सबकी अपनी अपनी सोच है, विचारों के इन्हीं प्रवाह में जीवन चलता रहता है ... अविरल धारा की तरह...
Friday, August 28, 2009
डूब गया कारोबार, नहीं कोई पुरसाहाल
बिहार में मधेपुरा जिले का मुरलीगंज बाजार कोसी क्षेत्र का ऐसा बाजार है जहां कोलकाता, दिल्ली सहित अन्य शहरों से सीधे कारोबार होता है। बाढ़ के बाद यहां सन्नाटे जैसा है।
कारोबारियों के चेहरे पर बाढ़ का दर्द साफ पढ़ा जा सकता है। वहीं जूट मंडी के 85 फीसदी कारोबारी, इलाका छोड़कर चले गए हैं। बचे कारोबारियों को भी पूछने वाला यहां कोई नहीं है।
मुरलीगंज बाजार में 22 अगस्त 2008 की रात को पानी घुसा। तबाही का मंजर ऐसा था कि मुख्यमंत्री ने अखबारों के माध्यम से अपील की कि सभी लोग इलाका खाली कर दें और संपत्ति का मोह छोड़कर इलाका खाली कर अपनी जान बचाएं। इस कवायद के तहत यहां का बाजार पूरी तरह से खाली करा लिया गया था।
मुरलीगंज बाजार में कुल 1,734 कारोबारी हैं। वहीं करीब 100 कारोबारियों की पूंजी एक करोड़ रुपये से ज्यादा की है। आकलन के मुताबिक इस बाजार में बाढ़ से कुल 19,96,79,587 रुपये का नुकसान हुआ है। यहां रोजाना औसतन 50 करोड़ रुपये का कारोबार होता था।
मुरलीगंज के काशीपुर रोड की ही मिसाल लें तो यहां से रोजाना 2 से 3 करोड़ रुपये का जूट कोलकाता भेजा था। बाद में किसानों की जूट की खेती चौपट हो गई और बाजार भी उजड़ गया। ट्रक, ट्रैक्टर और बैलगाड़ियों से जाम रहने वाली काशीपुर रोड की रोनक ही सूनी पड़ गई।
मुरलीगंज वार्ड नंबर-7 के किराना कारोबारी शिव कुमार भगत ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया,'इस बाजार से गेहूं, मूंग, मक्का, गुलाब बाग मंडी भेजा जाता है, जहां से माल दिल्ली, कोलकाता, कटक और बांग्लादेश सीमा तक भेजा जाता है। कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रियरंजन दासमुंशी के इलाके-कलियागंज में माल यहीं से जाता है।'
भगत ने कहा कि उन्हें तो दोहरी मार झेलनी पड़ी। पहले नेपाल के माओवादियों के डर से नेपाल से कारोबार छोड़कर भागना पड़ा, रिश्तेदारों की कोशिश से मुरलीगंज में कारोबार शुरू किया, उसे भी बाढ़ खा गई।
मुरलीगंज बाजार 200 साल पुराना है। स्थानीय कारोबारियों का कहना है बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बाजार पिछड़ता गया और बदहाल कानून व्यवस्था ने भी इसे प्रभावित किया। 3 साल से स्थिति में सुधार हो रहा था, लेकिन बाढ़ ने सब पर पानी फेर डाला।
कितना नुकसान हुआ मुरलीगंज में-
कारोबारियों की संख्या 1,734
क्षति राशि 19,96,79,587 रुपये
कर्ज़
कैश क्रेडिट अकाउंट 42,03,6,000 रुपये
प्रधानमंत्री रोज़गार योजना 1,16,84,400 रुपये
अन्य स्रोतों से 2,99,60,283 रुपये
मासिक आय 78,28,833 रुपये
बीमा राशि 5,34,49,000 रुपये
दावा राशि 4,46,19,449 रुपए
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Thursday, August 27, 2009
डूबते को नहीं बैंक का सहारा
"बाढ़ में 2,75,000 रुपये का माल डूब गया। 9 बीघा खेत बालू से भरा पड़ा है। बाढ़ में 4 गायें भी डूबकर मर गई। उम्मीद थी कि बीमा राशि से दुकान चल जाएगी, लेकिन बैंक से जानकारी मिली की वर्ष 2008-09 के दौरान बीमा ही नहीं कराया गया है।''
बिहार के सुपौल जिले के बीरपुर बाजार के कारोबारी इस समय अजब संकट में हैं। यहां करीब 100 कारोबारी हैं जो अपनी दुकाने चलाते हैं और इन्होंने भारतीय स्टेट बैंक से कैश क्रेडिट अकाउंट लोन ले रखा है। बैंक हर साल इस कर्ज के आधार पर बीमा करता था, लेकिन वर्ष 2008 में बैंक ने इन बीमा कारोबारियों का बीमा ही नहीं कराया।
बीरपुर बाजार में जायसवाल इंटरप्राइजेज नाम से दुकान चलाने वाले संतोष जायसवाल ने बताया कि 'सीसी अकाउंट से 1 लाख रुपये का कर्ज लिया था। पिछले 4 साल से बैंक हमारी दुकान का बीमा करता था लेकिन वर्ष 2008-09 के दौरान इसने बीमा नहीं कराया। हालांकि बैंक ने इस साल फिर करा दिया है।
बाढ़ में 2,75,000 रुपये का माल डूब गया। 9 बीघा खेत बालू से भरा पड़ा है। बाढ़ में 4 गायें भी डूबकर मर गई। उम्मीद थी कि बीमा राशि से दुकान चल जाएगी, लेकिन बैंक से जानकारी मिली की वर्ष 2008-09 के दौरान बीमा ही नहीं कराया गया है।'
यही स्थिति बाजार के हर कारोबारी की है। 25 कारोबारियों ने अपने कैश क्रेडिट अकाउंट नंबरों के साथ बैंक को आवेदन भी किया लेकिन बैंक से एक ही जवाब मिलता है कि बड़े अधिकारियों को इसके बारे में सूचित कर दिया गया है।
जय स्पेयर केंद्र के संजय कुमार घोष ने कहा कि उन्होंने बैंक से 4 लाख रुपये का कर्ज लिया था। बीमा न होने की क्षतिपूर्ति नहीं मिली और अब उधारी पर काम चल रहा है। बाजार में टाइम सेंटर के नाम से घड़ी की दुकान चलाने वाले वीरेंद्र कुमार मिश्र की तो पूरी दुकान ही नष्ट हो गई है।
टाइटन कंपनी से 3 लाख रुपये का क्रेडिट पर माल लेकर दुकान चला रहे हैं। पुरानी दुकान के किनारे ही उनकी 2 कारें अभी तक मिट्टी में धंसी है, लेकिन दुकान का बीमा ही नहीं हुआ था तो पैसा कैसे मिले।
वीरेंद्र कुमार मिश्र ने कहा कि उनकी दुकान का बीमा फरवरी 09 में करा दिया है, लेकिन बीमा उस दुकान का है जो नष्ट हो चुकी है। मिश्र को डर है कि अगर नई दुकान में कोई हादसा हो जाए तो बीमा कंपनी पैसा नहीं देगी। यही हाल यहां के 25 बीमित कारोबारियों का है।
स्थानीय कारोबारियों ने बताया कि 20 कारोबारी तो ऐसे हैं जिनका सब कुछ खत्म हो गया है और वे अब भी इधर-उधर रिश्तेदारों के यहां दिन काटने को मजबूर हैं। इस सिलसिले में पूछे जाने पर भारतीय स्टेट बैंक के बीरपुर शाखा के प्रबंधक मनोज कुमार मिश्र ने कहा, 'बीमा न होने के बारे में कंट्रोलर को सूचित कर दिया गया है और इस मामले की जांच चल रही है।'
हालांकि उन्होंने इस बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया कि इसका कोई समाधान निकल पाएगा या नहीं।
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कुछ आसरा मिला...और रुक गया मजदूरों का पलायन
मजदूरी करके जीवन गुजारने वाले मजदूरों का बस यही सपना है कि सरकार की ओर से 10,000
रुपये मिल जाएं, जिससे वे बांस की दीवार बनाकर टिन शेड डाल लें। साथ ही जब तक खेत
में मजदूरी नहीं मिलती, सरकार उन्हें गेहूं-चावल और नमक मुहैया कराती रहे।
आज तक मैं यह नहीं समझ पाया
कि हर साल बाढ़ में पडऩे के बाद भी
लोग दियारा छोड़कर कोई दूसरी जगह क्यों नहीं जाते?
अरुण कमल की इस कविता में बाढ़ से हर साल पीडि़त होने वाले लोगों को दर्द छिपा है। लेकिन पिछले साल कोसी नदी का तटबंध टूटने पर उन इलाकों में पानी घुसा था, जहां लोगों ने स्वतंत्रता के बाद से बाढ़ देखी ही नहीं। बलुआ बाजार के दिल्ली चौक (इसे दिल्ली चौक इसलिए कहते हैं कि पूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र के जमाने से लंबे समय तक यहां से दिल्ली की राजनीति तय होती थी) से करीब 15 किलोमीटर दूर गुलामी बिसनपुर वार्ड नं. 1 के युवक पवन पासवान को उम्मीद है कि सरकार उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाएगी और उनकी जिंदगी एक बार फिर पटरी पर आ जाएगी।
इस इलाके में छोटे-छोटे सैकड़ों टोलों में ऐसे परिवार रहते हैं, जिनके पास न तो पक्का मकान है न अपनी जमीन। पहले घास-फूस की झोपड़ी, कुछ बर्तन, कुछ कपड़े और बिस्तर, थोड़ा बहुत अनाज था- जो बाढ़ आने के बाद रेत में दब गया। राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अपील पर गांव के लोग लौटे। उम्मीद थी कि सरकार मदद देगी। उम्मीद पूरी हुई और हर परिवार को दो किश्तों में 4000 रुपये और 1 क्विंटल अनाज मिला, जिसके चलते ग्रामीण नीतीश सरकार से खुश हैं। 74 साल के जोगी पासवान कहते हैं कि इससे पहले उन्होंने कई बाढ़ झेली है, उसके बाद इस इलाके में आकर बसे। उम्मीद थी कि बाढ़ नहीं आएगी, लेकिन ऐसी बाढ़ आई कि इसके पहले उन्होंने जिंदगी में ऐसा नहीं देखा था। जोगी ने कहा, 'बाढ़ में सब कुछ गंवाने के बाद लोग अपनी पुरानी जगह छोड़ देते और ऊंची जगह देखकर चले जाते। वहां की यादें भूल जाते थे। लेकिन इस बार किसी ने अपना स्थान नहीं छोड़ा है। क्योंकि इसी आधार पर पहचान कर सरकार मदद कर रही है।Ó जोगी कहते हैं कि इसके पहले कभी सरकारी मदद मिली ही नहीं, जिसका जहां मन होता था, चला जाता था। कोई दूसरे जिले में चला गया तो कोई दिल्ली-मुंबई। लेकिन इस बार इतनी बड़ी त्रासदी के बाद भी कोई अपना स्थान नहीं छोड़ रहा है।
पास के ही गांव के कांता लाल ने कहा, 'पहले कटान होती थी, तो कोई वापस नहीं आता था। लेकिन सरकार से उम्मीद बंधी तो सब वापस आ गए।Ó गुलामी बिसनपुर में गांव के नाम के सामने 'गुलामीÓ लिखे जाने के बारे में ग्रामीणों ने बताया कि किसी जमाने में यहां लोगों को गुलाम के रूप में लाया गया होगा, जिसके चलते यह नाम पड़ा। गुलामी बिसनपुर के पवन पासवान को सरकार से कोई शिकायत नहीं है। उसे शिकायत है तो स्थानीय जनप्रतिनिधि से, जिसने पशुओं के मरने का 1000 रुपये मुआवजा नहीं मिलने दिया। साथ ही उसने कहा, 'घास-फूस का मकान हम सब लोगों ने मिल-जुलकर बनाया है। अगर सरकार की ओर से अन्य गांवों की तरह हमें भी मदद मिल जाती तो बांस का मकान बनाकर उस पर टिन शेड डाल लेते।
स्थानीय लोगों ने बताया कि ज्यादातर खेतों में बालू आ जाने और स्थानीय लोगों के छोड़कर चले जाने से धान की रोपाई नहीं हुई। बारिश भी इस साल नहीं हुई। इसके चलते मजदूरी करके जीवन यापन करने वालों को भी काम नहीं मिल पाया। किसान से लेकर मजदूर तक सभी सरकार के सहारे हैं। मजदूरी करके जीवन गुजारने वाले मजदूरों का बस यही सपना है कि सरकार की ओर से 10,000 रुपये मिल जाएं, जिससे वे बांस की दीवार बनाकर टिन शेड डाल लें। साथ ही जब तक खेत में मजदूरी नहीं मिलती, सरकार उन्हें गेहूं-चावल और नमक मुहैया कराती रहे।
बातों बातों में अरुण कमल की कविता का जवाब भी जोगी पासवान ने दे दिया... एक भरोसा राम का, एक आस विश्वास।
बारिश में डर-डरकर जिंदगी बिताते हैं कोसी इलाके के लोग
सहरसा जिले के नवहट्टा क्षेत्र स्थित झंगहा गांव में रहने वाले शिवशंकर झा अपनी उम्र का पैंसठवां पड़ाव पार कर चुके हैं। पिछले 15 साल से कोसी नदी के तटबंध उन्हें हर साल डराते हैं। कोसी तटबंध पर मिले झा ने कहा, 'कोसी इलाके में ही जन्म हुआ और इसी की माटी पर पला, बढ़ा हूं। अब पिछले 15 साल से हालत यह है कि बारिश शुरू होते ही रात की नींद गायब हो जाती है। जैसे ही सुनते हैं कि नदी में पानी बढ़ रहा है तो रात को नींद नहीं आती है। तटबंध पर घूमने निकल जाता हूं और देखता हूं कि कहीं तटबंध टूट न जाए।Ó ऐसी स्थिति केवल उन्हीं की नहीं है। नहर के किनारे बसे हजारों गावों के लोग बरसात के मौसम में तटबंध पर घूमते मिलते हैं। उनके बीच केवल एक ही चर्चा रहती है कि कहां-कहां पर तटबंध की कटान हो रही है। नवहट्टा से सटे मल्लाह जाति की फुलिया देवी भी तटबंध पर ही मिलीं। वे शाहपुर की मुखिया हैं। बुजुर्ग होने के साथ-साथ ही उन्होंने कोसी में हो रहे बदलाव को देखा है। बताती हैं, 'अगर किसी भी चीज की देखभाल बंद कर दी जाए, तो आखिर वह कब तक टिकेगी। तटबंध तो मिट्टी की दीवार भर है। पिछले बीस साल से देख रही हूं कि इस पर कभी मिट्टी नहीं पड़ी है।Ó दरअसल कोसी नदी के तटबंध की क्षमता लगातार कम हो रही है। बीरपुर से कोपरिया तक पूर्वी तटबंध की लंबाई 125 किलोमीटर है जो पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है। कुछ ऐसा ही हाल 120 किलोमीटर लंबे पश्चिमी तटबंध का भी है। जर्जर हो चुके पूर्वी तटबंध पर सुरंगनुमा रेनकट बन गए हैं। हालत यह है कि पानी बढ़ते ही सिंचाई विभाग के इंजिनियरों को इसे बचाने के लिए नाकों चने चबाने पड़ते हैं। सिंचाई विभाग के इंजिनियरों का कहना है कि कोसी नदी को नियंत्रित करने के लिए 1955 में तटबंध का निर्माण शुरू किया गया था, जो 1964 में पूरा कर लिया गया। तटबंध बनने के बाद नदी की जलग्रहण क्षमता बहुत ज्यादा थी। 1969 में अधिकतम प्रवाह 9 लाख क्यूसेक मापा गया था। 1990 के बाद नदी में अधिकतम जल प्रवाह 5 से 5।5 लाख क्यूसेक ही रहा है। दोनों तटबंधों के बीच की चौड़ाई 11 किलोमीटर है। शाहपुर गांव के शंकर यादव बताते हैं कि बिहार में जब कांग्रेस का राज था, तो यहां पर चौकी बनाई गई थी। चौकी में हमेशा यहां चौकीदार तैनात रहता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। तटबंध पर जब पानी का दबाव बढ़ता है, उसे रोकने के लिए बांस के खंभे गाड़े जाते हैं, उसके सहारे बालू की बोरियां रखी जाती हैं। गांव के लोग बताते हैं कि सरकार ने इस साल बोल्डर भी गिराए हैं, जिन्हें तटबंध पर बने स्पर के नोज पर रखा गया है। ऐसा पहली बार हुआ है। नवहट्टा स्थित तटबंध पर तैनात सिंचाई विभाग के कर्मचारियों ने कहा कि कटान बढऩे पर ये बोल्डर स्पर के नोज पर रख दिए जाएं, ऐसी व्यवस्था की गई है। गांव वाले सवाल उठाते हैं कि आखिर में जर्जर हो चुके तटबंध कोसी की धार को कब तक थामेंगे? जैसे-जैसे बारिश तेज होती है, बांध के बाहर रह रहे गावों के लोगों की धड़कने तेज होने लगती हैं। तटबंध पर मिले राम सुंदर की उम्र 70 साल हो चुकी है। उन्होंने कहा कि हर साल जब पानी बढ़ता है तो हम लोगों को तटबंध पर आना पड़ता है। तटबंध की मरम्मत के बारे में पूछे जाने पर उनका कहना है कि याद नहीं है कि कभी इस पर मिट्टी भी पड़ी हो। उनका कहना है कि जहां बारिश से कटान ज्यादा हो जाती है, तो उसे मिट्टी डालकर पाट दिया जाता है, बाकी तो आप देख ही रहे हैं कि क्या हालत है।तटबंध के रास्ते बीरपुर से सुपौल आने पर तमाम जगह ऐसी है, जहां तटबंध करीब-करीब खेत के बराबर पहुंच गया है। हालांकि कुछ जगहों पर पिच रोड भी है, लेकिन अधिकांश रास्ता जर्जर हालत में ही है। करीब 45 साल की उम्र पार कर चुके तटबंध को अब किसी उद्धारक की प्रतीक्षा है। भारी मात्रा में सिल्ट जमा हो जाने के कारण तटबंधों की क्षमता घट गई है, वहीं अपना आकार खो चुके तटबंध जलस्तर बढ़ते ही ग्रामीणों को डराने लगते हैं। डर पिछले साल से और ज्यादा बढ़ गया है, क्योंकि केवल 1,67000 क्यूसेक पानी में ही कुसहा में तटबंध टूट गया था। ऐसे में 27 अगस्त की रात तटबंध के किनारे रहने वाले ग्रामीणों ने रतजगा करके काटा था, जब उन्हें रेडियो पर खबर मिली कि 3,12,780 क्यूसेक पानी आ गया है। साथ ही राज्य सरकार भी इलाके के लोगों को पहली बार चुस्त नजर आई, जब ज्यादा पानी आने पर जल संसाधन विभाग के अभियंता प्रमुख (उत्तर) राजेश्वर दयाल बीरपुर पहुंच गए और उन्होंने दो दिन तक कैंप किया। कोसी नदी में इस समय इतना बालू भर गया है कि पूरे बारिश में तटबंध के बाहर के गांवों में कच्चे मकानों में खुद-ब-खुद पानी भर जाता है। हैंडपंप से चौबीसों घंटे अपने आप पानी निकलता रहता है। रात को सोने के बाद खटिया के नीचे से पानी बाहर निकालना पड़ता है। तमाम इलाके तो ऐसे हैं, जहां तटबंध के रेनकट भरने का जिम्मा भी ग्रामीणों ने ले रखा है। बलवा गांव के मदन मोहन मिश्र ने बताया कि तटबंधों पर काम होता ही नहीं है, बारिश होती है तो रातभर नींद नहीं आती। उन्होंंने कहा कि गांव के लोग ही चंदा लगाकर खुद रेनकट भरते हैं। नौलखा गांव में पहुंचने पर तटबंध की हालत और भी खस्ता नजर आती है। हालांकि इस पर लोगों के आने जाने के लिए मिनी बस भी चलती नजर आई। सड़क ऐसी है कि बस कब पलट जाए, कोई भरोसा नहीं। मजाल क्या है कि इस सड़क पर कोई चार पहिया वाहन 15 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार पार कर ले। लेकिन ग्रामीण तो इसे ही अपनी नियति मान चुके हैं। सभी निराश हैं- उन्हें बदलाव की कोई राह नजर नहीं आती।
इनकी भी जिंदगी है
नवहट्टा के पास तटबंध पर मिले अनूप शर्मा और धनिक शर्मा झरबा गांव से आए हैं। उन्हें घर जाने के लिए नाव की प्रतीक्षा है। झरबा गांव कोसी नदी के दोनों तटबंधों के बीच में बसा है। हर साल बाढ़ का पानी इनके घरों को डुबोता है। घरों का डूबना, सामान लेकर बाहर निकल आना और पानी कम होने पर फिर से वहीं आशियाना बसा लेना इनकी जिंदगी है। भेलाही गांव के ललन पासवान बताते हैं कि 40-45 गांव के लोग हैं, तो इसी स्थान से नाव पकड़कर अपने घरों को जाते हैं। कोसी तटबंध के भीतर बीरपुर से लेकर कुशेश्वर स्थान तक करीब 800 छोटे-छोटे टोले और गांव हैं, जो हर साल पानी में डूबते हैं और बाहर निकलकर अपने रिश्तेदारों और तटबंधों पर तीन महीने के लिए आशियाना बसा लेते हैं। इन गावों के ज्यादातर लोग पलायन कर चुके हैं। हर परिवार के लोग कहीं न कहीं दूसरे राज्य में जाकर नौकरी करता है और परिवार के कुछ लोग तटबंध के भीतर रहते हैं। यहां बाकायदा पंचायतें हैं, वोटिंग होती है और ये लोग अपने विधायक और सांसद भी चुनते हैं। लेकिन इनके दर्द की कोई दवा पिछले 45 साल से नहीं बनी। ललन पासवान से यह पूछने पर कि आखिर आप लोग यहां क्यों रहते हैं- वे उल्टा सवाल दाग देते हैं कि आप ही बता दीजिए कि क्या करें? इन इलाकों में एक फसल हो जाती है, जब बाढ़ का पानी नहीं रहता। इलाके के लोग बताते हैं कि यहां झींगा खाना सस्ता है, आलू महंगा है।
Wednesday, August 26, 2009
बाढ़ से फिर पहुंचे दर्द के उसी मुकाम पर
अगर कहीं और कारोबार शुरू करने का अवसर मिले तो इलाके को छोड़ना पसंद करेंगे- उनका चेहरा खिल जाता है और कहते हैं, 'तत्काल छोड़ देंगे'।
उन्होंने कहा, 'गंजी पहनकर आए थे, गंजी पर आ गए। पाकिस्तान (बांग्लादेश) में तूफान देखे थे। कभी ऐसी हालत नहीं देखी। यह विनाश था, बाढ़ नहीं।' दरअसल भारत के विभाजन के वक्त फूलचंद अग्रवाल पाकिस्तान छोड़कर मुरलीगंज आ गए थे और यहां पर फिर से जिंदगी शुरू की थी, लेकिन कुसहा में तटबंध टूटने से आई बाढ़ ने उन्हें फिर उसी मुकाम पर खड़ा कर दिया है, जैसे वे आए थे।
बाढ़ ने अग्रवाल परिवार का पूरा कारोबार लील लिया। करीब 30 लाख का नुकसान हुआ। 24 लाख के करीब का तो खाद और बीज नष्ट हो गया। फूलचंद अग्रवाल के पुत्र रामगोपाल अग्रवाल बताते हैं कि बीमा कंपनी के सर्वेयर कहते हैं कि आप लोग माल निकालकर कहीं और लेकर चले गए हैं।
इस इलाके का एक भी आदमी ऐसा नहीं कह सकता कि नुकसान नहीं हुआ, लेकिन बीमा कंपनियों को लगता है कि कुछ हुआ ही नहीं। हालांकि उनके यहां नैशनल फर्टिलाइजर, कृभको श्याम फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (केएसएफएल) नागार्जुन फर्टिलाइजर्स ऐंड केमिकल्स लिमिटेड (एनएफसीएल) इंडियन पोटाश लिमिटेड (आईपीएल) जैसी सरकारी कंपनियों से माल आता है और माल आने और बिकने सहित गोदाम में बचे माल का लेखा जोखा दर्ज होता है।
सारे काजगात दिए जाने के बाद भी सिर्फ फोन आते हैं कि फलां कागज को फिर से भेज दीजिए- इसके अलावा कुछ नहीं हुआ। राम गोपाल अग्रवाल बताते हैं कि 22 अगस्त को बाजार में पानी आया। 23 अगस्त को सब कुछ छोड़कर चल पड़े। पहली बार तो करीब 8 किलोमीटर पैदल चलकर गोशाला पहुंचे, जहां नाव मिलती थी, लेकिन नाव ही नहीं मिली।
दूसरी बार जाने पर नाव मिली तो भागकर कटिहार में अपने रिश्तेदार के यहां पहुंचे। अपना दर्द बयान करते हुए वे कहते हैं कि पिछले साल दशहरा की पूजा भी विस्थापित के रूप में ही हुई थी। उस समय तो ऐसा लगा था कि सब कुछ छोड़कर जाना पड़ेगा। वापस लौटे तो सब कुछ बर्बाद हो चुका था।
अब रिश्तेदारों से पैसा लेकर कारोबार फिर से शुरू किया है, 10 लाख रुपये का माल भी है- लेकिन अब नहीं लगता कि कारोबार को अपनी जिंदगी में उस मुकाम पर पहुंचा पाएंगे, जहां बाढ़ के पहले था। दरअसल खेती पर निर्भर कारोबार ही इस इलाके का बड़ा कारोबार है। खेतों में बालू भर जाने और कोसी से निकली नहर के क्षत-विक्षत हो जाने से कृषि कार्य पूरी तरह से ठप है। कारोबार चले भी तो कैसे।
कारोबार घटकर 15-20 प्रतिशत रह गया है। इलाके के पेड़ पौधे नष्ट हो गए हैं। जो आम 10 रुपये किलो मिलता था, इस साल 30 रुपये किलो बिका। यह पूछे जाने पर कि अगर कहीं और कारोबार शुरू करने का अवसर मिले तो इलाके को छोड़ना पसंद करेंगे- उनका चेहरा खिल जाता है और कहते हैं, 'तत्काल छोड़ देंगे'।
बाढ़ के ज़ख्म पर बीमा बना नमक
बीमा सामान्यतया इसलिए कराया जाता है कि नुकसान होने पर मदद मिले, लेकिन बीमा अपने आप में मुसीबत है। बिहार के मधेपुरा जिले के मुरलीगंज के कारोबारियों के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। कुछ कारोबारियों ने तो स्पस्ट कह दिया है कि वे अब अपने कारोबार का बीमा नहीं कराएंगे।
पिछले साल कोसी नदी का तटबंध टूटने से आई बाढ़ के बाद बाजार का कारोबार पूरी तरह से चौपट हो गया था। कोई ऐसा नहीं बचा, जिसे नुकसान न हुआ हो।
कारोबारी अपने व्यवसाय का बीमा भी कराते आ रहे हैं, लेकिन 15 साल से भारी भरकम बीमा प्रीमियम दे रहे कारोबारियों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि अगर उनका कारोबार चौपट हो जाए, तो बीमा कंपनियां बीमित राशि के भुगतान करने में रुला देंगी।
कारोबारियों का कहना है कि अभी करीब 90 प्रतिशत बीमा राशि का भुगतान नहीं हुआ है। मुरलीगंज बाजार में श्री राजहंस इंडस्ट्रीज के मालिक विनोद बाफना बताते हैं कि मुख्यमंत्री के इलाका खाली करने के अपील के बाद जायदाद के कागजात के अलावा वे सब कुछ छोड़कर चले गए थे।
3 महीने शरणार्थी की तरह कटिहार में दिन काटने के बाद वापस लौटे तो सब कुछ बर्बाद हो चुका था। खाद, बीज और कीटनाशकों की बोरियां भी नहीं बची थीं, सारा माल पानी में बह गया। बोरियों का प्रयोग शायद बालू भरकर कटान रोकने में प्रयोग कर लिया गया। बाफना ने बैंक से 51 लाख रुपये कर्ज ले रखा है और उसका मासिक ब्याज 65 हजार रुपये आता है।
15 साल से लगातार बीमा करा रहे बाफना ने पिछले साल भी 47,000 रु. सालाना प्रीमियम देकर 70,00,000 रु. का बीमा कराया था। कारोबार में हुए नुकसान को देखते हुए उन्होंने महज 30,53,825.30 रुपये का बीमा दावा किया, लेकिन उन्हें आज तक बीमा की राशि नहीं मिली। यही हाल कृषि विकास केंद्र के राम गोपाल अग्रवाल का है, जिनका बाढ़ में कुल 30 लाख रुपये का नुकसान हुआ।
उन्होंने दुकान में हुई क्षति के लिए 24 लाख क्लेम किया, लेकिन अभी तक बीमा राशि का भुगतान नहीं हुआ। छोटे कारोबारियों में रवि इलेक्ट्रॉनिक्स के नाम से दुकान चलाने वाले शिवशंकर भगत को 4 लाख रुपये का नुकसान हुआ, लेकिन उन्होंने बीमा दावे के मुताबिक 2 लाख का क्लेम किया, लेकिन एक ढेला भी नहीं मिला।
क्षेत्रीय खाद बीज भंडार के संतोष कुमार ने 11 लाख रुपये बीमा क्लेम किया, लेकिन अब तक बीमा राशि का भुगतान नहीं हुआ। ओरियंटल इंश्योरेंश के चीफ रीजनल मैनेजर सुशील कुमार ने कहा, 'यह इलाका हमारी प्राथमिकता में है और तेजी से बीमा राशि का भुगतान किया जा रहा है।'
उन्होंने यह भी दावा किया कि 2 महीने के भीतर सभी क्लेम क्लीयर कर दिए जाएंगे। विनोद बाफना ने तो बीमा से तौबा कर लिया है। उन्होंने बैंक में लिखकर दे दिया है कि अब बीमा नहीं कराएंगे। वे कहते हैं कि आखिर क्या फायदा है बीमा का कारोबार शुरू करने के लिए पैसा नहीं मिला, बैंक में कर्ज का ब्याज अलग बढ़ रहा है।
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Friday, August 7, 2009
.... कोसी की अजब कहानी
खेतों में भरी है बालू
पानी की जबरदस्त किल्लत
मॉनसून में देरी से बिगड़ गई बुआई
सत्येंद्र प्रताप सिंह / चैनपुर/सुपौल
बिहार में सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, अररिया, कटिहार और पूर्णिया जिलों के खेत इस साल सूखे पड़े हैं। बाढ़ ने पिछले साल इन इलाकों को डुबाया ही था, नहर की व्यवस्था ध्वस्त होने से खेतों में पानी नहीं पहुंच रहा है। मानसूनी बारिश न होना भी कोढ़ में खाज बन गया है।
कोसी नदी से सिंचाई के लिए निकाली गई पूर्र्वी नहर से इन सभी जिलों में सिंचाई होती थी। लेकिन कुसहा में तटबंध टूटने के बाद सिंचाई की व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई जिससे इलाके के किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है।
खेतों में बालू भरा पड़ा है और सिंचाई के लिए पानी की किल्लत हो गई है। जिन खेतों में बुआई होनी थी, बारिश की कमी की वजह से वे भी बांझ की तरह हैं, जिनमें बीज ही नहीं पड़ सकते। चैनपुर गांव के कलानंद यादव के पास 3 एकड़ जमीन है। लेकिन उनकी खेती-किसानी बिलकुल चौपट हो चुकी है।
खेत में बालू जमा है और गांव की कुछ जमीन पर सब्जी उगाकर उसे स्थानीय बाजार में बेचने जाते हैं। यादव कहते हैं, 'कोसी ने हमारे खेतों को विधवा बना दिया है। उस से निकली नहर के पानी से ही खेतों का श्रृंगार होता था। खेतों में बालू के बावजूद अगर पानी होता तो कुछ न कुछ उपजा ही लेते।'
हालांकि ग्रामीणों ने बताया कि सरकार ने 130 रुपये कट्ठा से हिसाब से मुआवजा दिया है। कोसी से निकली पूर्वी नहर की सिंचाई क्षमता करीब 8.5 लाख हेक्टेयर थी लेकिन नहरों में अवसाद जमा हो जाने से क्षमता घटकर 3 से 4 लाख हेक्टेयर तक रह गई।
नाम न छापने की शर्त पर सिंचाई विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं,'पूर्वी नहर के राजपुर ब्रांच की मरम्मत की गई है लेकिन काम की रफ्तार धीमी है। इस रफ्तार से काम में काफी वक्त लग जाएगा।'
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Thursday, August 6, 2009
फिर खिलेगा उजड़ा चमन
सत्येंद्र प्रताप सिंह / बीरपुर/सुपौल
साल भर पहले चारों ओर कयामत थी। जीवन देने वाला पानी बस्तियों-गांवों को श्मशान में तब्दील भी कर सकता है, इसके सबूत कोसी के आसपास बिखरे पड़े थे, चिल्ला चिल्लाकर अपनी कहानी कह रहे थे।
उस वक्त जो बचा, उसने आसमान की तरफ रुख कर ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया। एक साल बीत गया है, लेकिन उस खौफनाक मंजर की यादें ताजा हैं। यह बात अलग है कि नए सिरे से जिंदगी का सफर शुरू करने की जद्दोजहद चालू हो गई है।
कुसहा में टूटे तटबंध की मरम्मत के बाद इलाके के ग्रामीणों में खुशी है। खुशी है कि इस बार बाढ़ उनके सपने नहीं लीलेगी। लेकिन अभी रहने और खाने का ठिकाना नहीं है। अब तक तो सरकार की दी गई आर्थिक मदद और अनाज से गुजर बसर हुई। बाढ़ से निकलने के बाद 3 महीने बाद घर लौटे तो बालू और पानी के सिवा कुछ नहीं मिला।
पुरैनी गांव के वार्ड नंबर 14 के मंतलाल मंडल ने कहा, 'सब कुछ तो खत्म हो गया था, घार-बार, पशु सब कुछ खत्म हो गया। सरकार से रोटी मिली और ओडीआर की मदद से घर बन रहा है।'
दरअसल बीरपुर से सटे सभी गांवों से जहां से पानी की धार गुजरी सब कुछ लीलती गई। गांव के लोगों को अपनी जिंदगी फिर शून्य से शुरू करनी पड़ रही है। पुरैनी गांव में ज्यादातर लोग मजदूरी करते हैं, कुछ श्रमिक हैं तो कुछ मकान बनाने वाले राज मिस्त्री हैं।
ओडीआर नाम का स्वयंसेवी संगठन गांव को दोबारा बसाने में जुटा है। कारीगर और श्रमिक गांव के ही हैं लेकिन कंक्रीट, सीमेंट जैसी जरूरी चीजों के लिए संस्था ने कुल 55,000 रुपये प्रत्येक मकान के लिए मदद दी है।
गांव में कुल ऐसे 89 परिवार हैं जिनके लिए मकान बनाए जा रहे हैं। सरकार की मदद की आस में इस इलाके में लोग बने हुए हैं नहीं तो इन लोगों के पास ऐसा कुछ भी नहीं है जो इन्हें यहां रुकने को मजबूर कर सके।
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Wednesday, August 5, 2009
संसद के इतिहास में पहली बार बनियों पर हंगामा
आखिर संसद में बोलते हुए मुलायम सिंह ने क्या बुरा कहा था कि केंद्र सरकार की कृषि पर गठित समिति ने गेहूं का प्रति क्विंटल उत्पादन मूल्य ९०० रुपये बताए थे, साथ ही कहा था कि कच्चा माल होने की वजह से इस पर किसानों को ५० प्रतिशत मुनाफा मिलना चाहिए जैसा कि अन्य कारोबार में होता है। मुलायम ने पूछा कि किसानों को सरकार गेहूं की यह कीमत कब देगी? लेकिन सवाल दब गया। यहां तो समलैंगिकता महत्वपूर्ण सवाल है, राखी सावंत का विवाह देश के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। ८० करोड़ किसानों को पूछने वाला कौन है????
Tuesday, July 21, 2009
एक गायिका को करीब से जानने की कोशिश
"वह याद करती हैं, 'मैं कड़ी मेहनत किया करती थी। दिन-रात गानों की रिकॉर्डिंग। एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियों में भागना।' इसका नतीजा यह था, 'मैं दिनभर भूखी रह जाती, क्योंकि तब मैं यह नहीं जानती थी कि रिकॉर्डिंग स्टूडियो में कैंटीन भी होती है और वहां से मैं खरीद कर कुछ खा सकती हूं या चाय ले सकती हूं। अक्सर मैं पूरे दिन बिना खाए और पानी पिए रह जाती। "
अगर आपको मौका दिया जाए तो आप लता मंगेशकर को गाते हुए सुनना पसंद करेंगे या उनकी बातचीत?
बेशक इस पर बहुत अधिक वाद-विवाद की गुंजाइश नहीं है, खासतौर पर तब जब आप सचिन तेंडुलकर की ही तरह मंगेशकर की आवाज के बारे में कह रहे हों।
लंदन की डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्माता नसरीन मुन्नी कबीर ने चैनल 4 के लिए 6 कड़ियों वाली एक डॉक्यूमेंटरी लता मंगेशकर पर बनाई थी और अब कई साल बाद उनके कुछ और साक्षात्कारों के साथ उन्होंने इसे किताब में तब्दील कर दिया, जिसमें पाठकों को गायिका के बारे में काफी कुछ जानकारी मिलेगी।
इसमें लता मंगेशकर ने अपने जीवन और उनकी खुद की आवाज में गाए गए गानों के बारे में बातचीत की है। यह मंगेशकर की आत्मकथा के काफी नजदीक है, जिसमें उनके निजी जीवन से जुड़े विवादों (राज सिंह डूंगरपुर के साथ उनके संबंध)की तस्वीर नहीं है, लेकिन कामकाज की दुनिया से जुड़े कई ऐसे विवादों का जिक्र है।
इन विवादों को उन्होंने बेहद ही शांत और साधारण तरीके से खत्म भी कर दिया। ये विवाद भारत की स्वर कोकिला बनने के 6 दशकों के साथ-साथ ही उनके सामने आते रहे। सांगली के बड़े घर में जहां लता मंगेशकर के पिता थिएटर कंपनी चलाया करते थे, वहीं वह पैदा हुईं और उन्होंने संगीत सीखने की शुरुआत की।
संगीत सीखने के लिए उनके पिता ने अनमने मन से अपनी स्वीकृति दी थी और बचपन में उन्होंने अपने पिता के साथ ही संगीत की शुरुआत भी की। मंगेशकर मानती हैं कि अपनी रोजमर्रा की दीक्षा से बचने के लिए वह 'बहाने बनाती थीं।' वह कहती हैं, 'मैं बहुत छोटी थी और खेलना मुझे बेहद पसंद था', 'मैं ऐसा जताती थी जैसे मेरे सिर या पेट में दर्द हो रहा हो।'
उनके पिता ने उन्हें समझाया, 'हमेशा याद रखो- चाहे गुरु या तुम्हारे पिता तुम्हें सिखा रहे हों- जब भी तुम गाओ तुम सिर्फ अपने बारे में सोचो कि तुम्हें उनसे बेहतर गाना है। यह कभी मत सोचो कि उनकी मौजूदगी में मैं कैसे गा सकूंगी? इसे याद रखना। तुम्हें अपने गुरु से आगे बढ़ना है।' यह ऐसा सबक था जो जीवनभर तक उनके साथ बना रहेगा।
कबीर को उन्होंने बताया, 'बाबा के इन शब्दों को मैं कभी नहीं भूलूंगी।' 'लता मंगेशकर ... इन हर ओन वॉयस' काफी दिलचस्प है, क्योंकि इस किताब के ज्यादातर हिस्से को साक्षात्कार के रूप में लिखा गया है। इन साक्षात्कारों को दिनों या सप्ताहों में नहीं, बल्कि वर्षों में लिखा गया।
मंगेशकर याद कर कहती हैं, 'फिल्मी संगीत को घर पर कभी बहुत नहीं सराहा गया' 'और मेरे पिता एक रूढ़िवादी व्यक्ति थे। हम कैसे तैयार होते हैं, इसे लेकर उनका रवैया काफी कठोर था। हमने कभी पाउडर या मेक-अप नहीं लगाया। हम खुलेआम बाहर जा नहीं सकते थे। नाटक देखने के लिए देर रात हम बाहर जाएं, बाबा को यह पसंद नहीं था, यहां तक कि उनके खुद के।'
कुछ समय बाद ही परिवार के भाग्य ने करवट ली, सांगली मैंशन नीलाम हो गया और उनके पिता का निधन हो गया। वह घर में सबसे बड़ी थीं, तो उन्हें लगा कि आर्थिक जिम्मेदारी को वह बतौर अभिनेत्री पूरा कर सकती हैं। उन्होंने पहले मराठी और बाद में हिंदी सिनेमा में कोशिश की। उन्हें बताया, 'मेरे पास कोई और विकल्प नहीं था', 'लेकिन मुझे मेक-अप, लाइटें, लोगों का आपको आदेश देना, अपने संवाद पढ़ना कभी पसंद नहीं आया। मैं काफी असहज महसूस कर रही थी।'
यह सौभाग्य ही था कि शास्त्रीय संगीत में उनकी शिक्षा और आवाज पर उनका नियंत्रण इतना अच्छा था कि उन्हें कुछ प्लेबैक का काम मिलना शुरू हुआ। कुछ साल बाद फिल्म 'महल' के गाने 'आएगा आनेवाला' से लता को स्थापित होने में मदद मिली। लता अपने काम के लिए जीती हैं।
वह याद करती हैं, 'मैं कड़ी मेहनत किया करती थी। दिन-रात गानों की रिकॉर्डिंग। एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियों में भागना।' इसका नतीजा यह था, 'मैं दिनभर भूखी रह जाती, क्योंकि तब मैं यह नहीं जानती थी कि रिकॉर्डिंग स्टूडियो में कैंटीन भी होती है और वहां से मैं खरीद कर कुछ खा सकती हूं या चाय ले सकती हूं। अक्सर मैं पूरे दिन बिना खाए और पानी पिए रह जाती।'
पांच दशकों बाद भी 'मैं यह नहीं कह सकती की मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी है, लेकिन यह बुरी भी नहीं है, क्योंकि मैंने बहुत काम किया है।' रिहर्सल का क्या और स्टूडियो का मिल जाना जब दिन की शूटिंग समाप्त हो जाए, 'हम स्टूडियो की छत पर जाते थे और रातभर रिकॉर्डिंग किया करते थे। वह जगह धूल से भरी हुई थी, लाइटें उस वक्त भी काफी गर्मी पैदा करती थी। हम आवाज के चलते पंखों का इस्तेमाल भी नहीं कर सकते थे।'
लता के व्यक्तित्व का पता इस बात से ही चल जाता है कि उर्दू बोलने पर जब दिलीप कुमार ने उनकी आलोचना की तो उन्होंने उर्दू सीखी। वे यह भी कहती है, 'नैट किंग कोल, बीटल्स, बारबरा स्ट्रीसैंड और हैरी बेलाफोंट उनके पसंदीदा गायक हैं।' मोहम्मद रफी से 'रॉयल्टी पर' उनका झगड़ा हुआ और राज कपूर ने जब 'सत्यम शिवम सुंदरम' के लिए कंपोजर को बदला तो इस पर शम्मी कपूर से उनकी तू-तू, मैं-मैं हुई।
लोगों की हूबहू नकल करना उन्हें बेहद पसंद है, उनकी कारें सबसे पहले सलेटी हिलमैन बाद में शेव्रले, क्राइसलर और पुरानी मर्सीडिज के बाद यश चोपड़ा की ओर से 'वीर जारा' के लिए उन्हें तोहफे के रूप में मिली मर्सीडिज उनकी पसंदीदा चीजों की फेहरिस्त में शामिल है। लता को सिगरेट का धुआं पसंद नहीं, लेकिन हीरे और एमेराल्ड बेहद पसंद हैं।
क्रिकेट और मर्लिन डिट्रिच को स्टेज पर देखने के लिए उनकी विदेश यात्राएं उनका जोश बढ़ा देती हैं। इस किताब में शामिल उनके खुद पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण ने इस किताब को और भी यादगार बना दिया है। लता का कहना है, 'मैं हमेशा खुद पर निर्भर करती हूं।' 'इस मामले में, मैंने खुद अपने मुकाम हासिल किए हैं। मैंने लड़ना सीखा। मैं कभी किसी से नहीं डरी। मैं निडर हूं।'
पुस्तक समीक्षा
लता मंगेशकर ... इन हर ओन वॉयस
नसरीन मुन्नी कबीर के साथ बातचीत
प्रकाशक : नियोगी बुक्स
कीमत : 1,500 रुपये
पृष्ठ : 268
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पुतिन की सोच, सभी की समझ से परे
"अगर दुनिया चीन का उत्थान देख रही है और डर से भी वाकिफ है तो वह यह भी जानती है कि चीन डर और शंका के साथ रूस की सोवियत काल के बाद की राजनीति का ही अनुसरण कर रहा है। इस रूसी पहेली के केंद्र में हैं व्लादीमिर पुतिन। पुतिन एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें रूसी जनता का जबरदस्त समर्थन हासिल है।"
गोल्डमैन सैक्स के लोकप्रिय संक्षिप्त नाम ब्रिक में वर्ष 2050 तक ब्राजील, भारत और चीन के साथ रूस को देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में नामित किया गया है।
इन चारों में से रूस हालांकि अपनी भौगोलिक स्थिति के लिहाज से अलग है, क्योंकि यह यूरोप और एशिया दोनों महाद्वीपों में फैला हुआ है। इसके अलावा एक वक्त था जब रूस दुनिया की महाशक्ति के रूप में जाना जाता था।
अगर दुनिया चीन का उत्थान देख रही है और डर से भी वाकिफ है तो वह यह भी जानती है कि चीन डर और शंका के साथ रूस की सोवियत काल के बाद की राजनीति का ही अनुसरण कर रहा है। इस रूसी पहेली के केंद्र में हैं व्लादीमिर पुतिन। पुतिन एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें रूसी जनता का जबरदस्त समर्थन हासिल है।
वजह भी वाजिब है। पुतिन ही वह व्यक्ति हैं, जिन्होंने येल्तसिन के बाद के वर्षों में रूसी अर्थव्यवस्था में मचे कोहराम को शांत किया। पुतिन के सत्ता में आने के बाद के वर्षों में रूसी अर्थव्यवस्था में जबरदस्त सुधार देखा गया, जिसमें अहम योगदान तेल और गैस की बढ़ती कीमतों का रहा।
पिछले साल के अंत में केजीबी के इस पूर्व अधिकारी ने राजनीतिक विश्लेषकों को हक्का-बक्का कर दिया। अपनी जगह पुतिन ने अपने विश्वासपात्र दमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति पद के लिए अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और खुद प्रधानमंत्री बन बैठे।
2008 में राष्ट्रपति पद छोड़ते वक्त उन्होंने पत्रकारों से कहा था, 'मैं क्रैमलिन छोड़ रहा हूं, रूस नहीं।' और उन्होंने अपना वादा निभाया, भले ही उनके प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद किसी ने न की हो। इसलिए क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़े देश कीअर्थव्यवस्था और भविष्य की विश्व राजनीति का सूत्रधार कौन है?
क्या वह आधुनिक युग का राजनेता है, जिसमें 17वीं शताब्दी के जार की सोच समाई हुई है? क्या वह पूंजीवादी के भेष में स्टालिनवादी है? डाई वेल्ट के प्रमुख संवाददाता माइकल स्टूअर्मर ने अपनी पुस्तक की भूमिका में लिखा है, 'दो शताब्दियों में ऐसा पहली बार नहीं है कि रूस अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर दुनिया को हैरत में डाल चुका है।'
दुर्भाग्यवश, 228 पेज की उनकी किताब और अधिक जानकारी मुहैया नहीं करा पाई। अपनी लगन में पक्के स्टूअर्मर के हाथ भी पत्रकारों पर लगी सोवियंत संघ की पाबंदियों से बंधे हैं, हालांकि देश अपने चेहरे से मार्क्सवादी मुखौटे को उतार कर फेंक चुका है और देश की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में तब्दील हो चुका है।
नतीजतन, रूस पर नजर बनाए हुए किसी भी दूसरे व्यक्ति की ही तरह स्टूअर्मर के स्रोत भी पुतिन की सार्वजनिक सभाओं और प्रेस सम्मेलनों तक ही सीमित रहे। इसमें उनके साक्षात्कार की भी झलक देखने को नहीं मिली। स्टूअर्मर ने अपनी पुस्तक की शुरुआत वर्ष 2007 में पुतिन के सुरक्षा सम्मेलन पर एक भाषण से की है।
म्युनिख में अपने इस भाषण के दौरान पहली बार पुतिन ने दुनिया के सामने अपना दृष्टिकोण रखा था। यह भाषण बुनियादी सच्चाई से जुड़ा हुआ था, क्योंकि इसमें सोवियत के बाद पश्चिमी देशों के शोषण और घेराव के डर को लेकर रूस की चिंता साफ दिखाई देती थी। साथ ही इसमें पहली बार दुनिया में रूस की स्थिति को लेकर उनका दृष्टिकोण देखने को मिला था, जिसमें वैश्विक मामलों में रूस भी एक बराबर का भागीदार था।
स्टूअर्मर ने लिखा है, 'भविष्य में इतिहासकार म्युनिख में पुतिन के इस भाषण को असहजता से उपजी हुई एक नपी-तुली चुनौती के रूप में देखेंगे।' 'म्युनिख में पश्चिमी देशों ने ऐसी चीजों का जिक्र किया, जो पुतिन नहीं चाहते थे। लेकिन क्या पुतिन जानते थे कि वह खुद क्या चाहते हैं।'
जिन पाठकों को किताब में इस सवाल के जवाब की उम्मीद होगी, उन्हें निराशा ही हाथ लगेगी। शुरुआती अध्यायों में रूस के सोवियत के बाद के इतिहास पर से धूल हटाई गई है और उन्होंने इसमें एक कहानी बुनी है, जिसमें उन्होंने तेजी से आगे बढ़ रहे पुतिन को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाया है जो अब किसी खास जगह से जुड़ा हुआ नहीं है।
इस पुस्तक में जो सबसे दिलचस्प अध्याय लगा वह है, 'पुतिन्स पीपल'। इसमें स्टूअर्मर ने क्रैमलिन के एक वरिष्ठ अधिकारी ओलेग श्वार्त्समैन के रूस के एक व्यावसायिक समाचार पत्र में छपे साक्षात्कार से कुछ बातें डाली हैं। स्टूअर्मर का कहना है कि इस साक्षात्कार से 'आज के रूस में सत्ता की ताकत की कार्यप्रणाली की आंतरिक तस्वीर देखने को मिली है।'
असल में उन्होंने जो बताया, वह 'वैक्यूम क्लीनर प्रणाली' के रूप में जाना गया। उन्होंने अपने साक्षात्कार में कहा, 'यह वैक्यूम क्लीनर की तरह काम करता है, जो कंपनियों की परिसंपत्तियों को सोख कर ऐसे ढांचे में डाल देती हैं, जो जल्द ही सरकारी निगमों में तब्दील हो जाते हैं। इसके बाद इन परिसंपत्ति को पेशेवर अगुआओं के हाथों सौंप दिया जाता है। ये उपाय स्वेच्छा और अनिवार्यता दोनों तरीकों से लागू होते हैं... ये सरकार के हाथों में परिसंपत्ति के समेकन के लिए आज के दिशा-निर्देश हैं।'
बाकी किताब के लिए स्टूअर्मर ने गैजप्रॉम की ताकत और विकास के लिए रूस की तेल और गैस की कीमतों पर अनिश्चित निर्भरता पर रोशनी डाली है। उन्होंने देश के जनसांख्यिकीय संकटों, जिनमें आदमी ज्यादातर शराब पीने की वजह से मर रहे थे और जनसंख्या धीमी रफ्तार से बढ़ रही है, का भी जिक्र किया।
हैरत की बात है कि इसमें इस बात की भी चर्चा की गई है कि रूसी जनसंख्या कम हो रही है, जबकि मुस्लिमों की संख्या में इजाफा हो रहा है। गौरतलब है कि इस्लाम धर्म को लेकर वहां भेदभाव होता है। ऐसा ही भेदभाव हिटलर ने यहूदियों के खिलाफ किया था।
पुस्तक इस मायने में उपयोगी है कि इससे आपको रूस की समस्याओं के बारे में तत्काल जानकारी मिल जाती है। यदि पुतिन के रूस में वाकई आंतरिक जानकारी हासिल करनी हो तो पत्रकार ऐना पोलित्कोव्स्काया (जिनकी हत्या की गई) की पुस्तक हमेशा आदर्श रूप में देखी जाती है।
पुस्तक समीक्षा
पुतिन ऐंड दी राइज ऑफ रशिया
लेखक : माइकल स्टूअर्मर
प्रकाशक : हैशे इंडिया
कीमत : 650 रुपये
पृष्ठ : 253http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=19238
Thursday, July 16, 2009
नाबालिगों की रक्षा के लिए भी होता था धारा 377 का इस्तेमाल
श्रीलता मेनन"क्या यह मामला समलैंगिक संबंध रखने वालों की नैतिक विजय है, ऐसा मुश्किल से कहा जा सकता है। ऐसा एक भी मामला नहीं है जहां इस धारा का इस्तेमाल समलैंगिकों या सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने वालों के खिलाफ किया गया हो।"
समलैंगिक संबंधों पर पाबंदी लगाने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल में असंवैधानिक घोषित किया है।
यह फैसला ऐसे लोगों को जीत का झूठा अहसास दिला रहा है जिन्हें लगता है कि यह मामला समलैंगिक अधिकारों की रक्षा करने वाले लोगों और इसका विरोध करने वालों के बीच संघर्ष का था।
लेकिन यह मामला समलैंगिकों के अधिकारों से कतई संबंधित नहीं है। हकीकत तो यह है कि इस धारा का इस्तेमाल नाबालिगों की यौन उत्पीड़न से रक्षा करने में भी किया जाता रहा है।
अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जे. एन. सल्डान्हा ने भी एक बार इस धारा का इस्तेमाल यौन उत्पीड़न के शिकार हुए 10 साल के बच्चे को इंसाफ देने में किया था और इस मामले में दोषी पाए गए एक तांत्रिक को 10 साल की कैद व 25 लाख रुपये के जुर्माने की सजा मिली थी।
न्यायमूर्ति सल्डान्हा का कहना है कि किशोर न्याय अधिनियम और बाल अधिनियम बच्चों की रक्षा के लिए मौजूद हैं, लेकिन इन अधिनियमों में यौन उत्पीड़न से बच्चों की रक्षा के लिए कठोर प्रावधान नहीं हैं। उन्होंने कहा - हालांकि यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय तक ही सीमित है, लेकिन अब बेहतर यही होगा कि इस धारा के बारे में बातचीत भूतकाल में ही की जानी चाहिए।
स्वतंत्रता एवं समानता के मौलिक अधिकार के आलोक में इस धारा को उच्च न्यायालय ने असंवैधानिक घोषित किया है। न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे में कानूनी रूप से यह सभी अदालतों और भविष्य के मामलों को संदेह के घेरे में लाता है। अब नाबालिगों केलिए क्या बचा है?
क्या यह मामला समलैंगिक संबंध रखने वालों की नैतिक विजय मानी जाएगी, ऐसा मुश्किल से कहा जा सकता है। ऐसा एक भी मामला नहीं है जहां इस धारा का इस्तेमाल समलैंगिकों या सहमति से समलैंगिक संबंध बनाने वालों के खिलाफ किया गया हो।
लेकिन याचिका दाखिल करने वाले संगठन नाज फाउंडेशन का दावा है कि इस कानून की वजह से भारत में समलैंगिक संबंध रखने वाली महिलाओं और पुरुषों, उभयलिंगी और ट्रांसजेंडर लोगों को ब्लैकमेलिंग, उत्पीड़न और मौत का शिकार होना पड़ा है।
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हां... ओबामा कर सकते हैं!
उन्हें यायावर कहा जा रहा था, जो किसी सर्द और अंधेरे कोने से भटकते हुए अमेरिकी राजनीति के मंच पर आ पहुंचे थे।
दो लगातार लड़ाइयों और आतंकी हमलों से टूट चुके, बेजार अमेरिका को उनकी शख्सियत तिलिस्मी लगी, एक पहेली, जिसे बूझने की कुव्वत उसके पास नहीं थी। इससे पहले डेमोक्रेटिक पार्टी मान चुकी थी कि राष्ट्रपति की कुर्सी अब हिलेरी क्लिंटन के लिए है।
हिलेरी ने तो बहुत पहले ही व्हाइट हाउस पर निगाह जमा भी ली थी। लेकिन अचानक हिफाजत और सेहत की बात फिजां में तैरने लगी और अमेरिका के डरे, सहमे वाशिंदों को लगा कि इन्हें हासिल करने के लिए अब बदलाव जरूरी है। बदलाव.. यानी बराक ओबामा।
रिचर्ड वोल्फ न्यूजवीक के वरिष्ठ संवाददाता हैं और एक वक्त फाइनैंशियल टाइम्स के साथ भी काम कर चुके हैं। उन्हें लगता है कि बराक ओबामा पर किताब लिखना इसलिए भी वाजिब है क्योंकि उनकी कहानी से अब तक लोग रूबरू नहीं हुए हैं। वोल्फ ने यह काम राष्ट्रपति पद की होड़ में शामिल होने के ओबामा के ऐलान के साथ ही शुरू कर दिया।
दिलचस्प है कि जिस तरह राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने से पहले सोनिया गांधी की मुखालफत का सामना करना पड़ा था, वैसा ही ओबामा के साथ भी हुआ। वोल्फ लिखते हैं, 'संसद तक पहुंचने की ओबामा की कोशिश 2000 में नाकाम हो चुकी थी, जिससे मिशेल को बेहद नफरत थी और उनकी छोटी बेटी के जन्म के समय उनकी शादी पर भी खतरा मंडरा रहा था।
उनके बीच बातचीत न के बराबर थी और रोमांस तो गायब ही हो गया था। मिशेल को ओबामा की खुदगर्जी और करियर के पीछे दौड़ने की फितरत से नफरत थी, जबकि ओबामा मानते थे कि उनकी पत्नी बेहद सर्द स्वभाव की और नाशुक्र किस्म की थीं।'
मिशेल की चिंता थी कि ओबामा का रोजमर्रा का कार्यक्रम कैसा होगा। वह घर पर कितना रुकेंगे? बेटियों और पत्नी के लिए उनके पास कितना वक्त होगा? क्या हफ्ते के आखिर में वह घर पर रुक पाएंगे? और उन्हें जवाब मिला - नहीं! इधर ओबामा ने तय कर लिया कि उन्हें चुनाव लड़ना है और उन्होंने वोल्फ को प्रचार अभियान पर लिखने की सलाह दी। वोल्फ की किताब 'द मेकिंग ऑफ बराक ओबामा' में 21 महीने का ब्योरा है, जिसमें वह 'उम्मीदवार ओबामा' के साथ चले और 'राष्ट्रपति ओबामा' के साथ व्हाइट हाउस पहुंचे। हरेक रणनीति में शामिल रहे, ओबामा के भाषणों, उनकी गलतियों, उनकी कमजोरियों, उनकी ताकत और अमेरिका को बदलने के उनके भरोसे को बेहद करीब से वोल्फ ने महसूस किया।
एकबारगी ओबामा ने वोल्फ से कहा, 'तुम्हें पता है, मेरे लिए भरोसे का क्या मतलब है? मैं केवल बदलाव के नाम पर बदलाव नहीं चाहता। मैं चाहता हूं कि बेघर बच्चों को अच्छे स्कूल मिलें। मैं सबके लिए सेहत चाहता हूं।'
जब ओबामा ने इओवा गुट का समर्थन हासिल किया, तो उनकी टीम में शामिल डेविड प्लॉफ ने कहा, 'यह राजनीति का होली ग्रेल है। (ईसाई धर्म में होली ग्रेल वह प्याला है, जिसका इस्तेमाल ईसा मसीह ने सूली पर चढ़ाए जाने से पहले अपने आखिरी भोजन में किया था।
इसे करिश्माई ताकत वाला माना जाता है और इसे पाने के लिए सदियों से कोशिशें चल रही हैं।)' लेकिन इस जबरदस्त जीत का खुमार एक ही झटके में उतर गया, जब न्यू हैंपशायर में ओबामा को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। लेकिन यहीं से ओबामा ने नारा दिया, 'हां, हम यह कर सकते हैं।'
21 महीने में अमेरिका की किस्मत बदल गई, 21 महीने में बराक ओबामा की भी किस्मत बदल गई। इस दरम्यान वोल्फ ओबामा की परछाईं बने रहे। उन्हें ओबामा को अमेरिका में सड़कों पर राजनीति की बिसात बिछाने वाले आयोजकों के सामने मुस्कराते देखा, मतदाताओं से हाथ मिलाते देखा, भाषण का अभ्यास करते देखा, अपने परिवार का इतिहास उसमें मिलाते देखा और अमेरिका के सामने पड़ी संभावनाओं की झांकी सबके सामने रखते हुए भी देखा।
ओबामा को थकान महसूस नहीं होती, वह बहुत बड़ा सोचते हैं, हार और जीत में भी सबक सीखते हैं, अपने परिवार को मीडिया की पैनी निगाहों से बचाना जाते हैं, शायद इसी वजह से अमेरिका ही नहीं दुनिया में बदलाव की बयार की ठंडक इस किताब में मौजूद है।
पुस्तक समीक्षा
द मेकिंग ऑफ बराक ओबामा
संपादन : रिचर्ड वोल्फ
प्रकाशक : वर्जिन बुक्स
कीमत : 13.99 पाउंड
पृष्ठ : 365
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Wednesday, July 15, 2009
बाबू मोशाय, बिहार से बजट में ऐसा भेदभाव!
लोकसभा चुनाव के पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अपने पाले में शामिल करने की कोशिश करने वाली कांग्रेस ने सरकार बनने के बाद बिहार को निराश कर दिया है।
दरअसल चुनाव परिणाम आने के पहले कांग्रेस को खुद के गठजोड़ के दम पर सरकार बनने की उम्मीद नहीं थी और उस समय प्रधानमंत्री ने भी बिहार को सैध्दांतिक रूप से विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने को समर्थन दिया। लेकिन प्रणब मुखर्जी ने अपने बजट से बिहारी बाबू के खासा नाराज कर दिया।
नीतीश कुमार ने कहा कि हमें उम्मीद थी कि राज्य के पिछड़ेपन और स्थानीय लोगों के पलायन को ध्यान में रखते हुए सरकार निश्चित रूप से बजट में अलग से सहायता का प्रावधान करेगी, लेकिन बजट में तो मनमोहन सरकार खुद के वादों से भी मुकर गई। कुमार ने कहा कि सरकार ने बिहार के विकास की जरूरतों को नहीं समझा।
अगर बजट में राज्यों को विशेष सहायता दिए जाने की सूची को देखें तो तमिलनाडु को श्रीलंका से आए विस्थापितों को बसाने के लिए 500 करोड़ रुपये, पश्चिम बंगाल में आइला तूफान से हुए नुकसान की भरपाई के लिए 1000 करोड़ रुपये, दिल्ली में कामनवेल्थ खेलों के लिए 16,300 करोड़ रुपये दिए गए, वहीं बिहार में कोसी नदी से आई बाढ़ को पिछली संप्रग सरकार के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद राष्ट्रीय आपदा घोषित किया था और उस समय सहायता दिए जाने की बात कही गई।
उस सरकार में प्रमुख भागीदार रहे लालू प्रसाद केंद्र पर दबाव बनाने में सफल रहे थे, लेकिन वर्तमान संप्रग सरकार में बिहार की हिस्सेदारी खत्म हो गई और सरकार ने कोसी की बाढ़ से पीड़ित बिहार के लोगों के लिए कोई आर्थिक सहायता देने की जरूरत नहीं समझी।
राज्य सरकार ने बिहार की गरीबी और स्थानीय लोगों के दूसरे राज्यों में बढ़ते विस्थापन के आंकड़े देते हुए केंद्र सरकार से विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग की थी। राज्य की उम्मीदें तब और प्रबल हो गई, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्य के पिछड़ेपन को स्वीकारा, लेकिन बजट में विशेष श्रेणी या विशेष पैकेज जैसी कोई बात सामने नहीं आई।
यहां तक कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के लिए हैंडलूम क्लस्टर की घोषणा की गई, लेकिन भागलपुर के हैंडलूम क्षेत्र की पूरी तरह से उपेक्षा कर दी गई। राज्य के वित्तमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि राजस्व के मसले में भी केंद्र सरकार ने निराश किया है।
उन्होंने कहा कि अंतरिम बजट में बिहार के हिस्से 18,154 करोड़ रुपये आया था, लेकिन प्रणब मुखर्जी के 2009-10 के अंतिम बजट में इसे कम कर 18,909 करोड़ रुपये कर दिया गया। पिछले साल की तुलना में राज्य को दिए जाने वाले राजस्व में केवल 2.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
मोदी ने कहा कि इसके लिए मंदी का हवाला दिया जा रहा है, लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में राज्य सरकार ने आंतरिक कर राजस्व में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। उम्मीद थी कि राज्य को केंद्र की मदद मिल जाएगी, लेकिन बजट ने भी राज्य को निराश कर दिया।
ख्वाहिशें... जो नहीं हुई पूरी
विशेष राज्य का दर्जा
पिछड़ेपन और पलायन को देखते हुए विशेष पैकेज
कोसी नदी में आई बाढ़ के बाद पीड़ितों की मदद के लिए रकम
विशेष सड़क योजना के लिए सहायता
केंद्र सरकार के राजस्व में हिस्सेदारी बढ़ाना
भागलपुर को हैंडलूम क्लस्टर के रूप में आर्थिक मदद
किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय कैंपस खोलने के लिए मदद
http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=21235
Tuesday, June 30, 2009
ममता जी, कब बंद होगी जनरल बोगी में यात्रा करने वालों की रेल पुलिस द्वारा पिटाई
सुरक्षा का क्या होगा??? भगवान जाने। हर एक आदमी जिसने कभी रेल में जनरल बोगी में यात्रा की है, उसे पता होगा कि किस तरह से रेलवे पुलिस लोगों को लूटती है। पैसा न देने पर पीटती है। साथ ही बोगी में चार सिपाही आते हैं और सबको पीटना शुरू कर देते हैं। आखिर सुरक्षा की यह कौन सी व्यवस्था है?? क्या इसे रोके जाने की जरूरत कभी महसूस की गई है?? या कभी महसूस की जाएगी। अगर आपको इस माहौल से रूबरू होना है या आप इसे गलत समझ रहे हैं तो बिहार से मुंबई या दिल्ली जाने वाली किसी भी जनरल बोगी में घुस जाएं। आपने अगर टिकट लिया है तो सुरक्षा देने के लिए रेल पुलिस पीटकर आपसे २० रुपये ले लेगी। सामान ज्यादा लिए होने पर (जैसा कि अक्सर मजदूर वर्ग के पास होता है) अतिरिक्त पैसा देना होगा और पिटाई भी ज्यादा पड़ेगी।
इन घटनाओं का कोई पुरसाहाल नहीं है। किसी की औकात भी नहीं है कि अगर वह किसी काम से या नौकरी पर जा रहे हों तो इसके खिलाफ आवाज उठा सकें। पहली बात तो २० रुपये और चार थप्पड़ या दो लाठी खाना आसान है, वनिस्पत पुलिस में सूचित करना... स्वाभाविक है कि आप उसी रेल पुलिस को शिकायत करने जाते हैं, जिसने आपको रेल में नाहक पीटा होता है। ऐसे में शिकायत करने पर एक बार फिर पिटने की संभावना प्रबल हो जाती है।
Tuesday, June 23, 2009
हर लड़की तीसरे गर्भपात के बाद धर्मशाला हो जाती है
गर्भाधान की क्रिया से गुज़रते हुए
उसने जाना कि प्यार
घनी आबादी वाली बस्तियों में
मकान की तलाश है
लगातार बारिश में भीगते हुए
उसने जाना कि हर लड़की
तीसरे गर्भपात के बाद
धर्मशाला हो जाती है और कविता
हर तीसरे पाठ के बाद
नहीं – अब वहाँ अर्थ खोजना व्यर्थ है
पेशेवर भाषा के तस्कर-संकेतों
और बैलमुत्ती इबारतों में
अर्थ खोजना व्यर्थ है
हाँ, अगर हो सके तो बगल के गुज़रते हुए आदमी से कहो –
लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा,यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था
सुदामा पांडेय- धूमिल
Thursday, June 18, 2009
बोनस की राशि कहां खर्च करेंगे आप
मेरे मित्र गोपाल ठाकुर को बोनस का बेसब्री से इंतजार रहता है। प्रत्येक वर्ष एकमुश्त मिलने वाली इस राशि से वह या तो जरूरत की कोई वस्तु खरीदते हैं या उतने पैसों को सावधि जमा में निवेश कर डालते हैं। पिछले वर्ष उन्होंने बोनस के पैसे 3 वर्षो की सावधि जमा में लगा दिए थे।
कुछ लोगों का सोचना इसके ठीक विपरीत होता है। पैसे हैं तो खर्च करो, यही उनका नारा होता है। यह मायने नहीं रखता कि पैसे का स्रोत क्या है, यह मेहनत की कमाई है या किसी निवेश से प्राप्त होने वाला लाभ, पैसे तो पैसे हैं इसका अपना महत्व है। इसे लापरवाही से खर्च करना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती है।
कैसे करें इनका प्रबंधनपिछले वर्ष राहुल ने दिवाली से पहले लॉटरी की टिकट खरीदी थी, किस्मत अच्छी थी उसकी। दिवाली की रात के बंपर ड्रा में उसे 1.5 लाख रुपए मिले। राहुल के लिए यही बोनस था। उसने सोचा कि अभी किस्मत अच्छी है तो क्यों न इन पैसों को शेयर में लगा दिया जाए? बिना मेहनत के प्राप्त होने वाले पैसों से जैसे उसे कोई मोह ही नहीं था। उसके पिता ने समझाया भी कि ‘चलो तुम्हारी मर्जी है तो शेयर में 50000 रुपए का निवेश कर डालो और शेष बचे एक लाख रुपए सुरक्षित विकल्पों जैसे राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र, सावधि जमा, पीपीएफ आदि में लगा दो।’ राहुल के पिताजी की सलाह उचित भी थी लेकिन उनकी बात न मानते हुए उसने 75000 रुपए शेयर में लगा ही दिए।
इस प्रकार मिलने वाली एकमुश्त राशि का उपयोग ऋण चुकाने में भी किया जा सकता है। इससे आपको मानसिक शांति तो मिलेगी ही साथ ही ब्याज के रुप में दिए जाने वाले पैसे भी आप बचा सकेंगे। सर्वप्रथम वैसे ऋण को चुकता करने के बारे में सोचें जिसकी ब्याज दर अधिक है।
पर्सनल लोन सबसे अधिक खर्चीले होते हैं और इनके ब्याज दर भी प्राय: 15-30 प्रतिशत वार्षिक के होते हैं। प्रति महीने अपनी मेहनत की कमाई से इनके ब्याज चुकाते रहने से कहीं बेहतर है कि इसका पूर्ण भुगतान कर दिया जाए। मासिक किश्तों के जाने पर विराम लगने के बाद, विश्वास कीजिए, आपके वेतन में बड़क्कत भी होगी। पर्सनल लोन के बाद बारी आती है ऑटो लोन की। अगर पर्सनल लोन चुकाने के बाद पर्याप्त पैसे बच रहे हों तो इनका निपटान भी कर डालें। शिक्षा ऋण और आवास ऋण पर आयकर वाले लाभ प्राप्त होते हैं इसलिए इन्हें चुकाने के बारे में सबसे अंत में सोचना चाहिए। चलिए मान लेते हैं आपने ऐसा कोई लोन नहीं लिया हुआ है। लेकिन संभव है कि आपने अपने दोस्त या रिश्तेदार से कभी ऋण लिया हो। हालांकि इस प्रकार के उधार ब्याज रहित होते हैं लेकिन नैतिक तौर पर उचित यही है कि इन्हें चुका कर आप उनका धन्यवाद ज्ञापन करें। क्या अब भी आपके कुछ पैसे बच रहे हैं?
खर्च करने से पहले जरा रुकिए। याद कीजिए कि कहीं किसी खास मकसद से आपने बचत की शुरुआत तो नहीं की थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप घर खरीदना चाहते हों और उसके डाउनपेमेंट के लिए पैसे जुटा रहे हों?
निकट भविष्य में परिवार में किसी की शादी के लिए तो बचत नहीं कर रहे आप? इन सब उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भी आप इन पैसों का सदुपयोग कर सकते हैं। उपरोक्त व्यवस्था करने के बाद आप अपनी चाहतों को तरजीह दे सकते हैं। अगर लैपटॉप या होम थिएटर खरीदने का मन कर रहा हो तो अब आप खुद को मत रोकिए क्योंकि आपने पहले ही बाकि चीजों की व्यवस्था कर ली है।
http://www.bhaskar.com/2007/10/13/0710140008_bonus.html
बड़े उपयोगी हैं वित्तीय निर्णय लेने के ये सामान्य नियम
वित्तीय योजना बनाने और उस हिसाब से उत्पादों का चयन करने में गणित के साथ-साथ अर्थशास्त्र के ज्ञान की भी आवश्यकता होती है। ऐसा करना प्रत्येक व्यक्ति के बस की बात नहीं होती है।
निवेश करने के कुछ मोटे नियम हैं जो काफी हद तक कामयाब साबित हुए हैं। इसके लिए न तो आपको ज्यादा गणित जानने की आवश्यकता है और न ही अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने की। वित्तीय निर्णय लेने वाले व्यक्तियों की सुविधा के लिए ऐसे कुछ अतिसामान्य से नियम बनाए गए हैं।
पहले ही बताते चलें कि इनकी तह में जाने पर इसकी उपयोगिता कम हो सकती है लेकिन मोटे तौर पर ये नियम अपनी जगह पर ठीक हैं। फिर भी इसे अपनाते समय आपको सावधानी बरतनी चाहिए। इन तरीकों को अपनाइए और फायदा उठाइए।
बीमा+निवेश न कि निवेश+बीमा
प्रमाणित वित्तीय योजनाकार विश्राम मोदक कहते हैं, 'जीवन बीमा के मामले में एंडाउमेंट या यूलिप का चुनाव करना बुध्दिमानी नहीं कही जा सकती है। बीमा और निवेश का मिश्रण किसी भी नजरिए से बेहतर नहीं हो सकता है। यूलिप या एंडाउमेंट योजना को आप दो भागों में बांटिए।
एक हिस्सा अपनी जरुरत के अनुसार टर्म इंश्योरेंस प्लान लेने में लगाइए और शेष बचे पैसों को कहीं और निवेशित कर दीजिए।' उनके अनुसार, यूलिप=बीमा+निवेशकी जगह- बीमा+निवेश = यूलिप से अधिक लाभ का सूत्र अपनाइए। एक टर्म इंश्योरेंस प्लान खरीद कर शेष बची राशि का निवेश आप किसी म्यूचुअल फंड की योजना (विशेष रूप से सिप में) कीजिए, यह आपको यूलिप से अधिक लाभ दिलाएगा।
अधिकतम ऋण के नियम
आपने गौर किया होगा कि बैंक सबसे अधिक ऋण होम लोन के रूप में देता है जो आपकी मासिक आय का लगभग 55 गुना तक हो सकता है। अपनालोन के मुख्य कार्याधिकारी हर्षवर्ध्दन रुंगटा कहते हैं, 'बैंक मासिक आय, भुगतान करने की क्षमता, ऋण की अवधि और जायदाद के मामले में जायदाद की कीमत के आधार पर 35 से 55 प्रतिशत तक का ऋण उपलब्ध कराते हैं।'
चलिए मान लेते हैं कि आप 10.5 प्रतिशत की दर पर 20 वर्षों के लिए ऋण लेते हैं और आपकी मासिक किस्त प्रति लाख रुपये के लिए 1,000 रुपए बैठती है। मान लेते हैं कि आपको मिलने वाला वेतन प्रति माह 10,000 रुपये है।
ऋण के सामान्य नियम के मुताबिक कोई भी बैंक यह उम्मीद करता है कि आप मासिक किश्त के रुप में अधिकतम 5,000 रुपये का भुगतान कर सकते हैं। इसलिए वे आपको अधिकतम 5,00,000 रुपये तक का ऋण उपलब्ध करा सकते हैं। यह आपकी मासिक आय के लगभग 50 गुना है।
रूंगटा ने बताया, 'अगर बैंक को यह जानकारी मिलती है कि आपने अन्य किसी प्रकार का भी ऋण पहले से लिया हुआ है जिसकी मासिक किस्तों का आप भुगतान कर रहे हैं तो तो उसी हिसाब से वे आपके ऋण की पात्रता का निर्धारण करते हैं।' अगर आप मासिक किश्त के रुप में 5,000 रुपये प्रति माह दे रहे हैं तो कोई बैंक शायद ही आपको ऋण उपलब्ध कराए।
कब होंगे पैसे दोगुने
बैंक किस समयावधि में आपके पैसों को दोगुना कर देगा, यह जानने का एक आसान तरीका मौजूद है। 72 में ब्याज दर से भाग दीजिए, इस प्रकार जो संख्या प्राप्त होती है उसे आप वर्ष मानिए। अगर ब्याज वार्षिक जुड़ता हो तो उतने वर्षों में आपके पैसे दोगुने हो जाएंगे।
उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि कोई बैंक आपको 10 प्रतिशत वार्षिक का ब्याज देता है। ऊपर बताए गए तरीके के मुताबिक यह 7210 वर्षों में अर्थात 7.2 वर्षों में बैंक में जमा की गई रकम दोगुनी हो जाएगी।
अगर ब्याज तिमाही या छमाही जुड़ता हो तो इसके दोगुने होने में अपेक्षाकृत कम समय लगेगा। पहले 5 वर्षों में पैसे दोगुने हो जाते थे, इस मोटे नियम को लागू कर देखा जाए तो उस समय मिलने वाला ब्याज 14.2 फीसदी वार्षिक का था।
इक्विटी में निवेश
ऐसा कहा जाता है कि पोर्टफोलियो में इक्विटी के हिस्से का निर्धारण आप 100 में से अपनी उम्र घटा कर करें। मान लीजिए कि आपकी उम्र 30 वर्ष है और आप 10,000 रु पये का निवेश करना चाहते हैं तो आपको इक्विटी में 7,000 रुपये का निवेश करना चाहिए।
अगर आप 60 वर्ष के हैं तो इस नियम के मुताबिक आपको अपने कुल निवेशित की जाने वाली राशि के 40 प्रतिशत का निवेश इक्विटी में करना चाहिए। आधार के लिए इस नियम का प्रयोग किया जा सकता है। वास्तव में पोर्टफोलियो में विभिन्न घटकों का निर्धारण आपके भविष्य की जरूरतों, जोखिम उठाने की क्षमता आदि के अनुसार निर्धारित की जाती है।
जीवन बीमा गणना की तरकीब
किसी व्यक्ति के जीवन के मूल्य का आकलन करना मुश्किल है। वैसे भी जीवन बीमा कोई व्यक्ति अपने लिए तो करवाता नहीं है, यह तो आश्रितों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के लिए लिया जाता है। जीवन बीमा लेते समय सम एश्योर्ड के निर्धारण का एक सामान्य सा नियम यह है कि आप अपनी वार्षिक आय का 10 गुना सम एश्योर्ड लें।
ताकि आपके न होने की दशा में अगर सम एश्योर्ड की राशि पर वार्षिक 10 प्रतिशत का भी प्रतिफल मिले तो आपके आश्रितों को आपके न होने की कमी आर्थिक तौर पर न खले। ध्यान रखें ये नियम शुरुआत करने के लिए हैं। जीवन बीमा का सम एश्योर्ड हो या इक्विटी में निवेश, वास्तविक जरुरत विभिन्न व्यक्तियों की विभिन्न परिस्थितियों के आधार पर भिन्न- भिन्न होती हैं।
http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=20100
Thursday, June 4, 2009
यह कैसा दलित सम्मान?
भारत में दलितों को पद प्रतिष्ठा और सम्मान देने की होड़ सी लग गई है। खासकर मायावती के शक्तिशाली होने के बाद तो जैसे राजनीतिक पार्टियों को लगता है कि सोया हुआ जिन्न जाग गया है। कांग्रेस पार्टी ने मीरा कुमार को लोकसभा अध्यक्ष बना दिया। शपथ ग्रहण के समय सोनिया के चेहरे की मुस्कराहट जाहिर कर रही थी कि वह विजयी मुस्कान है। बड़ा दुख होता है कि मीरा कुमार के लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद सत्तासीन पार्टी कहते फिर रही है कि दलित.को अध्यक्ष बना दिया। दलित और उनके जाति के संबोधन को भारतीय समाज में गालियों की तरह ही लिया जाता है। अब मीरा को इतनी बार दलित कहा जा रहा है कि वे इस एहसान से दब जाएंगी कि ऐसा लगता है कि बगैर किसी योग्यता के दलित होने के चलते ही उन्हें यह पद मिल गया है। हालांकि उनका पिछला इतिहास देखा जाए तो हर मौके पर उन्होंने अपनी योग्यता साबित की है।अब सवाल यह उठता है कि लोकसभाध्यक्ष पद पर बैठाने के बाद, बार बार दलित का नारा लगाने और ऐसा किया, यह जताने के बाद कोई पार्टी दलितों के दिल में जगह बना सकती है? क्या इस तरह से मायावती के राजनीतिक कद का सामना किया जा सकता है? वैसे भी मीरा कुमार ने अपनी ताकत से यह पद नहीं हासिल किया, बल्कि उनके पीछे पूर्व कांग्रेसी दिग्गज जगजीवन राम का बैक अप है। भले ही मीरा कुमार योग्य हैं, लेकिन क्या जनता उन्हें दिल से अपना नेता स्वीकार कर पाएगी, कि लोकतंत्र के ताकतवर होने की वजह से एक वंचित तबके की महिला को सम्मान मिला है??
Tuesday, June 2, 2009
हर जगह पिटेंगे भारतीय, देश में भी-विदेश में भी

यही कांग्रेस सरकार केंद्र में थी और महाराष्ट्र में भी, जब महाराष्ट्र में मराठी गैर मराठी के नाम पर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग बड़े पैमाने पर पीटे और मारे जा रहे थे। सरकार कुछ नहीं कर सकी। अब आस्ट्रेलिया में स्थानीय लोगों की नौकरी छीनने के नाम पर भारतीयों को पीटा जा रहा है और वहां राजनीति हो रही है तो यह सरकार क्या कर सकती है? यह तो विदेश का मामला है। कुछ नहीं होने वाला गुरू, लात खाते रहो, जीते रहो और कांग्रेस, भाजपा को वोट देकर सत्ता देते रहो। फिलहाल अभी तो कांग्रेस की जय हो।
हम यही कर सकते हैं, जो फोटो में ये लोग कर रहे हैं।