सबकी अपनी अपनी सोच है, विचारों के इन्हीं प्रवाह में जीवन चलता रहता है ... अविरल धारा की तरह...
Wednesday, October 22, 2008
मराठी राजनीति की एक गंदी पीढ़ी
कांग्रेस की राजनीति
कांग्रेस इसलिए नवनिर्माण सेना को बढ़ावा दे रही है कि उसे शिव सेना से अगले चुनाव में मुकाबला करना है। अगर राज ठाकरे इस तरह की नंगई करके कुछ वोट काटने में सफल हो जाता है तो वह कांग्रेस के हित में रहेगा। यही वजह है कि कांग्रेस सरकार महाराष्ट्र में जंगलराज बरकरार रखने में मदद कर रही है। विलासराव देशमुख सरकार ने अगर गिरफ्तारी की भी, तो नाटक करने के लिए। हिंदी टीवी चैनलों पर मराठी बोलकर दिखाना पड़ा कि वे भी मराठियों के खैरख्वाह हैं।
भाजपा की राजनीति
यह पार्टी तो जैसे नंगी होने के लिए पैदा ही हुई है। सत्ता में रही तब अपने मुद्दे को छो़ड़कर नंगी हुई। सत्ता के बाहर रही तो और तरीकों से। राष्ट्रीय और हिंदूवादी पार्टी होने का दावा करने वाले ये लोग भी मुंबई में चल रही गुंडई के बारे में मौन साधे हुए हैं। शायद आडवाणी को प्रधानमंत्री बनने का लोभ इतना है कि वे राज ठाकरे और बाल ठाकरे दोनों को साधे रखना चाहते हैं। लेकिन इनको यह पता नहीं कि इस तरह के दोगलेपन को जनता पसंद नहीं करती।
लालू और मुलायम की राजनीति
ये केंद्र में सत्ता में बैठे हैं, लेकिन औकात नहीं है कि केंद्र सरकार की मुंबई में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को पिटवाने की नीति का विरोध कर सकें। खास बात यह है कि मुलायम के मुंबई प्रतिनिधि अबू आजमी भी अब उत्तर भारतीयों को संगठित करने में लग गए हैं। कोशिश यही कि इस पिटाई का राजनीतिक फायदा उठा लिया जाए। कांग्रेस की तुष्टिकरण में अमर सिंह तो पहले से ही सहयोगी बनकर बाटला हाउस के प्रवक्ता बनकर उभरे हैं।
अब सवाल उठता है कि ऐसी बुरी दशा में जनता जाए तो कहां जाए। राष्ट्रीयता का खामियाजा यूपी और बिहार वाले भुगत ही रहे हैं, जिसके कारण न तो इन राज्यों में सार्वजनिक इकाइयां हैं और न ही निजी। नौकरी के लिए ये दूसरे राज्यों में जाते हैं और यह समझते हैं कि पूरा भारत हमारा है, क्योंकि हम हिंदुस्तानी हैं।
Sunday, October 19, 2008
नंगू

शाकाहार तो ठीक है भइया। ज्यादातर भारतीय इसका समथॆन करते हैं। लेकिन इस तरह का शाकाहार? अगर ऐसा ही किया तब तो सड़क पर धूमने वाली गाय और बकरियां हमें नंगा कर देंगी।
Monday, October 13, 2008
कुछ यूं मचा कर्नाटक में बवाल, सरकार जवाब दे, क्या किया उसने?
2) “…गुरु वशिष्ठ एक वेश्या के पुत्र थे…”।
3) “…बाद में वशिष्ठ ने अपनी माँ से शादी की, इस प्रकार के नीच चरित्र का व्यक्ति भगवान राम का गुरु माना जाता है…” (पेज 48)।
4) “…जबकि कृष्ण खुद ही नर्क के अंधेरे में भटक रहा था, तब भला वह कैसे वह दूसरों को रोशनी दिखा सकता है। कृष्ण का चरित्र भी बहुत संदेहास्पद रहा था। हमें (यानी न्यूलाईफ़ संगठन को) इस झूठ का पर्दाफ़ाश करके लोगों को सच्चाई बताना ही होगी, जैसे कि खुद ब्रह्मा ने ही सीता का अपहरण किया था…” (पेज 50)।
5) “…ब्रह्मा, विष्णु और महेश खुद ही ईर्ष्या के मारे हुए थे, ऐसे में उन्हें भगवान मानना पाप के बराबर है। जब ये त्रिमूर्ति खुद ही गुस्सैल थी तब वह कैसे भक्तों का उद्धार कर सकती है, इन तीनों को भगवान कहना एक मजाक है…” (पेज 39)।
“न्यू लाईफ़ वॉइस” मिशनरी केन्द्र ने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसका नाम रखा गया “सत्य दर्शिनी”, और इस बुकलेटनुमा पुस्तक को बड़े पैमाने पर गाँव-गाँव में वितरित किया गया। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद लोग भड़क गये और यही इन दंगों का मुख्य कारण रहा.
http://sureshchiplunkar.blogspot.com
पर इसके बारे में जानकारी मिली। अगर यह सही है कि इस तरह की किताब बांटी गई, तो सवाल यह उठता है कि क्या यह भड़काऊ नहीं है जिससे मारकाट मच जाए???
ऐसे में सरकार ने क्या किया? क्या ऐसे संगठनों और मिशनरियों पर प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए????
Sunday, October 12, 2008
गंदी राजनीति के चलते खतरनाक बनता असम
असम में बोडो और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के बीच संघर्ष में गत सप्ताह दर्जनों लोग मारे गए।
2006 में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले भी असम में इसी तरह की मुठभेड़ हुई थी, लेकिन दो जनजाति समूहों के बीच। कबीलों, जनजातियों, जातीय और धार्मिक समुदायों में बंटा असम, अन्य राज्यों से ज्यादा हिंसा का शिकार होता है।
कहावत है कि आप अपने दोस्तों को चुन सकते हैं, लेकिन अपने संबंधियों को नहीं। असम का कुछ यही हाल है। बांग्लादेश से सटी एक सीमा की वजह से असम और बांग्लादेश के बीच पारिवारिक संबंध है। सीमा पर किसी तरह की रोक-टोक नहीं है।
अत: बोडो जाति के असामाजिक तत्व - जैसे कथित आतंकवादी परेश बरुआ- बांग्लादेश के दामाद की तरह सीमा पार कर आते जाते रहते हैं। बांग्लादेश भी उनको खुशी से दूध पिलाता है- क्या पता कब जरूरत पड़ जाए! 1960 से 1980 के दशक में असम में लगातार कांग्रेस का ही शासन रहा करता था।
राज्य के दिग्गज कांग्रेसी नेता, देवकांत बरुआ खुलेआम कहा करते थे कि जब तक अली (बांग्लादेशी मुसलमान), कुली (चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिक) और बंगाली (पश्चिम बंगाल से आए हुए हिंदू) कांग्रेस के साथ थे, कांग्रेस के हारने का कोई सवाल ही नहीं था। जब इन तीनों समुदायों- अली, कुली और बंगाली- के अनुपात की लगाम कांग्रेस के हाथ से निकल गई तो सामाजिक और आर्थिक विकृतियों का उभरकर आना स्वाभाविक था।
ऐसा कुछ होता चला गया 1980 के दशक से। बाहर से आए लोगों के खिलाफ आवाज उठाई अहोम गण परिषद ने। इसके बाद उत्तर प्रत्युत्तर में हिंसा असम की राजनीति का एक हिस्सा सा बन गई। कभी हिंदू मुस्लिम दंगे होते थे तो कभी बोडो-कुकी झगड़े। बांग्लादेश से भागे हिंदू भी असम आने लगे। असम के हिंदू इन्हें हिकारत की निगाह से देखते थे। तनाव स्वाभाविक था।
1980 और 84 के चुनाव किन परिस्थितियों में हुए, यह सर्वविदित है। भारत सरकार और आल असम स्टूडेंट्स यूनियन व अगप के बीच करार के बाद स्थिति संभल गई। अगप की सरकार भी बनी, लेकिन युवा आदर्शों को सत्ता के लालच ने निगल लिया। सरकार की लूटपाट से तंग आकर असम ने फिर कांग्रेस को चुना।
2001 में तरुण गोगोई मुख्यमंत्री बने और 2006 में कांग्रेस पुन: जीतकर आई। सरकार तो औपचारिक रूप से बन गई लेकिन राजनीतिक चुनौतियां बरकरार रहीं। लेफ्टीनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) एस. के. सिन्हा ने, जो असम के राज्यपाल थे, राज्य सरकार को कई बार चेताया कि यदि बाहरी लोगों को असम में आने से रोका नहीं गया तो असम का जनसांख्यिकीय चरित्र ही बदल जाएगा।
यही बात कही लेफ्टीनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) अजय सिंह ने, जो अब राज्यपाल हैं। तरुण गोगोई और राज्यपाल में तो सार्वजनिक झड़प हो गई। गोगोई ने राज्यपाल के इस कथन का खंडन किया कि रोज 6,000 लोग बांग्लादेश से भारत आते हैं और इन्हें रोकने का राज्य सरकार कोई प्रयास नहीं कर रही है।
2005 में तिनसुकिया जंगलों में फौज आतंकवादियों को ढूंढ रही थी। अचानक राज्य सरकार से आदेश मिला कि खोज को रोक दिया जाए। सेना ने 14 को मार गिराया था। सेनाध्यक्ष पशोपेश में पड़ गए। जब जंगल खाली करने का मौका था तो पीछे हटना क्या बुध्दिमानी थी? लेकिन सरकार अड़ी रही और सेना को ऑपरेशन अधूरा छोड़ना पड़ा। सच तो यह है कि चुनाव सामने था और सरकार नहीं चाहती थी कि किसी भी समुदाय के वोट वह खो दे।
तरुण गोगोई ने अपने कार्यकाल में ऐसा बहुत कुछ किया है, जिससे असम के निवासियों का विश्वास जीता जा सके। पुलिस के इंसपेक्टर जनरल की पदवी को ही रद्द कर दिया गया। जिस तरह मुफ्ती मोहम्मद सईद कश्मीर का चुनाव इस वायदे पर जीत गए कि स्पेशल टास्क फोर्स को वह राज्य से बाहर कर देंगे।
क्या सेना और पुलिस का मनोबल तब तोड़ना चाहिए, जब वे ऑपरेशन में सफलता हासिल कर रहे हों? बहरहाल दंगाइयों को लगा कि जब सैंया भए कोतवाल तब डर काहे का। लेफ्टी. जनरल सिन्हा की चेतावनी अब दिल्ली में सब को याद आ रही है।
राष्ट्रपति के. आर. नारायणन को एक पत्र में जनरल सिन्हा ने लिखा था कि बांग्लादेशी नागरिकों का असम में घर बनाना अब इतना प्रचलित हो गया है कि वह समय दूर नहीं, जब असम के बड़े हिस्सों से मांग होगी कि भारत सरकार को उन जिलों को बांग्लादेश के साथ विलय की अनुमति दे देनी चाहिए ।
भारत सरकार ने आईएमडीटी एक्ट के तहत गैर कानूनी बांग्लादेशी नागरिकों को स्वदेश भेजने के लिए एक तंत्र बनाया था। इसे संप्रग सरकार ने खारिज कर दिया है। असम अब कितने खतरनाक और संवेदनशील कगार पर खड़ा है, यह बहुत कम लोग समझते हैं।
भूटान, बांग्लादेश और बर्मा जैसे तीन देशों से सटी सीमा वाला असम भारत के लिए एक भयंकर जंजाल बन सकता है, यदि यहां की राजनीति पर नजर न रखी गई। जाति और कबीलों की राजनीति वैसे भी बहुत पेचीदा होती है। उसे धर्म का पुट मिल जाए तो पूरे भारत के लिए खतरा हो सकता है। प्रधानमंत्री जिस राज्य से चुने गए हैं, उसमें इस तरह की घटना वाकई शर्मनाक है।
courtesy: www.bshindi.com
Friday, October 10, 2008
एक खांटी अमेरिकी सीईओ की चिट्ठी
मेरे प्यारे पाठकों, अमेरिकी कॉर्पोरेट दुनिया के एक पोस्टर ब्वॉय के तौर पर मुझे हफ्ते के सातों दिन और दिन के चौबीसों घंटे खबरों में रहना काफी पसंद है।
लेकिन अगर आपको भी मेरी आंखों के नीचे काले धब्बे दिखाई देते हों, तो यह मेरी गलती नहीं है। दरअसल यह गलती है उन अखबारों की, जिनमें बड़ी-बड़ी कंपनियों के ऊंचे-ऊंचे ओहदेदारों की तस्वीर उनके मोटे-मोटे वेतन के साथ छपी होती है। हालांकि, मैंने अब इन बातों की तरफ ध्यान छोड़ दिया है।
मुझे पूरा भरोसा है कि कुछ अखबारों में हाल ही में छपा वह सर्वे पूरी तरह से झूठा और निराधार था। भाई साहब, वही सर्वेक्षण जिसमें 80 फीसदी अमेरिकियों ने यह कहा था कि कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों को जरूरत से ज्यादा मोटा वेतन मिलता है। आखिरकार मैंने अपने वेतन को सबसे छुपाकर रखने की इतनी जबरदस्त कोशिश जो की है। लेकिन कुछ लोगों में दबी-छुपी बातों को खोद निकालने का कीड़ा होता है। इसलिए तो मुझे इस बात पर कोई हैरत नहीं हुई, जब उन लोगों ने जैक वेल्स के जीई से जुदा होने से जुड़े कई बड़े राजों को दुनिया के सामने खोल कर रख दिया था। वह भी ऐसे राज जिनके बारे में खुद कंपनी ने शुरुआत में कुछ कहने से इनकार कर दिया था।
अब तो आपको भी मालूम हो चला होगा कि अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत में मगरमच्छ समझी जाने वाली उस कंपनी ने अपने पूर्व सीईओ को रुखसत करने के लिए उन्हें एक मोटा-ताजा रिटायरमेंट पैकेज दिया था। उस विदाई के तोहफे में कंपनी ने उन्हें न्यूयॉर्क के पॉश मैनहट्टन इलाके में एक फ्लैट, कई महंगे क्लबों की मेंबरशिप और यहां तक कि कॉर्पोरेट जेट में मुफ्त में सैर-सपाटा करने की इजाजत भी दी थी। हालांकि, सभी ऐसे नहीं होते। कुछ तो खुले तौर पर यह मान लेते हैं कि वे कंपनियों की सुविधाओं का जमकर इस्तेमाल करते हैं।
जॉन केनेथ गैल्ब्रेथ ने बिल्कुल सही कहा था कि एक बड़ी कंपनी के सीईओ का वेतन अक्सर उसका खुद को दिया गया सबसे बेहतरीन तोहफा होता है। इस बात की सबसे अच्छी मिसाल हैं लीमन ब्रदर्स के मुखिया रिचर्ड फ्लूड। उन्होंने खुद की खुशी को कभी भी नजरअंदाज नहीं किया। उन्होंने अपनी कंपनी को आसमान की ऊंचाई से पाताल की गहराई तक पहुंचाने के लिए कंपनी से अपने काम के हर घंटे के लिए 17 हजार डॉलर लिए थे। साथ ही, उन्होंने अपने मातहतों का भी पूरा ध्यान रखा और उनके बीच जमकर महंगे शेयर बांटे। लेकिन सारा दोष अकेले उनके और उनकी टीम के सिर ही क्यों मढ़ा जाए? आपने टायको के पूर्व सीईओ की वह मशहूर कहानी तो सुनी ही होगी कि उन्होंने पूरे छह हजार डॉलर में अपने बाथरूम के पर्दे खरीदे और बिल कंपनी के नाम भिजवा दिया। अभी हाल ही में बैंक ऑफ अमेरिका ने मेरिल लिंच का अधिग्रहण कर लिया।लेकिन इसके करीब एक साल पहले इस कंपनी ने अपने तत्कालीन सीईओ स्टैनली ओ'नील को रुखसत करने के लिए जो पैकेज दिया था, उसकी कीमत आज 6।6 करोड़ डॉलर है। इसके अलावा भी कई मिसालें हैं।
मुझे तो सबसे ज्यादा जलन अभी हाल ही में ह्यूलिट पैकर्ड से निकाली गईं उनकी सीईओ कार्ली फियोरिना से होती है। इसलिए नहीं कि उन्हें कंपनी छोड़ने के लिए 4.2 करोड़ डॉलर मिले, बल्कि इसलिए क्योंकि उनका जिक्र आज कल अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव अभियानों में खूब हो रहा है। हालांकि, इस चर्चा की वजह बहुत अच्छी नहीं है। राष्ट्रपति के पद के लिए डेमोक्रेट उम्मीदवार बराक ओबामा ने अभी हाल ही में अपने एक नए विज्ञापन में अपने रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी जॉन मैकेन और कंपनियों के बड़े अफसरों के लिए सोने के पैरासूटों को जोड़ा है। इस 30 सेकंड के विज्ञापन में फियोरिना पर खासा जोर दिया गया है। उन्हें इसमें हद से ज्यादा मोटा वेतन लेने के प्रतीक के रूप में दिखलाया है।
अगर ओबामा राष्ट्रपति बन गए तो उनका यह गुस्सा हम लोगों को काफी भारी पड़ सकता है। वह दुनिया को यह बताने में जुटे हुए हैं कि सभी अमेरिकी कंपनियों के सीईओ आज की तारीख में 1.05 करोड़ डॉलर का वेतन पा रहे हैं।साथ ही, वे यह भी बता रहे हैं कि हम एक औसत अमेरिकी कर्मचारी की तुलना में 344 गुना ज्यादा कमा रहे हैं। यह देखकर बहुत दुख होता है। इस तरह के खुलासे हमारी जिंदगियों को और मुश्किल ही बना देंगे। वैसे, हकीकत में इसकी उम्मीद कम ही है। सुना था कि बुश बेल-ऑउट प्लान में एक नया नियम जोड़ने के बारे में सोच रहे हैं। इस नए नियम के मुताबिक सरकारी मदद से बचाई गईं कंपनियों के लिए अपने बड़े अधिकारियों को विदाई का तोहफा देना नामुमकिन हो जाएगा।
चर्चा तो हमारे वेतन पर भी लगाम कसने की है। लेकिन इससे नाउम्मीद नहीं हूं। आखिरकार, सरकार का अपनी बातों पर खरा उतरने के मामले में ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है। मिसाल के लिए 1990 के दशक के शुरुआती सालों में कांग्रेस 10 लाख डॉलर से ज्यादा कमाने वाले कार्यकारी अधिकारियों के लिए टैक्स का फंदा और कड़ा कर दिया था। नतीजे उम्मीद के मुताबिक ही थे। हमने प्रोत्साहन और कामकाज पर आधारित वेतन लेना शुरू कर दिया, जो टैक्स के फंदे से बाहर था। इसी वजह से तो मेरे असल वेतन में पिछले कुछ सालों में थोड़ा-बहुत ही इजाफा हुआ है। लेकिन मेरी दूसरे तरीकों से होने वाली कमाई में जबरदस्त इजाफा हुआ है। इसलिए मुझे पूरा भरोसा है कि इस संकट से भी मैं निकल जाऊंगा। अगर कोई दूसरी तरकीब काम न आई तो वह अपना पूरा फॉर्मूला तो काम आएगा ही।
आखिरकार, किस कर्मचारी को कितना वेतन मिलना चाहिए, यह फैसला कांग्रेस को नहीं, बल्कि कंपनी के निदेशक मंडल को करना चाहिए। साथ ही, बड़े अफसरों के वेतन पर लगाम कसना मुसीबतों को बुलावा दे सकता है। हमें खुद इतना यकीन इसलिए है कि खुद अमेरिकी वित्त मंत्री हेनरी पॉलसन अभी हाल तक गोल्डमैन सैक्स के सीईओ रहे थे।साथ ही, उन्हें भी कंपनी से स्टॉक ऑप्शंस मिले हैं, जिनकी कुल कीमत आज की तारीख में 50 करोड़ डॉलर है। वह अपने भाइयों को इतनी जल्दी नहीं भूल सकते। वैसे मैं एआईजी के पूर्व सीईओ रॉबर्ट विलियम्सटैड की पेश की गई मिसाल से जरूर परेशान हूं। उन्होंने पिछले हफ्ते अपने रास्ते जुदा करने के लिए कंपनी द्वारा पेशकश की गई 2.2 करोड़ डॉलर की रकम पर यह कहते हुए लात मार दी कि उन्हें कंपनी को खुद अपने पैरों पर खड़ा करने का मौका नहीं दिया गया। उन जैसे लोगों को खत्म होने दीजिए। मेरा तो बड़ी शिद्दत से यह मानना है कि लोगों की याददाश्त बड़ी छोटी होती है।
आपका अजीज
सीईओ,ए 2जेड इंक
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Tuesday, September 30, 2008
कोसी की धारा में बह गए कारोबारियों के अरमान
नेपाल के कुसहा में तटबंध टूटने से दर्जन भर से अधिक बाजार जलमग्न हो गए हैं।
स्थानीय लोगों में स्वर्गनगरी के नाम से विख्यात सुपौल जिले का बीरपुर बाजार ध्वस्त हो गया है, जो नई बनी धारा के बीच में है। इस बाजार में भारत, नेपाल, चीन की बहुत सारी सामग्री उपलब्ध रहती है, महंगी शराब से लेकर सूई तक। यह बिहार और नेपाल के कुछ इलाकों के लिए पर्यटन स्थल के रूप में विख्यात था, जहां लोग छुट्टियां मनाने जाते थे।
बीरपुर बाजार के पहले भीमनगर का अस्तित्व खत्म हुआ। नदी की तेज धार ने आगे बढ़ते हुए बलुआ बाजार, छातापुर, फारबिसगंज, रानीगंज, नरपतगंज को डुबोते हुए मधेपुरा के रामनगर, कुमारखंड और मुरलीगंज के बाद पूर्णिया को प्रभावित किया है। इसके अलावा, जीतपुर, आलमनगर, पुरैनी, चौसा सहित तमाम बाजार प्रभावित हुए हैं। बीरपुर बाजार भारत-नेपाल के प्रमुख बाजार के रूप में जाना जाता है। यहां अनुमान के मुताबिक, प्रतिदिन 50 लाख रुपये का कारोबार होता था। यहां पर हीरो होंडा का शोरूम, थोक व फुटकर दुकानें, अदालत, सरकारी कार्यालय सभी डूब गए हैं। कुछ इमारतें बंद हो गई हैं, बाकी बची इमारतें भी टूट रही हैं।
इसके अलावा, मुरलीगंज और बिहारीगंज इस इलाके का सबसे बडा थोक बाजार था, जहां प्रतिदिन 2 करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार होता था। सुपौल के थोक व्यवसायी तपेश्वर मिश्र ने बताया, मुरलीगंज और बिहारीगंज, सहरसा जिले से भी बड़े थोक बाजार थे, जहां सामान कोलकाता से लाया जाता था और मधेपुरा, पूर्णिया के तमाम इलाके और सुपौल में सामान की आपूर्ति की जाती थी। इन इलाकों की नदियों पर अध्ययन कर चुके रणजीव ने कहा, नदी ने रुख बदल लिया है और ये सभी बाजार भरी हुई नदी धमदाहा कोसी मार्ग पर है, जिस मार्ग को तटबंध टूटने के बाद नदी ने पकड़ा है। इन सभी बाजारों में पानी की धार तेज है और सारा कारोबार चौपट हो गया है।
सुपौल व्यापार संघ के सचिव गोविन्द प्रसाद अग्रवाल का कहना है कि जो बाजार बचे हैं, वे टापू बन गए हैं। पूरा का पूरा कारोबार चौपट हो गया है। इस समय सभी व्यापारी इस कोशिश में लगे हैं कि जो पानी से निकलकर बाहर आ रहे हैं, उन्हें बचाया जाए।
पल भर में बने करोडपति से मोहताज
मधेपुरा जिले में मुरलीगंज बाजार के जोरगामा में अरविन्द चौधरी तेल मसाला व जिंस का कारोबार करते थे। उनका एक करोड़ से अधिक को थोक व्यापार था। 21 अगस्त को उनके घर में पानी घुसा, तो वे छत पर आ गए। 7 दिनों तक छत पर रहने के बाद सेना की नाव उन तक पहुंची और किसी तरह परिवार के साथ जान बचाकर भागे।जब वे अपने बहनोई के घर सहरसा पहुंचे तो उनके तन पर केवल लुंगी और बनियान थी। कुछ भी पूछने पर शून्य में खो जाते हैं और बार-बार सेना और भगवान को धन्यवाद देते हैं कि जान बच गई। कारोबार के बारे में पूछने पर कहते हैं कि जान बच गई है, तो जीने का कोई सहारा तो ढूंढ़ ही लेंगे।
Monday, September 29, 2008
बेलगाम कोसी से जूझ रहे लोग
कुसहा में तटबंध टूटने के साथ कोसी नदी ने रास्ता बदल लिया है। टूटे तटबंध से प्रतिदिन एक से दो लाख क्यूसेक तक पानी निकल रहा है।
वहीं भीमनगर बैराज से, जो पहले नदी का मुख्य रास्ता था, महज 15 से 20 प्रतिशत पानी बह रहा है। तटबंध पर अधिशासी अभियंता के। एन. सिंह के नेतृत्व में इंजीनियरों का एक दल टूटे तटबंध को और ज्यादा चौड़ा होने से रोकने में लगा है।साथ ही मजदूर बालू की बोरियों से कटाव रोकने की कोशिश कर रहे हैं। तटबंध पर बोल्डर लाया जा रहा है, जो ट्रकों से भरकर नेहरू पार्क से आ रहा है। इसके साथ ही एचसीएल (हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन लिमिटेड) का एक प्रबंधक इस कार्य को देख रहा है। धारा प्रवाह पानी बह रहा है और वह बाढ़ से डूबे इलाके में जा रहा है।
राज्य सरकार ने कोसी नदी से जुड़े रहे वरिष्ठ इंजीनियर नीलेंदु सान्याल की अध्यक्षता में उच्च सदस्यीय समिति का गठन किया है, जिसके सदस्य के.एन. लाल और वृजनंदन प्रसाद हैं। समिति का पहला उद्देश्य कटे हुए तटबंध को अधिक चौड़ा होने से रोकना और पानी की धारा को मूल दिशा की और ले जाना है। बाढ़ की हालत अगर बात करें बाढ़ पीड़ित इलाकों में पानी घटने की, तो जब टूटे तटबंध से कम पानी आता है या कोई सड़क तोड़कर पानी दूसरे इलाकों को डुबाता है, तो डूबे हुए इलाके में पानी घटता है। नई बनी नदी के पेट में तो अभी तूफानी गति से पानी बह रहा है। हालांकि यह पानी कुरसेला नामक स्थान से गंगा नदी में मिलने लगा है, जहां पहले भी कोसी का पानी गंगा से मिलता था।
'जब नदी बंधी' पुस्तक के लेखक और 'बाढ़ सुखाड़ मुक्ति अभियान' के सदस्य रणजीव का कहते हैं कि जब तक राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 31 को काटकर और उस पर पुल बनाकर रास्ता नहीं दिया जाएगा, सुपौल, मधेपुरा, सहरसा,पूर्णिया के तमाम जिले लंबे समय तक डूबे रहेंगे। आने वाले हथिया और कान्हा नक्षत्र में (सितंबर-अक्टूबर में) जमकर बारिश होगी। उस समय यह पानी 2 लाख क्यूसेक के आंकड़े को भी पार करता है।
अभिशाप की वजह
फरक्का बैराज पर जमी गाद की वजह से भारी तबाही होती है, क्योंकि कोसी का पानी गंगा से जल्दी नहीं मिल पाता है। इस बार का संकट तो और गहरा है, क्योंकि नदी की नई धार को अपने मुताबिक निकलने का रास्ता बनाना है।
भ्रष्ट लोगों की चारागाह
महिषी विधानसभा क्षेत्र के स्थानीय नेता कपिलेश्वर सिंह कहते हैं कि कोसी का बांध भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों का अड्डा है, जहां करोडों का वारा-न्यारा होता है। यही कारण है कि नदी में बालू जमा हो रही है और तटबंध कमजोर हो चुके हैं।उन्होंने मांग की कि नई धारा पर भी बैराज बनाया जाना चाहिए और साथ ही भीमनगर के पुराने बैराज की मरम्मत और नदी की गाद की तत्काल सफाई की जानी चाहिए। इसी में इस इलाके के लोगों का हित है।
Sunday, September 28, 2008
जहां गम भी न हों, आंसू...
सत्येंद्र प्रताप सिंह / सहरसा September 03, २००८
सहरसा से अमृतसर जाने वाली रेलगाड़ी जैसे ही प्लेटफॉर्म पर पहुंचती है, स्टेशन पर भयंकर चीख-पुकार मच जाती है। ठसा-ठस भरे प्लेटफॉर्म पर लोग परिजनों को चीख-चीख कर बुला रहे हैं, ताकि जल्द से जल्द गाड़ी में बैठकर इस इलाके से निकल सकें।
प्रधानमंत्री ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना सहित राज्य की विभिन्न योजनाओं के तहत काम मिलने लगा, तो मजदूर दूसरे राज्यों से घर वापस लौटने लगे थे, लेकिन बाढ़ ने जब सबको बेघर कर दिया, तो लाखों की संख्या में नए दिहाड़ी मजदूर भी पैदा हो गए, जो किसी तरह बाढ़ वाले इलाकों से निकल भाग जाना चाहते हैं। सहरसा से पटना-दिल्ली जाने वाली हर ट्रेन का यही हाल है।
मुरादपुर ब्लॉक के बिहारीगंज में रहने वाले 70 वर्षीय धनश्याम झा पूरे कुनबे के साथ अपने रिश्तेदार के घर पटना जा रहे हैं। गांव में आई बाढ़ से जूझते हुए, जब जान पर बन आई, तो एक निजी नाविक को 3,000 रुपये देकर किसी तरह बाहर निकले। अब उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि जाएं, तो कहां जाएं!वहीं मजदूर वर्ग के लोग सीधा महानगरों का रुख कर रहे हैं। सुपौल जिले के सियानी गांव के रवि यादव पंजाब जा रहे हैं, उनका परिचित वहां नौकरी करता है। वह इस आस में जा रहे हैं कि उन्हें पंजाब में कोई काम मिल जाएगा, जिससे दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो जाएगा। उसके बाद वह पूरे परिवार को वहां लाने की सोचेंगे। फिलहाल, मां, बाप, बहन को बांध पर छोड़ आए हैं।
बहुत से ऐसे मजदूर भी हैं, जो बाहर जाकर काम करते हैं और अब पूरे परिवार को लेकर पलायन कर रहे हैं। सहरसा के जमरा गांव के दिनेश सिंह दिल्ली के बदरपुर इलाके में रहकर वाहन चालक का काम करते हैं। अब वे पूरे कुनबे को लेकर दिल्ली जा रहे हैं। उन्होंने कहा, 'जान बच गई तो कुछ न कुछ काम तो मिल ही जाएगा।' सच तो यह है कि बिहार का कोसी इलाका कृषि के लिए उपयुक्त माना जाता है, बावजूद इसके उचित जल-प्रबंधन के अभाव में हर साल नए मजदूर पैदा हो रहे हैं। महानगरों में पुल-इमारत आदि बनाने के लिए अनुमानत: इस साल करीब 5 लाख मजदूर तैयार हो चुके हैं। जिनके दम पर रियल एस्टेट, आधारभूत क्षेत्र और छोटे-बड़े उद्योग चलते हैं, फिर भी मजदूरों की हालत दयनीय है।
बाढ़ ने तो इस इलाके के लोगों की उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी फेर दिया है, वे पूरी तरह से लाचार नजर आ रहे हैं। गुजरात समेत अन्य राज्यों के प्राकृतिक आपदा की तरह यहां न तो कोई बचाव कार्य होता है और न ही पुनर्वास का काम। पेशे से शिक्षक डॉ. मनोरंजन झा कहते हैं कि क्या जरूरत पड़ी है यहां उद्योग जगत के लोगों को आकर किसी गांव को गोद लें-फिर से बसाएं। उन्हें तो विस्थापन बाद मुफ्त के मजदूर मिलेंगे।
पशु नहीं, रोजी डूबी
'गाय-भैंस और बकरी पालि के अप्पन बेटा के पढ़ै ले भेजलिये रहे, जे डीएम-कमिश्नर नै बनतै त किरानियो बैनिये जैते। मुदा इ बाढ़ि त सब किछु खतमे क देलकै। आब की हैते।'
मधेपुरा से बाढ़ की वजह से घर छोड़कर भाग रहे अभय कुमार ने अपना दुख बताते हुए कहा कि सब कुछ डूब गया, जो पिछले 50 सालों में कमाया था। अब वे अपने परिवार के साथ पटना जा रहे हैं, जहां उनका बेटा पढ़ाई करता है।कोसी प्रमंडल के बाढ़ से डूबे इलाके में रोजगार का मुख्य साधन कृषि और पशुपालन है।
सहरसा से सड़क के रास्ते मधेपुरा जाने पर सैकड़ों महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और युवक झुंड बनाकर भाग रहे हैं। सवेला चौक से पानी शुरू होता है, जबकि अररहा-महुआ, चकला गांव पानी से घिरे हैं। मुख्य मार्ग को छोड़कर हर तरफ पानी ही पानी है।शुक्र है कि इन गांवों में पानी नहीं घुसा है। इसके थोडा आगे जाने पर तुनियाही गांव है, जहां रेल मंत्री लालू प्रसाद ने विद्युत रेल इंजन कारखाना खोलने का प्रस्ताव दिया था। आसपास के इलाकों की जमीन अधिग्रहण के लिए विज्ञापन भी आया था। अब यह सब जलमग्न है। आगे बढ़ने पर मठाही बाजार है, जहां सड़क के दोनों हिस्से में पानी है। बीच में जलमग्न छोटे-छोटे टोले हैं। इसके बाद साहूगढ़ गांव आता है, जो लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के समर्थकों का गांव माना जाता है। साहूगढ़ से आगे पुल बना है, जिसके बाद का इलाका जलमग्न है और सड़क मार्ग पूरी तरह से बंद है।
लालू प्रसाद और शरद यादव का राजनीतिक अखाडा मधेपुरा शहर पहुंचने का अब नाव ही एकमात्र जरिया है।मधेपुरा के वार्ड संख्या 11 के अब्दुल करीम अपनी बकरी और पत्नी को लेकर बाहर निकले हैं, बच्चों को पहले ही रिश्तेदार के यहां भेज दिया गया है। यह पूछे जाने पर कि बकरी क्यों लाए हैं, वे कहते हैं कि यही तो है, जो जिंदगी चलाती है। बाकी बत्तख और मुर्गी-मुर्गा तो घर में ही छोड़कर आए हैं।किसानों की फसल तो खत्म हो ही गई, घर में रखा अनाज, कपड़े और सामान भी डूब गए। पानी की मुख्यधारा में पड़ने वाले गांवों के सभी जानवर पानी में बह गए। लोगों ने खूंटा खोल दिया और अपनी जिंदगी के आधार को पानी में बहते हुए देखते रह गए।
नए इलाकों में पानी :
रोज बढ़ रहे जलस्तर से सहरसा के कई गांवों में पानी फैल गया है। बायसी अनुमंडल के नए इलाके पानी की चपेट में आ गए हैं। इसके साथ ही अररिया के फारबिसगंज कस्बे में भी पानी घुस गया है। त्रिवेणीगंज के समीप 20 फीट सड़क टूट गई है, जिससे राहत और बचाव कार्य में खासी दिक्कत आ रही है। अररिया के किनारे बहने वाली परमान नदी में जलस्तर बढ़ने से शहर में पानी घुसने की संभावना है। पूर्णिया-बनमनखी रेल खंड पर सरसी के समीप पटरी के नीचे से पानी बहने लगा है।
प्रभावित पशुओं के आंकड़े :
राज्य सरकार द्वारा जारी आंकड़े के मुताबिक, मधेपुरा में 3 लाख, अररिया में 10,250, सुपौल में 1355, सहरसा में 529 पशु प्रभावित हुए हैं। कुल प्रभावित पशुओं की संख्या 3,14,134 बताई गई है। भागकर आ रहे लोगों के साथ जो पशु आए हैं, उनके लिए सहरसा के पटेल मैदान में प्रबंध किया गया है, जहां करीब 300 पशु हैं।
दक्षिणपंथ छोड़ वामपंथी बनी कोसी
सन '1731 में फारबिसगंज और पूर्णिया के पास बहने वाली कोसी धीरे-धीरे पश्चिम की ओर खिसकते हुए 1892 में मुरलीगंज के पास, 1922 में मधेपुरा के पास, 1936 में सहरसा के पास और 1952 में मधुबनी और दरभंगा जिला की सीमा पर पहुंच गई। इस तरह लगभग सवा दो सौ साल में कोसी 110 किलोमीटर पश्चिम की ओर खिसक गई।
पिछले कुछ वर्षो से तटबंधों में कैद कोसी अब पुन: पूरब की ओर लौटने को व्यग्र दिखती है। 1984 में पूर्वी कोसी तटबंध का टूटना उसकी इस व्यग्रता का ही परिणाम था।' रणजीव और हेमंत द्वारा लिखित पुस्तक 'जब नदी बंधी' के इस अंश से संकेत मिलता है कि हिमालय से निकलकर भारत आने वाली कोसी नदी, जो उत्तर दिशा से आकर दक्षिण दिशा में गंगा से मिलती है, अब दक्षिणपंथी से वामपंथी होने को व्यग्र है। अब इसे राज्य सरकार की लापरवाही कहें, केन्द्र की लापरवाही कहें या नेपाल सरकार के मत्थे इसका दोष मढ़ दें, नेपाल में वामपंथियों की सरकार आते ही नेपाल से निकलने वाली कोसी वामपंथी हो गई है। दरअसल कोसी अपनी धारा परिवर्तन की प्रवृत्ति के कारण ही 'बिहार का शोक' कही जाती है।हालांकि यह अवगुण उत्तर बिहार की हर नदियों में है किन्तु कोसी इसलिए बदनाम है कि वह अन्य नदियों की तुलना में विस्तृत भूभाग में तेजी से धारा परिवर्तन करती है। 1892 में मुरलीगंज के पास से बहने वाली कोसी 2008 में बांध टूटने के बाद फिर मुरलीगंज से होकर बहने लगी है। इस कारण मधेपुरा जिले के मुरलीगंज क्षेत्र में सबसे ज्यादा तबाही है। सहरसा जिले में स्थापित किसी भी बांध में आज आपको मुरलीगंज इलाके के सबसे ज्यादा बाढ़ पीड़ित मिलेंगे।
कुछ कही, कुछ सुनी
चर्चा का बाजार गर्म है कि जब भी बिहार सरकार में कोशी क्षेत्र का विधायक जल संसाधन मंत्री बनता है तो इलाके में भारी तबाही आती है। 1984 में हेमपुर गांव के पास पूर्वी तटबंध टूटा था।यह गांव सहरसा जिले के नवहट्टा ब्लाक में आता है। उस समय कांग्रेस पाटी की सरकार थी और सिंचाई मंत्री थे सहरसा के महिसी विधानसभा क्षेत्र के विधायक लहटन चौधरी। 24 साल बाद 2008 में बांध टूटा है। इस समय जल संसाधन मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव हैं। ये भी कोसी क्षेत्र के सुपौल विधानसभा क्षेत्र के विधायक हैं।
Friday, September 26, 2008
पीने को बाढ़ का पानी...खाने को कच्चा चावल
सत्येन्द्र प्रताप सिंह / सहरसा September 01, 2008
कोसी का कहर झेल रहे लोग जिंदगी भर की कमाई गंवाकर बाढ़ग्रस्त इलाकों से सिर्फ आंसू लेकर निकल रहे हैं।
सहरसा के सरकारी और गैर-सरकारी कैंपों में 50 हजार से अधिक बाढ़ पीड़ित पहुंच चुके हैं, जबकि बाढ़ प्रभावित इलाकों से लोगों के यहां आने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। सहरसा के अलावा, शोरगंज कैंप में 10 हजार, सुपौल के कैंपों और बांधों पर 1 लाख से ज्यादा लोग जान बचाने के लिए जमा हैं।
इस बाढ़ ने कई लोगों के परिवार को बिखेर दिया है। मुरलीगंज, मधेपुरा के विपिन कुमार लाइटिंग का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि वे किसी तरह कैंप तक पहुंच पाए हैं, लेकिन परिवाार के बाकी सदस्यों का कोई अता-पता नहीं है। बाढ़ प्रभावित इलाकों से बचकर निकल आने वाले कई लोगों ने 4-5 दिनों से कुछ भी खाया-पीया नहीं है। छोटे-छोटे बच्चों के लिए दूध तो जैसे सपना बन गया है। शंकरपुर के जंझड़ से आए रामकिशुन अपने पूरे परिवार के साथ यहां के एक कैंप में पड़े हैं। उन्होंने जो बताया उससे बाढ़ की विभीषिका का अंदाजा लगाया जा सकता है। रामकिशुन बताते हैं कि वे छत्त पर बैठे बाढ़ का पानी पीते रहे और कच्चा चावल खाकर 5 दिन तक गुजारा किया। बच्चे को पिलाने के लिए बोतल में दूध की जगह सत्तू डाला जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस त्रासदी में मधेपुरा के 378 गांवों के 2 लाख 4 हजार परिवार, अररिया के 12 गांवों के 15 हजार, सुपौल के 243 गांवों के 1 लाख 79 हजार और सहरसा के 62 गांवों के 29 हजार परिवार प्रभावित हुए हैं। इन चार जिलों में करीब 700 गांवों के 4 लाख 27 हजार से ज्यादा परिवार बाढ़ की चपेट में हैं।
रक्षक भी बन रहे पीड़ित
मधेपुरा के पास रहने वाले श्रीनाथ यादव के यहां पिछले 10 दिन से 17 गांवों के तकरीबन 90 रिश्तेदार शरण लिए हुए हैं। किसी तरह इन मेहमानों को वे रख रहे थे और भोजन करा रहे थे, लेकिन शनिवार को अचानक जलस्तर बढ़ जाने से उनके घर में 2 फीट पानी जमा हो गया है। सवाल है कि इतने लोगों को कहां और कैसे ले जाया जाए।यही हाल मधेपुरा के ही कृतनारायण का है। वे अपने यहां रिश्तेदारों को शरण दिए हुए थे, पर रविवार को उनके घर में भी 5 फीट पानी जमा हो गया। अब वे सहरसा पहुंच चुके हैं। उन्होंने बताया कि वे पत्नी और दो रिश्तेदारों के साथ पटना में पढ़ाई कर रहे अपने बेटे के यहां जा रहे हैं।
कोई लालू से यह तो पूछे
रविवार को दिन के करीब 1 बजे रेलमंत्री लालू प्रसाद विशेष रेलगाड़ी से सहरसा पहुंचे। मंच पर चढ़ते ही लालू ने माइक संभाल लिया। लोगों से उन्होंने वही पुरानी बात दोहरायी कि 1 लाख बोतल पानी भेज दिया है। हर स्टेशन पर चना, चूड़ा और भूंजा बांटा जा रहा है। जैसे ही उन्होंने कहा कि कोसी की धार को पुराने रास्ते पर लाया जाएगा कि पूरा स्टेशन परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। अपनी अनोखी भाषा के लिए मशहूर लालू ने कहा कि लोगों को बचाने के लिए दो 'गजराज' (हेलीकॉप्टर) चल चुके हैं। अब उनसे कौन पूछे कि 1 लाख बोतल पानी और दो गजराज से बाढ़ में फंसे 15 लाख लोगों को कैसे बचाया जा सकेगा!
Sunday, September 21, 2008
कुछ ऐसे दृष्य, जिन्हें आप पसंद नहीं करेंगे
गुजरात के वड़ोदरा में हिंदू-मुस्लिम के बीच सांप्रदायिक लड़ाई में शहीद हो गया मंदिर। यह १५ सितंबर २००८ का दृष्य है।
Tuesday, September 9, 2008
अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल -3
हीरों की तरह सनम2 तराशे
आज अपने सनमकदे3 में तन्हा
मजबूर, निठाल, ज़ख़्मखुर्दा4
दिन रात पड़ा कराहता है।
1. पत्थर तराशने वाला,
2. मूर्ति
3. मूर्ति घर, मंदिर,
4. घाव से परेशान
कज1 अदाओं की इनायत2 है कि हमसे इश्शाक़3
कभी दीदार के पीछे कभी दीदार के बीच
तुम होना खुश तो यहाँ कौन है खुश भी फराज़
लोग रहते हैं इसी शहरे-दिल-आजार4 के बीच
मुहब्बतों का भी मौसम है जब गुज़र जाए
सब अपने-अपने घरों को तलाश करते हैं।
सुना है कि कल जिन्हें दस्तारे-इफ़्तिख़ार5 मिली
वह आज अपने सरों को तलाश करते हैं।
रात क्या सोए कि बाकी उम्र की नींद गई
ख़्वाब क्या देखा कि धड़का लग गया ताबीर6 का
अब तो हमें भी तर्के-मिरासिम7 का दुख नहीं
पर दिल यह चाहता है कि आगाज़8 तू करे
अब तो हम घर से निकलते हैं तो रख देते हैं
ताक पर इज़्ज़ते-सादात9 भी दस्तार10 के साथ
हमको इस शहर में तामीर11 का सौदा है जहाँ
लोग मेमार12 को चुन देते हैं दीवार के साथ
1. कुटिल, वक्र, 2. कृपा, 3. प्रेमी, 4. जख्मी दिल शहर 5. पगड़ी का सम्मान, 6. साकार, 7. संबंध-विच्छेद, 8. प्रारंभ, 9. सैयदों की इज़्ज़त, 10. पगड़ी, 11. निर्माण। 12. निर्माता
इतने सुकून के दिन कभी देखे न थे ‘फ़राज़’
आसूदगी1 ने मुझको परेशान कर दिया
रुके तो गर्दिशें उसका तवाफ़2 करती हैं
चले तो उसको ज़माने ठहर के देखते हैं।
राहे-वफ़ा3 में हरीफ़े-ख़राम4 कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकलके देखते हैं।
1. संपन्नता, 2. परिक्रमा, 3. प्रेम का पथ, 4. प्रतिद्वंदी साथी
मुझे तेरे दर्द के अलावा
भी और दुख थे यह मानता हूँ
हज़ार गम थे जो ज़िंदगी की
तलाश में थे यह जानता हूँ
मुझे ख़बर थी कि तेरे आँचल
में दर्द की रेत छानता हूँ
मगर हर एक बार तुझको छूकर
यह रेत रंगे-हिना1 बनी है
यह जख़्म गुलज़ार बन गए हैं
यह आहे-सोज़ाँ घटा बनी है
यह दर्द मौजे-सबा2 बनी है
आग दिल की सदी बनी है
और अब यह सारी मताए-हस्ती3
यह फूल यह जख़्म सब तेरे हैं
यह दुख के नोहे4 यह सुख के नग़में
जो कल मेरे थे वो अब तेरे हैं
जो तेरी कुरबत5 तेरी जुदाई
में कट गए रोज़ो-शब6 तेरे हैं
(ये मेरी ग़ज़लें, ये मेरी नज़्में)
यह कौन मासूम हैं
कि जिनको
स्याह7 आँधी
दीये समझकर बुझा रही है
उन्हें कोई जानना नहीं है
उन्हें कोई जानना न चाहे
यह किस क़ाबिल के सरबकफ़-जॉनिसार8 हैं
जिनको कोई पहचानना न चाहे
कि उनकी पहचान इम्तहान है
न कोई बच्चा, न कोई बाबा, न कोई माँ है
महल सराओं में खुश-मुकद्दर9
श्य्यूख़10 चुप
बादशाह चुप हैं
हरम के पासबान11
आलम पनाह चुप है।
तमाम अहले-रिया12 कि जिनके लबों पे है
‘लाइलिहा’ चुप हैं
(-बेरुत-1)
1. मेहंदी का रंग, 2. सुबह की हवा, 3. वजूद की पूँजी, 4. शोकगीत, 5. प्रेम, 6. दिन-रात, 7. काली, 8. सर पर कफन बांध, जान देने वाले, 9 अच्छा भाग्यशाली, 11 पहरेदार, 12, तमाम जनता
कौन इस कत्ल-गाहे-नाज1 के समझे इसरार
जिसने हर दशना2 को फूलों में छुपा रखा है
अमन की फ़ाख़्ता उड़ती है निशां पर लेकिन
नस्ले-इंसाँ को सलीबों3 पे चिढ़ा रखा है
इस तरफ नुफ्त4 की बाराने-करम5 और इधर
कासाए-सर6 से मीनारों को सजा रखा है।
(-सलामती कौउंसिल)
मुझे यकीन है
कि जब भी तारीख की अदालत में
वक़्त लाएगा
आज के बे-जमीर-ब-दीदा-दलेर कातिल7 को
जिसकी दामानों-आसतीं
ख़ून बेगुनाही से तरबतर हैं
तू नस्ले-आदम
वुफूर-नफरत8 से सुए-क़ातिल पे थूक देगी
मगर मुझे भी यक़ीन है
कि कल तारीख़
नस्ले-आदम से यह पूछेगी
ऐ-मुहज़्जब जहाँ9 की मख़लूक़10
कल तेरे रूबरू यही बेज़मीर क़ातिल
तेरे क़बीले के बेगुनाहों को
जो तहतेग़11 कर रहा था
तो तू तमाशाइयों की सूरत
ख़ामोश व बेहिस
दरिंदगी के मुज़ाहिरे12 में शरिक
क्यों देखती रही है
तेरी यह सब नफ़रतें कहाँ थीं
बता कि इस ज़ुल्म-कैश क़ातिल की तेग़बर्रा13 में
और तेरी मसलेहत के तीरों में
फ़र्क़ क्या है ?
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1. दबाव, चाकू, 3. फाँसी, 4. वाणी, 5. वर्षा की कृपा, 6. सिर के कटोरों, 7. हृदयविहीन, बेशर्म हत्यारा, 8. प्रभु घृणा, 9. सभ्यसंसार, 10. रचना, 11. हत्या, 12. प्रदर्शन, 13. तलवार की धार
अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल -2
देखा तो वो तस्वीर हर एक दिल से लगी थी
तनहाई में रोते हैं कि यूँ दिल को सुकूँ हो
ये चोट किसी साहिबे-महफ़िल से लगी थी
ऐ दिल तेरे आशोब1 ने फिर हश्र2 जगाया
बे-दर्द अभी आँख भी मुश्किल से लगी थी
ख़िलक़त3 का अजब हाल था उस कू-ए-सितम4 में
साये की तरह दामने-क़ातिल5 से लगी थी
उतरा भी तो कब दर्द का चढ़ता हुआ दरिया
जब कश्ती ए-जाँ6 मौत के साहिल7 से लगी थी
1. हलचल, उपद्रव, 2. प्रलय, मुसीबत, 3. जनता 4. अत्याचार की गली 5. हत्यारे के पल्लू 6. जीवन नौका 7. किनारा
2
तू पास भी हो तो दिले-बेक़रार अपना है
कि हमको तेरा नहीं इन्तज़ार अपना है
मिले कोई भी तेरा जिक्र छेड़ देते हैं
कि जैसे सारा जहाँ राज़दार अपना है
वो दूर हो तो बजा तर्के-दोस्ती1 का ख़याल
वो सामने हो तो कब इख़्तियार2 अपना है
ज़माने भर के दुखो को लगा लिया दिल से
इस आसरे पे कि एक ग़मगुसार3 अपना है
बला से जाँ का ज़ियाँ4 हो, इस एतमाद5 की ख़ैर
वफ़ा करे न करे फिर भी यार अपना है
फ़राज़ राहते-जाँ भी वही है क्या कीजे
वो जिसके हाथ से सीना फ़िगार6 अपना है
1. दोस्ती छोड़नी 2. वश 3. दुख सहने वाला 4. नुकसान 5. विश्वास, भरोसा, 6 घायल, आहत
3
अब वो झोंके कहाँ सबा1 जैसे
आग है शहर की हवा जैसे
शब सुलगती है दोपहर की तरह
चाँद, सूरज से जल बुझा जैसे
मुद्दतों बाद भी ये आलम है
आज ही तो जुदा हुआ जैसे
इस तरह मंज़िलों से हूँ महरूम2
मैं शरीके-सफ़र3 न था जैसे
अब भी वैसी है दूरी-ए-मंज़िल
साथ चलता हो रास्ता जैसे
इत्तफ़ाक़न भी ज़िन्दगी में फ़राज़
दोस्त मिलते नहीं ज़िया4 जैसे
1 पुरवाई, समीर, ठण्डी हवा 2. वंचित, 3. सफ़र में शामिल 4 ज़ियाउद्दीन ज़िया
4
फिर उसी रहगुज़ार पर शायद
हम कभी मिल सकें मगर, शायद
जिनके हम मुन्तज़र1 रहे उनको
मिल गये और हमसफर शायद
जान पहचान से भी क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त, ग़ौर कर शायद
अजनबीयत की धुन्ध छँट जाये
चमक उठे तेरी नज़र शायद
ज़िन्दगी भर लहू रुलायेगी
यादे-याराने-बेख़बर2 शायद
जो भी बिछड़े, वो कब मिले हैं फ़राज़
फिर भी तू इन्तज़ार कर शायद
1. प्रतीक्षारत 2. भूले-बिसरे दोस्तों की यादें
5
बेसरो-सामाँ1 थे लेकिन इतना अन्दाज़ा न था
इससे पहले शहर के लुटने का आवाज़ा2 न था
ज़र्फ़े-दिल3 देखा तो आँखें कर्ब4 से पथरा गयीं
ख़ून रोने की तमन्ना का ये ख़मियाज़ा5 न था
आ मेरे पहलू में आ ऐ रौनके- बज़्मे-ख़याल6
लज्ज़ते-रुख़्सारो-लब7 का अबतक अन्दाजा न था
हमने देखा है ख़िजाँ8 में भी तेरी आमद के बाद
कौन सा गुल था कि गुलशन में तरो-ताज़ा न था
हम क़सीदा ख़्वाँ9 नहीं उस हुस्न के लेकिन फ़राज़
इतना कहते हैं रहीने-सुर्मा-ओ-ग़ाज़ा10 न था
1 ज़िन्दगी के ज़रूरी सामान के बिना 2. धूम 3. दिल की सहनशीलता 4. दुख, बेचैनी, 5. परिणाम, करनी का फल 6. कल्पना की सभा की शोभा 7. गालों और होंटों का आनन्द 8. पतझड़ 9,. प्रशस्ति-गायक, प्रशंसक 10 सुर्मे और लाली पर निर्भर
अहमद फराज की गजल
कल की तारीख़ को मैं आज का आईना कहूँ
चश्मे-साफ़ी से छलकती है मये-जाँ तलबी
सब इसे ज़हर कहें मैं इसे नौशीना2 कहूँ
मैं कहूँ जुरअते-इज़हार हुसैनीय्यत है
मेरे यारों का ये कहना है कि ये भी न कहूँ
मैं तो जन्नत को भी जानाँ का शबिस्ताँ3 जानूँ
मैं तो दोज़ख़ को भी आतिशकद-ए-सीना4 कहूँ
ऐ ग़मे-इश्क़ सलामत तेरी साबितक़दमी
ऐ ग़मे-यार तुझे हमदमे-दैरीना5 कहूँ
इश्क़ की राह में जो कोहे-गराँ6 आता है
लोग दीवार कहें मैं तो उसे ज़ीना कहूँ
सब जिसे ताज़ा मुहब्बत का नशा कहते हैं
मैं ‘फ़राज़’ उस को ख़ुमारे-मये-दोशीना7 कहूँ
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1. गुज़रा हुआ, पुराना क़िस्सा 2. शर्बत 3. शयनागार 4. सीना या छाती की भट्ठी 5. पुराना मित्र 6. मुश्किल पहाड़ 7. ग़ुजरी रात की शराब का ख़ुमार
न कोई ख़्वाब न ताबीर ऐ मेरे मालिक
मुझे बता मेरी तक़सीर ऐ मेरे मालिक
न वक़्त है मेरे बस में न दिल पे क़ाबू है
है कौन किसका इनागीर1 ऐ मेरे मालिक
उदासियों का है मौसम तमाम बस्ती पर
बस एक मैं नहीं दिलगीर2 ऐ मेरे मालिक
सभी असीर हैं फिर भी अगरचे देखने हैं
है कोई तौक़3 न ज़ंजीर ऐ मेरे मालिक
सो बार बार उजड़ने से ये हुआ है कि अब
रही न हसरत-ए-तामीर ऐ मेरे मालिक
मुझे बता तो सही मेहरो-माह किसके हैं
ज़मीं तो है मेरी जागीर ऐ मेरे मालिक
‘फ़राज़’ तुझसे है ख़ुश और न तू ‘फ़राज़’ से है
सो बात हो गई गंभीर ऐ मेरे मालिक
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1. लगाम थामने वाला 2. ग़मगीन 3. गले में डाली जाने वाली कड़ी
तेरा क़ुर्ब था कि फ़िराक़ था वही तेरी जलवागरी रही
कि जो रौशनी तेरे जिस्म की थी मेरे बदन में भरी रही
तेरे शहर से मैं चला था जब जो कोई भी साथ न था मेरे
तो मैं किससे महवे-कलाम1 था ? तो ये किसकी हमसफ़री रही ?
मुझे अपने आप पे मान था कि न जब तलक तेरा ध्यान था
तू मिसाल थी मेरी आगही2 तू कमाले-बेख़बरी रही
मेरे आश्ना3 भी अजीब थे न रफ़ीक़4 थे न रक़ीब5 थे
मुझे जाँ से दर्द अज़ीज़ था उन्हें फ़िक्रे-चारागरी6 रही
मैं ये जानता था मेरा हुनर है शिकस्तो-रेख़्त7 से मोतबर8
जहाँ लोग संग-बदस्त9 थे वहीं मेरी शीशागरी रही
जहाँ नासेहों10 का हुजूम था वहीं आशिक़ों की भी धूम थी
जहाँ बख़्यागर11 थे गली-गली वहीं रस्मे-जामादरी12 रही
तेरे पास आके भी जाने क्यूँ मेरी तिश्नगी13 में हिरास1अ था
बमिसाले-चश्मे-ग़ज़ा14 जो लबे-आबजू15 भी डरी रही
जो हवस फ़रोश थे शहर के सभी माल बेच के जा चुके
मगर एक जिन्से-वफ़ा16 मेरी सरे-रह धरी की धरी रही
मेरे नाक़िदों17 ने फ़राज़’ जब मेरा हर्फ़-हर्फ़ परख लिया
तो कहा कि अहदे-रिया18 में भी जो खरी थी बात खरी रही
-------------------------------------------
1.बात करने में मग्न 2. जानकारी, चेतना 3. परिचित 4. मित्र 5. शत्रु 6. उपचार की धुन 7. टूट फूट 8. ऊपर, सम्मानित 9. हाथ में पत्थर लिए हुए 10. उपदेश देने वाले 11.कपड़ा सीने वाले 12. पागलपन की अवस्था में कपड़े फाड़ने की रीत
13.प्यास 1अ. आशंका निराशा 14.हिरन की आँख की तरह 15.दरिया के किनारे 16.वफ़ा नाम की चीज़ 17. आलोचक 18. झूठा ज़माना
यूँ तुझे ढूँढ़ने निकले के न आए ख़ुद भी
वो मुसाफ़िर कि जो मंज़िल थे बजाए ख़ुद भी
कितने ग़म थे कि ज़माने से छुपा रक्खे थे
इस तरह से कि हमें याद न आए खुद भी
ऐसा ज़ालिम कि अगर ज़िक्र में उसके कोई ज़ुल्म
हमसे रह जाए तो वो याद दिलाए ख़ुद भी
लुत्फ़ तो जब है तअल्लुक़ में कि वो शहरे-जमाल1
कभी खींचे कभी खिंचता चला आए ख़ुद भी
ऐसा साक़ी हो तो फिर देखिए रंगे-महफ़िल
सबको मदहोश करे होश से जाए ख़ुद भी
यार से हमको तगाफ़ुल का गिला है बेजा
बारहा महफ़िले-जानाँ से उठ आए ख़ुद भी
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1. महबूब
आज फिर दिल ने कहा आओ भुला दें यादें
ज़िंदगी बीत गई और वही यादें-यादें
जिस तरह आज ही बिछड़े हों बिछड़ने वाले
जैसे इक उम्र के दुःख याद दिला दें यादें
काश मुमकिन हो कि इक काग़ज़ी कश्ती की तरह
ख़ुदफरामोशी के दरिया में बहा दें यादें
वो भी रुत आए कि ऐ ज़ूद-फ़रामोश1 मेरे
फूल पत्ते तेरी यादों में बिछा दें यादें
जैसे चाहत भी कोई जुर्म हो और जुर्म भी वो
जिसकी पादाश2 में ताउम्र सज़ा दें यादें
भूल जाना भी तो इक तरह की नेअमत है ‘फ़राज़’
वरना इंसान को पागल न बना दें यादें
----------------
1.जल्दी भूलने वाला 2. जुर्म की सज़ा
बुझा है दिल तो ग़मे-यार अब कहाँ तू भी
मिसाले साया-ए-दीवार1 अब कहाँ तू भी
बजा कि चश्मे-तलब2 भी हुई तही3 कीस:4
मगर है रौनक़े-बाज़ार अब कहाँ तू भी
हमें भी कारे-जहाँ5 ले गया है दूर बहुत
रहा है दर-पए आज़ार6 अब कहाँ तू भी
हज़ार सूरतें आंखों में फिरती रहती हैं
मेरी निगाह में हर बार अब कहाँ तू भी
उसी को अहद फ़रामोश क्यों कहें ऐ दिल
रहा है इतना वफ़ादार अब कहाँ तू भी
मेरी गज़ल में कोई और कैसे दर आए
सितम तो ये है कि ऐ यार अब कहाँ तू भी
जो तुझसे प्यार करे तेरी नफ़रतों के सबब
‘फ़राज़’ ऐसा गुनहगार अब कहाँ तू भी
--------------
1.दीवार के साये की तरह 2. इच्छा वाली आँख 3. ख़ाली 4. झोली, कटोरा, प्याला 5. दुनिया, ज़माने वाला कार्य 6. तकलीफ़ और मुसीबत पहुँचाने पर प्रतिबद्ध
मैं दीवाना सही पर बात सुन ऐ हमनशीं मेरी
कि सबसे हाले-दिल कहता फिरूँ आदत नहीं मेरी
तअम्मुल1 क़त्ल में तुझको मुझे मरने की जल्दी थी
ख़ता दोनों की है उसमें, कहीं तेरी कहीं मेरी
भला क्यों रोकता है मुझको नासेह गिर्य:2 करने से
कि चश्मे-तर मेरा है, दिल मेरा है, आस्तीं मेरी
मुझे दुनिया के ग़म और फ़िक्र उक़बा3 की तुझे नासेह
चलो झगड़ा चुकाएँ आसमाँ तेरा ज़मीं मेरी
मैं सब कुछ देखते क्यों आ गया दामे-मुहब्बत में
चलो दिल हो गया था यार का, आंखें तो थीं मेरी
‘फ़राज़’ ऐसी ग़ज़ल पहले कभी मैंने न लिक्खी थी
मुझे ख़ुद पढ़के लगता है कि ये काविश4 नहीं मेरी
1. हिचकिचाहट, देरी, फ़िक्र, संकोच 2. रोना, विलाप, 3. परलोक 4. प्रयास
Tuesday, August 12, 2008
... मुमकिन है सपनों की मंजिल पाना
अगर आपके मन में कुछ कर गुजरने की इच्छा हो तो धन की कमी कोई मायने नहीं रखती।
यकीन नहीं होगा, लेकिन देश भर में ऐसे तमाम विद्यार्थी, जिन्हें विदेशों में पढ़ने के लिए पैसे नहीं थे, उसके बावजूद उन्होंने न केवल यूरोप और अमेरिका में पढ़ाई की बल्कि अपने उद्देश्यों को लेकर सफलता की राह पर चल रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन के फेलोशिप प्रोग्राम के तहत वर्ष 2000 से हर साल 40 ऐसे छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिए मदद दी जा रही है, जो उच्च शिक्षा के अवसरों से वंचित रह गए हैं।
उत्तर प्रदेश के भदोही जैसे पिछड़े जिले की रहने वाली दीप्ति का कहना है कि '25 साल की उम्र में शादी हो गई, उस समय उन्होंने स्नातक की शिक्षा पूरी की थी।उसके बाद कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था, लेकिन फोर्ड फाउंडेशन के इंटरनेशनल फेलोशिप प्रोग्राम ने उनकी जिंदगी को नई दिशा दे दी।' उन्होंने ब्रिटेन में रहकर शिक्षा हासिल की और अब वाराणसी के ही एक एनजीओ में काम कर रही हैं, जो वहां के बुनकरों की हालत को सुधारने के लिए काम कर रही है।
फोर्ड फाउंडेशन का इंटरनेशनल फेलोशिप प्रोग्राम सन 2000 में स्थापित किया गया था। फाउंडेशन का उद्देश्य था कि उन छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए मदद की जाए, जो ऐतिहासिक कारणों से धनाभाव के चलते उच्च शिक्षा नहीं पा सके हैं। कार्यक्रम का उद्देश्य है कि ऐसे लोग सामाजिक विकास तथा नेतृत्व के क्षेत्र में अपने देश का प्रतिनिधित्व कर सकें तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक, आर्थिक तथा सामाजिक न्याय के क्षेत्र में काम कर सकें। इस कार्यक्रम के तहत बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड राज्य से छात्रों का चयन किया जाता है। इस फेलोशिप कार्यक्रम के निदेशक विवेक मनसुखानी का कहना है कि चयन की प्रक्रिया में इस बात का खास खयाल रखा जाता है कि ऐसे लोग चुने जाएं, जिन्होंने उस क्षेत्र में कम से कम 3 साल तक काम किया हो, जिसमें वे उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं। साथ ही यह कोशिश की जाती है कि चयनित अभ्यर्थी ऐसा हो, जो केवल कैरियर बनाने के लिए विदेश में पढ़ाई न करना चाहता हो और वापस आकर अपने देश में वंचितों, पिछड़ों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए काम कर सके। आठ साल से चल रहे इस कार्यक्रम के तहत करीब 240 छात्र विदेशों में पढ़ाई करने जा चुके हैं। इनमें से 150 शिक्षा पूरी करके आ चुके हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। इसके अलावा 50 छात्रों को पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद पीएचडी में दाखिला मिल गया और आगे की पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में शिक्षा प्राप्त कर लौटे छात्र-छात्राओं ने एलुमिनी एसोसिएशन भी बना लिया है और वे हमेशा एक दूसरे के संपर्क में रहते हैं। यह लोग विभिन्न एनजीओ, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।
राजस्थान के धौलपुर जिले के शाला गांव के रहने वाले नेकराम के लिए तो शिकागो जाकर पढ़ाई करना सपने जैसा था। फेलोशिप पाने के बाद उन्होंने अपनी एमएससी की पढ़ाई शिकागो की यूनिवर्सिटी आफ इलिनाइस से पूरी की। अब वे पिछले 2 साल से दिल्ली में शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए विभिन्न उपकरण तैयार करने वाले संस्थान में काम करते हैं। उनका कहना है कि अब उन्हें 40,000 रुपये प्रतिमाह वेतन मिल जाता है, साथ ही ऐसे तबके के लिए काम करने पर बेहद खुशी होती है, जो अक्षम हैं। हालांकि फोर्ड फाउंडेशन की यह योजना 2010 में खत्म होने वाली है। यानी अब केवल दो बैच को ही मदद मिल पाएगी। फाउंडेशन की मदद से शिक्षा प्राप्त सभी युवक-युवतियां एक स्वर में कहते हैं कि इस योजना को विस्तार दिए जाने की जरूरत है, जिससे वंचितों को वैश्विक दुनिया के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल करने के अवसर मिल सके।
courtesy: bshindi.com
Wednesday, August 6, 2008
विकास की बयार से ही बदलेगी मेवात की तस्वीर
देश के विकसित राज्यों में शुमार हरियाणा का मेवात जिला आज भी विकास से कोसों दूर है। राज्य में प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे ज्यादा, 32712 रुपये है।
2006-07 के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में 9636 पंजीकृत फैक्टरियां हैं, लेकिन मेवात के करीब 95।36 प्रतिशत लोग गांवों में रहते हैं और उनके रोजगार का मुख्य साधन खेती है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से 145 किलोमीटर दूर अरावली पर्वत शृंखला के किनारे बसा यह ऐसा इलाका है, जहां आज भी बेरोजगारों की फौज सड़कों के किनारे ताश के पत्ते खेलते हुए मिलती है। हालांकि सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों की कोशिशों के बाद अब हालात बदल रहे हैं.
हरियाणा के विकसित इलाकों में से एक, गुड़गांव से महज 25 किलोमीटर आगे बढ़ने पर गरीबी का वीभत्स चेहरा दिखाई देता है। यहां फैक्टरियों, मॉल्स और विकास के अन्य सोपानों की सीमा समाप्त हो जाती है।
मेवात जिले का गठन 4 अप्रैल, 2005 को किया गया, जिसका मुख्यालय नूंह में है। पूरा जिला 6 ब्लॉक में विभाजित है। जिले की कुल आबादी करीब 12 लाख है, जिनमें 70 फीसदी जनसंख्या मेव (मुस्लिम) की है। इसके अलावा, यहां 78,802 लोग अनुसूचित जाति के हैं। पहाड़ी इलाका होने की वजह से यहां पानी की भी किल्लत है और मीठे पानी की खोज में गांव की महिलाओं को चंद कुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। पिछड़ेपन की शृंखला यहीं खत्म नहीं होती। राज्य में शिक्षित लोगों का प्रतिशत जहां 67.91 है, वहीं मेवात जिले में शिक्षा का प्रतिशत 44 है। इसमें भी 61.54 प्रतिशत पुरुष और केवल 24.26 प्रतिशत शिक्षित महिलाएं हैं।
मेवात के एक आला प्रशासनिक अधिकारी का कहना है, 'यहां पर रूढ़िवादिता इतनी ज्यादा है कि सरकार की कोशिशें बेकार साबित हो रही हैं। अगर रोजगारपरक शिक्षा मुफ्त में देने के लिए छात्र-छात्राओं को दूसरे राज्य में सरकारी खर्चे पर भी भेजना होता है, तो ढूंढना मुश्किल हो जाता है। किसी भी नई योजना के लागू होने पर लोग उसमें शामिल होने को तैयार ही नहीं होते।' मेवात के विकास के लिए सरकार ने अलग से मेवात डेवलपमेंट एजेंसी का गठन किया है। यह न केवल विकास कार्यों की निगरानी करती है, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में जरूरत के मुताबिक आर्थिक मदद भी देती है। विभिन्न गावों को सड़कों से जोड़ा जा चुका है।
हरियाणा ऐसा राज्य है, जहां नवंबर 1970 में ही सभी गावों का विद्युतीकरण कर दिया गया था। मेवात भी इससे अछूता नहीं है। अब इलाकाई विकास (क्लस्टर डेवलपमेंट) के माध्यम से विकास को गति देने की कोशिश की जा रही है। इस आधार पर कुछ इलाकों को दुग्ध उत्पादक क्षेत्र, सब्जी उत्पादक क्षेत्र, कृषि के साथ अन्य रोजगारपरक गतिविधियों से जोड़ने और सिलाई-कढ़ाई, अपैरल ट्रेनिंग और शिक्षा के लिए ब्लॉकवार व्यवस्था की जा रही है। इसके साथ ही स्थानीय लोगों को रोजगार से जोड़ने के लिए एलऐंडटी, डॉन बोस्को जैसी तमाम संस्थाओं की मदद ली जा रही है।
मेवात डेवलपमेंट एजेंसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अतर सिंह अहलावत कहते हैं, 'इस इलाके में अशिक्षा सबसे बडी समस्या है। कोशिशों के बाद यहां के विद्यालयों में शत-प्रतिशत शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित कर ली गई है। इसके साथ स्वास्थ्य क्षेत्र और पेयजल की स्थिति में सुधार लाने का प्रयास किया जा रहा है।' सरकारी आंकडों के मुताबिक, मेवात का कुल क्षेत्रफल 19,1154 हेक्टेयर है। इसमें 14,6805 हेक्टेयर कृषि और 44349 हेक्टेयर गैर कृषि भूमि है। कृषि भूमि में 1,0100 हेक्टेयर भूमि ही सिंचित है। इसके अलावा, शैक्षिक पिछड़ापन कोढ़ में खाज का काम करता है।
इलाके में पिछले 8 साल से एक स्वयंसेवी संस्था स्मार्ट का संचालन करने वाली अर्चना कपूर कहती हैं, 'लोगों में सकारात्मक सोच विकसित हो रही है और विभिन्न योजनाओं को लेकर जागरूकता आ रही है, लेकिन अभी भी सरकारी और गैर सरकारी संगठनों को पेयजल, रोजगारपरक शिक्षा और आधारभूत ढांचे के क्षेत्र में काम करने की जरूरत है।'
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Thursday, July 31, 2008
...रस्ते बड़े कठिन हैं चलना संभल-संभल के
'हमें यह नहीं सोचना है कि दुनिया हम पर कितना प्रभाव डालती है, हमें यह देखना है कि हम दुनिया पर कितना प्रभाव डालते हैं।'
विश्वास प्रस्ताव के दौरान संसद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी का यह बयान देश के बढ़ते आत्मविश्वास को प्रदर्शित करता है। भारत अमेरिका परमाणु करार का सकारात्मक पहलू यह है कि परमाणु परीक्षणों के बाद अलग-थलग पड़ा भारत अन्य देशों से नागरिक उपयोग के लिए परमाणु के क्षेत्र में सहयोग पा सकेगा।
वहीं इस करार के आलोचकों का कहना है कि समझौते के बाद हमारी स्वतंत्रता नहीं रहेगी और हम अमेरिका की निगरानी में रहेंगे।
परमाणु करार की जरूरत
पोखरण में हुए परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका और कई अन्य देश भारत के खिलाफ हो गए थे। कई देशों ने भारत के खिलाफ परमाणु प्रतिबंध तक लगा दिया। भारत को बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा विकसित करने के लिए परमाणु संयंत्रों हेतु यूरेनियम उपलब्ध नहीं है। हालत यह है कि परमाणु रिएक्टरों को बंद करने की नौबत आ गई। भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार की ओर देखना ही था।
करार के रास्ते
भारत और अमेरिका के बीच 18 जुलाई 2005 को समझौता हुआ। इसमें शर्त रखी गई कि भारत को जिन रिएक्टरों और प्रतिष्ठानों को अपने सैनिक कार्यक्रम से अलग रखना है, उनके लिए वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के स्थायी सुरक्षा मानदंडों के लिए राजी हो। यह होने पर अमेरिका अपने प्रतिबंध हटा लेगा।
02 मार्च 2006 को दिल्ली में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश के बीच हुई बातचीत के बाद विवादास्पद नाभिकीय समझौते पर सहमति बन गई। इस समझौते में भारत ने अपने कुल 22 नाभिकीय संयंत्रों में से 14 को नागरिक उपयोग का घोषित किया और इसे निगरानी के लिए खोल दिया। 3 अगस्त 2007 को नाभिकीय 123 समझौते के प्रारूप को दोनों देशों में एक साथ जारी किया गया। वामपंथियों ने 18 जून 2008 को कहा कि वे भारत सरकार के सेफगार्ड पैक्ट पर दस्तखत करने के खिलाफ हैं।
समर्थकों का तर्क
भारत सरकार का कहना है कि ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा की सख्त जरूरत है। अब तक भारत ने 17 परमाणु रिएक्टर बना रखे हैं, जिनमें सबसे बड़े रिएक्टर से 540 मेगावाट बिजली बन सकती है। परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिल काकोडकर का कहा है कि यदि 2012 और 2020 के बीच भारत 40 हजार मेगावाट के रिएक्टर आयात कर सका तो भारत में परमाणु बिजली की कमी दूर हो जाएगी।
करार से बेकरारी
करार का विरोधी तर्क देते हैं कि परमाणु बिजली विकास भारत अपने दम पर कर रहा है और भविष्य में भी करता रहेगा। इससे ऊर्जा सुरक्षा का कोई लेना देना नहीं है। पूरा समझौता कयासों पर आधारित है। विरोध करने वालों का तर्क है कि परमाणु बिजली महंगी है। डील के बाद अगर हम 40 रिएक्टर आयात करते हैं तो इसके लिए 100 अरब डॉलर का खर्च कहां से आएगा।
पड़ोसी का दर्द
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार पर पाकिस्तान ने ऐतराज जताया है। पाकिस्तान को डर है कि करार हो जाने के बाद भारत, परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सशक्त बन जाएगा और इससे उसके हथियारों के बढ़ने की आशंका भी है। उसने करीब 60 देशों को पत्र भेजा, जिसमें परमाणु करार पर भारत के बढ़ते कदम को रोकने की गुजारिश की गई है।
3 मार्च 2006 को नई दिल्ली पुराना किला से दिए गए अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश के भाषण में कहा गया कि 'अब दुनिया बदल चुकी है और विभाजित दुनिया में जो भारत-अमेरिका के बीच संबंध थे उस समय की हालत से अब बहुत परिवर्तन आ चुका है। दोनों देशों का आधार, लोकतंत्र है और 21वीं सदी में हम एक दूसरे के सबसे बड़े सहयोगी साबित हो सकते हैं।' भारत में उदारीकरण की नीति को लागू होने पर इसके विरोधियों ने कहा था कि विदेशी कंपनियां, हमारी घरेलू बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक को निगल जाएंगी। लेकिन अब तो हालत बिल्कुल उटल है।
करार के सकारात्मक पहलू को देखें तो इसके बाद भारत, परमाणु उत्पादों के वैश्विक बाजार में उतरेगा। यह भी हो सकता है कि मानव संसाधन और अपनी सस्ती तकनीक की बदौलत भविष्य में वह सबसे बड़ा न्यूक्लियर सप्लायर बनकर उभरे। बहरहाल परमाणु करार के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पहलू हैं और देश को इस मामले में बहुत संभलकर चलना होगा। शकील बदायूंनी के शब्दों में कहें तो-
देखो कदम तुम्हारा हरगिज न डगमगाए,
रस्ते बड़े कठिन हैं, चलना संभल-संभल के।
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Thursday, July 24, 2008
कभी सूरज है बालों पर, कभी शामें हैं चेहरे पर...
सत्येन्द्र प्रताप सिंह
भारत में नव उदारवाद की नीति को लागू हुए करीब 17 साल होने जा रहे हैं। इसे राजनीतिक आंदोलन के रूप में लिया जा सकता है, जो 1970 में आई वैश्विक मंदी के बाद दुनिया के तमाम देशों में लागू किया गया था।
भारत में नव उदारवाद के दूसरे चरण में- क्षेत्र के आधार पर परमाणु ऊर्जा में निजीकरण, रक्षा के क्षेत्र में निजीकरण और बैंकिंग क्षेत्र को खोलने की कवायद चल रही है। नव उदारवाद के दौरान भारत में जीडीपी और विकास दर में बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है और यह पहले की तुलना में अधिक रही है। अब केंद्र की मनमोहन सरकार ने विश्वास मत हासिल कर लिया है।
4 साल 2 महीने तक वामपंथियों के समर्थन में बहुत से बंधन लगे और तमाम विधेयक रुके रहे, जिन्हें केंद्र सरकार आर्थिक सुधारों के लिए जरूरी समझती थी। नव उदारवाद के समर्थक रहे वर्तमान प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री एक बार फिर अपने रंग में हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्तमंत्री पी. चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की तिकड़ी एक बार फिर नव उदारवाद के दूसरे चरण को शुरू करने के लिए बेताब हैं।
भारतीय कम्युनिस्ट पाटी की साप्ताहिक पत्रिका पीपुल्स डेमोक्रेसी में कहा गया है कि, 'इसका प्रभाव यह रहा है कि भारत में डॉलर के हिसाब से करीब 40 अरबपति बने हैं वहीं आम लोगों का जीवन स्तर बिगड़ा है। जहां 1973-74 में 56.4 प्रतिशत लोगों को 2200 कैलोरी से कम पौष्टिकता वाला भोजन मिलता था, 1993-94 में यह बढ़कर 58.5 प्रतिशत और 2004-05 में 64.5 प्रतिशत पहुंच गया।' मतलब साफ है। जहां आईटी, दूरसंचार, सेवा क्षेत्र में विकास हुआ वहीं संतुलन में कमी आई और कृषि क्षेत्र में विकास नहीं के बराबर हुआ। गरीबी, भुखमरी और कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या बढ़ गई।
वैसे तो 1991 में केंद्र में सत्तासीन हुई कांग्रेस के वित्तमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण की ठोस बुनियाद रखी थी। बाजार को खोले जाने की व्यापक कोशिश उसी समय हुई। उसके बाद आई सरकारें कमोबेश उसी राह पर चलती रहीं, जिस पर मनमोहन सिंह ने चलना सिखाया था। अपनी दूसरी पारी में जब मनमोहन प्रधानमंत्री बने तो नव उदारवाद को रंग देने की सरकार की इच्छा तो नजर आई लेकिन वामपंथियों के बाहरी समर्थन ने उनका हाथ रोक रखा था।
हालांकि इसके पहले भी उदारीकरण की चोरी-छुपे कोशिशें की गई थीं। इंदिरा गांधी ने 1980 में सत्ता संभालने के बाद औद्योगिक लाइसेंसिंग और बड़े उद्योगों पर लगे बंधनों को कम किया। वर्ष 1984 में राजीव गांधी ने औद्योगिक गैर नियमन, विनिमय दरों में छूट और आयात नियंत्रणों को आंशिक रूप से हटाए जाने संबंधी कुछ कदम उठाए। लेकिन ये 1991 में उठाए गए कदमों की तुलना में मामूली ही थे। नव उदारवाद के बाद भारत में दो प्रमुख बदलाव नजर आते हैं। पहला- विकास दर में बढ़ोतरी और दूसरा- वित्तीय घाटे में तेजी से कमी।
सरकार के विश्वास मत हासिल करने के बाद स्वाभाविक है कि अब पुराने पड़े तमाम एजेंडों को लागू करने की कोशिशें फिर से शुरू होंगी। इसमें बैंकिंग विधेयक, पेंशन विधेयक, लेबर रिफार्म विधेयक, बीमा क्षेत्र में विदेशी पूंजी बढ़ाए जाने का मसला सहित तमाम मुद्दे फिर से जिंदा होंगे, जो वामपंथियों के विरोध के चलते ठंडे बस्ते में डाल दिए गए थे। इसके अलावा अमेरिका से परमाणु समझौते के बाद बिजली उत्पादन के लिए भारी भरकम निवेश की जरूरत होगी, उसके लिए भी सरकार की कोशिश होगी कि निजी क्षेत्र आगे आएं। इसके अलावा सैन्य क्षेत्र में भी सरकार निजी क्षेत्र का मुंह देख रही है।
इस सिध्दांत के तहत बुनियादी जरूरतों के क्षेत्र में भी सरकार की हिस्सेदारी कम किए जाने की बात की जाती है- चाहे वह सड़क निर्माण, शिक्षा या पेय जल जैसी जीवन की मूलभूत जरूरतों से संबंधित मामला ही क्यों न हो। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत और चीन जैसे विकासशील देशों को लाभ हुआ है। यहां के जीवन स्तर में सुधार आया है, लेकिन वैश्विक मंदी को देखते हुए पश्चिमी देशों में यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या खुली बाजार व्यवस्था को समेटने की जरूरत है?
मार्गन स्टैनली का मानना है कि वैश्विक मंदी अब अंतिम दौर में है। अगर यह भविष्यवाणी सही साबित होती है तो यह संभावनाएं भी प्रबल हो जाएंगी कि आर्थिक सुधार की गति को तेज करने का असर तेजी से हो और गिरती विकास दर और बढ़ती महंगाई पर काबू पाया जा सके। सरकार भी कुछ वैसा ही रंग बदलते नजर आ रही है, जैसा पाकिस्तान की शायर शाहिदा हसन कहती हैं-
कभी सूरज है बालों पर, कभी शामें हैं चेहरे पर
सफर करते हुए रंगत बदलती जा रही हूं मैं।
courtesy_ bshindi.com