सबकी अपनी अपनी सोच है, विचारों के इन्हीं प्रवाह में जीवन चलता रहता है ... अविरल धारा की तरह...
Thursday, June 24, 2010
एक ही गांव के लोग भाई-बहन होते है...
गांव में रिश्तों की एक तासीर होती है। वे शायद शहरी रिश्तों को नहीं समझ पाते कि बगल वाले फ्लैट में रहने वाला व्यक्ति, रिश्ते में उसका क्या लगता है? शायद इसका कारण है कि शहरों में अभी लोग १०-२० या ४०-५० साल से बसे हैं। वे अलग-अलग इलाके से आते हैं। उन्हें बगल वाले के दुख-दर्द से कोई मतलब नहीं होता। अगर बगल के फ्लैट में कोई अकेला है, बीमार है और मरने की कगार पर है तो उसका पड़ोसी ऑफिस जाना ज्यादा जरूरी समझता है। गांव का आदमी अगर आधी रात को बीमार पड़ता है तो गांव में संसाधन, इलाज की सुविधा आदि न होने के बावजूद पूरा गांव एकत्र हो जाता है औऱ उसे अगर १०० किलोमीटर दूर इलाज के लिए ले जाना पड़ता है तो गांव के १० लोग साथ हो लेते हैं। लोगों के पास पैसा नहीं होता है लेकिन गांव में तत्काल १०-२० हजार रुपये इकट्ठा हो जाता है। दिल्ली में ज्यादातर लोग लखपति हैं, लेकिन यहां १०-२० प्रतिशत आबादी भूखे पेट सो जाती है। गांव में सभी लोग आधा पेट भोजन करते हैं, और भूख से तभी मरते हैं जब पूरा गांव भूख से मरने की कगार पर पहुंचने को होता है।
यह होती है रिश्तों की तासीर। यह होता है गांव और शहर के रिश्तों में फर्क, जो मैने महसूस किया है।
Sunday, June 20, 2010
कहीं आप भी बॉस और मातहत से भयभीत होकर अपनी निजी जिंदगी का नाश तो नहीं कर रहे?
श्यामल मजूमदार
समंदर के किनारे खड़े नारियल के खूबसूरत पेड़, सफेद रेत और आसमां को छूने की कोशिश करती सागर की लहरें किसी की भी आंखों को सुकून देने के लिए काफी हैं। लेकिन कुछ ज्यादा ही व्यस्त रहने वाले मिस्टर एक्जीक्यूटिव (आज के दौर की कंपनियों में काम करने वाले बड़े अफसर, आमतौर पर प्रबंधक) इन्हें उतनी रूमानियत के साथ नहीं देख पाते। वे तो बस सुबह अपने दफ्तर जाने के दौरान मीठी नदी (मुंबई में हवाई अड्डïे के करीब से बहती है।) को देखकर ही अपनी खुशी ढूंढऩे की कोशिश करते हैं। उस वक्त उनका दिमाग भी एक अलग स्तर पर होता है जहां वे या तो दूसरों के बॉस होते हैं या फिर वे खुद को किसी के मातहत पाते हैं।
आखिर इन लोगों के लिए गोवा में अरब सागर के खूबसूरत तटों के क्या मायने हो सकते हैं? मिस्टर एक्जीक्यूटिव और उनके जैसे कई महानुभाव होते हैं जो शारीरिक रूप से तो बीच पर मौजूद होते हैं लेकिन उनका मन कहीं और रमा होता है। या तो वे अपने फोन पर बातचीत करते हुए पाए जा सकते हैं या फिर उनकी उंगलियां ब्लैकबेरी फोन पर कसरत करती हुई नजर आ सकती हैं, जिससे वह अपने दफ्तर के लोगों को जरूरी संदेश भेज रहे होंगे। दूसरी ओर उनके साथ सैरसपाटे के लिए गया उनका परिवार इससे उकता जाता है और खुद ही समंदर किनारे की सैर के लिए निकल पड़ता है। एक 12 साल की बच्ची अपनी मां से शिकायत करते हुए पाई जा सकती है कि पापा दूसरे 'बच्चेÓ (फोन) को उससे ज्यादा प्यार करते हैं। उसके पिता उन अनगिनत प्रबंधकों में से एक हो सकते हैं जो अपने कनिष्ठों को लगातार काम देते रहते हैं लेकिन इस काम को किसी भी सूरत में अंजाम तक पहुंचाने की माथापच्ची उनके जिम्मे ही होती है। ये प्रबंधक अपने कनिष्ठों पर उतना ही भरोसा करते हैं जितना कोई गाड़ी चलाने के मामले में पांच साल के बच्चे पर करता है। लेकिन कुछ ज्यादा ही व्यस्त रहने वाला एक्जीक्यूटिव तबका खुद ही कई बार अपनी भूमिका को लेकर भ्रमित रहता है।
अगर छुट्टिïयां मनाने के दौरान उनमें से किसी का मोबाइल स्विच ऑफ है और उनका लैपटॉप होटल के कमरे के किसी कोने में पड़ा है तो एकबारगी उस एक्जीक्यूटिव के मन में यह भाव घर कर सकता है कि कहीं वह बेकार प्रबंधक तो नहीं है या जरूरी चीजों को करने में समर्थ नहीं है, वगैरह-वगैरह। अगर किसी एक्जीक्यूटिव के ईमेल इनबॉक्स में या वीडियो कॉन्फ्रेंसेज में उसके बॉस या मातहतों के 500 से ज्यादा ईमेल भरे हैं तो कोई अचंभे वाली बात नहीं है। ये बॉस सोते भी अपने मोबाइल फोन के साथ ही हैं। ज्यादातर मामलों में यही होता है कि सोने से पहले फोन ही देखा जाता है और सुबह उठते भी सबसे पहले फोन का ही जायजा लिया जाता है। कुछ लोग तो एक हद से भी ऊपर यह काम करते हैं। मौजूदा दौर में कॉर्पोरेट जगत ऐसे ही लोगों से भरा पड़ा है और यही लोग इस दुनिया को चला भी रहे हैं। ये लोग अपनी केबन तक पहुंचने के लिए भी लिफ्ट या एस्केलेटर का ही इस्तेमाल करते हैं और सीढिय़ां केवल उन्हीं लोगों के लिए बच जाती हैं जो उनकी सफाई का काम करते हैं।
छुट्टिïयों से उनका मतलब केवल कामकाजी छुट्टिïयों से होता है जिसमें काम पर ही सबसे ज्यादा ध्यान होता है। आप मुंबई की एक एफएमसीजी कंपनी के उपाध्यक्ष के एक मामले से इसे समझ सकते हैं। एक बेहद दुर्लभ मामले में जब उन्होंने अपना ब्लैकबेरी फोन बंद किया तो उनका यही कहना था कि पिछले तीन साल में यह उनका पहला ब्रेक है। क्योंकि आज की बेहद तेजी से भागती कारोबारी जिंदगी में उनके पास इसके अलावा और कोई विकल्प भी मौजूद नहीं है। वह कहते हैं, 'मैं खुद वहां मौजूद नहीं होता हूं लेकिन तकनीक के जरिये मैं उससे जुड़ा रहता हूं। मैं इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकता कि मेरी गैरमौजूदगी में काम जरा भी प्रभावित हो।
आज के दौर में इन उपाध्यक्ष जैसी हजारों मिसालें आपको मिल जाएंगी। उनमें से कई ऐसे भी होते हैं जिनमें असुरक्षा का भाव काफी होता है जो ऐसा करके खुद को सुरक्षित दायरे में महसूस करते हैं। इस कवायद से वे रिमोट कंट्रोल के जरिये अपने कनिष्ठों को साधते हैं तो अपने वरिष्ठïों से शाबाशी की आस रखते हैं। इसका दुखद पहलू यही है कि उनमें से ज्यादातर को यही लगता है कि उनके किए का सारा श्रेय उनके वरिष्ठï ले जाएंगे और उन्हें फिर बेहद चुनौतीपूर्ण काम थमा दिया जाएगा जिसके लिए वक्त भी काफी कम मिलेगा। इससे उन्हें लग सकता है कि काम के अलावा उनकी कोई जिंदगी नहीं है। इससे भी बड़े दुख की बात यह है कि यह सिलसिला बदस्तूर चल रहा है और वे लोग इसे आगे बढ़ा रहे हैं जो खुद कभी निचले पदों पर काम करते थे।
इसमें कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि कुछ साल पहले भारत में कर्मचारियों के बीच हुए एक सर्वेक्षण में तकरीबन 75 फीसदी ने अपने बॉस को घटिया करार दिया था। इसकी बड़ी वजह यही हो सकती है कि कई बॉस प्रोन्नति के मामले में कंपनी की घटिया नीतियों के कारण मनमाने तरीके अपनाकर कुछ भी कर सकते हैं। उनमें से कई अपने मातहतों के करियर की दशा और दिशा बिगाड़ सकते हैं तो कई मामलों में कम योग्य लोगों को ही बड़ी कुर्सी तक भी पहुंचा सकते हैं।
मंदी के दौर में पिछले कुछ अर्से में तो हालात और भी बुरे हुए हैं और इन प्रबंधकों की मुश्किलें और बढ़ी हैं। उन्हें कर्मचारियों की संख्या घटाने, लागत कम करने और कई दूसरे कठिन मोर्चों पर कमान संभालनी पड़ी है। अनुमान के मुताबिक कई भारतीय कंपनियों ने तो इस मामले में हद ही कर दी। कई कंपनियां दो व्यक्तियों का काम एक ही व्यक्ति से ले रही हैं तो कुछ ने काम के घंटे ही बढ़ा दिए हैं। मतलब कि एक दिन में 12 घंटे कंपनी के लिए काम करना कोई बड़ी बात नहीं रह गई है। इस तरह के परिदृश्य में कामकाजी जिंदगी और असल जिंदगी में संतुलन कायम रखना मुश्किल हो गया है। पिछले कुछ वर्षों में ज्यादा से ज्यादा लोगों ने काम पर अपना ज्यादा वक्त लगाया है और जिंदगी को कम ही वक्त मिल पाया है। यह केवल भारत में ही नहीं हो रहा है बल्कि दुनिया इस बीमारी से जूझ रही है।
साभारः http://www.business-standard.com/india/news/shyamal-majumdar-more-work-+-blackberry-=-holiday/396249/
Friday, June 18, 2010
एक साथ कई काम? कहीं आप बीमार तो नहीं?
श्यामल मजूमदार
अपराह्न के तीन बजे हैं। ईमेल देखने, न्यूज चैनल पर नजर डालने के दौरान आप लंबी दूरी की कॉल भी स्वीकार कर रहे हैं, साथ ही अनिच्छा के साथ सैंडविच का कौर भी ग्रहण कर रहे हैं जो कि ठंडा हो चुका है।
ऐसा इसलिए क्योंकि रोजाना की बैठकों की वजह से आपको पर्याप्त समय नहीं मिल रहा। आपको लग रहा होगा कि आपके साथ भी ऐसा हो रहा है? आपकी तरह ऐसे असंख्य एग्जिक्यूटिव हैं जो 60 मील प्रति घंटा (इसे 80 कर देते हैं) के हिसाब से जिंदगी चलाने के बारे में सोच रहे हैं और उन्हें लगता है कि ऐसे रास्ते पर चलकर ही आगे बढ़ा जाता है।
लेकिन मनोवैज्ञानिकों के पास 24X7 वाले ऐसे अस्तित्व के लिए एक शब्द है और वह है हरी सिकनेस, जिससे ग्रसित कोई व्यक्ति समय की कमी महसूस करता है और इस वजह से हर काम तेजी से करने की चेष्टा करता है। जब इसमें किसी तरह की देरी होती है तो वह घबरा जाता है।
ऐसे लोग पूरे कार्यसमय के दौरान छोड़ी गई मिसाइल की तरह चलते रहते हैं (वे दूसरों के मुकाबले काफी पहले दफ्तर पहुंचते हैं और बाकी लोगों के जाने केबाद दफ्तर छोड़ते हैं), वे इस उम्मीद में ऐसा करते हैं कि स्थायी रूप से व्यस्तता देखकर बॉस प्रभावित होंगे।
इसका दूसरा पहलू हालांकि यह है कि ऐसे लोग काम का व्यस्तता के साथ घालमेल कर रहे होते हैं और स्मार्ट बनकर काम किए जाने को लंबे समय तक व तेजी से काम करने से भ्रामक बना देते हैं। एचआर सलाहकार कहते हैं कि ऐसे व्यस्त लोगों को यह समझने की दरकार है कि करियर के लिए जहां ऐसी भावभंगिमा जरूरी हो सकती है, वहीं जिंदगी में इस भावभंगिमा की वजह से बहुत कुछ देखा जाना बाकी रह सकता है।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि हरी सिकनेस कॉरपोरेट रैट रेस की चिंता में वहां पहुंचना और उसमें मगन होने के मुकाबले बहुत कुछ और है। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों को कभी-कभी यह अहसास नहीं होता कि तेज गति और अतिरिक्त घंटे तक काम करना लंबी अवधि के लिए टिकाऊ नहीं हो सकता है। अगर वे ऐसा कर सकते हैं तो उनके काम की गुणवत्ता वैसी नहीं रह पाती है क्योंकि वे गौरवान्वित रोबोट के अलावा कुछ और नहीं होते।
मॉडर्न टाइम्स मूवी को याद कीजिए जहां चार्ली चैपलिन फैक्टरी की असेंबली लाइन में रोजाना आठ घंटे तक खड़े रहते हैं और वहां से गुजर रहे नट को औजार से कसते रहते हैं। समय-समय पर बॉस कन्वेयर बेल्ट की गति बढ़ा देता है और चैपलिन को तेज गति से काम करना पड़ता है। पूरे दिन वह अपनी बांह को एकसमान तरह से ही चलाते हैं।
आठ घंटे बाद वे जब वहां से बाहर निकलते हैं तो उनका काम नहीं रुकता। घर जाने के दौरान हालांकि उनके पास औजार नहीं होता, पर लोगों के मनोरंजन के लिए वे पूरे रास्ते उसी तरह का हाव-भाव दिखाते रहते हैं। अपने कार्यस्थल पर जल्दबाजी में रहने में रहने वाले लोगों के साथ भी ऐसा ही होता है।
एक समय के बाद वे सोचना बंद कर देते हैं और सही मायने में चैपलिन की ही तरह प्रतिक्रिया जताते हैं, जैसा कि वे घर जाने के दौरान जताते थे। और ज्यादा सक्षम बनने के लिए ऐसे लोग लगातार जल्दबाजी में रहते हैं। उन्हें लगता है कि हर समय आपातकालीन स्थिति है, लेकिन जब सही मायने में आपातकालीन स्थिति आती है तो वे इसका प्रत्युत्तर देने में अपने आपको अक्षम पाते हैं।
'द 80 मिनट एमबीए' के लेखक रिचर्ड रीव्स व जॉन नेल कहते हैं कि नियुक्ति करने और उन्हें बाहर का दरवाजा दिखाने की खातिर कामयाब नेतृत्व अपने आपको व सहयोगियों को समझने या जानने में समय लेते हैं। लेकिन जो लोग जल्दी में होते हैं उन्हें लगता है कि सभी लोगों के लिए संसाधनों का अभाव है। इस किताब ने क्विक हरी सिकनेस टेस्ट के बारे में बताया है, उसका सार इस तरह से है :
1। जब आप सुबह ब्रश कर रहे होते हैं तो क्या आप उस समय कुछ और काम कर रहे होते हैं मसलन अंडरवियर खोजना, बच्चों पर चिल्लाना आदि?
2. जब आप ट्रेन या विमान पकड़ते हैं- उन क्षणों में प्रवेश करना जब दरवाजा बंद होने वाला हो ?
3. जब आप लिफ्ट में प्रवेश करते हैं तो क्या आप तत्काल डोर क्लोज का बटन खोजते हैं? आप इस सच्चाई को नजरअंदाज कर रहे हो सकते हैं कि चार सेकंड में अपने आप दरवाजा बंद हो जाएगा। इस अवधि तक आपको इंतजार करना निश्चित रूप से अकल्पनीय लगता है, क्या ऐसा नहीं है?
4। आप लिफ्ट के बटन को कितनी बार दबाते हैं क्योंकि वह 16वीं मंजिल से नीचे आने में समय ले रहा है? आपमें से कुछ वास्तव में ऐसा करते हैं मानो ऐसा करने से लिफ्ट के आने की गति तेज हो जाएगी।
अब इसकी गिनती कीजिए कि कितने सवालों का जवाब आपने हां में दिया है। अगर स्कोर दो है तो फिर आप समय के साथ हैं। अगर स्कोर तीन है तो यह हरी सिकनेस का शुरुआती लक्षण है। और अगर स्कोर चार है तो दिन में ज्यादातर समय अपनी ही पूंछ का पीछा कर रहे होते हैं, इसका मतलब यह हुआ कि बीमारी उन्नत चरणों में पहुंच चुकी है।
चिकित्सा विज्ञान में इसके लिए शब्द है फिबरिलेशन। जब आपके दिल की धड़कन ऐसी स्थिति में होती है तो खून अवरूध्द हो जाता है बजाय इसके कि इसके जरिए खून का प्रवाह होता है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इन सब बातों का यह मतलब नहीं है कि आप अपने काम की गति इतनी धीमी कर लें कि जब जरूरत पड़े तो तेजी से काम न कर पाएं।
आप इस हद तक न जाएं जिसे ग्लाइक, मल्टी टास्किंग, चैनल फ्लिपिंग, फास्ट फॉरवर्डिंग आदि का नाम देते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि लिफ्ट के बटन को न ठोकें, यह काम को रोक देगा।
http://www.business-standard.com/india/news/shyamal-majumdar-hurry-sickness/397777/
Friday, May 28, 2010
ज्यादा प्रतिस्पर्धा से बिगड़ रही है बाजार की सेहत
प्रतिस्पर्धा से न केवल कारोबारियों, बल्कि ग्राहकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। जरूरत से ज्यादा प्रतिस्पर्धा से किसी का भला नहीं होता है। लेकिन इस वक्त इसका कोई विकल्प भी नहीं है। बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित यह लेख इसके विभिन्न पहलुओं को उजागर कर रहा है.... पेश है लेख
अजित रानाडे
एडम स्मिथ के वक्त से ही अर्थशास्त्री इस बात पर आंख मूंद कर भरोसा करते हैं कि खुले बाजार और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के नतीजे बेहतरीन होते हैं। इससे उपभोक्ताओं का भला होता है क्योंकि उन्हें कम से कम कीमत चुकानी पड़ती है।
साथ ही, इससे उत्पादकों को भी कार्यकुशल होने में मदद मिलती है। सामाजिक तौर पर इससे सीमित संपदा के बेहतरीन इस्तेमाल में मदद मिलती है। प्रतिस्पर्धा की वजह से सभी को अपने-अपने लक्ष्यों के पीछे भागने की इजाजत तो होती है, लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से इससे सामाजिक तौर पर सभी का भला होता है।
स्मिथ के ऐतिहासिक शब्दों में कहें तो लोगों को किसी कसाई या खानसामे की दरियादिली की वजह से नहीं, बल्कि इसीलिए खाना मिलता है क्योंकि वे दूसरे कसाइयों या खानसामों के मुकाबले कम दरों पर खाना बेचकर कमाई करते हैं।
बीते 200 सालों में मुक्त प्रतिस्पर्धा को लेकर मौजूद इस अंधविश्वास पर कई तरह के सवाल भी उठे हैं। हालांकि, ये सवाल सिर्फ 'मुक्त और स्वस्थ' प्रतिस्पर्धा तक ही सीमित रहे हैं। किसी ने प्रतिस्पर्धा के फायदों पर सवाल नहीं उठाए हैं। प्रतिस्पर्धा का यह सिध्दांत सिर्फ वैश्विक या घरेलू कारोबार तक ही सीमित नहीं रहा है। यह आपके और हमारे निजी जीवन में भी उतर आया है।
चाहे मामला स्कूलों में प्रवेश का हो या परीक्षाओं का, खेल का हो या स्वास्थ्य का या फिर राजनीति ही क्यों न हो, आप हर जगह इस सिध्दांत को देख सकते हैं। आधुनिक विश्व की ज्यादातर आर्थिक योजनाएं खुले बाजार और स्वस्थ प्रतिस्पध्र्दा को बढ़ावा देने के लिए बनाई जाती है। बाकी सारी बातें बाजार के लिए छोड़ दी जाती हैं।
इस बारे में आसानी से यह दावा किया जा सकता है कि लाइसेंस राज को खत्म करना इस ओर आधुनिक भारत के लिए एक बड़ा कदम था। इससे मुल्क में प्रतिस्पध्र्दा में तेजी आई और उपभोक्ताओं के साथ-साथ उत्पादकों का भी भला हुआ। इसी तरह कर की दरों में कमी और रुकावटों को खत्म करने से विदेशी कंपनियां अपने देश की तरफ आईं, जो फिर से भारत के लिए एक सही कदम साबित हुआ।
अगर इन विदेशी कंपनियों के खिलाफ अपने देश के कारोबारियों के दिल में कोई टीस है तो बस यही कि आज भी देसी बाजार में सबको एक समान नहीं माना जाता। प्रतिस्पर्धा से आज कोई नहीं डरता है। हाल ही प्रतिस्पर्धा आयोग का गठन भी इसीलिए हुआ है क्योकि देश में प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिल सके। हालांकि, आज ही एक सवाल नहीं पूछा गया है।
सवाल यह है कि जरूरत से प्रतिस्पर्धा जैसी भी कोई चीज होती है क्या? और कब प्रतिस्पर्धा से उपभोक्ताओं और समाज को नुकसान होने लगता है? वित्त जगत के लिए ऐसे सवाल कोई नई बात नहीं हैं। असल में लीमन संकट ने इस बात को साबित किया है कि बेरोक-टोक वाली प्रतिस्पर्धा (साथ में ढीले नियमन और जरूरत से ज्यादा खुली मौद्रिक नीति) की वजह से मुसीबत का दौर आया।
आज पश्चिमी मुल्कों के नेता प्रतिस्पर्धा के स्तर पर लगाम कसना चाहते है। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) भी विकासशील मुल्कों की तरफ या वहां से आने वाली रकम पर नियंत्रण की हिमायत कर रहा है। उसके मुताबिक मुनाफे के लिए ऐसी प्रतिस्पध्र्दा इन बाजारों के लिए अच्छी नहीं होगी क्योंकि इन बाजारों में ज्यादा गहराई नहीं है।
हालांकि, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा को लेकर हमारी चिंता का स्वरूप ज्यादा स्थानीय और स्पष्ट है। साथ ही, यह वित्तीय बाजारों को लेकर भी नहीं है। मिसाल के तौर पर देसी टेलीकॉम कंपनियों को ही ले लीजिए। जबरदस्त प्रतिस्पर्धा की वजह से इन कंपनियों ने कई क्रांतिकारी विचारों को अपनाया। इससे न सिर्फ उनके मुनाफे में इजाफा हुआ, बल्कि इससे भारत में टेलीकॉम सुविधाएं भी दुनिया के सबसे कम दरों पर मिलने लगीं।
इन क्रांतिकारी विचारों में एक था, सभी तकनीकी संबंधित कामों की आउटसोर्सिंग और सिर्फ अपने उपभोक्ताओं और ब्रांड पर ध्यान देना। दूसरा अनूठा विचार था, चिर प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के बीच टावर की साझेदारी करने का। लेकिन लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा की वजह से भला होने के बजाए सबका बुरा ही हुआ। आज इस सेक्टर में नेटवर्क के अक्सर जाम रहने से उपभोक्ताओं की संतुष्टि का स्तर लगातार नीचे जा रहा है।
कीमतों को लेकर छिड़ी जंग की वजह से सभी के मुनाफे पर असर पड़ा है। यहां तक कि लोगों के बीच चर्चा का विषय बने 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में ऊंची कीमत की वजह से इस सेक्टर पर काफी बुरा असर पड़ने की उम्मीद जताई जा रही है। कई रेटिंग एजेंसियों ने इस सेक्टर के लिए अपनी रेटिंग को कम कर दिया है। स्पेक्ट्रम की नीलामी की प्रक्रिया को पाक साफ रही, लेकिन यह इसके विजेताओं के लिए किसी श्राप से कम नहीं है।
इस नीलामी से पहले ही मुल्क के ज्यादातर सर्किलों में ऑपरेटरों की तादाद दुनिया में ज्यादा है। तो क्या ज्यादा प्रतिस्पर्धा के दुष्प्रभाव का मामला है? या फिर मुल्क की सस्ती एयरलाइनों की कहानी को ही ले लीजिए? यहां भी कंपनियों ने क्रांतिकारी विचारों को अपनाया. जिससे इस सेक्टर का तेजी से विकास हुआ। साथ ही, उपभोक्ताओं को कई सुविधाएं भी मिलीं।
जब दुनिया की बाकी एयरलाइन कंपनियां दिवालिया हो रही थीं, तब भी ये सेक्टर तेजी से बढ़ रहा था। लेकिन यहां भी उपभोक्ता संतुष्ट नहीं हैं। आप चाहें तो माइक्रोफाइनैंस सेक्टर की तरफ भी देख सकते हैं। इस सेक्टर के विकास ने मुल्क में वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया। इसमें कई नई सोच वाली और प्रतिस्पर्धात्मक कंपनियां कूद पड़ीं, जिससे ग्रामीण महिलाओं का काफी भला हुआ।
इन्होंने भी अपने काम काज के मामले में कई नई बातों को अपनाया और स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा दिया। हालांकि बीते दिनों में कुछ शिकायतें यहां से भी सुनने को मिल रही हैं। कई माइक्रोफाइनैंस संस्थाएं एक ही कर्ज लेने वाले समूह के पीछे भाग रही हैं, ताकि वे उनका लोन ले सकें। यहां कर्ज इसलिए दिया जाता है, ताकि ये महिलाएं अपने छोटे से कारोबार को बढ़ावा दे सकें।
हालांकि, एक वक्त के बाद जरूरत से ज्यादा कर्ज के बोझ के तले इंसान दब जाता है। तो क्या यहां भी एक सबप्राइम संकट पक रहा है? क्या यह भी जरूरत से ज्यादा प्रतिस्पध्र्दा का मामला नहीं है? आपको इस तरह के कई उदाहरण मिल जाएंगे। इंजीनियरिंग कॉलेजों की देश में जैसे बाढ़ ही आ गई है। भले ही उसमें न तो अध्यापक हैं और न ही छात्र।
टेलीविजन चैनलों को देख कर भी जरूरत से ज्यादा प्रतिस्पर्धा का खतरा ही नजर आता है। एक बड़ी मिसाल चुनाव आयोग भी है। आयोग में हर दिन कई राजनीतिक दलों का पंजीकरण होता है। अब तक यह तादाद करीब 1,000 के आंकड़े को पार कर गई है। ऊपर से आयोग के पास इन्हें अपंजीकृत करने का अधिकार भी नहीं है।
अब अर्थ जगत की ओर वापस आते हैं। अगर एक पल के लिए अति प्रतिस्पर्धा को मान लें, तो बड़ा सवाल यह है कि इस स्थिति के बारे में फैसला कौन करेगा? अगर इस बार को मानें तो बदकिस्मती से इसे रोकने के लिए हमें फिर से 1991 से पहले के दौर में लौटना पड़ेगा, जब लाइसेंस राज का बोलबाला था।
स्मिथ की सोच को मजूबत देने का श्रेय जोसेफ शूएंप्टेर को जाता है। उन्होंने कहा था कि प्रतिस्पर्धा असल में तात्कालिक एकाधिकार की एक शृंखला होती है, जहां प्रतिद्वंद्वियों से सबसे अच्छी सोच वाले का बोलबाला होता है। इससे कंपनियों का रचनात्मक विनाश होता है, जहां नई कंपनियां पुरानी की जगह लेती हैं। इसीलिए भले ही इस वक्त स्पेक्ट्रम और आकाश में भीड़ है, लेकिन ज्यादा प्रतिस्पध्र्दा जैसी कोई चीज नहीं होती। मिट्टी डालिए ऐसे विधर्मी विचार पर। (लेखक आदित्य बिड़ला समूह में मुख्य अर्थशास्त्री हैं। ये उनके निजी विचार है।)
http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=35292
Monday, May 10, 2010
ऑनर किलिंग की निकलती हवा
पहला उदाहरण लेते हैं सबसे सनसनीखेज मामले का। मुजफ्फरपुर से खबर आती है कि ऑनर किलिंग में प्रेमी-प्रेमिका को मार दिया गया। लड़की के भाई ने कैमरे पर स्वीकार कर लिया कि उसने अपनी बहन और उसके प्रेमी को मार डाला। लाश भी बरामद हो गई। लड़की का बाप इतने सदमें में था कि उसने जहर खा लिया। बाद में प्रेमी जोड़ा प्रकट हो गया- यानी लाश को धत्ता बताते हुए फिर जी उठा। फिर पुलिस ने गिरफ्तार बच्चे को धमकाया कि लाश किसकी थी तो उसने शायद कह दिया कि अपने दोस्त को मार डाला। बहरहाल- लड़की का पूरा परिवार तबाह हो गया। मीडिया और पुलिस ने इस तबाही में अहम भूमिका निभाई। सचमुच परिस्थितजन्य साक्ष्य यही कह रहे थे कि लड़की के भाई ने प्रेमी-प्रेमिका को काट डाला था?- ८ मई
दूसरी घटना- मेरठ में एक लड़की छत से गिर गई। लड़की के पिता का यह कसूर था कि वह पुलिस वाला है। इससे उसका रसूख भी जुड़ गया कि उसके डर से कोई सामने नहीं आ रहा है। जुड़ गई प्यार की कहानी। कहा गया कि लड़की प्यार करती थी, जिसके चलते इंस्पेक्टर बाप ने उसे छत से धकेल दिया। कहानी कुछ ऐसी चली कि पूरा परिवार तबाह है। लड़की होश में आने के बाद कह रही है कि उसके पिता ने उसे छत से नहीं धकेला था। हां- इतना जरूर हुआ कि लड़की और उसके परिवार के साथ बदनामी लंबे समय के लिए जुड़ गई।- ९ मई 2०१०
तीसरी घटना- कौशांबी के खलीलाबाद गांव में एक बाप ने अपनी बेटी को काट डाला। इस मामले में भी लड़की के पिता ने स्वीकार कर लिया कि उसने ही अपनी बेटी को मार डाला है। उसने मारने का तरीका भी बताया। उस मामले के आगे बढ़ने की उम्मीद कम ही है, क्योंकि टीवी चैनलों से बातचीत करने वाले पिता को देखने से लग रहा था कि वह गरीब है। उसकी शक्ल देखकर तो निश्चित रूप से लगता है कि उसे सजा मिल जाएगी। ९ मई, २०१०
चौथी घटना- मामला है निरुपमा पाठक का। इसमें ऑनर किलिंग के साथ परंपरावादी हिंदू परिवार, हिंदू धर्म, सेक्स, गर्भ और लिव इन रिलेशन जैसे आधुनिक और पुरातनपंथी मसाले लगे हैं, जिससे मीडिया और तमाम अधिकारवादी झंडावरदारों के पास ढेरों मसाले हैं। शुरू में जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई उससे और परिस्थितजन्य साक्ष्यों से लगा कि लड़की के परिवार वालों ने ऑनर किलिंग कर डाली। लड़की की मां गिरफ्तार हो गई। बाद में पता चलता है कि पोस्टमार्टम में झोल है। एम्स के डॉक्टरों ने कह दिया कि जांच परिणामों से इसे आत्महत्या होने से इनकार नहीं किया जा सकता। -३० अप्रैल, २०१०
अब पुलिस आत्महत्या मानकर भी घटना की छानबीन में आगे बढ़ रही है। लड़की के प्रेमी से भी पूछताछ हुई। दिल्ली के आंदोलनकारियों ने मान लिया कि अब अन्याय हो रहा है। जब तक लड़की के परिवारवाले फंस रहे थे, तब तक तो दिल्ली में न्याय की दिशा ठीक मानी जा रही थी, लेकिन जैसे ही शक की सुई प्रेमी की ओर घूमी, सीबीआई की मांग उठ गई। ढेर सारे सवाल उठे कि सब कुछ मैनेज कर जांच को गलत दिशा में ले जाया जा रहा है। पुलिस भी शायद ठोस नतीजे पर न पहुंच पाए कि आखिर हुआ क्या? बहरहाल, उम्मीद यही लगती है कि अंत में मामले को आत्महत्या मान लिया जाए। हां- यह अलग है कि लड़की के घर पर मरने की वजह और परिस्थितजन्य साक्ष्यों से माता-पिता और कुछ अन्य कथित साक्ष्यों से प्रेमी दोषी लगता है। लड़की ने अगर आत्महत्या की है तो दोनों इसके लिए जिम्मेदार हैं।
पंद्रह दिन के भीतर हुई इन घटनाओं ने पंद्रह हजार सवाल उठा दिए हैं। पहले, दूसरे और तीसरे मामले में लड़की के परिवार वाले तबाह हुए हैं। पहली घटना को देखते हुए पुलिस की भूमिका स्पष्ट होती है कि वे मामले को किस तरह निपटाते हैं और अपने सिर से बवाल हटा देते हैं। आखिरी घटना में अब तक तो लड़की के परिवार वाले तबाह हुए हैं और अब लड़के की दुर्दशा हो रही है जो सुनने में आ रहा है कि अपने परिवार का एकमात्र कमाऊ पूत है। अगर इस तरह के मामलों में तथ्यों का पता नहीं लगाया जाता है और बेवजह लोगों का परिवार तबाह होता है तो निश्चित रूप से मीडिया ट्रायल करने वालों और जांच करने वालों की जबाबदेही बनती है।
Monday, April 19, 2010
अब इंतजार कीजिए कि ललित मोदी कब जेल जाते हैं?????
क्यों गए थरूर? निश्चित रूप से यह सवाल जेहन में आता है। क्या भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते? नहीं। अगर ऐसा होता तो दो मंत्री और सोनिया गांधी के खिलाफ भी कार्रवाई होती और ललित मोदी पर अचानक हमले नहीं होते। ललित मोदी आईपीएल में आने से पहले प्रतिबंधित दवाओं के कारोबार में लिप्त पाए जा चुके थे, जो खबरें इस समय एक्सक्लूसिव चलाई गईं। भ्रष्टाचार और काले धन को सफेद करने का सिलसिला भी तो आईपीएल शुरू होने के समय से ही चल रहा था, तो आखिर कार्रवाई अब क्यों?
दरअसल कांग्रेस पार्टी आभामंडल पर चलती है। देश की जनता को हजारों साल की राजशाही की आदत है। पहले हिंदू सम्राट, फिर मुगल सम्राट और फिर अंग्रेजों का आभामंडल। राजनीतिक सिद्धांतों के मुताबिक राजशाही में राजा को ईश्वर का अवतार माना जाता है। उसमें दैवीय शक्तियां मानी जाती हैं। इसी आभामंडल पर राजशाही चलती है, क्योंकि ऐसे में जनता राजा बनने के बारे में नहीं सोचती, क्योंकि वह राजपरिवार में पैदा नहीं होती। इसके लिए वह अपने पूर्व जन्म या अपनी किस्मत को कोसती है। अब वही हाल नेहरू-गांधी परिवार का है, जिन्हें जन्मजा शासन के योग्य और त्यागी माना जाता है। शशि थरूर कांड में शक की सुई सोनिया की ओर घूम गई और उनके आभामंडल पर चोट पहुंची। ऐसे में जरूरी था कि किसी की बलि ले ली जाए। थरूर की बलि ले ली गई।
जहां तक ललित मोदी की बात है, वो विशुद्ध रूप से कारोबारी रहे हैं- उनके इतिहास से ऐसा ही पता चलता है। चाहे वह अवैध ड्रग्स से पैसा कमाएं या आईपीएल में काला धन सफेद करके। जब तक भाजपा (वसुंधरा राजे) से फायदा मिला, उनके रहे और जब कांग्रेस का जलवा हुआ तो कांग्रेस के साथ हो लिए।
अब तो उनकी कुर्बानी भी तय है। और शायद उनकी ऐसी कुर्बानी होगी, जैसी हर्षद मेहता या तेलगी और सत्यम के राजू की हुई। यह भी संभव है कि आने वाले दिनों में वे जेल में ही नजर आएं। इसके पीछे कहीं से इमानदारी या बेइमानी नहीं आती। आता है तो सिर्फ आभामंडल बचाने की कोशिश। अगर मोदी को कुर्बान किया जाता है तो यह प्रचारित करने में भी सहूलियत मिल जाएगी कि वो भाजपा के आदमी थे और कींचड़ भाजपा की तरफ उछल जाएगा।
Friday, April 16, 2010
ताकि प्रसव पीड़ा में न जुड़े वित्तीय कष्ट
प्रसव के दौरान इलाज पर होने वाले खर्च (मैटरनिटी कवर) के साथ नवजात की बीमारियों के लिए भी साधारण बीमा कंपनियां कवर उपलब्घ कराती है। विभिन्न साधारण बीमा कंपनियां सामूहिक स्वास्थ्य बीमा के अतिरिक्त पारिवारिक स्वास्थ्य बीमा के तहत यह सुविधा उपलब्ध कराती हैं।
क्या है मैटरनिटी कवर
व्यापक स्तर पर देखा जाए तो मैटरनिटी इंश्योरेंस में गर्भावस्था से लेकर प्रसव के बाद तक (नवजात शिशु के इलाज सहित), अस्पताल या इलाज पर होने वाले तमाम खर्चे शामिल होने चाहिए।
कुछ मैटरनिटी बीमा पॉलिसी है जिसके तहत गर्भावस्था के दौरान अस्पताल जाकर चिकित्सक से सलाह लेने का खर्च भी शामिल होता है।
उदाहरण के तौर पर आईसीआईसीआई लोम्बार्ड का हेल्थ एडवांटेज प्लस स्वास्थ्य बीमा के साथ बहिरंग विभाग (ओपीडी) के लिए भी कवर उपलब्ध कराता है जिसमें प्रसव-पूर्व जांच और दवाओं पर होने वाला खर्च शामिल होता है। इसकी सीमा 8,000 रुपये तक की है। ओपीडी के अतिरिक्त मैटरनिटी से जुड़े कई अन्य खर्च इस पॉलिसी में शामिल नहीं हैं।
कहां मिलेगा ये कवर
भारत में कोई भी बीमा कंपनी मैटरनिटी कवर के लिए स्टैंडएलोन पॉलिसी उपलब्ध नहीं कराती हैं। इसकी वजह है कि व्यक्तिगत स्तर पर केवल अप्रत्याशित जोखिमों के लिए ही कवर उपलब्ध कराया जाता है और गर्भावस्था या प्रसव इस दायरे में नहीं आते हैं।
ऑप्टिमा इंश्योरेंस ब्रोकर्स के मुख्य कार्याधिकारी राहुल अग्रवाल कहते हैं, 'कुछ साधारण बीमा कंपनियां ऐसी भी हैं जो पारिवारिक स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में मैटरनिटी कवर को शामिल करती हैं लेकिन इसके लिए न्यूनतम 4 साल तक का इंतजार करना होता है।' उललेखनीय है कि इस तरह की पॉलिसी शादी के बाद ही ली जा सकती है और मैटरनिटी कवर का लाभ लेने के लिए 4 साल तक का इंतजार करना होता है।
अग्रवाल ने बताया 'नैशनल इंश्योरेंस ने बैंक ऑफ इंडिया के ग्राहकों के लिए स्टार नैशनल स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी लॉन्च की थी जिसके तहत बैंक के ग्राहकों को मैटरनिटी कवर के साथ नवजात शिशु के इलाज पर हुए खर्च की वापसी की जाती है। लेकिन इसकी सीमा सम एश्योर्ड का मात्र 5 प्रतिशत है। इसमें इंतजार की अवधि मात्र एक महीने की है।'
नैशनल इंश्योरेंस कंपनी की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार 1 लाख के सम एश्योर्ड का सालाना प्रीमियम 1,746 रुपये और 5 लाख रुपये का 7,071 रुपये है। अपोलो म्यूनिख ईजी हेल्थ इंडिविजुअल एक्सक्लूसिव और मैक्सिमा 360 के तहत मैटरनिटी कवर उपलब्ध कराता है लेकिन इसके इंतजार की अवधि न्यूनतम 4 साल की है।
इस पॉलिसी के तहत प्रसव-पूर्व, अस्पताल में भर्ती होने, प्रसव और प्रसव के बाद होने वाले खर्चे एक विशेष सीमा तक कवर किए जाते हैं। 3 से 5 लाख रुपये तक के सम एश्योर्ड के लिए सामान्य प्रसव की दशा में खर्च की सीमा 15,000 रुपये और शल्य प्रसव के लिए 25,000 रुपये की सीमा है।
नवजात शिशु पर होने वाले खर्च की अधिकतम सीमा 2,000 रुपये है जबकि गर्भावस्था के दौरान और प्रसव के बाद शिशु की मां पर होने वाले खर्च की अधिकतम सीमा 1,500 रुपये है और यह उपरोक्त खर्च में सम्मिलित है।
सामूहिक मेडिक्लेम और मैटरनिटी कवर
अब नियोक्ता द्वारा कराए जाने वाले सामूहिक स्वास्थ्य बीमा की बात करते हैं। आम तौर पर मैटरनिटी कवर प्राप्त करने का यह जरिया सबसे अधिक फायदे का है।
मैटरनिटी कवर सामूहिक स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में स्वत: ही शामिल नहीं होता। कंपनी साधारण बीमा कंपनियों से इसे शामिल करने का अनुरोध करती हैं और इसके लिए अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान करती हैं। अग्रवाल कहते हैं, 'नियोक्ता को कर्मचारी के परिवार के स्वास्थ्य बीमा में प्रसव से जुड़े खर्च शामिल करवाने के एवज में 10 प्रतिशत तक अतिरिक्त प्रीमियम देना होता है।'
इसकी वजह भी है कि इरडा अधिनियम 1999 में मेडिक्लेम या स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी का उल्लेख विशेष रूप से नहीं किया गया है। विभिन्न बीमा कंपनियां भिन्न-भिन्न मेडिक्लेम पॉलिसी बेचती है जिनमें शामिल की जाने वाली बीमारियां और शामिल नहीं होने वाले रोग अलग-अलग होते हैं।
व्यक्तिगत या पारिवारिक स्तर (फ्लोटर पॉलिसी) पर इन पॉलिसियों को अपने अनुरूप बना कर लेना संभव नहीं है। लेकिन, कंपनियों के सामूहिक बीमा के मामले में पॉलिसियां कंपनी की जरूरतों को ध्यान में रखते तैयार की जाती हैं और प्रीमियम भी उसी के अनुसार निर्धारित किया जाता है।
ऐसा नहीं कि मैटरनिटी कवर का लाभ नई कंपनी में नियुक्ति के तुरंत बाद ही उठाया जा सकता है। इस कवर के फायदे लेने के लिए 9 महीने तक का इंतजार करना होता है। यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सामूहिक स्वास्थ्य बीमा के तहत अधिकांश कंपनियां मैटरनिटी कवर को शामिल कराती हैं।
उन्होंने बताया कि मैटरनिटी के मद में अस्पताल या नर्सिंग होम में होने वाले खर्च, सम एश्योर्ड या 50,000 रुपये में से जो भी कम हो, को सामूहिक मेडिक्लेम पॉलिसी के तहत कवर किया जाता है। नवजात शिशु का इलाज भी इसमें पहले दिन से ही शामिल होता है। 3 महीने बाद बच्चे को सामूहिक मेडिक्लेम पॉलिसी में शामिल करवाया जा सकता है।
नवजात शिशु का मेडिक्लेम
अगर आपने न्यू इंडिया इंश्योरेंस या मैक्स बुपा जनरल इंश्योरेंस से मेडिक्लेम पॉलिसी ली हुई है तो जन्म के पहले दिन से ही शिशु को कवर उपलब्ध होगा। अपनापैसा डॉट कॉम के मुख्य कार्याधिकारी हर्ष रूंगटा ने कहा, 'न्यू इंडिया इंश्योरेंस की बर्थराइट पॉलिसी बच्चे के जन्मजात रोगों को पॉलिसी में वर्णित एक खास समय सीमा के भीतर कवर करती है।'
उन्होंने बताया कि मैक्स बुपा भी हाल में ऐसी ही एक पॉलिसी लॉन्च की है जो नवजात बच्चे की बीमारियों को पहले दिन से ही कवर करती हैं। मैक्स बुपा मैटरनिटी कवर फैमिली फ्लोटर पॉलिसी के तहत उपलब्ध कराती है और इसके लिए इंतजार की अवधि न्यूनतम 24 महीने की है।
क्या नहीं होते शामिल
अधिकांश सामूहिक स्वास्थ्य बीमा में गर्भावस्था के दौरान होने वाली मासिक जांच और दवाओं के खर्च शामिल नहीं होते। मैटरनिटी कवर में शुरुआती 12 हफ्तों के दौरान होने वाले गर्भपात को भी शामिल नहीं किया जाता है। इसके अतिरिक्त मैटरनिटी कवर लेने के 9 महीने के दौरान गर्भावस्था से जुड़ा चिकित्सकीय खर्च भी इसमें शामिल नहीं होता है।
http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=33422
Thursday, April 15, 2010
आईपीएल घोटाले में सोनिया गांधी शामिल
सोनिया गांधी के राजनीति में आने और उनके
प्रधानमंत्री पद ग्रहण करने से इनकार के बाद सामान्यतया उन्हें त्यागी, साध्वी,
धर्मनिष्ठ और जनसेवक महिला के रूप में प्रचारित किया जाता है। आईपीएल यानी क्रिकेट
तमाशे में 200 करोड़ रुपये के घोटाले में सोनिया गांधी की भी हिस्सेदारी सामने आ
रही है। साथ ही यह भी सामने आ रहा है कि हुल्लड़बाजी और अनावश्यक खेल से अरबों की
कमाई में हिस्सेदारी के लिए टीम के हिस्सेदारों को केंद्रीय मंत्रियों ने अपने आवास
पर बुलाकर धमकाया और कारोबारियों को अपनी निजी सुरक्षा बढ़ानी पड़ी।
सामान्यतया
हम लोग किसी यूपी या बिहार के नेता को सांसद कोटे की राशि में से कुछ लाख रुपये
कमाने पर उसे बेइमान कहते हैं। या उसके कुछ लाख रुपये की अवैध कमाई (ठेकेदारी,
चंदावसूली आदि) के चलते बेइमान कहते हैं, लेकि न राजनीति से दूर रहने वाले और गणित
करके मंत्री पद हथियाने वाले मंत्री तो एक झटके में 100 करोड़ या 1000 करोड़ कमा
लेते हैं और यह उन्हें मिलता है उन कंपनियों से, जो गरीब जनता से पाई पाई निचोड़कर
अरबपति बनते हैं।
आश्चर्य है कि विदेश राज्य मंत्री ने अपनी प्रेमिका को 75
करोड़ रुपये का तोहफा कारोबारियों को धमकी देकर दिला दिया। और इस मामले में उन्हें
सीधा संरक्षण मिल रहा है सोनिया गांधी से। अगर उन्हें मंत्री पद से हटा दिया जाता
है तो सोनिया गांधी शायद खुद को साफ-पाक दिखा सकेंगी, लेकिन क्या इन बेइमानों को
उनकी बेइमानी की सजा मिल पाएगी... सत्येन्द्र
इसके तथ्यों को जानने के लिए एक रिपोर्ट पढि़ए....
http://www.business-standard.com/india/news/of-intriguearm-twisting-in-high-places/391883/
आदिति फडणीस
आईपीएल की नई टीम कोच्चि को भले ही आगाज से पहले ही कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा हो लेकिन उनके लिए चिंता की कोई बात नहीं क्योंकि देश की सबसे बड़ी वीटो पावर का वरदहस्त उन्हें हासिल हैं। यहां बात हो रही है कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की जो इस मामले में कोच्चि के हक में खड़ी दिखाई दे रही हैं।
कोच्चि की टीम हासिल करने वाले रॉन्दिवु स्पोट्र्स ग्रुप (आरएसडब्ल्यू) के सात निवेशकों में से 2 को पिछले हफ्ते एक केंद्रीय मंत्री के मुंबई स्थित आवास पर तलब किया गया। उनसे कोच्चि टीम की दावेदारी से हटने के लिए कहा गया। यह बातचीत रात 10 बजे शुरू हुई और सुबह करीब 4 बजे तक चली। मंत्रीजी ने उनसे कहा, 'आप जैसे लोगों से निपटने के हमें कई तरीके मालूम हैं।Ó जाहिर है उन दोनों निवेशकों में खौफ सा बैठ गया होगा।
अब उन्होंने दिल्ली दरबार का रुख किया और उसी राजनीतिक दल से संबद्घ एक अन्य मंत्री से गुहार लगाई। उन मंत्री महोदय ने अपने साथ के व्यवहार के लिए उनसे माफी मांगी लेकिन उनका भी विनम्र शब्दों में यही कहना था, 'आईपीएल से बाहर आ जाओ और टीम बेच दो।Ó
अब दोनों निवेशक अपने आप को असहाय स्थिति में पा रहे थे। उनमें से एक अपना कारोबार चलाते हैं और दूसरे एक ब्रोकिंग फर्म के मालिक हैं जो कीमती रत्नों के सौदे करती है। वे करोड़पति हैं। लेकिन उन्हें यह मालूम नहीं था कि क्रिकेट में पैसा लगाना जान में हाथ में लेकर घूमने जैसा काम होगा।
इस कहानी की शुरुआत साल भर पहले हुई जब देश के सात धनाढ्यों ने आईपीएल में पैसा लगाने का मन बनाया। अगले सत्र से इस टूर्नामेंट में दो नई टीमों के आने से उन्हें यह मौका भी मयस्सर हो गया। इस समूह की कमान एक बैंकर के हाथ में थी। जब यह निर्धारित हो गया कि कोच्चि की भी टीम बन सकती है तो समूह ने तय किया कि अगर केरल का कोई जनप्रतिनिधि उनके अभियान का समर्थन करे तो उनकी राह कुछ आसान हो सकती है। उन्होंने शशि थरूर से संपर्क किया और थरूर ने अपनी सहयोगी सुनंदा पुष्कर की हिस्सेदारी के लिए समर्थन मांगा। समूह का कहना है कि पुष्कर की टीम में केवल 5 फीसदी हिस्सेदारी है और उनकी 20 फीसदी हिस्सेदारी की चलाई जा रही खबरें बेबुनियाद हैं।
आरएसडब्ल्यू खेल प्रशंसकों का एक समूह है जो सहायतार्थ आयोजन कराता रहा है लेकिन उसका नाम बहुत ज्यादा सुर्खियों में कभी नहीं रहा। बोली लगाने के लिए बहुत ज्यादा रकम की जरूरत थी। इसके लिए कंपनी की कुल हैसियत 1 अरब डॉलर (तकरीबन 4,500 करोड़ रुपये) होनी चाहिए थी। समूह को लगा कि किसी दिग्गज कारोबारी के सहयोग के बिना उनका मकसद हासिल नहीं हो पाएगा। रॉन्दिुवु ने इसके लिए गौड़ समूह के जे पी गौड़ से संपर्क किया।
आरएसडब्ल्यू के एक सदस्य का कहना है, 'हमें किसी बड़े उद्योगपति के सहारे की दरकार थी।Ó उस समय तक यह स्पष्टï हो चुका था कि दो अन्य स्थानों के लिए भी आक्रामक बोलियां लगाई जाएंगी। इनमें अदाणी समूह अहमदाबाद और वीडियोकॉन और सहारा समूह पुणे के लिए बोली लगाने जा रहे थे। गौड़ ने फैसला लिया कि उन्हें खुद अपने दम पर बोली लगानी चाहिए और उन्होंने आरएसडब्ल्यू का साथ छोड़ दिया। तब रॉन्दिवु का एहसास हुआ कि वह इस खेल में पिछड़ते जा रहे हैं।
बहरहाल पहले दौर की बोली निरस्त कर दी गई और इसे दो हफ्ते बाद चेन्नई में करने का निश्चय किया गया। यह रविवार की एक सुबह थी और चेन्नई में क्रिकेट का एक मैच भी चल रहा था। तब तक पांच कंपनियां होड़ में बरकारर थीं। ये थीं अदाणी समूह, वीडियोकॉन, आरएसडब्ल्यू, साइरस पूनानवाला और उनके साथ बिल्डर अजय शिर्के और सहारा समूह।
जब रॉन्दिवु के पास यह संदेश गया कि उनकी बोली 30 करोड़ डॉलर से कम है और उनकी दावेदारी पिछड़ सकती है। उन्होंने आपस में राय-मशविरा किया और अपनी बोली बढ़ाकर 33.3 करोड़ डॉलर (तकरीबन 1,533 करोड़ रुपये) कर दी। आखिरकार वह टीम हासिल करने में कामयाब हो गए। जश्न मनाने की तैयारी भी हो गई थी लेकिन उनके मुखिया ने चेताया कि पहले फ्रैंचाइजी लैटर हाथ में आ जाए उसके बाद ही कुछ किया जाए।
उन्होंने दिल्ली में आईपीएल कमिश्नर ललित मोदी से मुलाकात की। जिस कमरे में बातचीत हो रही थी उसमें एक केंद्रीय मंत्री की बेटी भी मौजूद थीं। उनसे कहा गया कि चलो 5 करोड़ डॉलर लो और इससे बाहर आ जाओ। पहले तो समूह भौचक्का रह गया लेकिन जवाब आया, 'मान लीजिए कि हम इससे निकल भी जाते हैं तो कौन हमें यह रकम देगा।Ó यह जवाब एक निवेश बैंकर की ओर से आया था। मुखिया ने कहा, 'बातें न बनाएं! मैं निवेश बैंकर हूं और अच्छी तरह से जानता हूं कि कोई भी हमें इतनी बड़ी रकम नहीं देगा।Ó दूसरी ओर से जवाब आया, 'एक निवेश बैंकर का ही ग्राहक।Ó
हालांकि समूह खुद अचरज में पड़ गया लेकिन उन्होंने जवाब दिया कि उनकी साख दांव पर लगी है इसलिए वे ऐसा नहीं कर सकते। सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। संभाव्य देनदारियों, हिस्सेदारी का तरीका और आखिर में 10 फीसदी बैंक गारंटी जैसी तमाम औपचारिकताओं की आड़ में फ्रैंचाइजी पत्र वाले दस्तावेज को देने में देरी की जाती रही। आखिर में एक संदेश आया, 'आप इसमें क्यों फंसे? टीम बेच दो।Ó बातचीत की आखिरी जगह मंत्री का बंगला ही था।
समूह को लग गया था कि अगर राजनीतिक तरीके से ही उन्हें न्याय मिल पाएगा तो इसके लिए भी उन्हें किसी राजनेता का ही दरवाजा खटखटाना होगा। शशि थरूर ने अपने दोस्तों को भरोसा दिलाया कि वह विवाह की अपनी योजना को थोड़ा आगे खिसका सकते हैं। सुनंदा पुष्कर जरूर रुआंसी हो गईं। समूह के दो गुजराती निवेशकों ने अपने और अपने परिवार के लिए अतिरिक्त निजी सुरक्षा तैनात कर दी।
समूह के एक सदस्य का कहना है, 'पूरा खेल कुछ यूं था कि हम फ्रैंचाइजी अगले बोलीकर्ता के लिए खाली कर दें।Óयह मामला तो तब है जब किसी भी फ्रैंचाइजी को शुरुआती दो साल में 40 से 50 फीसदी का नुकसान झेलना पड़ता है। एक सदस्य का कहना है, 'हम पहले दो साल में कम से कम 100 करोड़ रुपये का नुकसान होते देख रहे हैं।Óतटस्थ जानकारों का मानना है कि यह विवाद महज 'चालाक लोगोंÓ के दो समूहों के हितों का टकराव है। बीसीसीआई की गवर्निंग परिषद के एक सदस्य का कहना है, 'मोदी के मामले में तो एकदम स्पष्टï है। उनके दामाद के पास इंटरनेट विज्ञापन अधिकार हैं और उनके साले एक टीम में हिस्सेदार हैं। जहां तक शशि थरूर की बात है तो वह जिस महिला से शादी करने जा रहे हैं उन्हें 75 करोड़ रुपये की हिस्सेदारी दी गई जो कुछ साल के बाद 500 करोड़ रुपये तक की हो सकती है। उनके पास जो मंत्रालय है उसमें भी उन्हें पश्चिम एशिया प्रभार मिला हुआ है और उनका कारोबार भी यहीं फैला है। क्या यह भी किसी संपत्ति से कम है।Ó
Monday, March 22, 2010
यमुना सफाई की नई मुहिम रंग लाई

सत्येन्द्र प्रताप सिंह
अगर किसी काम को पूरा करने का संकल्प लिया जाए तो कुछ भी असंभव नहीं है।
आर्ट आफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर की अगुआई में पिछले मंगलवार को शुरू हुए यमुना सफाई अभियान ने कुछ ऐसा ही रंग दिखाया। 'मेरी दिल्ली, मेरी यमुना' नाम से शुरू किए गए रविशंकर के इस अभियान में न केवल आर्ट आफ लिविंग से जुड़े लोग शामिल हुए, बल्कि दिल्ली जल बोर्ड की योजना 'आओ यमुना में जान डालें' भी शामिल हुई।
साथ ही नगर निगम की गाड़ियां भी पूर्व निर्धारित सफाई स्थल पर पहुंचने लगीं। स्थिति यह हुई कि पहले यमुना के आईटीओ घाट की चमक बढ़ी, 18 मार्च को वजीराबाद, 19 को निजामुद्दीन, 20 को कालिंदी कुंज, 21 मार्च को आईएसबीटी के पास कुदसिया घाट पर सुंदरता वापस लौट आई।
24 मार्च तक चलने वाले इस अभियान के दौरान कुल 7 घाटों का उध्दार होना है। करीब 10 महीने से दिल्ली जल बोर्ड यमुना की सफाई का अभियान 'आओ यमुना में जान डालें' चला रहा है, जो यमुना एक्शन प्लान-2 का हिस्सा है।
योजना में 4 स्तर पर काम किए जा रहे हैं, जिसमें स्कूल, झुग्गी-झोपडियों, अनधिकृत कालोनियों और ग्रामीण इलाके शामिल हैं। इन इलाकों में नुक्कड़ नाटक, फिल्म शो, जूट के थैले वितरित कर और अन्य पोस्टर बैनर के माध्यम से यमुना की सफाई के लिए जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है।
श्री श्री रविशंकर के 'मेरी दिल्ली, मेरी यमुना' कार्यक्रम में जल बोर्ड की भी योजना शामिल हो गई। पहले जहां यह योजना गरीब बस्तियों तक सिमटी हुई थी, रविशंकर के आह्वान के साथ खूबसूरत बने अपार्टमेंट से निकलकर लोग सफाई के लिए सामने आने लगे।
कालिंदी कुंज में सफाई अभियान का नेतृत्व कर रहे एनजीओ आराधना से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस कार्यक्रम को बेहतर समर्थन मिल रहा है, खासकर उन लोगों का जिनके गंदे घाटों पर आने की उम्मीद हम कभी नहीं करते थे।
सफाई के काम में लगे 'सोसायटी फार सोशल डेवलपमेंट' के ब्रजेश कुमार कहते हैं, 'सफाई की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति या विभाग या सरकार की नहीं है। सबने मिलकर यमुना को गंदा किया है। इसमें सरकार की लापरवाही तो है ही, फैक्टरियों की गंदगी के साथ आम लोगों की भी लापरवाही झलकती है।'
गाजियाबाद के इंदिरापुरम से कालिंदी कुंज में यमुना सफाई अभियान में शामिल होने आए राजीव कहते हैं, 'राष्ट्रमंडल खेल होने जा रहे हैं। अगर यमुना में गंदगी का आलम यही रहा तो आखिर दुनिया भर से आने वाले खिलाड़ी और अन्य लोग किस तरह का संदेश लेकर जाएंगे?'
स्वयंसेवी संस्थाओं, सरकारी महकमों और आम लोगों के साथ कंपनियों ने भी इस योजना में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जहां सफाई अभियान चल रहा होता है वहां फिलिप्स पीने के स्वच्छ पानी की व्यवस्था करती है तो मैक्स हेल्थ केयर किसी तरह की स्वास्थ्य समस्या होने पर इलाज के लिए तैयार रहती है।
श्री श्री रविशंकर का कहना है- यमुना की सफाई पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं पर कुछ परिणाम नहीं निकल रहा। अगर हम 'मेरी दिल्ली मेरी यमुना' की बात समझेंगे तो इसमें प्लास्टिक की थैली या बोतल आदि जैसी गंदगी नहीं फैलाएंगे।
उन्होंने कहा कि यमुना में 18 बड़े और 1557 छोटे नाले गिरते हैं। इनके पानी को साफ करने की जरूरत है, जिसके बाद इसका उपयोग अन्य कामों के लिए किया जा सके।
http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=32338
Wednesday, February 24, 2010
...और सरकार ने ही किसानों को भिखारी बनाया
विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने कृषि को समाज की संजीवनी कहा। नई सूचना है। लगता है संजीवनी खाकर ही किसान जिंदा रहते हैं, नहीं तो खेती करना इस समय ऐसा धंधा बन गया है कि किसानों का मरना तय था।
मजे की बात है कि कुछ इलाकों के किसान नहीं जानते थे कि संजीवनी कैसे उगाई जाए? यही कारण लगता है कि उन राज्यों में किसान आत्महत्या करने को मजबूर होते हैं। हालांकि जहां तक मैने देखा है- किसान को खेती से तभी मुनाफा होता है, जब वह दिखावे के लिए खेती करे और वास्तव में उसका धंधा कुछ और हो। वह ठेकेदारी हो सकता है, परिवार के किसी सदस्य का सरकारी नौकरी में होना हो सकता है। अन्यथा बड़े से बड़े खेतिहर भी अपने बच्चे को बेहतर स्कूल में पढ़ाने के लायक नहीं होते।
अब विधि मंत्री भी बेचारे क्या कर सकते हैं? क्या किसानों के लिए उनके पास कोई ऐसी व्यवस्था है कि वे किसानों को उनके उत्पाद का इतना मूल्य दिलाएं कि वे भी अपने बच्चे को एमिटी इंटरनेशनल, डीपीएस, डालमिया इंस्टीच्यूट के फीस अदा करने लायक बन सकें?
किसानों को राहत की भीख, कर्ज की भीख, छूट की भीख, गरीबों को दिए जाने वाले कार्ड की भीख, छूट देने की भीख आदि तो दिया जा रहा है, लेकिन किसानों को भी क्या कभी इतना पैसा मिल सकता है कि जिस तरह से कंपनियां अपने मुनाफे में हर तिमाही ३० प्रतिशत की बढ़ोतरी कम से कम दिखा देती हैं, वैसा ही हर सीजन में किसानों को भी अपने उत्पाद पर ३० प्रतिशत मुनाफा मिले और उन्हें भीख देने की नौबत न आए। वे भी गर्व से कह सकें कि हम अपना व्यवसाय करते हैं, भिखारी नहीं है। हमें खाद, बीज, राशन, तेल पर छूट नहीं चाहिए।
एक तर्क यह भी दिया जाता है कि किसानों को टैक्स नहीं देना होता है। यही तो कहना चाहते हैं कि मुनाफा दो और टैक्स भी लो। क्यों नहीं टैक्स देंगे? पहले लागत लगाने के बाद मुनाफा तो हो। अगर ३० प्रतिशत मुनाफा हो तो हर किसान १० प्रतिशत टैक्स तो खुशी-खुशी दे देगा।
Wednesday, January 20, 2010
अब पवार ने दिया दूध की कालाबाजारी करने वालों को अवसर
हालांकि जब शरद पवार से कीमतें घटने के ज्योतिष ज्ञान के बारे में पूछा जाता है तो वे अपने ज्योतिष ज्ञान से साफ मुकर जाते हैं।
खाद्य एवं कृषि मंत्री शरद पवार ने आज कहा कि उत्तरी भारत में दूध की कमी के कारण दुग्ध उत्पादक इसकी कीमत बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने यह भी आगाह किया कि जब तक कीमतों को बढ़ाने का निर्णय नहीं किया जाता राज्यों के लिए दूध को खरीदने में मुश्किल पेश आएगी। पवार ने कहा, 'हम विशेषकर उत्तरी भारत में दूध की अपर्याप्त उपलब्धता की स्थिति को झेल रहे हैं। अक्टूबर में हमने कीमतों में वृद्धि करने का निर्णय किया था। इसकी कीमतों को बढ़ाने की मांग की जा रही है।Ó उन्होंने कहा, 'जब तक कोई निर्णय नहीं हो जाता मुझे नहीं मालूम कि विभिन्न राज्य लोगों की मांग को पूरा करने के लिए दूध खरीदने में सक्षम होंगे या नहीं। यह दर्शाता है कि किस तरह से इस क्षेत्र की अनदेखी हुई है।Ó
अब देखना है कि दूध के लिए मारामारी कब से शुरू होती है और कालाबाजारी करने वाले इससे कितने सौ करोड़ रुपये कमाते हैं। चीनी की कीमतें बढ़वाने में तो पवार साहब का हित समझ में आता है। लेकिन लगता है कि अब उन्होंने दूध के कारोबार में भी कदम रख दिया है?
Tuesday, January 12, 2010
पवार की धोखेबाजी से चीनी मिलों को मोटी कमाई
शायद यह सभी को याद हो कि जब उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों ने परोक्ष रूप से धमकी दे दी थी कि किसानों का गन्ना वे 200 रुपये क्विंटल के हिसाब से नहीं लेंगे, तब उत्तर प्रदेश सरकार ने कच्ची चीनी के प्रवेश पर रोक लगाई थी। मिलों को भरोसा था कि वे पेराई नहीं भी करते तो आयातित कच्ची चीनी साफ करके मोटा मुनाफा कमा लेंगे। किसानों का गन्ना सूखे- उनकी बला से। केंद्र में तो पवार साहब हैं ही बयान देने के लिए कि कच्ची चीनी महंगी पड़ रही है, इसलिए चीनी की कीमतें 100 रुपये किलो तक जा सकती हैं।
आखिर केंद्र सरकार किसे बेवकूफ बना रही है? चीनी माफिया मंत्रियों ने जनता को धोखा देने की ठान ली है। अभी तो मान लीजिए कि कच्ची चीनी आ रही है, वह महंगी पड़ रही है इसलिए दाम बढ़ रहे हैं। याद कीजिए कि 2009 मार्च से लेकर अक्टूबर तक वही चीनी मिलों द्वारा 30 रुपये किलो तक बेची गई, जो चीनी मार्च के पहले 16 रुपये किलो बिक रही थी। आखिर चीनी तैयार करने की लागत कितनी बढ़ गई है कि मिलें थोक भाव में 41 रुपये किलो चीनी बेचने लगीं? आखिर मिलों को कितना मुनाफा खाना है? कितने प्रतिशत लाभ कमाना है, चीनी की कमी दिखाकर? इसके लिए कौैन जवाबदेह है? केंद्र सरकार या राज्यों की सरकारें? जवाब या तो केंद्र सरकार दे सकती है... या लोकतंत्र में सबसे ताकतवर माना जाने वाला मतदाता- यानी आम जनता।
Friday, January 8, 2010
मोबाइल है तो स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक आपको कभी भी धमकी दे सकता है!
फोन काटते ही फिर फोन आ गया तो मेरी पत्नी ने फोन ले लिया। वह बात कर रही थी तो स्पीकर ऑन था और फोन करने वाला लगातार गालियां दिए जा रहा था, ऐसी गालियां- जिसे लिखना भी संभव नहीं है। बहरहाल मैने फिर फोन काटा।12 बजे तक मैने कम से कम 5 बार फोन काटा। तब तक ऑफिस जाने के लिए मेरे मित्र भी आ चुके थे। मैं उन्हें इस घटना के बारे में बता ही रहा था कि फिर कॉल आ गई। इस बार मेरे मित्र ने फोन उठाया और उन्होंने समझाने की कोशिश की कि यह उस व्यक्ति का नंबर नहीं है, जिसे तुम तलाश रहे हो। उधर से जवाब आया कि तब उसे पैदा कर। बहरहाल उन्होंने भी थोड़ा-बहुत अपनी भाषा में समझाने की कोशिश की। हम लोग ऑफिस के लिए निकले और मैं लगातार फोन काटता रहा या उसे रिसीव करके छोड़ता रहा।
बहरहाल ऑफिस पहुंचने पर इस घटना के बारे में चर्चा कर ही रहा था कि फिर फोन आने लगा। इस बार मैने फोन उठाया और कहा कि यह एकता का नंबर नहीं है। फोन करने वाले ने कहा कि अभी थोड़ी देर पहले इसी फोन पर एकता से बात हुई है, तू उससे बात करा। बहरहाल- मैने फिर फोन काट दिया। फोन काटते ही फिर फोन आ गया। इस बार मेरे एक सहकर्मी मनीश ने फोन उठाया। उन्होंने फोन करने वाले को समझाने की कोशिश की कि भाई यह नंबर सत्येन्द्र जी का है। उसने कहा कि तुम फोन का कागज लेकर बैंक आ जाओ। उन्होंने फोन काट दिया और एफआईआर करने की सलाह दी। इस बीच मुझे कॉल करने वाले ने कहा कि मैं प्रवीण बोल रहा हूं, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक बैंक गुडग़ांव से। वह बार-बार पैसे वापस करने की बात कर रहा था।
इस बीच 4 काल और आई और मैं फोन काटते अपने सहयोगी को लेकर आईपीओ एक्सटेंशन थाने की ओर बढऩे लगा। थाने पर पहुंचने पर पहले तो वहां मौजूद पुलिसकर्मी ने मुझे समझाया कि आप पांडव नगर इलाके के थाने में एफआईआर दर्ज कराइये। हालांकि थाने पर यह बताने पर कि मैं बिजनेस स्टैंडर्ड में रिपोर्टर हूं और आईटीओ पर मेरा ऑफिस है, जो आपके थाना क्षेत्र में आता है, तो उसने मुझे सब इंस्पेक्टर (शायद) मीना यादव के पास भेज दिया। उन्होंने मुझे कॉल रिकॉर्ड करने की सलाह दी और एक लिखित आवेदन अपने पास जमा करा लिया, जिसमें मैने अपने दो घंटे के मानसिक उत्पीडऩ के बारे में लिख दिया। इंसपेक्टर ने मुझे कार्रवाई करने का आश्वासन देकर विदा कर दिया।
मैं अभी कार्यालय पहुंचा भी नहीं था कि इंसपेक्टर मीना यादव का फोन आ गया। उन्होंने कहा कि मेरी बात आपके द्वारा दिए गए नंबर पर हुई है और कॉल रिसीव करने वाले ने बताया है कि वह स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक से बोल रहा है। उसने इंसपेक्टर को बताया था कि यह नंबर उसे मिला है, जिसमें उसे एकता का नाम बताया गया है। बहरहाल इंसपेक्टर ने कहा कि अब इस नंबर से आपको कॉल नहीं आनी चाहिए और अगर आती है तो आप मुझे इनफार्म करिएगा। बैंक वाले ने इंसपेक्टर से यह भी कहा कि कॉल रिकार्डेड है और किसी तरह की गाली-गलौझ नहीं की गई है। शायद उसने बाद में की गई 2-3 कॉल की रिकॉर्डिंग की होगी।बहरहाल, उसके बाद ब्लॉग पर लिखने तक मेरे पास कॉल नहीं आई है।
मैं यही सोच रहा हूं कि आर्थिक अखबार में काम करने के नाते हम लोग लगातार रिजर्व बैंक के गाइडलाइंस के बारे में लिखते हैं, चिदंबरम का भाषण सुनते है और उसे छापते हैं कि वसूली के नाम पर किसी को तंग नहीं किया जाएगा। साथ ही पुलिस का आश्वासन होता है कि स्पेशल सेल बनी है और इस तरह की किसी भी सूचना पर तत्काल कार्रवाई होगी। आखिर ये सब आश्वासन, खबरें किसके लिए हैं।
हालांकि मैने अपनी अब तक की जिंदगी में किसी बैंक से कोई कर्ज नहीं लिया है। भगवान न करें कि कभी लेना भी पड़े, लेकिन अगर जिस व्यक्ति ने कर्ज लिया है तो ये निजी बैंक कितनी गुंडागर्दी करते हैं यह मुझे समझ में आ गया। दो-तीन घंटे का मानसिक उत्पीडऩ मेरे ऊपर इतना भारी पड़ा कि उसका बयान किया जाना भी मुश्किल है।
Sunday, November 22, 2009
किसान, बेरोजगार सभी- लिब्रहान मसले पर हुए हिंदू और मुसलमान
इंडियन एक्सप्रेस में लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित हो गई। इसमें अटल, आडवाणी, जोशी और कल्याण सिंह को दोषी ठहराया गया। जो रिपोर्ट संसद में पेश की जानी थी, अखबार में पेश हो गई। सही कहें तो यह मसला इस समय कोई मसला ही नहीं था।
असल मसला तो यह था कि चीनी लाबी के खिलाफ तैयार हो रहे जनमत को भ्रमित करना था। प्रदर्शनकारी किसानों का उत्पात, दारू पीते लोगों की फोटो, दारू की खाली बोतलें दिखाए जाने पर भी मुद्दे से भटकाव नहीं हुआ था। आम जनता लूट के खिलाफ एकजुट हो रही थी और वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी। ऐसे में कांग्रेस ने लिब्रहान आयोग का पासा फेंक दिया। पुराने सत्ताधारी हैं। बाजी कैसे खाली जाती। संसद ठप। अब हर गली- चौराहे पर सिर्फ एक ही चर्चा। बाबरी किसने ढहाई? कुछ कहेंगे भाजपा दोषी, कुछ कहेंगे कांग्रेस दोषी। हालांकि इस मसले से किसी के पेट में रोटी नहीं जानी है। किसी किसान का पेट नहीं भरना है। किसी बेरोजगार को रोजगार भी इस मसले से नहीं मिलने वाला है। लेकिन यह सही है कि यह पीड़ित तबका लिब्रहान आयोग और बाबरी पर चर्चा करके अपना पेट भर लेगा। किसानों का गेहूं १० रुपये किलो खरीदकर उन्हीं को २० रुपये किलो आटा देने और २० रुपये किलो अरहर खरीदकर १०० रुपये किलो अरहर का दाल देने वाले लोग फिर बचकर निकल जाएंगे। देश की जनता अब या तो हिंदू हो जाएगी, या मुसलमान। गरीब, किसान, शोषित, पीड़ित, दलित औऱ बेरोजगार कोई नहीं रहेगा।
हां इससे कांग्रेस को फायदा जरूर हो जाएगा। उन्हें पता है कि ये मुद्दा मर चुका है, जिससे भाजपा लाभ नहीं उठा सकती। इसकी प्रतिक्रिया में कांग्रेस को जरूर थोड़ा फायदा हो जाएगा। मसले की प्रतिक्रिया से कम, असल मुद्दों से भटकाव और आक्रोश की दिशा बदलने का फायदा कांग्रेस को जरूर मिलेगा। भाजपा एक बार फिर गलत मसला उठाकर जनता की नजर में कमजोर साबित हो जाएगी।
Friday, November 20, 2009
तोड़फोड़ और हंगामा करके सारी व्यवस्था न ठप करें तो क्या करें किसान?
तर्क दिया जा रहा है कि किसानों ने बहुत उत्पात मचाया। दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान। आखिर बेचारा किसान अपनी बाद किस ढंग से रखे। क्या अगर वह अपने घरों में शांत बैठकर सब दुख झेलता रहता है तो यह कथित सभ्य समाज और मीडिया उसकी बात को उठाता है? दिल्ली के अखबार किसानों के उत्पात के विरोध से पटे पड़े हैं। आखिर में इसके पहले इन मुनाफाखोरों और नेताओं के समर्थक कहां सोए रहते हैं?
पिछले पांच महीनों महीनों के दौरान कृषि के गौण उत्पादों की कीमतों में भारी उछाल आयी है, लेकिन उसका कोई लाभ कृषि के प्राथमिक उत्पादकों को नहीं मिला है।
किसानों को इसी बात की आशंका सता रही है कि आने वाले समय में भी उनके प्राथमिक उत्पाद न्यूनतम समर्थन मूल्य या उसके आसपास की कीमत पर खरीद लिए जाएंगे और उससे जुड़े उत्पाद चार या पांच गुने दाम पर बिकेंगे। एक आम उपभोक्ता के नाते उन्हें भी उसी बढ़ी कीमत पर गौण उत्पादों की खरीदारी करनी पड़ती है।
किसानों के मुताबिक पिछले सीजन में उन्होंने मंडी में दलहन (अरहर) की बिक्री 2000 रुपये प्रति क्विंटल तो मसूर की बिक्री 1700 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की थी। नए दलहनों के लिए सरकार ने कीमतों में प्रति क्विंटल 30-60 रुपये की बढ़ोतरी की है।
इस साल भी वे अधिकतम 1800-2200 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से दलहन की बिक्री करेंगे। जबकि नए सीजन में भी दालों के भाव में कोई खास गिरावट की संभावना नहीं है। किसान बताते हैं कि किसी दलहन को दाल बनाने एवं उस पर पॉलिश वगैरह करने में प्रति किलोग्राम अधिकतम 6 रुपये की लागत आती है।
मांग के मुकाबले आपूर्ति में कमी आते ही बाजार में भाव चढ़ने लगते हैं, लेकिन उस अनुपात में उन्हें उसका लाभ नहीं मिलता है। किसान कहते हैं कि उनके लिए मांग एवं पूर्ति का कोई सिध्दांत काम नहीं करता। गन्ने के भुगतान मूल्य के मामले में भी किसानों की यही शिकायत है।
दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे किसान पूछते हैं, 'क्या केवल चीनी बनाने की लागत बढ़ती है? चीनी की कमी होते ही 140-145 रुपये प्रति क्विंटल की दर से खरीदे गए गन्ने से बनी चीनी की कीमत 3600-3700 रुपये प्रति क्विंटल हो गयी तो क्या इसका लाभ गन्ना किसानों को नहीं मिलना चाहिए?'
गेहूं किसान रुआंसे मन से कहते हैं, 'पिछले साल उन्होंने अधिकतम 1000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गेहूं की बिक्री की, लेकिन धान के उत्पादन में कमी को देखते हुए बाजार में गेहूं की कीमत 1400 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी है। उन्हें इसका कोई लाभ नहीं मिला। उल्टा उन्हें अब 20 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से खाने के लिए आटा खरीदना पड़ रहा है।'
प्राथमिक उत्पादक को नहीं मुनाफा
कृषि जिंस कीमत जुड़े उत्पाद कीमत
दलहन अरहर 2000 अरहर दाल 9000
दलहन मसूर 1700 मसूर दाल 6000
सरसों 1600 सरसों तेल 6000
धान 950 चावल 2200
बासमती धान 1300 चावल 6500
गेहूं 1000 आटा 1900
चीनी 1800 चीनी 3700
सभी कीमत रुपये प्रति क्विंटल में
Thursday, November 19, 2009
आखिर क्यों न मिले गन्ने का उचित दाम...क्या कंपनियां और सरकार जवाबदेह नहीं?
जन्तर मंतर पर ४ दिन से प्रदर्शन चल रहा है। किसानों के चेहरे पर बेबसी साफ झलकती है। राजनीति करने वाले राजनीति कर रहे हैं, करना भी चाहिए। कंपनियों ने चीनी की कमी दिखाकर करोड़ो कमाए और अब चीनी के दाम ३६ रुपये किलो के करीब तय जो चुके हैं। शीरे का दाम कंपनियां बढ़ाकर २६ रुपये लीटर करने की तैयारी कर रही हैं, ऐसे में किसानों को क्यों बेबस बनाए रखना चाहती है सरकार।
किसानों के पास इसका तर्क भी है कि क्यों उन्हें ज्यादा दाम मिलना चाहिए। बागपत शुगर फैक्ट्री (सहकारी) के अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के तमाम सहकारी मिलों के अध्यक्षों के संगठन के चेयरमैन प्रताप सिंह गुर्जर किसानों की इस मांग को सही ठहराते हुए कहते हैं, 'थोक बाजार में चीनी की मौजूदा कीमत 3,600 रुपये प्रति क्विंटल है। पेराई से निकले बगास 280 रुपये प्रति क्विंटल, शीरा 1,600 रुपये प्रति क्विंटल और प्रेस मड 126 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिकते हैं। एक क्विंटल गन्ने से करीब 10 किलोग्राम चीनी का उत्पादन होता है। यानी अन्य सह उत्पादों को छोड़ भी दिया जाए तो एक क्विंटल गन्ने से केवल 360 रुपये की चीनी बनती है। ऐसे में 165-170 रुपये प्रति क्विंटल गन्ने की कीमत को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता।'
आखिर सरकार को ये क्यों समझ में नहीं आता? क्या चुनाव के पहले चीनी कंपनियों से इतना ब्लैक मनी वसूल लिया गया था कि १५ रुपये किलो लागत वाली चीनी ६ महीने तक ३० रुपये किलो बेचवाने के बाद भी कंपनियों का सरकार पर चढ़ा एहसान नहीं उतर रहा है?
Friday, November 6, 2009
मोंटेक सिंह ही बताएं कि क्या किसानों को मिल रहा है कृषि जिंसों की कीमतों में बढ़ोतरी का मुनाफा
बिचौलिए मुनाफा खा रहे हैं, हो सकता है कि प्रसंस्करण इकाइयों को फायदा हो, साथ ही बड़े आयातकों को भी आयात कराकर मुनाफा कराया जा रहा हो, लेकिन किसानों को तो कहीं से फायदा नहीं हो रहा है। उन्हें तो फायदा तब होता, जब अनाज खेतों से उपजने के बाद भी रेट महंगे रहते, न्यूनतम समर्थन मूल्य मूल्य उनके उत्पादन लागत से ५० प्रतिशत ज्यादा होता और सारा खाद्यान्न सरकार खरीद लेती और उसके बाद उसे बाजार में उतारती।
आइए देखते हैं कि क्या है आंटे दाल का भाव। चावल और गेहूं के अलावा कमोबेश सभी कृषि जिंसों के भाव पिछले महीने भर में 20 फीसदी से ज्यादा उछल गए हैं। देश में होने वाले कुल कृषि उत्पादन में 20 फीसदी हिस्सेदारी खरीफ के अनाज, दालों और तिलहनों की होती है। रबी की फसलें भी इसमें 20 फीसदी योगदान करती हैं। बाकी 60 फीसदी बागवानी, मांस और मछली उद्योग से मिलता है।
हालांकि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इस साल के आखिर तक सरकारी कवायद की वजह से खाने पीने की वस्तुओं के दाम कम हो जाने की उम्मीद जताई है, लेकिन यह बहुत दूर की कौड़ी लग रही है।
17 अक्टूबर को थोक मूल्य सूचकांक पिछले साल 17 अकटूबर के मुकाबले 1.51 फीसदी बढ़ा, लेकिन खाद्य मूल्य सूचकांक में 12.85 फीसदी की उछाल देखी गई। कृषि उत्पादों के वायदा कारोबार की देश की सबसे बड़ी संस्था नैशनल कमोडिटी ऐंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज (एनसीडीईएक्स) मुख्य अर्थशास्त्री और ज्ञान प्रबंधन प्रमुख मदन सबनवीस अहलूवालिया की बात से सहमत नहीं हैं।
उन्होंने कहा, 'देश के हरेक क्षेत्र में अलग-अलग वस्तुओं की खपत कम-ज्यादा रहती है और इस मामले में उपभोक्ताओं का जायका बदल नहीं सकता। चने की दाल सस्ती और आसानी से उपलब्ध है, केवल यही सोचकर अरहर की जगह कोई चने की दाल खाना शुरू नहीं करेगा। इसी तरह कुछ खास राज्यों में चावल कभी गेहूं की जगह नहीं ले सकता। इसलिए सरकार लाख चाहे, कीमतों में तेजी रुक नहीं सकती।'
इस साल मॉनसून की लुकाछिपी की वजह से खरीफ की फसल में 18 फीसदी कमी का अंदेशा जताया जा रहा है। इसी तरह रबी की फसल में गेहूं भी पिछले साल से कम होने की बात कही जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में कुल खाद्यान्न उत्पादन में रबी का योगदान बढ़ा है और पिछले वित्त वर्ष में यह हिस्सेदारी 50 फीसदी रही थी।
हालांकि प्रमुख अनाज गेहूं और चावल के दाम कम बढ़े हैं क्योंकि कारोबारियों को डर है कि सरकार दाम काबू करने के लिए पिछले रबी और इस बार के खरीफ सत्र में बनाए गए बफर स्टॉक का इस्तेमाल कर लेगी। लेकिन दालों, चीनी और मसालों के ऐसे भंडार मौजूद नहीं हैं और फसल भी कमजोर हुई है, जिसकी वजह से इनके दाम बेलगाम हो रहे हैं।
सबनवीस कहते हैं कि घरेलू उत्पादन पर बहुत कुछ निर्भर करता है। चीनी को ही लीजिए। विदेशों में भी कीमत ज्यादा है, इसलिए सरकार कच्ची चीनी का आयात नहीं कर सकती। हल्दी का न तो बफर स्टॉक है और न ही उसके आयात की कोई गुंजाइश है, इसलिए घरेलू उपज पर ही ये निर्भर हैं।
आखिर कैसे भरें पेट
उत्पाद 4 अक्टूबर 4 नवंबर
चावल 33 34
गेहूं 18 20
आटा 20 24
सूजी 20 24
मैदा 20 26
चीनी 32 38
तुअर 90 110
हल्दी 120 160
अंडे* 30 38
सभी भाव रुपये प्रति किलोग्राम
* अंडे के भाव रुपये प्रति दर्ज़न
Wednesday, November 4, 2009
सरकार की गन्ना किसानों से बेइमानी और मिलों से गन्ने की कीमत ज्यादा देने के घड़ियाली आंसू
इसी बीच केंद्र सरकार उचित और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) ले आई। इसके मुताबिक मिलों को सिर्फ १२९ रुपये प्रति क्विंटल ही किसानों को गन्ना मूल्य देना होगा। अगर किसी राज्य सरकार ने गन्ने के ज्यादा दाम किसानों को दिलाने की कोशिश की, तो उसकी भरपाई उस संबंधित राज्य को करनी होगी। कहने का मतलब यह है कि एफआरपी अगर १३० रुपये क्विंटल तय हो गया और किसी राज्य सरकार ने अपने राज्य के लिए गन्ने का राज्य समर्थित मूल्य १६० रुपये प्रति क्विंटल तय कर दिया तो उस राज्य सरकार को ही किसानों को ३० रुपये क्विंटल किसानों को देना होगा। मिलें सिर्फ १३० रुपये क्विंटल भुगतान करके निकल जाएंगी।
कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों से वे उम्मीद करते हैं कि वे एफआरपी से ज्यादा गन्ने का दाम देंगी। समझ से परे है कि वे किस आधार पर उम्मीद कर रहे हैं कि अधिक दाम देंगी मिलें। अगर गन्ने का अधिक दाम देना उचित है, तो वही दाम केंद्र सरकार ने क्यों नहीं फिक्स कर दिया, उचित औऱ लाभकारी मूल्य के रूप में।
साफ है कि कांग्रेस सरकार बेइमानी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना चाहती है, न कि किसानों को मुनाफा कराना चाहती है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया कहते हैं कि खाद्यान्न के दाम बढ़ने से किसानों को फायदा होगा। शायद वे जमीनी हकीकत से रूबरू नहीं होना चाहते। चीनी मिलों ने वही चीनी ३० रुपये प्रति किलो बेची, जो वे फरवरी तक १५ रुपये किलो बेचा करते थे। और यह ८ महीने से चल रहा है। इस बीच नई चीनी बाजार में नहीं आई है। आयातित चीनी भी अभी बाजार में कम ही आई है (आंकड़े सामने आए तो इस पर एक बार फिर लिखेंगे कि चीनी मिलों ने इस लूट से पिछले आठ महीने में कितने हजार करोड़ रुपये कमाए हैं)। अब मोंटेक सिंह ही बताएं कि इससे गन्ना किसानों को कितना फायदा मिला है और उपभोक्ताओं को कितना फायदा मिला है?
Sunday, November 1, 2009
आखिर लोग इतने पाशविक क्यों हो जाते हैं कि भावनाओं में बहकर निर्दोष लोगों की जान लेते है?
स्वतंत्रता के बाद भीषण दंगे हुए। विभाजन का दंगा। उसके बाद सबसे वीभत्स रहा १९८४ में सिखों पर हमला। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सामूहिक नरसंहार शुरू हुए और यह तीन दिन तक चला। देश भर में हजारों की संख्या में लोगों को जिंदा जलाया गया। अभी मैं दैनिक जागरण के पूर्व पत्रकार और चिदंबरम पर जूता फेंकने वाले जरनैल सिंह की पुस्तक पढ़ रहा था। रात को पढ़ना शुरू किया। हालात के वर्णन कुछ इस तरह थे कि रात भर नींद नहीं आई। इसमें सबसे दुखद यह रहा कि आज भी पीड़ितों का उत्पीड़न जारी है। मानसिक, शारीरिक, आर्थिक हर तरह का। न्याय मिलना तो दूर की बात है।
दिल्ली में ८४ के दंगों में भी देखा गया था कि जिन इलाकों के अधिकारी चुस्त दुरुस्त थे, उन इलाकों में दंगे का प्रभाव कम रहा। जहां नेताओं ने दंगाइयों को नेतृत्व दिया, वहीं संकट गहरा रहा। लेकिन इन दंगाई नेताओं को किसी तरह की सजा नहीं मिली।
यही स्थिति गुजरात में हुई, जब नरेंद्र मोदी सरकार कुछ नहीं कर पाई और पूरा राज्य जलता रहा।आखिर इस तरह के दंगों में प्रशासन भी भावनात्मक रूप से पागल हुए लोगों के साथ पागल क्यों हो जाता है? बार बार जेहन में यही सवाल कौंधता है।
कश्मीर के बारे में तो अब शायद कोई याद भी नहीं करता, जहां स्वतंत्रता मांगने के नाम पर आए दिन हत्याएं होती हैं। लंबे समय से वहां चल रहे आतंकी अपराध के बाद कश्मीरी पंडितों का वही हाल है, जो ८४ में दंगे से पीडित सिखों का है। अपने ही देश में निर्वासित जीवन जीने को विवश हैं कश्मीरी पंडित।राजनीति से जु़ड़े लोग इनकी लाशों पर राजनीति करते हैं। समझ में नहीं आता कि आखिर कब तक चलेंगे इस तरह के दंगे और प्रशासन इनका कब तक साथ देता रहेगा।
जब कभी भी प्रशासन चुस्त होता है, इस तरह की घटनाएं तत्काल रुक जाती हैं। कई ऐसे मामले उत्तर प्रदेश में हुए हैं। प्रशासन ने जब कर्फ्यू लगाया, लोग अपने घरों में दुबक गए। एकाध बाहर निकले दंगा करने तो उन्हें सेना ने गोली मार दी। और अगर इस तरह के ऐक्शन ज्यादा नहीं एक बड़े शहर में इक्के दुक्के होते हैं और पूरा शहर खामोश हो जाता है। लेकिन अगर आम आदमी की भावनाओं के साथ प्रशासन और नेता दंगाई हो जाते हैं, तभी लाशों की ढेर जमा होती है।
Wednesday, October 28, 2009
ये कैसे माओवादी हैं जो राजधानी एक्सप्रेस में रोटी और कंबल लूटते हैं
-वे ट्रेन को जलाना चाहते थे
-बाद में कुछ बच्चे और महिलाएं डर के मारे रोने लगे तो उन्होंने ट्रेन जलाने का विचार त्याग दिया
-उन्होंने पूरी ट्रेन में नारे लिखे और लिखा कि छत्रधर महतो संथालियों के मित्र हैं
-ट्रेन छोड़ने से पहले वे अपने साथ पेंट्री कार से खाना और कंबल लूट के ले गए
यह सब पढ़कर थोड़ा अफसोस हुआ। ब्लागों पर पढ़ते आ रहे थे कि ये बहुत धनी, अमीर लोग हैं। लेवी वसूलते हैं। करोडो़ की संपत्ति रखते हैं। ऐय्याशियां करते हैं। लेकिन खबरें कुछ ऐसी आईं कि दिल में दर्द हुआ। ये तो रोटी लूटते हैं। ओढ़ने के लिए कंबल लूटते हैं। यात्रियों और उनके सामान को सुरक्षित छोड़ देते हैं और अपनी बात कहकर जंगल में चले जाते हैं।
स्वतंत्रता के समय संथालों ने भी अंग्रेजों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई थी। मैनै अयोध्या सिंह की अंग्रेजों के समय हुए आदिवासी विद्रोह पर लिखी गई किताब में यह सब पढ़ा। उनके पास गोला बारूद नहीं था। जान देकर अपने तीर धनुष से लड़े थे। स्वतंत्र भारत में भी वे वैसे ही हैं। रोटी लूटते हैं, तीर धनुष, फरसा लेकर क्रांति लाने और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश मात्र करते हैं। उनकी जिंदगी में आज भी सब कुछ वैसा ही है, जैसा १०० साल पहले था। उनकी जमीन अंग्रेजों और जमींदारों ने मिलकर छीनी। वहां से खनिजों का दोहन हुआ। आदिवासियों को जंगल में जाने के अधिकार से भी वंचित कर दिया गया।
मजे की बात है कि अखबार भी उनकी दयनीय हालत के बारे में लिखते-लिखते थक गए। पढ़ने वाले भी थक गए। अखबारों ने लिखना बंद कर दिया.. और सरकार ने उनके बारे में सोचना। अब जब उन्होंने राजधानी एक्सप्रेस को कब्जे में लिया, तब जाकर खबर बने। लेकिन उनकी समस्या पर कुछ नहीं लिखा गया। क्या उन्हें स्वतंत्र भारत में रोटी और कंबल लूटते और पुलिस की गोलियां खाते ही जिंदगी काटनी है??
बुधवार की सुबह से ही खबरें आ रही हैं कि दिल्ली की केंद्र सरकार उच्च स्तरीय बैठक कर रही है। चिदंबरम साब पहले ही सेना और अर्धसैनिक बलों के माध्यम से लड़ाई लड़ने की तैयारी कर चुके हैं।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि किस तरह से सरकार गरीबों पर गोलियां चलाकर गरीबी खत्म कर पाती है। और किस हद तक। सवाल यह भी है कि जिन आदिवासी इलाकों में आजतक सड़कें, रेल, पेयजल, स्वास्थ्य सुविधाएं, पुलिस व्यवस्था बहाल नहीं की जा सकी, वहां अब सरकार सेना को कैसे पहुंचाती है और इन इलाकों के लोगों के ऊपर गोलियां चलवाकर किस तरह से हिंसक आंदोलन को खत्म करती है।