Tuesday, July 21, 2009

पुतिन की सोच, सभी की समझ से परे

कनिका दत्ता
"अगर दुनिया चीन का उत्थान देख रही है और डर से भी वाकिफ है तो वह यह भी जानती है कि चीन डर और शंका के साथ रूस की सोवियत काल के बाद की राजनीति का ही अनुसरण कर रहा है। इस रूसी पहेली के केंद्र में हैं व्लादीमिर पुतिन। पुतिन एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें रूसी जनता का जबरदस्त समर्थन हासिल है।"


गोल्डमैन सैक्स के लोकप्रिय संक्षिप्त नाम ब्रिक में वर्ष 2050 तक ब्राजील, भारत और चीन के साथ रूस को देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में नामित किया गया है।
इन चारों में से रूस हालांकि अपनी भौगोलिक स्थिति के लिहाज से अलग है, क्योंकि यह यूरोप और एशिया दोनों महाद्वीपों में फैला हुआ है। इसके अलावा एक वक्त था जब रूस दुनिया की महाशक्ति के रूप में जाना जाता था।
अगर दुनिया चीन का उत्थान देख रही है और डर से भी वाकिफ है तो वह यह भी जानती है कि चीन डर और शंका के साथ रूस की सोवियत काल के बाद की राजनीति का ही अनुसरण कर रहा है। इस रूसी पहेली के केंद्र में हैं व्लादीमिर पुतिन। पुतिन एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें रूसी जनता का जबरदस्त समर्थन हासिल है।
वजह भी वाजिब है। पुतिन ही वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने येल्तसिन के बाद के वर्षों में रूसी अर्थव्यवस्था में मचे कोहराम को शांत किया। पुतिन के सत्ता में आने के बाद के वर्षों में रूसी अर्थव्यवस्था में जबरदस्त सुधार देखा गया, जिसमें अहम योगदान तेल और गैस की बढ़ती कीमतों का रहा।
पिछले साल के अंत में केजीबी के इस पूर्व अधिकारी ने राजनीतिक विश्लेषकों को हक्का-बक्का कर दिया। अपनी जगह पुतिन ने अपने विश्वासपात्र दमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति पद के लिए अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और खुद प्रधानमंत्री बन बैठे।
2008 में राष्ट्रपति पद छोड़ते वक्त उन्होंने पत्रकारों से कहा था, 'मैं क्रैमलिन छोड़ रहा हूं, रूस नहीं।' और उन्होंने अपना वादा निभाया, भले ही उनके प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद किसी ने न की हो। इसलिए क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़े देश कीअर्थव्यवस्था और भविष्य की विश्व राजनीति का सूत्रधार कौन है?
क्या वह आधुनिक युग का राजनेता है, जिसमें 17वीं शताब्दी के जार की सोच समाई हुई है? क्या वह पूंजीवादी के भेष में स्टालिनवादी है? डाई वेल्ट के प्रमुख संवाददाता माइकल स्टूअर्मर ने अपनी पुस्तक की भूमिका में लिखा है, 'दो शताब्दियों में ऐसा पहली बार नहीं है कि रूस अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर दुनिया को हैरत में डाल चुका है।'
दुर्भाग्यवश, 228 पेज की उनकी किताब और अधिक जानकारी मुहैया नहीं करा पाई। अपनी लगन में पक्के स्टूअर्मर के हाथ भी पत्रकारों पर लगी सोवियंत संघ की पाबंदियों से बंधे हैं, हालांकि देश अपने चेहरे से मार्क्सवादी मुखौटे को उतार कर फेंक चुका है और देश की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में तब्दील हो चुका है।
नतीजतन, रूस पर नजर बनाए हुए किसी भी दूसरे व्यक्ति की ही तरह स्टूअर्मर के स्रोत भी पुतिन की सार्वजनिक सभाओं और प्रेस सम्मेलनों तक ही सीमित रहे। इसमें उनके साक्षात्कार की भी झलक देखने को नहीं मिली। स्टूअर्मर ने अपनी पुस्तक की शुरुआत वर्ष 2007 में पुतिन के सुरक्षा सम्मेलन पर एक भाषण से की है।
म्युनिख में अपने इस भाषण के दौरान पहली बार पुतिन ने दुनिया के सामने अपना दृष्टिकोण रखा था। यह भाषण बुनियादी सच्चाई से जुड़ा हुआ था, क्योंकि इसमें सोवियत के बाद पश्चिमी देशों के शोषण और घेराव के डर को लेकर रूस की चिंता साफ दिखाई देती थी। साथ ही इसमें पहली बार दुनिया में रूस की स्थिति को लेकर उनका दृष्टिकोण देखने को मिला था, जिसमें वैश्विक मामलों में रूस भी एक बराबर का भागीदार था।
स्टूअर्मर ने लिखा है, 'भविष्य में इतिहासकार म्युनिख में पुतिन के इस भाषण को असहजता से उपजी हुई एक नपी-तुली चुनौती के रूप में देखेंगे।' 'म्युनिख में पश्चिमी देशों ने ऐसी चीजों का जिक्र किया, जो पुतिन नहीं चाहते थे। लेकिन क्या पुतिन जानते थे कि वह खुद क्या चाहते हैं।'
जिन पाठकों को किताब में इस सवाल के जवाब की उम्मीद होगी, उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी। शुरुआती अध्यायों में रूस के सोवियत के बाद के इतिहास पर से धूल हटाई गई है और उन्होंने इसमें एक कहानी बुनी है, जिसमें उन्होंने तेजी से आगे बढ़ रहे पुतिन को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाया है जो अब किसी खास जगह से जुड़ा हुआ नहीं है।
इस पुस्तक में जो सबसे दिलचस्प अध्याय लगा वह है, 'पुतिन्स पीपल'। इसमें स्टूअर्मर ने क्रैमलिन के एक वरिष्ठ अधिकारी ओलेग श्वार्त्समैन के रूस के एक व्यावसायिक समाचार पत्र में छपे साक्षात्कार से कुछ बातें डाली हैं। स्टूअर्मर का कहना है कि इस साक्षात्कार से 'आज के रूस में सत्ता की ताकत की कार्यप्रणाली की आंतरिक तस्वीर देखने को मिली है।'
असल में उन्होंने जो बताया, वह 'वैक्यूम क्लीनर प्रणाली' के रूप में जाना गया। उन्होंने अपने साक्षात्कार में कहा, 'यह वैक्यूम क्लीनर की तरह काम करता है, जो कंपनियों की परिसंपत्तियों को सोख कर ऐसे ढांचे में डाल देती हैं, जो जल्द ही सरकारी निगमों में तब्दील हो जाते हैं। इसके बाद इन परिसंपत्ति को पेशेवर अगुआओं के हाथों सौंप दिया जाता है। ये उपाय स्वेच्छा और अनिवार्यता दोनों तरीकों से लागू होते हैं... ये सरकार के हाथों में परिसंपत्ति के समेकन के लिए आज के दिशा-निर्देश हैं।'
बाकी किताब के लिए स्टूअर्मर ने गैजप्रॉम की ताकत और विकास के लिए रूस की तेल और गैस की कीमतों पर अनिश्चित निर्भरता पर रोशनी डाली है। उन्होंने देश के जनसांख्यिकीय संकटों, जिनमें आदमी ज्यादातर शराब पीने की वजह से मर रहे थे और जनसंख्या धीमी रफ्तार से बढ़ रही है, का भी जिक्र किया।
हैरत की बात है कि इसमें इस बात की भी चर्चा की गई है कि रूसी जनसंख्या कम हो रही है, जबकि मुस्लिमों की संख्या में इजाफा हो रहा है। गौरतलब है कि इस्लाम धर्म को लेकर वहां भेदभाव होता है। ऐसा ही भेदभाव हिटलर ने यहूदियों के खिलाफ किया था।
पुस्तक इस मायने में उपयोगी है कि इससे आपको रूस की समस्याओं के बारे में तत्काल जानकारी मिल जाती है। यदि पुतिन के रूस में वाकई आंतरिक जानकारी हासिल करनी हो तो पत्रकार ऐना पोलित्कोव्स्काया (जिनकी हत्या की गई) की पुस्तक हमेशा आदर्श रूप में देखी जाती है।



पुस्तक समीक्षा
पुतिन ऐंड दी राइज ऑफ रशिया
लेखक : माइकल स्टूअर्मर
प्रकाशक : हैशे इंडिया
कीमत : 650 रुपये
पृष्ठ : 253

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Thursday, July 16, 2009

नाबालिगों की रक्षा के लिए भी होता था धारा 377 का इस्तेमाल

"क्या यह मामला समलैंगिक संबंध रखने वालों की नैतिक विजय है, ऐसा मुश्किल से कहा जा सकता है। ऐसा एक भी मामला नहीं है जहां इस धारा का इस्तेमाल समलैंगिकों या सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने वालों के खिलाफ किया गया हो।"

श्रीलता मेनन

समलैंगिक संबंधों पर पाबंदी लगाने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल में असंवैधानिक घोषित किया है।
यह फैसला ऐसे लोगों को जीत का झूठा अहसास दिला रहा है जिन्हें लगता है कि यह मामला समलैंगिक अधिकारों की रक्षा करने वाले लोगों और इसका विरोध करने वालों के बीच संघर्ष का था।
लेकिन यह मामला समलैंगिकों के अधिकारों से कतई संबंधित नहीं है। हकीकत तो यह है कि इस धारा का इस्तेमाल नाबालिगों की यौन उत्पीड़न से रक्षा करने में भी किया जाता रहा है।
अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जे. एन. सल्डान्हा ने भी एक बार इस धारा का इस्तेमाल यौन उत्पीड़न के शिकार हुए 10 साल के बच्चे को इंसाफ देने में किया था और इस मामले में दोषी पाए गए एक तांत्रिक को 10 साल की कैद व 25 लाख रुपये के जुर्माने की सजा मिली थी।
न्यायमूर्ति सल्डान्हा का कहना है कि किशोर न्याय अधिनियम और बाल अधिनियम बच्चों की रक्षा के लिए मौजूद हैं, लेकिन इन अधिनियमों में यौन उत्पीड़न से बच्चों की रक्षा के लिए कठोर प्रावधान नहीं हैं। उन्होंने कहा - हालांकि यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय तक ही सीमित है, लेकिन अब बेहतर यही होगा कि इस धारा के बारे में बातचीत भूतकाल में ही की जानी चाहिए।
स्वतंत्रता एवं समानता के मौलिक अधिकार के आलोक में इस धारा को उच्च न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित किया है। न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे में कानूनी रूप से यह सभी अदालतों और भविष्य के मामलों को संदेह के घेरे में लाता है। अब नाबालिगों केलिए क्या बचा है?
क्या यह मामला समलैंगिक संबंध रखने वालों की नैतिक विजय मानी जाएगी, ऐसा मुश्किल से कहा जा सकता है। ऐसा एक भी मामला नहीं है जहां इस धारा का इस्तेमाल समलैंगिकों या सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने वालों के खिलाफ किया गया हो।
लेकिन याचिका दाखिल करने वाले संगठन नाज फाउंडेशन का दावा है कि इस कानून की वजह से भारत में समलैंगिक संबंध रखने वाली महिलाओं और पुरुषों, उभयलिंगी और ट्रांसजेंडर लोगों को ब्लैकमेलिंग, उत्पीड़न और मौत का शिकार होना पड़ा है।


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हां... ओबामा कर सकते हैं!

किशोर सिंह

उन्हें यायावर कहा जा रहा था, जो किसी सर्द और अंधेरे कोने से भटकते हुए अमेरिकी राजनीति के मंच पर आ पहुंचे थे।
दो लगातार लड़ाइयों और आतंकी हमलों से टूट चुके, बेजार अमेरिका को उनकी शख्सियत तिलिस्मी लगी, एक पहेली, जिसे बूझने की कुव्वत उसके पास नहीं थी। इससे पहले डेमोक्रेटिक पार्टी मान चुकी थी कि राष्ट्रपति की कुर्सी अब हिलेरी क्लिंटन के लिए है।
हिलेरी ने तो बहुत पहले ही व्हाइट हाउस पर निगाह जमा भी ली थी। लेकिन अचानक हिफाजत और सेहत की बात फिजां में तैरने लगी और अमेरिका के डरे, सहमे वाशिंदों को लगा कि इन्हें हासिल करने के लिए अब बदलाव जरूरी है। बदलाव.. यानी बराक ओबामा।
रिचर्ड वोल्फ न्यूजवीक के वरिष्ठ संवाददाता हैं और एक वक्त फाइनैंशियल टाइम्स के साथ भी काम कर चुके हैं। उन्हें लगता है कि बराक ओबामा पर किताब लिखना इसलिए भी वाजिब है क्योंकि उनकी कहानी से अब तक लोग रूबरू नहीं हुए हैं। वोल्फ ने यह काम राष्ट्रपति पद की होड़ में शामिल होने के ओबामा के ऐलान के साथ ही शुरू कर दिया।
दिलचस्प है कि जिस तरह राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने से पहले सोनिया गांधी की मुखालफत का सामना करना पड़ा था, वैसा ही ओबामा के साथ भी हुआ। वोल्फ लिखते हैं, 'संसद तक पहुंचने की ओबामा की कोशिश 2000 में नाकाम हो चुकी थी, जिससे मिशेल को बेहद नफरत थी और उनकी छोटी बेटी के जन्म के समय उनकी शादी पर भी खतरा मंडरा रहा था।
उनके बीच बातचीत न के बराबर थी और रोमांस तो गायब ही हो गया था। मिशेल को ओबामा की खुदगर्जी और करियर के पीछे दौड़ने की फितरत से नफरत थी, जबकि ओबामा मानते थे कि उनकी पत्नी बेहद सर्द स्वभाव की और नाशुक्र किस्म की थीं।'
मिशेल की चिंता थी कि ओबामा का रोजमर्रा का कार्यक्रम कैसा होगा। वह घर पर कितना रुकेंगे? बेटियों और पत्नी के लिए उनके पास कितना वक्त होगा? क्या हफ्ते के आखिर में वह घर पर रुक पाएंगे? और उन्हें जवाब मिला - नहीं! इधर ओबामा ने तय कर लिया कि उन्हें चुनाव लड़ना है और उन्होंने वोल्फ को प्रचार अभियान पर लिखने की सलाह दी। वोल्फ की किताब 'द मेकिंग ऑफ बराक ओबामा' में 21 महीने का ब्योरा है, जिसमें वह 'उम्मीदवार ओबामा' के साथ चले और 'राष्ट्रपति ओबामा' के साथ व्हाइट हाउस पहुंचे। हरेक रणनीति में शामिल रहे, ओबामा के भाषणों, उनकी गलतियों, उनकी कमजोरियों, उनकी ताकत और अमेरिका को बदलने के उनके भरोसे को बेहद करीब से वोल्फ ने महसूस किया।
एकबारगी ओबामा ने वोल्फ से कहा, 'तुम्हें पता है, मेरे लिए भरोसे का क्या मतलब है? मैं केवल बदलाव के नाम पर बदलाव नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि बेघर बच्चों को अच्छे स्कूल मिलें। मैं सबके लिए सेहत चाहता हूं।'
जब ओबामा ने इओवा गुट का समर्थन हासिल किया, तो उनकी टीम में शामिल डेविड प्लॉफ ने कहा, 'यह राजनीति का होली ग्रेल है। (ईसाई धर्म में होली ग्रेल वह प्याला है, जिसका इस्तेमाल ईसा मसीह ने सूली पर चढ़ाए जाने से पहले अपने आखिरी भोजन में किया था।
इसे करिश्माई ताकत वाला माना जाता है और इसे पाने के लिए सदियों से कोशिशें चल रही हैं।)' लेकिन इस जबरदस्त जीत का खुमार एक ही झटके में उतर गया, जब न्यू हैंपशायर में ओबामा को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। लेकिन यहीं से ओबामा ने नारा दिया, 'हां, हम यह कर सकते हैं।'
21 महीने में अमेरिका की किस्मत बदल गई, 21 महीने में बराक ओबामा की भी किस्मत बदल गई। इस दरम्यान वोल्फ ओबामा की परछाईं बने रहे। उन्हें ओबामा को अमेरिका में सड़कों पर राजनीति की बिसात बिछाने वाले आयोजकों के सामने मुस्कराते देखा, मतदाताओं से हाथ मिलाते देखा, भाषण का अभ्यास करते देखा, अपने परिवार का इतिहास उसमें मिलाते देखा और अमेरिका के सामने पड़ी संभावनाओं की झांकी सबके सामने रखते हुए भी देखा।
ओबामा को थकान महसूस नहीं होती, वह बहुत बड़ा सोचते हैं, हार और जीत में भी सबक सीखते हैं, अपने परिवार को मीडिया की पैनी निगाहों से बचाना जाते हैं, शायद इसी वजह से अमेरिका ही नहीं दुनिया में बदलाव की बयार की ठंडक इस किताब में मौजूद है।


पुस्तक समीक्षा

द मेकिंग ऑफ बराक ओबामा
संपादन : रिचर्ड वोल्फ
प्रकाशक : वर्जिन बुक्स
कीमत : 13.99 पाउंड
पृष्ठ : 365

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Wednesday, July 15, 2009

बाबू मोशाय, बिहार से बजट में ऐसा भेदभाव!

सत्येन्द्र प्रताप सिंह
लोकसभा चुनाव के पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने पाले में शामिल करने की कोशिश करने वाली कांग्रेस ने सरकार बनने के बाद बिहार को निराश कर दिया है।
दरअसल चुनाव परिणाम आने के पहले कांग्रेस को खुद के गठजोड़ के दम पर सरकार बनने की उम्मीद नहीं थी और उस समय प्रधानमंत्री ने भी बिहार को सैध्दांतिक रूप से विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने को समर्थन दिया। लेकिन प्रणब मुखर्जी ने अपने बजट से बिहारी बाबू के खासा नाराज कर दिया।
नीतीश कुमार ने कहा कि हमें उम्मीद थी कि राज्य के पिछड़ेपन और स्थानीय लोगों के पलायन को ध्यान में रखते हुए सरकार निश्चित रूप से बजट में अलग से सहायता का प्रावधान करेगी, लेकिन बजट में तो मनमोहन सरकार खुद के वादों से भी मुकर गई। कुमार ने कहा कि सरकार ने बिहार के विकास की जरूरतों को नहीं समझा।
अगर बजट में राज्यों को विशेष सहायता दिए जाने की सूची को देखें तो तमिलनाडु को श्रीलंका से आए विस्थापितों को बसाने के लिए 500 करोड़ रुपये, पश्चिम बंगाल में आइला तूफान से हुए नुकसान की भरपाई के लिए 1000 करोड़ रुपये, दिल्ली में कामनवेल्थ खेलों के लिए 16,300 करोड़ रुपये दिए गए, वहीं बिहार में कोसी नदी से आई बाढ़ को पिछली संप्रग सरकार के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद राष्ट्रीय आपदा घोषित किया था और उस समय सहायता दिए जाने की बात कही गई।
उस सरकार में प्रमुख भागीदार रहे लालू प्रसाद केंद्र पर दबाव बनाने में सफल रहे थे, लेकिन वर्तमान संप्रग सरकार में बिहार की हिस्सेदारी खत्म हो गई और सरकार ने कोसी की बाढ़ से पीड़ित बिहार के लोगों के लिए कोई आर्थिक सहायता देने की जरूरत नहीं समझी।
राज्य सरकार ने बिहार की गरीबी और स्थानीय लोगों के दूसरे राज्यों में बढ़ते विस्थापन के आंकड़े देते हुए केंद्र सरकार से विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग की थी। राज्य की उम्मीदें तब और प्रबल हो गई, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्य के पिछड़ेपन को स्वीकारा, लेकिन बजट में विशेष श्रेणी या विशेष पैकेज जैसी कोई बात सामने नहीं आई।
यहां तक कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के लिए हैंडलूम क्लस्टर की घोषणा की गई, लेकिन भागलपुर के हैंडलूम क्षेत्र की पूरी तरह से उपेक्षा कर दी गई। राज्य के वित्तमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि राजस्व के मसले में भी केंद्र सरकार ने निराश किया है।
उन्होंने कहा कि अंतरिम बजट में बिहार के हिस्से 18,154 करोड़ रुपये आया था, लेकिन प्रणब मुखर्जी के 2009-10 के अंतिम बजट में इसे कम कर 18,909 करोड़ रुपये कर दिया गया। पिछले साल की तुलना में राज्य को दिए जाने वाले राजस्व में केवल 2.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
मोदी ने कहा कि इसके लिए मंदी का हवाला दिया जा रहा है, लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में राज्य सरकार ने आंतरिक कर राजस्व में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। उम्मीद थी कि राज्य को केंद्र की मदद मिल जाएगी, लेकिन बजट ने भी राज्य को निराश कर दिया।


ख्वाहिशें... जो नहीं हुई पूरी

विशेष राज्य का दर्जा

पिछड़ेपन और पलायन को देखते हुए विशेष पैकेज

कोसी नदी में आई बाढ़ के बाद पीड़ितों की मदद के लिए रकम

विशेष सड़क योजना के लिए सहायता

केंद्र सरकार के राजस्व में हिस्सेदारी बढ़ाना

भागलपुर को हैंडलूम क्लस्टर के रूप में आर्थिक मदद

किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कैंपस खोलने के लिए
मदद


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Tuesday, June 30, 2009

ममता जी, कब बंद होगी जनरल बोगी में यात्रा करने वालों की रेल पुलिस द्वारा पिटाई

रेल बजट आने वाला है। हर साल आता है और चला जाता है। कहां हैं सुविधाएं और कब मिलेंगी? लालू प्रसाद ने एक नियम बनाया था तत्काल कोटा का। इससे कमाई भी हुई, मुनाफा भी बढ़ा। बिल्कुल हवाई यात्रा टाइप सुविधा थी कि आप अगर प्रस्थान समय के ५ दिन पहले टिकट लेते हैं तो अधिक पैसा देना पड़ेगा।

सुरक्षा का क्या होगा??? भगवान जाने। हर एक आदमी जिसने कभी रेल में जनरल बोगी में यात्रा की है, उसे पता होगा कि किस तरह से रेलवे पुलिस लोगों को लूटती है। पैसा न देने पर पीटती है। साथ ही बोगी में चार सिपाही आते हैं और सबको पीटना शुरू कर देते हैं। आखिर सुरक्षा की यह कौन सी व्यवस्था है?? क्या इसे रोके जाने की जरूरत कभी महसूस की गई है?? या कभी महसूस की जाएगी। अगर आपको इस माहौल से रूबरू होना है या आप इसे गलत समझ रहे हैं तो बिहार से मुंबई या दिल्ली जाने वाली किसी भी जनरल बोगी में घुस जाएं। आपने अगर टिकट लिया है तो सुरक्षा देने के लिए रेल पुलिस पीटकर आपसे २० रुपये ले लेगी। सामान ज्यादा लिए होने पर (जैसा कि अक्सर मजदूर वर्ग के पास होता है) अतिरिक्त पैसा देना होगा और पिटाई भी ज्यादा पड़ेगी।

इन घटनाओं का कोई पुरसाहाल नहीं है। किसी की औकात भी नहीं है कि अगर वह किसी काम से या नौकरी पर जा रहे हों तो इसके खिलाफ आवाज उठा सकें। पहली बात तो २० रुपये और चार थप्पड़ या दो लाठी खाना आसान है, वनिस्पत पुलिस में सूचित करना... स्वाभाविक है कि आप उसी रेल पुलिस को शिकायत करने जाते हैं, जिसने आपको रेल में नाहक पीटा होता है। ऐसे में शिकायत करने पर एक बार फिर पिटने की संभावना प्रबल हो जाती है।

Tuesday, June 23, 2009

हर लड़की तीसरे गर्भपात के बाद धर्मशाला हो जाती है

एक सम्पूर्ण स्त्री होने के पहले ही

गर्भाधान की क्रिया से गुज़रते हुए

उसने जाना कि प्यार

घनी आबादी वाली बस्तियों में

मकान की तलाश है

लगातार बारिश में भीगते हुए

उसने जाना कि हर लड़की

तीसरे गर्भपात के बाद

धर्मशाला हो जाती है और कविता

हर तीसरे पाठ के बाद

नहीं – अब वहाँ अर्थ खोजना व्यर्थ है

पेशेवर भाषा के तस्कर-संकेतों

और बैलमुत्ती इबारतों में

अर्थ खोजना व्यर्थ है

हाँ, अगर हो सके तो बगल के गुज़रते हुए आदमी से कहो –

लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था

सुदामा पांडेय- धूमिल

Thursday, June 18, 2009

बोनस की राशि कहां खर्च करेंगे आप

मनीश कुमार मिश्र


मेरे मित्र गोपाल ठाकुर को बोनस का बेसब्री से इंतजार रहता है। प्रत्येक वर्ष एकमुश्त मिलने वाली इस राशि से वह या तो जरूरत की कोई वस्तु खरीदते हैं या उतने पैसों को सावधि जमा में निवेश कर डालते हैं। पिछले वर्ष उन्होंने बोनस के पैसे 3 वर्षो की सावधि जमा में लगा दिए थे।

कुछ लोगों का सोचना इसके ठीक विपरीत होता है। पैसे हैं तो खर्च करो, यही उनका नारा होता है। यह मायने नहीं रखता कि पैसे का स्रोत क्या है, यह मेहनत की कमाई है या किसी निवेश से प्राप्त होने वाला लाभ, पैसे तो पैसे हैं इसका अपना महत्व है। इसे लापरवाही से खर्च करना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती है।

कैसे करें इनका प्रबंधनपिछले वर्ष राहुल ने दिवाली से पहले लॉटरी की टिकट खरीदी थी, किस्मत अच्छी थी उसकी। दिवाली की रात के बंपर ड्रा में उसे 1.5 लाख रुपए मिले। राहुल के लिए यही बोनस था। उसने सोचा कि अभी किस्मत अच्छी है तो क्यों न इन पैसों को शेयर में लगा दिया जाए? बिना मेहनत के प्राप्त होने वाले पैसों से जैसे उसे कोई मोह ही नहीं था। उसके पिता ने समझाया भी कि ‘चलो तुम्हारी मर्जी है तो शेयर में 50000 रुपए का निवेश कर डालो और शेष बचे एक लाख रुपए सुरक्षित विकल्पों जैसे राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र, सावधि जमा, पीपीएफ आदि में लगा दो।’ राहुल के पिताजी की सलाह उचित भी थी लेकिन उनकी बात न मानते हुए उसने 75000 रुपए शेयर में लगा ही दिए।
इस प्रकार मिलने वाली एकमुश्त राशि का उपयोग ऋण चुकाने में भी किया जा सकता है। इससे आपको मानसिक शांति तो मिलेगी ही साथ ही ब्याज के रुप में दिए जाने वाले पैसे भी आप बचा सकेंगे। सर्वप्रथम वैसे ऋण को चुकता करने के बारे में सोचें जिसकी ब्याज दर अधिक है।
पर्सनल लोन सबसे अधिक खर्चीले होते हैं और इनके ब्याज दर भी प्राय: 15-30 प्रतिशत वार्षिक के होते हैं। प्रति महीने अपनी मेहनत की कमाई से इनके ब्याज चुकाते रहने से कहीं बेहतर है कि इसका पूर्ण भुगतान कर दिया जाए। मासिक किश्तों के जाने पर विराम लगने के बाद, विश्वास कीजिए, आपके वेतन में बड़क्कत भी होगी। पर्सनल लोन के बाद बारी आती है ऑटो लोन की। अगर पर्सनल लोन चुकाने के बाद पर्याप्त पैसे बच रहे हों तो इनका निपटान भी कर डालें। शिक्षा ऋण और आवास ऋण पर आयकर वाले लाभ प्राप्त होते हैं इसलिए इन्हें चुकाने के बारे में सबसे अंत में सोचना चाहिए। चलिए मान लेते हैं आपने ऐसा कोई लोन नहीं लिया हुआ है। लेकिन संभव है कि आपने अपने दोस्त या रिश्तेदार से कभी ऋण लिया हो। हालांकि इस प्रकार के उधार ब्याज रहित होते हैं लेकिन नैतिक तौर पर उचित यही है कि इन्हें चुका कर आप उनका धन्यवाद ज्ञापन करें। क्या अब भी आपके कुछ पैसे बच रहे हैं?
खर्च करने से पहले जरा रुकिए। याद कीजिए कि कहीं किसी खास मकसद से आपने बचत की शुरुआत तो नहीं की थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप घर खरीदना चाहते हों और उसके डाउनपेमेंट के लिए पैसे जुटा रहे हों?
निकट भविष्य में परिवार में किसी की शादी के लिए तो बचत नहीं कर रहे आप? इन सब उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भी आप इन पैसों का सदुपयोग कर सकते हैं। उपरोक्त व्यवस्था करने के बाद आप अपनी चाहतों को तरजीह दे सकते हैं। अगर लैपटॉप या होम थिएटर खरीदने का मन कर रहा हो तो अब आप खुद को मत रोकिए क्योंकि आपने पहले ही बाकि चीजों की व्यवस्था कर ली है।

http://www.bhaskar.com/2007/10/13/0710140008_bonus.html

बड़े उपयोगी हैं वित्तीय निर्णय लेने के ये सामान्य नियम

मनीश कुमार मिश्र

वित्तीय योजना बनाने और उस हिसाब से उत्पादों का चयन करने में गणित के साथ-साथ अर्थशास्त्र के ज्ञान की भी आवश्यकता होती है। ऐसा करना प्रत्येक व्यक्ति के बस की बात नहीं होती है।
निवेश करने के कुछ मोटे नियम हैं जो काफी हद तक कामयाब साबित हुए हैं। इसके लिए न तो आपको ज्यादा गणित जानने की आवश्यकता है और न ही अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने की। वित्तीय निर्णय लेने वाले व्यक्तियों की सुविधा के लिए ऐसे कुछ अतिसामान्य से नियम बनाए गए हैं।
पहले ही बताते चलें कि इनकी तह में जाने पर इसकी उपयोगिता कम हो सकती है लेकिन मोटे तौर पर ये नियम अपनी जगह पर ठीक हैं। फिर भी इसे अपनाते समय आपको सावधानी बरतनी चाहिए। इन तरीकों को अपनाइए और फायदा उठाइए।
बीमा+निवेश न कि निवेश+बीमा
प्रमाणित वित्तीय योजनाकार विश्राम मोदक कहते हैं, 'जीवन बीमा के मामले में एंडाउमेंट या यूलिप का चुनाव करना बुध्दिमानी नहीं कही जा सकती है। बीमा और निवेश का मिश्रण किसी भी नजरिए से बेहतर नहीं हो सकता है। यूलिप या एंडाउमेंट योजना को आप दो भागों में बांटिए।
एक हिस्सा अपनी जरुरत के अनुसार टर्म इंश्योरेंस प्लान लेने में लगाइए और शेष बचे पैसों को कहीं और निवेशित कर दीजिए।' उनके अनुसार, यूलिप=बीमा+निवेशकी जगह- बीमा+निवेश = यूलिप से अधिक लाभ का सूत्र अपनाइए। एक टर्म इंश्योरेंस प्लान खरीद कर शेष बची राशि का निवेश आप किसी म्यूचुअल फंड की योजना (विशेष रूप से सिप में) कीजिए, यह आपको यूलिप से अधिक लाभ दिलाएगा।

अधिकतम ऋण के नियम
आपने गौर किया होगा कि बैंक सबसे अधिक ऋण होम लोन के रूप में देता है जो आपकी मासिक आय का लगभग 55 गुना तक हो सकता है। अपनालोन के मुख्य कार्याधिकारी हर्षवर्ध्दन रुंगटा कहते हैं, 'बैंक मासिक आय, भुगतान करने की क्षमता, ऋण की अवधि और जायदाद के मामले में जायदाद की कीमत के आधार पर 35 से 55 प्रतिशत तक का ऋण उपलब्ध कराते हैं।'
चलिए मान लेते हैं कि आप 10.5 प्रतिशत की दर पर 20 वर्षों के लिए ऋण लेते हैं और आपकी मासिक किस्त प्रति लाख रुपये के लिए 1,000 रुपए बैठती है। मान लेते हैं कि आपको मिलने वाला वेतन प्रति माह 10,000 रुपये है।
ऋण के सामान्य नियम के मुताबिक कोई भी बैंक यह उम्मीद करता है कि आप मासिक किश्त के रुप में अधिकतम 5,000 रुपये का भुगतान कर सकते हैं। इसलिए वे आपको अधिकतम 5,00,000 रुपये तक का ऋण उपलब्ध करा सकते हैं। यह आपकी मासिक आय के लगभग 50 गुना है।
रूंगटा ने बताया, 'अगर बैंक को यह जानकारी मिलती है कि आपने अन्य किसी प्रकार का भी ऋण पहले से लिया हुआ है जिसकी मासिक किस्तों का आप भुगतान कर रहे हैं तो तो उसी हिसाब से वे आपके ऋण की पात्रता का निर्धारण करते हैं।' अगर आप मासिक किश्त के रुप में 5,000 रुपये प्रति माह दे रहे हैं तो कोई बैंक शायद ही आपको ऋण उपलब्ध कराए।

कब होंगे पैसे दोगुने
बैंक किस समयावधि में आपके पैसों को दोगुना कर देगा, यह जानने का एक आसान तरीका मौजूद है। 72 में ब्याज दर से भाग दीजिए, इस प्रकार जो संख्या प्राप्त होती है उसे आप वर्ष मानिए। अगर ब्याज वार्षिक जुड़ता हो तो उतने वर्षों में आपके पैसे दोगुने हो जाएंगे।
उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि कोई बैंक आपको 10 प्रतिशत वार्षिक का ब्याज देता है। ऊपर बताए गए तरीके के मुताबिक यह 7210 वर्षों में अर्थात 7.2 वर्षों में बैंक में जमा की गई रकम दोगुनी हो जाएगी।
अगर ब्याज तिमाही या छमाही जुड़ता हो तो इसके दोगुने होने में अपेक्षाकृत कम समय लगेगा। पहले 5 वर्षों में पैसे दोगुने हो जाते थे, इस मोटे नियम को लागू कर देखा जाए तो उस समय मिलने वाला ब्याज 14.2 फीसदी वार्षिक का था।

इक्विटी में निवेश
ऐसा कहा जाता है कि पोर्टफोलियो में इक्विटी के हिस्से का निर्धारण आप 100 में से अपनी उम्र घटा कर करें। मान लीजिए कि आपकी उम्र 30 वर्ष है और आप 10,000 रु पये का निवेश करना चाहते हैं तो आपको इक्विटी में 7,000 रुपये का निवेश करना चाहिए।
अगर आप 60 वर्ष के हैं तो इस नियम के मुताबिक आपको अपने कुल निवेशित की जाने वाली राशि के 40 प्रतिशत का निवेश इक्विटी में करना चाहिए। आधार के लिए इस नियम का प्रयोग किया जा सकता है। वास्तव में पोर्टफोलियो में विभिन्न घटकों का निर्धारण आपके भविष्य की जरूरतों, जोखिम उठाने की क्षमता आदि के अनुसार निर्धारित की जाती है।

जीवन बीमा गणना की तरकीब
किसी व्यक्ति के जीवन के मूल्य का आकलन करना मुश्किल है। वैसे भी जीवन बीमा कोई व्यक्ति अपने लिए तो करवाता नहीं है, यह तो आश्रितों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के लिए लिया जाता है। जीवन बीमा लेते समय सम एश्योर्ड के निर्धारण का एक सामान्य सा नियम यह है कि आप अपनी वार्षिक आय का 10 गुना सम एश्योर्ड लें।
ताकि आपके न होने की दशा में अगर सम एश्योर्ड की राशि पर वार्षिक 10 प्रतिशत का भी प्रतिफल मिले तो आपके आश्रितों को आपके न होने की कमी आर्थिक तौर पर न खले। ध्यान रखें ये नियम शुरुआत करने के लिए हैं। जीवन बीमा का सम एश्योर्ड हो या इक्विटी में निवेश, वास्तविक जरुरत विभिन्न व्यक्तियों की विभिन्न परिस्थितियों के आधार पर भिन्न- भिन्न होती हैं।
http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=20100

Thursday, June 4, 2009

यह कैसा दलित सम्मान?

राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस बात का जिक्र किया गया कि सरकार ने एक दलित महिला मीरा कुमार को लोकसभा अध्यक्ष बना दिया, जिससे लोकतंत्र का मान बढ़ा है।
भारत में दलितों को पद प्रतिष्ठा और सम्मान देने की होड़ सी लग गई है। खासकर मायावती के शक्तिशाली होने के बाद तो जैसे राजनीतिक पार्टियों को लगता है कि सोया हुआ जिन्न जाग गया है। कांग्रेस पार्टी ने मीरा कुमार को लोकसभा अध्यक्ष बना दिया। शपथ ग्रहण के समय सोनिया के चेहरे की मुस्कराहट जाहिर कर रही थी कि वह विजयी मुस्कान है। बड़ा दुख होता है कि मीरा कुमार के लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद सत्तासीन पार्टी कहते फिर रही है कि दलित.को अध्यक्ष बना दिया। दलित और उनके जाति के संबोधन को भारतीय समाज में गालियों की तरह ही लिया जाता है। अब मीरा को इतनी बार दलित कहा जा रहा है कि वे इस एहसान से दब जाएंगी कि ऐसा लगता है कि बगैर किसी योग्यता के दलित होने के चलते ही उन्हें यह पद मिल गया है। हालांकि उनका पिछला इतिहास देखा जाए तो हर मौके पर उन्होंने अपनी योग्यता साबित की है।अब सवाल यह उठता है कि लोकसभाध्यक्ष पद पर बैठाने के बाद, बार बार दलित का नारा लगाने और ऐसा किया, यह जताने के बाद कोई पार्टी दलितों के दिल में जगह बना सकती है? क्या इस तरह से मायावती के राजनीतिक कद का सामना किया जा सकता है? वैसे भी मीरा कुमार ने अपनी ताकत से यह पद नहीं हासिल किया, बल्कि उनके पीछे पूर्व कांग्रेसी दिग्गज जगजीवन राम का बैक अप है। भले ही मीरा कुमार योग्य हैं, लेकिन क्या जनता उन्हें दिल से अपना नेता स्वीकार कर पाएगी, कि लोकतंत्र के ताकतवर होने की वजह से एक वंचित तबके की महिला को सम्मान मिला है??

Tuesday, June 2, 2009

हर जगह पिटेंगे भारतीय, देश में भी-विदेश में भी

अब आस्ट्रेलिया में भारतीयों की पिटाई हो रही है। विदेश में रहने वाले तमाम मराठियों ने महाराष्ट्र में एक गुंडे का समर्थन किया था, जब वह उप्र और बिहार के लोगों को पिटवा रहा था। कांग्रेस भी चुप, भाजपा भी चुप।
यही कांग्रेस सरकार केंद्र में थी और महाराष्ट्र में भी, जब महाराष्ट्र में मराठी गैर मराठी के नाम पर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग बड़े पैमाने पर पीटे और मारे जा रहे थे। सरकार कुछ नहीं कर सकी। अब आस्ट्रेलिया में स्थानीय लोगों की नौकरी छीनने के नाम पर भारतीयों को पीटा जा रहा है और वहां राजनीति हो रही है तो यह सरकार क्या कर सकती है? यह तो विदेश का मामला है। कुछ नहीं होने वाला गुरू, लात खाते रहो, जीते रहो और कांग्रेस, भाजपा को वोट देकर सत्ता देते रहो। फिलहाल अभी तो कांग्रेस की जय हो।
हम यही कर सकते हैं, जो फोटो में ये लोग कर रहे हैं।

Wednesday, May 20, 2009

अदम गोंडवी की कुछ रचनाएं

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है

उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है


इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का

उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है


कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले

हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है


रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी

जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

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काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में

उतरा है रामराज विधायक निवास में


पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत

इतना असर है खादी के उजले लिबास में


आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह

जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में


पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें

संसद बदल गयी है यहाँ की नखास में


जनता के पास एक ही चारा है बगावत

यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

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जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये

आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये


जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़

उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये


जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को

किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये


मतस्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार

दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिये.

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तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है

मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है


उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो

इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है


लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में

ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है


तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के

यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है



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हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये

अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये


हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है

दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये


ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले

ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये


हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ

मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये


छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़

दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये
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वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागे आस्‍था विश्‍वास लेकर क्‍या करें


लोकरंजन हो जहां शम्‍बूक-वध की आड़ में
उस व्‍यवस्‍था का घृणित इतिहास लेकर क्‍या करें


कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्‍या करें


बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है
ठूंठ में भी सेक्‍स का एहसास लेकर क्‍या करें


गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्‍यार का मधुमास लेकर क्‍या करें

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मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की

आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की ,संत्रास की

यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी
ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की?

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की

याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार
होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की.

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-रचनाकार: अदम गोंडवी




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Satyendra Pratap Singh
Senior Sub Editor,
Business Standard,
New Delhi

Thursday, April 23, 2009

हैं तो चुनावी मुद्दे, लेकिन पार्टियां उन्हें उठाती ही नहीं


अब दिल्ली को ही देखिए। शीला दीक्षित चुनाव जीत गईं। वाह, क्या बात है- तीसरी बार जीतीं। भाजपा ने मुद्दा भी क्या उठाया?? गजब की मरी पार्टी की तरह। कांग्रेस एक प्याज से सत्ता में आई थी, भाजपा ने सोचा कि सब्जियों को मुद्दा बनाकर वापस सत्ता पर काबिज हो जाएं। साथ ही बुझे मन से आतंकवाद का मसला भी उठाया, इस डर के साथ कि कहीं उनकी सरकार में हुआ संसद पर हमला जनता को न याद आ जाए। हुआ भी वही। जनता को याद रहा कि भाजपा के शासन में आतंकवाद भी था, सब्जी भी महंगी थी- बढ़िया है कि फिर से कांग्रेस को चुन लिया जाए।
अब ऐसा भी नहीं कि कांग्रेस ने कम नाश किया हो। आज स्थिति यह है कि आप अपने बच्चे को किसी मझोले दर्जे के निजी प्राथमिक स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं तो ४०,००० (चालीस हजार) डोनेशन, ७,००० तिमाही के हिसाब से २८,००० (अट्ठाइस हजार सालाना) फीस रख लीजिए। इसके अलावा ८०० रुपये महीने के हिसाब से १०००० रुपया सालाना बस भाड़ा। कुल मिलाकर न्यूनतम ९०,००० रुपये चाहिए, तब जाकर आपका बच्चा एलकेजी से यूकेजी में पहुंच पाएगा। इस तरह से करीब ७,५०० रुपये महीना आपको अपने एक बच्चे के लिए कमाना होगा। लेकिन यह चुनावी मसला नहीं...
इसी तरह से दिल्ली में भूमाफिया और बिल्डर सक्रिय हैं। रही सही कसर प्रॉपर्टी डीलर पूरा कर देते हैं। अगर आप किसी लाल डोरा (स्लम) इलाके में कमरा किराये पर लेना चाहते हैं तो २ कमरे का ६,००० रुपया महीना किराया देना होगा। दलाल को हर साल ६,००० रुपये दलाली देनी होगी। किसी भी प्लैट की कीमत दिल्ली के बाहरी इलाकों में भी २ कमरे का २० लाख रुपये से कम नहीं है। लूट मची है। लेकिन यह भी चुनावी मसला नहीं...
दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्री खुद स्कूल चलाते (शिक्षा माफिया??) हैं, उन्हें शायद किसी से भी ज्यादा पता है। भाजपा शायद इसलिए इसे मुद्दा बनाना नहीं चाहती होगी कि उसे भी किसी शिक्षा माफिया को शिक्षा मंत्री और शहरी विकास मंत्रालय किसी भूमाफिया या बिल्डर को देना हो....

Sunday, April 19, 2009

मीडिया बिकता है... बोलो खरीदोगे???

इन दिनों आईपीएल क्रिकेट चल रहा है। इसका पूरा नाम इंडियन प्रीमियर लीग था, जो इस समय दक्षिण अफ्रीका में हो रहा है। इसके बारे में और ज्यादा बताने की जरूरत नहीं कि इसमें कौन से खिलाड़ी होते हैं, कैसी टीम होती है। यह सब कुछ मीडिया में आ रहा है।

परदे के पीछे की बात यह है कि एक महीने के आईपीएल का अनुमानित कारोबार २००० करोड़ रुपये का है। इस कारोबार में सभी चैनल, अखबार साथ देने में लगे हैं। स्वाभाविक है कि इसका विग्यापन बजट कम से कम कुल पूंजी का २० प्रतिशत तो होगा ही। यानी ४०० करोड़ रुपये। अगर इस विग्यापन राशि को ४० मीडिया हाउस में बांट दें तो एक एक का हिस्सा आता है, १० करोड़ रुपये। मंदी के इस दौर में अगर एक महीने में १० करोड़ की आमदनी किसी मीडिया हाउस को हो जाए, तो अच्छा मुनाफा हुआ न... खासकर ऐसे में जब एक मीडिया हाउस की कुल पूंजी (अगर ५ बड़े मीडिया हाउस को निकाल दें) तो ५०० करोड़ रुपये के आसपास आएगी। ऐसे में अखबारों में क्यों न छा जाए आईपीएल। इस हद तक कि लोगों को आईपीएल का बुखार चढ़ जाए।


आखिर अखबारों- चैनलों को भी तो कारोबार करना है। चुनावी विग्यापन तो आ ही रहे हैं। इसका कुल विग्यापन भी ४००-५०० करोड़ के आसपास ही होगा। इसमें नेताओं को गरियाने का भी मौका मिलता है। सभी विग्यापन देते हैं इसलिए। लेकिन आईपीएल के मामले में तो ऐसा नहीं है, उसका बुखार जनता पर चढ़ाने का ठेका मिला है, उसका समर्थन करने के लिए विग्यापन मिला है।अब आपको लग रहा है न कि कितनी सस्ती है हमारी मीडिया....

Thursday, April 16, 2009

पड़ रहे हैं जूते, चप्पल और खड़ाऊं

अब लौह पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी के ऊपर खड़ाऊं फेकी गई। फेकने वाले का कहना है कि आडवाणी लौह पुरुष नहीं, दोमुहें व्यक्ति हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि कार्यकर्ता ने यह देखने के लिए लकड़ी की चप्पल चलाई कि आडवाणी सचमुच लोहे के हैं या नहीं। उसने सोचा कि अगर लोहे के होंगे, तो धातु से लकड़ी के टकराने पर अलग आवाज आएगी और पता चल जाएगा कि वह लोहे के बने हैं या नहीं। बहरहाल...

भारत में जूता फेंको अभियान की शुरुआत एक वरिष्ठ पत्रकार जरनैल सिंह ने की। कांग्रेस ने सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर का टिकट काट दिया। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस ने टिकट काटने के बाद महसूस किया कि १२ बजे प्रेस कांन्फ्रेंस आयोजित होने के चलते जरनैल सिंह को गुस्सा आया।

वहीं कांग्रेस सांसद के ऊपर शिक्षक ने इसलिए जूता चलाया कि वह दारू पिए था। नवीन जिंदल ने तुरंत पकड़ लिया। लेकिन असली वजह स्पष्ट नहीं है।

अब कहीं ऐसा न हो कि जूता-चप्पल चलाकर लोकप्रियता पाने की कोशिश करने वालों के भाग्य का फैसला नेता के समर्थक ही कर दें और उनकी जमकर धुनाई हो जाए???

Friday, April 10, 2009

वॉर्न की गुगली पर आउट हुए 100 क्रिकेटर

सुवीन सिन्हा


किताब में गांगुली को जहां 96वें स्थान पर रखा गया है, वहीं पूर्व क्रिकेटर कपिल देव 43वें स्थान पर हैं।

इस किताब के शीर्षक पर ज्यादा सोच-विचार मत कीजिएगा। यह किताब उन 100 क्रिकेट खिलाड़ियों के बारे में नहीं है, जिनके साथ या खिलाफ शेन वॉर्न ने कमान संभाली थी। असलियत में यह किताब खुद शेन वॉर्न के बारे में है।
यह क्रिकेट से संन्यास ले चुके ऑस्ट्रेलिया के लेग स्पिनर का एक तरीका है, जिसके जरिए वह दुनिया को अपने नजरिये के बारे में बताते हैं। निश्चित तौर पर उनके करियर में भी काफी उतार-चढ़ाव रहे होंगे।किताब को पिछले साल ब्रिटेन के एक अखबार 'टाइम्स' में छपी उस फेहरिस्त का अगला भाग भी कह सकते हैं, जिसमें उनके समय के 50 क्रिकेटरों का जिक्र किया गया है। इस सूची के छपने से एक उत्तेजना पैदा होती है। इसे वॉर्न के अपनी टीम और दूसरी टीमों में अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ हिसाब चुकाने के एक तरीके के रूप में भी देखा गया था। इस किताब से ऐसा लगता है जैसे वार्न टॉप 50 के छपने के बाद से कुछ नरम हो गए हों। इस किताब ने वॉर्न को एक मंच भी दिया है, जिसके जरिये उन्होंने अपने फैसलों के लिए सफाई भी दी है। जैसे आखिर सचिन तेंदुलकर ब्रायन लारा से रैंक के मुकाबले में आगे क्यों हैं। टाइम्स के टॉप 50 में कुछ ऐसे भी चेहरे थे, जिनका जिक्र वॉर्न नहीं कर पाए थे, लेकिन उन्होंने वॉर्न की इस किताब में अपनी जगह जरूर बना ली है। इस किताब में 100 नाम हैं। किताब में फेहरिस्त के मुकाबले दोगुनी जगह मिलनी है।

इस फेहरिस्त में श्रीलंका के खिलाड़ी अर्जुन रणतुंगा को 93वां स्थान मिला है, जिनके साथ वॉर्न (और दूसरे ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों) की लंबी बहस हुई थी। यह अलग बात है कि रणतुंगा इस किताब में अपने नाम को अंत में भी शामिल कराना नहीं चाहते हों क्योंकि वॉर्न ने उनके बारे में कहा था कि 'उन्हें देखकर ऐसा लगता है, मानो उन्होंने पूरी भेड़ खा ली हो।'मजे की बात तो यह है कि वॉर्न भी कभी दुबले-पतले नहीं रहे और वजन घटाने के लिए उन्होंने दवाओं तक का इस्तेमाल किया और जब पकड़े गए तब उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।वॉर्न की इस किताब में शामिल होने का सम्मान दो कप्तान को हासिल हुआ। दूसरे कैप्टन सौरव गांगुली रहे, जो रणतुंगा की ही तरह ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों का दर्द बन गए। इस किताब में उन्हें रणतुंगा से 3 पायदान नीचे 96वें पायदान पर रखा गया है।

वॉर्न ने किताब में गांगुली के बतौर कप्तान और खिलाड़ी कुछ ऐसे वाकयों को लिखने का मौका नहीं गंवाया जहां उन पर उंगली उठाई जा सके। जहां दुनिया ऑफ-साइड मंद गति से खेलने वाले गांगुली की तारीफ करती नहीं थकती, वहीं वॉर्न ने काफी भद्र व्यवहार के साथ कहा, 'मैं पूरी तरह से तो नहीं, लेकिन हां, काफी हद तक यह कह सकता हूं कि औरों के मुकाबले वह लगातार बेहतर खेलते थे और असलियत में यह उनका एक गुण था।' वॉर्न के शब्दों में गांगुली की कप्तानी कुशलता के लिहाज से बेहद अच्छी तो नहीं कही जा सकती और वह अपने खिलाड़ियों का शानदार तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाए। इन दोनों कप्तानों के नाम के इस फेहरिस्त में शामिल होने के साथ ही वार्न का एक अहम मकसद भी पूरा हो गया।

टाइम्स में छपी उनकी टॉप 50 की फेहरिस्त के लिए उनकी आलोचना की गई थी कि इसमें सिर्फ उनके साथियों का ही नाम शामिल किया गया है। इस किताब में आगे कुछ विक्टोरिया की तरफ से खेलने वाले उनके साथियों के नाम भी शामिल हैं, हालांकि मर्व ह्यूज को वार्न ने 18वें पायदान पर रखा है, जबकि कपिल देव (43वें), वकार यूनिस (31वें), ऐलन डोनाल्ड (36वें) उनसे काफी नीचे हैं।हालांकि वार्न ने अपने ही कप्तान स्टीव वॉ की रेटिंग (26 वें) ऐसी की है कि कुछ भी कहा नहीं जा सकता। वॉ भाइयों में से बड़ा भाई अपने समय में सबसे साहस वाला बल्लेबाज माना जाता था। उन्हें संकटमोचक खिलाड़ी कहा जाता था, जिसके मैदान पर रहते टीम को मैच अपनी मुट्ठी में रहने का भरोसा होता था।छोटे भाई मार्क वॉ को इस फेहरिस्त में 9वें पायदान पर रखा गया है। 1990 के दशक के बीच में जब ऑस्ट्रेलिया की टीम वेस्ट इंडीज को उसी की जमीन पर पछाड़ कर सबसे बेहतर टेस्ट टीम बनी थी तो उसकी वजह स्टीव वॉ की बल्लेबाजी थी। वॉ की कप्तानी में ऑस्ट्रेलियाई टीम एक नए मुकाम पर पहुंची और टेस्ट क्रिकेट की शक्ल ही बदल गई। उसमें इतनी तेजी से रन बनाए जाने लगे कि मैच ड्रॉ होने का सवाल ही नहीं रहा।हालांकि वॉ की तारीफ में पढ़े जाने वाले कसीदे ऐलन बॉर्डर (चौथा पायदान) और मार्क टेलर (12वां पायदान) से पहले ही खत्म हो गए। वॉ के करियर की शुरुआत इन्हीं दो कप्तानों के साथ हुई, जिनके हाथों में ऑस्ट्रेलियाई टीम की कमान थी। ये भी इत्तेफाक है कि वॉ के कप्तान बनते ही वॉर्न को कप्तानी मिलने की उम्मीद खत्म हो गई और ये दोनों कभी बहुत अच्छे दोस्त नहीं रहे।लेकिन जैसा वॉर्न ने एक जगह कहा भी है, आखिरकार ये उन्हीं की किताब है। और इसमें आपको वही पढ़ने को मिलेगा जो वॉर्न चाहते हैं।


पुस्तक समीक्षा

शेन वर्र्न्स सेंचुरी: र्माई टॉप 100 टेस्ट क्रिकेटर्स

लेखक: शेन वॉर्न

प्रकाशक: मेनस्ट्रीम पब्लिशिंग

कीमत: 525 रुपये

पृष्ठ: 320



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Thursday, April 9, 2009

मुकाबला करें, पर पर्यावरण को रखें याद

सुबीर रॉय

इस किताब का महत्त्व इसके प्रकाशन के इतिहास में छुपा हुआ है।

लेखकों को याद है कि वर्ष 2006 में इस किताब को इस उम्मीद के साथ प्रकाशित किया गया था कि कारोबारियों को उनकी रणनीतियों में पर्यावरण को शामिल करने के लिए प्रेरित किया जा सकेगा।
इस किताब के प्रकाशन का समय बिल्कुल उपयुक्त ही नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव लेखकों की उम्मीदों से काफी अधिक दिखाई दिया। पहले जहां शायद ही कोई इक्का-दुक्का कंपनी पर्यावरण के जोखिमों और उसकी लागत पर ध्यान देती थी, वहीं अब ज्यादा से ज्यादा कंपनियां पर्यावरण के साथ लगातार विकास करने और मुनाफा कमाने की राह देख रही हैं।
इस संशोधित पेपरबैक संस्करण में लेखकों ने वाकयों पर नजर डालते और अध्ययन के दौरान कॉर्पोरेट जगत के नवीन चलनों का जिक्र किया है और नई सामग्री को इसमें शामिल किया है। अगर आम तर्क को देखें तो उसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है, बल्कि वह पहले के मुकाबले और भी कड़ा और मजबूत हो गया है।

पहले जब यह किताब लिखी गई थी और अब जब इसका संशोधित संस्करण पढ़ने को मिल रहा है तब यह बात कंपनियों के लिए 'अनिवार्य' हो गया है कि वे उनकी कारोबारी रणनीति में पर्यावरण और निरंतरता पर ध्यान दें।
येल आए दोनों लेखकों के रास्ते तो अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों की एक समान चिंता का विषय है। डेनियल एस्टी अमेरिका की पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी से आए हैं और उन्होंने कंपनियों के साथ उनकी रणनीतियों में सुधार के लिए 15 साल का अपना वक्त दिया है। वहीं दूसरे लेखक ऐंड्रयू विंस्टन ने मार्केटिंग एवं रणनीति में अपने 10 साल दिए हैं।

वर्ष 2003 में येल में बतौर फैकल्टी इन दोनों को एक साथ कॉर्पोरेट की पर्यावरण संबंधी रणनीति को परखने का काम मिला और इन चीजों के साथ-साथ यह किताब भी इसी शोध का नतीजा है। अपने इस शोध के लिए लेखकों ने 300 से भी अधिक लोगों और 100 कंपनियों से बातचीत की थी।
किताब की शुरुआत ही इस बात से होती है कि कैसे और क्यों पर्यावरण सभी आकार के कारोबारों के लिए एक गंभीर रणनीतिक मुद्दे के रूप में उभर कर आया। इसके बाद किताब में ही पर्यावरण संबंधी प्रमुख कंपनियों की पर्यावरण-अनुकूल रणनीतियों का विश्लेषण किया गया है।

इस तरह से दुनिया की ऐसी 50 कंपनियों की पहचान की गई हैं, जो पर्यावरण-अनुकूल बने रहने के लिए अपनी कारोबारी रणनीतियों में इस मुद्दे को गंभीरता से लेती हैं। इनमें से 25 अमेरिका की हैं जबकि बाकी दुनिया के अलग-अलग कोने में हैं।
अमेरिका की कंपनियों की फेहरिस्त में जॉनसन ऐंड जॉनसन, डुपॉन्ट, डाऊ, एचपी, फोर्ड, स्टारबक्स, इंटेल और मैकडॉनल्ड्स शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय फेहरिस्त में बीपी, शेल, टोयोटा, सोनी, यूनिलीवर, लाफार्ज, ऐल्कैन और सीमेंस शामिल है।

प्रमुख कंपनियों ने अपने खर्च कम किए हैं और अपनी पूरी शृंखला में पर्यावरण सबंधी खर्चों में कटौती की है। इसके अलावा उन्होंने उनके परिचालन कार्यों, आपूर्ति शृंखला, में पर्यावरण संबंधी और नियामक जोखिमों को पहचान कर उन्हें कम किया है और ऐसे उत्पादों को लोगों तक पहुंचाया है जो पर्यावरण के लिहाज से बेहतर है और ग्राहकों की ओर से पसंद किए जाते हैं।
ऐसे उत्पादों की बिक्री से उन्होंने कमाई करने की कोशिश भी की है। इसी के साथ उन्होंने पर्यावरण अनुकूल होने के अपने मार्केटिंग प्रयासों के जरिये ऐसी ब्रांड वैल्यू बनाई है जो बेशक दिखाई नहीं देती हो, लेकिन इसके फायदे कंपनियों को खूब होते हैं। ऐसी कंपनियों के साथ आज ग्राहक जुड़ने के बारे में सोचते हैं।

हरियाली से कमाई का खेल खेलने में महारत हासिल करने के लिए कंपनियों को सबसे पहले एक मानसिकता अपनाने की जरूरत है और उन्हें कॉर्पोरेट रणनीति में पर्यावरण संबंधी सोच पर ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए उन्हें उनके पर्यावरण संबंधी प्रदर्शन का जायजा लेने और ऐसे मामलों को समझने की जरूरत है, जिनसे वे प्रभावित होते हैं।
इसके बाद उन्हें अपनी पूरी शृंखला में बदलाव लाने और उन्हें ऐसी पर्यावरण अनुकूल संस्कृति का विकास करने की जरूरत है जो ऊपर से नीचे तक हर जगह उनकी कंपनी में फैल जाए। पर्यावरण अनुकूल रणनीति में छोटी-मोटी अड़चनों पर नहीं बल्कि अल्पावधि-मध्यावधि और दीर्घावधि पर ध्यान देना चाहिए।

इन कंपनियों ने तेजी से उभरते हुए एक अहम सच 'अर्थव्यवस्था और पर्यावरण आपस में गहरे जुड़े हुए हैं' पर अपनी प्रतिक्रिया दी और लेखकों ने यह अनुमान लगाया कि जल्द ही 'कोई भी कंपनी अपनी रणनीति में पर्यावरण संबंधी मामलों को शामिल किए बगैर उद्योग में अपना दबदबा कायम नहीं कर पाएगी और लगातार मुनाफा भी नहीं कमा पाएगी।'
यह मुख्यतया दो कारणों से होगा- प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों का अभाव और 'ऐसे लोगों का समूह जो कारोबारी समुदायों को इस दिशा में कदम उठाने के लिए मजबूर कर रहा है।' आमतौरपर सिविल सोसायटी और खासतौर पर पर्यावरण संबंधी गैर-सरकारी संगठन एक दबाव बनाने वाले संगठन के रूप में उभरे हैं। '


ई-मेल, वेब, सोशल नेटवर्किंग और दूसरे आधुनिक संपर्क से जुड़ी प्रौद्योगिकी के बिना गैर-जिम्मेवार कंपनियों के खिलाफ एक साथ कदम उठाना कभी आसान नहीं होता। और सक्रिय हिस्सेदारों, जिनमें बड़ी संख्या में मुख्यधारा की निवेशक कंपनियां भी शामिल हैं, के कानों में उनकी आवाज पड़ने लगी है।' इससे कई अलग-अलग उद्योगों के भविष्य पर प्रभाव पड़ रहा है।
कोयले का क्या होगा? अगर यह उद्योग जीवित रहा तो क्या आगे भी बना रहेगा? अध्ययन में यह भी बताया गया है कि कंपनियों को पर्यावरण अनुकूल बनने के लिए क्या-क्या करना पड़ा। ऐल्कैन ने 22.5 करोड़ डॉलर जितनी बड़ी रकम जहरीले अपशिष्ट पदार्थ, जो एल्युमीनियम बनाते हुए खांचों के नीचे जमा हो जाता है, को दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाने में खर्च करने पड़े।

इतने से न सिर्फ ऐल्कैन के अपशिष्ट की समस्या का समाधान नहीं निकला, बल्कि कंपनी प्रतिद्वंद्वियों के अपशिष्ट को भी एक कीमत लेकर खत्म कर सकती है। टोयोटा 21वीं शताब्दी की कार पर दोबारा नजर डाल रही है और कंपनी ने हाइब्रिड प्रियस का प्रयोग किया है, जिसके लिए ग्राहक इंतजार करने और मोटी रकम देने को भी तैया होंगे।
ट्रैक्टर बेचने वाले जॉन डीरे ने किसानों की फसल के लिए पवन ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए मदद को एक इकाई लगाई है। और पर्यावरण अनुकूल रणनीति में जबरदस्त प्रभाव दिखाई देगा, जब बड़े कारोबारी जैसे वॉल-मार्ट और मैकडॉनल्ड्स अपनी आपूर्ति शृंखलाओं में पर्यावरण संबंधी रणनीतियों को लागू करेंगे।

कारोबार के लिए दुनिया बदल रही है, क्योंकि पर्यावरण को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ रही है और नियामक इस दिशा में कदम भी उठा रहे हैं। भला इसमें भारतीय आंकड़े क्या कहते हैं? इस मामले में देश निश्चित रूप से सार्वजनिक जागरूकता और नियामक स्तर पर काफी लंबा रास्ता तय करके आया है, क्योंकि इंदिरा गांधी ने अकेले ही साइलैंट वैली के खात्मे को रोक दिया था।

बाजवूद इसके अब भी काफी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। कई कारोबार पर्यावरण संबंधी चिंताओं को रास्ते में बाधा मानते हैं और यहां तक कि कई प्रबंधक अपनी परियोजनाओं के मामले में पर्यावरण संबंधी अनुमति को एक बाधा बताते हैं। आईटीसी को वेवराइडर बनने की चाहत है और वह दिन काफी अहम होगा, जब अंतरराष्ट्रीय 25 कंपनियों की फेहरिस्त में इसका नाम भी शामिल होगा।


ग्रीन टु गोल्ड

संपादन: डेनियन सी एस्टी और ऐंड्रयू एस विंस्टन

प्रकाशक: वाईयूपी

कीमत: 19.95 डॉलर

पृष्ठ: 380

Wednesday, April 8, 2009

फिल्म नगरी से सेट की दुनिया तक

अभिलाषा ओझा

मीडिया और मनोरंजन उद्योग पर लगातार नजर बनाए हुए पत्रकारों को अनिल सारी की हिंदी सिनेमा : ऐन इन्साइडर्स व्यू काफी आकर्षक लगेगी।


यह किताब स्वर्गीय सारी के देश के प्रमुख समाचार पत्रों और आज अपनी पहचान को तरस रहीं कुछ पत्रिकाओं में छपे लेख व निबंधों का संग्रह है। सारी के वर्ष 2005 में आकस्मिक निधन के बाद प्रकाशित इस किताब के प्रति लगाव और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह भारत के काफी वरिष्ठ फिल्म आलोचकों में से एक की सोच को सबके सामने लाती है।
इस किताब में फिल्म उद्योग पर बारीकी से नजर डाली गई है, जिस कारण हिंदी सिनेमा सभी को पसंद आए ऐसा नहीं है। सीधे-सीधे कहें तो कंटेंट के मामले में यह काफी मजबूत है और इसमें काफी व्यापक शोध दिखाई देता है। 'इन्साइडर्स व्यू' होने के बावजूद इसमें फिल्मी दुनिया की चकाचौंध का अंश भी नजर नहीं आता, जो आमतौर पर हिंदी सिनेमा से जुड़ा हुआ है।
दूसरे शब्दों में कहें तो सारी की किताब लेखन के लिहाज से सबसे बढ़िया के स्तर पर नहीं पहुंच पाई है, खासतौर पर 'रैग्स टु रिचेस स्टोरीज मेड रियल - को पढ़ते-पढ़ते मुझे नींद आने लगी।' लेकिन इस किताब को पढ़ने के दौरान शायद ही ऐसा लगा हो कि लेखक को अपने हिंदी फिल्मों पर अनगिनत विचारों को पाठकों तक पहुंचाने में मुश्किल आई हो।
साथ ही चूंकि भारतीय फिल्मों पर बहुत सारी अकादमिक किताबें तो मौजूद नहीं हैं, इसलिए हिंदी सिनेमा कम से कम चयनित मीडिया वर्ग में उत्तेजना तो पैदा कर पाई है। सच तो यह है कि मैं हाल ही में किताब के साथ फिल्म निदेशक दीपा मेहता से मिली और उन्होंने तुरंत ही किताब का नाम लिखना शुरू कर दिया, यह कहते हुए कि वह भी इस किताब को खरीदना चाहती हैं।
पुस्तक का सबसे मजबूत पहलू यही है कि इसमें एक ऐसे पत्रकार के लेख और निबंध प्रस्तुत किए गए हैं, जिसने सिर्फ और सिर्फ भारतीय सिनेमा को समझाने के लिए इन्हें लिखा। इससे भी अहम बात यह है कि उसने भारतीय सिनेमा के हरेक पहलू का भरपूर लुत्फ उठाया था।
खुद को गुरु दत्त के प्रशंसक कहने वाले सारी ने अपनी किताब में भी 'दी मेकर्स ऑफ पॉपुलर सिनेमा' के तहत 'अ चेला सैल्युट्स गुरु दत्त' प्रकाशित किया है। उनके यहां प्रकाशित सभी लेखों या निबंधों में देखा गया है कि उन्होंने फिल्मों के प्रारूप का अध्ययन किया है और देश में अमीर-गरीब तबकों में होने वाले बदलावों के साथ उन्हें जोड़ कर देखा है। इससे भी ज्यादा अक्सर अपने लेखों में जादू बिखेरते हुए वे हिंदी फिल्मों की चमक-धमक के पीछे छिपे तर्कों पर पाठकों को पूरी तरह सहमत कर पाने में भी सफल रहे।
मिसाल के तौर पर फिल्म 'प्यासा' के यादगार गीत 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' के अध्ययन में लेखक के मुताबिक, '....इस गाने की आत्मा पीछे चली जाती है... कबीर के पास और उस समय में जब सभी उलझनों से निपटने के लिए लोग भक्ति की शरण में पहुंचते हैं। और उस समय जब माया की काल्पनिक दुनिया की तरफ भारतीयों के भावों में।'
सेटों पर आकर्षित रिपोर्टें, शूटिंग की जगहों और फिल्मों के शेडयूल को जिस तरह उन्होंने अपने काम में बुना है- उसका जिक्र भी हिंदी सिनेमा में मिलता है। इससे ज्यादा क्या हो सकता है कि जिस सिनेमा को आज हम देख रहे हैं उसमें वह जीवंत हो उठता है। साथ ही इस किताब के जरिये मुंबई फिल्म नगरी की कम दिखलाई देने वाली झलक मिल जाती है और साथ ही यह भी पता चलता है कि वह काम कैसे करती है।
इस किताब में से मेरा एक पसंदीदा निबंध है, 'आर्किटेक्चर ऑफ इल्यूजन' जो एक राष्ट्रीय दैनिक में 1994 में प्रकाशित हुआ था। इस समाचार पत्र में सारी काम किया करते थे। जहां उन्होंने हिंदी फिल्मों में कला निर्देशकों के योगदान का जिक्र किया है, वहीं उन्होंने 'धड़कनों को थमा देने वाले आर्किटेक्चरल विशाल सेट' पर भी अपना अनुभव पाठकों के साथ बांटा है।
यह विशाल सेट बतौर निर्माता टुटु शर्मा की फिल्म 'राजकुमार' का था, जिसमें माधुरी दीक्षित और अनिल कपूर ने काम किया था, लेकिन किसी को यह मालूम नहीं था कि यह फिल्म हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी असफल फिल्म रहेगी।
इस फिल्म के लेखक विनय शुक्ला के मुताबिक, 'दो राज घरानों की दुश्मनी पर आधारित यह फिल्म राजस्थानी पृष्ठभूमि पर बनाई गई है।' उनका यह दावा था कि फिल्म रिकॉर्ड बनाएगी, लेकिन उनके यह दावे धराशायी हो गए। फिल्म के सेट पर मौजूदा बीबीसी की एक यूनिट के शब्दों में, '7,000 लकड़ी के लट्ठे, जिन पर मिस्र शैली में नक्काशी थी और जिन्हें ग्रीको-रशियन खंभों में तब्दील किया गया, शूटिंग के समाप्त होने पर लगभग 30 दिन बाद मिट्टी में मिल गए।'
चार भागों में बंटे हुए हिंदी सिनेमा में 35 लेखों का संग्रह है। ये चार भाग हैं: 'दी एस्थेटिक फाउंडेशंस ऑफ दी हिंदी फॉर्मूला फिल्म', 'थीम्स ऐंड वैरियेशंस ऑफ इंडियन सिनेमा', 'पर्सपेक्टिव्स ऑन इंडियन सिनेमा' और 'मेकर्स ऑफ पॉप्युलर सिनेमा'।
इस किताब को पढ़ने के बाद दिल में सिर्फ एक ही ख्वाहिश उठती है कि काश सारी से बात करना संभव होता। 'हिंदी सिनेमा : ऐन इन्साइडर्स व्यू' एक ऐसा संवाद है जिसकी शुरुआत बेहद खूबसूरत है और पाठक का मन होता है कि यह आगे भी जारी रहना चाहिए। इसीलिए तो इसे अच्छी किताब की संज्ञा दी जा सकती है।

पुस्तक समीक्षा

हिंदी सिनेमा: ऐन इन्साइडर्स व्यू

लेखक : अनिल सारी

प्रकाशक : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

कीमत: 495 रुपये

पृष्ठ: 6 + 222


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Tuesday, April 7, 2009

'खुलासे' का किया खुलासा

ए. के. भट्टाचार्य

देश में 24*7 टेलीविजन समाचार चैनलों की मौजूदगी दर्ज होने से बहुत पहले ही अंग्रेजी में भारत की पहली विडियो समाचार पत्रिका पेश करने का श्रेय मधु त्रेहन को जाता है। मधु ने बेहतर शोध के बाद उस समय मौजूदा सरकार के चेहरे पर से पर्दे हटाने वाले मीडिया प्रयासों पर एक किताब लिखी है।

साथ ही उनकी यह किताब सभी को हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, प्रणालियों और संस्थानों की खूबियां और खामियों से रूबरू कराती है। उनकी किताब का विषय एक वेबसाइट,तहलका की ओर से किया गया स्टिंग ऑपरेशन है।

13 मार्च, 2001 को देशभर का मन खट्टा हो गया, क्योंकि उस दिन केंद्रीय सत्ता में मौजूद नेताओं का ऐसा मिलन देखने को मिला था, जिसमें उन्हें पैसे लेते हुए या फिर उनकी जुबानी उनकी पार्टियों के लिए पैसे लेते हुए सुना गया।

उन्होंने ये पैसे लिए भी तो उस व्यक्ति से, जिसका दावा था कि वह एक हथियारों का कारोबार करने वाली कंपनी का एजेंट है। तहलका की टेपों ने उससे कहीं ज्यादा खुलासा किया- एक सेना अधिकारी और उसके सहायक कुछ हजार रुपयों और एक महिला के साथ के बदले गुप्त दस्तावेज एजेंट को सौंप रहे थे।

तहलका खुलासे के बाद जो हुआ वह भी कम नहीं था। जहां कैमरे में कैद कुछ नेताओं पर ऐसा दबाव बनाया गया कि वे अपने-अपने इस्तीफे दे दें। जांच में सेना अधिकारियों को भी दोषी पाया गया और उन्हें निकाल दिया गया, वहीं दूसरी तरफ सरकारी तंत्र हरकत में आ गया ताकि पता चल सके कि कहीं इस 'स्टिंग' ऑपरेशन के पीछे कोई साजिश तो नहीं।

एक आयोग की जांच-पड़ताल साजिश को ध्यान में रखकर शुरू हुई, जिसके साथ इस खुलासे की योजना बनाने वाले सभी पत्रकारों पर हर तरह के दबाव डाले जाने लगे। तहलका के निवेशकों को काफी प्रताड़ित किया गया और उन्हें आर्थिक अपराधों को अंजाम देने के लिए आरोपी ठहराया गया। इसके लिए उनमें से एक को जेल तक भेजा गया।

जैसा कि त्रेहन अपनी इस किताब में कहती हैं, तहलका टेपों और उसके बाद के मामलों से पता चलता है कि भारत का प्रशासन तंत्र कितना दूषित हो चुका है। ऊंचे पदों पर जिनमें सत्ताधारी पार्टी के राजनेता भी शामिल हैं, भ्रष्टाचार अपने पैर पसार चुका है।
लेकिन जब कभी भ्रष्टाचार के इस तरह के मामले सामने आते हैं, सरकार को भारी चोट लगती है और वह अक्सर मामले का भांडा फोड़ करने वाले को चुप कराने के अपने प्रयास में सफल भी हो जाती है।

लोगों की स्मृति में ये मामले जल्द धुंधले पड़ जाते हैं और भारतीय मीडिया कभी-कभार ही इस तरह के मामलों की गहराई में जाता है। कोई कभी इस ओर ध्यान नहीं देता कि सरकार ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग तो नहीं किया और सरकार की ओर से पत्रकारों को किसी भ्रष्टाचार के मामले का खुलासा करने से रोकने के लिए लुभाने की कोशिश तो नहीं की गई या मीडिया की ओर से भ्रष्टाचार का खुलासा करने का तरीका सही था या नहीं।

यह जानकारी मिलने से पहले ही मीडिया किसी दूसरी बड़ी घटना या अगले घोटाले को कवर करने के लिए आगे बढ़ जाता है। फलस्वरूप, कोई यह नहीं जान पाया कि क्या तहलका खुलासे के पीछे वाकई कोई साजिश थी और क्या तहलका के निवेशकों के खिलाफ सरकारी कार्रवाई करना उचित था या नहीं।

त्रेहन की यह किताब तहलका 'स्टिंग' ऑपरेशन के करीबी मामलों पर हमारी समझ, हमारी सोच के अंतर को भरने के लिए एक गंभीर प्रयास है। उन्होंने तहलका और इस खुलासे से जुड़े लोगों के साथ 40 साक्षात्कारों का सहारा लिया है।
इस प्रक्रिया के दौरान हमें 'स्टिंग' ऑपरेशन को अंजाम देने वाले कुछ पत्रकारों (वाकई वे पत्रकार थे?) के बारे में जानने का मौका मिला है। हमने जाना कि प्रेस काउंसिल की आचार संहिता से कैसे कुछ संपादक अपरिचित हैं ।

कैसे सरकारी वकील आरोपी को जमानत नही दिए जाने की खातिर अदालतों को मना पाने में कामयाब रहे या तहलका टेप में जिनके चेहरे पहचाने जा रहे हैं उनमें से कुछ क्यों परस्पर विरोधी बातें कह रहे हैं, जबकि खुलासे के दौरान उन्होंने कुछ और ही कहा था।
किताब में इस बात के भी कुछ संकेत दिए हैं कि कैसे वरिष्ठ तहलका पत्रकार खुलासे के लिए किसे ज्यादा श्रेय जाए इस बात पर भी गुटों में बंट गए। साथ ही तहलका के कुछ शुरुआती निवेशक परियोजना से अलग क्यों हो गए, इस बात का स्पष्टीकरण भी उतना ही दिलचस्प है।
विन्यास के नजरिये से देखें तो यह किताब थोड़ी ढीली है और निश्चित रूप से इसका संपादन भी कुछ बेहतर हो सकता था। लेकिन इस किताब की एक खूबी है। एक बार जब आप किताब का पहला अध्याय पढ़ लेंगे, जिसमें किताब के केंद्र बिंदु का जिक्र किया गया है, फिर आप तहलका मामले के विभिन्न पहलुओं की जानकारी हासिल करने के लिए बचे हुए 27 अध्यायों में से किसी को भी चुन सकते हैं।
इस किताब में साक्षात्कारों का इस्तेमाल इस तरह से किया गया है कि वे किसी भी अध्याय में प्रवाह को तोड़ते नहीं हैं। अब तक किताब किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंची कि आखिर हुआ क्या था।
वेबसाइट के संपादक तरुण तेजपाल का कहना है कि उन्होंने अपने प्रतिनिधि को लंदन में हिंदुजा से मिलने जाने दिया, लेकिन उन्होंने खुद यह फैसला किया कि जिस भवन में यह बैठक हो रही है, वे वहां नहीं जाएंगे। क्या तहलका प्रवर्तकों के दिमाग में 'स्टिंग' ऑपरेशन करने के लिए कुछ और ही एजेंडा था? इस सवाल का कोई साफ जवाब नहीं है।

त्रेहन का कहना है कि किसी घटना को समझने या उसके पेश करने के अलग-अलग लोगों के तरीके अलग-अलग होते हैं यानी सच्चाई कई तरह की होती है। उद्देश्यपूर्ण तरीके से त्रेहन की अलग-अलग सच्चाई को पेश करने की क्षमता और जल्द निष्कर्ष पर पहुंचने की लालसा को बनाए रखना काबिल-ए-तारीफ है। यह किताब, किताब कम और तहलका मामले पर शोध करने वालों के दस्तावेज अधिक लगती है।


पुस्तक समीक्षा

प्रिज्म मी ए लाइ टेल मी ए ट्रूथ तहलका एज मेटाफर

लेखिका : मधु त्रेहन

प्रकाशक: रोली बुक्स

कीमत: 595 रुपये

पृष्ठ: 616



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Sunday, April 5, 2009

हिंदू-मुसलमानों पर उठते सवालों का जवाब

सुनील जैन

क्या देश की अदालतों में मुस्लिमों से भेदभाव किया जाता है, जैसा कि अक्सर इल्जाम लगता है कि स्थानीय पुलिस हिंदुओं के मुकाबले उन्हें ज्यादा गिरफ्तार करती है?

क्या न्यायिक प्रणाली सिर्फ आंख बंद कर फैसला देती है और आतंकवाद के आरोपियों को बिना एक निष्पक्ष मुकदमे के उन्हें सजा दे देती है? क्या विभिन्न अदालतों और न्यायाधीशों के फैसलों का पहले अनुमान लगाया जा सकता है जैसा जॉन ग्रिशैम ने 'दी रनवे जूरी' में किया था?

क्या कमजोरगठबंधन सरकार की मौजूदगी अदालतों के किसी तरह के फैसले पर असर डालती है? जब कभी आप भारत की न्यायिक प्रणाली के बारे में सोचते हैं तो इस तरह के कई और सवाल भी खुद-ब-खुद दिमाग में आ जाते हैं।
कोलंबिया से राजनीतिक विज्ञान में पीएचडी शैलाश्री शंकर जो ऑस्टिन की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस में असिस्टेंट प्रोफेसर थीं और अब नई दिल्ली में पॉलिसी रिसर्च सेंटर में काम कर रही हैं, ने इन और ऐसे कई सवालों के सटीक जवाब देने की कोशिश की है।

अदालतों के अलग-अलग फैसलों के रूप में चरणों में दिलचस्प लेखन के अलावा शंकर ने अपने तर्कों को अलग आयाम देने के लिए दिलचस्प अर्थमितीय उदाहरणों का सहारा लिया है।

नतीजतन, लगभग इस किताब के अहम हिस्से के लगभग 200 पृष्ठ आसानी से एक बार में ही पढ़े जाते हैं। यह किताब मनुपात्र में दिए गए फैसलों पर आधारित है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय और अलग-अलग उच्च न्यायालयों के फैसले बड़ी तादाद में शामिल हैं।

जैसा कि आप उम्मीद करेंगे अदालतों ने लीक से हटकर फैसले दिए हैं। ये फैसले आपातकाल के दिनों से लेकर अत्यधिक सक्रियता के हैं। लेखक ने इसे बताने के लिए काफी अच्छे उदाहरणों का सहारा लिया है: जैसे प्रधान न्यायाधीश बेग 1978 में सेवानिवृत्त होने को ही थे, सार्वजनिक जीवन से जुड़ी 52 हस्तियों और वकीलों ने बॉम्बे मेमोरेंडम में सरकार से अपील की कि वह न तो न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ और न ही न्यायमूर्ति भगवती को नियुक्त करें।

उनका तर्क था कि उन्होंने काले कानूनमीसा को लागू करने के सरकार के अधिकार को बरकरार रखा था। दो वर्ष बाद, न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने मुकदमे के दौरान खुद में इस्तीफा न दे पाने की हिम्मत को लेकर माफी मांगी। दूसरे शब्दों में कहें तो न्यायाधीश इंसान भी हैं, और जनता के बीच अपनी वैधानिकता भी चाहते हैं।

सौभाग्य से लेखिका ने यह किताब लिखने के लिए जो तथ्य जुटाए हैं, उनसे पता चलता है कि न्यायमूर्ति अपनार् कत्तव्य भूल कर अपनी वैधानिकता पाने की कोशिश नहीं करते। सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने वर्ष 2005 में 1,700 मामलों की सुनवाई की।

यह संख्या अपने आप में काफी चकरा देने वाली है। इनमें से कुछ उदाहरणों को यहां पेश किया गया है: वर्ष 1985 से 1995 के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महज 35 प्रतिशत टाडा के मामले सुनवाई के लिए आए। अदालत में पेश इनमें से 57 प्रतिशत मामले ही राज्य के पक्ष में गए।

वर्ष 1950 से 1970 के दौरान निवारक निरोधक के मामलों में से सिर्फ 53 प्रतिशत ही ऐसे थे जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे। इनमें से 74 प्रतिशत मामलों का फैसला राज्य के हक में हुआ। टाडा के मामले में एक न्यायाधीश द्वारा आरोपी के पक्ष में आदेश दिए जाने की संभावना निवारक निरोधक मामले की तुलना में 48 प्रतिशत अधिक थी। इससे आपातकाल के बाद न्यायपालिका के नजरिये में परिवर्तन का संकेत मिलता है।

टाडा के मामलों में अगर कोई मुस्लिम याचिकाकर्ता है तो ऐसे मामले में राज्य के पक्ष में फैसला दिए जाने की संभावना 38 प्रतिशत कम थी (इससे प्रदर्शित होता है कि पुलिस दूसरे समुदायों की तुलना में अक्सर मुस्लिमों को ज्यादा पकड़ती है, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि अगर मुस्लिमों के खिलाफ हिंदू पक्षपात है तो निश्चित ही न्यायाधीशों में यह बिल्कुल नहीं झलकता।)

ऐसे मामलों में जिनमें आरोपी मुस्लिम था, हिंदू न्यायाधीशों के फैसले राज्य के पक्ष में 34 प्रतिशत कम रहने की संभावना थी। (सर्वोच्च न्यायालय में 87 प्रतिशत हिंदू न्यायाधीश।) गठजोड़ अल्पमत सरकारों के दौरान न्यायधीशों के राज्य के खिलाफ फैसला दिए जाने की संभावना 27 प्रतिशत अधिक थी। संसद पर हमले के बाद फैसले राज्य के पक्ष में अधिक लगे।
आधे से तीन-चौथाई मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के 40 प्रतिशत न्यायाधीश राज्य के पक्ष में रहते हैं, जबकि आधे से भी कम मामलों में वे 24 प्रतिशत राज्य के पक्ष में नहीं रहते हैं। सोचिए कि इन आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद मुकदमा लड़ने वालों को कैसे फायदा होगा।

लेकिन इस तर्क में कुछ खामियां भी हैं- मिसाल के तौर पर हर मामले को एक ही नजर से देखा जाता है, जबकि उनमें से कुछ निश्चित तौर पर ज्यादा अहम होते हैं। बीएमडब्ल्यू मामले में हमने देखा, कि मामला मजबूत होने के बावजूद भी कई बार सरकार आरोपी को सजा नहीं दिला पाती। यह फेहरिस्त काफी लंबी है।

इस किताब का उद्देश्य न्यायिक प्रणाली की सराहना करना या उसकी निंदा करना नहीं है। बल्कि इसके पीछे अदालती रवैये में पैटर्न को सामने लाना है। और उनके लिए सफाई की तलाश करना है। इस स्तर पर यह सराहनीय कार्य है। और यह पढ़ने के लिहाज से उत्कृष्ट है।


पुस्तक समीक्षा

स्केलिंग जस्टिस इंडियाज सुप्रीम कोर्ट, एंटी-टेरर लॉज ऐंड सोशल राइट्स

लेखिका: शैलाश्री शंकर

प्रकाशक: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

कीमत: 395 रुपये

पृष्ठ: 271

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यूं लिखी गई आईटी की कामयाबी गाथा


सुबीर रॉय

यह किताब बहुत अच्छे ढंग से हम तक ये सभी जानकारियां उपलब्ध कराती हैं। यह भारतीय आईटी उद्योग का व्यापक और विस्तृत इतिहास है। किताब की भाषा सरल है और इसमें एक प्रवाह दिखता है।

भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग की सफलता जगजाहिर होने के बाद मुख्यधारा के मीडिया ने सफलता की इस गाथा के बारे में छापने या प्रसारित करने में गहरी दिलचस्पी दिखाई है।
अब चूंकि साबित हो चुका है कि यह सफलता टिकाऊ है, इसलिए हमें यह जानने की जरूरत है कि इस सफर की शुरुआत कैसे हुई और कैसे यह उद्योग लगातार तरक्की करते हुए अपने मौजूदा स्तर तक पहुंचा है।
यह किताब बहुत अच्छे ढंग से हम तक ये सभी जानकारियां उपलब्ध कराती हैं। यह भारतीय आईटी उद्योग का व्यापक और विस्तृत इतिहास है। पुराने दस्तावेजों और आईटी उद्योग की दिग्गज शख्सियतों के साथ बातचीत ने इस को बेशकीमती बना दिया है। किताब की भाषा सरल है और इसमें एक प्रवाह दिखता है।
दिनेश शर्मा इस बात से शुरूआत करते हैं कि भारत में पहली बार कंप्यूटर कैसे चालू हुआ। इनमें कोलकाता के पास भारतीय सांख्यिकीय संस्थान में 1956 में लगाई गई मशीन शामिल है। मुंबई स्थित टाटा इंस्टीटयूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च ने 1960 में अपनी मशीन लगाई। इसका नाम टीआईएफआर ऑटोमोटिक कैलकुलेटर था।
उन दिनों पीसी महलनोबिस और होमी भाभा के बीच एक आकर्षक मुकाबला चल रहा था कि आखिर कौन अपने प्रतिष्ठानों में पहले कंप्यूटर केंद्र स्थापित कर पाता है। दोनों ही जवाहर लाल नेहरू के करीबी थे। इस मुकाबले में जीत भाभा के हाथ लगी। 1950 और 1960 के दशक के दौरान शुरूआती पीढ़ी के कंप्यूटरों में हार्डवेयर डिजाइन, सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग, रखरखाव और प्रशिक्षण की सुविधा थी।
जल्दी शुरूआत के साथ ही उन दिनों की सरकारी और राजनीतिक सोच के कारण देश में कंप्यूटरों का तेजी से प्रसार हुआ। पूरी तरह से आत्मनिर्भरता और प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण के संकल्प के कारण अधिक तेज गति से विकास हुआ। इलेक्ट्रॉनिक आयोग पूरी तरह से भारत में विकसित कंप्यूटर प्रणाली और कलपुर्जे हासिल करना चाहता था, क्योंकि अभी तक केवल कुछ खास प्रौद्योगिकी और कलपुर्जों के आयात की ही अनुमति दी गई थी।
इस दिशा में पहली बार पुख्ता सोच संतोष सोंधी समिति की रिपोर्ट आने के बाद तैयार हुई। इस समिति की स्थापना मोरारजी देसाई ने की थी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि उद्योगों द्वारा कंप्यूटर आयात के लिए दिए गए प्रस्ताव की कोई जरूरत नहीं है और कंप्यूटरीकरण की पूरी कवायद ठंडे बस्ते में चली गई।
इसके बाद कंप्यूटर को लेकर सरकार की सोच में 1980 के दशक में उस समय से बदलाव आना शुरू हुए जब इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में आई और राजीव गांधी ने नीतियों को प्रभावित करना शुरू किया। यह उनके प्रधानमंत्री बनने से काफी पहले की बात है। इसलिए उनके सत्ता में आने से काफी पहले ही इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर और दूरसंचार के लिए उदारवादी नीतियों की जमीन तैयार की जा चुकी थी।
किताब में एक जगह शर्मा लिखते हैं कि 'अगर नेहरू भारतीय विज्ञान का राजनीतिक हिस्सा थे तो राजीव भारतीय प्रौद्योगिकी का राजनीतिक हिस्सा थे।' नेहरू के समय में राजनीतिज्ञों और वैज्ञानिकों के गठजोड़ से विज्ञान का विकास हुआ जबकि राजीव गांधी के वक्त में राजनीतिज्ञों और तकनीकविदों के गठजोड़ से प्रौद्योगिकी का विकास हुआ।
आयात पर अवरोध और विदेशी कंपनियों के साथ परिचालन के लिए सख्त नियम (इस कारण आईबीएम को 1978 में रुखसत होना पड़ा) का अच्छा असर भी दिखाई दिया और 1970 के दशक के अंत में और 1980 की शुरूआत में डीसीएम, एचसीएल और पीएसआई की अगुवाई में हार्डवेयर विनिर्माण के लिए भारतीयों ने प्रयास शुरू किए।
इन कंपनियों ने कैलकुलेटर, मिनी और माइक्रो कंप्यूटर और फिर पर्सनल कंप्यूटर बनाना शुरू किया। लेकिन 1980 के दशक में आयात और संयुक्त उद्योग को लेकर उदारवादी नीतियों के कारण प्रौद्योगिकी अंतर में कमी आई लेकिन इसका भारतीय शोध और विकास पर विपरीत असर देखने को मिला।
इसके अलावा आईटी क्षेत्र के विकास की राह में 1980 के दशक में पैदा हुए विदेशी मुद्रा संकट के कारण भी बुरा असर पड़ा। इस संकट के कारण शुल्कों को बढ़ा दिया गया। इस कारण हार्डवेयर कंपनी कारोबार के नए आयाम तलाशने के लिए मुड़ी और उनकी खोज सॉफ्टवेयर पर आकर पूरी हुई।
इस लोकप्रिय धारणा के विपरीत कि भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग की सफलता की गाथा में सरकार ने अहम भूमिका निभाई है, नेशनल सेंटर फॉर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट ऐंड कंप्यूटिंग टेकि्क्स ने 1980 में करीब एक तिहाई सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को निकाल दिया।
भारतीयों की कौशल क्षमता के कुछ संकेत उस समय मिले जब एचसीएल ने 1989 में एक दुर्घटना के बाद अपने अमेरिकी परिचालन को बंद करने का फैसला किया और उसे बाद में अपना फैसला पलटना पड़ा क्योंकि ग्राहक एचसीएल के सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे और वे उनके वेतन का भुगतान करने के लिए भी तैयार हो गए।
यह सॉफ्टवेयर सेवाओं की शुरूआत थी। इसके बाद विदेशी परिचालन बढ़ता चला गया और सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी पार्क और सैटेलाइट संपर्क के कारण इसमें और तेजी आई। इसके अलावा किताब में कुछ और रोचक घटनाओं का जिक्र किया गया है। इसमें आईबीएम का उत्थान और पतन शामिल है। ऐसी ही एक घटना में बताया गया है कि कैसे रेलवे ने यात्री आरक्षण प्रणाली का कंप्यूटरीकरण किया।
यह जिम्मेदारी सीएमसी को सौंपी गई थी। इसके अलावा यात्रियों की स्थिति की जानकारी कंप्यूटरों के द्वारा रखी जाने लगी। रेलवे ने यह काम खुद करने का फैसला किया। शर्मा की किताब के निष्कर्ष की बात करें तो सरकार ने शुरूआत में इलेक्ट्रॉनिक्स और कंप्यूटर हार्डवेयर उद्योग की जमीन तैयार करने, उनका पोषण करने और उनके विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन सरकार की सहानुभूति सरकारी कंपनियों के साथ ही थी।
विदेशी पूंजी को लेकर पूर्वाग्रह के कारण भारत इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण के लिए अमेरिकी कंपनियों की अगवानी से वंचित रह गया, जो कि बाद में हांगकांग, ताइवान और सिंगापुर चली गईं। हालांकि इंदिरा गांधी के दूसरे कार्यकाल के दौरान सरकार का रुख पूरी तरह से बदल गया था। इस दौरान नीतियां मददगार थीं। उनके द्वारा की गई शुरूआत और 1991 के बजट में सॉफ्टवेयर निर्यात पर कर छूट के साथ ही सॉफ्टवेयर क्षेत्र में सफलता की इबारत लिख दी गई थी।

पुस्तक समीक्षा


द लॉन्ग रिवोल्यूशन

द बर्थ ऐंड ग्रोथ ऑफ इंडियाज आईटी इंडस्ट्री

लेखक: दिनेश सी शर्मा

प्रकाशक: हार्पर कॉलिंस इंडिया

कीमत: 595 रुपये

पृष्ठ: ४८८

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