सबकी अपनी अपनी सोच है, विचारों के इन्हीं प्रवाह में जीवन चलता रहता है ... अविरल धारा की तरह...
Sunday, March 27, 2011
"शुद्धिकरण"
Friday, March 25, 2011
बूझो न बूझो अबूझमाड़
राजेश अग्रवाल 12 June, 2009
नक्सलियों से सीधी लड़ाई के लिए सरकार ने तीन दशक से बंद अबूझमाड़ का मोर्चा खोल दिया है. वस्त्रविहीन व कंदमूल खाकर जीने वाले आदिम गोंड़ जाति के बीच अब आम लोगों का सीधा सम्पर्क हो सकेगा. इससे उनकी जीवन शैली और संस्कृति पर ख़तरे तो दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सरकार को अपने इस फैसले के पीछे नक्सली हिंसा की आग से झुलस रहे बस्तर में शांति की नई बयार बहने की उम्मीद भी दिखाई दे रही है. वैसे तो लोग देश में कहीं भी आने-जाने के लिए आज़ाद हैं लेकिन बस्तर का अबूझमाड़ दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा एक ऐसा गलियारा है जहां पिछले 3 दशकों से आम लोगों को जाने की मनाही थी.
अबूझमाड़ में आम लोगों के प्रवेश पर तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार ने रोक तब लगाई गई थी,
जब 80 के दशक में बीबीसी के कुछ पत्रकारों ने यहां पहुंचकर गोंड़ महिलाओं की अर्धनग्न तस्वीरें खींचीं और उनके विदेशी अख़बारों में छप जाने से हंगामा मचा. बस्तर संभाग के तीन जिलों दंतेवाड़ा, नारायणपुर व बीजापुर के 4,000 वर्गकिलोमीटर के दायरे में फैले 237 गांवों के 26 हज़ार आदिवासी अपनी ही विशिष्ट आदिम संस्कृति में जीते हैं. वे जानवरों का शिकार करते हैं, कंदमूल खाते हैं और पेड़ों की छाल पहनते हैं. हालांकि बीते दो दशकों से वे हाट-बाज़ारों में जाकर बिना सिले हुए कपड़े भी पहनने लग गए हैं. जिलाधीश से अनुमति लेकर नारायणपुर स्थित रामकृष्ण मिशन ने यहां शिक्षा व स्वास्थ्य की दिशा में भी कुछ काम किया है.लेकिन अबूझमाड़ का ज्यादातर हिस्सा बीते 3 दशकों से अबूझ पहेली है. यहां के आदिवासी जंगल, नदी, पहाड़ के बीच ही जीवन बिताते हैं. ज्यादातर हिस्सों में सरकार की कोई योजना नहीं पहुंच पाई है. न इन्हें सरकारी राशन मिलता है न पेंशन. न इन गांवों में सड़कें है और न ही बिजली. अबूझमाड़ के सघन वनों के शुरूआती कुछ गांवों में तो समय-समय पर सरकार के नुमाइंदो व सुरक्षा बलों ने प्रवेश किया है पर अधिकतर हिस्से अभी भी रहस्यमयी बने हुए हैं. सन् 2001 में छत्तीसगढ़ राज्य का गठन होने के बाद अबूझमाड़ के सर्वेक्षण के लिए कई प्रयास हुए हैं. गांवों की संख्या तो सेटेलाइट के चित्रों से निर्धारित की गई है पर इन गांवों तक सरकार भी नहीं पहुंच पाई है. सन् 2005 में प्रदेश की भाजपा सरकार ने एक निजी संस्था को इस क्षेत्र के सर्वेक्षण की जिम्मेदारी दी थी लेकिन नक्सलियों ने उन्हें घुसने नहीं दिया. बस्तर के सांसद बलिराम कश्यप की अध्यक्षता में भी एक बार समिति बनाई गई लेकिन यह समिति भी अबूझमाड़ को बूझने में सफल नहीं हो पाई. परिणामस्वरूप यह अबूझ इलाका हिंसक नक्सलियों के लिए स्वर्ग बना हुआ है.
पीडब्ल्यूजी की रीजनल इकाई ने तो 1980 में बकायदा इसे अपना मुख्यालय घोषित कर दिया था. नक्सली इन इलाकों में छिपकर अपनी योजनाएं तैयार करते हैं और यहां से निकलकर पूरे बस्तर में तांडव मचाते हैं. बीते कुछ सालों में नक्सलियों ने सुरक्षा बलों व नेताओं पर हमले तेज किए हैं. नक्सलियों की बढ़ती ताक़त को वैसे तो सरकार उनकी हताशा का नाम देती है, लेकिन सच्चाई यही है कि उनसे मुकाबला करने में सरकार के पसीने छूट रहे हैं. नक्सलियों के विरोध के लिए आदिवासियों के बीच चलाया जा रहा सलवा जुड़ूम आंदोलन भी कारगर साबित नहीं हो रहा है. भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती भी उनको रोक पाने में कारगर नहीं है. हाल के दिनों में नक्सलियों ने धमतरी और राजनांदगांव जिले के नये इलाकों में सुरक्षा बल के जवानों व मतदान कर्मियों की सामूहिक हत्याएं की है. कई सलवा जुड़ूमियों व कांग्रेस-भाजपा नेताओं को उन्होंने मार डाला है. इन घटनाओं से सरकार की जबरदस्त किरकिरी हो रही है. छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ननकीराम कंवर को तो कहना पड़ा है कि यदि दो साल के भीतर नक्सली समस्या का अंत नहीं हुआ तो वे अपने पद से इस्तीफा दे देंगे. विरोधी दल कांग्रेस ने इस बयान पर कहा है कि यह बात मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को कहनी चाहिए, क्योंकि प्रदेश के मुखिया होने के नाते पहली जवाबदारी उनकी ही बनती है.
राजनैतिक दलों के अतिरिक्त सरकार पर औद्योगिक घरानों की ओर से भी दबाव है. टाटा और एस्सार जैसी बड़ी कम्पनियों को बस्तर के बहुमूल्य खनिजों के उत्खनन और इस्पात संयंत्र लगाने के लिए हजारों एकड़ जमीन दी गई है, लेकिन नक्सलियों के हमले उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं. मुख्यमंत्री कहते हैं कि पूरी दुनिया जब 21वीं सदी में पहुंच गई है तो नक्सली बस्तर के आदिवासियों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित कर उन्हें 19वीं सदी में रखना चाहते हैं. नक्सली कहते हैं कि जंगल, पानी, जमीन सब उन आदिवासियों का है जो यहां रहते हैं. चंद पूंजीपतियों के फायदे के लिए आदिवासियों को उजाड़ने की साजिश वे नहीं चलने देंगे. नक्सलियों ने बस्तर में हस्तक्षेप के ख़िलाफ मुख्यमंत्री सहित बस्तर के कई जन-प्रतिनिधियों के नाम मौत का फरमान जारी कर रखा है. बस्तर विकास प्राधिकरण की इसी हफ़्ते मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में अबूझमाड़ को आम लोगों के लिए खोलने का निर्णय लिया गया. सरकार अब नक्सलियों को उनके सुरक्षित ठिकाने पर घुसकर घेरना चाहती है. अभी तक सरकार के नहीं पहुंचने के चलते शायद अबूझमाड़ के आदिवासी नक्सलियों को ही सरकार मानते रहे हों लेकिन अब उन्हें एक दूसरी सरकार का भी सामना करना पड़ेगा.
अबूझमाड़ के दरवाजे खोल दिए जाने के बाद भी सरकारी अमले व सुरक्षा बलों को दुरूह भौगोलिक संरचना के चलते इसे भेद पाना आसान नहीं है. वैसे भी उनके लिए कभी इस इलाके में जाने के लिए मनाही तो रही नहीं है. कुछ सालों के बाद मालूम हो सकेगा कि अबूझमाड़िया जन-जीवन में बाकी दुनिया की दख़ल का क्या असर पड़ेगा, फिलहाल, सरकार ने नक्सलियों से निपटने के लिए एक और दांव खेल दिया है.
Thursday, March 17, 2011
अगर खेती को कारोबार बनाया जाये...
Chattisgarh's heart of darkness
Binayak Sen is a non-conformist, who consciously decided to dedicate his life-work in the service of the deprived and exploited people in the tribal belt of Bastar, Raipur and around the Bhilai steel plant. He decided that his medical training from the Christian Medical College at Vellore would be devoted to providing rural health services for poorest of the poor in India. It is not as though Sen sees himself as a martyr to the cause, however. As Minnie Vaid points out, Sen believed that every individual should have the right to make his own choices and his was to bring medical facilities to people who had been denied this basic right by the democratic state of India.
Nobody who works in rural or tribal communities in India can be immune to the multi-faceted societal problems there। So, it is not surprising that Sen’s narrow commitment eventually widened to social activism that brought up squarely against the power of the state. His initial work in providing rural health services ended up highlighting the issues of tribal displacement that became endemic once this natural resource-rich area started attracting industrial projects. This book, the product of seven months of intensive field work, traces Sen’s evolution from grassroots worker to community activist and organiser of the civil liberties movement in ten clearly-focused chapters. Given the outrageous manner of his arrest and incarceration, the book may not present anything strikingly new, but it works as a grim reminder of the lengths of delinquency even in democratic states.
Sen’s work was not just courageous, it was inspirational too। His Shahid Hospital acted as a model for others and Sen set up the Jan Swasthya Sahyog in 1989 as a “people-centric community-based model of heathcare” in rural Bailaspur as “the voluntary, non-profit” registered society of health professionals running a low-cost health programme for the tribal and rural poor through a community health programme and a hospital. Given the absence of state-sponsored social infrastructure in the area, it was no surprise that Sen came to be considered a messiah for the the marginalised.
This in itself was sufficient cause for friction with local politicians as almost any community worker will attest. But it was the Salwa Judum, the Chhattisgarh government-sponsored 2005 anti-Naxal vigilante force (or state-promoted private militias, depending on how you looked at it) of 4,000 that proved the turning point. It was the tribals who were caught in the brutal violence between the Naxals and the state’s militia. As a result of this orgy of violence, 300,000 to 400,000 tribals were compelled to seek refuge in “camps” and become displaced people.
It was their plight that Sen highlighted. “In Bastar, when Salwa Judum started, Binayak went after it and brought it into the limelight and termed the Salwa Judum a major threat to peace, source of oppression…”. More to the point, his reports starkly highlighted the lack of governance in the predominantly tribal belt of Dantewada, which had 37 police stations but just 26 primary health centres and 26 higher secondary schools.
Naturally, the exposure of this dark side of Indian democracy is unlikely to have pleased the state government, not least when the criticism was focused on its own pet project. There is no less pique now that his arrest and punishment on charge of “sedition” against the state have attracted worldwide attention and sympathy. His predicament suggests a brutish lack of understanding on the part of state authorities of Sen’s message. He was, for instance, among the few who spoke up against the Dantewada massacre of state security personnel by gun-wielding Naxalites, his argument being that violence cannot be justified, either in the name of Mao’s revolution or the state.
Vaid’s book also raises the issue of the inherent limitations of individual voluntarism in improving the lives of people. Sen worked like a missionary, overcoming the tribal superstitions against modern medical techniques such as injections and so on. His work benefited many, no doubt, and brought him satisfaction. But the impact of interventions such as his is co-terminus with the area he covers. Only the institutions of state have the critical mass to deliver health and education on a larger scale that can make a difference to the lives of a significant number of people. Sen’s work was reminder that the state had basically abdicated its responsibility here.
Vaid’s contribution is in the direction of narrating a story of the human tragedy of an individual who decided to be “different” from the mainstream professional classes of India. Her story also exposes the myth perpetuated by the managers of the Indian state that gun-wielding terrorists can be silenced by the power of the gun of the state. The Indian state has failed to provide primary and basic services to the poor. The state has established police stations and failed to see the struggles of tribals who have to walk a whole day to access even rudimentary first-aid. Sen is the central character of Vaid’s book but an equally important revelation is the brute reality of neglect by the state of its own citizens simply because they are helpless and have no option except to turn to Sen.
A DOCTOR TO DEFEND: THE BINAYAK SEN story
Minnie vaid
Rajpal and Sons
242 pages;
Rs 250
http://www.business-standard.com/india/news/chattisgarh/s-heartdarkness/427053/
Tuesday, March 15, 2011
लोकतंत्र के साथ खुला बलात्कार!!
कारोबारी किस तरह से लोकतंत्र के साथ बलात्कार कर रहे हैं, इसका दो उदाहरण एक साथ पढ़ने को मिला. विकिलीक्स ने कहा कि अमेरिका के दबाव में मणिशंकर की जगह मुरली देवड़ा को मंत्री बनाया गया और कांग्रेस सदस्य विक्रमभाई अर्जनभाई मादम ने कहा कि केयर्न इंडिया उन्हें अंजाम भुगतने की धमकी दे रही है.
विकीलीक्स खुलासा के अनुसार अमेरिका के करीबी एक भारतीय मंत्री जनवरी 2006 में कैबिनेट में हुए फेरबदल के दो दिन बाद अमेरिकी राजदूत डेविड मलफोर्ड वॉशिंगटन से बातचीत में इस फैरबदल को अमेरिका के लिए अच्छी खबर बताते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 'मलफोर्ड कहते हैं अय्यर का पेट्रोलियम मंत्रालय से हटना काफी अहम है। कैबिनेट में शामिल मंत्री अमेरिका के भरोसे के लोग हैं। मलफोर्ड की नज़र में अमेरिका के लिए बढ़िया मंत्री हैं- कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा, अश्विनी कुमार और सैफुद्दीन सोज़ और मुरली देवड़ा। ईरान गैस पाइप लाइन को काम को रोकने के लिए मणि शंकर अय्यर को हटाकर बनाए गए मंत्री मुरली देवड़ा से तो अमेरिका ज्यादा ही खुश है।
अब भारत में सांसद का हाल देखिये. लोकसभा में कांग्रेस के एक सदस्य ने आरोप लगाया कि एक प्रमुख निजी तेल कंपनी के अधिकारियों ने गुजरात में उस कंपनी की एक परियोजना के खिलाफ किसानों के विरोध का नेतृत्व करने के लिए उन्हें घूस देने का प्रयास किया और उसके बाद उन्हें नतीजे भुगतने की धमकी दी। गुजरात के जामनगर से कांग्रेस सदस्य विक्रमभाई अर्जनभाई मादम ने शून्यकाल के दौरान यह मामला उठाते हुए कहा कि कारपोरेट माफिया सांसद के घर पहुंच जाते हैं और घमकी भी देते हैं।
उन्होंने केयर्न इंडिया लिमिटेड का नाम लेते हुए दावा किया कि इस कंपनी के अधिकारियों ने उन्हें दो करोड़ रूपए घूस देने की पेशकश की और कई मौकों पर धमकाया। पुलिस कहती है कि कोई मामला नहीं है और मुझे कोई संरक्षण नहीं है। उन्होंने मांग की कि उन्हें धमकी देने के मामले से जुड़े अधिकारियों को बर्खास्त किया जाए और आंदोलनरत किसानों को भूमि अधिग्रहण का पूरा भुगतान दिए जाने के बाद ही उनकी जमीन पर कंपनी के अधिकारी पैर रखें। कांग्रेस राजद और सपा के अनेक सदस्यों ने उनका समर्थन किया और उन्हें संरक्षण दिए जाने की मांग की। लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने कहा कि मादम ने एक पत्र उन्हें भी दिया है और यह मामला उनके विचाराधीन है। असुरक्षा को लेकर सांसद ने जो आशंका जताई है उस पर पूरा ध्यान दिया जाएगा।
ये कारोबारी कितनी ईमानदारी से काम करते है, रातों रात कैसे खरबपति बन जाते है, एकाध किताबे इन पर आ ही जाती हैं। इस लिंक से कुछ अनुमान लग सकता है। http://www.indianexpress.com/news/yarn-dyed-again/687551/
उद्योगी-पूंजीपति आज इतने प्रभावी हो गए हैं कि वो सांसदों तक को धमकी दे रहे है कि तुम जनता की आवाज उठाओगे तो मारे जाओगे. कारोबारी लोबी अपनी सुविधा के मुताबिक मंत्री बनवा देते है. राजा का मामला पहले ही सामने आ चुका है. ऐसे में भी वर्तमान लोकतंत्र में आस्था!! क्या ये लोकतंत्र जनता के लिए काम कर रहा है? बेचारे विक्रमभाई को पता ही नहीं होगा कि अगर वो सरकार से अपनी जान का गुहार करेंगे तो उनका मंत्री ही कह सकता कि इस मामले से हट जाओ, उसी कंपनी के मालिक ने मुझे मंत्री बनवाया है!!
Monday, March 7, 2011
अरब जागृति का सऊदी अरब में क्या स्वरुप होगा?
Thursday, February 10, 2011
कांग्रेस में सच बोलने पर मिलती है सजा

Wednesday, February 9, 2011
फेसबुक की मिस्र क्रांति
क्या कहा जाए इस फेसबुक क्रांति के बारे में। खासकर अरब देश की क्रांति के बारे में। जिन देशों में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की अच्छी-खासी तादात है, वहां तो फेसबुक कोई क्रांति नहीं ला पाया, लेकिन मिस्र में क्रांति लाने का श्रेय जरूर फेसबुक को दे दिया गया।
हालांकि फेसबुक पर मिस्र के बारे में खोजने पर बहुत थोड़ा कुछ ही मिलता है। होमोसेक्स, फ्रीसेक्स, पंरपराओं को तोड़ने, मुस्लिम प्रथाओं का विरोध करने जैसे जुमले जरूर मिल जाएंगे। कुछ ऐसा तो कम ही मिलता है, जिसमें यह कहा जा रहा हो कि होस्नी मुबारक तानाशाह हैं। या कुछ आंकड़े दिए जा रहे हों कि वहां की तानाशाही सत्ता से जनता परेशान है।
उधर इन दावों के बीच फेसबुक ने घोषणा कर दी कि वह मिस्र के उपभोक्ताओं को मोबाइल सेवा देने जा रहा है। यानी मोबाइल से अपना मैसेज भेजें और वह फेसबुक पर खुद-ब-खुद आ जाएगा। हो गया न कारोबारी इस्तेमाल एक जन विरोध का।
ऐसी ही क्रांति भारत में भी कर रहा है फेसबुक। कुछ लाइनों में भड़ास निकालिए या निरर्थक बातें लिख दीजिए। अगर आप अच्छे पद पर हैं और नौकरी की चाह रखने वाले बेरोजगारों को थोड़ी भी उम्मीद आपसे बनती है तो तुरंत फेसबुक पर क्रांति आ जाएगी। यानी प्रतिक्रियाओं की बाढ़। अगर ऐसे लोग (जिनसे बेरोजगारों से थोडी़ भी मदद की उम्मीद है) अपने थोबड़े की घटिया सी फोटो भी डाल दें तो वाह उस्ताद वाह कहने वाले बेचारों की बाढ़ लग जाती है।
मजेदार बात है कि भारत में भी यह चर्चा उठी कि भ्रष्टाचार, शोषण के इतने मामले भारत में हैं कि यहां भी मिस्र जैसा विरोध हो सकता है। लेकिन ऐसा कहने वाले फेसबुक तक ही सिमटे हैं। अखबारों में भी थोड़ा बहुत लिखा गया। अब उम्मीद करिए फेसबुक से। क्रांति ले आएगा। जमीनी हकीकत न तो जानने की जरूरत है और न ही पीड़ित लोगों के बीच जाकर उनका पक्ष जानने का। बस फेस बुक से आस रखिए। एक न एक दिन भारत में भी क्रांति जरूर आएगी।
Friday, February 4, 2011
बौद्धिक उलटी नहीं चाटेगा युवा, उसे दिशा चाहिए...
Monday, January 31, 2011
इतनी सस्ती सब्जी? कैसे जिएं किसान?
Thursday, January 27, 2011
अपराध का कारपोरेटाइजेशन
अपराध की धारणा देखने पर पता चलता है कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जहां अपराध को अपराध के नजरिए से देखा जाता है, वहीं औद्योगिक रूप से विकसित राज्यों में अपराध का कारपोरेटाइजेशन हो चुका है। इसका आशय यह है कि जो बेइमानी करे, किसी भी तरीके से पैसे बनाए, उसका सम्मान है। वह नेता है, कारोबारी है। उत्तर प्रदेश और बिहार में जहां राजनीतिग्यों व भ्रष्ट ताकतवर लोगों पर लगातार बलात्कार व छोटे मोटे भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, महाराष्ट्र में माफियाओं और राजनेताओं की मिलीभगत से अधिकारी को जला देने जैसी घटना सामने आ रही है।
संकेत देखिए। उन राज्यों की जनता कितनी हताश और हारी हुई है, जहां अपराध का कारपोरेटाइजेशन हो चुका है। चाहे वह महाराष्ट्र हो, दिल्ली हो, हरियाणा हो या इस तरह के अन्य राज्य। वैसी स्थिति अभी राजनीतिक रूप से जागरूक या कहें कि औद्योगिक रूप से पिछड़े राज्यों में नहीं है और अपराधी को अपराधी ही माना जा रहा है। जबकि औद्योगिक राज्यों में अपराधियों को कारोबारी माना जा रहा है और वे अपने मुताबिक कानून के साथ खेल रहे हैं। कार्रवाई होती भी है तो दिखावे के लिए।
नासिक जिले के मनमाड में तेल माफिया को चुनौती देने वाले मालेगांव के अपर जिलाधिकारी (एडीएम) यशवंत सोनवाने करीब 35 मिनट तक धू-धू कर जलते हुए तकलीफ और दर्द से चिल्लाते रहे। कोई उन्हें बचाने के लिए सामने नहीं आया। इसके पहले भी खैरनार ने अपराधियों पर धावा बोला था। खैरनार को भी वहां की जनता ने बेवकूफ मान लिया कि वह कमाने के चक्कर में न पड़कर आम लोगों की सोचते थे। पता नहीं कहां गायब हो गए खैरनार। उस समय खबरें आईं कि खैरनार की सगी बहन दूसरे के घर में चौका बरतन का काम करती थीं। यशवंत भी इन औद्योगिक सोच वाले राज्यों की पीढ़ी के बेवकूफ अधिकारी निकले। जिस पोपट के यहां उनके आला अधिकारी और बड़े नेता सलामी ठोंकते थे, उसके खिलाफ उन्होंने कार्रवाई करने की बेवकूफी की। अभी मामला ज्वलंत है। छापेमारी चल रही है और सैकड़ों की संख्या में मिलावटखोर पकड़े जा रहे हैं। मिलावटखोर भी वही पकड़े जाएंगे जो हजार-दो हजार की नौकरी करते हैं। करोड़ों के काले कारोबार में एक भी उच्च स्तरीय माफिया या उसे संरक्षण देने वाला नेता पकड़ा जाए, उसकी गुंजाइश कम ही है, क्योंकि वह तो ईमानदार कारोबारी या रसूखदार नेता होता है।
Tuesday, January 25, 2011
क्या पाकिस्तान में है लाल चौक?
मुझे याद आ रहा है अयोध्या का मसला। अयोध्या के पड़ोसी जिला गोंडा का निवासी होने के कारण मुझे भी बचपन से थोड़ी बहुत जानकारी मिलती रहती थी। हिंदू अयोध्या के विवावित स्थल को राम जन्मभूमि मानते थे। जो ढांचा ढहाया गया उसका गुंबद मस्जिद जैसा था, लेकिन उसी के नीचे रामलला विराजमान थे। उसमें जाने के लिए एक टूटा-सा, छोटा-सा गेट था, जिसमें सरकारी ताला लगा था। वीर बहादुर सिंह जब मुख्यमंत्री थे तो उसी ताले को खोलने के लिए यात्रा निकली थी और बाद में ताला खुल गया (हालांकि राम भक्तों को ताले से कोई फर्क नहीं पड़ता था, वे बगल के टूटे रास्ते से जाकर दर्शन करते थे)। उसके बाद भारतीय जनता पार्टी ही वह राजनीतिक दल थी, जिसने व्यापक रूप से बताया कि हिंदू जिस इमारत के नीचे पूजा करते हैं और उसे मंदिर मानते हैं, वह मस्जिद है और उन्होंने उस ढांचे को तोड़ डाला।
तोड़े जाने के पहले हिंदू (जिनकी संख्या बहुत ज्यादा थी) उस ढांचे को मंदिर, मुसलमान उसे मस्जिद और कुछ जानकार (सभी धर्मों के) उसे विवादास्पद ढांचा कहते थे। लेकिन भाजपा के पुण्य प्रताप से उसे अब सब लोग मस्जिद कहते हैं। कोई नहीं कहने वाला कि भाजपा ने मंदिर तोड़ दिया या विवादास्पद ढांचा तोड़ दिया। (वैसे भी राम गरीबों के देवता हैं, कोई कारोबारी राम मंदिर के निर्माण में निवेश नहीं करता। जबसे अयोध्या के राम मंदिर में पूंजी आई है, विवाद और गहरा हुआ है)।
लेख लंबा होने के लिए माफी। लेकिन कुछ ऐसा ही दृष्य कश्मीर मसले में भी बन रहा है। अभी तक पाकिस्तान सरकार से मुर्गा-रोटी पाने पाले कुछ लोग (मुसलमान या हिंदू नहीं) लाल चौक पर पाकिस्तान या कोई अन्य झंडा फहराकर या भारत विरोधी नारे लगाकर यह दिखाने की कोशिश करते थे कि कश्मीर का लाल चौक पाकिस्तान का हिस्सा है। या ऐसे ही कुछ लोग दिखाते रहते हैं कि कश्मीर का स्वतंत्र अस्तित्व है। भारतीय जनता पार्टी भी उसी जमात के साथ खड़ी हो गई है और यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि कश्मीर भारत का अंग है।
कोई भी भारतीय यह मानने को तैयार नहीं होगा कि कश्मीर पाकिस्तान का अंग है। अगर भाजपा को कश्मीर पर अपना आधिपत्य दिखाना ही है तो वह कश्मीर के उस हिस्से में घुसे, जिसे लेकर आम भारतीय का दिल तड़पता है, जिसे पाकिस्तान ने अवैध रूप से अपने कब्जे में ले रखा है। पाकिस्तान तो हमारी धरती (भारत के कब्जे वाले इलाके) में घुसकर लोगों से कहलाता है कि लाल चौक पाकिस्तान का है। आम लोगों को भाजपा यह दिखाने की कोशिश क्यों कर रही है कि लाल चौक भारत का हिस्सा है। वह तो है ही, वहां के आसपास के हर जिला मुख्यालयों पर शान से तिरंगा फहराया जाता है। अब तो जो लोग कश्मीर को कम जानते हैं उन्हें कुछ ऐसा लगने लगेगा कि लाल चौक भारत का अंग है ही नहीं, जैसे कि राम मंदिर को मस्जिद बताकर तोड़ा गया था।
Friday, January 21, 2011
लाल चौक पर तिरंगा फहराने की क्या है मंशा?
तिरंगा फहराना देश के लिए गर्व की बात होती है। प्रधानमंत्री और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण करते हैं। इसे स्वतंत्रता मिलने की याद के रूप में मनाते हैं और हम गर्व महसूस करते हैं कि इसी दिन हम स्वतंत्र हुए थे और स्वतंत्रता को खुशी, समृद्धि और गुलामी से मुक्ति के प्रतीक के रूप में एक दूसरे से बांटते हैं। लेकिन लाल चौक पर तिरंगा फहराकर खुशी मनाने का उद्देश्य क्या हो सकता है? तिरंगा फहराना ही है तो आखिर उसे देश भर में प्रचारित कर विवाद क्यों खड़ा किया जा रहा है और इसके पीछे भारतीय जनता पार्टी की मंशा क्या है?
ऐसा भी तो नहीं है कि जो लोग लाल चौक जाकर झंडा नहीं फहरा रहे हैं वे देशभक्त नहीं हैं। रही बात वहां तिरंगा फहराने से रोकने की.. तो मैं दिल्ली में बैठा हूं लेकिन मुझे तो लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा फहराना क्या, वहां लगे पुलिस कर्मी प्राचीर के निकट फटकने भी नहीं देते। इसकी भी मांग होनी चाहिए कि मेरे जैसे आम आदमी को भी लाल किले की प्राचीर पर झंडा फहराने का मौका मिले, नहीं तो मुझे लगता है कि मेरी देशभक्ति खतरे में पड़ जाएगी।
Tuesday, January 18, 2011
फिर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा युवक-२
महराजगंज जिले के नौतनवा थाना क्षेत्र के मुडि़ला गांव में एसएसबी जवानों के खौफ से सत्रह वर्षीय मोनू डांडा नदी में कूद गया। मुडि़ला गांव का सत्रह वर्षीय मोनू पुत्र राम बचन यादव सुबह सात बजे साइकिल पर खाद लाद कर डांडा नदी की ओर जा रहा था। इसी दौरान पेट्रोलिंग करते हुए एसएसबी के जवान वहां पहुंच गए। खाद देखकर वह मोनू को तस्कर समझ कर लाठियों से पीटने लगे। जान बचाने के लिए मोनू ने नदी में छलांग लगा दी। निकलने का प्रयास करने पर एसएसबी जवानों ने मोनू पर राइफल तान दिया। अंतत: मोनू की मौत हो गयी।
सूचना मिलते ही ग्रामीण नदी की ओर भागे। शव को बाहर निकाला। इसके बाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर शव रख कर जाम लगाया। ग्रामीण मांग कर रहे थे कि जब तक आरोपी जवानों की गिरफ्तारी नहीं होगी, जाम समाप्त नहीं होगा।
एसएसबी जवानों की ज्यादती से मोनू की हुई मौत के बाद शव के साथ विरोध कर रहे ग्रामीणों के साथ पुलिस भी सख्ती से पेश आयी। उन्हें खदेड़ने के लिए लाठियां भांजी। जवाब में ग्रामीणों ने भी ईट-पत्थर चलाए। जाम स्थल पर एसएसबी कमांडेंट ललित कुमार के पहुंचते ही ग्रामीण नारेबाजी करने लगे। इस पर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने लाठियां पटकीं।
Monday, January 17, 2011
भ्रष्टाचार की बीमारी का शिकार हुआ छात्र
कानपुर के पड़ोसी जिले रमाबाईनगर के डेरापुर के बिहारी गांव में पुलिस की कथित पिटाई से क्षुब्ध होकर हाईस्कूल के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली, इस घटना के बाद जनता के गुस्से को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने विहाराघाट चौकी इंचार्ज और दो सिपाहियों को सस्पेंड कर दिया है तथा उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करा दी गई है।लोगों के गुस्से को देखते हुए इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किए गए हैं।
डेरापुर इलाके के विहारी गांव के पास एक ढाबे से 13 जनवरी की रात एक नलकूप चोरी हो गया। ढाबे के मालिक सुरेश फौजी की शिकायत पर पुलिस चौकी इंचार्ज ने 14 जनवरी की रात को गांव के चार लड़कों को उठा लिया और उनसे पूछताछ की। इन चार लड़कों में से एक हाईस्कूल के छात्र विजय कुमार के पिता रघुवीर का आरोप है कि उसके पुत्र की बुरी तरह की पिटाई की गई और चौकी इंचार्ज एम पी सिंह ने 14 हजार रूपए रिश्वत लेकर उसे छोड़ा। पुलिस चौकी से लौटने के बाद विजय शनिवार रात अपने कमरे में सोने गया और कल सुबह जब काफी देर तक उसके कमरे का दरवाजा नही खुला तो घर वालों को आशंका हुई। उन्होंने अंदर झांका तो विजय को पंखे के कुंडे से रस्सी के सहारे लटकता पाया।
Wednesday, January 5, 2011
और ये है अमेरिकी न्यायालय
अमरीका के टैक्सस प्रांत में रहने वाले कॉर्नेलियस डूप्री जूनियर इस फ़ैसले से ख़ुश भी हैं और नाराज़ भी. डूप्री को वर्ष 1979 में जेल भेजा गया था. उन पर आरोप था कि उन्होंने घातक हथियार के साथ डकैती की. अब 51 वर्ष के हो चुके कॉर्नेलियस डूप्री को 2010 में पैरोल पर रिहा किया गया और इसके सात दिनों बाद ही डीएनए टेस्ट से ये पता चला कि वे निर्दोष हैं. अब एक जज ने अधिकृत रुप से पुराने फ़ैसले को पलट दिया है.
डलास में अदालत के बाहर डूप्री ने कहा, "फिर से आज़ाद होना ख़ुशी देता है."
सीएनएन नेटवर्क से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि यह ध्यान में रखने के बाद कि उन्होंने इतना लंबा समय जेल में गुज़ारा है, उनकी भावनाएं मिली-जुली सी हैं। उन्होंने कहा, "मैं मानता हूँ कि मुझे थोड़ा ग़ुस्सा भी आ रहा है लेकिन ख़ुशी भी है और ख़ुशी ग़ुस्से की तुलना में ज़्यादा है."
कॉर्नेलियस डूप्री पर आरोप लगा था कि उन्होंने एक और व्यक्ति के साथ मिलकर एक 26 वर्षीय महिला के साथ बलात्कार किया और फिर उसे लूट लिया। हालांकि उन पर बलात्कार का मुक़दमा कभी नहीं चला लेकिन डकैती के लिए उन्हें दोषी ठहराया गया और 75 साल जेल की सज़ा सुनाई गई। ( बीबीसी की खबर )
Tuesday, January 4, 2011
इसीलिए चाहिए जनसेवकों को सुरक्षा
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सीपी ठाकुर ने कहा कि केसरी की मौत से भाजपा ने एक युवा और समर्पित सिपाही खो दिया है। राजद के महासचिव रामकृपाल यादव ने कहा कि मैंने अपना एक करीबी साथी खो दिया। घटना के बाद विधायक के घर पर मौजूद लोगों ने महिला को बुरी तरह पीटा और बाद में उसे पुलिस के हवाले कर दिया।
(स्वाभाविक है कि जनता दरबार का संचालन कर रहे विधायक पर हमला करने आई महिला को पता रहा होगा कि चाकू मारने के बाद उसका जिंदा बचना मुश्किल है। विधायक के पास हमेशा पुलिस सुरक्षा होती है- उसकी मौजूदगी में ही महिला की पिटाई हुई होगी। साथ ही उनके पास निजी सुरक्षा फोर्स भी होती है। उसने बलात्कार का आरोप ६ महीने पहले लगाया था और शायद उसे "न्याय" की आस थी। अगर यह सहमति से हुआ यौन संबंध था, तब भी उस महिला के साथ कुछ ऐसा धोखा जरूर हुआ होगा कि उसने आपा खो दिया। अब देखिए कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के किस तरह के बयान सामने आ रहे हैं।)
Friday, December 31, 2010
Tuesday, December 28, 2010
क्या प्रजातंत्र में प्रजा फैसले कर रही है?
बिनायक सेन जेल में और शिबू सोरेन, सुरेश कलमाडी और ए. राजा सत्ता में! क्या ऐसा नहीं लगता कि प्रजातंत्र में कुछ सीरियस गड़बड़ी है? ये शिबू, ये राजा, ये कलमाडी या कोड़ा सालों देश की छाती पर मंूग दलते हुए राज करते रहे। मुलायम, लालू, नीरा यादव या हजारों खद्दरी लिबास वालों को इनकी जान की हिफाजत के लिए राज्य से सुरक्षा प्रदान की जाती है, जबकि शंकर गुहा नियोगी को, जो कि मजदूरों के वेतन के लिए आवाज उठाता था, मालिकों ने गोली मरवा दी। सुरक्षा के नाम पर उन्हें एक चिडिय़ा भी नहीं दी गई।
गौर करिए! नियोगी या बिनायक सेन (गोल्ड मेडलिस्ट पोस्ट ग्रेजुएट डॉक्टर जो आदिवासियों का इलाज करते थे) ने जिंदगी में एक मच्छर भी नहीं मारा होगा। परंतु मिली एक को गोली, दूसरे को आजीवन कारावास। अब दूसरा पहलू लीजिए। खूंखार उल्फा आतंकवादियों के नेता को अदालत जमानत दे देता है और असम की सरकार इस फैसले के खिलाफ अपील भी नहीं करती। लालू के खिलाफ भ्रष्टाचार के मुकदमे में भी केंद्र सरकार अपील नहीं करती।
एक और पहलू देखें। महज कुछ सालों पहले विदेश से भारत पहुंची नीरा राडिया के पास एक भी फैक्टरी नहीं है, पर चंद सालों में ही वह ३०० करोड़ रुपए की मालकिन बन जाती है। यानी करोड़ों रुपए कमाती है, करोड़ों कमवाती है और अरबों का चूना देश को लगा देती है। पूरे सिस्टम की ऐसी-तैसी करती हुई! भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा (आठ) के तहत इसकी सजा छह माह से पांच साल तक है। बिनायक सेन सलवा जुडूम के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। वह कह रहे थे कि माओवादियों के खिलाफ सरकार द्वारा चलाया जा रहा कार्यक्रम वहां के आदिवासियों के लिए एक नए आतंकवाद की तरह है। उनकी सजा? आजीवन कारावास!
कौन हैं ये लोग जो सिस्टम पर कब्जा कर रहे हैं? कैसा है यह प्रजातंत्र जिसमें हमें जिंदा मक्खी निगलने को मजबूर किया जा रहा है? कोई सिख दंगों का दोषी फिर खद्दर पहन कर सिस्टम पर कब्जा जमाने आ जाता है। करोड़ों सिख हाथ मलते रह जाते हैं। सत्ता पर बैठे लोग कह देते हैं- देखो, दूध और पानी अलग कर दिया गया ना! और हम, सब सच जानते हुए भी हामी भर देते हैं।
याद आता है सिविल डिसओबीडिएंस (सविनय अवज्ञा आंदोलन गांधीजी ने इसी से लिया था) के जनक हेनरी डेविड थोरो का एक किस्सा। अमेरिकी सरकार ने एक टैक्स लगाया। थोरो के अनुसार वह टैक्स अनुचित था। थोरो ने विरोध किया तो उन्हें जेल भेज दिया गया। एक दिन उनका पड़ोसी किसी और को देखने जेल में पहुंचा तो देखा कि एक एनक्लोजर में थोरो बंद हैं। उसने चौंक कर पूछा- ‘थोरो, आप यहां कैसे?’ थोरो का संयत जवाब था- ‘यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि आप बाहर कैसे।
आज जरूरत यह पूछने की है कि ये कौन लोग हैं जो परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से सत्ता को कठपुतली की तरह नचा रहे हैं।’कभी साउथ एवेन्यू या नॉर्थ एवेन्यू के सांसदों के बंगलों के आसपास खड़े होकर देखें। अलस्सुबह बुर्राक सफेद कड़क कुर्ता-पाजामा पहने हुए कुछ नेतानुमा लोग अपने पीछे दस-बीस आदमियों का झुंड लिए सांसदों के घर जाते या निकलते दिखाई दे जाएंगे। ये इस झुंड का ‘काम’ करवाने आए हैं। उन्हीं के खर्च पर ‘काम हो जाने पर आगे की बात होगी’ का भाव लिए हुए। प्रजातंत्र की मंडी से लगते हैं ये ‘पॉश’ मोहल्ले। बड़ा नेता देर से बाहर निकलता है। अपनी गणित के हिसाब से आश्वासन देता है या फोन करता है, या फिर साथ चल देता है। क्यों? क्या प्रजातंत्र में अपने आप से काम नहीं होगा? क्या इन खद्दरधारीनुमा बिचौलियों के बिना काम नहीं होता?
थोड़ी देर यह नजारा देखें। सड़ांध आने लगती है। एक नेता अगर पांच साल बाद जाता है तो दूसरा आ जाता है। फिर वही सिलसिला। नेता बदलने से सड़ांध कम नहीं होती। संसद में पिछली बार ९९ लोग करोड़पति थे। इस बार ३०६ हैं। करोड़पतियों का जमघट है।प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्री टाकविल ने अमेरिका के प्रजातंत्र की धूम सुनी तो पेरिस से अमेरिका पहुंचे वहां के प्रजातंत्र की खूबियां जानने। लौटकर उन्होंने एक लेख लिखा- अमेरिकी प्रजातंत्र का सबसे बड़ा खतरा है बहुसंख्यक का आतंक। भारत में यह खतरा तो नहीं है, पर वोट का बहुमत जिस तरह हासिल हो रहा है, जिस तरह जनता को गुमराह कर शोषण को संस्थागत किया जा रहा है, वह सबसे बड़ा खतरा है।ऐसा नहीं है कि अच्छे लोग नहीं हैं। यह भी नहीं है कि ईमानदार तन कर खड़ा होने को तैयार नहीं है। समस्या यह है कि उसके तन कर खड़े होने से भी कुछ नहीं हो पा रहा है। मीडिया कॉरपोरेट घरानों की चेरी है तो न्याय-प्रक्रिया दोषपूर्ण।
लेकिन, एक ही आशा की किरण है और वह है जनमत (पब्लिक ओपिनियन)। जब सर्वोच्च न्यायालय और मुख्य न्यायाधीश कपाडिया सीवीसी की गलत नियुक्ति पर सख्त रुख अपनाते हैं, जब यही सर्वोच्च न्यायालय अपने ही अधीनस्थ इलाहाबाद हाईकोर्ट की सही तस्वीर जनता को दिखाता है, तो जनमत उसका खैरमकदम करता है। मनमोहन सिंह को कोई भ्रष्ट कहने की हिम्मत नहीं जुटाता, लेकिन उनकी निष्क्रिय ईमानदारी जनता में चर्चा का विषय जरूर बनती है।
साभार- http://epaper.bhaskar.com/cph/epapermain.aspx?edcode=194&eddate=12/28/2010&querypage=7
Monday, December 27, 2010
गांधी जितने ही खतरनाक बिनायक सेन!
बिनायक सेन का पूरा जीवन त्याग और समर्पण का रहा है। उनके जीवन परिचय से तो यही सामने आता है। बिनायक सेन ने वैल्लोर विश्वविद्यालय के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज से स्वर्ण पदक प्राप्त किया था। 80 के दशक के प्रारंभ में वे छत्तीसगढ़ चले आए थे। वे तभी से छत्तीसगढ़ में हैं और उन्होंने हर पृष्ठभूमि के मरीजों की देखभाल की है। सेन ने अपने आदर्श शंकर गुहा नियोगी की ही तरह अन्य क्षेत्रों में भी काम किया (नियोगी की १९९१ में हत्या कर दी गई थी)। वे आदिवासियों के सामाजिक अधिकारों के प्रति सचेत हुए, जो बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे थे और जिनके बच्चे प्राथमिक शिक्षा तक से महरूम थे। उसके बाद उन्होंने उन इलाकों को अपना कार्यक्षेत्र बनाया, जहां स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं थीं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के वे आदिवासी इलाके, जहां स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं (आज भी नहीं हैं)।
सवाल यह है कि क्या भारत में वंचितों की आवाज उठाने की यही सजा मिलेगी? आज देश का कोई भी चैनल या अखबार उन इलाकों से खबरें लाने की भी स्थिति में नहीं है, जहां बिनायक सेन काम करते थे। क्या उन इलाकों की हकीकत से आम लोग रूबरू हो पाएंगे कि सेन ग्रामीणों को कौन सी शिक्षा दे रहे थे?
आइये देखते हैं कि किन आरोपों में विनायक सेन को सजा सुनाई गई है और उसमें क्या दम है..
1- डॉ. सेन ने 17 महीनों के दौरान सान्याल से 33 मुलाकातें कीं। इसके लिए जेल प्रशासन ने उन्हें बाकायदा अनुमति दी थी। आवेदन करते समय डॉ. सेन ने पीयूसीएल (सर्वोदय नेता जयप्रकाश नारायण द्वारा गठित संस्था पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज) से जुड़ाव को भी नहीं छुपाया था।
2-डॉ. सेन ने पीयूसीएल के लैटरहेड पर ही जेल प्रशासन को अपना आवेदन दिया था। जिस पर उन्हें सान्याल और दूसरे कैदियों से मिलने की इजाजत दी गई।
3- रायपुर के अतिरिक्त जिला एवं सत्र जज बीपी वर्मा ने सान्याल की रिश्तेदार बुला सान्याल और डॉ. सेन के बीच फोन पर हुई बातचीत के टैप को सान्याल के साथ डॉ. सेन के साजिशपूर्ण रिश्तों का सबूत माना था।
4- 24 दिसंबर को दिए गए फैसले में कई जगह जेल में दर्ज रिकॉर्ड का हवाला दिया गया, जिसमें डॉ. सेन को सान्याल का रिश्तेदार बताया गया है।
5- डॉ. सेन की सान्याल से मुलाकातों का जेल प्रशासन के पास पूरा ब्योरा रहता था।
और ये हैं सबूत, जो पेश किए गए....
१-रायपुर सेंट्रल जेल में बंद नारायण सान्याल ने ३ जून २००६ को बिनायक सेन को एक पोस्ट काडॆ लिखा, जिसमें उन्होंने अपने स्वास्थ्य चिंताओं और चल रही कानूनी कार्यवाही के बारे में जानकारी दी थी। इस पर जेल अधिकारियों के हस्ताक्षर थे।
२-एक पीले रंग की बुकलेट जिसमें सीपीआई (पीपुल्स वार) और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के बीच एकता की बात कही गई है।
३-मदनलाल बनर्जी (सीपीआई-माओवादी के सदस्य) द्वारा जेल से लिखा गया पत्र, जिसमें उन्होंने प्रिय कामरेड बिनायक सेन... लिखकर सेन को संबोधित किया गया है।
४- अंग्रेजी में लिखे एक लेख की छाया प्रति, जिसे ... नक्सल मूवमेंट, ट्राइबल एंड वुमेन्स मूवमेंट... शीर्षक के तहत लिखा गया।
५-एक ४ पृष्ठ का हस्तलिखित नोट, जिसका शीर्षक है॥ हाऊ टु बिल्ड एंटी यूएस इंपीरियलिस्ट फ्रंट।
६- आठ पृष्ठों का लेख, जिसका शीर्षक है क्रांतिकारी जनवादी मोर्चा (आईटीएफ), वैश्वीकरण एवं भारतीय सेवा केंद्र।
इसके पहले भी मैने ब्लॉग में लिखा था कि रायपुर से खबर आई थी कि माओवादियों का संबंध आईएसआई से है। उस आईएसआई का जुड़ाव भी विनायक सेन से लगाया गया था, जिसके बारे में न्यायालय में पूछे जाने पर पता चला कि दिल्ली स्थित इंडियन सोशन इंस्टीट्यूट के संस्थापक से विनायक सेन की पत्नी से रायपुर के आदिवासियों से बातचीत होती थी, जिसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से भारतीय जांच एजेंसियों ने रिश्ते निकाल लिए।
क्या न्यायालय में पेश किए गए दस्तावेज विनायक सेन को राजद्रोही घोषित करने के लिए पर्याप्त हैं? मुझे तो यही लगता है कि कांग्रेस व भाजपा जैसी पूंजीवाद समर्थक पार्टियों के लिए सेन उतने ही खतरनाक होते जा रहे थे, जितने खतरनाक अंग्रेजों के लिए गांधी थे। उसी की सजा सेन को न्यायालय ने भी दे दी और सरकार को खुश कर दिया।
Sunday, December 26, 2010
नजर रखिए, कहीं लुट न जाए झारखंड
झारखंड सरकार 2001 की औद्योगिक नीति में बदलाव करने जा रही है। इसके पहले भी अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री रहे हैं, लेकिन तब उन्हें नहीं लगा कि 2001 की औद्योगिक नीति उद्योग जगत के प्रति मित्रवत नहीं है। लेकिन अब उन्हें ऐसा लगने लगा है।
राजनीतिक अस्थिरता के दौर में बड़ी मेहनत से अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने हैं। कहा गया कि असल मेहनत भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और कुछ प्रमुख उद्योगपतियों ने की, जिनकी नजर राज्य के प्राकृतिक संसाधनों पर है। अब यही देखने की बात होगी कि मुंडा सरकार जब अपना दिल खोलती है तो किसको कितने हजार करोड़ का फायदा कराती है।
झारखंड सरकार ने राज्य की औद्योगिक नीति 2001 में संशोधन करने का फैसला किया है। इसमें कारोबारियों को और प्रोत्साहन देने के लिए बदलाव किया जाएगा। 10 साल पहले बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी सरकार ने औद्योगिक नीति तैयार की थी। पुनरीक्षित औद्योगिक नीति मेंं जमीन, पानी, लौह अयस्क, कोल लिंकेज आदि जैसी बुनियादी ढांचा सुविधाओं को ध्यान में रखा जाएगा, जिससे इन क्षेत्रों में निवेश आकर्षित किया जा सके। पुनरीक्षित औद्योगिक नीति में परंपरागत और गैर परंपरागत ऊर्जा, कृषि और खनन क्षेत्र को कुछ प्रोत्साहन दिए जाने की योजना है।
Wednesday, December 22, 2010
कांग्रेस की हड्डी और विपक्ष की पीड़ा
बहुत बेहतरीन परिकल्पना है। सही है कि मुख्य विपक्ष भारतीय जनता पार्टी में कोई नेता नहीं है। जिस उत्तर प्रदेश ने भाजपा को केंद्र की गद्दी पर पहुंचाया, उस प्रदेश में ही नेतृत्व का संकट। मध्य प्रदेश से नेता का आयात किया जा रहा है उत्तर प्रदेश को चलाने के लिए। उस पर भी उत्तर प्रदेश के धुरंधर भाजपाई डरे हैं कि कहीं वह महिला आकर यूपी में भी न जगह बना ले। राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, लालजी टंडन, मुरली मनोहर जोशी- संघ के सनातन धर्मी हिंदू ढांचे में यही नेता नजर आते हैं। अगर इनसे एक रैली करने को कह दिया जाए तो शायद ही इनमें से कोई दो हजार की भीड़ जुटा पाए। संसद में राज्यसभा औऱ लोक सभा में विपक्ष के नेता हवा-हवाई लोग हैं। ये जनाधार वाले नेताओं का नाश तो कर सकते हैं, खुद दिल्ली की किसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। शायद डर जाते हैं कि बड़े नेता हैं, जमानत जब्त हो गई तो मुंह कैसे दिखाएंगे।
हां, चुनावी मसलों की हड्डी के बजाय अगर कांग्रेस इन नेताओं के सामने मंत्री पद की हड्डी फैला देती तो शायद एक-एक हड्डी के लिए भाजपा से ४-४ नेता निकल आते और अपनी पार्टी को तत्काल नमस्ते कर लेते।
Tuesday, December 21, 2010
देश को प्याज के आंसू रुलाती कांग्रेस की प्याज राजनीति
आखिर रातों रात कौन सा ऐसा तूफान आया कि प्याज के दाम दोगुना से ज्यादा हो गए? यह तो अब कांग्रेस सरकार ही समझा सकती है। आखिर क्या है इस सरकार की गणित।
प्याज के इतिहास में जाएं तो सबसे पहले इंदिरा गांधी ने १९८० में प्याज की बढ़ी कीमतों के नाम पर जनता पार्टी को चुनावी मैदान में धूल चटा दिया। उसके बाद दिल्ली में सुषमा स्वराज के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार १९९८ का चुनाव प्याज की बढ़ी कीमतों के चलते हार गई। उसके बाद आज तक भाजपा दिल्ली प्रदेश में सत्ता के लिए तरस रही है। राजस्थान में भैरों सिंह शेखावत ने १० साल तक शासन किया, लेकिन १९९८ के चुनाव में वे भी प्याज के आंसू रोए।
आश्चर्य है। प्याज का राजनीतिक इस्तेमाल करना कोई कांग्रेस से सीखे। लेकिन इस बार तो कांग्रेस सरकार में है। पूरा देश प्याज के आंसू रो रहा है। वह भी रातो-रात प्याज का संकट हो गया। कहा जा रहा है कि असमय बारिश से फसल खराब हो गई। इसके पहले कांग्रेस ने कालाबाजारी करने वालों और चीनी मिलों को खूब कमाई कराई थी, कहा गया कि देश में चीनी कम है। हालांकि कोई ऐसी दूकान नहीं थी, जहां चीनी न हो। लेकिन सरकार कहती रही कि चीनी कम है। हालत यह हुआ कि आयात किया गया। लेकिन बाजार में आयातित चीनी नहीं पहुंची, नए सत्र की चीनी भी बाजार में नहीं पहुंची, लेकिन कारोबारियों ने कहना शुरू किया कि देश में चीनी बहुत ज्यादा है।
आखिर इसके पीछे क्या राजनीति है? आखिर किस तरह से कांग्रेस प्याज का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है? लगता है कि स्पेक्ट्रम घोटाले और हर कांग्रेसी राज के भ्रष्टाचार के खुलासे सामने आने लगे हैं और इससे सरकार डर गई है। पहले दिग्विजय उवाच। फिर चिदंबरम की आग। जब कोई दवा काम न आई तो जनता से सीधे निपटने का तरीका। अब एक तीर से दो शिकार हो रहा है। पहला- प्याज की कीमतों के पीछे जनता भ्रष्टाचार भूल जाए, दूसरा- कालाबाजारी करने वालों को बेहतर कमाई हो जाए। साथ ही कालाबाजारी करने वालों का तालमेल इस सरकार से इतना अच्छा है कि शायद चुनाव ४ महीने पहले फिर कांग्रेस सरकार प्याज को १५ रुपये प्रति किलो के नीचे ले ही आएगी।
Tuesday, December 14, 2010
दिग्विजय-चिदंबरम की कुड़ुमई की वजह
दिल्ली में सामूहिक बलात्कार, रोड रेज, चोरी, छिनैती आदि करने वाले प्रवासी (यानी दूसरे राज्यों से आए लोग) हैं। मुंबई में हेमंत करकरे ने अपनी हत्या के पहले कहा था कि उन्हें हिंदूवादियों से खतरा था।
कांग्रेस के दो बड़े नेताओं ने ताबड़तोड़ यह बयान दिया। क्या ये दोनो पागल हो गए हैं? ऐसा नहीं है। ये दोनों बहुत सयाने और दस जनपथ के चहेते हैं। दरअसल एक लाख पचहत्तर हजार करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है और वह सत्ता पक्ष व विपक्ष के न चाहते हुए भी एक देशव्यापी मुद्दा बन गया है। इसके जवाब में कुछ तो चाहिए। हेमंत करकरे के बारे में दिए गए बयान की हवा शहीद की पत्नी ने ही निकाल दी और वह मसला नहीं बन पाया। ऐसे में चिदंबरम का बयान आना स्वाभाविक था। कांग्रेस तो मान ही चुकी है कि उसे उत्तर प्रदेश और बिहार में हाल फिलहाल में कुछ नहीं मिलना है। यह मसला उठाने पर महज यूपी बिहार में ही असर पड़ना है। ऐसे में कांग्रेस के रणनीतिकारों को यह बयान दिए जाने में कोई जोखिम नहीं महसूस हुआ, वर्ना यह बयान आने के बाद चिदंबरम को देश का गृहमंत्री बने रहने का हक नहीं होता।
मेरे कुछ मित्रों ने इसके पहले की पोस्ट में संसद के साथ बलात्कार शब्द पर आपत्ति उठाई थी और उन्होंने पोस्ट पर प्रतिक्रिया नहीं दी थी। इसलिए इसके लिए मैने थोड़ा सॉफ्ट बनारसी शब्द कुड़ुमई शब्द इस्तेमाल किया।
प्रवासी मजदूरों का मसला ऐसा है, जिस पर कांग्रेस व भाजपा दोनों की एक ही राय है। जो बात शीला दीक्षित, तेजिंदर खन्ना और अब चिदंबरम कह रहे हैं या कहते रहे हैं, कुछ वैसा ही भाजपा के विजय मलहोत्रा, विजय गोयल भी गाहे-बगाहे कहते रहते हैं। अभी कल ही विजय मलहोत्रा ने चिदंबरम का विरोध करते हुए कह ही दिया कि एनसीआर के लोग दिल्ली आते हैं और अपराध करके चले जाते हैं। ऐसे में दोनों पार्टियों की राय एक ही है।
मजदूरों के वास्तविक संकट और झुग्गी बस्तियों को खत्म करना एक ऐसा मसला है, जिसे पूंजीवादी व्यवस्था में कोई हल नहीं करना चाहता। अगर झुग्गी नहीं बसानी होती तो औद्योगिक क्षेत्रों में जब जमीन दी जाती है, उसी समय उस इकाई में काम करने वाले औद्योगिक मजदूरों के लिए भी रहने के लिए जमीन देकर भवन बनवा दिए जाते। अगर यह अनिवार्य हो जाए तो किसी भी जगह से आने वाला मजदूर झुग्गी बस्तियों में रहने को मजबूर नहीं होगा। लेकिन इसमें समस्या यह है कि तब मुफ्त के और सस्ते मजदूर नहीं मिलेंगे, क्योंकि उस इकाई विशेष में काम करने वालों की सही गणना हो जाएगी और उन्हें फैक्टरियों को उचित मजदूरी देनी पड़ेगी।
समस्या यही है कि कांग्रेस चोर इसलिए है, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी डकैत है। ये दोनों जानते भी हैं कि अभी देश में इनका कोई विकल्प नहीं है, जैसा कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों ने ढूंढ लिया है। कांग्रेस जनता की समझ को जानती है कि वह चोरों के बजाय डकैत को चुनना नहीं चाहेगी, इसलिए उसकी सत्ता को फिलहाल कोई खतरा नहीं है। लेकिन कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका और उद्योग जगत ने जिस तरह से उत्पात मचा रखा है, उससे एक संभावना हमेशा जिंदा रहती है कि जनता इनके खिलाफ एकजुट हो जाए और कुछ कर बैठे।
Sunday, December 12, 2010
राडिया के नाम पर
टू-जी घोटाले को 2 साल से ज्यादा हो गए। उसके पहले इसके आवंटन को लेकर चर्चा चली। किसी की नहीं सुनी गई और औने पौने भाव स्पेक्ट्रम दे दिया गया। जब पिछली सरकार में आवंटन नीति को लेकर चर्चा हुई तब इसका नामलेवा कोई नहीं था। राजा पर सीबीआई के छापे पड़े। कब? सीबीआई जांच शुरू होने के एक साल बाद। आखिर कोई भी बुद्धिमान आदमी, जो पौने दो लाख करोड़ रुपये का घोटाला करेगा, वह अपने घर में उसके सबूत क्यों रखेगा? तो आखिर क्या तलाश रही है सीबीआई? अब टू-जी का पूरा मामला नीरा राडिया तक समेटा जा रहा है। राडिया, जो जन संपर्क एजेंसी की मालकिन है। अगर उसने नीतियों पर प्रभाव डालने के लिए लॉबीईंग की तो उसके ऊपर क्या कोई मामला बनेगा? कोई भी समझदार आदमी कह सकता है कि नीरा राडिया ने वही किया जो एक पीआर एजेंसी के लोग करते हैं।
अब नया शिगूफा- नीरा राडिया देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त थी। सवाल किया जा रहा है कि उसकी पीआर कंपनी 9 साल में 300 करोड़ रुपये कैसे कमा सकी?
क्या जनता को यह समझ में नहीं आता कि जिन कंपनियों को सरकार ने मुफ्त में पौने दो लाख करोड़ रुपये दे दिए, उनका जनसंपर्क देखने वाली कंपनी एक साल में 300 करोड़ रुपये कमा सकती है? क्या जनता को यह समझ में नहीं आता है कि निहायत अनुत्पादक काम करने वाले महेंद्र सिंह धोनी को अगर ये कंपनियां अपने ब्रांड के प्रचार के लिए 400 करोड़ रुपये सालाना दे सकती हैं तो क्या उन्होंने 300 करोड़ रुपये जैसी छोटी राशि का मुनाफा पिछले 9 साल में उस वैष्णवी कम्युनीकेशंस को नहीं कराया होगा, जिसका जन संपर्क वह कंपनी देखती है? ध्यान रहे कि टाटा. मुकेश अंबानी, यूनीटेक जैसी देश की करीब हर बड़ी कंपनी का जनसंपर्क वैष्णवी कम्युनीकेशंस देखती है।
सरकारी जांच एजेंसियों की स्थिति देखें तो वे कानून के साथ किस तरह बलात्कार कर रही हैं, इसी से पता चलता है, जिसमें विनायक सेन की बीवी एलीना को आईएसआई का एजेंट और फर्नांडिस को अमेरिकी आतंकवादी बताया गया। 3 साल का मानसिक उत्पीडऩ झेलते रहे विनायक। अभी कल ही पता चला कि आईएसआई का मतलब दिल्ली स्थित इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट और फर्नांडिस का मतलब इस संस्थान के संस्थापक निदेशक वाल्टर फर्नांडिस हैं।
Monday, November 29, 2010
आप धन्य हैं मनमोहन!
आज मेरी पत्नी से बहुत देर तक मेरा सवाल-जवाब चला। उन्होंने पूछ दिया कि ये स्पेक्ट्रम घोटाला क्या है? मैंने उनसे कहा कि देश की संपत्ति की लूट की लूट का मामला है। उन्हें समझ में नहीं आया तो मैने सामान्य ढंग से समझाने की कोशिश की। मैने उनसे पूछा कि २ लाख में कितने शून्य लगते हैं तो उन्होंने बताया कि पांच। फिर मैने पूछा कि २ लाख करोड़ में कितने शून्य लगेंगे तो उन्होंने बहुत मेहनत कर बताया कि करोड़ के सात और लाख के पांच मिलाकर बारह शून्य लगेंगे। तब मैने उन्हें बताया कि २ के बाद बारह शून्य लगाने पर जितने रुपये बनते हैं उतने बाजार मूल्य का स्पेक्ट्रम कुछ कारोबारियों को हमारी सरकार ने करीब मुफ्त में दे दिया है।
हालांकि २ के बाद इतने शून्य लगाने के बाद ही वो चकरा गई थीं। लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि संचार विभाग के अलावा और विभागों में भी ऐसा है क्या? मैने फिर अपनी छोटी बुद्धि दौड़ाई और बताया कि इससे बड़ा घोटाला गैस ब्लॉक आवंटन में हुआ है और एक ही सेठ को सरकार ने औने पौने दाम देश की सारे गैस ब्लॉक दिए हैं। साथ ही देश में कोयला ब्लॉक के आवंटन में भी लूट है। इतनी ही बड़ी लूट लौह अयस्क ब्लॉक के मामले में हुई है। तब तक मेरी पत्नी को याद आया कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री को हटाने की साजिश लौह अयस्क की लूट करने वाले लोग कर रहे हैं। येदियुरप्पा के ऊपर कुछ लाख रुपये के प्लाट उनके परिवार को दिए जाने के मामले को लेकर।
बहरहाल, बीच में नीरा राडिया की भी चर्चा हो गई। उनके बारे में भी बताना पड़ा कि वो लंदन में पढ़ी लिखी और पूंजीवाद को नज़दीक से समझने वाली महिला हैं। राडिया की पढ़ाई पूरी हुई, ठीक उसी समय हमारे मनमोहन सिंह बाजार को पूंजीवादी रास्ते पर लेकर आए। उस समय मनमोहन वित्त मंत्री थे। नीरा राडिया ने नजदीक से देखा था कि पूंजीवाद में एक जनसंपर्क एजेंसी की बड़ी भूमिका होती है और उन्होंने वैष्णवी कम्युनिकेशंस की नींव रख दी। बाद में वह टाटा समूह और मुकेश अंबानी समूह प्रमुख उद्योग घरानों के जनसंपर्क देखने लगीं और उन्होंने बहुत बड़ी पूंजी वाली जन संपर्क एजेंसी खड़ी कर ली। अब वह मीडिया और अपने अन्य संपर्कों के माध्यम से उद्योग जगत के पक्ष में माहौल बनाती हैं।
तो आखिर नीरा राडिया कैसे सामने आ गईं? दरअसल टू-जी स्पेक्ट्रम की लूट की जांच का फैसला सरकार ने किया। राडिया चूंकि उद्योगपतियों के लिए काम करती थीं, इसलिए उनके फोन टेप किए जाने लगे। जब फोन टेप में बड़ी-बड़ी मछलियों के नाम सामने आने लगे तो जांच एजेंसी ने उसे साल भर दबाए रखा लेकिन वह टेप लीक हो गई और खबरें मीडिया में आने लगीं।
बहरहाल चर्चा में यह आ गया कि गैस घोटाला क्यों सामने नहीं आया? असल में मुकेश अंबानी ज्यादा चालाक निकले और उन्होंने अपनी डीलिंग सीधे सरकार से की और उस क्षेत्र में किसी प्रतिस्पर्धी को घुसने का मौका ही नहीं दिया। कुछ वैसे ही, जैसे वेदांता के अग्रवाल ने खनन कारोबार में किया था। जब खनन कारोबार में तमाम कारोबारी कमाई के लिए घुसने लगे औऱ घोटाला सामने आने की नौबत आई तो उन्होंने लंदन में घर बसा लिया। अग्रवाल को अब भारत में कमाई से खास मतलब भी नहीं है क्योंकि वेदांता विश्व की तीसरी बड़ी खनन कंपनी बन चुकी है। हालांकि उनका भारत में भी बहुत बड़ा कारोबार है।
मेरी समझ में इतना ही आया और यह मेरे निजी विचार हो सकते हैं। मनमोहन को मैने धन्यवाद भी दिया और खुद नए सिरे से समझने और समझाने की कोशिश की कि किस तरह से देश में धनकुबेरों की संख्या बढ़ रही है और वे वैश्विक धनकुबेरों की सूची में ऊंचा स्थान बनाते जा रहे हैं। इसी को कहते हैं शानदार विकास!
Friday, November 26, 2010
राहुल गांधी और चेहरे की राजनीति
हालांकि चमचागीरी की राजनीति करने वाले कांग्रेसियों को भी पता ही होगा कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जीत क्यों मिली थी?
उत्तर प्रदेश में मंडल आयोग के बाद हुए ध्रुवीकरण में मुलायम सिंह यादव पिछड़े वर्ग के मसीहा बनकर उभरे थे। उसी में उनके एक डिप्टी मुलायम भी थे, बेनी प्रसाद वर्मा। लेकिन मुलायम सिंह भी जब लंबे समय तक जीत हासिल करते रहे तो उन्होंने उत्तर प्रदेश में आए बदलाव को यादवों और मुलायम परिवार की जीत मान ली और उनके डिप्टी ढक्कन साबित हो गए। शायद लोगों को अभी भी याद होगा कि जब मुलायम केंद्रीय मंत्री थे तो उन्होंने बेनी प्रसाद को संचार मंत्री जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी दिलाई थी और उन्हें केबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल हुआ।
बेनी प्रसाद वर्मा लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की राजनीति में पृष्ठभूमि में पड़े रहे और पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपनी पहचान बचाने के लिए कांग्रेस का सहारा लिया। उधर मुलायम सिंह की उत्तर प्रदेश में ऐसी छवि बनी, जैसे वे सिर्फ यादवों के नेता बन गए हों। परिणाम यह हुआ कि बेनी प्रसाद ने जनता की भावनाओं को समझा और कांग्रेस के साथ मिलकर इसका लाभ उठाया। मुलायम सिंह की तमाम परंपरागत बन चुकी सीटें (जो बेनी प्रसाद के प्रभाव से सपा को मिलती थीं) कांग्रेस को चली गईं। गोंडा और नेपाल बॉर्डर से सटी बेनी के प्रभाव वाली करीब १० सीटें कांग्रेस ने मुफ्त में हथिया लीं।
हां, रायबरेली-अमेठी औऱ उससे सटे इलाकों में जरूर नेहरू खानदान का फेस वैल्यू रहा।
इसे कांग्रेसियों ने कुछ इस तरह प्रचारित किया, जैसे कि राहुल गांधी का जादू चल गया। कहीं राहुल की छवि को मीडिया दूसरा रुख न दे दे, शायद इसी का ध्यान रखते हुए बेनी बाबू को मंत्री क्या संत्री बनाने के योग्य भी नहीं समझा गया।
बिहार क्या, अब पूरे देश में फेस वैल्यू है। लेकिन वह फेस कैसा हो? सवाल यह है। शायद जनता चाहती है कि यह फेस उनके बीच का हो, जो उनके दर्द-दुख और उनके विचारों को समझे। कांग्रेस और भाजपा दोनों ऐसी पार्टियां हैं जो जनाधार वाले नेताओं को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं। जहां भाजपा में फेस बनाने के चक्कर में तमाम हवा-हवाई नेता लगे रहते हैं, कांग्रेस के लोग नेहरू खानदान के अलावा किसी को फेस मानते ही नहीं।
कुल मिलाकर देखें तो हवा-हवाई फेस वैल्यू बनाने वालों की हवा भी बिहार के मतदाताओं ने निकाल दी है।
Wednesday, November 24, 2010
क्या भारत का कारोबारी जगत अपनाएगा बिहार मॉडल
बिहार में हालत यह हो गई है कि विपक्ष ही नहीं रहा। सारी सीटें नीतीश-मोदी ने हथिया ली। लालू प्रसाद जैसे करिश्माई नेता को यह उम्मीद तो कतई नहीं थी, या कहें कि किसी को यह उम्मीद नहीं थी।
नीतीश कुमार ने जनता से सिर्फ एक बात कही थी कि ५ साल से जो सेवा की है, उसकी मजदूरी दे दो। बिहार में ज्यादातर मजदूर ही हैं... खासकर वे लोग, जो वोट देते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि उन्होंने नीतीश को उनकी मजदूरी देकर खुश कर दिया। कारोबारी जगत भी खुश है। बिहार के चुनाव को एक मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। जिस बिहार को कहा जाता था कि यह नहीं सुधर सकता, जाति-पाति से ऊपर नहीं उठ सकता, उसने कम से कम मजदूरी देने में तो पूरी दरियादिली दिखाई और सही कहें तो बिहार में नीतीश सरकार ने जितना काम किया था, उससे कहीं ज्यादा उन्हें मजदूरी मिली।
देश में अभी तक जाति की ही राजनीति चली है। कांग्रेस सरकार शुरू से कथित ऊंची जाति, दलित और मुसलमान के जातीय समीकरण से सत्ता में बनी रही। उसके बाद लालू प्रसाद के समय में वह वर्ग उभरकर सामने आया, जो कांग्रेस सरकार में सत्ता सुख से वंचित था और ऐसा हर राज्य में कमोबेश हुआ। कांग्रेस-भाजपा अभी भी उस वर्ग को अछूत मानती है, जिसका वोट लेकर मुलायम-लालू जैसे नेता सरकार में आए।
अभी भी उदाहरण सामने है। महाराष्ट्र में चव्हाण के बदले चव्हाण खोजा गया। कर्नाटक में भाजपा लिंगायत के बदले लिंगायत खोज रही थी, लेकिन येदियुरप्पा ने इस्तीफा ही नहीं दिया। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस ने रेड्डी के बदले रेड्डी खोज निकाला। ऐसे माहौल में अगर नीतीश कुमार २४३ में से २०६ सीटें जीतकर सत्ता में आते हैं तो निश्चित रूप से बिहार ने देश को एक नई दिशा दी है। यह प्रचंड बहुमत किसी जाति समूह के मत से नहीं मिल सकता, सबका मत नीतीश सरकार को मिला। वह भी मजदूरी के बदले।
मजदूरों से भरे बिहार ने नीतीश का दर्द समझा है कि अगर कोई मेहनत से काम करता है तो उसे मजदूरी दिल खोल कर दी जानी चाहिए। ऐसे में कारोबारियों को भी एक सीख मिली है कि अगर कोई मेहनत से काम करता है तो उसका हक जरूर मिलना चाहिए। देश के हर औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों में असंतोष है। नोएडा और गाजियाबाद में प्रबंधन से जुड़े लोगों की हत्या इसका उदाहरण है। तो ऐसी स्थिति में बिहार का मतदाता क्या संकेत दे रहा है.... क्या हर तिकड़म लगाकर, टैक्स की चोरी कर, सरकार में अपने प्यादे रखवाकर, बैलेंस सीट में गड़बड़ियां कर, सरकार से मिली भगत कर देश की संपत्ति को निजी संपत्ति बनाने में जुटे कारोबारी- एक तिमाही में तीन हजार करोड़ रुपये मुनाफा कमाने वाले कारोबारी जनता के इस संदेश को समझ पाएंगे? क्या वे बिहार के मजदूरी मॉडल को स्वीकार कर पाएंगे?
बहरहाल... बहुत दिन बाद राजनीति पर लिखने को मन में आया है। उम्मीद है कि अभी और कुछ भी जारी रहेगा...
Wednesday, November 17, 2010
मरने के लिए ही बने हैं मजदूर
आखिर लोग अन्य राज्यों से मजदूरी करने दिल्ली आते ही क्यों हैं? यही तो शाइनिंग इंडिया है। पूंजीपतियों को सुविधा देने के लिए देश भर में कुछ केंद्र बना दिए गए। वहां पर फैक्टरी या संयंत्र लगाने के लिए उद्योगपतियों को फ्री जमीन, मामूली ब्याज दर (कभी कभी तो शून्य दर पर) कर्ज मुहैया कराया जाता है। साथ ही यह सुविधा दी जाती है कि उस इलाके में अगर कारोबारी मजदूर का खून भी निचोड़ रहा है तो स्थानीय प्रशासन की कोई भूमिका नहीं होगी, न ही स्थानीय लोगों का कोई हस्तक्षेप होगा। बाहर से मजदूरी करने लोग आएंगे और वे दो जून की रोटी कमाने के लिए जितना भी खटाया जाए, खटेंगे।
इससे हुआ यही कि अन्य रोजगार केंद्रों से रोजगार छिन गए। उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य कुछ पिछड़े राज्यों में कुछ बचा ही नहीं। किसानों को बिचौलियों के हाथ बर्बाद करवा दिया गया, उत्पादन लागत से ज्यादा पर वह अपना उत्पाद बेच ही नहीं पाता। वह ८ रुपये किलो गेहूं बेचता है तो गरीब खरीदारों तक पहुंचते पहुंचते वह १६ रुपये किलो हो जाता है। विनिर्माण क्षेत्र पूरी तरह से कुछ शहरों तक केंद्रित कर दिए गए।
अगर शाइनिंग इंडिया में मजदूरों और कर्मचारियों की कोई जगह होती तो निश्चित रूप से रोजगार के तमाम केंद्र बनते, जिससे मजदूरों का विस्थापन नहीं होता। अगर मजदूरों का विस्थापन कराना और छोटे-छोटे रोजगार केंद्रों को बर्बाद करना ही था तो उस शाइनिंग इंडिया में सेज में कंपनियों को १० एकड़ जमीन देते वक्त सरकार २ एकड़ जमीन की व्यवस्था उसके कर्मचारियों के लिए भी कर देती, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
दिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाके में बिल्डिंग ढहने की घटना इसकी बानगी है। दिल्ली में केंद्र सरकार और राज्य सरकार ने मिलकर १६०० से ज्यादा स्लम और अवैध कालोनियां विकसित करवाई हैं, जिससे वहां देश भर के मजदूर आकर बस सकें। इन कालोनियों में जनसंख्या विस्फोट की स्थिति है। दो कमरे का किराया सात से दस हजार रुपये महीने तक चल रहा है। स्लम एरिया में पहले बस चुके लोग अपने मकान में कहीं न कहीं से कमरे बढ़ाने की गुंजाइश में लगे हैं कि किसी तरह से १ कमरा बढ़ जाए तो उसका तीन हजार रुपये महीने किराया आने लगे।
इन १६०० अवैध और स्लम कालोनियों में वे लोग रहते हैं जिनकी मासिक कमाई तीस हजार रुपये तक है। उससे ऊपर जाने पर वे वैध कालोनियों में घुसने की कोशिश करते हैं, जहां दो कमरे का किराया बारह हजार रुपये महीने के ऊपर चला गया है। वैसे तो दिल्ली में पाकिस्तानी और बांग्लादेशियों के अलावा हर राज्य से आए लोग अवैध रूप से रहते हैं, क्योंकि सरकारों ने तो सिर्फ पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों को ही वैध रूप से बसाया है, बाकी वैध रूप से रहने वाले लोगों की संख्या कम ही है।
अवैध कालोनियों में रह रहे लोगों के पास विकल्प क्या है? क्या वे अपने नियोक्ता पर हमला करें, जो उन्हे इतना वेतन नहीं देता कि वे वैध इलाकों में रह सकें, या वे उस मकान मालिक पर हमला कर दें तो उन्हें अपने घर में रखता है, या वे खुद कहीं रेल के नीचे कट मरें।
बाहर से आने वाले मजदूरों के बिना भी दिल्ली में काम नहीं चलने वाला है। आखिर वे जो काम कर रहे हैं, उसे कौन करेगा? लेकिन उनके जीने का कोई इंतजाम नहीं है। अपने राज्य में रहें तो भूख से मरें और दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे रोजगार केंद्रों पर नौकरी करने जाएं तो अपने आशियाने के कब्रिस्तान में दफन हो जाएं। इस तरह से मरना ही उनकी नियति है और यही शाइनिंग इंडिया की चमकदार तस्वीर है।
Tuesday, October 26, 2010
बिहार में नीतीश कुमार के लिए संभावनाएं
दरअसल दुनिया की किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में करीब सात प्रतिशत मतदाता बेवकूफ होते हैं। वे विकास और नेता के कामों को मतदान का आधार बनाते हैं। उनकी कोई राजनीतिक विचारधारा या निष्ठा, पूर्वाग्रह या ग्रंथि नहीं होती। वे अंत तक भ्रमित रहते हैं। बिहार में ऐसे मतदाताओं को लुभाने की कोशिश में नीतीश ने कहा कि हमने काम किया, लालू ने कहा कि सब स्टंट है और कांग्रेस ने कहा कि सब हमारे पैसे से हुआ। लेकिन ये मतदाता नीतीश कुमार के पक्ष में शत प्रतिशत जाते नजर आ रहे हैं।
दूसरे, जातीय समीकरण नीतीश के खिलाफ था। ऐसे में कांग्रेस बेहतरीन भूमिका निभा रही है। पहले चरण में जहां उसने लालू प्रसाद के भूराबाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) का वोट कांग्रेस ने नीतीश से छीना है, दूसरे चरण में राम विलास पासवान का बेड़ा... गर्क करती कांग्रेस साफ नजर आ रही है।
नीतीश को असल खतरा भूराबाल से ही था, जिस वर्ग ने पिछले चुनाव में यह सोचकर नीतीश को वोट दिया था कि जिस तरह की लूट का अवसर उन्हें श्रीकृष्ण सिंह और जगन्नाथ मिश्र के समय मिला था, वैसा ही अवसर नीतीश के कार्यकाल में मिलेगा। लेकिन इन्हें निराशा ही हाथ लगी है। इनके फ्रस्टेटेड वोट (करीब ३० प्रतिशत) कांग्रेस को जा रहे हैं, वहीं तमाम क्षेत्रीय आदि समीकरण बैठाने में सफल रहे नीतीश के पक्ष में अभी भी ६० प्रतिशत भूराबाल हैं। इस तरह से कांग्रेस, नीतीश कुमार के पक्ष में वोटकटवा की भूमिका में ज्यादा नजर आ रही है।
Sunday, October 17, 2010
न्यायालय पहुंचा ब्राह्मणवाद, वहां भी न्याय नहीं
Tuesday, October 12, 2010
कर्नाटक में लोकतंत्र का जनाजा
लंबे समय से कर्नाटक में संघर्ष कर रही भारतीय जनता पार्टी आखिर मुसीबत में आ ही गई। कितना विरोधाभास है कि एक तरफ येदियुरप्पा जैसे साफ छवि के और पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाले मुख्यमंत्री हैं तो उसी पार्टी में अगड़ी जाति के रेड्डी बंधु भी।
भाजपा के इस विरोधाभास का फायदा को कांग्रेस और विपक्षी दलों को उठाना ही था। खबरों के मुताबिक ३०० करोड़ रुपये खर्च करके १२ विधायक खरीद लिए गए और येदियुरप्पा सरकार अल्पमत में आ गई।
कर्नाटक जैसे राज्य में येदियुरप्पा सरकार को गिराने के लिए तीन सौ करोड़ रुपये की राशि बहुत छोटी है। राज्य सरकार ने लौह अयस्क की लूट पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। कोर्ट के फैसले के बाद भी लौह अयस्क माफियाओं की दाल नहीं गल रही है। जिस राज्य में लौह अयस्क के खनन व निर्यात पर प्रतिबंध के चलते लौह अयस्क माफिया कंपनियों और ठेकेदारों को प्रतिदिन तीन सौ करोड़ रुपये का घाटा हो रहा हो, वहां सरकार गिराने के लिए इतना पैसा खर्च करना तो बहुत छोटी राशि है।
रही बात भारतीय जनता पार्टी की। वह कर्नाटक में सरकार बचाना भी चाहती है और रेड्डी बंधुओं के साथ भी रहना चाहती है। भाजपा अपने चाल-चरित्र के मुताबिक पिछड़े वर्ग को एक शानदार नेता के रूप में नहीं देख सकती, लेकिन वह उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग के नेतृत्व को हाशिए पर लगाने का परिणाम देख चुकी है और केंद्र में सत्ता के लिए लार टपकाने के सिवा उसके हाथ में आज कुछ भी नहीं है। ऐसे में वह येदियुरप्पा को ठिकाने लगाने का जोखिम भी नहीं उठाना चाहती, क्योंकि ऐसा करने पर वह राज्य भी भाजपा के हाथ से निकलना तय है।
कर्नाटक में लोकतंत्र बहाली में असल समस्या लौह अयस्क के अवैध लूट पर रोक है। अगर येदियुरप्पा हटते हैं तो कांग्रेस, भाजपा सहित सभी पार्टियां खुश ही होंगी, क्योंकि लूट में सबका मुंह काला है। लेकिन येदियुरप्पा को हटाने का मतलब होगा की भाजपा अपनी कब्र तैयार कर लेगी। ऐसे में संकट गहराना स्वाभाविक है।
Wednesday, September 1, 2010
न्यायालय भी किसानों के लिए नहीं!!
लघु एवं कुटीर उद्योग के तहत बनने वाले उत्पाद के खरीद की व्यवस्था सरकार करती है। केंद्र सरकार ने अनाज की सरकारी खरीद व्यवस्था बनाई थी। लेकिन यह व्यवस्था फाइलों तक ही सीमित रही। पंजाब और हरियाणा को छोड़ दिया जाए तो किसी भी राज्य में सरकारी खरीद नाममात्र को होती है। सरकारी खरीद का ही फायदा है कि वहां के किसान बिचौलियों के चंगुल में नहीं फंसते और कुछ हद तक इन राज्यों के किसान खुशहाल हैं। अन्य राज्यों में तो किसान आज भी आत्महत्या करने की कगार पर हैं, वे इसलिए नहीं मरते कि गांवों में अभी भी लोगों की जिजीविषा ज्यादा है।
हां कुछ सालों से सरकारी खरीद इसलिए बढ़ गई, क्योंकि स्थानीय जनता और नेताओं का दबाव अनाज के सरकारी खऱीद को लेकर बढ़ा। सरकारी खरीद होती ही कितने खाद्यान्न की है? गेहूं, चावल, दाल, कपास जैसे कुछ नाममात्र के कृषि जिंस हैं, जिनकी खरीदारी सरकार करती है। आलू, प्याज और अन्य कच्चे माल की खेती करने वाले किसान तो आज भी आए दिन बर्बाद होते रहते हैं और लाखों टन आलू खेतों में या किसानों के घर-आंगन में सड़-गल जाता है।
अगर न्यायालय किसानों के हित की बात सोचते तो कब का यह व्यवस्था दे चुके होते कि किसानों का सारा अनाज सरकार खरीदे और उसका रखरखाव करे। उसके बाद किसानों को भी खाने के लिए अनाज सब्सिडी रेट पर या फ्री में दिया जाए। लेकिन ऐसा नहीं। अगर गेहूं का उत्पादन लागत १० रुपये किलो आता है और किसान उसे ३० रुपये किलो बेचे तो शायद उसे हाथ फैलाने को विवश नहीं होना पड़े। किसान खुद कोल्ड स्टोरेज और अनाज के रखरखाव की सुविधा विकसित कर लेगा। लेकिन खाद्यान्न कीमतों पर तो सरकार का शिकंजा है और कीमतें बढ़ाने या घटाने में दलालों और बिचौलियों की ही मुख्य भूमिका होती है।
आखिर हमारी न्यायपालिका कब कहेगी कि देश में ऐसी नीति बनाइये कि हर इलाके में पर्याप्त गोदाम, कोल्ड चेन और अन्य सुविधाएं हों, जिससे किसानों के उत्पाद बर्बाद न होने पाएं। इससे न सिर्फ खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि किसान को अगर उचित फायदा और बेहतर जीवन स्तर मिलने लगेगा तो वे महानगरों में मजदूरी करने के लिए विवश नहीं होंगे।
Wednesday, August 11, 2010
आखिर वही हुआ, जो संदेह था!
मेरे कुछ मित्रों ने यह भी लिखा कि ऐसा ही पैकेज पंजाब को भी दिया गया। पंजाब में तो ऐसा एक बार या दो बार किया गया। कश्मीर में तो लगातार यह हरकत जारी है। पंजाब ने भी तो आखिर कश्मीर से ही सीख ली थी। पंजाब का उदाहरण देकर कश्मीर के पैकेज को तो कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता है।
आखिर इस पैकेज और रोजगार से क्या फायदा मिलने वाला है? यह तो सीधे-सीधे ब्लैकमेलिंग है। कश्मीर की हालत आज ऐसी है कि वहां हर घर में सरकारी नौकरी है। खाद्यान्न से लेकर फल और मेवा सब कुछ सस्ते में सब्सिडी रेट पर मिलता है। कुल मिलाकर कहें तो आर्थिक राम राज्य जैसा माहौल पिछले ५० साल में केंद्र सरकार ने बना दिया है।
तर्क दिया जाता है कि हाथों को रोजगार नहीं है, इसलिए वहां के युवक पथराव करने को मिल जाते हैं। आखिर देश को कब तक बेवकूफ बनाया जाता रहेगा? वहां रोजगार और सरकारी नौकरियां करने वाले लोग और उनके बच्चे भी पथराव करते हैं। हाल ही में मैने एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में पढ़ा कि बेरोजगारी बहुत बड़ा संकट है कश्मीर में। हालांकि लेखक महोदय शायद यह नहीं जानते कि वहां के लोग न तो रोजगार की मांग कर रहे हैं, न बिजली, सड़क, पानी और अन्य बुनियादी सुविधाओं की। आखिर मांगें भी क्यों? देश के किसी भी पहाड़ी या मैदानी हिस्से से तुलना की जाए तो वहां बहुत ज्यादा विकास हुआ है। अगर पड़ोस के ही पाक अधिकृत कश्मीर से तुलना की जाए तो नरक और स्वर्ग का अंतर नजर आता है।
मीडिया में लिखने और कश्मीर की जनता की आवाज दिल्ली में उठाने वाले लोग आखिर इस बात पर सवाल क्यों नहीं उठाते कि एक ही चैनल में दिल्ली में बैठा एंकर कहता है कि आतंकवादियों ने ३ सुरक्षा बलों की हत्या कर दी और कश्मीर में तैनात उसी चैनल का संवाददाता जब लाइव देता है तो कहता है कि मिलिटेंट्स ने सुरक्षा बलों पर हमला किया। क्या उसी चैनल का कश्मीरी रिपोर्टर यह बताने की कोशिश करता है कि हमलावर टेररिस्ट या आतंकवादी नहीं, बल्कि मिलिटेंट या धर्मयोद्धा हैं, जो धर्म के लिए युद्ध कर रहे हैं? आज ही हुए एक हमले के मामले में देश के सबसे बड़े अंग्रेजी न्यूज चैनल में यह घटना हुई।
अगर कश्मीर के लोग नहीं चाहते कि कश्मीर में रोजगार बढ़े, सड़कें बने, पुल बने, विकास हो तो सरकार ऐसा क्यों चाहती है?? क्या कश्मीर में सुविधाएं नहीं दी जाती तो देश के मुसलमान भारत के खिलाफ हो जाएंगे? ऐसा नहीं है। लेकिन फिर भी दिल्ली में बैठे नीति नियंताओं को समझ में नहीं आता कि कश्मीर में यथास्थिति बनाए रखने के अलावा कुछ भी किए जाने की जरूरत नहीं है।
कश्मीर में ऐसा माहौल है कि जो नेता भारत को जितनी ज्यादा गालियां देगा, उसे उतना ही वोट (या कहें जनता का समर्थन) मिलेगा। कश्मीर के लोगों को शायद ही यह एहसास हो कि वहां उत्पादकता नगण्य होने के बावजूद उस तरह के अन्य इलाकों या देश के किसी समृद्ध इलाके के आम लोगों की तुलना में वहां ज्यादा स्वतंत्रता और आर्थिक समृद्धि है। वहां के लोगों को तो यही एहसास है कि भारत को जितनी गालियां दी जाएं, जितना ही सुरक्षा बलों को पीटा जाए, उतनी ही सुविधाएं और आर्थिक मदद मिलती जाएगी। ऐसे में भारत को गालियां देने वाले ही वहां के स्थानीय लोगों के आदर्श हैं।
अगर पैकेज दिया ही जाना है तो कश्मीर के उन लोगों के पुनर्वास का पैकेज जाना चाहिए, जिन्हें कश्मीर से भगाया जा चुका है। देश के अन्य इलाकों के हिंदू- मुसलमानों (या कहें देशवासियों) को भी कश्मीर में रहने व बसने की आजादी मिलनी चाहिए, न कि कश्मीर के नेताओं को पैकेज देकर उन्हें सेना के खिलाफ हथियार खरीदने की आजादी।
Thursday, June 24, 2010
एक ही गांव के लोग भाई-बहन होते है...
गांव में रिश्तों की एक तासीर होती है। वे शायद शहरी रिश्तों को नहीं समझ पाते कि बगल वाले फ्लैट में रहने वाला व्यक्ति, रिश्ते में उसका क्या लगता है? शायद इसका कारण है कि शहरों में अभी लोग १०-२० या ४०-५० साल से बसे हैं। वे अलग-अलग इलाके से आते हैं। उन्हें बगल वाले के दुख-दर्द से कोई मतलब नहीं होता। अगर बगल के फ्लैट में कोई अकेला है, बीमार है और मरने की कगार पर है तो उसका पड़ोसी ऑफिस जाना ज्यादा जरूरी समझता है। गांव का आदमी अगर आधी रात को बीमार पड़ता है तो गांव में संसाधन, इलाज की सुविधा आदि न होने के बावजूद पूरा गांव एकत्र हो जाता है औऱ उसे अगर १०० किलोमीटर दूर इलाज के लिए ले जाना पड़ता है तो गांव के १० लोग साथ हो लेते हैं। लोगों के पास पैसा नहीं होता है लेकिन गांव में तत्काल १०-२० हजार रुपये इकट्ठा हो जाता है। दिल्ली में ज्यादातर लोग लखपति हैं, लेकिन यहां १०-२० प्रतिशत आबादी भूखे पेट सो जाती है। गांव में सभी लोग आधा पेट भोजन करते हैं, और भूख से तभी मरते हैं जब पूरा गांव भूख से मरने की कगार पर पहुंचने को होता है।
यह होती है रिश्तों की तासीर। यह होता है गांव और शहर के रिश्तों में फर्क, जो मैने महसूस किया है।
Sunday, June 20, 2010
कहीं आप भी बॉस और मातहत से भयभीत होकर अपनी निजी जिंदगी का नाश तो नहीं कर रहे?
श्यामल मजूमदार
समंदर के किनारे खड़े नारियल के खूबसूरत पेड़, सफेद रेत और आसमां को छूने की कोशिश करती सागर की लहरें किसी की भी आंखों को सुकून देने के लिए काफी हैं। लेकिन कुछ ज्यादा ही व्यस्त रहने वाले मिस्टर एक्जीक्यूटिव (आज के दौर की कंपनियों में काम करने वाले बड़े अफसर, आमतौर पर प्रबंधक) इन्हें उतनी रूमानियत के साथ नहीं देख पाते। वे तो बस सुबह अपने दफ्तर जाने के दौरान मीठी नदी (मुंबई में हवाई अड्डïे के करीब से बहती है।) को देखकर ही अपनी खुशी ढूंढऩे की कोशिश करते हैं। उस वक्त उनका दिमाग भी एक अलग स्तर पर होता है जहां वे या तो दूसरों के बॉस होते हैं या फिर वे खुद को किसी के मातहत पाते हैं।
आखिर इन लोगों के लिए गोवा में अरब सागर के खूबसूरत तटों के क्या मायने हो सकते हैं? मिस्टर एक्जीक्यूटिव और उनके जैसे कई महानुभाव होते हैं जो शारीरिक रूप से तो बीच पर मौजूद होते हैं लेकिन उनका मन कहीं और रमा होता है। या तो वे अपने फोन पर बातचीत करते हुए पाए जा सकते हैं या फिर उनकी उंगलियां ब्लैकबेरी फोन पर कसरत करती हुई नजर आ सकती हैं, जिससे वह अपने दफ्तर के लोगों को जरूरी संदेश भेज रहे होंगे। दूसरी ओर उनके साथ सैरसपाटे के लिए गया उनका परिवार इससे उकता जाता है और खुद ही समंदर किनारे की सैर के लिए निकल पड़ता है। एक 12 साल की बच्ची अपनी मां से शिकायत करते हुए पाई जा सकती है कि पापा दूसरे 'बच्चेÓ (फोन) को उससे ज्यादा प्यार करते हैं। उसके पिता उन अनगिनत प्रबंधकों में से एक हो सकते हैं जो अपने कनिष्ठों को लगातार काम देते रहते हैं लेकिन इस काम को किसी भी सूरत में अंजाम तक पहुंचाने की माथापच्ची उनके जिम्मे ही होती है। ये प्रबंधक अपने कनिष्ठों पर उतना ही भरोसा करते हैं जितना कोई गाड़ी चलाने के मामले में पांच साल के बच्चे पर करता है। लेकिन कुछ ज्यादा ही व्यस्त रहने वाला एक्जीक्यूटिव तबका खुद ही कई बार अपनी भूमिका को लेकर भ्रमित रहता है।
अगर छुट्टिïयां मनाने के दौरान उनमें से किसी का मोबाइल स्विच ऑफ है और उनका लैपटॉप होटल के कमरे के किसी कोने में पड़ा है तो एकबारगी उस एक्जीक्यूटिव के मन में यह भाव घर कर सकता है कि कहीं वह बेकार प्रबंधक तो नहीं है या जरूरी चीजों को करने में समर्थ नहीं है, वगैरह-वगैरह। अगर किसी एक्जीक्यूटिव के ईमेल इनबॉक्स में या वीडियो कॉन्फ्रेंसेज में उसके बॉस या मातहतों के 500 से ज्यादा ईमेल भरे हैं तो कोई अचंभे वाली बात नहीं है। ये बॉस सोते भी अपने मोबाइल फोन के साथ ही हैं। ज्यादातर मामलों में यही होता है कि सोने से पहले फोन ही देखा जाता है और सुबह उठते भी सबसे पहले फोन का ही जायजा लिया जाता है। कुछ लोग तो एक हद से भी ऊपर यह काम करते हैं। मौजूदा दौर में कॉर्पोरेट जगत ऐसे ही लोगों से भरा पड़ा है और यही लोग इस दुनिया को चला भी रहे हैं। ये लोग अपनी केबन तक पहुंचने के लिए भी लिफ्ट या एस्केलेटर का ही इस्तेमाल करते हैं और सीढिय़ां केवल उन्हीं लोगों के लिए बच जाती हैं जो उनकी सफाई का काम करते हैं।
छुट्टिïयों से उनका मतलब केवल कामकाजी छुट्टिïयों से होता है जिसमें काम पर ही सबसे ज्यादा ध्यान होता है। आप मुंबई की एक एफएमसीजी कंपनी के उपाध्यक्ष के एक मामले से इसे समझ सकते हैं। एक बेहद दुर्लभ मामले में जब उन्होंने अपना ब्लैकबेरी फोन बंद किया तो उनका यही कहना था कि पिछले तीन साल में यह उनका पहला ब्रेक है। क्योंकि आज की बेहद तेजी से भागती कारोबारी जिंदगी में उनके पास इसके अलावा और कोई विकल्प भी मौजूद नहीं है। वह कहते हैं, 'मैं खुद वहां मौजूद नहीं होता हूं लेकिन तकनीक के जरिये मैं उससे जुड़ा रहता हूं। मैं इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकता कि मेरी गैरमौजूदगी में काम जरा भी प्रभावित हो।
आज के दौर में इन उपाध्यक्ष जैसी हजारों मिसालें आपको मिल जाएंगी। उनमें से कई ऐसे भी होते हैं जिनमें असुरक्षा का भाव काफी होता है जो ऐसा करके खुद को सुरक्षित दायरे में महसूस करते हैं। इस कवायद से वे रिमोट कंट्रोल के जरिये अपने कनिष्ठों को साधते हैं तो अपने वरिष्ठïों से शाबाशी की आस रखते हैं। इसका दुखद पहलू यही है कि उनमें से ज्यादातर को यही लगता है कि उनके किए का सारा श्रेय उनके वरिष्ठï ले जाएंगे और उन्हें फिर बेहद चुनौतीपूर्ण काम थमा दिया जाएगा जिसके लिए वक्त भी काफी कम मिलेगा। इससे उन्हें लग सकता है कि काम के अलावा उनकी कोई जिंदगी नहीं है। इससे भी बड़े दुख की बात यह है कि यह सिलसिला बदस्तूर चल रहा है और वे लोग इसे आगे बढ़ा रहे हैं जो खुद कभी निचले पदों पर काम करते थे।
इसमें कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि कुछ साल पहले भारत में कर्मचारियों के बीच हुए एक सर्वेक्षण में तकरीबन 75 फीसदी ने अपने बॉस को घटिया करार दिया था। इसकी बड़ी वजह यही हो सकती है कि कई बॉस प्रोन्नति के मामले में कंपनी की घटिया नीतियों के कारण मनमाने तरीके अपनाकर कुछ भी कर सकते हैं। उनमें से कई अपने मातहतों के करियर की दशा और दिशा बिगाड़ सकते हैं तो कई मामलों में कम योग्य लोगों को ही बड़ी कुर्सी तक भी पहुंचा सकते हैं।
मंदी के दौर में पिछले कुछ अर्से में तो हालात और भी बुरे हुए हैं और इन प्रबंधकों की मुश्किलें और बढ़ी हैं। उन्हें कर्मचारियों की संख्या घटाने, लागत कम करने और कई दूसरे कठिन मोर्चों पर कमान संभालनी पड़ी है। अनुमान के मुताबिक कई भारतीय कंपनियों ने तो इस मामले में हद ही कर दी। कई कंपनियां दो व्यक्तियों का काम एक ही व्यक्ति से ले रही हैं तो कुछ ने काम के घंटे ही बढ़ा दिए हैं। मतलब कि एक दिन में 12 घंटे कंपनी के लिए काम करना कोई बड़ी बात नहीं रह गई है। इस तरह के परिदृश्य में कामकाजी जिंदगी और असल जिंदगी में संतुलन कायम रखना मुश्किल हो गया है। पिछले कुछ वर्षों में ज्यादा से ज्यादा लोगों ने काम पर अपना ज्यादा वक्त लगाया है और जिंदगी को कम ही वक्त मिल पाया है। यह केवल भारत में ही नहीं हो रहा है बल्कि दुनिया इस बीमारी से जूझ रही है।
साभारः http://www.business-standard.com/india/news/shyamal-majumdar-more-work-+-blackberry-=-holiday/396249/
Friday, June 18, 2010
एक साथ कई काम? कहीं आप बीमार तो नहीं?
श्यामल मजूमदार
अपराह्न के तीन बजे हैं। ईमेल देखने, न्यूज चैनल पर नजर डालने के दौरान आप लंबी दूरी की कॉल भी स्वीकार कर रहे हैं, साथ ही अनिच्छा के साथ सैंडविच का कौर भी ग्रहण कर रहे हैं जो कि ठंडा हो चुका है।
ऐसा इसलिए क्योंकि रोजाना की बैठकों की वजह से आपको पर्याप्त समय नहीं मिल रहा। आपको लग रहा होगा कि आपके साथ भी ऐसा हो रहा है? आपकी तरह ऐसे असंख्य एग्जिक्यूटिव हैं जो 60 मील प्रति घंटा (इसे 80 कर देते हैं) के हिसाब से जिंदगी चलाने के बारे में सोच रहे हैं और उन्हें लगता है कि ऐसे रास्ते पर चलकर ही आगे बढ़ा जाता है।
लेकिन मनोवैज्ञानिकों के पास 24X7 वाले ऐसे अस्तित्व के लिए एक शब्द है और वह है हरी सिकनेस, जिससे ग्रसित कोई व्यक्ति समय की कमी महसूस करता है और इस वजह से हर काम तेजी से करने की चेष्टा करता है। जब इसमें किसी तरह की देरी होती है तो वह घबरा जाता है।
ऐसे लोग पूरे कार्यसमय के दौरान छोड़ी गई मिसाइल की तरह चलते रहते हैं (वे दूसरों के मुकाबले काफी पहले दफ्तर पहुंचते हैं और बाकी लोगों के जाने केबाद दफ्तर छोड़ते हैं), वे इस उम्मीद में ऐसा करते हैं कि स्थायी रूप से व्यस्तता देखकर बॉस प्रभावित होंगे।
इसका दूसरा पहलू हालांकि यह है कि ऐसे लोग काम का व्यस्तता के साथ घालमेल कर रहे होते हैं और स्मार्ट बनकर काम किए जाने को लंबे समय तक व तेजी से काम करने से भ्रामक बना देते हैं। एचआर सलाहकार कहते हैं कि ऐसे व्यस्त लोगों को यह समझने की दरकार है कि करियर के लिए जहां ऐसी भावभंगिमा जरूरी हो सकती है, वहीं जिंदगी में इस भावभंगिमा की वजह से बहुत कुछ देखा जाना बाकी रह सकता है।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि हरी सिकनेस कॉरपोरेट रैट रेस की चिंता में वहां पहुंचना और उसमें मगन होने के मुकाबले बहुत कुछ और है। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्तियों को कभी-कभी यह अहसास नहीं होता कि तेज गति और अतिरिक्त घंटे तक काम करना लंबी अवधि के लिए टिकाऊ नहीं हो सकता है। अगर वे ऐसा कर सकते हैं तो उनके काम की गुणवत्ता वैसी नहीं रह पाती है क्योंकि वे गौरवान्वित रोबोट के अलावा कुछ और नहीं होते।
मॉडर्न टाइम्स मूवी को याद कीजिए जहां चार्ली चैपलिन फैक्टरी की असेंबली लाइन में रोजाना आठ घंटे तक खड़े रहते हैं और वहां से गुजर रहे नट को औजार से कसते रहते हैं। समय-समय पर बॉस कन्वेयर बेल्ट की गति बढ़ा देता है और चैपलिन को तेज गति से काम करना पड़ता है। पूरे दिन वह अपनी बांह को एकसमान तरह से ही चलाते हैं।
आठ घंटे बाद वे जब वहां से बाहर निकलते हैं तो उनका काम नहीं रुकता। घर जाने के दौरान हालांकि उनके पास औजार नहीं होता, पर लोगों के मनोरंजन के लिए वे पूरे रास्ते उसी तरह का हाव-भाव दिखाते रहते हैं। अपने कार्यस्थल पर जल्दबाजी में रहने में रहने वाले लोगों के साथ भी ऐसा ही होता है।
एक समय के बाद वे सोचना बंद कर देते हैं और सही मायने में चैपलिन की ही तरह प्रतिक्रिया जताते हैं, जैसा कि वे घर जाने के दौरान जताते थे। और ज्यादा सक्षम बनने के लिए ऐसे लोग लगातार जल्दबाजी में रहते हैं। उन्हें लगता है कि हर समय आपातकालीन स्थिति है, लेकिन जब सही मायने में आपातकालीन स्थिति आती है तो वे इसका प्रत्युत्तर देने में अपने आपको अक्षम पाते हैं।
'द 80 मिनट एमबीए' के लेखक रिचर्ड रीव्स व जॉन नेल कहते हैं कि नियुक्ति करने और उन्हें बाहर का दरवाजा दिखाने की खातिर कामयाब नेतृत्व अपने आपको व सहयोगियों को समझने या जानने में समय लेते हैं। लेकिन जो लोग जल्दी में होते हैं उन्हें लगता है कि सभी लोगों के लिए संसाधनों का अभाव है। इस किताब ने क्विक हरी सिकनेस टेस्ट के बारे में बताया है, उसका सार इस तरह से है :
1। जब आप सुबह ब्रश कर रहे होते हैं तो क्या आप उस समय कुछ और काम कर रहे होते हैं मसलन अंडरवियर खोजना, बच्चों पर चिल्लाना आदि?
2. जब आप ट्रेन या विमान पकड़ते हैं- उन क्षणों में प्रवेश करना जब दरवाजा बंद होने वाला हो ?
3. जब आप लिफ्ट में प्रवेश करते हैं तो क्या आप तत्काल डोर क्लोज का बटन खोजते हैं? आप इस सच्चाई को नजरअंदाज कर रहे हो सकते हैं कि चार सेकंड में अपने आप दरवाजा बंद हो जाएगा। इस अवधि तक आपको इंतजार करना निश्चित रूप से अकल्पनीय लगता है, क्या ऐसा नहीं है?
4। आप लिफ्ट के बटन को कितनी बार दबाते हैं क्योंकि वह 16वीं मंजिल से नीचे आने में समय ले रहा है? आपमें से कुछ वास्तव में ऐसा करते हैं मानो ऐसा करने से लिफ्ट के आने की गति तेज हो जाएगी।
अब इसकी गिनती कीजिए कि कितने सवालों का जवाब आपने हां में दिया है। अगर स्कोर दो है तो फिर आप समय के साथ हैं। अगर स्कोर तीन है तो यह हरी सिकनेस का शुरुआती लक्षण है। और अगर स्कोर चार है तो दिन में ज्यादातर समय अपनी ही पूंछ का पीछा कर रहे होते हैं, इसका मतलब यह हुआ कि बीमारी उन्नत चरणों में पहुंच चुकी है।
चिकित्सा विज्ञान में इसके लिए शब्द है फिबरिलेशन। जब आपके दिल की धड़कन ऐसी स्थिति में होती है तो खून अवरूध्द हो जाता है बजाय इसके कि इसके जरिए खून का प्रवाह होता है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इन सब बातों का यह मतलब नहीं है कि आप अपने काम की गति इतनी धीमी कर लें कि जब जरूरत पड़े तो तेजी से काम न कर पाएं।
आप इस हद तक न जाएं जिसे ग्लाइक, मल्टी टास्किंग, चैनल फ्लिपिंग, फास्ट फॉरवर्डिंग आदि का नाम देते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि लिफ्ट के बटन को न ठोकें, यह काम को रोक देगा।
http://www.business-standard.com/india/news/shyamal-majumdar-hurry-sickness/397777/