जाता है कि आप अफवाहों पर ध्यान न दें।'' उन्होंने कर्मचारियों को यह भी याद दिलाई कि कंपनी ने गोल्डन पीकॉक अवार्ड पाया था।

राजू ने बताया था कि किस तरह उन्होंने उन सभी प्रक्रियाओं का पालन किया जो निदेशक मंडल के सर्वसम्मत फैसले के लिए जरूरी था और यह फैसला सत्यम को नई ऊंचाइयों पर ले जाता। इस तरह के उदाहरण मिलने कठिन हैं कि किसी सीईओ ने अपने कर्मचारियों के साथ इस तरह का विश्वासघात किया हो।राजू और उनके बेटों को निश्चित रूप से उनके द्वारा उठाए गए कदमों के परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
हकीकत यह है कि वे खुद भी इसे स्वीकार करते हैं और उन्होंने बोर्ड को लिए गए पत्र में इसका जिक्र भी किया है। राजू ने पत्र में कहा, 'मंत अपनी गलतियां स्वीकार करते हुए हर कानूनी कार्रवाई का सामना करने को तैयार हूं।'दरअसल, राजू ने यह आभास दिलाने की कोशिश की कि कंपनी बोर्ड के पुराने और मौजूदा सदस्यों को कंपनी की वास्तविक स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यह एक उल्लेखनीय बयान है और इससे इस आम धारणा को बल मिलता है कि भारत में परिवारों द्वारा चलाए जाने वाले कारोबार में मालिक की ही अहमियत होती हैलेकिन ऐसा नहीं है कि राजू का बयान सत्यम के निदेशकों और वरिष्ठ प्रबंधकों के लिए एक चरित्र प्रमाण पत्र है। राम मयनामपति का ही उदाहरण लीजिए, जो अब कंपनी के अंतरिम सीईओ हैं, जिन्हें पद छोड़ने के बाद राजू ने ही यह काम सौंपा। मयनामपति कुछ ही दिन पहले तक कंपनी के तिमाही नतीजों के दौरान अपने चेयरमैन द्वारा बताए गए आंकड़ों को उचित ठहराने में व्यस्त थे।इस पर विश्वास करना कठिन है कि उन्हें सही आंकड़ों के बारे में जानकारी नहीं थी। या फिर इससे सत्यम के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की घोर अज्ञानता का पता चलता है।आप सत्यम के स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका को ही ले लीजिए, जो इस समय पूरे घटनाक्रम से दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

इससे भी ज्यादा निराशाजनक यह है कि स्वतंत्र निदेशकों की टीम में हार्वर्ड के प्रोफेसर कृष्णा पालेपू, इंडियन स्कूल आफ बिजनेस के डीन एम राममोहन राव, उद्यमी विनोद धाम और पूर्व कैबिनेट सचिव टीआर प्रसाद शामिल हैं। अगर इस तरह के प्रभावशाली और प्रतिभाशाली लोग कार्पोरेट गवनर्स के मानकों की निगरानी नहीं कर सके तो निश्चित रूप से कहीं न कहीं से व्यवस्था में ही खामी है। हकीकत यह है कि राजू का वक्तव्य इस तरफ इशारा करता है कि ज्यादातर निदेशक मूकदर्शक रहने में ही विश्वास करते हैं और वे केवल उसी बात में विश्वास करते हैं, जो कंपनी के चेयरमैन उनसे विश्वास करवाना चाहते हैं। इस तरह से कार्पोरेट गवनर्स का पूरी तरह से मखौल ही बनता है कि कंपनी के प्रमोटर की कंपनी में मामूली हिस्सेदारी हो और वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ सभी कार्यों का संचालन करे।

इससे भारत के कार्पोरेट गवनर्स की एक बड़ी कमजोरी उजागर होती है कि ऐसे स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति की जाती है, जो या तो पुराने साथी हों या प्रबंधन में सहयोगी रहे हों या शेयरधारक हों।यह भी स्पष्ट होता है कि ज्यादातर स्वतंत्र निदेशकों के सामने परंपरागत रूप से यह उदाहरण होता है कि वे किसी तरह का दबाव न डालें और उन्हें यह भी डर बना रहे कि उनकी आलोचना को किस रूप में लिया जाएगा।हाल ही में हुए एक अध्ययन से भी यह पता चलता है कि 90 प्रतिशत कंपनियों ने स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्तियां सीईओ या चेयरमैन से राय लेने के बाद ही की हैं। स्वतंत्र सर्वेक्षणों से पता चलता है कि भारत में 5 में से 1 कंपनी ही बोर्ड के प्रदर्शन का आकलन करती हैं। बोर्ड द्वारा मामले को देखने की प्रक्रिया धीमी होती है और कुछ पुराने या बहुत ही वरिष्ठ निदेशक ही कुछ प्रतिरोध दर्ज कराते हैं। इन सबको देखते हुए यह जरूरी है कि बाजार नियामक अनुच्छेद 49 पर फिर से विचार करे, जो सूचीबध्दता समझौते से संबध्द है और स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका के बारे में बताता है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो सत्यम के नए अंतरिम सीईओ का बयान खोखला ही साबित होगा कि कंपनी के वरिष्ठ लोग उपभोक्ताओं, सहयोगियों, आपूतिकर्ताओं और सभी शेयरधारकों को किए गए वादों को निभाने के लिए एकजुट हैं और वे इसे जारी रखेंगे। और, यह न केवल सत्यम के लिए ही, बल्कि पूरे इंडिया इंक के लिए भी एक बुरी खबर होगी।



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आइये देखते हैं क्यों डगमगाती नजर आ रही है डीएलएफ की नाव

सत्यम वह करने में सफल नहीं हो सकी, जो डीएलएफ पिछले कई महीनों से कर रही है। दरअसल डीएलएफ ने मंदी आने के बाद खुद ही तमाम सहायक कंपनियां बना डालीं। उसके बाद उनकी ही सहायक कंपनियों ने बढ़े हुए दामों पर डीएलएफ की प्रॉपर्टी खरीदी। इस खेल से फायदा यह हुआ कि डीएलएफ का मुनाफा दिखाया जाता रहा। कंपनी के शेयर गिरे भी, लेकिन इस गड़बड़झाले और मुनाफा दिखाए जाने के चलते कंपनी के शेयरों के भाव बढ़े, जबकि हकीकत में कंपनी को मुनाफे जैसी कोई चीज मिली ही नहीं। कंपनी ने ताश के पत्तों के महल बनाए हैं। अब देखना है कि उसकी गति सत्यम जैसी कब होती है....

Thursday, January 8, 2009

सत्यम के बाद अब डीएलएफ!

पिछली पोस्ट में मैने लिखा था कि राजू ने तो केवल पूंजीवाद का चेहरा दिखाया है। पिछले सोमवार को डीएलएफ के सीएफओ ने अपने पास के कंपनी के एक लाख शेयर बेंच दिए। अचानक कंपनी के एक जिम्मेदार अधिकारी द्वारा शेयर बेचे जाने का कोई कारण समझ में नहीं आता। जब उस अधिकारी से कारण पूछा गया तो उसने कहा कि व्यक्तिगत कारणों से शेयर बेचे गए हैं।
आज बाजार खुलते ही डीएलएफ के शेयर गिरने लगे। भाइयों, एक बार फिर कहना पड़ रहा है कि पूंजीवाद का यही असली चेहरा है। हर तरह की बेइमानी से पैसा कमाओ। हां, मैने सत्यम को बेलआउट पैकेज दिए जाने की बात कही थी। अमेरिका ने भी उस कंपनी को बेलआउट पैकेज नहीं दिया था, जो बर्बाद होने वाली पहली कंपनी थी। लेकिन जब उसके यहां तमाम कंपनियां ताश के पत्ते की तरह भरभराकर गिरने लगीं तो पैकेज की झड़ी लगी। अब देखते जाइये कि अनिश्चितता के इस दौर में कौन-कौन से दिग्गज धराशायी होते हैं।

सत्यम को बेलआउट पैकेज की जरूरत


सत्यम कंप्यूटर्स के मुखिया रामलिंग राजू ने सिर्फ पूंजीवादी कार्पोरेट जगत का चेहरा देश के सामने रखा है। आखिर भारत में सभी लोग राजू को खलनायक, फ्राड और झूठा साबित करने पर क्यों तुले हैं? ऐसा ही कुछ तो इस समय दुनिया भर में हो रहा है। कंपनियां, बैंक, विभिन्न संस्थानों का फ्राड सामने आ रहा है, वे धराशायी हो रही हैं और वहां की सरकारें बेलआउट पैकेज देकर कंपनियों को बचाने की कोशिश कर रही हैं। आखिर वैसा ही कुछ तो राजू ने भी किया था- इसमें क्या गलत किया।


एक किसान परिवार में जन्मे रामलिंग राजू एक सप्ताह पहले तक देश के हीरो थे। यहां तक कि अमेरिका जैसा पूंजीवादी देश भी उनसे भयभीत रहते थे। अचानक जीरो कैसे हो गए?? पूंजीवादी व्यवस्था में ऐसा ही होता है कि पैसे से पैसा बनाया जाए। राजू ने भी यही किया। कंपनी का विस्तार करते चले गए। भले ही गलत बैलेंस शीट दिखाया। अगर विस्तार योजनाएं कारगर हो जातीं तो?? तब तो कंपनी के सभी शेयरधारकों की बल्ले-बल्ले होती ना। तब कोई उंगली नहीं उठाता कि गलत हुआ या किसी की जेब काटकर कोई अमीर हुआ है।


अब उद्योग जगत को ही देखिये। ऐसी व्यवस्था तो नहीं सोची जा रही है कि आम आदमी की कमाई बढ़े और वह गाड़ियां, मकान आदि-आदि खरीदने में सक्षम हो। उद्योग जगत यही मांग कर रहा है कि रिजर्व बैंक कर्ज सस्ता करे, लोग कर्ज लेकर घी पिएं और बाद में जब कर्जदार उन्हें घेरना शुरू करें तो वे आत्महत्या कर लें, डकैती करें, लूट करें, फ्राड करें या कुछ भी करें। कर्ज का भुगतान कर दें बैंकों को।


ऐसी नीति में तो यही जायज होगा कि जिस व्यक्ति ने ५०-६० हजार लोगों को पिछले बीस साल तक रोजी-रोटी दी, उसे गुनाहगार न मानते हुए तत्काल बेलआउट पैकेज दे दे। आखिर राजू ने क्या बुरा किया? अगर उन्होंने कंपनी का पैसा कहीं और जमा कर रखा हो तो सरकार उसे ढूंढे और जब्त कर ले या बेल आउट पैकेज में शामिल कर ले। लेकिन देश के गौरव के रूप में स्थान बना चुकी सत्यम कंप्यूटर्स को बचाना जरूरी है। वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था की यही मांग है।

Monday, January 5, 2009

दम हो तो पीट दीजिए, साथी भी मिल जाएंगे


इजरायल और भारत। दो देश, जो पड़ोसी के खतरों से जूझ रहे हैं। अब इजरायल को ही देखिए जैसे ही उस पर हमला शुरू हुआ, पीटना शुरू किया और दस दिन से पीट रहा है। दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जो जरा भी चूं-चपड़ करे। मजे की बात है कि वह चारो ओर से इस्लामिक देशों से घिरा है। भले ही उसे अमेरिका का साथ है, लेकिन उसे भी तो डर होगा कि अगर सभी पड़ोसी मिलकर उसे पीटने लगें तो अमेरिका क्या सहयोग कर देगा? बावजूद इसके, खुद उस देश में दम है और दुश्मनों को दौड़ा-दौडा़कर मार रहा है, उनकी धरती पर।
इधर भारत की देखिए। बेचारे। तरह तरह की धमकियां देकर हार चुके। इतनी छीछालेदर और इतना नुकसान तो भारत जैसे विशाल देश का तब भी नहीं होगा, अगर पाकिस्तान अपने पास पड़े सारे परमाणु बम भारत पर छोड़ दे। अगर हिम्मत बनाकर एक बार कुछ करने को ठाने तब ना। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता। अरे छोड़िये- पाकिस्तान को सबूत दिया तो दिया ही, पूरी दुनिया को सबूत दे रहे हैं कि पाकिस्तान ने ही हमें पीटा। रो रहे हैं, हमें पीटा गया। इससे तो बढ़िया था कि मुंबई विस्फोटों के बाद भी धूल झाड़कर खड़े हो जाते, जैसे अन्य विस्फोटों के बाद किया था।

धैर्य के कप में लीजिए मुनाफे का 'सिप'

मनीश कुमार मिश्र

साल 2008 इक्विटी फंडों के निवेशकों के लिए निराशाजनक रहा है। एक साल में फंडों से मिलने वाला रिटर्न ऋणात्मक ही रहा है, चाहे निवेश एकमुश्त तौर पर किया गया हो या योजनाबध्द निवेश (सिप) के रूप में।


अब सवाल यह है कि साल 2009 निवेशकों के लिए कैसा रहेगा? क्या 2008 उनके घाटे की भरपाई हो पाएगी? आइए, विभिन्न विशेषज्ञों से जानने की कोशिश करते हैं।


टॉरस म्युचुअल फंड के प्रबंध निदेशक आर. के. गुप्ता कहते हैं- साल 2008 की शुरुआत से ही बाजार में गिरावट का दौर रहा है। इक्विटी में निवेश करने वाले निवेशकों को नुकसान हुआ है लेकिन साल 2009 प्रतिफल की दृष्टि से आशाजनक है।'


कैसे? इसके जवाब में वित्तीय योजनाकार विश्राम मोदक ने कहा-अगर निवेश किसी वित्तीय लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए किया जाए तो घाटे की संभावना कम होती है क्योंकि निवेशक अपनी जोखिम उठाने की क्षमता के अनुसार विभिन्न रूपों से निवेश करता है।


योजनाबध्द निवेश योजनाएं निवेश का अनुशासित तरीका हैं लेकिन इक्विटी फंडों में निवेश कर तीन साल के बाद पैसे निकालने की बात नहीं सोचनी चाहिए।


इक्विटी या इक्विटी फंडों में सिप के माध्यम से कम से कम सात वर्षों के लिए निवेश किया जाना चाहिए वह भी किसी वित्तीय लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए विभिन्न फंडों में निवेश करते हुए।


ऐसे में निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिल सकता है। वैसे उनका मानना है कि साल 2009 में बाजार की स्थिति में सुधार होगा होगा। फलस्वरूप, सिप के माध्यम से निवेश करने वाले नए और पुराने, दोनों निवेशकों को लाभ होगा।


गुप्ता ने भी इस पर मुहर लगाते हुए कहा - साल के पहले तीन महीनों में बाजार स्थिर रहेगा। साल 2009 के शुरुआती तीन महीनों में बाजार में स्थिरता रहेगी। लोकसभा चुनाव के आस पास बाजार में उतार-चढ़ाव रहेगा।


लेकिन हमारा अनुमान है कि साल की समाप्ति अच्छी रहेगी। इक्विटी फंडों में सिप के माध्यम से निवेश करने का यह समय उचित है। अगला साल निवेशकों की खुशियां वापस लौटा सकता है।


वैल्यू रिसर्च के मुख्य कार्यकारी अधिकारी धीरेन्द्र कुमार ने कहा, 'वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करने के बाद दीर्घावधि के लिए विभिन्न इक्विटी फंडों में सिप के माध्यम से नियमित तौर पर निवेश करना चाहिए।


बाजार के उतार-चढ़ाव का प्रभाव अल्पावधि के निवेश पर पड़ता है। दीर्घावधि (सात साल से अधिक की अवधि) के लिहाज से इक्विटी फंड बेहतर रिटर्न देते हैं। साल 2008 निवेशकों के लिए अच्छा नहीं रहा लेकिन उम्मीद है कि अगले साल वे कुछ बेहतर लाभ अर्जित कर पाएंगे।

साभार: http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=12068

Sunday, January 4, 2009

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र देगा बिहार के विकास को गति

सत्येन्द्र प्रताप सिंह


बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से हर साल जूझने वाले बिहार ने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के लिए कमर कस ली है।
इसके तहत सभी बुनियादी सुविधाओं वाले मेगा फूड पार्क बनाने की योजना है, जो इस साल कार्यरूप लेगा। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर टेक्सटाइल और हैंडलूम के क्षेत्र में भी तेजी से काम चल रहा है। इस कारोबार से जुड़े कारोबारियों और सरकारी अधिकारियों का मानना है कि ये क्षेत्र वर्ष 2009 को खुशगवार बना देंगे।

खाद्य प्रसंस्करण से जुडे ज़ानकारों का मानना है कि 2015 तक खाद्य प्रसंस्करण कारोबार 83,000 करोड़ रुपये तक का हो जाएगा। इसे देखते हुए बिहार सरकार ने 2 मेगा फूड पार्क बनाने की योजना बनाई है। एक मुजफ्फरपुर वैशाली क्षेत्र तथा एक भागलपुर खगड़िया क्षेत्र में होगा। मेगा फूड पार्क, छोटे-छोटे प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्रों से जोड़े जाएंगे। इसके लिए कोल्ड चेन तैयार की जाएगी। प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्रों को फील्ड कलेक्शन केंद्रों से जोड़ा जाएगा। केंद्रीय प्रसंस्करण हब के रूप में विकसित किए जाने वाले मेगा फूड पार्कों में सभी बुनियादी सुविधाएं जैसे गोदाम और प्रसंस्करण आदि की सुविधा उपलब्ध होगी। इसके अलावा चावल, मक्का और मखाना क्लस्टर के विकास के साथ ही 100 कृषि आधारित ग्रामीण व्यापार केंद्र विकसित करने की योजना है। इसके अलावा राज्य सरकार ने पिछले एक साल में निजी निवेश के 71,000 करोड़ रुपये के 145 निजी प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इसमें 2 चीनी मिलें, 11 पॉवर प्लांट, 8 फूड प्रॉसेसिंग, 6 तकनीकी संस्थान शामिल हैं। इंटीग्रेटेड हैंडलूम डेवलपमेंट योजना के तहत राज्य के 9 हथकरघा क्लस्टर विक सित करने की परियोजना को मंजूरी दे दी गई है। साथ ही इन औद्योगिक क्षेत्रों में 50 प्रतिशत के अनुदान पर डीजल जेनरेटिंग सेट की स्थापना की योजना बनाई गई है। बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष कैलाश झुनझुनवाला का कहना है कि नया साल राज्य के लिए ढेरों उम्मीदें लेकर आ रहा है। इंटीग्रल रेल कोच फैक्टरी बनने वाली है। इससे सेवा क्षेत्र में संभावनाएं बढ़ेंगी। साथ ही सरकार की फूड पार्क, क्लस्टर डेवलपमेंट की कोशिशें भी कार्यरूप लेना शुरू कर देंगी, जिसका सीधा असर उत्पादन और रोजगार पर पड़ेगा और छोटे-छोटे कारोबार चल पड़ेंगे।बिहार के उद्योग मंत्री दिनेश यादव ने बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहा कि राज्य में छोटे-मझोले कारोबारियों के लिए अपार संभावनाएं हैं। खासकर हमारी कोशिश यह है कि ऐसे कारोबार विकसित किए जाएं, जिसमें यहां का कच्चा माल इस्तेमाल हो सके। सरकार की पिछले तीन साल की कोशिशें इस साल रंग दिखाएंगी और वर्ष 2009 में खाद्य प्रसंस्करण, हथकरघा, बिजली उत्पादन के क्षेत्र में जोरदार प्रगति होगी। राज्य सरकार ने छोटे कारोबारियों को राहत देते हुए रस्सियों और सुतलियों, ऑटो पार्ट्स, ड्राई फ्रूट्स, प्लाईवुड, ब्लैकबोर्ड सहित उनके निर्माण में लगने वाले कच्चे माल पर वैट की दर 12।5 प्रतिशत से घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया है। आने वाले साल में छोटे और मझोले उद्योग के कारोबारी अपने कार्य को विस्तार देने में की दिशा में भी काम करेंगे।

साभार: http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=12248

Friday, January 2, 2009

मिलेगा कर्ज का घी, और सुनहरे मौके भी

सत्येन्द्र प्रताप सिंह


गुजरे साल में पाई-पाई को तरसते रहे छोटे और मझोले उद्योगपतियों की झोली में 2009 काफी माल डाल सकता है, अब चाहे वह कर्ज ही हो।
वह यूं कि एक तरफ तो रिजर्व बैंक ने रोजगार में इस क्षेत्र के महत्व को देखते हुए खजाना खोल दिया है। तो दूसरी तरफ बैंकों ने भी सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों की अहमियत को समझते हुए सस्ता और सुलभ कर्ज मुहैया कराने की ठान ली है।

मिसाल के तौर पर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, जो अब तक अपने कुल कर्ज का 16 प्रतिशत एसएमई को देता है, उसने अब इसे बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने का फैसला किया है। बैंक के महाप्रबंधक एस।एस. घुग्रे ने कहा, 'हमने अपने कुल दिए गए कर्ज 85,506 करोड़ रुपये में से 13,884 करोड़ रुपये एमएसएमई को दिया है, जो कुल कर्ज के 16 प्रतिशत से ज्यादा है।' यही नहीं, नए साल में इनके खुश होने की और भी कई वजहें हैं। वह इसलिए कि यूरोप और अमेरिका में भले ही इनका निर्यात प्रभावित हो रहा हो, लेकिन कैरेबियाई देशों और अन्य विकासशील देशों में संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं। यानी, जरूरत है अब सिर्फ समय की नब्ज समझकर कारोबार करने की।उद्योग से जुड़े लोगों का भी मानना है कि वर्ष 2009 में उद्योग जगत में स्थिरता आएगी और सरकार की सकारात्मक कोशिशें रंग लाएंगी।

इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष और एमआर इंजीनियरिंग वर्क्स, सहारनपुर के प्रमुख प्रवीण सडाना कहते हैं कि 8 दिसंबर को प्रधानमंत्री के साथ हुई बैठक से ढेरों उम्मीदें हैं।सरकार ने 13 में से 10 मांगें मान ली हैं, जिसमें कर्ज की ब्याज दरें कम करना भी शामिल है। कारोबारियों को खुला मौका है कि वे कैरेबियाई देशों में अपने उत्पादों का निर्यात कर सकते हैं।त्रिनिदाद और टोबैगो के राजदूत ने भी कहा कि हमारी खुली अर्थव्यवस्था है और देश पर मंदी का कोई प्रभाव नहीं है, कारोबारियों को खुला मौका है कि वे न केवल हमारे देश में अपने उत्पादों की आपूर्ति, विनिर्माण कर सकते हैं, बल्कि वहां आधार बनाकर अन्य देशों को भी उत्पादों की आपूर्ति कर सकते हैं। दिल्ली के प्रमुख ऑटो पाट्र्स उत्पादक और वेलकम ऑटोमोबाइल के प्रमुख नरेंद्र मदान ने कहा, 'ऑटो सेक्टर में पूरे साल मंदी का दौर रहा। उम्मीद है कि अब बड़े उत्पादकों का भी स्टॉक खत्म होने को है और इस साल उनकी तरफ से मांग बढ़ेगी।'सडाना बताते हैं कि जिला स्तर पर बैंकों का रवैया छोटे उद्योगपतियों के प्रति बहुत ही निराशाजनक होता है, जिसके चलते हमने प्रधानमंत्री से मांग की है कि जिला स्तर पर बैंकों द्वारा रिजर्व बैंक के निर्देशों के मुताबिक कर्ज दिए जाने की जांच की जाए। इस पर प्रधानमंत्री ने समिति गठित करने की घोषणा की है।

साभार: http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=12220

Thursday, January 1, 2009

'पोंजी' से पूंजी पर झाड़ू फेर गया शातिर अमेरिकी साहूकार, 2500 अरब रुपए का चूना !

ऋषभ कृष्ण सक्सेना / नई दिल्ली


हिंदी फिल्मों में गांव के साहूकार तो आपको याद होंगे, जो गरीब अनपढ़ लोगों को तगड़ी ब्याज दर पर कर्ज देकर लूटते हैं।
इनके ठीक उलट खांटी हिंदुस्तानी चिटफंड कंपनियां होती हैं, जिनमें से कुछ वित्तीय गुणा भाग से अनजान लोगों को कम से कम वक्त में ज्यादा से ज्यादा रिटर्न का झांसा देकर लूटती रही हैं। लेकिन आधुनिक वित्तीय प्रणाली की बुनियाद रखने का दावा करने वाले पढ़े-लिखे अमेरिकी भी इस झांसे में फंस सकते हैं, ऐसा किसने सोचा होगा। लेकिन नामी निवेशक बर्नार्ड मैडॉफ ने इन महारथियों को भी नहीं छोड़ा।पोंजी योजना के जरिये आम अमेरिकी निवेशकों की पूंजी लूटने का नायाब तरीका ढूंढने वाला मैडॉफ इसी वजह से आजकल सुर्खियों में है। मजे की बात है कि मैडॉफ ने लूटा भी उन देशों को, जहां के निवेशक सबसे ज्यादा तीसमारखां माने जाते हैं, मसलन अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, जापान और दक्षिण कोरिया। मंदी के दौर में इन निवेशकों को अकेले मैडॉफ ने ही 50 अरब डॉलर यानी करीब 2500 अरब रुपए का चूना लगाया है। मजे की बात है कि इनमें बड़े-बड़े नामी गिरामी बैंक भी शामिल हैं।

कौन है मैडॉफ

मैडॉफ को दुनिया ने तो तभी जाना, जब पिछले हफ्ते पोंजी घोटाले की वजह से उसे गिरफ्तार किया गया। लेकिन अमेरिका और यूरोप में मैडॉफ के मुरीदों की कमी नहीं थी, जो निवेश के तमाम बुनियादी नियमों को ताक पर रखकर 13 फीसदी के गारंटेड सालाना रिटर्न के फेर में उसके एक इशारे पर पैसा लगा देते थे।
बर्नार्ड एल मैडॉफ इनवेस्टमेंट सिक्योरिटीज नाम से निवेश कंपनी चलाने वाले मैडॉफ की वेबसाइट उसे फिनरा के नाम से मशहूर सिक्योरिटीज डीलरों के अमेरिकी संगठन का प्रमुख सदस्य बताती है। वह नैस्डैक के निदेशक मंडल का चेयरमैन भी रह चुका है और प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग की सलाहकार समिति में भी शामिल था। सिक्योरिटीज उद्योग के संघ की ट्रेडिंग समिति में मैडॉफ चेयरमैन था और 12 दिसंबर को गिरफ्तारी से पहले तक वह होफ्सत्रा विश्वविद्यालय और येशिवा विश्वविद्यालय का ट्रस्टी भी था।

क्या था पोंजी का चक्कर

पोंजी दरअसल अमेरिकी निवेशकों के लालच का ही नतीजा थी। भारत में भी कई कंपनियों ने वही किया है, जो मैडॉफ ने किया। उन कंपनियों का जो हश्र यहां हुआ, वही अमेरिका में आखिकार मैडॉफ का भी हो गया। उसने गिरफ्तार होने के बाद साफ लफ्जों में कबूल भी किया कि पोंजी योजना कुछ भी नहीं थी, यह तो 'सफेद झूठ' थी।
दरअसल मैडॉफ बेहतर रिटर्न देने के नाम पर निवेशकों से रकम लेता था। जब रिटर्न देने का मौका आता था, तो वह पुराने निवेशकों को वह रकम दे देता था, जो उसे नए निवेशकों से हासिल हुई थी। इसका मतलब है कि उसके पास तो कोई रकम थी ही नहीं और न ही वह कहीं निवेश कर रहा था यानी 'हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा।'
जांच एजेंसियों के मुताबिक कम से कम पिछले चार साल से वह यही काम कर रहा था। मजे की बात है कि पिछले 15 साल में मैडॉफ पर सवालिया निशान भी लगे, लेकिन वित्तीय जगत में अपनी पहुंच के चलते वह किसी भी कार्रवाई से हमेशा बचता रहा।

कौन हुए शिकार

सत्तर साल के इस शिकारी ने यूरोप के बड़े से बड़े दिग्गज को घुटनों पर ला दिया है। ब्रिटेन के एचएसबीसी बैंक ने कबूल किया है कि मैडॉफ ने उसे तकीबन 100 करोड़ डॉलर का चूना लगाया है। उसके सबसे बड़े शिकारों में यह बैंक शामिल है।
रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड, नोमुरा, नैटिक्सि चोट लगने की बात स्वीकार कर चुके हैं।
फ्रांस के नैटिक्सिस बैंक के 45 करोड़ यूरो इस घोटाले में डूबे हैं और ब्रिटेन की हेज फंड प्रबंधक कंपनी मैन ग्रुप को 36 करोड़ डॉलर की चोट लगी है। नामी हॉलीवुड निदेशक स्टीवन स्पीलबर्ग की वंडकाइंड फाउंडेशन भी मैडॉफ के जाल से बच नहीं पाई। उनके अलावा फ्रांस के बैंक बीएनपी पारिबा और बांको सैंटैंडर को भी मैडॉफ ने चूना लगाया है।
रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड के 60 करोड़ डॉलर मैडॉफ ने पचाए और जापान के नामी गिरामी नोमुरा बैंक के 30 करोड़ डॉलर उसकी जेब में गए हैं। यूरोप के कई दूसरे बैंकों के नाम भी अभी आ सकते हैं।

साभार- http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=11476

जुआरी पर जुर्माना!


नीलकमल सुंदरम / नई दिल्ली


अमेरिका की संघीय अदालत ने भारतीय मूल के जिब्राल्टर निवासी और ऑनलाइन गेमिंग बादशाह अनुराग दीक्षित को संचार साधनों के उपयोग का दोषी करार देते हुए करीब 1,500 करोड़ रुपये (30 करोड़ डॉलर) का जुर्माना अदा करने को कहा है।
कौन हैं अनुराग और किस तरह का करते हैं कारोबार, आइए जानते हैं :

कौन हैं अनुराग

दीक्षित झारखंड के सिंदरी में मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे (वर्ष 1973) अनुराग दीक्षित बहुत जल्द सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए दुनिया के अरबपतियों में शुमार हो गए। आईआईटी दिल्ली से 1994 में कंप्यूटर टेक्लॉजी में स्नातक की डिग्री करने के बाद उन्होंने सीएमसी और एटीएंडटी जैसी नामी-गिरामी में काम किया, लेकिन दीक्षित का मन नौकरी में नहीं रमा। और खुद का कारोबार शुरू करने की ठानी। अपनी चतुराई और तकनीकी शिक्षा के दम पर दीक्षित आज दुनिया के अरबपतियों में 618 पायदान पर हैं। फोर्ब्स पत्रिका के मुताबिक अनुराग की कुल संपत्ति करीब 80 अरब रुपये आंकी गई है।

ऑनलाइन गेमिंग के कारोबार में दस्तक

इसी बीच, वह ऑनलाइन पार्टी गेमिंग के संस्थापक पारासोल के संपर्क में आए। पारासोल ने उनकी प्रतिभा पहचानी और खुद का कारोबार करने के लिए प्रेरित किया। 25 वर्ष की उम्र में दीक्षित ने अपने मित्र विक्रांत भार्गव के साथ वर्ष 2001 में पार्टी पोकर डॉट कॉम नाम से पार्टी गेमिंग (ऑनलाइन जुआ) कंपनी शुरुआत ब्रिटेन के जिब्राल्टर शहर से की। जल्द ही उनकी साइट दुनियाभर में लोकप्रिय हो गई। 2005 में पब्लिक इश्यू के जरिए कंपनी की 23 फीसदी हिस्सेदारी उन्होंने बेच दी। वर्ष 2007 में कंपनी को करीब 40 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था।

मामला क्या था?

अनुराग दीक्षित पर जुए के संघीय नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था, जिसके तहत अमेरिका में दो साल की सजा का प्रावधान है। दरअसल, अमेरिकी कानूनों में वर्ष 2006 में किए गए संशोधन के बाद पार्टी गेमिंग कारोबार को प्रतिबंधित कर दिया गया था। लेकिन दीक्षित ने इसके बावजूद अपना कारोबार अमेरिका में बंद नहीं किया। इसके लिए संघीय अदालत ने दीक्षित को सट्टेबाजी के लिए संचार साधनों के उपयोग का दोषी पाया गया। हालांकि उन्होंने सजा के बजाय अर्थदंड देने का समझौता कर लिया। कंपनी के कुल राजस्व का 75 फीसदी हिस्सा अमेरिका से ही आता है।

क्या है पार्टी गेमिंग?

यह इंटरनेट पर खेला जाने वाला जुआ है, जिसे साइबर जगत में वर्चुअल गेमिंग भी कहा जाता है। इसमें दुनियाभर में कहीं बैठकर एक साथ कई यूजर विभिन्न तरह के खेलों (जुआ) में हिस्सा ले सकते हैं। इसके तहत विंगो, कसीनो जैसे ऑनलाइन गेम आते हैं। पार्टी पोकर डॉट कॉम पर सालाना 36 लाख लोग विजिट करते हैं। कंपनी का सालाना कारोबार 45।78 करोड़ डॉलर है।

साभार - http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=11579

Thursday, December 11, 2008

देखें पाकिस्तान की दुर्भावनाएं.. बन रही है भयावह स्थिति ?

उर्दू में प्रकाशित होने वाले एक पाकिस्तानी अखबार ने २०१२ और २०२० तक पाकिस्तान शासित भूभाग का वर्णन किया है। उसका मानना है कि २०२० तक भारत का नामोनिशान मिट जाएगा। तस्वीरें इस्लामिक राज्य के सपने की हैं। अगर आप उर्दू जानते हैं तो इस अखबार ( http://express.com.pk/ ) को जरूर पढ़ें। यह ३ दिसंबर के संस्करण में प्रकाशित किया गया। या तो ऐसे अखबारों या इस तरह के लेखन पर पाकिस्तानी सरकार का अंकुश नहीं है, या यह अखबार पाकिस्तान सरकार के मंसूबे को प्रदर्शित करता है। आप अपनी राय जरूर दें।

Wednesday, December 3, 2008

आम भारतीय से दूर होता बड़े लोगों का मीडिया

ए. के. भट्टाचार्य

सरकार भारत पर मंडरा रहे किसी संकट का मुंहतोड़ जवाब देगी। यह बात पालानीअप्पन चिदंबरम ने सोमवार को उस समय कही थी जब वह गृह मंत्रालय की कमान संभाल रहे थे।
मुंबई पर हुए हमले के बाद उनका यह बयान काफी सुकून दिलाने वाला था। लेकिन गृहमंत्री आखिर कौन से भारत की बात कर रहे थे? जी हां, मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले का एक असर यह भी हुआ है कि इसने अमीरों के भारत और आम आदमी के भारत के बीच मौजूद खाई को और भी चौड़ा कर दिया।
इस बात से किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए कि आज भी इस तरह की खाई अपने मुल्क में मौजूद है और वह दिनोंदिन चौड़ी होती जा रही है। हैरत अगर है तो उस अंदाज पर, जिसमें मीडिया ने इस हमले को पेश किया। उसने इस खाई को और भी गहरा व चौड़ा कर दिया। उसकी वजह से यह खाई खुलकर लोगों के सामने आ गई। जिस तरह से मीडिया ने इस त्रासदी को कवर किया, उसने हमारे सबसे बुरे सपनों में से एक को हकीकत में तब्दील कर दिया। मीडिया में कौन सी चीज कैसे दिखाई जानी है, इस बारे में फैसला करने में कहीं न कहीं खामी जरूर है। साथ ही, आज मीडिया का नजरिया वही कुछेक लोग तय कर रहे हैं, जो उसे चला रहे हैं।
यहां संकट की गंभीरता या फिर इस त्रासदी की व्यापकता पर सवाल नहीं उठाए जा रहे हैं। मुंबई पर हुए इस आतंकवादी हमले में कम से कम 200 लोगों की जान गई। 60 घंटे तक मुट्ठी भर आतंकवादियों ने बंदूक के दम पर हिंदुस्तान के हाई प्रोफाइल होटलों में से दो पर अपना कब्जा जमाए रखा। उन्होंने सैकड़ों की तादाद में लोगों को बंधक बनाकर रखा, जिनमें से कई को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम को मीडिया ने अच्छे या कहें कि काफी अच्छे तरीके से पेश किया।
लेकिन असल दिक्कत है उस तरीके के साथ, जिससे उसी मीडिया ने भारतीय रेलवे के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) की घटना की जानकारी दी थी। आखिर वहां भी तो आतंकवादियों ने कई मासूमों की जिंदगी की लौ वक्त से पहले ही बुझा दी। शुरुआत में तो टीवी चैनलों ने रेलवे स्टेशन पर हुई गोलीबारी के बारे में जानकारी दी थी, लेकिन जल्दी ही सभी के सभी टीवी चैनलों का ध्यान वहां से हट गया और उनके कैमरों के लेंस दोनों लक्जरी होटलों की तरफ टिक गए। अखबारों में भी छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर हुई घटना के बारे में खबरों को भूलेभटके ही जगह दी गई।

क्या अपनी मीडिया के लिए किसी रेलवे स्टेशन पर खड़े आम लोगों की जिंदगियों की कीमत पांच सितारा होटलों में जुटे अमीरों की जान से कम है? या क्या मीडिया को हिंदुस्तान के अमीरों की जिंदगी में ज्यादा दिलचस्पी होती है?
या फिर क्या मीडिया इन होटलों में हो रही घटनाओं में इस कदर उलझा हुआ था कि वह दूसरी तरफ ध्यान ही नहीं दे पा रहा था? आप कह सकते हैं कि इन दोनों होटलों में हुई घटनाएं काफी ज्यादा अहम थीं, इसलिए सीएसटी की खबर को ज्यादा तव्वजो नहीं दी गई? आपकी बात में दम है, लेकिन इस घटना की तुलना पिछले साल या उससे पहले ही हुई आतंकवादी घटनाओं को मिले मीडिया कवरेज से कीजिए। यहां बिल्कुल साफ-साफ दिखता है कि मीडिया को उन लोगों की काफी चिंता रहती है, जो उच्च वर्ग से ताल्लुक रखते हैं।

जुलाई, 2006 में मुंबई में सात जगहों पर लोकल टे्रनों में बम धमाके हुए थे। उस हमले में भी उतने ही लोग मारे गए थे, जितने पिछले हफ्ते की आतंकी घटनाओं में मारे गए। लेकिन उन धमाकों को उस स्तर पर कवरेज नहीं मिला, जितना कि पिछले हफ्ते की आतंकवादी हमले को मिला था।
हालांकि, इन दोनों आतंकवादी घटनाओं में दो बड़े अंतर हैं। पहली बात तो यह है कि 2006 के हमले कुछ ही घंटों के दौरान हुए थे। वहीं, पिछले हफ्ते का हमला तीन दिनों तक चला था। दूसरी बात यह है कि ये दोनों हमले अलग-अलग तरह के थे। 2006 में एक अनजान और अनाम आतंकवादी ने लोकल टे्रनों में बम रखे थे, जो एक के बाद एक फटे। वहीं पिछले हफ्ते हाथों में बंदूक थामे आतंकवादियों ने अलग-अलग जगहों पर खुद ही लोगों को मौत के घाट उतारा था।
इन दोनों हमलों में कोई समानता ही नहीं थी। इसलिए हो सकता है कि अभूतपूर्व स्तर पर किए गए इस हमले को दिखाने के लिए तैयारी करने का मौका ही नहीं मिला हो। ऐसा है तो आप उस बाढ़ के बारे में क्या कहेंगे, जिनसे महज कुछ महीनों पहले ही बिहार के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया था? उन मासूम लोगों का क्या, जो हर रोज अलग-अलग आतंकवादी या उग्रवादी संगठनों के हमलों में मारे जाते हैं?
दिक्कत साफ तौर पर उस कवेरज को लेकर कतई नहीं है, जो पिछले हफ्ते मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले को मिला था। असल दिक्कत यह है कि जब आम लोग ऐसे हमलों में मारे जाते हैं, तो उन्हें खबरों में इतनी जगह नहीं मिलती। इसी वजह से तो सवाल उठते हैं कि क्या मीडिया कवरेज का असल मकसद, ज्यादा से ज्यादा लोगों तक खबरों को पहुंचाने का होता है या फिर विज्ञापनदाताओं के सामने ज्यादा से ज्यादा अंक बटोरने का मिसाल के तौर पर बिहार में बाढ़ या फिर छत्तीसगढ क़े किसी गांव में नक्सलियों का हमला तो टीवी चैनलों को उतनी रेटिंग तो कतई नहीं देगा, जितना अमीर हिंदुस्तानियों पर हुआ आतंकवादी हमला दिला सकता है।
यह देखकर भी काफी दुख होता है कि आज मीडिया कवरेज का फैसला उन लोगों के विवेक पर होता है, जो उसके कंटेट के बारे में फैसला करते हैं। इसलिए जन परिवहन प्रणाली पर निशाना साधा जाता है क्योंकि इससे कारों के मालिकों पर बुरा असर पड़ता है। इसीलिए तो लक्जरी होटलों पर हुआ हमला, किसी रेलवे स्टेशनों पर हुए हमले से ज्यादा अहम हो जाता है। सबसे दिक्कत वाली बात यह है कि आज मीडिया और उसे चलाने वाले, दोनों उच्च वर्ग का हिस्सा बन चुके हैं।
इसीलिए तो उनकी चिंताएं उच्च वर्ग की चिंताओं के बारे में बताती हैं, आम हिंदुस्तानियों के बारे में नहीं। यह बात अपने-आप में किसी हमले से कमतर नहीं है।

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पाकिस्तान की चिंताः अगर ६५ आतंकवादी दे भी दिया तो उनका क्या करेंगे भारतीय?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से लेकर प्रशासन तक, सभी इन दिनों परेशान हैं। भारत ने अजीब सी मांग रख दी है कि वहां के ६५ आतंकवादियों को हमें दे दो। पाकिस्तानी नेता इसी को लेकर परेशान हैं कि भारत उन आतंकवादियों को लेकर करेगा क्या? यहां तो पहले से ही कैदियों की संख्या से जेलें कराह रही हैं। कुछ लाइव फायरिंग करने और कराने वाले जेल में बंद हैं। उन पर दस-बीस साल बीत जाने पर भी कोई फैसला नहीं लिया जा सका है। ऐसे में अगर ६५ आतंकवादी और दे दिया तो वे भारत की जेलों में रहकर पाकिस्तान की ही मुसीबत बढ़ाएंगे। उन्हें बेहतरीन सुविधाएं, सैटेलाइट फोन आदि जेल में पहुंचा दिए जाएंगे, भारतीय नेता उनकी तुलना शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद से करेंगे। वे खुलेआम जेलों में बैठकर सुरक्षित रहकर आतंकवादी शिविरों का संचालन करने लगेंगे।

Sunday, November 30, 2008

सोनिया जी माफ करिए- इस फैसले से हम तीनों खुश... देश जाए भाड़ में

बेचारे मनमोहन सिंह, उम्मीद थी कि सरकार उन्हें वित्तमंत्री बनाएगी और बन गए प्रधानमंत्री। सोनिया ने फंसा दिया। इतना बड़ा देश, इतनी समस्याएं। कई बार इस्तीफे की पेशकश की। लेकिन सोनिया ने स्वीकार ही नहीं किया। क्या करें। सबसे बड़ा गम तो वित्तमंत्रालय दूसरे के हाथ जाने का था। अब खुश हैं। कम से कम फिर से वित्तमंत्रालय मिल गया।
अपने भाई चिदंबरम अलग परेशान। छोटी मोटी समस्या होती तो निपट लेते। आर्थिक मंदी ने नाक में दम कर रखा है। अब बढ़िया फैसला लिया है सोनिया ने। उनको हटा दिया। प्रोमोशन भी मिली और वित्त मंत्रालय की आफत से मुक्ति भी मिल गई।
सबसे ज्यादा परेशान तो चीनी माफिया शिवराज पाटिल थे। बढ़िया धंधा पानी चल रहा था। बुढ़उती में परेशान कर दिया इस सोनिया ने। वे तो इसलिए उनके पांव पखारते थे कि धंधे में कोई सरकारी अधिकारी खलल न डाले। लेकिन ये क्या? गृहमंत्री बनाकर मुसीबत में डाल दिया। अब कहां फाइव स्टार होटल की रंगरेलियां और कहां हर विस्फोट पर उठते सवाल? कभी कभी तो बेचारे को रोना आता था कि नींद हराम कर रखी है इस विभाग ने।अब तीन के तीनों खुश हैं। देश जाए भाड़ में...

गंदी राजनीति की एक और मिसाल- आईएसआई के चीफ को बुलाना, गृहमंत्री का इस्तीफा देना

धांसू राजनीतिग्य हैं ये कांग्रेस वाले। आखिर इतना लंबा इतिहास जो है। दिल्ली के चुनाव को किस तरह से मैनेज किया इन सभों ने। दिल्ली के चुनाव को ध्यान में रखकर ये खबर इस्लामाबाद से प्लान कराई गई कि भारत के प्रधानमंत्री ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष से फोन कर आईएसआई के मुखिया को भारत भेजने की मांग की और यह आग्रह पाकिस्तान ने स्वीकार भी कर लिया। कोशिश की गई है कि जनता की थू-थू से थोड़ा बचा जा सके। और हुआ भी यही, इधर आधी वोटिंग भी नहीं हुई थी कि पाकिस्तान से खबर आई कि वे आईएसआई के चीफ को नहीं भेज रहे हैं। उसके बाद से ही भारत के प्रधानमंत्री के मुंह में ताला लग गया है। अब उन्होंने गृहमंत्री से इस्तीफा ले लिया। अलग खबर चल पड़ी। पाकिस्तान वाला धारावाहिक दब गया। अगर कोई पूछे भी कि मनमोहन भाई, वो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री तो आपकी बात मानता ही नहीं, अब क्या करेंगे? तो स्पष्ट रूप से कह देंगे, ऐसा तो हमने कुछ कहा ही नहीं। मीडिया ने ऐसा भ्रम फैलाया कि मैने पाक प्रधानमंत्री से आईएसआई के चीफ को भेजने को कहा था।

Tuesday, November 4, 2008

राज ठाकरे जी, आप यूपी-बिहार की जनता की मदद करें... यहां के नेताओं को पीटने में

अब इसमें कोई संदेह नहीं रहा कि आप बहुत महान नेता हैं। महाराष्ट्र की रक्षा करते हैं, यूपी और बिहार या कहें उत्तर भारत के ठेले खोमचे वालों, रिक्शेवालों को पीटकर। हमें आपकी मदद चाहिए। हमें यूपी-बिहार के नेताओं को पीटना है।

ये हमारे लिए कुछ नहीं कर सकते। इनके पास प्रदेश के विकास की कोई योजना नहीं है। रोजगार के अवसर कुछ खास प्रदेशों के कुछ बड़े शहरों तक सिमटते गए। और हमारे नेता- चाहे मुलायम-राजनाथ-मायावती हों या नीतीश-लालू-रामविलास, किसी ने अपने प्रदेश में कृषि के विकास के बारे में नहीं सोचा। वहां का किसान आलू, लहसुन, गन्ना, लीची, आम, दूध... आदि, आदि सब कुछ उपजाने को तैयार है। उपजाता भी है। लेकिन इन सरकारों के पास व्यावसायिक खेती के क्षेत्रवार विभाजन, यानी किस इलाके में क्या उपजाया जाए, किस जिले में टमाटर उपजाया जाए और वहां उसके संरक्षण और प्रासेसिंग प्लांट, बाजार की व्यवस्था कर दी जाए- ऐसी योजना नहीं है।

बिहार के नेता तो ठीक हैं। केंद्र में भी आपके लोगों द्वारा पिटाई के खिलाफ कम से कम आवाज उठाते हैं। ठीक है कि आप दबाव में न आकर पिटाई जारी रखे हैं क्योंकि आपके चाचा ने आपको अपने उत्तराधिकार से बेदखल कर दिया है, तो अब अपना कुछ राजनीतिक धंधा तो चमकाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही है। ठीक ही कर रहे हैं। बिहार के नेताओं का रोना-पीटना सुनकर आपने उत्तर भारतीयों की पिटाई की कुछ स्पीड कम कर दी है, यह खुशी की बात है।

लेकिन यूपी के नेता तो कुछ भी करने में सक्षम नहीं हैं, सब के सब निपनिया हैं। निपनिया शब्द उनके लिए होता है, जिनको कोई लाज शर्म न हो। राजनाथ सिंह को देख लीजिए। पता नहीं कहां से टपके हैं। भाजपा के अध्यक्ष बन गए। जुबान ही नहीं खुल रही है, जबकि बिहार की तुलना में आपके लोगों ने उत्तर प्रदेश के तीन गुना लोगों को मार डाला है।

सही कहें तो उत्तर प्रदेश कानूनी रूप से नहीं तो व्यावहारिक रूप से पूरी तरह विभाजित है। लखनऊ में पिछले १५-२० साल से सत्ता में आ रहे नेता पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं। वे कभी पूर्वी उत्तर प्रदेश के बारे में सोचते नहीं। उन्हें केवल उनके वोट से मतलब होता है।

अब आप ही से एक आस बची है। ऐसे निकम्मे और विध्वंसक नेताओं से आप ही यूपी और बिहार के लोगों को बचा सकते हैं। आप हमारी मदद करें। हम इन निकम्मे नेताओं को पीटना चाहते हैं। हमी लोग हैं, जो देश और दुनिया में जाकर नौकरी करते हैं और उन प्रदेशों को चमका देते हैं, लेकिन अपने प्रदेश में भैंस पालकर दूध भी नहीं पैदा कर सकते। दूध से बने पदार्थ भी हम दूसरे राज्यों से लेते हैं। आपसे अनुरोध है कि इन गरीब ठेले-खोमचे और रिक्शावालों को पीटने की बजाय हमारा साथ ले लें। हमारे नेताओं को पीटना शुरू कर दें। पूरे देश के नेता बन जाएंगे।

राज ठाकरे जी, शायद आप भूल गए हैं कि आप भारतीय हैं और भारत के नेता बन सकते हैं। लेकिन हम आपको भारत का नेता बनाएंगे, जो महाराष्ट्र की तुलना में हर लिहाज से बड़ा है।

Sunday, November 2, 2008

आग से आग नहीं बुझती (हरिवंश जी का क्रांतिकारी मैराथन लेख)

आप छात्रों को शायद अपना इतिहास मालूम हो। आप उदारीकरण के आसपास या बाद की पौध हैं। उदारीकरण के पहले राजनीति विचारों, सिद्धांतों और वसूलों से संचालित होती थी। उदारीकरण के बाद की राजनीति, आर्थिक सवालों, प्रगति, विकास और बिजनेस के आसपास घूम रही है। यह विचार की राजनीति के दिनों का नारा है, 'जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है।' इस नारे में आपकी ताकत की कहानी लिखी हुई है। याद करिए, बिहार में '60 के दशक में पटना में छात्रों पर पहला गोलीकांड हुआ। देशव्यापी प्रतिक्रिया हुई। महामाया बाबू ने छात्रों को जिगर का टुकडा कह आकाश पर पहुंचा दिया। फिर आया '74 का आंदोलन। इस आंदोलन ने देश की राजनीति की सूरत ही बदल दी। आंदोलन का लंबा सिलसिला है। फिर भी हिंदी प्रदेश अपनी पीडा और बदहाली से मुक्ति नहीं पा सके। इतिहास का सबक यही बताता है कि आपके इस तोड़फोड़ और विरोध आंदोलन से भी कुछ हासिल नहीं होनेवाला।ऐसा नहीं है कि '74 के पहले बिहार, उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ भेदभाव नहीं होता था। 1980 के आसपास महाराष्ट्र के जानेमाने विचारक और संपादक माधव गडकरी ने तीखे सवाल उठाये थे, जिनका आशय था कि हिंदी भाषी पिछडे़ राज्यों के विकास का खर्च अन्य राज्य क्यों उठाएं। क्यों बंबई या महाराष्ट्र आयकर से अधिक कमायें और सेंट्रल पूल में पैसा दें। क्यों केंद्र से संसाधनों का बंटवारा गरीबी के आधार पर हो। और महाराष्ट्र का कमाया अधिक धन केंद्र के रास्ते हिंदी पट्टी के गरीब राज्यों के पास क्यों जाये। यह प्रश्न वैसा ही था जैसे परिवार में एक कमाऊ भाई, दूसरे बेरोजगार या कम कमानेवाले से पूछता है कि आपका बोझ हम कब तक उठाएं।
आज राज ठाकरे हैं। कल वहां बाल ठाकरे थे। वह '60 के दशक में मुबंई से दक्षिण भारतीयों को भगाते थे। इसी दौर में दत्ता सामंत, यूनियन नेता हुए, जो मराठावाद की ही बात करते थे। पर जब बाल ठाकरे ने दक्षिण भारतीय भगाओ का नारा दिया और वहां उपद्रव हुए, तब दक्षिण के किसी राज्य में प्रतिक्रिया में हिंसा नहीं हुई। दक्षिण के राज्यों ने क्या किया। इसके बाद दक्षिण के राज्यों ने अपनी ऊर्जा विकास में झोंक दी। सड़कें, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, प्रबंधन के संस्थान और नये-नये उद्योग धंधे। आज हालत यह है कि हैदराबाद, बेंगलुरू, चेन्नई वगैरह कई अर्थों में मुंबई से आगे निकल गये हैं। दक्षिण का कम्युनिस्ट केरल, आज देंग शियाओ पेंग के रास्ते पर है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, खुद पूंजीवादी निवेशक की भूमिका में है। एक कर्नाटक अकेले, आइटी उद्योग से आज 70 हजार करोड अर्जित कर रहा है। दक्षिण सर्वश्रेष्ठ अस्पतालों की राजधानी बन गया है।

दक्षिण के एयरपोर्टों पर सीधे दुनिया के महत्वपूर्ण देशों से विमान उड़ान भरते हैं। एक-एक राज्य में छह-आठ एयरपोर्ट हैं। जहाज से जुडे हैं। हैदाराबाद, बेंगलुरू के हवाईअड्डे विश्व स्तर के हैं। चार लेन - छह लेन की सड़कें हैं। बेहतर सुविधाएं हैं। बाल ठाकरे की शिवसेना ने मद्रासी भगाओ (सभी दक्षिण भारतीयों को मद्रासी कह कर ही संबोधित करते थे, जैसे सभी हिंदी भाषियों को बिहारी या भैया कह कर संबोधित करते हैं) नारा दिया, तो दक्षिण के राज्यों ने ट्रेन जलाकर, अपना नुकसान कर, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारकर जवाब नहीं दिया। क्या बिहार में ट्रेन जलाने, उपद्रव करने, अपना नुकसान करने से राज ठाकरे सुधर जाएंगे? क्या वह ऐसे इंसान हैं, जिनकी आत्मा है? या संवेदनशीलता है? बिहार के आक्रोश की यह तात्कालिक प्रतिक्रिया है। यह श्मशान वैराग्य जैसा है। जैसे श्मशान में चिता जलते देख, वैराग्य बोध होता है। संसार छोड़ने का मानस बनता है। पर श्मशान से बाहर होते ही वहीं प्रपंच, राग-द्वेष। दुनिया के छल-प्रपंच। ऐसा कहा जाता है कि श्मशान वैराग्य भाव, मनुष्य में ठहर जाए तो वह जीवन में संकीर्णताओं से ऊपर उठ जाएगा। उसका जीवन तर जाएगा। बिहार में हो रही हिंसा, बंद और तोड़फोड़ अंग्रेजी में कहें, तो क्रिएटिव रिसपांड आफ द क्राइसिस नहीं है। हम बिहारी, झारखंडी या हिंदी भाषी, गंभीर संकट का रचनात्मक जवाब कैसे दे सकते हैं।अपना नुकसान कर हम अपनी कायरता का परिचय दे रहे हैं। अपनी पौरुषहीनता दिखा रहे हैं। अगर सचमुच हम दुखी, आहत और अपमानित हैं, तो दुख, पीड़ा और अपमान को एक अद-भुत सृजनात्मक ऊर्जा में बदल सकते हैं। चुनौतियों को स्वीकार करने की पौरुष दृष्टि ही इतिहास बनाती है। इस घटना से सबक लेकर हम हिंदीभाषी भविष्य का इतिहास बना सकते हैं। जिस तरह दक्षिण ने अपने आर्थिक चमत्कार से दुनिया को स्तब्ध कर दिया है। बेंगलुरू को संसार में दूसरा सिलिकन वैली कहा जा रहा है। उससे बेहतर चमत्कार और काम, हम कर सकते हैं। क्या आप छात्रों को मालूम है, कि हिंदीभाषी राज्यों के लड़के दक्षिण के इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं? हमारे उत्तर के पैसे से दक्षिण के बेहतर अस्पताल, बेहतर इंजीनियरिंग कॉलेज, उत्कृष्ट संस्थाएं चल रही हैं। हजारों करोड़ रुपये प्रतिवर्ष चिकित्सा, शिक्षा के मद में, उत्तर के गरीब राज्यों से देश के संपन्न राज्यों में जा रहे हैं। क्यों? क्योंकि हमारे यहां चिकित्सा, शिक्षा, इंजीनियरिंग वगैरह में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (उत्कृष्ट संस्थाएं) नहीं हैं। क्या हम ऐसी संस्थाओं को बनाने, गढ़ने और नींव रखने की बाढ़ नहीं ला सकते? अभियान नहीं चला सकते? नीतीश सरकार ने ऐतिहासिक काम किया है। लॉ, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, कृषि, मेडिकल वगैरह में बडे़ पैमाने पर बिहार सरकार ने संस्थाओं को शुरू किया है। इसके चमत्कारी असर कुछ वर्षों बाद दिखाई देंगे। पर ऐसी संस्थाओं की बाढ़ आ जाए, आप छात्र यह कोशिश नहीं कर सकते? बिहार के तीन नेता, आज देश में प्रभावी हैं। लालू प्रसाद, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार। आप छात्र बाध्य कर सकते हैं, इन तीनों नेताओं को। कैसे और किसलिए? आप बेचैन छात्र इनसे मिलिए और अनुरोध कीजिए। बिहार को गढ़ने और बनाने के सवाल पर, आप तीनों एक हो जाएं। आप तीनों नेता मिल जाएं, सिर्फ बिहार बनाने के सवाल पर, तो बिहार संवर जाएगा। इनसे गुजारिश करें कि आप तीनों के सौजन्य से बिहार में संस्थाओं की बौछार हो। आप छात्र सिर्फ यह एक काम करा दें, तो राज ठाकरे को जवाब मिल जाएगा। अशोक मेहता ने एक सिद्धांत गढा, 'पिछड़ी अर्थव्यवस्था की राजनीतिक अनिवार्यता'। इसी सिद्धांत पर आगे चलकर पीएसपी (पिपुल सोशलिस्ट पार्टी) का कांग्रेस में विलय हो गया। हमारे कहने का आशय यह नहीं कि लालूजी, रामविलास जी और नीतीशजी को आप युवा एक पार्टी में जाने को कहें बल्कि 'पिछडी अर्थव्यवस्था की राजनीतिक अनिवार्यता' के तहत बिहार के हितों के सवाल पर इन तीनों को एक साथ खडे़ होने के लिए आप विवश कर सकते हैं। यह याद रखिए कि कभी पटना मेडिकल कॉलेज, भारत के सर्वश्रेष्ठ मेडिकल कॉलेजों में से एक था। देश में जितने एफआरसीएस डॉक्टर थें, उनमें से आधे से अधिक तब सिर्फ पटना मेडिकल कॉलेज में थे। पर आज क्या हालत है, उस संस्था की? साइंस कालेज जैसी संस्थाएं थीं। पर क्या स्थिति है संस्थाओं और अध्यापकों की? रोज नारे, धरने, प्रदर्शन, जुलूस। आप छात्र अगर शिक्षण संस्थाओं को सर्वश्रेष्ठ बनाने का अभियान चलाएं और इसके लिए सख्त से सख्त कदम उठाने के लिए सरकार को विवश करें, तो हालात बदल जाएंगे। आज की दुनिया में नौकरियों की कमी नहीं। योग्य और क्षमतावान युवकों की कमी है। मेरे युवा मित्र, इरफान और कौशल (जो आइआइएम, अहमदाबाद से पढे़ हैं और बड़ी नौकरियों के प्रस्ताव छोड़ कर बिहार में काम कर रहे हैं) कहते हैं, कि अगर दक्ष, पढे़-लिखे युवा मिलें, तो सैकड़ों नौकरी देने के लिए हम तैयार हैं। मेरे मित्र संतोष झा, मिकेंजी की एक रिपोर्ट का हवाला देते हैं, जिसमें कहा गया है कि भारतीय शिक्षण संस्थाओं से अनइम्प्लायबल यूथ (नौकरी के अयोग्य युवा) निकल रहे हैं। इस फ़‍िज़ा को आप छात्र बदलिए। करोड़ों-अरबों रुपये शिक्षण संस्थाओं पर खर्च हो रहे हैं। अध्यापकों के वेतन-भत्तों में भारी इजाफा हुआ है, पर क्वालिटी एजुकेशन क्यों खत्म हो गया? अगर जात-पात और पैरवी के व्याकरण से ही आप शिक्षण संस्थाओं को चलाना चाहते हैं, तो याद रखिए, इन संस्थाओं से लाखों अयोग्य, अकर्मण्य और अकुशल पढे़-लिखे युवा निकलेंगे और वे रोजगार के लिए दर-दर भटकेंगें, याचक के रूप में। जीवन का एक और सिद्धांत गांठ बांध लीजिए - याचक अपमानित होने के लिए ही होता है। अपने अंदर की प्रतिभा, ईमानदारी, कठोर श्रम, निवेशक को जगाइए और दाता की भूमिका में आइए। आपको देश ढूंढेगा और पूजेगा। हम कहां-कहां और कब-कब और कितने आंदोलन करेंगे? बिहार बंद करेंगे? ट्रेनें जलाएंगे? इस हकीकत से मुंह मत चुराइए कि आज हिंदी भाषी राज्य लेबर सप्लायर राज्यों के रूप में ही जाने जाते हैं। मत भूलिए, असम और पूर्वोत्तर में कई बार बिहारियों पर हमले हुए, भगाये गये, वहां कर्फ्यू लगा। शिविरों में रहना पड़ा। अपमान, तिरस्कार और भय के बीच। जम्मू-कश्मीर में रेल लाइन बिछाने में सुरंगों में विस्फोट हो या आतंकवादी विस्फोट हो, बिहारी, झारखंडी या हिंदीभाषी मजदूर ही मारे जाते हैं। पंजाब और हरियाणा के खेतों में या फार्म हाउसों में, कितनी जिल्लत की ज़‍िंदगी झारखंडी-बिहारी मजदूर जीते हैं, आप जानते हैं? गुजरात हो या राजस्थान या दक्षिण के राज्य, झारखंडी-बिहारी मजदूरों की दुर्दशा आप देख सकते हैं। याद करिए, दो साल पहले का दिल्ली का वह दृश्य। छठ के अवसर पर बिहार आ रहे थे। स्टेशन पर भगदड़ हुई। दर्जनों बिहारी मर गये। दब-कुचल कर। भगदड़ में। हाल में असम में जो उत्पात हुआ उसमें झारखंड से गये लोगों के साथ क्या सुलूक हुआ? अपमान, तिरस्कार का एक लंबा विवरण है। क्या-क्या गिनाएं? पर तोड़फोड़, आगजनी, उत्पात सबसे आसान है। सबसे कठिन है, सृजन और निर्माण। अपने राजनेताओं को बाध्य करिए कि वे सृजन और निर्माण के कामों में राजनीति न करें। सरकार चाहे जिसकी हो, पर अगर वह शिक्षा संस्थाओं को दुरुस्त करने, सड़क बनाने, बिजली ठीक करने जैसे बुनियादी कामों में कठोर कदम उठाती है, तो उस पर राजनीति बंद कराइए। अगर इन संस्थानों में कमियां हैं, तो सरकार के कठोर कदमों के पक्ष में खडे़ होइए। अनावश्यक यूनियनबाजी, नेतागिरी और हर चीज में राजनीतिक पेंच लगाने की बिहारी संस्कृति के खिलाफ विद्रोह करिए। क्यों एक बिहारी बाहर जाकर अपने काम, उपलब्धि और श्रम के लिए गौरव पाता है, पर बिहार में वही फिसड्डी हो जाता है। क्योंकि बिहार की कार्यशैली, प्रवृत्ति और चिंतन में कहीं गंभीर त्रुटि है। इस त्रुटि को दूर करना अपमान की आग में झुलस रहे युवाओं की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। बिहार में वह माहौल, कार्यसंस्कृति बनाइए कि हम बिहारी होने पर गर्व करें। बिना रिजर्वेशन के ट्रेन में घुसना, टिकट न लेना, उजड्डता दिखाना, मारपीट करना, परीक्षा केंद्रों पर हजारों की संख्या में पहुंच कर चिट कराना, ऐसी आदतों को छोड़ने का हम सामूहिक संकल्प लें, क्योंकि इनसे मुक्ति के बाद ही बिहार के लिए नया अध्याय शुरू होगा। स्मरण करिए बिहार के इतिहास को।

कई हजार वर्षों पहले जब सूचना क्रांति नहीं हुई थी, चंद्रगुप्त मौर्य ने आधुनिक भारत की नींव रखी। सबसे बड़ा साम्राज्य खड़ा किया। अफगानिस्तान तक। चाणक्य दुनिया के गौरव के विषय बने। अशोक के करुणा के गीत आज भी गाये जाते हैं। नालंदा की सुगंध आज भी दुनिया में है। तब के बिहार से हम अगर आज प्रेरित हों, तो दुनिया में हमारी सुगंध फैलेगी।आप बिहारी, झारखंडी विद्यार्थियों से एक और निवेदन, याद रखिए देश के जिस किसी हिस्से में बिहारियों-झारखंडियों के साथ अपमान हुआ, वहां उनसे जाति नहीं पूछी गयी? बल्कि पहचान का एक ही फार्मूला है, बिहारी होना या झारखंडी होना या हिंदी पट्टी का होना। तो आप ऐसा ही माहौल बनाइए। यादव, भूमिहार, कुर्मी, राजपूत, ब्राह्मण, पासवान, आदिवासी, गैरआदिवासी या अन्य होने का नहीं? छात्रावासों में जातिगत मोर्चे तोड़ दीजिए। जाति के आधार पर अध्यापकों और नेताओं का समर्थन बंद करिए। काम करनेवाले और राज्य को आगे ले जानेवाले नेताओं के साथ खडे़ रहिए। जो नेता, विधायक इस बिहारीपन-झारखंडीपन के बीच बाधा बनें, उनके खिलाफ अभियान चलाइए। बिहार की राजनीति बिहार के लिए, झारखंड की राजनीति, झारखंड के लिए, कुछ ऐसी फ़‍िज़ा बनाइए, तब शायद बात बने।विचारों की राजनीति के दौर में भाषा के प्रति प्रबल आग्रह था, तब के लिए वह नारा भी ठीक था, हिंदी में सब कुछ। पर आज उदारीकरण के बाद की दुनिया में यह नारा बेमानी है। अंग्रेजी पढ़‍िए। चीन से सीखिए। आप जानते हैं, गुजरे चार-पांच वर्षों में चीन में सबसे लंबी लाइन किन दुकानों पर लगती थी? 2001 के बाद चीन में अंग्रेजी सीखने की भूख पैदा हुई और किताब की उन दुकानों पर मीलों लंबी कतारें लगने लगीं, जहां आक्सफोर्ड द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी-चीनी शब्दकोश उपलब्ध था। चीन ने यह प्रेरणा भारत से ली। 2000 के आसपास चीन के प्रधानमंत्री ने भारत आकर देखा। सॉफ्टवेयर उद्योग में भारत दुनिया में क्यों अग्रणी है? तब उन्हें बेंगलुरू देखकर लगा कि भारतीय युवा अंग्रेजी जानते हैं। इस कारण भारत साफ्टवेयर में चीन से आगे है। चीन ने भारत से सबक लेकर अपनी कमी को पहचान कर सृजनात्मक अभियान चलाया, अंग्रेजी सीखने का, ताकि चीन विश्वताकत बन सके। क्या हम बिहारी-झारखंडी या हिंदी पट्टी के लोग चीन के इस प्रसंग से सबक ले सकते हैं? अपने नेताओं और राजनीतिज्ञों को बाध्य करिए कि वे शिक्षा में अंग्रेजी को महत्व दिलाएं, उत्कृष्ट संस्थाओं को आमंत्रित करें। मेरे एक मित्र हैं, संजयजी। देशकाल संस्था के सचिव। इस संस्था ने मुसहरों-दलितों में उल्लेखनीय काम किया है। वह कहते हैं, मुसहर लोग जो खुद पढे़ नहीं है, शिक्षा के तीन प्रतीक बताते हैं -


(1) शहर(2) टेक्नोलाजी, और(3) इंग्लिशउन्होंने जेएनयू विश्वविद्यालय दिल्ली की एक दलित छात्रा का अनुभव बताया। उसने कहा - मोबाइल (टेक्नोलॉजी), अंग्रेजी, वैश्विक दृष्टि (ग्लोबलाइजेशन) और शहर (अरबनाइजेशन) का असर नहीं होता तो मैं दलित लड़की जेएनयू नहीं पहुंचती। दलित चिंतक चंद्रभान बार-बार कह-लिख रहे हैं, अंग्रेजी, पूंजीवाद और शहरीकरण (अरबनाइजेशन) ही दलितों के उद्धार मार्ग हैं। इसलिए अंग्रेजी हिंदी पट्टी की शिक्षा में अनिवार्य हो।दूसरा मसला, शहरीकरण (अरबनाइजेशन) का है। हाल में सिंगापुर में एक आयोजन हुआ भारत को लेकर। मिनी प्रवासी भारतीय दिवस। इसमें सिंगापुर के मिनिस्टर मेंटर (दो-दो बार पूर्व प्रधानमंत्री रहें और विश्‍व के चर्चित श्रेष्ठ नेताओं में से एक) ने कहा, भारत तेजी से प्रगति कर सकता है, पर उसे कठोर कदम उठाने पड़ेंगे। उन्होंने कहा, चीन आज एक करोड़ लोगों को प्रतिवर्ष गांवों से शहरों में ले जा रहा है। शहरीकरण की प्रक्रिया तेज कर गांवों को शहर बना रहा है। उनके अनुसार, अगर भारत सुपर हाइवे, सुपरफास्ट ट्रेनें, बडे़-बडे़ हवाई अड्डे और बडे़ निमार्ण नहीं करता, तो वह इस दौर में पीछे छूट जाएगा। फिर उसके भाग्य होगा, खोये अवसरों की कहानी। ली ने पूछा कि सुकरात और ग्रीक के बुद्धिजीवी गांवों में नहीं, शहरों में रहते थे। गांव के स्कूलों को बेहतर बनाइए। देश के शिक्षण संस्थाओं को श्रेष्ठ बनाइए। ली की दृष्टि में भारत इसी रास्ते महान और बड़ा बन सकता है। ली ने दो हिस्से में अपनी आत्मकथा लिखी है। नेहरू जमाने के भारत का अदभुत वर्णन है। भारत ने कैसे अवसर खोये, इसका वृत्तांत है। ली, जीते जी किंवदंती बन गये हैं। उनकी आत्मकथा को, उन भारतीयों को ज़रूर पढ़ना चाहिए, जो भारत को बनाना चाहते हैं। अंत में महाराष्ट्र के ही मधु लिमये को उद्धृत करना चाहूंगा। चरित्र, सच्चाई, कार्य क्षमता और उद्यमशीलता के अभाव में आप कैसे सफल हो सकते हैं। आलस्य, समय की पाबंदी, अच्छी नीयत जिम्मेदार नागरिक के लिए आवश्यक सदगुणों का संपोषण आदि के बिना आधुनिक तकनीक के पीछे भागना मूर्खता है। वह कहते हैं, बेईमानी, भ्रष्ट आचरण, आलस्य, अनास्था, इन दुर्गुणों की दवा कंप्यूटर नहीं है। यह उन्होंने राजीव राज के दौरान लिखा था। अगर हम सचमुच हिंदी पट्टी के राज्यों का कायापलट करना चाहते हैं तो क्या हम इन चीजों से प्रेरणा?युवा मित्रो, जीवन में कोई शार्टकट नहीं होता। परिश्रम, ईमानदारी, तप और त्याग का विकल्प, धूर्तता, बेईमानी, आलस्य और कामचोरी नहीं। यह दर्शन अपने इलाके के घर-घर तक पहुंचाइए। कहावत है, 'सूर्य अस्त, झारखंड मस्त'। दारू, शराब और मुफ्तखोरी के खिलाफ आप युवा ही अभियान चला सकते हैं। इतिहास पलटिए और देखिए, बंगाल और महाराष्ट्र में आजादी के पहले पुनर्जागरण (रेनेसां) आंदोलन चले, समाज सुधार आंदोलन। हिंदी पट्टी में आज ऐसे समाज सुधार के आंदोलन चाहिए। रेनेसां की तलाश में है, हिंदी पट्टी। आप युवा ही इस ऐतिहासिक भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं। बिना श्रम किये, जीवन में कुछ न स्वीकारें। यह दर्शन आप युवा ही समाज से मनवा सकते हैं। बेंजामिन फ्रेंकलिन का एक उद्धरण याद रखिए। एक युवा के जीवन में सबसे अंधकार का क्षण या दौर वह होता है, जब वह अपार धन की कामना करता है, बिना श्रम किये, बिना अर्जित किये। आज की राजनीति क्या सीख देती है? सत्ता, रुतबा और पैसा कमाना। इस शार्टकट से हिंदी समाज को निकाले बिना बात नहीं बनेगी।

आप हालात समझिए। पहला तथ्य। राज ठाकरे को हीरो मत बनाइए। कांग्रेस और शरद पवार की पार्टी, एनसीपी ने एक उद्देश्य के तहत राज ठाकरे को आगे बढ़ाया है। उसी तरह जैसे संजय गांधी ने भिंडरावाले को बढ़ाया था। कांग्रेस की चाल है कि आगामी चुनावों में भाजपा एवं बाल ठाकरे की शिव सेना को अपदस्थ कर दें। इसलिए उन्होंने राज ठाकरे को आगे बढ़ाया। आप युवा इस ख़तरनाक राजनीति को समझिए। अपने स्वार्थ और वोट के लिए पार्टियां देश बेचने पर उतारू हैं। पहले नेता होते थे। अब दलाल और बिचौलिये नेता बनते हैं। उनके सामने देश की एकता, अखंडता का सपना नहीं है। पैसा लूटना वे अपना धर्म समझते हैं। और इस काम के लिए उन्हें गद्दी चाहिए। गद्दी के लिए वे कोई भी षड्यंत्र-तिकड़म कर सकते हैं। महाराष्ट्र में यही षड्यंत्र हुआ है। क्या उस आग में आप युवा भी घी डालेंगे? यह सिर्फ आपकी जानकारी के लिए। केंद्र में कांग्रेस चाहती तो नेशनल सिक्यूरिटी एक्ट के तहत राज ठाकरे को गिरफ्तार कर सकती थी। यह कदम उठाने में गृह मंत्रालय सक्षम है। एक आदमी जिसके पिछले एक साल के बयानों से लगातार उपद्रव हो रहे हैं, दंगे हो रहे हैं, करोड़ों का नुकसान हो रहा है, जानें जा रही हैं, देश में विषाक्त माहौल बन रहा है, क्या उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी? फिर क्यों हैं सरकारें? इस राज ठाकरे नाम के आदमी का सबसे गंभीर अपराध है, देश की एकता, अखंडता पर सीधे प्रहार। भयहीन आचरण। पर उसके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं। इससे केंद्र सरकार की मंशा स्पष्ट है।

महाराष्ट्र सरकार का गणित समझिए। वहां के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे हैं। कांग्रेस का एक गुट, उन्हें हटाना चाहता है। वह चाहते हैं कि यह मुद्दा जीवित रहे ताकि उनकी कुर्सी बची रहे। महाराष्ट्र की पुलिस कभी स्काटलैंड की पुलिस की तरह सक्षम और चुस्त-दुरुस्त मानी जाती थी। पर राज ठाकरे प्रकरण ने साबित कर दिया कि राजनीति ने कैसे एक बेहतर पुलिस संस्था को अक्षम और पंगु बना दिया। वरना महाराष्ट्र में मकोका लागू है। क्या राज ठाकरे उसके तहत गिरफ्तार नहीं किये जा सकते थे?सबसे स्तब्धकारी घटना और गवर्नेंस के खत्म हो जाने का सबूत एक और है। महाराष्ट्र पुलिस ने राज ठाकरे जैसे देशतोड़क के खिलाफ सारी जमानती धाराएं लगायीं? क्यों? इससे सरकार का इंटेंशन (इरादा) साफ होता है। राज ठाकरे के समर्थक उत्पाती पहले पकड़ लिये गये होते तो हालात भिन्न होते। कोर्ट में उनकी पेशी के वक्त पुलिस पहले सजग होती, धारा 144 होती, तो हिंसा नहीं होती। पर वोट और सत्ता की राजनीति तो खून की प्यासी है। इस खूनी राजनीति के खिलाफ अपना खून बहा कर आप क्या कर लेंगे? आप युवा इस तरह के षड्यंत्र की राजनीति का मर्म समझिए और ऐसी राजनीति के खिलाफ उतरिए। रचनात्मक ढंग से। ऐसी ताकतों को चुनावों में पाठ पढाने की दृष्टि से। राष्ट्रीय नेतृत्व ने महाराष्ट्र में जो कुछ हिंदी भाषियों के साथ हुआ या हो रहा है, उस पर स्तब्धकारी आचरण किया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्पी पीड़ा पहुंचानेवाली है।

बिहार में प्रलयंकारी बाढ़ आती है, तब भी बिहार के लोगों को केंद्र के नेताओं को कुंभकरण की नींद से जगाना पड़ता है। मुंबई में एक बारिश होती है, तो राहत के लिए प्रधानमंत्री 3-4 करोड़ रुपये दे देते हैं। पर बिहार की विनाशकारी बाढ़ पर केंद्र तब उदार होता है, जब राज्य की आवाज़ उठती है और केंद्र में बैठे बिहार के नेता ध्यान दिलाते हैं। मुंबई में हुई घटना असाधारण है। देश के भविष्य की दृष्टि से। पर इसके लिए विशेष कैबिनेट की बैठक नहीं। विशेष प्रस्ताव नहीं। तत्काल आग बुझाने के लिए अलग प्रयास नहीं। केंद्र की कोई उच्चस्तरीय टीम मुंबई नहीं गयी। देश को एक रखने का दायित्व जिस केंद्र पर है, उसका यह आचरण? पिछले 60 वर्षों में बिहार और झारखंड ने खनिज के मामले में देश को कितना दिया है, क्या इसका हिसाब कोई देगा? फ्रेट इक्वलाइजेशन के मामले में लाखों करोड़ों का भेदभाव बिहार-झारखंड से हुआ होगा। बिहार और झारखंड से निकले सस्ते श्रम और बहुमूल्य खनिज से देश के विभिन्न हिस्सों में औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया से संपन्नता आयी। क्या बिहार की इस कीमत को कोई चुकायेगा? आज जब नीतीश कुमार बिहार के साथ हुए एतिहासिक भेदभाव का सवाल उठाते हैं तो बिहार के सभी दल एवं जनता एक स्वर में बोले... तब इस अंधेरी सुरंग से बिहार के लिए एक राह निकलेगी।

यह सही है कि हिंदीभाषी राज्य विकास के बस से छूट गये हैं। अगर देश ऐसे छूटे राज्यों के प्रति सदाशयता का परिचय नहीं देगा, तो क्षेत्रीय विस्फोट की इस आग को रोक पाना कठिन होगा। यह कैसे संभव है कि देश के कुछ हिस्से या राज्य संपन्नता के टापू बन जाएंगे और अन्य राज्य भूख और गरीबी से तबाह हो कर मूक दर्शक बने रहेंगे। क्षेत्रीय विषमता की यह आग देश को ले डूबेगी। 1995 के आसपास पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने बढ़ती क्षेत्रीय विषमता पर एक लंबा (लगभग 30-40 पेजों का) लेख लिखा था और आगाह किया था कि हम देश को किधर ले जा रहे हैं। अंततः क्षेत्रीय विषमता जैसे गंभीर सवालों को कौन एड्रेस (सुलझाना) करेगा? केंद्र सरकार ही न या संसद? केंद्र सरकार, संसद, योजना आयोग और राजनीतिक पार्टियां ही न। पर कहां पहुंच गयी है हमारी संसद? क्या इन विषयों पर सचमुच कोई डीबेट हो रहा है? क्या आचरण रह गया है हमारे सांसदों, राजनीतिक दलों और सरकारों का? अगर आप हिंदी पट्टी के युवा सचमुच इस देश को और अपने राज्यों को विकास के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं, खुद आत्सम्मान के साथ जीना चाहते हैं, निजी जीवन में प्रगति और विकास चाहते हैं तो आपको सुनिश्चित करना होगा कि राजनीति का चाल, चरित्र और चेहरा बदले? ऐसा माहौल बनाइए कि केंद्र की राजनीति (चाहे सरकार किसी पक्ष की हो) भारत के पिछडे़ राज्यों और क्षेत्रीय असंतुलन के सवालों पर अलग नीति बनाये। आप युवा राजनीति की धारा बदल सकते हैं।1974 में हुए छात्र आंदोलन के एक तथ्य से आप परिचित होंगे। 1972 के आसपास गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन हुआ। जेपी को इस छात्र आंदोलन में एक नयी रोशनी दिखाई दी। वह गुजरात गये। फिर इस आंदोलन पर एक लंबा लेख लिखा। आप छात्र जानते हैं, यह आंदोलन गुजरात के मोरवी इंजीनियरिंग कालेज के एक मेस से शुरू हुआ। उस छात्रावास में रह रहे छात्रों को लगा मेस में खाने का मासिक शुल्क अचानक बढ़ गया है और इस कीमत बढ़ोतरी के पीछे राजनीतिक भ्रष्टाचार है। छात्रों में आक्रोश पैदा हुआ और एक छात्रावास के मेस से निकली इस आग की लपटों में अंततः पहली बार केंद्र से कांग्रेस का सफाया हो गया। आप बिहारी और झारखंडी छात्रों में अगर सचमुच आग है तो अपने राज्य के नवनिर्माण के सृजन के लिए उस आग की आंच को इस्तेमाल करिए। लोकसभा के चुनाव जल्द ही होने वाले हैं। सारे राजनीतिक दलों को बाध्य करिए कि चुनाव के पहले आपके राज्य के विकास का एजेंडा लेकर जनता के पास आएं। मांग करिए कि राज्य में उद्योग लगाने को, टैक्स होलीडे के तहत पैकेज दिया जाए। एजुकेशन हब की परिकल्पना लेकर दल चुनाव में उतरे। बिहार पंजाब से भी ज्यादा उपजाऊ है, पर कृषि आधारति चीजों का विकास का प्रयास नहीं हुआ। इसके ब्लू प्रिंट की मांग करिए। 40 जिलों में 40 बेहतरीन अलग-अलग शिक्षा के उत्कृष्ट इंस्टीटूशन की परिकल्पना करिए। चौड़ी और बेहतर सड़कों के लिए अभियान चलाइए। अपने बीच से नये उद्यमियों को गढ़‍िए। कानून और व्यवस्था के अनुसार सभ्य समाज गढ़ने का अभियान चलाइए। यही रास्ता बिहार को फिर शिखर पर ले जा सकता है।लगभग 40 वर्षों पहले प्रो गुन्नार मिर्डल ने एशियन ड्रामा पुस्तक लिखी, जिस पर उन्हें अर्थशास्त्र का नोबल पुरस्कार मिला। तब उन्होंने कहा था कि करप्शन ने भारत को तबाह कर दिया है। आप छात्र गौर करिए, भ्रष्टाचार ने बिहार को कहां पहुंचा दिया? ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार देश के भ्रष्ट राज्यों में से एक। कांग्रेस राज्य में यह परंपरा शुरू हुई। लोग सड़क चुराने लगे, बांध चुराने लगे और यह परंपरा चलती रही। भ्रष्टाचार के खिलाफ चौतरफा हमले में सक्रिय हुई यह बिहार सरकार भ्रष्टाचारियों को धर पकड़ रही है। ऐसा माहौल बनाइए कि भ्रष्टाचारी पकडे़ जाएं। दंडित हों। पर इतना ही काफी नहीं है। भ्रष्टाचार नियंत्रण अब अकेले सिर्फ सरकार के बूते की बात नहीं है। भ्रष्ट लोगों के खिलाफ समाज में एक नफरत और घृणा का माहौल पैदा करिए। भ्रष्टाचारी समाज में पूज्य न बने। आप में अगर सचमुच आग है, पौरुष है तो राजनीतिज्ञों को एकाउंटेबल बनाने के अभियान में लगिए। राजनीति में मूल्य और आदर्श स्थापित करने के अभियान में जुटिए।

आप जानते हैं डॉ वर्गीस कुरियन को? एक आदर्शवादी केरल के युवा ने दूध उत्पादन और को-ऑपरेटिव के क्षेत्र में गुजरात को दुनिया के शिखर पर पहुंचा दिया। उनके जीवन का निचोड़ याद रखिए। हम जो कुछ सही करते हैं वही नैतिकता है। पर जो चीज हमारे सोचने की प्रक्रिया को संचालित करती है, वह इथिक्स (मूल्य) है। हम जैसे जीते हैं, वह नैतिकता है। जैसा सोचते है और अपना बचाव करते हैं, वही इथिक्स है। हिंदी पट्टी के समाज और राजनीति को आप युवा ही मॉरल और इथिकल बना सकते हैं।आप युवाओं ने नाम सुना होगा, पीटर ड्रकर का। आधुनिक प्रबंधन में दुनिया के सबसे बडे़ नामों में से एक। पहले जैसे पूंजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद, आकर्षण और विचार के केंद्र थे, उसी तरह ग्लोबल दुनिया में इक्कीसवीं सदी के दौर में कंप्यूटर क्रांति और सूचना क्रांति के इस दौर में प्रबंधन सबसे आकर्षक और नयावाद बन गया है। राजनीति हो या उद्योग धंधा या विकास, श्रेष्ठ प्रबंधन कला ही किसी इंसान, समाज और व्यवस्था को शिखर पर ले जा सकती है। इसी प्रबंधनवाद के मार्क्स कहे जाते है, पीटर ड्रकर। एक जगह उन्होंने कहा है कि चीन को भारत पछाड़ सकता है, अगर वह टेक्नोलाजी में आगे रहे, सर्वश्रेष्ठ उच्चशिक्षा संस्थान बनाये और वर्ल्ड क्लास प्राइवेट सेक्टर विकसित करे। बिहार के शिक्षा संस्थानों में बौद्धिक श्रेष्ठता का माहौल नहीं रह गया है। क्या इसे हम दोबारा वापस कर पाएंगे? यह आप छात्र करा सकते हैं। सरकारें नहीं करा सकती। शिक्षा में यूनियनबाजी, नेतागीरी, चापलूसी, पैरवी, जातिवाद और संकीर्ण माहौल को आग लगा दीजिए और इस अग्नि-परीक्षा से एक नया बिहार निकलेगा।दुनिया के प्रख्यात कंसलटेंसी मिकेंजी एंड कंपनी की रिपोर्ट है कि इस बदलती दुनिया में रिटेल व्यवसाय, रेस्टूरेंटों और होटलों, हेल्थ सर्विस में बडे़ पैमाने पर अवसर पैदा होनेवाले हैं। क्या हम हिंदी पट्टी के लोग अपने यहां ऐसे संस्थान बना सकते हैं, जहां से ऐसे कुशल और प्रशिक्षित युवा निकलें जिनकी दुनिया में मांग हो? आज अरब के देशों में बडे़ पैमाने पर प्लंबर, राज मिस्त्री वगैरह की मांग है, सीखिए दुबई और खाड़ी के देशों से। वहां मुसलिम शासक हैं। पर हर धर्म, देश और राष्ट्रीयता के कुशल लोगों को छूट है कि वे आकर काम करें। आजादी से रहें। और उनकी इसी रणनीति ने खाड़ी देशों को कितना आगे पहुंचा दिया।

प्रकृति ने हिंदी पट्टी के इलाकों को उपजाऊ बनाया। जैसा मौसम दिया, वैसा शायद अन्यत्र न मिले। पर क्या हम इसका उपयोग कर पाते हैं? थामस एल फ्रीडमैन ने 2005 में संसार प्रसिद्ध पुस्तकें लिखी, द वर्ल्ड इज फ्लैट। पुस्तक की भूमिका में उन्होंने एक फ्रेज (मुहावरे) का इस्तेमाल किया है, जो भारत देखकर उन्हें लगा, न्यू वर्ल्ड, द ओल्ड वर्ल्ड आर द नेक्सट वर्ल्ड (नया संसार, पुराना संसार या भविष्य का संसार)। आप बिहारी छात्र भविष्य का संसार गढ़‍िए। दुनिया आपके कदमों पर होगी। अक्सर बिहार के कुछ दृश्य मेरे जेहन में उभरते हैं। पेड़ों के नीचे बैठ कर ताश खेलते लोग। गप्‍पें मारते लोग। परनिंदा में व्यस्त। 10वीं-12वीं की परीक्षा में चोरी कराने में बडे़ पैमाने पर परीक्षाकेंद्रों में उपस्थित भीड़। क्या आप छात्र इन प्रवृत्तियों के खिलाफ कुछ कर सकते हैं? जिस दिन हमारी यह श्रमशक्ति अपनी ताकत पहचान लेगी, बिहार का कायाकल्प हो जाएगा।इतिहास की एक घटना से हम सीख ले सकते हैं। रूस ने स्पूतनिक उपग्रह छोड़ा था और अंतरिक्ष में रूसी यात्री यूरी गैगरिन गये थे। अमरीका रूस की इस प्रगति से स्तब्ध और आहत था। आहत अपनी स्थिति को लेकर। यह '60 के दशक की बात है। कैनेडी राष्ट्रपति बने थे, 20 जनवरी 1961 को। उन्होंने अपनी संसद (कांग्रेस) की बैठक बुलायी। बातचीत का विषय था, अर्जेंट नेशनल नीड्स (आवश्यक राष्ट्रीय सवाल)। उन्होंने ऐतिहासिक भाषण दिया। कहा, मेरी बातें स्पष्ट हैं। मैं संसद (कांग्रेस) और देश से गुजारिश कर रहा हूं। एक दृढ़प्रतिबद्धता की। एक नये कार्यक्रमों के प्रति। एक नया अध्याय शुरू करने के प्रति, जिसमें भारी खर्च होंगे और जो कई वर्ष चलेगा... यह निर्णय हमारी इस राष्ट्रीय प्रतिबद्धता से जुडा है कि वैज्ञानिक और तकनीक संपन्न मैनपावर पैदा करें। उसे सारी भौतिक और अन्य सुविधाएं दें... इस संदर्भ में उन्होंने प्रतिबद्धता, सांगठनिक कुशलता और अनुशासन की बात की। उन्होंने कहा, मैं कांग्रेस को बता रहा हूं, हजारों लाखों की संख्या में लोगों को प्रशिक्षित, पुनःप्रशिक्षित करने का ट्रेनिंग प्रोग्राम (प्रशिक्षण प्रोग्राम) और मैनपावर डेवलपमेंट (मानव संपदा विकास) करें।क्या हम इतिहास के इस पाठ से शिक्षा ले सकते हैं? हमारे दिल में अगर सचमुच राज ठाकरे के व्यवहार से जलन और आग है, तो हम इस जलन और आग को एक नये समाज गढ़ने के अभियान में ईंधन बना सकते हैं। चीन पहले अफीमचीयों का देश माना जाता था। बिल गेट्स ने चीन के बारे में एक महत्वपूर्ण बात कही है। आज वह दुनिया की महाशक्ति है। कैसे और क्यों? उसमें क्या हुनर है? बिल गेट्स के अनुसार, चीनी खतरे उठाते हैं। संकटों से जूझते हैं। कठिन श्रम करते हैं। अच्छी पढ़ाई करते हैं। बिल गेट्स के अनुसार जब किसी चीनी राजनीतिज्ञ से मिलते हैं, तो पाते हैं कि वे वैज्ञानिक हैं। इंजीनियर हैं। उनके साथ आप अनंत सवालों पर बहस कर सकते हैं। लगता है आप एक इंटेलीजेंट ब्यूरोक्रेसी से मिल रहे हैं।दुनिया के युवाओं के आदर्श और प्रेरक ताकत बिल गेट्स भी हैं, जो एक गैरेज से काम शुरू कर दुनिया के शिखर तक पहुंचे। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के एक प्रोफेसर गर स्टरनर ने एक जगह कहा है, किसी संस्था में बदलाव, संकट या आपात स्थिति में ही शुरू होता है। वह कहते हैं कि किसी भी संस्था में तब तक कोई मौलिक बदलाव नहीं होता, जब तक उसे यह एहसास न हो कि वह अत्यंत खतरे (डीप ट्रबल) में है और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उसे कुछ नया, ठोस और अनोखा प्रयास करना होगा। आज बिहार या झारखंड को छात्र बदलना चाहते हैं, तो इससे प्रेरक वाक्य नहीं हो सकता। इस अपमान को सम्मान में बदल देने के रास्ते पर चलिए, आप इतिहास बनाएंगे। इतिहास बनानेवालों से ही सबक लीजिए। ऐसे ही एक इतिहास नायक चर्चिल ने कहा था, किसी चीज के निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत धीमी होती है। इसके पीछे वर्षों का श्रम और साधना होती है। पर इसको नष्ट करने का विचारहीन काम एक दिन में हो सकता है। राष्ट्र की इस संपदा (रेलवे वगैरह) को बनाने में भारी श्रम और पूंजी लगे हैं। यह देश की संपत्ति है, बिहार की संपत्ति है। राज ठाकरे की नहीं। यह आपके और हमारे करों से बनी सार्वजनिक चीज है। हम अपमानित भी हों और अपनी ही दुनिया में आग लगाएं, ऐसा काम दुनिया में शायद कहीं और नहीं होता।आप युवा हैं। युवाओं में ही कुछ नया करने की कल्पनाशीलता होती है। सपनों के पंख होते हैं। उत्साह होता है। महान वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा था, कल्पनाशीलता ज्ञान से ज्यादा महत्चपूर्ण है। क्या आप युवा अपनी कल्पनाशीलता की ताकत को अपने राज्य को गढ़ने में नहीं लगा सकते?आप युवाओं ने दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी (जीइसी) का नाम सुना होगा। उसके करिश्माई चेयरमैन हुए, जैक वालेशा। उन्होंने भारत के बारे में कहा है, मैं भारत को एक बड़ा खिलाड़ी मानता हूं। आधुनिक दुनिया में। 100 करोड़ से अधिक की जनसंख्यावाला यह देश तेजस्वी लोगों का मुल्क है। यह लगातार बढे़गा और बड़ा होगा और दुनिया की अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण रोल होगा। नैस्कॉम (नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज) के अनुसार भारतीय तकनीकी कंपनियां, अमेरिका, यूरोप, जापान की बड़ी-बड़ी कंपनियों को सेवाएं दे रही हैं। विदेशी, इन कंपनियों को इंडियन टाइगर्स कहते हैं। भविष्य में इन कंपनियों की मांग और बढ़नेवाली है। यह मंदी, वर्ष-डेढ़ वर्ष में कम होगी। आज एक लाख बीस हजार छात्र सूचना तकनीक में भारतीय कॉलेजों से स्नातक की डिग्री पा रहे हैं। 30 लाख विद्यार्थी अंडर ग्रेजुएट डिग्री ले रहे हैं।
(सभी आंकडे़ नैस्कॉम रिपोर्ट 2007 के अनुसार)इन भारतीय युवाओं को पश्चिम के देशों में जो वेतन मिलते हैं, उसका महज 20 फीसदी ही मिलता है, वह भी भारत में घर बैठे। इसके लिए एक बडा रोचक फार्मूला है - Internet + Brains - High Cost = Huge Business Opportunitiesक्यों हमारे हिंदी पट्टी के प्रतिभाशाली विद्यार्थी, इस मौके का लाभ नहीं उठा सकते? इसके लिए बडे़ कल-कारखाने नहीं चाहिए। बड़ी पूंजी नहीं चाहिए। बस चाहिए सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थान, जहां से निकले प्रतिभाशाली छात्र अच्छी तरह कामकाज करना जानें। लिखना-पढ़ना जानें। फर्राटेदार अंगरेजी बोलना जानें। अच्छी सड़कें हों, बेहतर कानून-व्यवस्था हो, तो अपने आप आइटी उद्योग आपके यहां खिंचा चला आएगा। वैसे भी अब आइटी उद्योग या अन्य कंपनियां बडे़ शहरों से दूसरे दरजे के शहरों की ओर रुख कर रही हैं। लागत खर्च कम करने की दृष्टि से। यह सुनहरा मौका है बिहार, झारखंड और हिंदी पट्टी के राज्यों के लिए। पहले भारत सांप-सपेरों, जादूगरों, साधुओं और तंत्र-मंत्र का देश जाना जाता था। दुनिया में। पर भारत के युवकों ने यह छवि बदल दी है। क्या बिहार, झारखंड या हिंदी पट्टी के छात्र अपना पुरुषार्थ नहीं दिखा सकते?बीबीसी के जाने-माने पत्रकार, डेनियल लैक ने भारत पर दो किताबें लिखी हैं। एक मंत्राज ऑफ चेंज (वर्ष 2005)। उनकी ताजा पुस्तक आयी है, इंडिया एक्सप्रेस (2008)। अपनी पुस्तक मंत्राज ऑफ चेंज में उन्होंने हिंदी राज्यों के बारे में लिखा है। उन्होंने भारत के सबसे बडे डेमोग्राफर इन चीफ प्रो आशीष बोस से मुलाकात की। प्रो बोस अपने बौद्धिक कामों के लिए दुनिया में जाने जाते हैं। पहली बार '80 के दशक में, उन्होंने बीमारू राज्यों की अवधारणा को स्पष्ट किया। बीमारू राज्य यानी जो बीमार हैं, पिछडे़ हैं। बीमारू शब्द में ये राज्य हैं - बिहार, राजस्थान, यूपी, मध्य प्रदेश। सन 2000 के आसपास योजना आयोग ने माना कि राजस्थान और मध्यप्रदेश, बीमारू राज्यों की अवधारणा से निकल आये हैं। इस तरह बीमार राज्यों में दो ही राज्य बचे, बिहार और यूपी। वर्ष 2000 के अंत में ये दोनों राज्य बंट कर चार राज्य हो गये - बिहार, झारखंड, यूपी और उत्तरांचल। इस तरह ये चारों राज्य भारत के बीमार राज्य माने जाते हैं। इन राज्यों के कामकाज को लेकर विकास की दौड़ में शामिल अन्य राज्य टीका-टिप्पणी भी करते हैं। वर्ष 2000 के आसपास नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल की बैठक में आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कई गंभीर सवाल उठाये। उन्होंने कहा कि हमारे आंध्रप्रदेश जैसे राज्य या अन्य, जो प्रगति और विकास कर रहे हैं, अपनी बेहतर व्यवस्था, गुड गवर्नेंस, बेहतर आर्थिक प्रबंध वगैरह के कारण, वे पैसे कमा कर केंद्र को देते हैं और केंद्र का वित्त आयोग हमारे कमाये पैसे को गरीब राज्यों के विकास के लिए दे देता है। इससे हमें निराशा होती है। क्या कुशल राज्य संचालन, प्रबंधन का यही पुरस्कार है? उन्होंने साफ-साफ कहा कि हिंदी पट्टी के राज्य न अपनी जनसंख्या घटाते हैं, न आर्थिक विकास दर बढाते हैं, न बेहतर गवर्नेंस करते हैं, न उनकी दिलचस्पी अपने राज्य के विकास में है, तो उनकी अव्यवस्था, अराजकता, अकुशलता का बोझ हम क्यों उठायें? इस सवाल के मूल्यांकन की भी दो दृष्टि है। पहली, यह देश एक है, इसलिए गरीबों का बोझ संपन्न राज्यों को उठाना चाहिए। 1980 तक लगभग यही मानस पूरे देश में था, क्योंकि आजादी के समय के नेता जीवित थे। पर आज यह भावना ख़त्म हो गयी है। हर राज्य अपने विकास में सिमट गया है। इस दृष्टि से चंद्रबाबू नायडू के सवाल जायज़ एवं सही हैं। क्यों हिंदी पट्टी के राज्य अपनी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ नहीं कर सकते? विकास दर नहीं बढा सकते? सुशासन नहीं ला सकते?आप युवा विद्यार्थी बीमारी की इस जड़ को समझिए और ऐसी राजनीति और नेता को प्रश्रय दीजिए, जो इन मोर्चों पर इन पिछडे़ राज्यों को आगे ले जा सके। अपनी ताजा पुस्तक में डेनियल लैक कहते हैं कि बीमारू राज्यों के बावजूद भारत बीकमिंग एशियाज अमेरिका (भारत, एशिया का अमेरिका बन रहा है)। ऐसी स्थिति में क्यों हिंदी पट्टी के राज्य पिछडे़ और दरिद्र बने रहे? डेनियल एक जगह नारायण मूर्ति को उद्धृत करते हैं। नारायण मूर्ति पहले साम्यवादी थे। साम्यवाद से अपने अनुभव के बाद इंफोसिस कंपनी बनायी, जिसने दुनिया में भारत को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने एक बड़ा वाजिब सवाल उठाया। आप सीमित धन गरीबों में बांट कर, गरीबी दूर नहीं कर सकते। बल्कि अधिक से अधिक संपत्ति का सृजन कर ही गरीबों की गरीबी दूर की जा सकती है। आज क्या कारण है कि अमेरिका के राष्ट्रपति हों या चीन के प्रधानमंत्री या दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष, पहले बेंगलुरू, हैदराबाद, चेन्नई वगैरह जाते हैं। दिल्ली बाद में पहुंचते हैं। मुंबई तो शायद जाते भी नहीं। क्या हम हिंदी पट्टी के लोग एक बेंगलुरू, एक हैदराबाद, एक चेन्नई, एक त्रिवेंद्रम, मनीपाल वगैरह भी खडा नहीं कर सकते?दुनिया के प्रतिष्ठित फाइनेंसियल टाइम्स अखबार के जाने-माने पत्रकार एडवर्ड लूस ने 2006 में एक किताब लिखी, इन स्पाइट ऑफ द गॉड्स। उसमें एक जगह लिखा है, व्यंग्य के तौर पर ही। इटली के संदर्भ में। 'रात में आर्थिक प्रगति होती है, जब सरकार सो रही होती है।' दरअसल भारत के पावर हाउस के रूप में उभरे नये शहरों में कामकाज रात में ही होता है, जब दुनिया की अर्थव्यवस्था और कंपनियों को भारत के युवा भारत में बैठे नियंत्रित करते हैं।आप युवाओं को अपनी दृष्टि बदलनी होगी, सोचने का तरीका बदलना होगा। आप खुद को समस्या न मानिए। न समस्या बनिए। बल्कि आप इस संकट के समाधान के कारगर यंत्र बनिए। हिंदी पट्टी की आबादी बहुत बड़ी है और यह बाजार बहुत बड़ा है। यह हमारी ताकत है। हमें इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। टेक्नोलॉजी अपनाने में अग्रिम मोरचे पर रहिए। कंप्यूटर, इंटरनेट, नयी खोज, नयी चीजें, इन सबको जीवन में पहले उतारिए। इनके विरोधी मत बनिए। इतिहास से सीखिए। जो टेक्नोलॉजी में पिछड़ गया, वह गुलाम बनने के लिए अभिशप्त है। औद्योगिक क्रांति का अगुआ था ब्रिटेन। उसके राज्य में सूर्यास्त नहीं होता था। भारत उसका गुलाम बन गया। अमेरिका का वर्चस्व अपनी टेक्नोलॉजी के कारण है। दक्षिण के राज्य हमसे क्यों आगे हैं? क्योंकि अच्छी शिक्षण संस्थाएं, इंफ्रास्ट्रक्चर वगैरह बना कर वह सूचना क्रांति के केंद्र बन गये हैं।रॉबर्ट फ्रास्ट की एक मशहूर कविता है, जिसका आशय है -
आज से हजारों हजार वर्ष बादमैं भले भाव में यह कहूंगाजंगल में दो रास्ते थेमैं उस पर चलाजिस पर लोग यात्रा नहीं करते थेऔर इसी प्रयास ने सारे द्वार खोल दियेआप युवा घटिया राजनीति के पात्र न बनें। यह राजनीति देश को तोड़ने की ओर ले जाएगी। 1960 में सेलिग एस हैरिसन ने बहुचर्चित किताब लिखी थी इंडिया : द मोस्ट डेंजरस डिकेड। जो चीज़ें आज के भारत में हो रही हैं, उसका उल्लेख है इस पुस्तक में। कैसे राज ठाकरे जैसे लोग देश को तोडने की ओर ले जा रहे हैं? क्या आप भी राज ठाकरे के सपने को पूरा करना चाहते हैं? इस देश के लाखों-करोड़ों युवाओं ने आजादी के लिए कुर्बानी दी है। गर्व की बात है कि आजादी की लड़ाई में हिंदी इलाके अग्रिम मोरचे पर थे। लगभग 2500 वर्षों के ज्ञात इतिहास में भारत में स्थिर केंद्रीय शासन के चार संक्षिप्त दौर हैं। मौर्य काल, मुगल काल, ब्रिटिश काल और आजादी के बाद के 60 वर्ष। इनमें पहला और अंतिम शासन देश की धरती से निकले थे। तीसरा पूरी तरह विदेशी था। दूसरा शुरू में विदेशी था। तीन पीढ़‍ियों बाद देशी बनने लगा। भारत की इस एका को किसी कीमत पर आप युवा खंडित न होने दें। महाराष्ट्र की परंपरा आज युवा नहीं जानते। यह राज ठाकरे का राज्य नहीं रहा है। यह लोकमान्य तिलक, दादा भाई नौरोजी से लेकर साने गुरुजी, अच्युत पटवर्धन, मधु लिमये, मधु दंडवते, एसएम जोशी, एनजी गोरे, मृणाल गोरे जैसे देशभक्तों का राज्य है। बाल ठाकरे और राज ठाकरे अपवाद और इस समाज की विकृतियां हैं। यह महाराष्ट्र की मुख्यधारा नहीं है।मधु लिमये के लेख से राजनीति के बारे में एक अंश उद्धृत कर रहा हूं। वही मधु लिमये जिन्हें बिहार ने बार-बार लोकसभा में भेजा और गौरवान्वित महसूस किया। अमेरिका के एक लेखक जॉन एस सलोमा का वह हवाला देते हैं कि आज राजनीति, राजनेता, राजनीतिज्ञ और दलीय, ये सब शब्द लोगों में तिरस्कार की भावना पैदा करते हैं। इनमें संकीर्ण स्वार्थवादिता की बू आती है।

आप बिहार के युवा एक क्रांतिकारी परंपरा के वाहक हैं। क्या आप इस सड़ी राजनीति का हिस्सा बनना चाहते हैं? एक कविता की इन पंक्तियों पर गौर कीजिए...
कई बार मरने से जीना बुरा हैकि गुस्से को हर बार पीना बुरा हैभले वो न चेते हमें चेत होगाहमारा नया घर, नया रेत होगामुक्तिबोध की यह पंक्ति भी याद रखिए
एक पांव रखता हूं, हजार राहें फूट पडती हैं!


(इस लेख को तैयार करने में निम्न पुस्तकों से मदद ली गयी है। मेरा आग्रह है कि आप इन सभी पुस्तकों को पढ़ें। पढ़ने-पढ़ाने का अभियान चलाएं ताकि आपके शासक (शासन चलानेवाले, राजनीति करने वाले) इन्हें पढ़ें और जानें कि दुनिया कहां चली गयी है। भारत के अन्य राज्य कहां पहुंच गये हैं और हम हिंदी इलाके कहां हैं। पहले यह कहावत थी, इग्नोरेंस इज ब्लिस (अज्ञानता वरदान है)। पर ग्लोबल विलेज के इस दौर की बुनियादी शर्त है, इनफॉरमेशन इज पावर (सूचना ही ताकत है)। इसे नॉलेज एरा कहा जाता है। क्या इन पुस्तकों को पढ़ कर, इनके निचोड़ निकाल कर, आप छात्र बिहार के गांव-गांव, स्कूलों और संस्थाओं में इसके मर्म बताने का अभियान चला सकते हैं? इससे लोग बदलती दुनिया की हकीकत समझेंगे और तथ्य जान कर बिहारियों-झारखंडियों में आकांक्षाएं पैदा होंगी, जिनसे नया राज्य बनेगा।

1. The World Is Flat: Thomas L Friedman

2. Rising Elephant: Ashutosh Sheshabalaya

3. Building A Vibrant India: M M Luther

4. India: Aaron Chaze5. Made in India: Subir Roy

6. Banglore Tiger: Steve Hamm

7. India Booms: John Farndon

8. India Arriving: Rafiq Dossani

9. Remaking India: Arun Maira

10. Mantras of Change: Daniel Lak11. India Express: Daniel Lak

12. Inspite of Gods: Edward Luce

13. India: The Most Dangerous Decades: Selig S Harrison

14. India's New Capitalists: Harish Damodaran

15. संक्रमणकालीन राजनीति: मधु लिमये

16. भारतीय राजनीति का नया मोड़: मधु लिमये

17. The New Asian Hemishpere: Kishore Mehbubani

18. Transforming Capitalism: Arun Maira

19. 20 : 21 Vision: Bill Emmott

20. The Second World: Parag Khanna21. Rivals: Bill Emmott

Wednesday, October 22, 2008

मराठी राजनीति की एक गंदी पीढ़ी

शायद तीन दशक पहले की बात आपको याद होगी, बाल ठाकरे के नेतृत्व में मुंबई में रहने वाले दक्षिण भारतीयों के खिलाफ एक नारा दिया गया था, लुंगी उठाओ-पुंगी बजाओ। अब उसी खानदान के कुलदीपक ने उत्तर भारतीयों के विरोध का ठेका लिया है। संकट सामने है कि आगामी लोकसभा चुनाव में किसे चुनें। अब देखिए वर्तमान राजनीति--

कांग्रेस की राजनीति

कांग्रेस इसलिए नवनिर्माण सेना को बढ़ावा दे रही है कि उसे शिव सेना से अगले चुनाव में मुकाबला करना है। अगर राज ठाकरे इस तरह की नंगई करके कुछ वोट काटने में सफल हो जाता है तो वह कांग्रेस के हित में रहेगा। यही वजह है कि कांग्रेस सरकार महाराष्ट्र में जंगलराज बरकरार रखने में मदद कर रही है। विलासराव देशमुख सरकार ने अगर गिरफ्तारी की भी, तो नाटक करने के लिए। हिंदी टीवी चैनलों पर मराठी बोलकर दिखाना पड़ा कि वे भी मराठियों के खैरख्वाह हैं।

भाजपा की राजनीति

यह पार्टी तो जैसे नंगी होने के लिए पैदा ही हुई है। सत्ता में रही तब अपने मुद्दे को छो़ड़कर नंगी हुई। सत्ता के बाहर रही तो और तरीकों से। राष्ट्रीय और हिंदूवादी पार्टी होने का दावा करने वाले ये लोग भी मुंबई में चल रही गुंडई के बारे में मौन साधे हुए हैं। शायद आडवाणी को प्रधानमंत्री बनने का लोभ इतना है कि वे राज ठाकरे और बाल ठाकरे दोनों को साधे रखना चाहते हैं। लेकिन इनको यह पता नहीं कि इस तरह के दोगलेपन को जनता पसंद नहीं करती।

लालू और मुलायम की राजनीति

ये केंद्र में सत्ता में बैठे हैं, लेकिन औकात नहीं है कि केंद्र सरकार की मुंबई में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को पिटवाने की नीति का विरोध कर सकें। खास बात यह है कि मुलायम के मुंबई प्रतिनिधि अबू आजमी भी अब उत्तर भारतीयों को संगठित करने में लग गए हैं। कोशिश यही कि इस पिटाई का राजनीतिक फायदा उठा लिया जाए। कांग्रेस की तुष्टिकरण में अमर सिंह तो पहले से ही सहयोगी बनकर बाटला हाउस के प्रवक्ता बनकर उभरे हैं।

अब सवाल उठता है कि ऐसी बुरी दशा में जनता जाए तो कहां जाए। राष्ट्रीयता का खामियाजा यूपी और बिहार वाले भुगत ही रहे हैं, जिसके कारण न तो इन राज्यों में सार्वजनिक इकाइयां हैं और न ही निजी। नौकरी के लिए ये दूसरे राज्यों में जाते हैं और यह समझते हैं कि पूरा भारत हमारा है, क्योंकि हम हिंदुस्तानी हैं।

Sunday, October 19, 2008

नंगू


शाकाहार तो ठीक है भइया। ज्यादातर भारतीय इसका समथॆन करते हैं। लेकिन इस तरह का शाकाहार? अगर ऐसा ही किया तब तो सड़क पर धूमने वाली गाय और बकरियां हमें नंगा कर देंगी।

Monday, October 13, 2008

कुछ यूं मचा कर्नाटक में बवाल, सरकार जवाब दे, क्या किया उसने?

1) “…इन्द्रसभा की नृत्यांगना उर्वशी विष्णु की पुत्री थी, जो कि एक वेश्या थी…”।
2) “…गुरु वशिष्ठ एक वेश्या के पुत्र थे…”।
3) “…बाद में वशिष्ठ ने अपनी माँ से शादी की, इस प्रकार के नीच चरित्र का व्यक्ति भगवान राम का गुरु माना जाता है…” (पेज 48)।
4) “…जबकि कृष्ण खुद ही नर्क के अंधेरे में भटक रहा था, तब भला वह कैसे वह दूसरों को रोशनी दिखा सकता है। कृष्ण का चरित्र भी बहुत संदेहास्पद रहा था। हमें (यानी न्यूलाईफ़ संगठन को) इस झूठ का पर्दाफ़ाश करके लोगों को सच्चाई बताना ही होगी, जैसे कि खुद ब्रह्मा ने ही सीता का अपहरण किया था…” (पेज 50)।
5) “…ब्रह्मा, विष्णु और महेश खुद ही ईर्ष्या के मारे हुए थे, ऐसे में उन्हें भगवान मानना पाप के बराबर है। जब ये त्रिमूर्ति खुद ही गुस्सैल थी तब वह कैसे भक्तों का उद्धार कर सकती है, इन तीनों को भगवान कहना एक मजाक है…” (पेज 39)।


“न्यू लाईफ़ वॉइस” मिशनरी केन्द्र ने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसका नाम रखा गया “सत्य दर्शिनी”, और इस बुकलेटनुमा पुस्तक को बड़े पैमाने पर गाँव-गाँव में वितरित किया गया। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद लोग भड़क गये और यही इन दंगों का मुख्य कारण रहा.
http://sureshchiplunkar.blogspot.com
पर इसके बारे में जानकारी मिली। अगर यह सही है कि इस तरह की किताब बांटी गई, तो सवाल यह उठता है कि क्या यह भड़काऊ नहीं है जिससे मारकाट मच जाए???
ऐसे में सरकार ने क्या किया? क्या ऐसे संगठनों और मिशनरियों पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए????

Sunday, October 12, 2008

गंदी राजनीति के चलते खतरनाक बनता असम

आदिति फडणीस



असम में बोडो और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के बीच संघर्ष में गत सप्ताह दर्जनों लोग मारे गए।

2006 में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले भी असम में इसी तरह की मुठभेड़ हुई थी, लेकिन दो जनजाति समूहों के बीच। कबीलों, जनजातियों, जातीय और धार्मिक समुदायों में बंटा असम, अन्य राज्यों से ज्यादा हिंसा का शिकार होता है।

कहावत है कि आप अपने दोस्तों को चुन सकते हैं, लेकिन अपने संबंधियों को नहीं। असम का कुछ यही हाल है। बांग्लादेश से सटी एक सीमा की वजह से असम और बांग्लादेश के बीच पारिवारिक संबंध है। सीमा पर किसी तरह की रोक-टोक नहीं है।

अत: बोडो जाति के असामाजिक तत्व - जैसे कथित आतंकवादी परेश बरुआ- बांग्लादेश के दामाद की तरह सीमा पार कर आते जाते रहते हैं। बांग्लादेश भी उनको खुशी से दूध पिलाता है- क्या पता कब जरूरत पड़ जाए! 1960 से 1980 के दशक में असम में लगातार कांग्रेस का ही शासन रहा करता था।

राज्य के दिग्गज कांग्रेसी नेता, देवकांत बरुआ खुलेआम कहा करते थे कि जब तक अली (बांग्लादेशी मुसलमान), कुली (चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिक) और बंगाली (पश्चिम बंगाल से आए हुए हिंदू) कांग्रेस के साथ थे, कांग्रेस के हारने का कोई सवाल ही नहीं था। जब इन तीनों समुदायों- अली, कुली और बंगाली- के अनुपात की लगाम कांग्रेस के हाथ से निकल गई तो सामाजिक और आर्थिक विकृतियों का उभरकर आना स्वाभाविक था।

ऐसा कुछ होता चला गया 1980 के दशक से। बाहर से आए लोगों के खिलाफ आवाज उठाई अहोम गण परिषद ने। इसके बाद उत्तर प्रत्युत्तर में हिंसा असम की राजनीति का एक हिस्सा सा बन गई। कभी हिंदू मुस्लिम दंगे होते थे तो कभी बोडो-कुकी झगड़े। बांग्लादेश से भागे हिंदू भी असम आने लगे। असम के हिंदू इन्हें हिकारत की निगाह से देखते थे। तनाव स्वाभाविक था।

1980 और 84 के चुनाव किन परिस्थितियों में हुए, यह सर्वविदित है। भारत सरकार और आल असम स्टूडेंट्स यूनियन व अगप के बीच करार के बाद स्थिति संभल गई। अगप की सरकार भी बनी, लेकिन युवा आदर्शों को सत्ता के लालच ने निगल लिया। सरकार की लूटपाट से तंग आकर असम ने फिर कांग्रेस को चुना।

2001 में तरुण गोगोई मुख्यमंत्री बने और 2006 में कांग्रेस पुन: जीतकर आई। सरकार तो औपचारिक रूप से बन गई लेकिन राजनीतिक चुनौतियां बरकरार रहीं। लेफ्टीनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) एस. के. सिन्हा ने, जो असम के राज्यपाल थे, राज्य सरकार को कई बार चेताया कि यदि बाहरी लोगों को असम में आने से रोका नहीं गया तो असम का जनसांख्यिकीय चरित्र ही बदल जाएगा।

यही बात कही लेफ्टीनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) अजय सिंह ने, जो अब राज्यपाल हैं। तरुण गोगोई और राज्यपाल में तो सार्वजनिक झड़प हो गई। गोगोई ने राज्यपाल के इस कथन का खंडन किया कि रोज 6,000 लोग बांग्लादेश से भारत आते हैं और इन्हें रोकने का राज्य सरकार कोई प्रयास नहीं कर रही है।

2005 में तिनसुकिया जंगलों में फौज आतंकवादियों को ढूंढ रही थी। अचानक राज्य सरकार से आदेश मिला कि खोज को रोक दिया जाए। सेना ने 14 को मार गिराया था। सेनाध्यक्ष पशोपेश में पड़ गए। जब जंगल खाली करने का मौका था तो पीछे हटना क्या बुध्दिमानी थी? लेकिन सरकार अड़ी रही और सेना को ऑपरेशन अधूरा छोड़ना पड़ा। सच तो यह है कि चुनाव सामने था और सरकार नहीं चाहती थी कि किसी भी समुदाय के वोट वह खो दे।

तरुण गोगोई ने अपने कार्यकाल में ऐसा बहुत कुछ किया है, जिससे असम के निवासियों का विश्वास जीता जा सके। पुलिस के इंसपेक्टर जनरल की पदवी को ही रद्द कर दिया गया। जिस तरह मुफ्ती मोहम्मद सईद कश्मीर का चुनाव इस वायदे पर जीत गए कि स्पेशल टास्क फोर्स को वह राज्य से बाहर कर देंगे।

क्या सेना और पुलिस का मनोबल तब तोड़ना चाहिए, जब वे ऑपरेशन में सफलता हासिल कर रहे हों? बहरहाल दंगाइयों को लगा कि जब सैंया भए कोतवाल तब डर काहे का। लेफ्टी. जनरल सिन्हा की चेतावनी अब दिल्ली में सब को याद आ रही है।

राष्ट्रपति के. आर. नारायणन को एक पत्र में जनरल सिन्हा ने लिखा था कि बांग्लादेशी नागरिकों का असम में घर बनाना अब इतना प्रचलित हो गया है कि वह समय दूर नहीं, जब असम के बड़े हिस्सों से मांग होगी कि भारत सरकार को उन जिलों को बांग्लादेश के साथ विलय की अनुमति दे देनी चाहिए ।

भारत सरकार ने आईएमडीटी एक्ट के तहत गैर कानूनी बांग्लादेशी नागरिकों को स्वदेश भेजने के लिए एक तंत्र बनाया था। इसे संप्रग सरकार ने खारिज कर दिया है। असम अब कितने खतरनाक और संवेदनशील कगार पर खड़ा है, यह बहुत कम लोग समझते हैं।

भूटान, बांग्लादेश और बर्मा जैसे तीन देशों से सटी सीमा वाला असम भारत के लिए एक भयंकर जंजाल बन सकता है, यदि यहां की राजनीति पर नजर न रखी गई। जाति और कबीलों की राजनीति वैसे भी बहुत पेचीदा होती है। उसे धर्म का पुट मिल जाए तो पूरे भारत के लिए खतरा हो सकता है। प्रधानमंत्री जिस राज्य से चुने गए हैं, उसमें इस तरह की घटना वाकई शर्मनाक है।
courtesy: www.bshindi.com

Friday, October 10, 2008

एक खांटी अमेरिकी सीईओ की चिट्ठी

श्यामल मजूमदार / October 08, 2008
मेरे प्यारे पाठकों, अमेरिकी कॉर्पोरेट दुनिया के एक पोस्टर ब्वॉय के तौर पर मुझे हफ्ते के सातों दिन और दिन के चौबीसों घंटे खबरों में रहना काफी पसंद है।
लेकिन अगर आपको भी मेरी आंखों के नीचे काले धब्बे दिखाई देते हों, तो यह मेरी गलती नहीं है। दरअसल यह गलती है उन अखबारों की, जिनमें बड़ी-बड़ी कंपनियों के ऊंचे-ऊंचे ओहदेदारों की तस्वीर उनके मोटे-मोटे वेतन के साथ छपी होती है। हालांकि, मैंने अब इन बातों की तरफ ध्यान छोड़ दिया है।

मुझे पूरा भरोसा है कि कुछ अखबारों में हाल ही में छपा वह सर्वे पूरी तरह से झूठा और निराधार था। भाई साहब, वही सर्वेक्षण जिसमें 80 फीसदी अमेरिकियों ने यह कहा था कि कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को जरूरत से ज्यादा मोटा वेतन मिलता है। आखिरकार मैंने अपने वेतन को सबसे छुपाकर रखने की इतनी जबरदस्त कोशिश जो की है। लेकिन कुछ लोगों में दबी-छुपी बातों को खोद निकालने का कीड़ा होता है। इसलिए तो मुझे इस बात पर कोई हैरत नहीं हुई, जब उन लोगों ने जैक वेल्स के जीई से जुदा होने से जुड़े कई बड़े राजों को दुनिया के सामने खोल कर रख दिया था। वह भी ऐसे राज जिनके बारे में खुद कंपनी ने शुरुआत में कुछ कहने से इनकार कर दिया था।

अब तो आपको भी मालूम हो चला होगा कि अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत में मगरमच्छ समझी जाने वाली उस कंपनी ने अपने पूर्व सीईओ को रुखसत करने के लिए उन्हें एक मोटा-ताजा रिटायरमेंट पैकेज दिया था। उस विदाई के तोहफे में कंपनी ने उन्हें न्यूयॉर्क के पॉश मैनहट्टन इलाके में एक फ्लैट, कई महंगे क्लबों की मेंबरशिप और यहां तक कि कॉर्पोरेट जेट में मुफ्त में सैर-सपाटा करने की इजाजत भी दी थी। हालांकि, सभी ऐसे नहीं होते। कुछ तो खुले तौर पर यह मान लेते हैं कि वे कंपनियों की सुविधाओं का जमकर इस्तेमाल करते हैं।

जॉन केनेथ गैल्ब्रेथ ने बिल्कुल सही कहा था कि एक बड़ी कंपनी के सीईओ का वेतन अक्सर उसका खुद को दिया गया सबसे बेहतरीन तोहफा होता है। इस बात की सबसे अच्छी मिसाल हैं लीमन ब्रदर्स के मुखिया रिचर्ड फ्लूड। उन्होंने खुद की खुशी को कभी भी नजरअंदाज नहीं किया। उन्होंने अपनी कंपनी को आसमान की ऊंचाई से पाताल की गहराई तक पहुंचाने के लिए कंपनी से अपने काम के हर घंटे के लिए 17 हजार डॉलर लिए थे। साथ ही, उन्होंने अपने मातहतों का भी पूरा ध्यान रखा और उनके बीच जमकर महंगे शेयर बांटे। लेकिन सारा दोष अकेले उनके और उनकी टीम के सिर ही क्यों मढ़ा जाए? आपने टायको के पूर्व सीईओ की वह मशहूर कहानी तो सुनी ही होगी कि उन्होंने पूरे छह हजार डॉलर में अपने बाथरूम के पर्दे खरीदे और बिल कंपनी के नाम भिजवा दिया। अभी हाल ही में बैंक ऑफ अमेरिका ने मेरिल लिंच का अधिग्रहण कर लिया।लेकिन इसके करीब एक साल पहले इस कंपनी ने अपने तत्कालीन सीईओ स्टैनली ओ'नील को रुखसत करने के लिए जो पैकेज दिया था, उसकी कीमत आज 6।6 करोड़ डॉलर है। इसके अलावा भी कई मिसालें हैं।

मुझे तो सबसे ज्यादा जलन अभी हाल ही में ह्यूलिट पैकर्ड से निकाली गईं उनकी सीईओ कार्ली फियोरिना से होती है। इसलिए नहीं कि उन्हें कंपनी छोड़ने के लिए 4.2 करोड़ डॉलर मिले, बल्कि इसलिए क्योंकि उनका जिक्र आज कल अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव अभियानों में खूब हो रहा है। हालांकि, इस चर्चा की वजह बहुत अच्छी नहीं है। राष्ट्रपति के पद के लिए डेमोक्रेट उम्मीदवार बराक ओबामा ने अभी हाल ही में अपने एक नए विज्ञापन में अपने रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी जॉन मैकेन और कंपनियों के बड़े अफसरों के लिए सोने के पैरासूटों को जोड़ा है। इस 30 सेकंड के विज्ञापन में फियोरिना पर खासा जोर दिया गया है। उन्हें इसमें हद से ज्यादा मोटा वेतन लेने के प्रतीक के रूप में दिखलाया है।

अगर ओबामा राष्ट्रपति बन गए तो उनका यह गुस्सा हम लोगों को काफी भारी पड़ सकता है। वह दुनिया को यह बताने में जुटे हुए हैं कि सभी अमेरिकी कंपनियों के सीईओ आज की तारीख में 1.05 करोड़ डॉलर का वेतन पा रहे हैं।साथ ही, वे यह भी बता रहे हैं कि हम एक औसत अमेरिकी कर्मचारी की तुलना में 344 गुना ज्यादा कमा रहे हैं। यह देखकर बहुत दुख होता है। इस तरह के खुलासे हमारी जिंदगियों को और मुश्किल ही बना देंगे। वैसे, हकीकत में इसकी उम्मीद कम ही है। सुना था कि बुश बेल-ऑउट प्लान में एक नया नियम जोड़ने के बारे में सोच रहे हैं। इस नए नियम के मुताबिक सरकारी मदद से बचाई गईं कंपनियों के लिए अपने बड़े अधिकारियों को विदाई का तोहफा देना नामुमकिन हो जाएगा।

चर्चा तो हमारे वेतन पर भी लगाम कसने की है। लेकिन इससे नाउम्मीद नहीं हूं। आखिरकार, सरकार का अपनी बातों पर खरा उतरने के मामले में ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है। मिसाल के लिए 1990 के दशक के शुरुआती सालों में कांग्रेस 10 लाख डॉलर से ज्यादा कमाने वाले कार्यकारी अधिकारियों के लिए टैक्स का फंदा और कड़ा कर दिया था। नतीजे उम्मीद के मुताबिक ही थे। हमने प्रोत्साहन और कामकाज पर आधारित वेतन लेना शुरू कर दिया, जो टैक्स के फंदे से बाहर था। इसी वजह से तो मेरे असल वेतन में पिछले कुछ सालों में थोड़ा-बहुत ही इजाफा हुआ है। लेकिन मेरी दूसरे तरीकों से होने वाली कमाई में जबरदस्त इजाफा हुआ है। इसलिए मुझे पूरा भरोसा है कि इस संकट से भी मैं निकल जाऊंगा। अगर कोई दूसरी तरकीब काम न आई तो वह अपना पूरा फॉर्मूला तो काम आएगा ही।

आखिरकार, किस कर्मचारी को कितना वेतन मिलना चाहिए, यह फैसला कांग्रेस को नहीं, बल्कि कंपनी के निदेशक मंडल को करना चाहिए। साथ ही, बड़े अफसरों के वेतन पर लगाम कसना मुसीबतों को बुलावा दे सकता है। हमें खुद इतना यकीन इसलिए है कि खुद अमेरिकी वित्त मंत्री हेनरी पॉलसन अभी हाल तक गोल्डमैन सैक्स के सीईओ रहे थे।साथ ही, उन्हें भी कंपनी से स्टॉक ऑप्शंस मिले हैं, जिनकी कुल कीमत आज की तारीख में 50 करोड़ डॉलर है। वह अपने भाइयों को इतनी जल्दी नहीं भूल सकते। वैसे मैं एआईजी के पूर्व सीईओ रॉबर्ट विलियम्सटैड की पेश की गई मिसाल से जरूर परेशान हूं। उन्होंने पिछले हफ्ते अपने रास्ते जुदा करने के लिए कंपनी द्वारा पेशकश की गई 2.2 करोड़ डॉलर की रकम पर यह कहते हुए लात मार दी कि उन्हें कंपनी को खुद अपने पैरों पर खड़ा करने का मौका नहीं दिया गया। उन जैसे लोगों को खत्म होने दीजिए। मेरा तो बड़ी शिद्दत से यह मानना है कि लोगों की याददाश्त बड़ी छोटी होती है।

आपका अजीज
सीईओ,ए 2जेड इंक
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