Thursday, June 18, 2009

बड़े उपयोगी हैं वित्तीय निर्णय लेने के ये सामान्य नियम

मनीश कुमार मिश्र

वित्तीय योजना बनाने और उस हिसाब से उत्पादों का चयन करने में गणित के साथ-साथ अर्थशास्त्र के ज्ञान की भी आवश्यकता होती है। ऐसा करना प्रत्येक व्यक्ति के बस की बात नहीं होती है।
निवेश करने के कुछ मोटे नियम हैं जो काफी हद तक कामयाब साबित हुए हैं। इसके लिए न तो आपको ज्यादा गणित जानने की आवश्यकता है और न ही अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने की। वित्तीय निर्णय लेने वाले व्यक्तियों की सुविधा के लिए ऐसे कुछ अतिसामान्य से नियम बनाए गए हैं।
पहले ही बताते चलें कि इनकी तह में जाने पर इसकी उपयोगिता कम हो सकती है लेकिन मोटे तौर पर ये नियम अपनी जगह पर ठीक हैं। फिर भी इसे अपनाते समय आपको सावधानी बरतनी चाहिए। इन तरीकों को अपनाइए और फायदा उठाइए।
बीमा+निवेश न कि निवेश+बीमा
प्रमाणित वित्तीय योजनाकार विश्राम मोदक कहते हैं, 'जीवन बीमा के मामले में एंडाउमेंट या यूलिप का चुनाव करना बुध्दिमानी नहीं कही जा सकती है। बीमा और निवेश का मिश्रण किसी भी नजरिए से बेहतर नहीं हो सकता है। यूलिप या एंडाउमेंट योजना को आप दो भागों में बांटिए।
एक हिस्सा अपनी जरुरत के अनुसार टर्म इंश्योरेंस प्लान लेने में लगाइए और शेष बचे पैसों को कहीं और निवेशित कर दीजिए।' उनके अनुसार, यूलिप=बीमा+निवेशकी जगह- बीमा+निवेश = यूलिप से अधिक लाभ का सूत्र अपनाइए। एक टर्म इंश्योरेंस प्लान खरीद कर शेष बची राशि का निवेश आप किसी म्यूचुअल फंड की योजना (विशेष रूप से सिप में) कीजिए, यह आपको यूलिप से अधिक लाभ दिलाएगा।

अधिकतम ऋण के नियम
आपने गौर किया होगा कि बैंक सबसे अधिक ऋण होम लोन के रूप में देता है जो आपकी मासिक आय का लगभग 55 गुना तक हो सकता है। अपनालोन के मुख्य कार्याधिकारी हर्षवर्ध्दन रुंगटा कहते हैं, 'बैंक मासिक आय, भुगतान करने की क्षमता, ऋण की अवधि और जायदाद के मामले में जायदाद की कीमत के आधार पर 35 से 55 प्रतिशत तक का ऋण उपलब्ध कराते हैं।'
चलिए मान लेते हैं कि आप 10.5 प्रतिशत की दर पर 20 वर्षों के लिए ऋण लेते हैं और आपकी मासिक किस्त प्रति लाख रुपये के लिए 1,000 रुपए बैठती है। मान लेते हैं कि आपको मिलने वाला वेतन प्रति माह 10,000 रुपये है।
ऋण के सामान्य नियम के मुताबिक कोई भी बैंक यह उम्मीद करता है कि आप मासिक किश्त के रुप में अधिकतम 5,000 रुपये का भुगतान कर सकते हैं। इसलिए वे आपको अधिकतम 5,00,000 रुपये तक का ऋण उपलब्ध करा सकते हैं। यह आपकी मासिक आय के लगभग 50 गुना है।
रूंगटा ने बताया, 'अगर बैंक को यह जानकारी मिलती है कि आपने अन्य किसी प्रकार का भी ऋण पहले से लिया हुआ है जिसकी मासिक किस्तों का आप भुगतान कर रहे हैं तो तो उसी हिसाब से वे आपके ऋण की पात्रता का निर्धारण करते हैं।' अगर आप मासिक किश्त के रुप में 5,000 रुपये प्रति माह दे रहे हैं तो कोई बैंक शायद ही आपको ऋण उपलब्ध कराए।

कब होंगे पैसे दोगुने
बैंक किस समयावधि में आपके पैसों को दोगुना कर देगा, यह जानने का एक आसान तरीका मौजूद है। 72 में ब्याज दर से भाग दीजिए, इस प्रकार जो संख्या प्राप्त होती है उसे आप वर्ष मानिए। अगर ब्याज वार्षिक जुड़ता हो तो उतने वर्षों में आपके पैसे दोगुने हो जाएंगे।
उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि कोई बैंक आपको 10 प्रतिशत वार्षिक का ब्याज देता है। ऊपर बताए गए तरीके के मुताबिक यह 7210 वर्षों में अर्थात 7.2 वर्षों में बैंक में जमा की गई रकम दोगुनी हो जाएगी।
अगर ब्याज तिमाही या छमाही जुड़ता हो तो इसके दोगुने होने में अपेक्षाकृत कम समय लगेगा। पहले 5 वर्षों में पैसे दोगुने हो जाते थे, इस मोटे नियम को लागू कर देखा जाए तो उस समय मिलने वाला ब्याज 14.2 फीसदी वार्षिक का था।

इक्विटी में निवेश
ऐसा कहा जाता है कि पोर्टफोलियो में इक्विटी के हिस्से का निर्धारण आप 100 में से अपनी उम्र घटा कर करें। मान लीजिए कि आपकी उम्र 30 वर्ष है और आप 10,000 रु पये का निवेश करना चाहते हैं तो आपको इक्विटी में 7,000 रुपये का निवेश करना चाहिए।
अगर आप 60 वर्ष के हैं तो इस नियम के मुताबिक आपको अपने कुल निवेशित की जाने वाली राशि के 40 प्रतिशत का निवेश इक्विटी में करना चाहिए। आधार के लिए इस नियम का प्रयोग किया जा सकता है। वास्तव में पोर्टफोलियो में विभिन्न घटकों का निर्धारण आपके भविष्य की जरूरतों, जोखिम उठाने की क्षमता आदि के अनुसार निर्धारित की जाती है।

जीवन बीमा गणना की तरकीब
किसी व्यक्ति के जीवन के मूल्य का आकलन करना मुश्किल है। वैसे भी जीवन बीमा कोई व्यक्ति अपने लिए तो करवाता नहीं है, यह तो आश्रितों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के लिए लिया जाता है। जीवन बीमा लेते समय सम एश्योर्ड के निर्धारण का एक सामान्य सा नियम यह है कि आप अपनी वार्षिक आय का 10 गुना सम एश्योर्ड लें।
ताकि आपके न होने की दशा में अगर सम एश्योर्ड की राशि पर वार्षिक 10 प्रतिशत का भी प्रतिफल मिले तो आपके आश्रितों को आपके न होने की कमी आर्थिक तौर पर न खले। ध्यान रखें ये नियम शुरुआत करने के लिए हैं। जीवन बीमा का सम एश्योर्ड हो या इक्विटी में निवेश, वास्तविक जरुरत विभिन्न व्यक्तियों की विभिन्न परिस्थितियों के आधार पर भिन्न- भिन्न होती हैं।
http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=20100

Thursday, June 4, 2009

यह कैसा दलित सम्मान?

राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस बात का जिक्र किया गया कि सरका ने एक दलित महिला मीरा कुमार को लोकसभा अध्यक्ष बना दिया, जिससे लोकतंत्र का मान बढ़ा है।
भारत में दलितों को पद प्रतिष्ठा और सम्मान देने की होड़ सी लग गई है। खासकर मायावती के शक्तिशाली होने के बाद तो जैसे राजनीतिक पार्टियों को लगता है कि सोया हुआ जिन्न जाग गया है। कांग्रेस पार्टी ने मीरा कुमार को लोकसभा अध्यक्ष बना दिया। शपथ ग्रहण के समय सोनिया के चेहरे की मुस्कराहट जाहिर कर रही थी कि वह विजयी मुस्कान है। बड़ा दुख होता है कि मीरा कुमार के लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद सत्तासीन पार्टी कहते फिर रही है कि दलित.को अध्यक्ष बना दिया। दलित और उनके जाति के संबोधन को भारतीय समाज में गालियों की तरह ही लिया जाता है। अब मीरा को इतनी बार दलित कहा जा रहा है कि वे इस एहसान से दब जाएंगी कि ऐसा लगता है कि बगैर किसी योग्यता के दलित होने के चलते ही उन्हें यह पद मिल गया है। हालांकि उनका पिछला इतिहास देखा जाए तो हर मौके पर उन्होंने अपनी योग्यता साबित की है।अब सवाल यह उठता है कि लोकसभाध्यक्ष पद पर बैठाने के बाद, बार बार दलित का नारा लगाने और ऐसा किया, यह जताने के बाद कोई पार्टी दलितों के दिल में जगह बना सकती है? क्या इस तरह से मायावती के राजनीतिक कद का सामना किया जा सकता है? वैसे भी मीरा कुमार ने अपनी ताकत से यह पद नहीं हासिल किया, बल्कि उनके पीछे पूर्व कांग्रेसी दिग्गज जगजीवन राम का बैक अप है। भले ही मीरा कुमार योग्य हैं, लेकिन क्या जनता उन्हें दिल से अपना नेता स्वीकार कर पाएगी, कि लोकतंत्र के ताकतवर होने की वजह से एक वंचित तबके की महिला को सम्मान मिला है??

Tuesday, June 2, 2009

हर जगह पिटेंगे भारतीय, देश में भी-विदेश में भी

अब आस्ट्रेलिया में भारतीयों की पिटाई हो रही है। विदेश में रहने वाले तमाम मराठियों ने महाराष्ट्र में एक गुंडे का समर्थन किया था, जब वह उप्र और बिहार के लोगों को पिटवा रहा था। कांग्रेस भी चुप, भाजपा भी चुप।
यही कांग्रेस सरकार केंद्र में थी और महाराष्ट्र में भी, जब महाराष्ट्र में मराठी गैर मराठी के नाम पर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग बड़े पैमाने पर पीटे और मारे जा रहे थे। सरकार कुछ नहीं कर सकी। अब आस्ट्रेलिया में स्थानीय लोगों की नौकरी छीनने के नाम पर भारतीयों को पीटा जा रहा है और वहां राजनीति हो रही है तो यह सरकार क्या कर सकती है? यह तो विदेश का मामला है। कुछ नहीं होने वाला गुरू, लात खाते रहो, जीते रहो और कांग्रेस, भाजपा को वोट देकर सत्ता देते रहो। फिलहाल अभी तो कांग्रेस की जय हो।
हम यही कर सकते हैं, जो फोटो में ये लोग कर रहे हैं।

Wednesday, May 20, 2009

अदम गोंडवी की कुछ रचनाएं

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है

उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है


इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का

उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है


कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले

हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है


रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी

जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

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काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में

उतरा है रामराज विधायक निवास में


पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत

इतना असर है खादी के उजले लिबास में


आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह

जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में


पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें

संसद बदल गयी है यहाँ की नखास में


जनता के पास एक ही चारा है बगावत

यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में

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जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये

आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये


जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़

उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये


जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को

किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिये


मतस्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार

दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिये.

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तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है

मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है


उधर जम्हूरियत का ढोल पीते जा रहे हैं वो

इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है ,नवाबी है


लगी है होड़ - सी देखो अमीरी औ गरीबी में

ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है


तुम्हारी मेज़ चांदी की तुम्हारे जाम सोने के

यहाँ जुम्मन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है



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हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये

अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये


हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है

दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये


ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले

ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये


हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ

मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये


छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़

दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये
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वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं
वे अभागे आस्‍था विश्‍वास लेकर क्‍या करें


लोकरंजन हो जहां शम्‍बूक-वध की आड़ में
उस व्‍यवस्‍था का घृणित इतिहास लेकर क्‍या करें


कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्‍या करें


बुद्धिजीवी के यहाँ सूखे का मतलब और है
ठूंठ में भी सेक्‍स का एहसास लेकर क्‍या करें


गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे
पारलौकिक प्‍यार का मधुमास लेकर क्‍या करें

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मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की

आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की ,संत्रास की

यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी
ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की?

इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया
सेक्स की रंगीनियाँ या गोलियाँ सल्फ़ास की

याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार
होता है परिपाक धीमी आँच पर एहसास की.

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-रचनाकार: अदम गोंडवी




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Satyendra Pratap Singh
Senior Sub Editor,
Business Standard,
New Delhi

Thursday, April 23, 2009

हैं तो चुनावी मुद्दे, लेकिन पार्टियां उन्हें उठाती ही नहीं


अब दिल्ली को ही देखिए। शीला दीक्षित चुनाव जीत गईं। वाह, क्या बात है- तीसरी बार जीतीं। भाजपा ने मुद्दा भी क्या उठाया?? गजब की मरी पार्टी की तरह। कांग्रेस एक प्याज से सत्ता में आई थी, भाजपा ने सोचा कि सब्जियों को मुद्दा बनाकर वापस सत्ता पर काबिज हो जाएं। साथ ही बुझे मन से आतंकवाद का मसला भी उठाया, इस डर के साथ कि कहीं उनकी सरकार में हुआ संसद पर हमला जनता को न याद आ जाए। हुआ भी वही। जनता को याद रहा कि भाजपा के शासन में आतंकवाद भी था, सब्जी भी महंगी थी- बढ़िया है कि फिर से कांग्रेस को चुन लिया जाए।
अब ऐसा भी नहीं कि कांग्रेस ने कम नाश किया हो। आज स्थिति यह है कि आप अपने बच्चे को किसी मझोले दर्जे के निजी प्राथमिक स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं तो ४०,००० (चालीस हजार) डोनेशन, ७,००० तिमाही के हिसाब से २८,००० (अट्ठाइस हजार सालाना) फीस रख लीजिए। इसके अलावा ८०० रुपये महीने के हिसाब से १०००० रुपया सालाना बस भाड़ा। कुल मिलाकर न्यूनतम ९०,००० रुपये चाहिए, तब जाकर आपका बच्चा एलकेजी से यूकेजी में पहुंच पाएगा। इस तरह से करीब ७,५०० रुपये महीना आपको अपने एक बच्चे के लिए कमाना होगा। लेकिन यह चुनावी मसला नहीं...
इसी तरह से दिल्ली में भूमाफिया और बिल्डर सक्रिय हैं। रही सही कसर प्रॉपर्टी डीलर पूरा कर देते हैं। अगर आप किसी लाल डोरा (स्लम) इलाके में कमरा किराये पर लेना चाहते हैं तो २ कमरे का ६,००० रुपया महीना किराया देना होगा। दलाल को हर साल ६,००० रुपये दलाली देनी होगी। किसी भी प्लैट की कीमत दिल्ली के बाहरी इलाकों में भी २ कमरे का २० लाख रुपये से कम नहीं है। लूट मची है। लेकिन यह भी चुनावी मसला नहीं...
दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्री खुद स्कूल चलाते (शिक्षा माफिया??) हैं, उन्हें शायद किसी से भी ज्यादा पता है। भाजपा शायद इसलिए इसे मुद्दा बनाना नहीं चाहती होगी कि उसे भी किसी शिक्षा माफिया को शिक्षा मंत्री और शहरी विकास मंत्रालय किसी भूमाफिया या बिल्डर को देना हो....

Sunday, April 19, 2009

मीडिया बिकता है... बोलो खरीदोगे???

इन दिनों आईपीएल क्रिकेट चल रहा है। इसका पूरा नाम इंडियन प्रीमियर लीग था, जो इस समय दक्षिण अफ्रीका में हो रहा है। इसके बारे में और ज्यादा बताने की जरूरत नहीं कि इसमें कौन से खिलाड़ी होते हैं, कैसी टीम होती है। यह सब कुछ मीडिया में आ रहा है।

परदे के पीछे की बात यह है कि एक महीने के आईपीएल का अनुमानित कारोबार २००० करोड़ रुपये का है। इस कारोबार में सभी चैनल, अखबार साथ देने में लगे हैं। स्वाभाविक है कि इसका विग्यापन बजट कम से कम कुल पूंजी का २० प्रतिशत तो होगा ही। यानी ४०० करोड़ रुपये। अगर इस विग्यापन राशि को ४० मीडिया हाउस में बांट दें तो एक एक का हिस्सा आता है, १० करोड़ रुपये। मंदी के इस दौर में अगर एक महीने में १० करोड़ की आमदनी किसी मीडिया हाउस को हो जाए, तो अच्छा मुनाफा हुआ न... खासकर ऐसे में जब एक मीडिया हाउस की कुल पूंजी (अगर ५ बड़े मीडिया हाउस को निकाल दें) तो ५०० करोड़ रुपये के आसपास आएगी। ऐसे में अखबारों में क्यों न छा जाए आईपीएल। इस हद तक कि लोगों को आईपीएल का बुखार चढ़ जाए।


आखिर अखबारों- चैनलों को भी तो कारोबार करना है। चुनावी विग्यापन तो आ ही रहे हैं। इसका कुल विग्यापन भी ४००-५०० करोड़ के आसपास ही होगा। इसमें नेताओं को गरियाने का भी मौका मिलता है। सभी विग्यापन देते हैं इसलिए। लेकिन आईपीएल के मामले में तो ऐसा नहीं है, उसका बुखार जनता पर चढ़ाने का ठेका मिला है, उसका समर्थन करने के लिए विग्यापन मिला है।अब आपको लग रहा है न कि कितनी सस्ती है हमारी मीडिया....

Thursday, April 16, 2009

पड़ रहे हैं जूते, चप्पल और खड़ाऊं

अब लौह पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी के ऊपर खड़ाऊं फेकी गई। फेकने वाले का कहना है कि आडवाणी लौह पुरुष नहीं, दोमुहें व्यक्ति हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि कार्यकर्ता ने यह देखने के लिए लकड़ी की चप्पल चलाई कि आडवाणी सचमुच लोहे के हैं या नहीं। उसने सोचा कि अगर लोहे के होंगे, तो धातु से लकड़ी के टकराने पर अलग आवाज आएगी और पता चल जाएगा कि वह लोहे के बने हैं या नहीं। बहरहाल...

भारत में जूता फेंको अभियान की शुरुआत एक वरिष्ठ पत्रकार जरनैल सिंह ने की। कांग्रेस ने सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर का टिकट काट दिया। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस ने टिकट काटने के बाद महसूस किया कि १२ बजे प्रेस कांन्फ्रेंस आयोजित होने के चलते जरनैल सिंह को गुस्सा आया।

वहीं कांग्रेस सांसद के ऊपर शिक्षक ने इसलिए जूता चलाया कि वह दारू पिए था। नवीन जिंदल ने तुरंत पकड़ लिया। लेकिन असली वजह स्पष्ट नहीं है।

अब कहीं ऐसा न हो कि जूता-चप्पल चलाकर लोकप्रियता पाने की कोशिश करने वालों के भाग्य का फैसला नेता के समर्थक ही कर दें और उनकी जमकर धुनाई हो जाए???

Friday, April 10, 2009

वॉर्न की गुगली पर आउट हुए 100 क्रिकेटर

सुवीन सिन्हा


किताब में गांगुली को जहां 96वें स्थान पर रखा गया है, वहीं पूर्व क्रिकेटर कपिल देव 43वें स्थान पर हैं।

इस किताब के शीर्षक पर ज्यादा सोच-विचार मत कीजिएगा। यह किताब उन 100 क्रिकेट खिलाड़ियों के बारे में नहीं है, जिनके साथ या खिलाफ शेन वॉर्न ने कमान संभाली थी। असलियत में यह किताब खुद शेन वॉर्न के बारे में है।
यह क्रिकेट से संन्यास ले चुके ऑस्ट्रेलिया के लेग स्पिनर का एक तरीका है, जिसके जरिए वह दुनिया को अपने नजरिये के बारे में बताते हैं। निश्चित तौर पर उनके करियर में भी काफी उतार-चढ़ाव रहे होंगे।किताब को पिछले साल ब्रिटेन के एक अखबार 'टाइम्स' में छपी उस फेहरिस्त का अगला भाग भी कह सकते हैं, जिसमें उनके समय के 50 क्रिकेटरों का जिक्र किया गया है। इस सूची के छपने से एक उत्तेजना पैदा होती है। इसे वॉर्न के अपनी टीम और दूसरी टीमों में अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ हिसाब चुकाने के एक तरीके के रूप में भी देखा गया था। इस किताब से ऐसा लगता है जैसे वार्न टॉप 50 के छपने के बाद से कुछ नरम हो गए हों। इस किताब ने वॉर्न को एक मंच भी दिया है, जिसके जरिये उन्होंने अपने फैसलों के लिए सफाई भी दी है। जैसे आखिर सचिन तेंदुलकर ब्रायन लारा से रैंक के मुकाबले में आगे क्यों हैं। टाइम्स के टॉप 50 में कुछ ऐसे भी चेहरे थे, जिनका जिक्र वॉर्न नहीं कर पाए थे, लेकिन उन्होंने वॉर्न की इस किताब में अपनी जगह जरूर बना ली है। इस किताब में 100 नाम हैं। किताब में फेहरिस्त के मुकाबले दोगुनी जगह मिलनी है।

इस फेहरिस्त में श्रीलंका के खिलाड़ी अर्जुन रणतुंगा को 93वां स्थान मिला है, जिनके साथ वॉर्न (और दूसरे ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों) की लंबी बहस हुई थी। यह अलग बात है कि रणतुंगा इस किताब में अपने नाम को अंत में भी शामिल कराना नहीं चाहते हों क्योंकि वॉर्न ने उनके बारे में कहा था कि 'उन्हें देखकर ऐसा लगता है, मानो उन्होंने पूरी भेड़ खा ली हो।'मजे की बात तो यह है कि वॉर्न भी कभी दुबले-पतले नहीं रहे और वजन घटाने के लिए उन्होंने दवाओं तक का इस्तेमाल किया और जब पकड़े गए तब उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।वॉर्न की इस किताब में शामिल होने का सम्मान दो कप्तान को हासिल हुआ। दूसरे कैप्टन सौरव गांगुली रहे, जो रणतुंगा की ही तरह ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों का दर्द बन गए। इस किताब में उन्हें रणतुंगा से 3 पायदान नीचे 96वें पायदान पर रखा गया है।

वॉर्न ने किताब में गांगुली के बतौर कप्तान और खिलाड़ी कुछ ऐसे वाकयों को लिखने का मौका नहीं गंवाया जहां उन पर उंगली उठाई जा सके। जहां दुनिया ऑफ-साइड मंद गति से खेलने वाले गांगुली की तारीफ करती नहीं थकती, वहीं वॉर्न ने काफी भद्र व्यवहार के साथ कहा, 'मैं पूरी तरह से तो नहीं, लेकिन हां, काफी हद तक यह कह सकता हूं कि औरों के मुकाबले वह लगातार बेहतर खेलते थे और असलियत में यह उनका एक गुण था।' वॉर्न के शब्दों में गांगुली की कप्तानी कुशलता के लिहाज से बेहद अच्छी तो नहीं कही जा सकती और वह अपने खिलाड़ियों का शानदार तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाए। इन दोनों कप्तानों के नाम के इस फेहरिस्त में शामिल होने के साथ ही वार्न का एक अहम मकसद भी पूरा हो गया।

टाइम्स में छपी उनकी टॉप 50 की फेहरिस्त के लिए उनकी आलोचना की गई थी कि इसमें सिर्फ उनके साथियों का ही नाम शामिल किया गया है। इस किताब में आगे कुछ विक्टोरिया की तरफ से खेलने वाले उनके साथियों के नाम भी शामिल हैं, हालांकि मर्व ह्यूज को वार्न ने 18वें पायदान पर रखा है, जबकि कपिल देव (43वें), वकार यूनिस (31वें), ऐलन डोनाल्ड (36वें) उनसे काफी नीचे हैं।हालांकि वार्न ने अपने ही कप्तान स्टीव वॉ की रेटिंग (26 वें) ऐसी की है कि कुछ भी कहा नहीं जा सकता। वॉ भाइयों में से बड़ा भाई अपने समय में सबसे साहस वाला बल्लेबाज माना जाता था। उन्हें संकटमोचक खिलाड़ी कहा जाता था, जिसके मैदान पर रहते टीम को मैच अपनी मुट्ठी में रहने का भरोसा होता था।छोटे भाई मार्क वॉ को इस फेहरिस्त में 9वें पायदान पर रखा गया है। 1990 के दशक के बीच में जब ऑस्ट्रेलिया की टीम वेस्ट इंडीज को उसी की जमीन पर पछाड़ कर सबसे बेहतर टेस्ट टीम बनी थी तो उसकी वजह स्टीव वॉ की बल्लेबाजी थी। वॉ की कप्तानी में ऑस्ट्रेलियाई टीम एक नए मुकाम पर पहुंची और टेस्ट क्रिकेट की शक्ल ही बदल गई। उसमें इतनी तेजी से रन बनाए जाने लगे कि मैच ड्रॉ होने का सवाल ही नहीं रहा।हालांकि वॉ की तारीफ में पढ़े जाने वाले कसीदे ऐलन बॉर्डर (चौथा पायदान) और मार्क टेलर (12वां पायदान) से पहले ही खत्म हो गए। वॉ के करियर की शुरुआत इन्हीं दो कप्तानों के साथ हुई, जिनके हाथों में ऑस्ट्रेलियाई टीम की कमान थी। ये भी इत्तेफाक है कि वॉ के कप्तान बनते ही वॉर्न को कप्तानी मिलने की उम्मीद खत्म हो गई और ये दोनों कभी बहुत अच्छे दोस्त नहीं रहे।लेकिन जैसा वॉर्न ने एक जगह कहा भी है, आखिरकार ये उन्हीं की किताब है। और इसमें आपको वही पढ़ने को मिलेगा जो वॉर्न चाहते हैं।


पुस्तक समीक्षा

शेन वर्र्न्स सेंचुरी: र्माई टॉप 100 टेस्ट क्रिकेटर्स

लेखक: शेन वॉर्न

प्रकाशक: मेनस्ट्रीम पब्लिशिंग

कीमत: 525 रुपये

पृष्ठ: 320



http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=13291

Thursday, April 9, 2009

मुकाबला करें, पर पर्यावरण को रखें याद

सुबीर रॉय

इस किताब का महत्त्व इसके प्रकाशन के इतिहास में छुपा हुआ है।

लेखकों को याद है कि वर्ष 2006 में इस किताब को इस उम्मीद के साथ प्रकाशित किया गया था कि कारोबारियों को उनकी रणनीतियों में पर्यावरण को शामिल करने के लिए प्रेरित किया जा सकेगा।
इस किताब के प्रकाशन का समय बिल्कुल उपयुक्त ही नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव लेखकों की उम्मीदों से काफी अधिक दिखाई दिया। पहले जहां शायद ही कोई इक्का-दुक्का कंपनी पर्यावरण के जोखिमों और उसकी लागत पर ध्यान देती थी, वहीं अब ज्यादा से ज्यादा कंपनियां पर्यावरण के साथ लगातार विकास करने और मुनाफा कमाने की राह देख रही हैं।
इस संशोधित पेपरबैक संस्करण में लेखकों ने वाकयों पर नजर डालते और अध्ययन के दौरान कॉर्पोरेट जगत के नवीन चलनों का जिक्र किया है और नई सामग्री को इसमें शामिल किया है। अगर आम तर्क को देखें तो उसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है, बल्कि वह पहले के मुकाबले और भी कड़ा और मजबूत हो गया है।

पहले जब यह किताब लिखी गई थी और अब जब इसका संशोधित संस्करण पढ़ने को मिल रहा है तब यह बात कंपनियों के लिए 'अनिवार्य' हो गया है कि वे उनकी कारोबारी रणनीति में पर्यावरण और निरंतरता पर ध्यान दें।
येल आए दोनों लेखकों के रास्ते तो अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों की एक समान चिंता का विषय है। डेनियल एस्टी अमेरिका की पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी से आए हैं और उन्होंने कंपनियों के साथ उनकी रणनीतियों में सुधार के लिए 15 साल का अपना वक्त दिया है। वहीं दूसरे लेखक ऐंड्रयू विंस्टन ने मार्केटिंग एवं रणनीति में अपने 10 साल दिए हैं।

वर्ष 2003 में येल में बतौर फैकल्टी इन दोनों को एक साथ कॉर्पोरेट की पर्यावरण संबंधी रणनीति को परखने का काम मिला और इन चीजों के साथ-साथ यह किताब भी इसी शोध का नतीजा है। अपने इस शोध के लिए लेखकों ने 300 से भी अधिक लोगों और 100 कंपनियों से बातचीत की थी।
किताब की शुरुआत ही इस बात से होती है कि कैसे और क्यों पर्यावरण सभी आकार के कारोबारों के लिए एक गंभीर रणनीतिक मुद्दे के रूप में उभर कर आया। इसके बाद किताब में ही पर्यावरण संबंधी प्रमुख कंपनियों की पर्यावरण-अनुकूल रणनीतियों का विश्लेषण किया गया है।

इस तरह से दुनिया की ऐसी 50 कंपनियों की पहचान की गई हैं, जो पर्यावरण-अनुकूल बने रहने के लिए अपनी कारोबारी रणनीतियों में इस मुद्दे को गंभीरता से लेती हैं। इनमें से 25 अमेरिका की हैं जबकि बाकी दुनिया के अलग-अलग कोने में हैं।
अमेरिका की कंपनियों की फेहरिस्त में जॉनसन ऐंड जॉनसन, डुपॉन्ट, डाऊ, एचपी, फोर्ड, स्टारबक्स, इंटेल और मैकडॉनल्ड्स शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय फेहरिस्त में बीपी, शेल, टोयोटा, सोनी, यूनिलीवर, लाफार्ज, ऐल्कैन और सीमेंस शामिल है।

प्रमुख कंपनियों ने अपने खर्च कम किए हैं और अपनी पूरी शृंखला में पर्यावरण सबंधी खर्चों में कटौती की है। इसके अलावा उन्होंने उनके परिचालन कार्यों, आपूर्ति शृंखला, में पर्यावरण संबंधी और नियामक जोखिमों को पहचान कर उन्हें कम किया है और ऐसे उत्पादों को लोगों तक पहुंचाया है जो पर्यावरण के लिहाज से बेहतर है और ग्राहकों की ओर से पसंद किए जाते हैं।
ऐसे उत्पादों की बिक्री से उन्होंने कमाई करने की कोशिश भी की है। इसी के साथ उन्होंने पर्यावरण अनुकूल होने के अपने मार्केटिंग प्रयासों के जरिये ऐसी ब्रांड वैल्यू बनाई है जो बेशक दिखाई नहीं देती हो, लेकिन इसके फायदे कंपनियों को खूब होते हैं। ऐसी कंपनियों के साथ आज ग्राहक जुड़ने के बारे में सोचते हैं।

हरियाली से कमाई का खेल खेलने में महारत हासिल करने के लिए कंपनियों को सबसे पहले एक मानसिकता अपनाने की जरूरत है और उन्हें कॉर्पोरेट रणनीति में पर्यावरण संबंधी सोच पर ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए उन्हें उनके पर्यावरण संबंधी प्रदर्शन का जायजा लेने और ऐसे मामलों को समझने की जरूरत है, जिनसे वे प्रभावित होते हैं।
इसके बाद उन्हें अपनी पूरी शृंखला में बदलाव लाने और उन्हें ऐसी पर्यावरण अनुकूल संस्कृति का विकास करने की जरूरत है जो ऊपर से नीचे तक हर जगह उनकी कंपनी में फैल जाए। पर्यावरण अनुकूल रणनीति में छोटी-मोटी अड़चनों पर नहीं बल्कि अल्पावधि-मध्यावधि और दीर्घावधि पर ध्यान देना चाहिए।

इन कंपनियों ने तेजी से उभरते हुए एक अहम सच 'अर्थव्यवस्था और पर्यावरण आपस में गहरे जुड़े हुए हैं' पर अपनी प्रतिक्रिया दी और लेखकों ने यह अनुमान लगाया कि जल्द ही 'कोई भी कंपनी अपनी रणनीति में पर्यावरण संबंधी मामलों को शामिल किए बगैर उद्योग में अपना दबदबा कायम नहीं कर पाएगी और लगातार मुनाफा भी नहीं कमा पाएगी।'
यह मुख्यतया दो कारणों से होगा- प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों का अभाव और 'ऐसे लोगों का समूह जो कारोबारी समुदायों को इस दिशा में कदम उठाने के लिए मजबूर कर रहा है।' आमतौरपर सिविल सोसायटी और खासतौर पर पर्यावरण संबंधी गैर-सरकारी संगठन एक दबाव बनाने वाले संगठन के रूप में उभरे हैं। '


ई-मेल, वेब, सोशल नेटवर्किंग और दूसरे आधुनिक संपर्क से जुड़ी प्रौद्योगिकी के बिना गैर-जिम्मेवार कंपनियों के खिलाफ एक साथ कदम उठाना कभी आसान नहीं होता। और सक्रिय हिस्सेदारों, जिनमें बड़ी संख्या में मुख्यधारा की निवेशक कंपनियां भी शामिल हैं, के कानों में उनकी आवाज पड़ने लगी है।' इससे कई अलग-अलग उद्योगों के भविष्य पर प्रभाव पड़ रहा है।
कोयले का क्या होगा? अगर यह उद्योग जीवित रहा तो क्या आगे भी बना रहेगा? अध्ययन में यह भी बताया गया है कि कंपनियों को पर्यावरण अनुकूल बनने के लिए क्या-क्या करना पड़ा। ऐल्कैन ने 22.5 करोड़ डॉलर जितनी बड़ी रकम जहरीले अपशिष्ट पदार्थ, जो एल्युमीनियम बनाते हुए खांचों के नीचे जमा हो जाता है, को दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाने में खर्च करने पड़े।

इतने से न सिर्फ ऐल्कैन के अपशिष्ट की समस्या का समाधान नहीं निकला, बल्कि कंपनी प्रतिद्वंद्वियों के अपशिष्ट को भी एक कीमत लेकर खत्म कर सकती है। टोयोटा 21वीं शताब्दी की कार पर दोबारा नजर डाल रही है और कंपनी ने हाइब्रिड प्रियस का प्रयोग किया है, जिसके लिए ग्राहक इंतजार करने और मोटी रकम देने को भी तैया होंगे।
ट्रैक्टर बेचने वाले जॉन डीरे ने किसानों की फसल के लिए पवन ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए मदद को एक इकाई लगाई है। और पर्यावरण अनुकूल रणनीति में जबरदस्त प्रभाव दिखाई देगा, जब बड़े कारोबारी जैसे वॉल-मार्ट और मैकडॉनल्ड्स अपनी आपूर्ति शृंखलाओं में पर्यावरण संबंधी रणनीतियों को लागू करेंगे।

कारोबार के लिए दुनिया बदल रही है, क्योंकि पर्यावरण को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ रही है और नियामक इस दिशा में कदम भी उठा रहे हैं। भला इसमें भारतीय आंकड़े क्या कहते हैं? इस मामले में देश निश्चित रूप से सार्वजनिक जागरूकता और नियामक स्तर पर काफी लंबा रास्ता तय करके आया है, क्योंकि इंदिरा गांधी ने अकेले ही साइलैंट वैली के खात्मे को रोक दिया था।

बाजवूद इसके अब भी काफी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। कई कारोबार पर्यावरण संबंधी चिंताओं को रास्ते में बाधा मानते हैं और यहां तक कि कई प्रबंधक अपनी परियोजनाओं के मामले में पर्यावरण संबंधी अनुमति को एक बाधा बताते हैं। आईटीसी को वेवराइडर बनने की चाहत है और वह दिन काफी अहम होगा, जब अंतरराष्ट्रीय 25 कंपनियों की फेहरिस्त में इसका नाम भी शामिल होगा।


ग्रीन टु गोल्ड

संपादन: डेनियन सी एस्टी और ऐंड्रयू एस विंस्टन

प्रकाशक: वाईयूपी

कीमत: 19.95 डॉलर

पृष्ठ: 380

Wednesday, April 8, 2009

फिल्म नगरी से सेट की दुनिया तक

अभिलाषा ओझा

मीडिया और मनोरंजन उद्योग पर लगातार नजर बनाए हुए पत्रकारों को अनिल सारी की हिंदी सिनेमा : ऐन इन्साइडर्स व्यू काफी आकर्षक लगेगी।


यह किताब स्वर्गीय सारी के देश के प्रमुख समाचार पत्रों और आज अपनी पहचान को तरस रहीं कुछ पत्रिकाओं में छपे लेख व निबंधों का संग्रह है। सारी के वर्ष 2005 में आकस्मिक निधन के बाद प्रकाशित इस किताब के प्रति लगाव और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह भारत के काफी वरिष्ठ फिल्म आलोचकों में से एक की सोच को सबके सामने लाती है।
इस किताब में फिल्म उद्योग पर बारीकी से नजर डाली गई है, जिस कारण हिंदी सिनेमा सभी को पसंद आए ऐसा नहीं है। सीधे-सीधे कहें तो कंटेंट के मामले में यह काफी मजबूत है और इसमें काफी व्यापक शोध दिखाई देता है। 'इन्साइडर्स व्यू' होने के बावजूद इसमें फिल्मी दुनिया की चकाचौंध का अंश भी नजर नहीं आता, जो आमतौर पर हिंदी सिनेमा से जुड़ा हुआ है।
दूसरे शब्दों में कहें तो सारी की किताब लेखन के लिहाज से सबसे बढ़िया के स्तर पर नहीं पहुंच पाई है, खासतौर पर 'रैग्स टु रिचेस स्टोरीज मेड रियल - को पढ़ते-पढ़ते मुझे नींद आने लगी।' लेकिन इस किताब को पढ़ने के दौरान शायद ही ऐसा लगा हो कि लेखक को अपने हिंदी फिल्मों पर अनगिनत विचारों को पाठकों तक पहुंचाने में मुश्किल आई हो।
साथ ही चूंकि भारतीय फिल्मों पर बहुत सारी अकादमिक किताबें तो मौजूद नहीं हैं, इसलिए हिंदी सिनेमा कम से कम चयनित मीडिया वर्ग में उत्तेजना तो पैदा कर पाई है। सच तो यह है कि मैं हाल ही में किताब के साथ फिल्म निदेशक दीपा मेहता से मिली और उन्होंने तुरंत ही किताब का नाम लिखना शुरू कर दिया, यह कहते हुए कि वह भी इस किताब को खरीदना चाहती हैं।
पुस्तक का सबसे मजबूत पहलू यही है कि इसमें एक ऐसे पत्रकार के लेख और निबंध प्रस्तुत किए गए हैं, जिसने सिर्फ और सिर्फ भारतीय सिनेमा को समझाने के लिए इन्हें लिखा। इससे भी अहम बात यह है कि उसने भारतीय सिनेमा के हरेक पहलू का भरपूर लुत्फ उठाया था।
खुद को गुरु दत्त के प्रशंसक कहने वाले सारी ने अपनी किताब में भी 'दी मेकर्स ऑफ पॉपुलर सिनेमा' के तहत 'अ चेला सैल्युट्स गुरु दत्त' प्रकाशित किया है। उनके यहां प्रकाशित सभी लेखों या निबंधों में देखा गया है कि उन्होंने फिल्मों के प्रारूप का अध्ययन किया है और देश में अमीर-गरीब तबकों में होने वाले बदलावों के साथ उन्हें जोड़ कर देखा है। इससे भी ज्यादा अक्सर अपने लेखों में जादू बिखेरते हुए वे हिंदी फिल्मों की चमक-धमक के पीछे छिपे तर्कों पर पाठकों को पूरी तरह सहमत कर पाने में भी सफल रहे।
मिसाल के तौर पर फिल्म 'प्यासा' के यादगार गीत 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' के अध्ययन में लेखक के मुताबिक, '....इस गाने की आत्मा पीछे चली जाती है... कबीर के पास और उस समय में जब सभी उलझनों से निपटने के लिए लोग भक्ति की शरण में पहुंचते हैं। और उस समय जब माया की काल्पनिक दुनिया की तरफ भारतीयों के भावों में।'
सेटों पर आकर्षित रिपोर्टें, शूटिंग की जगहों और फिल्मों के शेडयूल को जिस तरह उन्होंने अपने काम में बुना है- उसका जिक्र भी हिंदी सिनेमा में मिलता है। इससे ज्यादा क्या हो सकता है कि जिस सिनेमा को आज हम देख रहे हैं उसमें वह जीवंत हो उठता है। साथ ही इस किताब के जरिये मुंबई फिल्म नगरी की कम दिखलाई देने वाली झलक मिल जाती है और साथ ही यह भी पता चलता है कि वह काम कैसे करती है।
इस किताब में से मेरा एक पसंदीदा निबंध है, 'आर्किटेक्चर ऑफ इल्यूजन' जो एक राष्ट्रीय दैनिक में 1994 में प्रकाशित हुआ था। इस समाचार पत्र में सारी काम किया करते थे। जहां उन्होंने हिंदी फिल्मों में कला निर्देशकों के योगदान का जिक्र किया है, वहीं उन्होंने 'धड़कनों को थमा देने वाले आर्किटेक्चरल विशाल सेट' पर भी अपना अनुभव पाठकों के साथ बांटा है।
यह विशाल सेट बतौर निर्माता टुटु शर्मा की फिल्म 'राजकुमार' का था, जिसमें माधुरी दीक्षित और अनिल कपूर ने काम किया था, लेकिन किसी को यह मालूम नहीं था कि यह फिल्म हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी असफल फिल्म रहेगी।
इस फिल्म के लेखक विनय शुक्ला के मुताबिक, 'दो राज घरानों की दुश्मनी पर आधारित यह फिल्म राजस्थानी पृष्ठभूमि पर बनाई गई है।' उनका यह दावा था कि फिल्म रिकॉर्ड बनाएगी, लेकिन उनके यह दावे धराशायी हो गए। फिल्म के सेट पर मौजूदा बीबीसी की एक यूनिट के शब्दों में, '7,000 लकड़ी के लट्ठे, जिन पर मिस्र शैली में नक्काशी थी और जिन्हें ग्रीको-रशियन खंभों में तब्दील किया गया, शूटिंग के समाप्त होने पर लगभग 30 दिन बाद मिट्टी में मिल गए।'
चार भागों में बंटे हुए हिंदी सिनेमा में 35 लेखों का संग्रह है। ये चार भाग हैं: 'दी एस्थेटिक फाउंडेशंस ऑफ दी हिंदी फॉर्मूला फिल्म', 'थीम्स ऐंड वैरियेशंस ऑफ इंडियन सिनेमा', 'पर्सपेक्टिव्स ऑन इंडियन सिनेमा' और 'मेकर्स ऑफ पॉप्युलर सिनेमा'।
इस किताब को पढ़ने के बाद दिल में सिर्फ एक ही ख्वाहिश उठती है कि काश सारी से बात करना संभव होता। 'हिंदी सिनेमा : ऐन इन्साइडर्स व्यू' एक ऐसा संवाद है जिसकी शुरुआत बेहद खूबसूरत है और पाठक का मन होता है कि यह आगे भी जारी रहना चाहिए। इसीलिए तो इसे अच्छी किताब की संज्ञा दी जा सकती है।

पुस्तक समीक्षा

हिंदी सिनेमा: ऐन इन्साइडर्स व्यू

लेखक : अनिल सारी

प्रकाशक : ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

कीमत: 495 रुपये

पृष्ठ: 6 + 222


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Tuesday, April 7, 2009

'खुलासे' का किया खुलासा

ए. के. भट्टाचार्य

देश में 24*7 टेलीविजन समाचार चैनलों की मौजूदगी दर्ज होने से बहुत पहले ही अंग्रेजी में भारत की पहली विडियो समाचार पत्रिका पेश करने का श्रेय मधु त्रेहन को जाता है। मधु ने बेहतर शोध के बाद उस समय मौजूदा सरकार के चेहरे पर से पर्दे हटाने वाले मीडिया प्रयासों पर एक किताब लिखी है।

साथ ही उनकी यह किताब सभी को हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, प्रणालियों और संस्थानों की खूबियां और खामियों से रूबरू कराती है। उनकी किताब का विषय एक वेबसाइट,तहलका की ओर से किया गया स्टिंग ऑपरेशन है।

13 मार्च, 2001 को देशभर का मन खट्टा हो गया, क्योंकि उस दिन केंद्रीय सत्ता में मौजूद नेताओं का ऐसा मिलन देखने को मिला था, जिसमें उन्हें पैसे लेते हुए या फिर उनकी जुबानी उनकी पार्टियों के लिए पैसे लेते हुए सुना गया।

उन्होंने ये पैसे लिए भी तो उस व्यक्ति से, जिसका दावा था कि वह एक हथियारों का कारोबार करने वाली कंपनी का एजेंट है। तहलका की टेपों ने उससे कहीं ज्यादा खुलासा किया- एक सेना अधिकारी और उसके सहायक कुछ हजार रुपयों और एक महिला के साथ के बदले गुप्त दस्तावेज एजेंट को सौंप रहे थे।

तहलका खुलासे के बाद जो हुआ वह भी कम नहीं था। जहां कैमरे में कैद कुछ नेताओं पर ऐसा दबाव बनाया गया कि वे अपने-अपने इस्तीफे दे दें। जांच में सेना अधिकारियों को भी दोषी पाया गया और उन्हें निकाल दिया गया, वहीं दूसरी तरफ सरकारी तंत्र हरकत में आ गया ताकि पता चल सके कि कहीं इस 'स्टिंग' ऑपरेशन के पीछे कोई साजिश तो नहीं।

एक आयोग की जांच-पड़ताल साजिश को ध्यान में रखकर शुरू हुई, जिसके साथ इस खुलासे की योजना बनाने वाले सभी पत्रकारों पर हर तरह के दबाव डाले जाने लगे। तहलका के निवेशकों को काफी प्रताड़ित किया गया और उन्हें आर्थिक अपराधों को अंजाम देने के लिए आरोपी ठहराया गया। इसके लिए उनमें से एक को जेल तक भेजा गया।

जैसा कि त्रेहन अपनी इस किताब में कहती हैं, तहलका टेपों और उसके बाद के मामलों से पता चलता है कि भारत का प्रशासन तंत्र कितना दूषित हो चुका है। ऊंचे पदों पर जिनमें सत्ताधारी पार्टी के राजनेता भी शामिल हैं, भ्रष्टाचार अपने पैर पसार चुका है।
लेकिन जब कभी भ्रष्टाचार के इस तरह के मामले सामने आते हैं, सरकार को भारी चोट लगती है और वह अक्सर मामले का भांडा फोड़ करने वाले को चुप कराने के अपने प्रयास में सफल भी हो जाती है।

लोगों की स्मृति में ये मामले जल्द धुंधले पड़ जाते हैं और भारतीय मीडिया कभी-कभार ही इस तरह के मामलों की गहराई में जाता है। कोई कभी इस ओर ध्यान नहीं देता कि सरकार ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग तो नहीं किया और सरकार की ओर से पत्रकारों को किसी भ्रष्टाचार के मामले का खुलासा करने से रोकने के लिए लुभाने की कोशिश तो नहीं की गई या मीडिया की ओर से भ्रष्टाचार का खुलासा करने का तरीका सही था या नहीं।

यह जानकारी मिलने से पहले ही मीडिया किसी दूसरी बड़ी घटना या अगले घोटाले को कवर करने के लिए आगे बढ़ जाता है। फलस्वरूप, कोई यह नहीं जान पाया कि क्या तहलका खुलासे के पीछे वाकई कोई साजिश थी और क्या तहलका के निवेशकों के खिलाफ सरकारी कार्रवाई करना उचित था या नहीं।

त्रेहन की यह किताब तहलका 'स्टिंग' ऑपरेशन के करीबी मामलों पर हमारी समझ, हमारी सोच के अंतर को भरने के लिए एक गंभीर प्रयास है। उन्होंने तहलका और इस खुलासे से जुड़े लोगों के साथ 40 साक्षात्कारों का सहारा लिया है।
इस प्रक्रिया के दौरान हमें 'स्टिंग' ऑपरेशन को अंजाम देने वाले कुछ पत्रकारों (वाकई वे पत्रकार थे?) के बारे में जानने का मौका मिला है। हमने जाना कि प्रेस काउंसिल की आचार संहिता से कैसे कुछ संपादक अपरिचित हैं ।

कैसे सरकारी वकील आरोपी को जमानत नही दिए जाने की खातिर अदालतों को मना पाने में कामयाब रहे या तहलका टेप में जिनके चेहरे पहचाने जा रहे हैं उनमें से कुछ क्यों परस्पर विरोधी बातें कह रहे हैं, जबकि खुलासे के दौरान उन्होंने कुछ और ही कहा था।
किताब में इस बात के भी कुछ संकेत दिए हैं कि कैसे वरिष्ठ तहलका पत्रकार खुलासे के लिए किसे ज्यादा श्रेय जाए इस बात पर भी गुटों में बंट गए। साथ ही तहलका के कुछ शुरुआती निवेशक परियोजना से अलग क्यों हो गए, इस बात का स्पष्टीकरण भी उतना ही दिलचस्प है।
विन्यास के नजरिये से देखें तो यह किताब थोड़ी ढीली है और निश्चित रूप से इसका संपादन भी कुछ बेहतर हो सकता था। लेकिन इस किताब की एक खूबी है। एक बार जब आप किताब का पहला अध्याय पढ़ लेंगे, जिसमें किताब के केंद्र बिंदु का जिक्र किया गया है, फिर आप तहलका मामले के विभिन्न पहलुओं की जानकारी हासिल करने के लिए बचे हुए 27 अध्यायों में से किसी को भी चुन सकते हैं।
इस किताब में साक्षात्कारों का इस्तेमाल इस तरह से किया गया है कि वे किसी भी अध्याय में प्रवाह को तोड़ते नहीं हैं। अब तक किताब किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंची कि आखिर हुआ क्या था।
वेबसाइट के संपादक तरुण तेजपाल का कहना है कि उन्होंने अपने प्रतिनिधि को लंदन में हिंदुजा से मिलने जाने दिया, लेकिन उन्होंने खुद यह फैसला किया कि जिस भवन में यह बैठक हो रही है, वे वहां नहीं जाएंगे। क्या तहलका प्रवर्तकों के दिमाग में 'स्टिंग' ऑपरेशन करने के लिए कुछ और ही एजेंडा था? इस सवाल का कोई साफ जवाब नहीं है।

त्रेहन का कहना है कि किसी घटना को समझने या उसके पेश करने के अलग-अलग लोगों के तरीके अलग-अलग होते हैं यानी सच्चाई कई तरह की होती है। उद्देश्यपूर्ण तरीके से त्रेहन की अलग-अलग सच्चाई को पेश करने की क्षमता और जल्द निष्कर्ष पर पहुंचने की लालसा को बनाए रखना काबिल-ए-तारीफ है। यह किताब, किताब कम और तहलका मामले पर शोध करने वालों के दस्तावेज अधिक लगती है।


पुस्तक समीक्षा

प्रिज्म मी ए लाइ टेल मी ए ट्रूथ तहलका एज मेटाफर

लेखिका : मधु त्रेहन

प्रकाशक: रोली बुक्स

कीमत: 595 रुपये

पृष्ठ: 616



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Sunday, April 5, 2009

हिंदू-मुसलमानों पर उठते सवालों का जवाब

सुनील जैन

क्या देश की अदालतों में मुस्लिमों से भेदभाव किया जाता है, जैसा कि अक्सर इल्जाम लगता है कि स्थानीय पुलिस हिंदुओं के मुकाबले उन्हें ज्यादा गिरफ्तार करती है?

क्या न्यायिक प्रणाली सिर्फ आंख बंद कर फैसला देती है और आतंकवाद के आरोपियों को बिना एक निष्पक्ष मुकदमे के उन्हें सजा दे देती है? क्या विभिन्न अदालतों और न्यायाधीशों के फैसलों का पहले अनुमान लगाया जा सकता है जैसा जॉन ग्रिशैम ने 'दी रनवे जूरी' में किया था?

क्या कमजोरगठबंधन सरकार की मौजूदगी अदालतों के किसी तरह के फैसले पर असर डालती है? जब कभी आप भारत की न्यायिक प्रणाली के बारे में सोचते हैं तो इस तरह के कई और सवाल भी खुद-ब-खुद दिमाग में आ जाते हैं।
कोलंबिया से राजनीतिक विज्ञान में पीएचडी शैलाश्री शंकर जो ऑस्टिन की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस में असिस्टेंट प्रोफेसर थीं और अब नई दिल्ली में पॉलिसी रिसर्च सेंटर में काम कर रही हैं, ने इन और ऐसे कई सवालों के सटीक जवाब देने की कोशिश की है।

अदालतों के अलग-अलग फैसलों के रूप में चरणों में दिलचस्प लेखन के अलावा शंकर ने अपने तर्कों को अलग आयाम देने के लिए दिलचस्प अर्थमितीय उदाहरणों का सहारा लिया है।

नतीजतन, लगभग इस किताब के अहम हिस्से के लगभग 200 पृष्ठ आसानी से एक बार में ही पढ़े जाते हैं। यह किताब मनुपात्र में दिए गए फैसलों पर आधारित है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय और अलग-अलग उच्च न्यायालयों के फैसले बड़ी तादाद में शामिल हैं।

जैसा कि आप उम्मीद करेंगे अदालतों ने लीक से हटकर फैसले दिए हैं। ये फैसले आपातकाल के दिनों से लेकर अत्यधिक सक्रियता के हैं। लेखक ने इसे बताने के लिए काफी अच्छे उदाहरणों का सहारा लिया है: जैसे प्रधान न्यायाधीश बेग 1978 में सेवानिवृत्त होने को ही थे, सार्वजनिक जीवन से जुड़ी 52 हस्तियों और वकीलों ने बॉम्बे मेमोरेंडम में सरकार से अपील की कि वह न तो न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ और न ही न्यायमूर्ति भगवती को नियुक्त करें।

उनका तर्क था कि उन्होंने काले कानूनमीसा को लागू करने के सरकार के अधिकार को बरकरार रखा था। दो वर्ष बाद, न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने मुकदमे के दौरान खुद में इस्तीफा न दे पाने की हिम्मत को लेकर माफी मांगी। दूसरे शब्दों में कहें तो न्यायाधीश इंसान भी हैं, और जनता के बीच अपनी वैधानिकता भी चाहते हैं।

सौभाग्य से लेखिका ने यह किताब लिखने के लिए जो तथ्य जुटाए हैं, उनसे पता चलता है कि न्यायमूर्ति अपनार् कत्तव्य भूल कर अपनी वैधानिकता पाने की कोशिश नहीं करते। सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने वर्ष 2005 में 1,700 मामलों की सुनवाई की।

यह संख्या अपने आप में काफी चकरा देने वाली है। इनमें से कुछ उदाहरणों को यहां पेश किया गया है: वर्ष 1985 से 1995 के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महज 35 प्रतिशत टाडा के मामले सुनवाई के लिए आए। अदालत में पेश इनमें से 57 प्रतिशत मामले ही राज्य के पक्ष में गए।

वर्ष 1950 से 1970 के दौरान निवारक निरोधक के मामलों में से सिर्फ 53 प्रतिशत ही ऐसे थे जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे। इनमें से 74 प्रतिशत मामलों का फैसला राज्य के हक में हुआ। टाडा के मामले में एक न्यायाधीश द्वारा आरोपी के पक्ष में आदेश दिए जाने की संभावना निवारक निरोधक मामले की तुलना में 48 प्रतिशत अधिक थी। इससे आपातकाल के बाद न्यायपालिका के नजरिये में परिवर्तन का संकेत मिलता है।

टाडा के मामलों में अगर कोई मुस्लिम याचिकाकर्ता है तो ऐसे मामले में राज्य के पक्ष में फैसला दिए जाने की संभावना 38 प्रतिशत कम थी (इससे प्रदर्शित होता है कि पुलिस दूसरे समुदायों की तुलना में अक्सर मुस्लिमों को ज्यादा पकड़ती है, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि अगर मुस्लिमों के खिलाफ हिंदू पक्षपात है तो निश्चित ही न्यायाधीशों में यह बिल्कुल नहीं झलकता।)

ऐसे मामलों में जिनमें आरोपी मुस्लिम था, हिंदू न्यायाधीशों के फैसले राज्य के पक्ष में 34 प्रतिशत कम रहने की संभावना थी। (सर्वोच्च न्यायालय में 87 प्रतिशत हिंदू न्यायाधीश।) गठजोड़ अल्पमत सरकारों के दौरान न्यायधीशों के राज्य के खिलाफ फैसला दिए जाने की संभावना 27 प्रतिशत अधिक थी। संसद पर हमले के बाद फैसले राज्य के पक्ष में अधिक लगे।
आधे से तीन-चौथाई मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के 40 प्रतिशत न्यायाधीश राज्य के पक्ष में रहते हैं, जबकि आधे से भी कम मामलों में वे 24 प्रतिशत राज्य के पक्ष में नहीं रहते हैं। सोचिए कि इन आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद मुकदमा लड़ने वालों को कैसे फायदा होगा।

लेकिन इस तर्क में कुछ खामियां भी हैं- मिसाल के तौर पर हर मामले को एक ही नजर से देखा जाता है, जबकि उनमें से कुछ निश्चित तौर पर ज्यादा अहम होते हैं। बीएमडब्ल्यू मामले में हमने देखा, कि मामला मजबूत होने के बावजूद भी कई बार सरकार आरोपी को सजा नहीं दिला पाती। यह फेहरिस्त काफी लंबी है।

इस किताब का उद्देश्य न्यायिक प्रणाली की सराहना करना या उसकी निंदा करना नहीं है। बल्कि इसके पीछे अदालती रवैये में पैटर्न को सामने लाना है। और उनके लिए सफाई की तलाश करना है। इस स्तर पर यह सराहनीय कार्य है। और यह पढ़ने के लिहाज से उत्कृष्ट है।


पुस्तक समीक्षा

स्केलिंग जस्टिस इंडियाज सुप्रीम कोर्ट, एंटी-टेरर लॉज ऐंड सोशल राइट्स

लेखिका: शैलाश्री शंकर

प्रकाशक: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस

कीमत: 395 रुपये

पृष्ठ: 271

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यूं लिखी गई आईटी की कामयाबी गाथा


सुबीर रॉय

यह किताब बहुत अच्छे ढंग से हम तक ये सभी जानकारियां उपलब्ध कराती हैं। यह भारतीय आईटी उद्योग का व्यापक और विस्तृत इतिहास है। किताब की भाषा सरल है और इसमें एक प्रवाह दिखता है।

भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग की सफलता जगजाहिर होने के बाद मुख्यधारा के मीडिया ने सफलता की इस गाथा के बारे में छापने या प्रसारित करने में गहरी दिलचस्पी दिखाई है।
अब चूंकि साबित हो चुका है कि यह सफलता टिकाऊ है, इसलिए हमें यह जानने की जरूरत है कि इस सफर की शुरुआत कैसे हुई और कैसे यह उद्योग लगातार तरक्की करते हुए अपने मौजूदा स्तर तक पहुंचा है।
यह किताब बहुत अच्छे ढंग से हम तक ये सभी जानकारियां उपलब्ध कराती हैं। यह भारतीय आईटी उद्योग का व्यापक और विस्तृत इतिहास है। पुराने दस्तावेजों और आईटी उद्योग की दिग्गज शख्सियतों के साथ बातचीत ने इस को बेशकीमती बना दिया है। किताब की भाषा सरल है और इसमें एक प्रवाह दिखता है।
दिनेश शर्मा इस बात से शुरूआत करते हैं कि भारत में पहली बार कंप्यूटर कैसे चालू हुआ। इनमें कोलकाता के पास भारतीय सांख्यिकीय संस्थान में 1956 में लगाई गई मशीन शामिल है। मुंबई स्थित टाटा इंस्टीटयूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च ने 1960 में अपनी मशीन लगाई। इसका नाम टीआईएफआर ऑटोमोटिक कैलकुलेटर था।
उन दिनों पीसी महलनोबिस और होमी भाभा के बीच एक आकर्षक मुकाबला चल रहा था कि आखिर कौन अपने प्रतिष्ठानों में पहले कंप्यूटर केंद्र स्थापित कर पाता है। दोनों ही जवाहर लाल नेहरू के करीबी थे। इस मुकाबले में जीत भाभा के हाथ लगी। 1950 और 1960 के दशक के दौरान शुरूआती पीढ़ी के कंप्यूटरों में हार्डवेयर डिजाइन, सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग, रखरखाव और प्रशिक्षण की सुविधा थी।
जल्दी शुरूआत के साथ ही उन दिनों की सरकारी और राजनीतिक सोच के कारण देश में कंप्यूटरों का तेजी से प्रसार हुआ। पूरी तरह से आत्मनिर्भरता और प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण के संकल्प के कारण अधिक तेज गति से विकास हुआ। इलेक्ट्रॉनिक आयोग पूरी तरह से भारत में विकसित कंप्यूटर प्रणाली और कलपुर्जे हासिल करना चाहता था, क्योंकि अभी तक केवल कुछ खास प्रौद्योगिकी और कलपुर्जों के आयात की ही अनुमति दी गई थी।
इस दिशा में पहली बार पुख्ता सोच संतोष सोंधी समिति की रिपोर्ट आने के बाद तैयार हुई। इस समिति की स्थापना मोरारजी देसाई ने की थी। इस रिपोर्ट में कहा गया कि उद्योगों द्वारा कंप्यूटर आयात के लिए दिए गए प्रस्ताव की कोई जरूरत नहीं है और कंप्यूटरीकरण की पूरी कवायद ठंडे बस्ते में चली गई।
इसके बाद कंप्यूटर को लेकर सरकार की सोच में 1980 के दशक में उस समय से बदलाव आना शुरू हुए जब इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में आई और राजीव गांधी ने नीतियों को प्रभावित करना शुरू किया। यह उनके प्रधानमंत्री बनने से काफी पहले की बात है। इसलिए उनके सत्ता में आने से काफी पहले ही इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर और दूरसंचार के लिए उदारवादी नीतियों की जमीन तैयार की जा चुकी थी।
किताब में एक जगह शर्मा लिखते हैं कि 'अगर नेहरू भारतीय विज्ञान का राजनीतिक हिस्सा थे तो राजीव भारतीय प्रौद्योगिकी का राजनीतिक हिस्सा थे।' नेहरू के समय में राजनीतिज्ञों और वैज्ञानिकों के गठजोड़ से विज्ञान का विकास हुआ जबकि राजीव गांधी के वक्त में राजनीतिज्ञों और तकनीकविदों के गठजोड़ से प्रौद्योगिकी का विकास हुआ।
आयात पर अवरोध और विदेशी कंपनियों के साथ परिचालन के लिए सख्त नियम (इस कारण आईबीएम को 1978 में रुखसत होना पड़ा) का अच्छा असर भी दिखाई दिया और 1970 के दशक के अंत में और 1980 की शुरूआत में डीसीएम, एचसीएल और पीएसआई की अगुवाई में हार्डवेयर विनिर्माण के लिए भारतीयों ने प्रयास शुरू किए।
इन कंपनियों ने कैलकुलेटर, मिनी और माइक्रो कंप्यूटर और फिर पर्सनल कंप्यूटर बनाना शुरू किया। लेकिन 1980 के दशक में आयात और संयुक्त उद्योग को लेकर उदारवादी नीतियों के कारण प्रौद्योगिकी अंतर में कमी आई लेकिन इसका भारतीय शोध और विकास पर विपरीत असर देखने को मिला।
इसके अलावा आईटी क्षेत्र के विकास की राह में 1980 के दशक में पैदा हुए विदेशी मुद्रा संकट के कारण भी बुरा असर पड़ा। इस संकट के कारण शुल्कों को बढ़ा दिया गया। इस कारण हार्डवेयर कंपनी कारोबार के नए आयाम तलाशने के लिए मुड़ी और उनकी खोज सॉफ्टवेयर पर आकर पूरी हुई।
इस लोकप्रिय धारणा के विपरीत कि भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग की सफलता की गाथा में सरकार ने अहम भूमिका निभाई है, नेशनल सेंटर फॉर सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट ऐंड कंप्यूटिंग टेकि्क्स ने 1980 में करीब एक तिहाई सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को निकाल दिया।
भारतीयों की कौशल क्षमता के कुछ संकेत उस समय मिले जब एचसीएल ने 1989 में एक दुर्घटना के बाद अपने अमेरिकी परिचालन को बंद करने का फैसला किया और उसे बाद में अपना फैसला पलटना पड़ा क्योंकि ग्राहक एचसीएल के सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे और वे उनके वेतन का भुगतान करने के लिए भी तैयार हो गए।
यह सॉफ्टवेयर सेवाओं की शुरूआत थी। इसके बाद विदेशी परिचालन बढ़ता चला गया और सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी पार्क और सैटेलाइट संपर्क के कारण इसमें और तेजी आई। इसके अलावा किताब में कुछ और रोचक घटनाओं का जिक्र किया गया है। इसमें आईबीएम का उत्थान और पतन शामिल है। ऐसी ही एक घटना में बताया गया है कि कैसे रेलवे ने यात्री आरक्षण प्रणाली का कंप्यूटरीकरण किया।
यह जिम्मेदारी सीएमसी को सौंपी गई थी। इसके अलावा यात्रियों की स्थिति की जानकारी कंप्यूटरों के द्वारा रखी जाने लगी। रेलवे ने यह काम खुद करने का फैसला किया। शर्मा की किताब के निष्कर्ष की बात करें तो सरकार ने शुरूआत में इलेक्ट्रॉनिक्स और कंप्यूटर हार्डवेयर उद्योग की जमीन तैयार करने, उनका पोषण करने और उनके विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन सरकार की सहानुभूति सरकारी कंपनियों के साथ ही थी।
विदेशी पूंजी को लेकर पूर्वाग्रह के कारण भारत इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण के लिए अमेरिकी कंपनियों की अगवानी से वंचित रह गया, जो कि बाद में हांगकांग, ताइवान और सिंगापुर चली गईं। हालांकि इंदिरा गांधी के दूसरे कार्यकाल के दौरान सरकार का रुख पूरी तरह से बदल गया था। इस दौरान नीतियां मददगार थीं। उनके द्वारा की गई शुरूआत और 1991 के बजट में सॉफ्टवेयर निर्यात पर कर छूट के साथ ही सॉफ्टवेयर क्षेत्र में सफलता की इबारत लिख दी गई थी।

पुस्तक समीक्षा


द लॉन्ग रिवोल्यूशन

द बर्थ ऐंड ग्रोथ ऑफ इंडियाज आईटी इंडस्ट्री

लेखक: दिनेश सी शर्मा

प्रकाशक: हार्पर कॉलिंस इंडिया

कीमत: 595 रुपये

पृष्ठ: ४८८

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Tuesday, March 24, 2009

सफरनामा एक निवेश बैंक का

भूपेश भन्डारी

पिछले साल सितंबर महीने की 22 तारीख को अमेरिका के केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व ने गोल्डमैन सैक्स को बैंक होल्डिंग कंपनी बनने की इजाजत दे दी।

दरअसल, इस कवायद के बाद इसने फेडरल रिजर्व द्वारा दिए जा रहे बेलआउट पैकेज को लेने की पात्रता हासिल की। इसके बाद वित्तीय जगत में विलय और अधिग्रहण के मामलों का यह दिग्गज निवेश बैंक बचा तो रहेगा लेकिन अपनी मूल पहचान के साथ नहीं बल्कि एक सामान्य बैंक के तौर पर ही कायम रहेगा।

और इस तरह दुनिया के सबसे पुराने निवेश बैंक के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लग गए। सितंबर 2008 दुनिया के बड़े निवेश बैंकों के लिए बड़े बदलाव लेकर आया।

गोल्डमैन सैक्स और मॉर्गन स्टैनली सामान्य बैंक बन गए। जबकि लीमन ब्रदर्स तो दिवालिया ही हो गया और मेरिल लिंच, बैंक ऑफ अमेरिका के हाथों बिक गया।

लेकिन इन चारों में से कोई भी नाम गोल्डमैन सैक्स से बड़ा नहीं था। दुनियाभर में नामी गिरामी बिजनेस स्कूलों के छात्रों का सपना गोल्डमैन सैक्स में नौकरी करने का होता था तो बड़ी-बड़ी कंपनियां भी इसकी सलाह लेने के लिए लाइन लगा कर खड़ी रहती थीं।

वैसे, इसके अतीत की पड़ताल करने के लिए एक किताब से बेहतर कुछ और नहीं हो सकता जो इसकी शुरूआत से लेकर अब तक के बारे में सब कुछ बता सके। इसकी राह में आए उतार चढ़ावों का जिक्र कर सके तथा उन लोगों और सिद्धांतों के बारे में बता सके जिन्होंने इसकी सफलता में अहम भूमिका निभाई।

और किताब लिखने के लिए चार्ल्स डी एलिस से बेहतर शख्स और कोई नहीं हो सकता। दरअसल, उनका और गोल्डमैन सैक्स का साथ काफी पुराना है।

उन्होंने ग्रीनविच एसोसिएट्स नाम की कंसल्टेंसी सेवा की स्थापना की। ग्रीनविच पिछले तीस सालों से दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों के साथ काम कर चुकी हैं जिनमें से गोल्डमैन सैक्स भी एक हैं।

इस सबकी वजह से एलिस को न केवल गोल्डमैन सैक्स के अंदर की कई बातें मालूम होंगी बल्कि वह कई और बड़ी संस्थाओं से उसकी तुलना आसानी से कर सकते हैं। गोल्डमैन सैक्स की शुरुआत 1869 में जर्मनी से अमेरिका आए एक यहूदी मार्क्स गोल्डमैन ने की थी।

इसके तेरह साल बाद मार्क्स के दामाद सैमुअल सैक्स भी इसमें शामिल हुए और तब इसका नाम गोल्डमैन सैक्स किया गया। 1896 में इसे न्यू यॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में शामिल होने का न्यौता मिला। 1929 की मंदी तक गोल्डमैन सैक्स के लिए सब कुछ बेहतर होता रहा। इसने धीरे-धीरे अपनी पहचान पुख्ता करनी शुरू कर दी।

बाजार में इसका काफी नाम होने लगा। 1906 में इसने सीयर्स, रीबॉक एंड कंपनी के आईपीओ का प्रबंधन किया। यह उस समय की एक बड़ी आर्थिक हलचलों में से एक थी।

लेकिन शेयर बाजार की टूट ने गोल्डमैन सैक्स की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया। लेकिन इसके बाद सिडनी वेनबर्ग ने इसकी कमान संभाली और नुकसान की भरपाई करने की शुरुआत की।

पोलैंड के एक शराब व्यवसायी के बेटे वेनबर्ग ने 1907 में गोल्डमैन सैक्स में काम की शुरुआत की थी। उस वक्त उनकी उम्र 16 साल की ही थी। उन्होंने एक सहायक के तौर पर काम शुरू किया।

वेनबर्ग 1930 में सीनियर पार्टनर बन गए और उन्होंने अपना ध्यान ट्रेडिंग से हटाकर निवेश बैंकिंग पर करना शुरू कर दिया। उनकी सरपरस्ती में गोल्डमैन सैक्स में निवेश के लिए एक शोध टीम बनाई गई।

इसने म्युनिसिपल बॉन्ड डिविजन भी बनाई और जोखिम से फायदा बनाने की रणनीति अख्तियार की। इसके बाद फोर्ड मोटर कंपनी ने 1956 में अपने आईपीओ के लिए इसको मुख्य सलाहकार बनाया।

1969 में वेनबर्ग की जगह गस लेवी ने ली। लेवी जाने माने ट्रेडर थे और उन्होंने गोल्डमैन सैक्स की ट्रेडिंग फ्रेंचाइजियों को फिर से खड़ा किया।

यह लेवी ही थे जिन्होंने गोल्डमैन सैक्स को नया कारोबारी मंत्र दिया। उनका मानना था कि अगर बड़े फायदे के लिए थोड़ा नुकसान भी उठा लिया जाए तो इसमें क्या बुराई है।

उनके इस सिद्धांत को 'लॉन्ग टर्म ग्रीडी' का नाम दिया गया। 1974 में गोल्डमैन सैक्स ने विलय और अधिग्रहण के लिए 'व्हाइट नाइट' के तौर पर एक नायाब कॉन्सेप्ट पेश किया।

इसने इलेक्ट्रिक स्टोरेज बैटरी के जबरन अधिग्रहण की कोशिश में लगी इंटरनेशनल निकेल और गोल्डमैन की प्रतिद्वंद्वी मॉर्गन स्टैनली की कोशिशों को परवान नहीं चढ़ने दिया। इस मामले को गोल्डमैन ने बेहतरीन ढंग से संभाला।

हालांकि,गोल्डमैन सैक्स को पता था कि इससे इलेक्ट्रिक स्टोरेज बैटरी की स्वतंत्रता तो नहीं रह पाएगी लेकिन उनको इतना जरूर लगा कि इससे इलेक्ट्रिक स्टोरेज बैटरी के शेयरधारकों को बेहतर कीमत मिल जाएगी।

इसके चलते गोल्डमैन ने 'व्हाइट नाइट' के तौर पर यूनाइटेड एयरक्राफ्ट को खरीदा और इंटरनेशनल निकेल को मजबूरी में ज्यादा कीमत देकर सौदे को पाटना पड़ा।

इस तरह गोल्डमैन के ग्राहक को ज्यादा पैसा मिला और सलाहकार के तौर पर गोल्डमैन का भी फायदा ही हुआ। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि इससे यही संदेश गया कि मुश्किल हालात को संभालने में गोल्डमैन सैक्स से बेहतर कोई और नहीं।

इस किताब में 'रॉबर्ट मैक्सवेल, द क्लाइंट फ्रॉम हेल' वाला अध्याय सबसे ज्यादा बांधे रखता है। मैक्सवेल का जन्म चेकोस्लोवाकिया में हुआ था। कई सालों में उन्होंने लंदन के बाहर काफी बड़ा मीडिया साम्राज्य खड़ा कर लिया। मैक्सवेल काफी दिलचस्प शख्स थे।

छह फुट से भी ज्यादा लंबे मैक्सवेल 9 बच्चों के पिता थे और इतनी ही भाषाएं बोल सकते थे। यह 1991 की बात है जब वह अपनी याट में मृत पाए गए। आज तक यह पता नहीं लग पाया कि उन्होंने खुदकुशी की थी या फिर उनकी हत्या की गई थी।

उन्होंने 2.8 अरब डॉलर का कर्ज बैंकों से लिया हुआ था और दो सार्वजनिक कंपनियों में तकरीबन 50 करोड़ डॉलर की हेराफेरी की थी और लगभग 33,000 ब्रिटिश कामगारों की पेंशन भी हड़प ली।

मैक्सवेल से संबंध की कीमत गोल्डमैन सैक्स को चुकानी पड़ी और लंदन शहर के इतिहास में तब तक के सबसे बड़े 25.2 करोड़ डॉलर के निपटारा पैकेज पर सहमति बनी।

दरअसल, अपने ग्राहकों के लिए निवेश बैंकों और सिक्योरिटीज फर्म की भी जिम्मेदारी बनती है। वैसे, दुनिया के सबसे पुराने निवेश बैंक का इतिहास जानने के लिहाज से यह काफी बढ़िया किताब है।


पुस्तक समीक्षा

द पार्टनरशिप: ए हिस्ट्री ऑफ गोल्डमैन सैक्स

लेखक: चार्ल्स डी. एलिस

प्रकाशक: पेंग्विन
(एलन लेन )

कीमत: 995 रुपये
पृष्ठ: 729

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भारतीय रेल : कुबेर का खजाना

रघु दयाल

हाल में भारतीय रेल की सुविधाओं में इजाफा और वित्तीय स्थिति में जो मजबूती देखी गई है, वह आज घर-घर और गली के नुक्कड़ों पर चर्चा का अहम विषय बनी हुई है।

सभी लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर रेल ने नुकसान से नफे की पटरी बदली कैसे? दिमाग में चल रहे कई सवालों के जवाब ढूंढ़ती किताब है- 'बैंकरप्टसी टु बिलियंस।'

इस किताब में लेखक ने सरल, सहज और व्यावहारिक तरीके से तमाम पहलुओं का जिक्र किया है, जो पढ़ने के लिहाज से भी बेहतर है। नाटकीय अंदाज के साथ लेखक ने अपनी किताब की शुरुआत रेल मंत्री लालू प्रसाद और उनके निर्वाचन क्षेत्र के कुछ लोगों के बीच दिलचस्प क्षेत्रीय संवाद से किया है।

इस संवाद में लालू प्रसाद की जमीनी सूझबूझ को उजागर किया गया, जिसकी मदद से वे लोगों की सोच पर काम करते हैं। मिसाल के तौर पर द्वितीय श्रेणी यात्री किरायों में टिकट पर 1 रुपये की छूट देने पर भारतीय रेल पर 250 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा।

लालू प्रसाद की ओर से मूल मंत्र के रूप में 'न निजीकरण, न छंटनी और न ही किरायों में इजाफा' जैसी सिफारिशें उनकी राजनीतिक कुशाग्र बुध्दि के साथ इस सूझबूझ को दिखाती है कि महंगी दुधारू गाय का पूरा दोहन करना चाहिए।

इससे भारतीय रेल के लिए साफ संकेत मिलते हैं कि महंगी परिसंपत्तियों का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इससे 'तेज, लंबी और भारी ट्रेनों' के दूसरे मंत्र को सामने आने का मौका मिला। इससे परिसंपत्तियों से जितनी ज्यादा हो सके उतनी कमाई की जा सके।

असलियत में तेज ट्रेनों से वक्त की बर्बादी कम होती है, जिसकी अहम वजह मार्ग और टर्मिनलों पर होने वाले देरी में कमी लाना है। भारी ट्रेनों का मतलब है स्थायी रास्तों और माल ढुलाई से अधिक कमाई करना।

रेलवे अकेले इससे माल भाड़े और यात्रियों की संख्या में वर्ष 2004 और 2008 के दौरान 9 प्रतिशत सालाना चक्रवृध्दि विकास दर कायम कर पाने में सफल रही। साथ ही साथ इससे परिसंपत्ति और श्रम उत्पादकता भी 1990 की दर के मुकाबले दोगुनी हो गई, जिसके फलस्वरूप इकाई लागत में कमी होने लगी।

कीमत के लिए 'बहुआयामी, अलग और बाजार अनुकूल ' तीन सूत्री मंत्र का इस्तेमाल किया गया। इनके और दूसरी रणनीतियों और बीच-बचावों के साथ वर्ष 2004-08 की अवधि में भारतीय रेल का परिचालन अनुपात 76 प्रतिशत के नीचे पहुंच गया और ऋण देने की क्षमता बढ़कर 22,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गई, जिस पर विश्वास करना मुश्किल है।

बिना किराया या माल भाड़ा बढ़ाए अगर आय बढ़ने का दावा किया गया तो इसका मजाक उड़ना ही था। हालांकि रेल मंत्री लालू प्रसाद ने मुनाफे की ट्रेन चला ही दी और इन दावों को सच करके दिखाया।

अगर इस किताब का उप-शीर्षक 'किसने उबारी लालू की नैया?' होता तो और भी बढ़िया होता। इसमें बताया गया है कि कोई कैसे एक चतुर नेता बनता है। जो कभी भारतीय राजनीति के 'जोकर' माने जाते थे, आज वह भारत के उच्च प्रबंधन संस्थानों में 'प्रोफेसर लालू' बन गए हैं।

जैसे-जैसे उनके व्यक्तित्व का गुणगान बढ़ने लगा, भारतीय रेल संतुष्टि की स्थिति में आ गई। लेकिन इसे अभी यह समझना होगा कि उसके सामने अभी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है। भारतीय रेल को देश भर के माल ढुलाई के 50 प्रतिशत और यात्री पर्यटन के 30 प्रतिशत के अपने लक्ष्य को हासिल करना है।

नम्रता और ईमानदारी के साथ इस बात को स्वीकार करने की जरूरत है कि पिछले पांच सालों में भारतीय रेल के परिणामों में जो तेजी, जो वृध्दि देखी गई है, हालांकि वह अभूतपूर्व है, उसमें कोई 'असली क्रांति' या फिर बुनियादी बदलाव शामिल नहीं हैं।

लालू ने रेल के दैनिक परिचालन कार्यों के साथ किसी भी तरह की राजनीतिक हस्तक्षेप को न तो बर्दाश्त किया और न ही उनके लिए कोई जगह छोड़ी। नींद में उंघने वाली गाय रूपी भारतीय रेल पर चली तो सिर्फ लालू की ही लाठी।

जिसके हाथ में संचालन की कमान है, जब उस व्यक्ति का कद बढ़ता है, तब संस्थान बहुत कुछ और भी हासिल कर सकता है। एक बेहतरीन वक्ता के पास देहाती शब्दावली की एक अमूल्य भेंट होती है। लालू के ऊपर सुधार के एक मुश्किल दौर की शुरुआत का दायित्व था।

हालांकि किसी के भी पास तर्क के लिए काफी जगह बचती है, मिसाल के तौर पर राजनीतिक आर्थिक दबावों या व्यावहारिक्ता के नाम पर अब भारतीय रेल अहम परिवर्तनों की अनदेखी नहीं कर सकती।

इन परिवर्तनों में विभागों में बुनियादी ढांचे में बदलाव से लेकर संस्थागत बदलाव शामिल हैं। इसे अपने पुराने ढर्रे वाले उन विभागों और संस्थानों से छुटकारा पाना होगा, जिनसे बमुश्किल कोई फायदा होता है या वे विस्तार और विकास की अपनी रफ्तार को बरकरार रख पाते हैं।

कोई कुछ भी कहे या तर्क दे, लेकिन वह कभी नियम विरुध्द, यात्री सेवाओं की अनुचित कीमतों और सैकड़ों धीमी रफ्तार वाली क्षेत्रीय यात्री ट्रेनों को जारी रखने को उचित नहीं ठहरा सकता। भारतीय रेल के सामने अपने खर्चों में कटौती करने और माल भाड़े और कुछ किरायों में कमी करने की कई संभावनाएं हैं।

लालू का जनसंपर्क भी बेहतरीन हैं। जितने अच्छे वे वक्ता है, उतना शायद ही कोई और हो। उनके अधिकारी तो रेल मंत्रालय को फायदे में पहुंचाने के लिए उनकी तारीफ करते नजर आते ही हैं, लेकिन लालू भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। कई बार संसद के सामने लालू प्रसाद ने अपने कार्यकाल के दौरान यात्री किरायों और माल भाड़े की दरों के मामले में कई परिवर्तनों की अप्रासंगिक चर्चा की है।

जब भी कोई इतिहास की अनदेखी करता है तो वह पथभ्रष्ट हो जाता है। भारतीय रेल के चक्रीय विकास के दर्द को अपने दिलो-दिमाग में बैठा लेने की जरूरत है। भारतीय रेल के इतिहास में यह पहले भी देखा जा चुका है कि भारतीय रेल ने पीछे का मुंह ताका है, फिर भले ही उस समय उसने यात्रियों की संख्या और कमाई में इजाफा दर्ज किया हो। हम मार्च महीने का आधा समय बिता चुके हैं।

यात्रियों से हासिल हुई सकल राशि 93,159 करोड़ रुपये है और वर्ष 2009-10 के अंतरिम बजट में कुल कार्यशील खर्च के लिए 83,600 करोड़ रुपये तय किए गए हैं। इसके साथ परिचालन अनुपात 89.95 प्रतिशत है।

कुल मिलाकर अब जो हमारे सामने तस्वीर मौजूद है वह लालू के चार सालों के कार्यकाल के दौरान करोड़पति मंत्रालय बनने से पहले के भारतीय रेल के उस दशक की ओर इशारा करती है, जिस समय भारतीय रेल वित्तीय मुश्किलों का सामना करते हुए काफी कड़ी मेहनत कर रही थी और उसे इंतजार था तो अपने तारणहार का।


पुस्तक समीक्षा

बैंकरप्टसी टु बिलियंस हाऊ द इंडियन रेलवेज ट्रांसफॉम्ड

संपादन: सुधीर कुमार और शगुन मेहरोत्रा

प्रकाशक: ऑक्सफोर्ड

यूनिवर्सिटी प्रेस

कीमत: 495 रुपये

पृष्ठ: 206


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Sunday, January 11, 2009

आभूषणों से बेहतर गोल्ड ईटीएफ




"- गोल्ड ईटीएफ में निवेश कर होती है सोने की अभौतिक खरीदारी, भौतिक सोने में निवेश से जुड़ा जोखिम नहीं"

मनीश कुमार मिश्र


शेयर बाजार की स्थिति फिलहाल भ्रमित करने वाली है। बाजार की दिशा के सेदर्भ में अनुमान लगाना मुश्किल है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह समय इक्विटी फंडों में निवेश के लिए पूरी तरह उपयुक्त है।

लेकिन, पोर्टफोलियो के विशाखण और संतुलन के लिए सोने को सम्मिलित करने की सलाह भी देते हैं। सोने की कीमत साल की दूसरी छमाही में पहली छमाही की तुलना में अधिक होती है क्योंकि यह मौसम शादी-विवाह का होता है। इसे देखते हुए क्या धातु में निवेश करना का यह उपयुक्त समय है? पार्क फाइनैंशियल एडवाइजर के अखिलेश तिलोतिया कहते हैं,'पोर्टफोलियो बनाते समय सोने को निश्चित तौर पर शामिल करना चाहिए।

अगर, 50-60 फीसदी इक्विटी फंडों में निवेश करते हैं तो 10 से 15 प्रतिशत निवेश सोने में भी किया जाना चाहिए। वैसे भी सोना निवेश का सबसे सुरक्षित विकल्प है।' तो क्या निवेश या फिर पोर्टफोलियो के विविधीकरण के लिए आपको नजदीक के आभूषण विक्रेता के पास जाकर सोने के आभूषण खरीदने चाहिए, जिस पर आपकी महीनों से नजर थी? या पड़ोस के बैंक से सोने के सिक्के की खरीदारी करना आपके लिए ज्यादा लाभदायक साबित होगा?अगर सोने में ही निवेश करना है तो इसे भौतिक रुप से खरीदने की क्या जरुरत है। गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) सोने में निवेश करने का सबसे बेहतर माध्यम हो सकता है। ईटीएफ वस्तुत: म्यूचुअल फंड हैं जिसके यूनिटों का कारोबार स्टॉक एक्सचेंजों में ठीक उसी प्रकार किया जा सकता है जैसे किसी कंपनी के शेयरों का।

गोल्ड ईटीएफ में निवेश कर आप सोना अभौतिक रुप में खरीदते हैं, इसमें भौतिक सोने में निवेश से जुड़ा जोखिम नहीं है। गोल्ड ईटीएफ चूंकि डीमैट रुप में होता है इसलिए जो निवेशक इसमें निवेश करना चाहते हैं उनका डीमैट खाता होना आवश्यक है।कोई भी व्यक्ति गोल्ड ईटीएफ के यूनिटों की खरीदारी स्टॉक एक्सचेंजों से कर सकता है जहां वर्तमान में पांच गोल्ड ईटीएफ फंड सूचीबध्द हैं। इन पांच फंडों में बेंचमार्क गोल्ड ईटीएफ और यूटीआई म्यूचुअल फंड का गोल्डईटीएफ, रिलायंस गोल्ड ईटीएफ, क्वांटम गोल्ड ईटीएफ और कोटक गोल्ड ईटीएफ शामिल हैं।

यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि शेयरों की तरह ही गोल्ड ईटीएफ के यूनिटों की खरीदारी करने में आपको ब्रोकरेज शुल्क का भुगतान करना होता है। जब कोई निवेशक गोल्ड ईटीएफ का एक यूनिट खरीदता है तो प्रभावी तौर पर वह एक ग्राम सोना खरीद रहा होता है। दूसरी बात यह कि गोल्ड ईटीएफ में किए गए निवेश का मूल्य सोने के वास्तविक बाजार मूल्य से लगभग मेल खा रहा होता है। 2 जनवरी 2009 को जहां सोने का बाजार मूल्य प्रति ग्राम 1,357.5 रुपये था वहीं बेंचमार्क म्युचुअल फंड के गोल्ड ईटीएफ के एक यूनिट का मूल्य 1,364.64 रुपये था।

इस प्रकार आप जब भी चाहें गोल्ड ईटीएफ का एक यूनिट बेच कर बाजार से एक ग्राम सोना खरीद सकते हैं। जब कभी आप भौतिक तौर पर सोने में 15 लाख से अधिक की राशि का निवेश करते हैं तो आपको वेल्थ टैक्स देना पड़ता है। गोल्ड ईटीएफ के मामले में एक निवेशक सोने को अभौतिक रुप में या यूनिटों के रुप में रखता है इसलिए इस पर कोई वेल्थ टैक्स अदा करने की जरुरत नहीं होती है।वैसे लोगों को क्या करना चाहिए जो सोने की खरीदारी अपने पुत्र या पुत्री की शादी के लिए करना चाहते हैं? अधिकांश भारतीय परिवार शादी के कई वर्ष पहले से ही आभूषण खरीद-खरीद कर जमा करने लगते हैं। आभूषण के डिजाइन विवाह के समय तक पुराने हो जाते हैं।

आभूषण निर्माता और विक्रेता ऐसे में सलाह देते हैं कि डिजाइन की चिंता नहीं की जानी चाहिए क्योंकि उन्हीं गहनों को बाद में नए डिजाइनों में ढाला जा सकता है।डिजाइन को परिवर्तित कराने में भी पैसे लगते हैं। इसके अलावा अगर आप अपने आभूषणों को बैंक के लॉकर में सुरक्षित रखना चाहते हैं तो उसके लिए भी आपको अतिरिक्त पैसे देने होते हैं। हो सकता है कि आप आभूषणों का बीमा करवाना चााहें जिसके प्रीमियम में आपको अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ सकते हैं।

कुल मिला कर देखा जाए तो यह गोल्ड ईटीएफ में निवेश करने की अपेक्षा महंगा सौदा है। शादी-विवाह के लिए पहले से आभूषण खरीद कर रखने से बेहतर है कि आप गोल्ड ईटीएफ में निवेश करें। जब कभी आभूषण खरीदने की जरुरत हो तो इसके यूनिटों को बेच कर प्राप्त पैसों से नवीनतम डिजाइन वाले गहने खरीदे जा सकते हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि आपका विश्वस्त आभूषण विक्रेता भी आपको एक बार अशुध्द सोने के गहने पकड़ा सकता है लेकिन गोल्ड ईटीएफ चूंकि अभौतिक रुप में होता है इसलिए इसमें अशुध्दि संबंधी कोई जोखिम ही नहीं होता है।

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Friday, January 9, 2009

सवालों के घेरे में स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका


"अगर आप रामलिंग राजू से मिलें तो आपके दिमाग में
दो बातें जरूर कौंधेंगी। पहला, भारतीय सीईओ में आपको इतना मृदुभाषी व्यक्ति शायद ही मिले, कभी कभी तो वे इतने धीमे से बोलते हैं कि आपके लिए उसे समझना मुश्किल हो जाएगा।
"

अगर आप रामलिंग राजू से मिलें तो आपके दिमाग में दो बातें जरूर कौंधेंगी। पहला, भारतीय सीईओ में आपको इतना मृदुभाषी व्यक्ति शायद ही मिले, कभी कभी तो वे इतने धीमे से बोलते हैं कि आपके लिए उसे समझना मुश्किल हो जाएगा।
और दूसरे, वह तभी खुलकर बोलते हैं जब आप उनसे कार्पोरेट गवनर्स के बारे में बात करें। अगर आप बातचीत को दूसरी ओर मोड़ते हैं, जो सत्यम से जुड़ा हो तो उनके जवाब रटे-रटाए होते

राजू के साथ हुई एक ऐसी ही बैठक याद आ रही है। उस समय राजू ने विस्तार से बातचीत करते हुए बताया था कि सत्यम का मानना है कि बेहतरीन कार्पोरेट गवनर्स कारोबार के बेहतर परिणाम देता है और इससे कंपनी का प्रदर्शन बेहतरीन होता है और हिस्सेदारों को बहुत लाभ मिलता है। उन्होंने बोर होने तक मुझे यह सब कुछ सुनाया था। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि बेहतरीन कार्पोरेट गवनर्स के लिए सत्यम को दो गोल्डन पीकॉक पुरस्कार मिले, इस तरह के पुरस्कार मिलने से कंपनी को भविष्य में लगातार अपने कार्पोरेट गवनर्स में सुधार करने के लिए प्रोत्साहन मिलता

गुरुवार को दिए गए उनके चौंका देने वाले वक्तव्य से पता चलता है कि राजू कार्पोरेट गवनर्स के नियमों का पालन करने की बजाय इस कोशिश में लगे हुए थे कि किस तरह से सत्यम के बही खातों में गड़बड़ी की जाए। कंपनी के वित्तीय ब्यौरों में हेराफेरी और धोखाधड़ी इतनी ज्यादा हुई है कि यह किसी के भी दिमाग को उलझन में डाल सकती है। और अगर कोई राजू से पहले मिल चुका है और उनसे कुछ देर तक भी बातचीत की है तो वह उनके झूठ बोलने के स्तर के बारे में सोचकर हैरत में होगा, जैसा मेरे साथ हुआ।किसी पत्रकार को गुमराह करना कोई बड़ी बात नहीं है, अगर आप तुलना करें कि राजू ने किस तरह से 50,000 से अधिक कर्मचारियों का मात्र एक सप्ताह पहले तक नेतृत्व किया। मायटास की दो फर्म को खरीदने की योजना के निवेशकों द्वारा कड़े विरोध और उसके बाद उस योजना के खत्म हो जाने पर राजू ने अपने कर्मचारियों को लिखे गए एक पत्र में कहा था,''आप कंपनी के साथ बने रहिए,कंपनी ने हमेशा कार्पोरेट गवनर्स के उच्चतम मानकों का पालन किया है। आपसे अनुरोध किया जाता है कि आप अफवाहों पर ध्यान न दें।'' उन्होंने कर्मचारियों को यह भी याद दिलाई कि कंपनी ने गोल्डन पीकॉक अवार्ड पाया था।

राजू ने बताया था कि किस तरह उन्होंने उन सभी प्रक्रियाओं का पालन किया जो निदेशक मंडल के सर्वसम्मत फैसले के लिए जरूरी था और यह फैसला सत्यम को नई ऊंचाइयों पर ले जाता। इस तरह के उदाहरण मिलने कठिन हैं कि किसी सीईओ ने अपने कर्मचारियों के साथ इस तरह का विश्वासघात किया हो।राजू और उनके बेटों को निश्चित रूप से उनके द्वारा उठाए गए कदमों के परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
हकीकत यह है कि वे खुद भी इसे स्वीकार करते हैं और उन्होंने बोर्ड को लिए गए पत्र में इसका जिक्र भी किया है। राजू ने पत्र में कहा, 'मंत अपनी गलतियां स्वीकार करते हुए हर कानूनी कार्रवाई का सामना करने को तैयार हूं।'दरअसल, राजू ने यह आभास दिलाने की कोशिश की कि कंपनी बोर्ड के पुराने और मौजूदा सदस्यों को कंपनी की वास्तविक स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यह एक उल्लेखनीय बयान है और इससे इस आम धारणा को बल मिलता है कि भारत में परिवारों द्वारा चलाए जाने वाले कारोबार में मालिक की ही अहमियत होती हैलेकिन ऐसा नहीं है कि राजू का बयान सत्यम के निदेशकों और वरिष्ठ प्रबंधकों के लिए एक चरित्र प्रमाण पत्र है। राम मयनामपति का ही उदाहरण लीजिए, जो अब कंपनी के अंतरिम सीईओ हैं, जिन्हें पद छोड़ने के बाद राजू ने ही यह काम सौंपा। मयनामपति कुछ ही दिन पहले तक कंपनी के तिमाही नतीजों के दौरान अपने चेयरमैन द्वारा बताए गए आंकड़ों को उचित ठहराने में व्यस्त थे।इस पर विश्वास करना कठिन है कि उन्हें सही आंकड़ों के बारे में जानकारी नहीं थी। या फिर इससे सत्यम के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की घोर अज्ञानता का पता चलता है।आप सत्यम के स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका को ही ले लीजिए, जो इस समय पूरे घटनाक्रम से दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

इससे भी ज्यादा निराशाजनक यह है कि स्वतंत्र निदेशकों की टीम में हार्वर्ड के प्रोफेसर कृष्णा पालेपू, इंडियन स्कूल आफ बिजनेस के डीन एम राममोहन राव, उद्यमी विनोद धाम और पूर्व कैबिनेट सचिव टीआर प्रसाद शामिल हैं। अगर इस तरह के प्रभावशाली और प्रतिभाशाली लोग कार्पोरेट गवनर्स के मानकों की निगरानी नहीं कर सके तो निश्चित रूप से कहीं न कहीं से व्यवस्था में ही खामी है। हकीकत यह है कि राजू का वक्तव्य इस तरफ इशारा करता है कि ज्यादातर निदेशक मूकदर्शक रहने में ही विश्वास करते हैं और वे केवल उसी बात में विश्वास करते हैं, जो कंपनी के चेयरमैन उनसे विश्वास करवाना चाहते हैं। इस तरह से कार्पोरेट गवनर्स का पूरी तरह से मखौल ही बनता है कि कंपनी के प्रमोटर की कंपनी में मामूली हिस्सेदारी हो और वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ सभी कार्यों का संचालन करे।

इससे भारत के कार्पोरेट गवनर्स की एक बड़ी कमजोरी उजागर होती है कि ऐसे स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति की जाती है, जो या तो पुराने साथी हों या प्रबंधन में सहयोगी रहे हों या शेयरधारक हों।यह भी स्पष्ट होता है कि ज्यादातर स्वतंत्र निदेशकों के सामने परंपरागत रूप से यह उदाहरण होता है कि वे किसी तरह का दबाव न डालें और उन्हें यह भी डर बना रहे कि उनकी आलोचना को किस रूप में लिया जाएगा।हाल ही में हुए एक अध्ययन से भी यह पता चलता है कि 90 प्रतिशत कंपनियों ने स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्तियां सीईओ या चेयरमैन से राय लेने के बाद ही की हैं। स्वतंत्र सर्वेक्षणों से पता चलता है कि भारत में 5 में से 1 कंपनी ही बोर्ड के प्रदर्शन का आकलन करती हैं। बोर्ड द्वारा मामले को देखने की प्रक्रिया धीमी होती है और कुछ पुराने या बहुत ही वरिष्ठ निदेशक ही कुछ प्रतिरोध दर्ज कराते हैं। इन सबको देखते हुए यह जरूरी है कि बाजार नियामक अनुच्छेद 49 पर फिर से विचार करे, जो सूचीबध्दता समझौते से संबध्द है और स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका के बारे में बताता है। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो सत्यम के नए अंतरिम सीईओ का बयान खोखला ही साबित होगा कि कंपनी के वरिष्ठ लोग उपभोक्ताओं, सहयोगियों, आपूतिकर्ताओं और सभी शेयरधारकों को किए गए वादों को निभाने के लिए एकजुट हैं और वे इसे जारी रखेंगे। और, यह न केवल सत्यम के लिए ही, बल्कि पूरे इंडिया इंक के लिए भी एक बुरी खबर होगी।



saabhar: http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=12677

आइये देखते हैं क्यों डगमगाती नजर आ रही है डीएलएफ की नाव

सत्यम वह करने में सफल नहीं हो सकी, जो डीएलएफ पिछले कई महीनों से कर रही है। दरअसल डीएलएफ ने मंदी आने के बाद खुद ही तमाम सहायक कंपनियां बना डालीं। उसके बाद उनकी ही सहायक कंपनियों ने बढ़े हुए दामों पर डीएलएफ की प्रॉपर्टी खरीदी। इस खेल से फायदा यह हुआ कि डीएलएफ का मुनाफा दिखाया जाता रहा। कंपनी के शेयर गिरे भी, लेकिन इस गड़बड़झाले और मुनाफा दिखाए जाने के चलते कंपनी के शेयरों के भाव बढ़े, जबकि हकीकत में कंपनी को मुनाफे जैसी कोई चीज मिली ही नहीं। कंपनी ने ताश के पत्तों के महल बनाए हैं। अब देखना है कि उसकी गति सत्यम जैसी कब होती है....

Thursday, January 8, 2009

सत्यम के बाद अब डीएलएफ!

पिछली पोस्ट में मैने लिखा था कि राजू ने तो केवल पूंजीवाद का चेहरा दिखाया है। पिछले सोमवार को डीएलएफ के सीएफओ ने अपने पास के कंपनी के एक लाख शेयर बेंच दिए। अचानक कंपनी के एक जिम्मेदार अधिकारी द्वारा शेयर बेचे जाने का कोई कारण समझ में नहीं आता। जब उस अधिकारी से कारण पूछा गया तो उसने कहा कि व्यक्तिगत कारणों से शेयर बेचे गए हैं।
आज बाजार खुलते ही डीएलएफ के शेयर गिरने लगे। भाइयों, एक बार फिर कहना पड़ रहा है कि पूंजीवाद का यही असली चेहरा है। हर तरह की बेइमानी से पैसा कमाओ। हां, मैने सत्यम को बेलआउट पैकेज दिए जाने की बात कही थी। अमेरिका ने भी उस कंपनी को बेलआउट पैकेज नहीं दिया था, जो बर्बाद होने वाली पहली कंपनी थी। लेकिन जब उसके यहां तमाम कंपनियां ताश के पत्ते की तरह भरभराकर गिरने लगीं तो पैकेज की झड़ी लगी। अब देखते जाइये कि अनिश्चितता के इस दौर में कौन-कौन से दिग्गज धराशायी होते हैं।

सत्यम को बेलआउट पैकेज की जरूरत


सत्यम कंप्यूटर्स के मुखिया रामलिंग राजू ने सिर्फ पूंजीवादी कार्पोरेट जगत का चेहरा देश के सामने रखा है। आखिर भारत में सभी लोग राजू को खलनायक, फ्राड और झूठा साबित करने पर क्यों तुले हैं? ऐसा ही कुछ तो इस समय दुनिया भर में हो रहा है। कंपनियां, बैंक, विभिन्न संस्थानों का फ्राड सामने आ रहा है, वे धराशायी हो रही हैं और वहां की सरकारें बेलआउट पैकेज देकर कंपनियों को बचाने की कोशिश कर रही हैं। आखिर वैसा ही कुछ तो राजू ने भी किया था- इसमें क्या गलत किया।


एक किसान परिवार में जन्मे रामलिंग राजू एक सप्ताह पहले तक देश के हीरो थे। यहां तक कि अमेरिका जैसा पूंजीवादी देश भी उनसे भयभीत रहते थे। अचानक जीरो कैसे हो गए?? पूंजीवादी व्यवस्था में ऐसा ही होता है कि पैसे से पैसा बनाया जाए। राजू ने भी यही किया। कंपनी का विस्तार करते चले गए। भले ही गलत बैलेंस शीट दिखाया। अगर विस्तार योजनाएं कारगर हो जातीं तो?? तब तो कंपनी के सभी शेयरधारकों की बल्ले-बल्ले होती ना। तब कोई उंगली नहीं उठाता कि गलत हुआ या किसी की जेब काटकर कोई अमीर हुआ है।


अब उद्योग जगत को ही देखिये। ऐसी व्यवस्था तो नहीं सोची जा रही है कि आम आदमी की कमाई बढ़े और वह गाड़ियां, मकान आदि-आदि खरीदने में सक्षम हो। उद्योग जगत यही मांग कर रहा है कि रिजर्व बैंक कर्ज सस्ता करे, लोग कर्ज लेकर घी पिएं और बाद में जब कर्जदार उन्हें घेरना शुरू करें तो वे आत्महत्या कर लें, डकैती करें, लूट करें, फ्राड करें या कुछ भी करें। कर्ज का भुगतान कर दें बैंकों को।


ऐसी नीति में तो यही जायज होगा कि जिस व्यक्ति ने ५०-६० हजार लोगों को पिछले बीस साल तक रोजी-रोटी दी, उसे गुनाहगार न मानते हुए तत्काल बेलआउट पैकेज दे दे। आखिर राजू ने क्या बुरा किया? अगर उन्होंने कंपनी का पैसा कहीं और जमा कर रखा हो तो सरकार उसे ढूंढे और जब्त कर ले या बेल आउट पैकेज में शामिल कर ले। लेकिन देश के गौरव के रूप में स्थान बना चुकी सत्यम कंप्यूटर्स को बचाना जरूरी है। वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था की यही मांग है।

Monday, January 5, 2009

दम हो तो पीट दीजिए, साथी भी मिल जाएंगे


इजरायल और भारत। दो देश, जो पड़ोसी के खतरों से जूझ रहे हैं। अब इजरायल को ही देखिए जैसे ही उस पर हमला शुरू हुआ, पीटना शुरू किया और दस दिन से पीट रहा है। दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जो जरा भी चूं-चपड़ करे। मजे की बात है कि वह चारो ओर से इस्लामिक देशों से घिरा है। भले ही उसे अमेरिका का साथ है, लेकिन उसे भी तो डर होगा कि अगर सभी पड़ोसी मिलकर उसे पीटने लगें तो अमेरिका क्या सहयोग कर देगा? बावजूद इसके, खुद उस देश में दम है और दुश्मनों को दौड़ा-दौडा़कर मार रहा है, उनकी धरती पर।
इधर भारत की देखिए। बेचारे। तरह तरह की धमकियां देकर हार चुके। इतनी छीछालेदर और इतना नुकसान तो भारत जैसे विशाल देश का तब भी नहीं होगा, अगर पाकिस्तान अपने पास पड़े सारे परमाणु बम भारत पर छोड़ दे। अगर हिम्मत बनाकर एक बार कुछ करने को ठाने तब ना। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता। अरे छोड़िये- पाकिस्तान को सबूत दिया तो दिया ही, पूरी दुनिया को सबूत दे रहे हैं कि पाकिस्तान ने ही हमें पीटा। रो रहे हैं, हमें पीटा गया। इससे तो बढ़िया था कि मुंबई विस्फोटों के बाद भी धूल झाड़कर खड़े हो जाते, जैसे अन्य विस्फोटों के बाद किया था।

धैर्य के कप में लीजिए मुनाफे का 'सिप'

मनीश कुमार मिश्र

साल 2008 इक्विटी फंडों के निवेशकों के लिए निराशाजनक रहा है। एक साल में फंडों से मिलने वाला रिटर्न ऋणात्मक ही रहा है, चाहे निवेश एकमुश्त तौर पर किया गया हो या योजनाबध्द निवेश (सिप) के रूप में।


अब सवाल यह है कि साल 2009 निवेशकों के लिए कैसा रहेगा? क्या 2008 उनके घाटे की भरपाई हो पाएगी? आइए, विभिन्न विशेषज्ञों से जानने की कोशिश करते हैं।


टॉरस म्युचुअल फंड के प्रबंध निदेशक आर. के. गुप्ता कहते हैं- साल 2008 की शुरुआत से ही बाजार में गिरावट का दौर रहा है। इक्विटी में निवेश करने वाले निवेशकों को नुकसान हुआ है लेकिन साल 2009 प्रतिफल की दृष्टि से आशाजनक है।'


कैसे? इसके जवाब में वित्तीय योजनाकार विश्राम मोदक ने कहा-अगर निवेश किसी वित्तीय लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए किया जाए तो घाटे की संभावना कम होती है क्योंकि निवेशक अपनी जोखिम उठाने की क्षमता के अनुसार विभिन्न रूपों से निवेश करता है।


योजनाबध्द निवेश योजनाएं निवेश का अनुशासित तरीका हैं लेकिन इक्विटी फंडों में निवेश कर तीन साल के बाद पैसे निकालने की बात नहीं सोचनी चाहिए।


इक्विटी या इक्विटी फंडों में सिप के माध्यम से कम से कम सात वर्षों के लिए निवेश किया जाना चाहिए वह भी किसी वित्तीय लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए विभिन्न फंडों में निवेश करते हुए।


ऐसे में निवेशकों को बेहतर रिटर्न मिल सकता है। वैसे उनका मानना है कि साल 2009 में बाजार की स्थिति में सुधार होगा होगा। फलस्वरूप, सिप के माध्यम से निवेश करने वाले नए और पुराने, दोनों निवेशकों को लाभ होगा।


गुप्ता ने भी इस पर मुहर लगाते हुए कहा - साल के पहले तीन महीनों में बाजार स्थिर रहेगा। साल 2009 के शुरुआती तीन महीनों में बाजार में स्थिरता रहेगी। लोकसभा चुनाव के आस पास बाजार में उतार-चढ़ाव रहेगा।


लेकिन हमारा अनुमान है कि साल की समाप्ति अच्छी रहेगी। इक्विटी फंडों में सिप के माध्यम से निवेश करने का यह समय उचित है। अगला साल निवेशकों की खुशियां वापस लौटा सकता है।


वैल्यू रिसर्च के मुख्य कार्यकारी अधिकारी धीरेन्द्र कुमार ने कहा, 'वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करने के बाद दीर्घावधि के लिए विभिन्न इक्विटी फंडों में सिप के माध्यम से नियमित तौर पर निवेश करना चाहिए।


बाजार के उतार-चढ़ाव का प्रभाव अल्पावधि के निवेश पर पड़ता है। दीर्घावधि (सात साल से अधिक की अवधि) के लिहाज से इक्विटी फंड बेहतर रिटर्न देते हैं। साल 2008 निवेशकों के लिए अच्छा नहीं रहा लेकिन उम्मीद है कि अगले साल वे कुछ बेहतर लाभ अर्जित कर पाएंगे।

साभार: http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=12068

Sunday, January 4, 2009

खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र देगा बिहार के विकास को गति

सत्येन्द्र प्रताप सिंह


बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से हर साल जूझने वाले बिहार ने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने के लिए कमर कस ली है।
इसके तहत सभी बुनियादी सुविधाओं वाले मेगा फूड पार्क बनाने की योजना है, जो इस साल कार्यरूप लेगा। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर टेक्सटाइल और हैंडलूम के क्षेत्र में भी तेजी से काम चल रहा है। इस कारोबार से जुड़े कारोबारियों और सरकारी अधिकारियों का मानना है कि ये क्षेत्र वर्ष 2009 को खुशगवार बना देंगे।

खाद्य प्रसंस्करण से जुडे ज़ानकारों का मानना है कि 2015 तक खाद्य प्रसंस्करण कारोबार 83,000 करोड़ रुपये तक का हो जाएगा। इसे देखते हुए बिहार सरकार ने 2 मेगा फूड पार्क बनाने की योजना बनाई है। एक मुजफ्फरपुर वैशाली क्षेत्र तथा एक भागलपुर खगड़िया क्षेत्र में होगा। मेगा फूड पार्क, छोटे-छोटे प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्रों से जोड़े जाएंगे। इसके लिए कोल्ड चेन तैयार की जाएगी। प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्रों को फील्ड कलेक्शन केंद्रों से जोड़ा जाएगा। केंद्रीय प्रसंस्करण हब के रूप में विकसित किए जाने वाले मेगा फूड पार्कों में सभी बुनियादी सुविधाएं जैसे गोदाम और प्रसंस्करण आदि की सुविधा उपलब्ध होगी। इसके अलावा चावल, मक्का और मखाना क्लस्टर के विकास के साथ ही 100 कृषि आधारित ग्रामीण व्यापार केंद्र विकसित करने की योजना है। इसके अलावा राज्य सरकार ने पिछले एक साल में निजी निवेश के 71,000 करोड़ रुपये के 145 निजी प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इसमें 2 चीनी मिलें, 11 पॉवर प्लांट, 8 फूड प्रॉसेसिंग, 6 तकनीकी संस्थान शामिल हैं। इंटीग्रेटेड हैंडलूम डेवलपमेंट योजना के तहत राज्य के 9 हथकरघा क्लस्टर विक सित करने की परियोजना को मंजूरी दे दी गई है। साथ ही इन औद्योगिक क्षेत्रों में 50 प्रतिशत के अनुदान पर डीजल जेनरेटिंग सेट की स्थापना की योजना बनाई गई है। बिहार इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष कैलाश झुनझुनवाला का कहना है कि नया साल राज्य के लिए ढेरों उम्मीदें लेकर आ रहा है। इंटीग्रल रेल कोच फैक्टरी बनने वाली है। इससे सेवा क्षेत्र में संभावनाएं बढ़ेंगी। साथ ही सरकार की फूड पार्क, क्लस्टर डेवलपमेंट की कोशिशें भी कार्यरूप लेना शुरू कर देंगी, जिसका सीधा असर उत्पादन और रोजगार पर पड़ेगा और छोटे-छोटे कारोबार चल पड़ेंगे।बिहार के उद्योग मंत्री दिनेश यादव ने बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहा कि राज्य में छोटे-मझोले कारोबारियों के लिए अपार संभावनाएं हैं। खासकर हमारी कोशिश यह है कि ऐसे कारोबार विकसित किए जाएं, जिसमें यहां का कच्चा माल इस्तेमाल हो सके। सरकार की पिछले तीन साल की कोशिशें इस साल रंग दिखाएंगी और वर्ष 2009 में खाद्य प्रसंस्करण, हथकरघा, बिजली उत्पादन के क्षेत्र में जोरदार प्रगति होगी। राज्य सरकार ने छोटे कारोबारियों को राहत देते हुए रस्सियों और सुतलियों, ऑटो पार्ट्स, ड्राई फ्रूट्स, प्लाईवुड, ब्लैकबोर्ड सहित उनके निर्माण में लगने वाले कच्चे माल पर वैट की दर 12।5 प्रतिशत से घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया है। आने वाले साल में छोटे और मझोले उद्योग के कारोबारी अपने कार्य को विस्तार देने में की दिशा में भी काम करेंगे।

साभार: http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=12248

Friday, January 2, 2009

मिलेगा कर्ज का घी, और सुनहरे मौके भी

सत्येन्द्र प्रताप सिंह


गुजरे साल में पाई-पाई को तरसते रहे छोटे और मझोले उद्योगपतियों की झोली में 2009 काफी माल डाल सकता है, अब चाहे वह कर्ज ही हो।
वह यूं कि एक तरफ तो रिजर्व बैंक ने रोजगार में इस क्षेत्र के महत्व को देखते हुए खजाना खोल दिया है। तो दूसरी तरफ बैंकों ने भी सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योगों की अहमियत को समझते हुए सस्ता और सुलभ कर्ज मुहैया कराने की ठान ली है।

मिसाल के तौर पर यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, जो अब तक अपने कुल कर्ज का 16 प्रतिशत एसएमई को देता है, उसने अब इसे बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने का फैसला किया है। बैंक के महाप्रबंधक एस।एस. घुग्रे ने कहा, 'हमने अपने कुल दिए गए कर्ज 85,506 करोड़ रुपये में से 13,884 करोड़ रुपये एमएसएमई को दिया है, जो कुल कर्ज के 16 प्रतिशत से ज्यादा है।' यही नहीं, नए साल में इनके खुश होने की और भी कई वजहें हैं। वह इसलिए कि यूरोप और अमेरिका में भले ही इनका निर्यात प्रभावित हो रहा हो, लेकिन कैरेबियाई देशों और अन्य विकासशील देशों में संभावनाओं के द्वार खुल रहे हैं। यानी, जरूरत है अब सिर्फ समय की नब्ज समझकर कारोबार करने की।उद्योग से जुड़े लोगों का भी मानना है कि वर्ष 2009 में उद्योग जगत में स्थिरता आएगी और सरकार की सकारात्मक कोशिशें रंग लाएंगी।

इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष और एमआर इंजीनियरिंग वर्क्स, सहारनपुर के प्रमुख प्रवीण सडाना कहते हैं कि 8 दिसंबर को प्रधानमंत्री के साथ हुई बैठक से ढेरों उम्मीदें हैं।सरकार ने 13 में से 10 मांगें मान ली हैं, जिसमें कर्ज की ब्याज दरें कम करना भी शामिल है। कारोबारियों को खुला मौका है कि वे कैरेबियाई देशों में अपने उत्पादों का निर्यात कर सकते हैं।त्रिनिदाद और टोबैगो के राजदूत ने भी कहा कि हमारी खुली अर्थव्यवस्था है और देश पर मंदी का कोई प्रभाव नहीं है, कारोबारियों को खुला मौका है कि वे न केवल हमारे देश में अपने उत्पादों की आपूर्ति, विनिर्माण कर सकते हैं, बल्कि वहां आधार बनाकर अन्य देशों को भी उत्पादों की आपूर्ति कर सकते हैं। दिल्ली के प्रमुख ऑटो पाट्र्स उत्पादक और वेलकम ऑटोमोबाइल के प्रमुख नरेंद्र मदान ने कहा, 'ऑटो सेक्टर में पूरे साल मंदी का दौर रहा। उम्मीद है कि अब बड़े उत्पादकों का भी स्टॉक खत्म होने को है और इस साल उनकी तरफ से मांग बढ़ेगी।'सडाना बताते हैं कि जिला स्तर पर बैंकों का रवैया छोटे उद्योगपतियों के प्रति बहुत ही निराशाजनक होता है, जिसके चलते हमने प्रधानमंत्री से मांग की है कि जिला स्तर पर बैंकों द्वारा रिजर्व बैंक के निर्देशों के मुताबिक कर्ज दिए जाने की जांच की जाए। इस पर प्रधानमंत्री ने समिति गठित करने की घोषणा की है।

साभार: http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=12220

Thursday, January 1, 2009

'पोंजी' से पूंजी पर झाड़ू फेर गया शातिर अमेरिकी साहूकार, 2500 अरब रुपए का चूना !

ऋषभ कृष्ण सक्सेना / नई दिल्ली


हिंदी फिल्मों में गांव के साहूकार तो आपको याद होंगे, जो गरीब अनपढ़ लोगों को तगड़ी ब्याज दर पर कर्ज देकर लूटते हैं।
इनके ठीक उलट खांटी हिंदुस्तानी चिटफंड कंपनियां होती हैं, जिनमें से कुछ वित्तीय गुणा भाग से अनजान लोगों को कम से कम वक्त में ज्यादा से ज्यादा रिटर्न का झांसा देकर लूटती रही हैं। लेकिन आधुनिक वित्तीय प्रणाली की बुनियाद रखने का दावा करने वाले पढ़े-लिखे अमेरिकी भी इस झांसे में फंस सकते हैं, ऐसा किसने सोचा होगा। लेकिन नामी निवेशक बर्नार्ड मैडॉफ ने इन महारथियों को भी नहीं छोड़ा।पोंजी योजना के जरिये आम अमेरिकी निवेशकों की पूंजी लूटने का नायाब तरीका ढूंढने वाला मैडॉफ इसी वजह से आजकल सुर्खियों में है। मजे की बात है कि मैडॉफ ने लूटा भी उन देशों को, जहां के निवेशक सबसे ज्यादा तीसमारखां माने जाते हैं, मसलन अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, जापान और दक्षिण कोरिया। मंदी के दौर में इन निवेशकों को अकेले मैडॉफ ने ही 50 अरब डॉलर यानी करीब 2500 अरब रुपए का चूना लगाया है। मजे की बात है कि इनमें बड़े-बड़े नामी गिरामी बैंक भी शामिल हैं।

कौन है मैडॉफ

मैडॉफ को दुनिया ने तो तभी जाना, जब पिछले हफ्ते पोंजी घोटाले की वजह से उसे गिरफ्तार किया गया। लेकिन अमेरिका और यूरोप में मैडॉफ के मुरीदों की कमी नहीं थी, जो निवेश के तमाम बुनियादी नियमों को ताक पर रखकर 13 फीसदी के गारंटेड सालाना रिटर्न के फेर में उसके एक इशारे पर पैसा लगा देते थे।
बर्नार्ड एल मैडॉफ इनवेस्टमेंट सिक्योरिटीज नाम से निवेश कंपनी चलाने वाले मैडॉफ की वेबसाइट उसे फिनरा के नाम से मशहूर सिक्योरिटीज डीलरों के अमेरिकी संगठन का प्रमुख सदस्य बताती है। वह नैस्डैक के निदेशक मंडल का चेयरमैन भी रह चुका है और प्रतिभूति एवं विनिमय आयोग की सलाहकार समिति में भी शामिल था। सिक्योरिटीज उद्योग के संघ की ट्रेडिंग समिति में मैडॉफ चेयरमैन था और 12 दिसंबर को गिरफ्तारी से पहले तक वह होफ्सत्रा विश्वविद्यालय और येशिवा विश्वविद्यालय का ट्रस्टी भी था।

क्या था पोंजी का चक्कर

पोंजी दरअसल अमेरिकी निवेशकों के लालच का ही नतीजा थी। भारत में भी कई कंपनियों ने वही किया है, जो मैडॉफ ने किया। उन कंपनियों का जो हश्र यहां हुआ, वही अमेरिका में आखिकार मैडॉफ का भी हो गया। उसने गिरफ्तार होने के बाद साफ लफ्जों में कबूल भी किया कि पोंजी योजना कुछ भी नहीं थी, यह तो 'सफेद झूठ' थी।
दरअसल मैडॉफ बेहतर रिटर्न देने के नाम पर निवेशकों से रकम लेता था। जब रिटर्न देने का मौका आता था, तो वह पुराने निवेशकों को वह रकम दे देता था, जो उसे नए निवेशकों से हासिल हुई थी। इसका मतलब है कि उसके पास तो कोई रकम थी ही नहीं और न ही वह कहीं निवेश कर रहा था यानी 'हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा।'
जांच एजेंसियों के मुताबिक कम से कम पिछले चार साल से वह यही काम कर रहा था। मजे की बात है कि पिछले 15 साल में मैडॉफ पर सवालिया निशान भी लगे, लेकिन वित्तीय जगत में अपनी पहुंच के चलते वह किसी भी कार्रवाई से हमेशा बचता रहा।

कौन हुए शिकार

सत्तर साल के इस शिकारी ने यूरोप के बड़े से बड़े दिग्गज को घुटनों पर ला दिया है। ब्रिटेन के एचएसबीसी बैंक ने कबूल किया है कि मैडॉफ ने उसे तकीबन 100 करोड़ डॉलर का चूना लगाया है। उसके सबसे बड़े शिकारों में यह बैंक शामिल है।
रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड, नोमुरा, नैटिक्सि चोट लगने की बात स्वीकार कर चुके हैं।
फ्रांस के नैटिक्सिस बैंक के 45 करोड़ यूरो इस घोटाले में डूबे हैं और ब्रिटेन की हेज फंड प्रबंधक कंपनी मैन ग्रुप को 36 करोड़ डॉलर की चोट लगी है। नामी हॉलीवुड निदेशक स्टीवन स्पीलबर्ग की वंडकाइंड फाउंडेशन भी मैडॉफ के जाल से बच नहीं पाई। उनके अलावा फ्रांस के बैंक बीएनपी पारिबा और बांको सैंटैंडर को भी मैडॉफ ने चूना लगाया है।
रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड के 60 करोड़ डॉलर मैडॉफ ने पचाए और जापान के नामी गिरामी नोमुरा बैंक के 30 करोड़ डॉलर उसकी जेब में गए हैं। यूरोप के कई दूसरे बैंकों के नाम भी अभी आ सकते हैं।

साभार- http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=11476

जुआरी पर जुर्माना!


नीलकमल सुंदरम / नई दिल्ली


अमेरिका की संघीय अदालत ने भारतीय मूल के जिब्राल्टर निवासी और ऑनलाइन गेमिंग बादशाह अनुराग दीक्षित को संचार साधनों के उपयोग का दोषी करार देते हुए करीब 1,500 करोड़ रुपये (30 करोड़ डॉलर) का जुर्माना अदा करने को कहा है।
कौन हैं अनुराग और किस तरह का करते हैं कारोबार, आइए जानते हैं :

कौन हैं अनुराग

दीक्षित झारखंड के सिंदरी में मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे (वर्ष 1973) अनुराग दीक्षित बहुत जल्द सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए दुनिया के अरबपतियों में शुमार हो गए। आईआईटी दिल्ली से 1994 में कंप्यूटर टेक्लॉजी में स्नातक की डिग्री करने के बाद उन्होंने सीएमसी और एटीएंडटी जैसी नामी-गिरामी में काम किया, लेकिन दीक्षित का मन नौकरी में नहीं रमा। और खुद का कारोबार शुरू करने की ठानी। अपनी चतुराई और तकनीकी शिक्षा के दम पर दीक्षित आज दुनिया के अरबपतियों में 618 पायदान पर हैं। फोर्ब्स पत्रिका के मुताबिक अनुराग की कुल संपत्ति करीब 80 अरब रुपये आंकी गई है।

ऑनलाइन गेमिंग के कारोबार में दस्तक

इसी बीच, वह ऑनलाइन पार्टी गेमिंग के संस्थापक पारासोल के संपर्क में आए। पारासोल ने उनकी प्रतिभा पहचानी और खुद का कारोबार करने के लिए प्रेरित किया। 25 वर्ष की उम्र में दीक्षित ने अपने मित्र विक्रांत भार्गव के साथ वर्ष 2001 में पार्टी पोकर डॉट कॉम नाम से पार्टी गेमिंग (ऑनलाइन जुआ) कंपनी शुरुआत ब्रिटेन के जिब्राल्टर शहर से की। जल्द ही उनकी साइट दुनियाभर में लोकप्रिय हो गई। 2005 में पब्लिक इश्यू के जरिए कंपनी की 23 फीसदी हिस्सेदारी उन्होंने बेच दी। वर्ष 2007 में कंपनी को करीब 40 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था।

मामला क्या था?

अनुराग दीक्षित पर जुए के संघीय नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था, जिसके तहत अमेरिका में दो साल की सजा का प्रावधान है। दरअसल, अमेरिकी कानूनों में वर्ष 2006 में किए गए संशोधन के बाद पार्टी गेमिंग कारोबार को प्रतिबंधित कर दिया गया था। लेकिन दीक्षित ने इसके बावजूद अपना कारोबार अमेरिका में बंद नहीं किया। इसके लिए संघीय अदालत ने दीक्षित को सट्टेबाजी के लिए संचार साधनों के उपयोग का दोषी पाया गया। हालांकि उन्होंने सजा के बजाय अर्थदंड देने का समझौता कर लिया। कंपनी के कुल राजस्व का 75 फीसदी हिस्सा अमेरिका से ही आता है।

क्या है पार्टी गेमिंग?

यह इंटरनेट पर खेला जाने वाला जुआ है, जिसे साइबर जगत में वर्चुअल गेमिंग भी कहा जाता है। इसमें दुनियाभर में कहीं बैठकर एक साथ कई यूजर विभिन्न तरह के खेलों (जुआ) में हिस्सा ले सकते हैं। इसके तहत विंगो, कसीनो जैसे ऑनलाइन गेम आते हैं। पार्टी पोकर डॉट कॉम पर सालाना 36 लाख लोग विजिट करते हैं। कंपनी का सालाना कारोबार 45।78 करोड़ डॉलर है।

साभार - http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=11579

Thursday, December 11, 2008

देखें पाकिस्तान की दुर्भावनाएं.. बन रही है भयावह स्थिति ?

उर्दू में प्रकाशित होने वाले एक पाकिस्तानी अखबार ने २०१२ और २०२० तक पाकिस्तान शासित भूभाग का वर्णन किया है। उसका मानना है कि २०२० तक भारत का नामोनिशान मिट जाएगा। तस्वीरें इस्लामिक राज्य के सपने की हैं। अगर आप उर्दू जानते हैं तो इस अखबार ( http://express.com.pk/ ) को जरूर पढ़ें। यह ३ दिसंबर के संस्करण में प्रकाशित किया गया। या तो ऐसे अखबारों या इस तरह के लेखन पर पाकिस्तानी सरकार का अंकुश नहीं है, या यह अखबार पाकिस्तान सरकार के मंसूबे को प्रदर्शित करता है। आप अपनी राय जरूर दें।

Wednesday, December 3, 2008

आम भारतीय से दूर होता बड़े लोगों का मीडिया

ए. के. भट्टाचार्य

सरकार भारत पर मंडरा रहे किसी संकट का मुंहतोड़ जवाब देगी। यह बात पालानीअप्पन चिदंबरम ने सोमवार को उस समय कही थी जब वह गृह मंत्रालय की कमान संभाल रहे थे।
मुंबई पर हुए हमले के बाद उनका यह बयान काफी सुकून दिलाने वाला था। लेकिन गृहमंत्री आखिर कौन से भारत की बात कर रहे थे? जी हां, मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले का एक असर यह भी हुआ है कि इसने अमीरों के भारत और आम आदमी के भारत के बीच मौजूद खाई को और भी चौड़ा कर दिया।
इस बात से किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए कि आज भी इस तरह की खाई अपने मुल्क में मौजूद है और वह दिनोंदिन चौड़ी होती जा रही है। हैरत अगर है तो उस अंदाज पर, जिसमें मीडिया ने इस हमले को पेश किया। उसने इस खाई को और भी गहरा व चौड़ा कर दिया। उसकी वजह से यह खाई खुलकर लोगों के सामने आ गई। जिस तरह से मीडिया ने इस त्रासदी को कवर किया, उसने हमारे सबसे बुरे सपनों में से एक को हकीकत में तब्दील कर दिया। मीडिया में कौन सी चीज कैसे दिखाई जानी है, इस बारे में फैसला करने में कहीं न कहीं खामी जरूर है। साथ ही, आज मीडिया का नजरिया वही कुछेक लोग तय कर रहे हैं, जो उसे चला रहे हैं।
यहां संकट की गंभीरता या फिर इस त्रासदी की व्यापकता पर सवाल नहीं उठाए जा रहे हैं। मुंबई पर हुए इस आतंकवादी हमले में कम से कम 200 लोगों की जान गई। 60 घंटे तक मुट्ठी भर आतंकवादियों ने बंदूक के दम पर हिंदुस्तान के हाई प्रोफाइल होटलों में से दो पर अपना कब्जा जमाए रखा। उन्होंने सैकड़ों की तादाद में लोगों को बंधक बनाकर रखा, जिनमें से कई को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम को मीडिया ने अच्छे या कहें कि काफी अच्छे तरीके से पेश किया।
लेकिन असल दिक्कत है उस तरीके के साथ, जिससे उसी मीडिया ने भारतीय रेलवे के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) की घटना की जानकारी दी थी। आखिर वहां भी तो आतंकवादियों ने कई मासूमों की जिंदगी की लौ वक्त से पहले ही बुझा दी। शुरुआत में तो टीवी चैनलों ने रेलवे स्टेशन पर हुई गोलीबारी के बारे में जानकारी दी थी, लेकिन जल्दी ही सभी के सभी टीवी चैनलों का ध्यान वहां से हट गया और उनके कैमरों के लेंस दोनों लक्जरी होटलों की तरफ टिक गए। अखबारों में भी छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर हुई घटना के बारे में खबरों को भूलेभटके ही जगह दी गई।

क्या अपनी मीडिया के लिए किसी रेलवे स्टेशन पर खड़े आम लोगों की जिंदगियों की कीमत पांच सितारा होटलों में जुटे अमीरों की जान से कम है? या क्या मीडिया को हिंदुस्तान के अमीरों की जिंदगी में ज्यादा दिलचस्पी होती है?
या फिर क्या मीडिया इन होटलों में हो रही घटनाओं में इस कदर उलझा हुआ था कि वह दूसरी तरफ ध्यान ही नहीं दे पा रहा था? आप कह सकते हैं कि इन दोनों होटलों में हुई घटनाएं काफी ज्यादा अहम थीं, इसलिए सीएसटी की खबर को ज्यादा तव्वजो नहीं दी गई? आपकी बात में दम है, लेकिन इस घटना की तुलना पिछले साल या उससे पहले ही हुई आतंकवादी घटनाओं को मिले मीडिया कवरेज से कीजिए। यहां बिल्कुल साफ-साफ दिखता है कि मीडिया को उन लोगों की काफी चिंता रहती है, जो उच्च वर्ग से ताल्लुक रखते हैं।

जुलाई, 2006 में मुंबई में सात जगहों पर लोकल टे्रनों में बम धमाके हुए थे। उस हमले में भी उतने ही लोग मारे गए थे, जितने पिछले हफ्ते की आतंकी घटनाओं में मारे गए। लेकिन उन धमाकों को उस स्तर पर कवरेज नहीं मिला, जितना कि पिछले हफ्ते की आतंकवादी हमले को मिला था।
हालांकि, इन दोनों आतंकवादी घटनाओं में दो बड़े अंतर हैं। पहली बात तो यह है कि 2006 के हमले कुछ ही घंटों के दौरान हुए थे। वहीं, पिछले हफ्ते का हमला तीन दिनों तक चला था। दूसरी बात यह है कि ये दोनों हमले अलग-अलग तरह के थे। 2006 में एक अनजान और अनाम आतंकवादी ने लोकल टे्रनों में बम रखे थे, जो एक के बाद एक फटे। वहीं पिछले हफ्ते हाथों में बंदूक थामे आतंकवादियों ने अलग-अलग जगहों पर खुद ही लोगों को मौत के घाट उतारा था।
इन दोनों हमलों में कोई समानता ही नहीं थी। इसलिए हो सकता है कि अभूतपूर्व स्तर पर किए गए इस हमले को दिखाने के लिए तैयारी करने का मौका ही नहीं मिला हो। ऐसा है तो आप उस बाढ़ के बारे में क्या कहेंगे, जिनसे महज कुछ महीनों पहले ही बिहार के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया था? उन मासूम लोगों का क्या, जो हर रोज अलग-अलग आतंकवादी या उग्रवादी संगठनों के हमलों में मारे जाते हैं?
दिक्कत साफ तौर पर उस कवेरज को लेकर कतई नहीं है, जो पिछले हफ्ते मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले को मिला था। असल दिक्कत यह है कि जब आम लोग ऐसे हमलों में मारे जाते हैं, तो उन्हें खबरों में इतनी जगह नहीं मिलती। इसी वजह से तो सवाल उठते हैं कि क्या मीडिया कवरेज का असल मकसद, ज्यादा से ज्यादा लोगों तक खबरों को पहुंचाने का होता है या फिर विज्ञापनदाताओं के सामने ज्यादा से ज्यादा अंक बटोरने का मिसाल के तौर पर बिहार में बाढ़ या फिर छत्तीसगढ क़े किसी गांव में नक्सलियों का हमला तो टीवी चैनलों को उतनी रेटिंग तो कतई नहीं देगा, जितना अमीर हिंदुस्तानियों पर हुआ आतंकवादी हमला दिला सकता है।
यह देखकर भी काफी दुख होता है कि आज मीडिया कवरेज का फैसला उन लोगों के विवेक पर होता है, जो उसके कंटेट के बारे में फैसला करते हैं। इसलिए जन परिवहन प्रणाली पर निशाना साधा जाता है क्योंकि इससे कारों के मालिकों पर बुरा असर पड़ता है। इसीलिए तो लक्जरी होटलों पर हुआ हमला, किसी रेलवे स्टेशनों पर हुए हमले से ज्यादा अहम हो जाता है। सबसे दिक्कत वाली बात यह है कि आज मीडिया और उसे चलाने वाले, दोनों उच्च वर्ग का हिस्सा बन चुके हैं।
इसीलिए तो उनकी चिंताएं उच्च वर्ग की चिंताओं के बारे में बताती हैं, आम हिंदुस्तानियों के बारे में नहीं। यह बात अपने-आप में किसी हमले से कमतर नहीं है।

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पाकिस्तान की चिंताः अगर ६५ आतंकवादी दे भी दिया तो उनका क्या करेंगे भारतीय?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से लेकर प्रशासन तक, सभी इन दिनों परेशान हैं। भारत ने अजीब सी मांग रख दी है कि वहां के ६५ आतंकवादियों को हमें दे दो। पाकिस्तानी नेता इसी को लेकर परेशान हैं कि भारत उन आतंकवादियों को लेकर करेगा क्या? यहां तो पहले से ही कैदियों की संख्या से जेलें कराह रही हैं। कुछ लाइव फायरिंग करने और कराने वाले जेल में बंद हैं। उन पर दस-बीस साल बीत जाने पर भी कोई फैसला नहीं लिया जा सका है। ऐसे में अगर ६५ आतंकवादी और दे दिया तो वे भारत की जेलों में रहकर पाकिस्तान की ही मुसीबत बढ़ाएंगे। उन्हें बेहतरीन सुविधाएं, सैटेलाइट फोन आदि जेल में पहुंचा दिए जाएंगे, भारतीय नेता उनकी तुलना शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद से करेंगे। वे खुलेआम जेलों में बैठकर सुरक्षित रहकर आतंकवादी शिविरों का संचालन करने लगेंगे।